राजेश रंजन का आलेख - अपना कंप्यूटर अपनी भाषा में - अंतिम भाग - कंप्यूटरों का स्थानीयकरण

(पिछले भाग 6 से जारी)

11. स्थानीयकरण का ईंधनफ़्यूल (FUEL)

लगातार सॉफ़्टवेयर लोकलाइज़ेशन के लिए काम करते हुए जो ज़रूरत सबसे ज़्यादा महसूस की गई वो यह कि अंग्रेज़ी की तुलना में हमारे कामों में जो सबसे ज़्यादा भिन्नता जहाँ है वह है मानकीकरण व एकरूपता की. जहाँ अंग्रेज़ी में कमोबेस सारे तकनीकी शब्द फिक्स हो गए हैं वहीं हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में एक अराजकता की स्थिति है. इसका एक कारण है कि सभी अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं और उनके काम के बीच तालमेल व बातचीत का अभाव है. फ़्यूल की शुरुआत इसी उद्देश्य से की गई. चूँकि मुक्त स्रोत के अंतर्गत अनुवाद अलग अलग जगहों से आते हैं अलग अलग भाषा रूपों को अपने में रखते हुए इसलिए यहाँ यह और जरूरी हो जाता है कि उनके कामों के बीच कम से कम एक न्यूनतम मानक रहे जो उनके लिए दिशानिर्देश का काम करे.

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इसी क्रम में ऐसा ख्याल आया कि क्यों न सबसे पहले उन शब्दों व प्रविष्टियों को लिया जाए जो सबसे पहले व प्रयोग में बार-बार सामने आते हैं. जैसे उन सारे अनुप्रयोगों के मेन्यू व सबमेन्यू आदि. इस प्रकार का काम न केवल प्रारंभिक स्तर पर विसंगतियों की सारी स्थितियों को दूर करता है बल्कि नया आरंभ करने वाले लोगों के लिए एक निर्देशिका की तरह भी प्रयोग किया जा सकता है ताकि समुदाय उन शब्दों पर गौर कर सकें जो उनके अनुप्रयोगों के अनुवादों के लिए बहुत जरूरी थे. इन्हीं स्थानीयकरण के लिए बारंबार प्रयुक्त प्रविष्टियों को FUEL (Frequently Used Entries For Localization) का नाम दिया क्योंकि यही वे शब्द हैं जो लोकलाइज़ेशन की सफलता के लिए बतौर ईंधन का काम कर सकते हैं. इसके लिए गनोम मेन्यू, नॉटिलस, पिज़िन, फ़ायरफ़ॉक्स, गनोम टर्मिनल, इवोल्यूशन, ओपनऑफ़िस को शामिल किया गया. करीब छह सौ शब्द चुने गए. ज़ाहिर है कि यह एक छोटी-सी शब्दावली है और सभी समुदाय इसको अपने अनुवाद के दौरान अपने ध्यान में आसानी से रख सकती हैं.

बहुत कम भाषाओं में कंप्यूटिंग शब्दावली अभी बन पाई है और इसलिए फ्यूल से तैयार की गई शब्दावली पहली कंप्यूटिंग शब्दावली साबित हो पा रही है. मैथिली के फ़्यूल मूल्यांकन कार्यशाला से यह बात काफ़ी महत्वपूर्ण रूप से सामने आई है. छत्तीसगढ़ी में भी यह पहली ही कोशिश है. सबसे ख़ास बात फ़्यूल की यह है कि इसने सभी वैसे शब्दों को समाहित करने की कोशिश की है जो कि किसी भी कंप्यूटर के ग्राफिकल यूजर इंटरफेस, यानी जीयूआई के पहले तीन-चार स्तर

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फ़्यूल मैथिली सम्मेलन, ए. एन. सिन्हा इंस्टीट्यूट, पटना.

के मेन्यू के दरम्यान पाए जाते हैं यानी ऐसी प्रविष्टियाँ यहाँ दिखेंगी जो कि एक सामान्य उपयोक्ता बार बार उपयोग करता है. तो यह एक प्रकार से मौलिक शब्दावली का भी कार्य करती है. सुविधा के लिए फ़्यूल की हिंदी शब्दावली परिशिष्ट III में मौजूद है जहाँ से संदर्भ लिया जा सकता है. अभी करीब दस भाषाओं पर फ़्यूल के अंतर्गत कार्य चल रहा है.

