यदि मैं तानाशाह होता तो…

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मैं तानाशाह होता तो...

एक अध्यापक जी “गाय हमारी माता है” पर निबंध लिखवा-लिखवा कर जब निहायत ऊब गए तो एक दिन उन्होंने अपने विद्यार्थियों को एक नया विषय दिया. निबंध का विषय था – “मैं तानाशाह होता तो...”

एक विद्यार्थी को पूरे अंक मिले. 100 में 100. किसी ने सूचना का अधिकार लगा कर उसकी उत्तर-पुस्तिका की प्रतिलिपि हासिल कर ली और उसे वाट्सएप्प पर चढ़ा दिया. देखते-देखते यह वायरल हो गया. अपना भी धर्म बनता है कि इसे आगे अपने तमाम संपर्कों को फारवर्ड करें. लिहाजा पेश है वह निबंध –

यदि मैं तानाशाह होता...

मैं तानाशाह होता तो पुलिस और न्यायालय को एक झटके में पूरी तरह से खत्म कर देता. न्याय तो वैसे भी किसी को मिलता नहीं है, कभी मिलता भी है तो बहुत देर से – न्याय में देरी यानी अन्याय. और, जब न्यायालय ही नहीं रहेंगे तो भला पुलिस का क्या काम!

मैं तानाशाह होता तो भ्रष्टाचार और घूसखोरी को कानूनी करार दे देता, और इन पर सेवा कर लगा देता. खूब, जी भर कर भ्रष्टाचार करो, घूसखोरी करो और जम के सर्विस टैक्स दो. जनता का भी भला और सरकार का भी भला.

मैं तानाशाह होता तो हर किस्म के अतिक्रमण को मौलिक अधिकार घोषित कर देता और तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों, मजारों आदि में उच्च-शक्ति के लाउडस्पीकरों से न्यूनतम 5000 डेसीबेल की ध्वनि से 24 घंटे धार्मिक भजन, पाठ, इबादत आदि अनिवार्य कर देता क्योंकि धर्म में ही जनता की प्रगति टिकी है.

मैं तानाशाह होता तो आयकर खत्म कर देता और व्ययकर चालू कर देता. आजकल जहाँ देखो दुकान और मॉल खुल रहे हैं और सब के सब भीड़ भरे – आय भले न हो, जनता व्यय ही व्यय कर रही है – यानी सरकारी खजाने को भरने की फुलप्रूफ़ योजना. वैसे भी, अपनी आय को हर कोई छुपाता फिरता है, परंतु व्यय को नहीं. ऊपर से, व्यय को बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं. पांच सौ रुपल्ली की साड़ी को पड़ोसन पांच हजार की बताती है और डेढ़ सौ रुपल्ली के टी-शर्ट को पड़ोसी डेढ़ हजार का बताता है.  व्यय गारंटी योजना के तहत हर व्यक्ति को प्रतिमाह न्यूनतम पच्चीस हजार खर्च करने की सीमा बाँध देता. यानी एक झटके में ही गरीबी का समूलनाश!

 

मैं तानाशाह होता तो पी.एस.सी., यूपीएससी, सीसैट, पीएमटी, सीपीएमटी, कैट, गेट आदि-आदि तमाम चयन परीक्षाओं को समाप्त करवा देता. इनके बजाय पैसा दो, अंदर आओ पद्धति लागू कर देता जिसमें जो अभ्यर्थी देश के खाते में ज्यादा पैसा जमा कराएगा, वो पहले प्रवेश पाएगा – अब तक  इन चयन परीक्षाओं के अधिकतर पेपर वैसे भी आउट होते हैं, और चयन में घोर यादव-चौटाला-चौहान-करुणा*धि-आदि-आदि-वाद होता ही रहा है, जिससे देश को कोई फायदा नहीं होता!

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निबंध आगे और भी जारी है, पर इस बीच एक विचार आया है-

यदि आप तानाशाह होते तो?

टिप्पणियाँ

  1. इससे से तो यह प्रमाणित हो रहा है।
    जो जैसा जनून सर चड़ता,उसे लागू करवा देता।
    अस्वीकृति का सर कटवा देता। ओर फिर देखो व्यवस्ता पूर्ण रूप से सूरक्षित रहती। न चोरी न चकारी। भ्रष्ट मुक्त राष्ट्र का निर्माण होता।

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  2. बहुत सुंदर लेख, यदि मै तानाशाह होता ... सच में सरकार सरकार चलाने के चक्कर में लूट ही तो रही है ...

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  3. सरकार को मारिये गोली... वो तो वैसे भी निरंकुश और तानाशाह है... मैं ताना शाह होता तो क्या करता?? शायद नया कुछ नहीं कर पाता, वही करता जो इतिहास में लोग करते आये हैं!
    (इमोशन में बहकर नहीं - हक़ीक़त के चश्मे से कह रहा हूँ)

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की मंगलवार ०५ अगस्त २०१४ की बुलेटिन -- भारतीयता से विलग होकर विकास नहीं– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...
    एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें.
    सादर आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या बात है.... अति सुंदर
    http://pratibimbprakash.blogspot.in/

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  6. व्यय कर लागू कर ही देना चाहिये।

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