जरूरी कड़ियाँ:

https://fedorahosted.org/fuel/

https://fedorahosted.org/fuel/wiki/FuelLanguages

डाक सूची:

https://fedorahosted.org/mailman/listinfo/fuel-discuss

संपर्क:

irc.freenode.net: #fuel-discuss

https://fedorahosted.org/fuel/wiki/team-contacts

12. इंडलिनक्स सराय-सीएसडीएस

इंडलिनक्स

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भारत में लोकलाइज़ेशन की शुरुआत का श्रेय काफ़ी हद तक इंडलिनक्स को जाता है. इंडलिनक्स की शुरुआत वर्ष 1999 के दिसंबर में हुई थी, जिसकी शुरुआत करने वालों में प्रकाश आडवाणी और वेंकटेश हरिहरण का नाम आता है. प्रकाश आडवाणी freeOS.com पोर्टल चलाते थे और हरिहरण तकनीकी पत्रकार थे. जून 2000 में इससे करुणाकर पूर्णकालिक सदस्य के रूप में जुड़े. इसके कोर टीम में अपूर्व साह, प्रकाश आडवाणी, वेंकटेश हरिहरण, हर्ष कुमार, और राहुल पाल्कर थे. कुछ ही समय बाद www.indlinux.org सेटअप किया गया. इसी समय शुषा के आधार पर स्थानीयकृत अनुप्रयोग पहली बार तैयार किए गए. गनोम हिंदी का अनुवाद 2002 में शुरू हुआ और भोपाल की टीम ने इसमें काम किया. इसी के तहत हिंदी गनोम का पहला सार्वजनिक डेमो लिनक्स बंगलोर 2002 मीट में हुआ.

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चित्रः इंडलिनक्स के द्वारा आयोजित कार्यशाला के कुछ सहभागी

2003 में हिंदी की पहली समीक्षा कार्यशाला सराय-सीएसडीएस के सौजन्य से हुई और उसके बाद सराय-सीएसडीएस भी भारतीय भाषाओं में लोकलाइज़ेशन को कई रूपों में समर्थन करने लगी.

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सिर्फ़ हिंदी ही नहीं इंडलिनक्स ने कई भाषा समूहों को जो लिनक्स को अपनी भाषाओं में देखना चाहते थे काम शुरू करने में मदद की. इंडलिनक्स अभी भी समुदाय आधारित चर्चाओं के लिए प्रमुख समूह के रूप में गिना जाता है. इसलिए आप यहाँ की डाक सूची पर लिख कर स्थानीयकरण से संबंधित अपनी सारी शंकाओं और सहायता के लिए लिख सकते हैं.

जरूरी कड़ियाँ:

http://indlinux.org/

http://indlinux.org/wiki/index.php/IndLinux:Community_Portal

डाक सूची:

indlinux-group

http://lists.sourceforge.net/mailman/listinfo/indlinux-group

indlinux-hindi

http://lists.sourceforge.net/mailman/listinfo/indlinux-hindi

सराय

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इंडलिनक्स के साथ किसी संस्था ने कंधे से कंधा मिलाकर लगातार साथ दिया तो वह सराय-सीएसडीएस है. 2003 से सराय-सीएसडीएस ने इस क्षेत्र में क़दम रखा तबसे न केवल इंडलिनक्स को कई रूपों में सहयोग दिया है बल्कि दूसरी भाषाओं के लिए भी फेलोशिप आदि के माध्यम से लोकलाइज़ेशन के क्षेत्र में कई कार्य किए हैं. सराय-सीएसडीएस ने हिंदी के लिए लगातार समीक्षा कार्यशाला आयोजित की है और भारतीय परिदृश्य में मुक्त स्रोत के लिए ऐसे कार्य करने वाली ये अकेली संस्था है. ये फेलोशिप सामान्यतया समुदाय के लोगों को विभिन्न मुक्त स्रोत आधारित अनुप्रयोगों के निर्माण में मदद करती है. ये ऐसे कार्यों को बढ़ावा देने की कोशिश करती है जो औपचारिक, सांस्थानिक या बाज़ार से चालित ताक़तों के आधार पर संभव नहीं है. तो यह भी एक जगह है जहाँ सराय-सीएसडीएस के विभिन्न कार्यक्रमों के तहत मदद के लिए कोई भी समुदाय आवेदन दे सकती हैं.

जरूरी कड़ियाँ:

http://www.sarai.net/

http://www.sarai.net/practices/indic-localization

http://www.sarai.net/fellowships/floss

13. मुक्त स्रोत स्थानीयकरण: भारतीय माहौल जुड़े समूह

भारत के प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक यू.आर.अनंतमूर्ति ने एक साक्षात्कार में बताया था कि भाषाएँ तहजीब की खजाना होती हैं. भाषाओं की इस तहजीब को योग्य व समर्थ बनाने की अहमियत न केवल इसे जीवित रखने में बल्कि इसे पल्लवित पुष्पित करने के लिए आज की डिजिटल दुनिया के लिए भी कम जरूरी नहीं रह गया है. यदि कोई भाषा डिजिटल जमाने का हिस्सा नहीं होती है, तो वह भाषा पुरानी हो जाएगी, अपना वजूद खो देगी, उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और कुछ मायनों में वह गुजरे जमाने की वस्तु बन जायेगी. भाषा के अन्त का मतलब है सभ्यता की मौत. धन्यवाद है फ़्री सॉफ़्टवेयर विचारधारा और समकालीन ओपन सोर्स विकास प्रक्रिया का, जिसने कई विभिन्न भाषाओं को नवजीवन दिया. हम कितने छोटे हैं, हमारी तादाद कितनी है, वहाँ यह कोई अर्थ नहीं रखता है. फ़्री व ओपेन सॉफ़्टवेयर अन्य ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया से भिन्न आप सहित प्रत्येक व्यक्ति को, स्थानीय भाषा कंप्यूटिंग को योग्य बनाने के लिए योगदान और इस कारण ग्रामीण भारत में कंप्यूटर द्वारा तकनीक को अपनाने की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए सक्षम बनाता है. हम सभी महात्मा गांधी के उद्धरण की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकते कि ''आप जो कुछ भी करते है, वह महत्वपूर्ण नहीं भी हो सकता है, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप इसे करते हैं.'' यह एक सच्चाई है कि मालिकाना समूह उन आम लोगों की आवश्यकता को पूरा करने को तत्पर नहीं होती, ख़ासकर क्रय शक्ति की अर्थव्यवस्था में, लेकिन हम ओपेन सोर्स कंप्यूटिंग में आमजनों के सरोकार से सम्बन्धित अवसर पैदा कर सकते हैं.

भारत में, कई समूह कंप्यूटर पर भाषा सम्बन्धी कार्य कर रहे है. “लोकलाइजिंग फ़्री सॉफ़्टवेयर फॉर ए फ़्री कंट्री” के नारे के साथ इंडलिनक्स (www.indlinux.org) एक व्यापक और लोकप्रिय ग्रुप है जिन्हें इस कार्य में काफ़ी सफलता मिली है. इंडलिनक्स ऐसे लोगों का समूह है जो बिना किसी हैरानी के विश्वास जताते हैं कि सूचना तकनीक के फायदे आम भारतीयों को व्यापक तौर पर मुफ्त उपलब्ध होना चाहिए. इस संगठन ने कई नये समूहों को आगे आकर साथ-साथ कार्य करने के लिए प्रेरित किया है. पनलिनक्स (http://punlinux.sourceforge.net) बेहद कामयाब मिसाल है. दो वर्षों के दरमियान इस समूह ने भारत की स्पदंन पूर्ण भाषा एवं संस्कृति पंजाबी में भारी मात्रा में तकनीक को स्थानीयकृत किया है. हर चीज चाहे वह फ़ेडोरा हो, या गनोम, या केडीई या फिर ओपनऑफ़िस और सब कुछ! ग्रामीण भारत में फली-फूली एक संगठन की बड़ी सफल कहानी! पनलिनक्स के किसी भी सदस्य का कोई शहरी आधार नहीं. भाषा एवं ओपेन सोर्स के लिए स्नेह के मिश्रण इस उदाहरण ने अविश्सनीय परिणामों को जन्म दिया है.

लिनक्स के भारतीयकरण के लिए कई प्रयास किये जा रहे हैं. एक बड़ी कोशिश, अंकुर (www.bengalinux.org), पहला सामूहिक क़दम है बंगाली को फ़्लॉस डेस्कटॉप पर लाने का. अंकुर का मुख्य लक्ष्य है जीएनयू/लिनक्स ओएस को पूरी तरह स्थानीयकृत कर उपलब्ध कराना है तथा इन्हें इस क्षेत्र में अच्छी सफलता मिली है. गुजराती भाषा समुदाय को कंप्यूटर की ताक़त देने में उत्कर्ष (www.utkarsh.org) का योगदान काफ़ी बड़ा है. यह सबसे व्यवस्थित- व्यावसायिक संगठनों में से एक है. इंडियनओएसएस (www.indianoss.org) गुजराती कंप्यूटिंग के लिए प्रतिबद्ध दूसरा बड़ा नाम है. तमिल के कई सक्रिय समुदाय है- http://sourceforge.net/projects/zha बड़े प्रयासों में से एक है. तमिल लिनक्स (http://groups.yahoo.com/group/tamilinix) लिनक्स/यूनिक्स पर विकसित दूसरा महत्वपूर्ण समूह है. भारत में भारतीय भाषाओं में ओपनऑफ़िस लाने के लिए आईसीटी रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेन्टर द्वारा भारतीयओओ परियोजना (http://trinetra.ncb.ernet.in/bharateeyaoo) पहला क़दम है. यह काम डेवलेपमेंट गेटवे फाउंडेशन के क्रियाकलाप के रूप में किया जा रहा है.

हिन्दी भाषा के लिए कई संगठन काम करते हैं. इंडलिनक्स ने भी अपना काम हिन्दी से ही शुरू किया. हिन्दी के लिए विभिन्न परियोजनाओं को एक सूत्र में बांधने के इरादे से सोर्सफोर्ज पर हिन्दी प्रोजेक्ट (http://hindi.sourceforge.net ) भी शुरू हुई है. यह मूलतः फ़ेडोरा, गनोम, केडीई, मोज़िला, और ओपनऑफ़िस पर केंद्रित किए हुए है. मलयालम परियोजना (http://malayalam.sarovar.org) मलयालम पैकेज के लिए टाईप सेटिंग के वास्ते माक्रोस और फोन्टस का एक सेट ऑफर करता है, जो दक्षिण भारतीय राज्य केरल के अनुमानित सवा तीन करोड़ लोगों की प्राथमिक भाषा है. सरोवर परियोजना (http://sarovar.org/projects/oriya/) ओड़िया में लिनक्स को उपलब्ध कराने का पहला चरण है. जीएनयू/लिनक्स तेलुगु लोकलाइज़ेशन एफर्ट (http://telugu.sarovar.org) सामान्य अनुप्रयोगों को जीएनयू/लिनक्स गनोम, केडीई, मोज़िला और ओपेन आफिस सहित सबको स्थानीयकृत बनाने का लक्ष्य रखता है. स्वतंत्र मलयालम कंप्यूटिंग (http://sarovar.org/projects/smc) मौजूदा समय में जीएनयू/लिनक्स आलेखीय अंतरफलक को मलयालम में अनूदित/स्थानीयकृत करने हेतु रोशनी प्रदान करता है. स्वतंत्र मलयालम फोंट्‌स (http://sarovar.org/projects/smf) स्वतंत्र मलयालम कंप्यूटिंग की एक सहायक परियोजना है. इसका मकसद मलयालम फोंटस को पर्याप्त आज़ादी देना है. इंडिक ट्रांस (www.indictrans.org) भारतीय भाषाओं में लिनक्स स्थानीयकरण के लिए कार्य करता है. इंडिक-कंप्यूटिंग प्रोजेक्ट (http://indic-computing.sourceforge.net) भारतीय भाषा कंप्यूटिंग सवालों के लिए तकनीकी दस्तावेज मुहैया कराता है. और कई नाम हैं: कन्नड़ लोकलाईजेशन इनीशियेटिव (http://kannada.sourceforge.net) कन्नड़ की भाषा के लिए कार्य करता है और तमिज लिनक्स (http://www.thamizhlinux.org) तमिल भाषा में एक दूसरा प्रयास है. फ़्री सॉफ़्टवेयर लोकलाइज़ेशन इन असामीज (http://sourceforge.net/projects/luit) असमिया भाषा के लिए कार्य करता है. मराठा ओपेन सोर्स (http://groups.yahoo.com/group/MarathiOpenSource) मराठी भाषा के लिए. स्वेच्छा (www.swecha.org) तेलुगु भाषा के वास्ते प्रयास करता है. मैथिली जो भारत के बिहार राज्य के खास क्षेत्र में बोली जाती है और जिसे कुछ वर्ष पहले भारतीय संविधान की अनूसूची में शामिल किया गया है, के लिए भी एक परियोजना मैथिली कंप्यूटिंग रिसर्च सेंटर (http://maithili.sourceforge.net) नाम से शुरू हुई है. बिहार में ही मूल रूप से ज़्यादा बोली जाने वाली परंतु व्यापक रूप से लोकप्रिय भोजपुरी भाषा के लिए भी काम शुरू हो चुका है. भोजपुरी कंप्यूटिंग सेंटर (http://bhojpuri.sourceforge.net) नाम से यह कोशिश पटना में रहने वाले एक समूह की कोशिशों का नतीजा है. इन सबसे समझा जा सकता है कि मुक्त स्रोत कंप्यूटिंग का कितना फैलाव हो चुका है. उदाहरणों से पता चलता है कि पारदर्शी एवं सामूहिक ओपेन सोर्स लोकलाइजेशन और इसकी प्रणाली बड़ी सतर्क एवं जवाबदेह है. फिर भी कई भाषाओं पर काम होना अभी बचा है. भारत जैसे भाषाई वैविध्य रखने वाले देश में और प्रयास की ज़रूरत है.

यदि भारतीय उपमहाद्वीप के वर्णन के लिए यदि कोई बीजशब्द का इस्तेमाल किया जाय तो वह निश्चित रूप से होगी विविधता. भारत में तकरीबन 500 भाषाएँ हैं जिसमें 22 भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है. स्थिति की कल्पना इससे की जा सकती है कि सिर्फ़ एक छोटा सा मुल्क नेपाल जहाँ 50 से अधिक भाषाएँ हैं. देर सबेर ये सभी छोटी भाषाएँ सूचना प्रौद्योगिकी के साथ कंधे से कंधे मिला कर चलने की उम्मीद तो कर सकती है, लेकिन सिर्फ़ फ़्री सॉफ़्टवेयर के दर्शन के ही सहारे. भारत के पड़ोसी देशों में भी लोकलाइज़ेशन आंदोलन की शुरुआत हो चुकी है. पर्वतीय भाषा- गोरखाली यानी नेपाली बोलने वालों की संख्या फकत 16 लाख है. गत वर्ष नेपाली भाषा में लोकलाईजेशन के क्षेत्र में मदन पुरस्कार पुस्तकालय (www.mpp.org.np) के साथ कार्य करने वाले एक समूह ने सार्थक पहल कर महत्वपूर्ण गति प्रदान की है. इस समूह ने गनोम डेस्कटॉप को पूरी तरह स्थानीयकृत किया है. भूटानी जो भूटानी राजतंत्र की राष्ट्रभाषा है, को पूर्णत: लोकलाइज्ड किया है. Dzongkha लोकलाइज़ेशन प्रोजेक्ट (http://dzongkha.sourceforge.net) का उद्देश्य Dzongkha स्क्रिप्ट को लिनक्स साथ जोड़कर इसे मजबूत करना है ताकि भूटान के आम नागरिकों को सूचना एवं संचार तकनीक का लाभ मिल सके. यह परियोजना भूटान की राजकीय सरकार द्वारा लागू की गई है और यह इन्टरनेशनल डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर (IDRC) कनाडा के पैन एशिया नेटवर्किंग (PAN) द्वारा

वित्त प्रदत्त है. सिंहाला लिनक्स प्रोजेक्ट (http://sinhala.linux.lk ) एक दूसरी परियोजना है सिंहाला में लिनक्स के स्थानीयकरण का. यह लंका लिनक्स यूजर ग्रुप (LKLUG) द्वारा प्रारंभ किया गया. पैन लोकलाइज़ेशन प्रोजेक्ट (www.panl10n.net) का व्यापक परिसर है. एशिया में स्थानीय भाषा क्षमता विकसित करने का यह एक क्षेत्रीय प्रयास है. यह संगठन निम्नलिखित भाषाओं के लिए कार्य करता है: बांग्ला, भूटानी, ख्मेर, लाओ, नेपाली, पश्तो, सिंहाला और उर्दू!

प्राय: सबल भाषा अल्पसंख्यक भाषा को दबाती है. लेकिन पाकिस्तान में पंजाबी भाषा के साथ इस तरह की बात नहीं है. पाकिस्तान में पंजाबी भाषा बहुसंख्यकों की भाषा है. लेकिन वहाँ की सरकार इस भाषा को मदद करती नहीं मालूम पड़ती है. इसीलिए पनलिनक्स ने शामुखी स्क्रिप्ट में पंजाबी भाषा के स्थानीयकरण के वास्ते शुरू करने की योजना बनायी है. और इसे अलग लोकेल देने हेतु आग्रह पहले ही किया जा चुका है. यह सिर्फ़ आपेन सोर्स की दुनिया में संभव हो सकता है. लोकतंत्र की तरह ही जहाँ हर आदमी बराबर है, प्रत्येक भाषा को कंप्यूटर की तकनीक में एक जैसा दर्जा दिया जा सकता है.

मुक्त स्रोत सॉफ़्टवेयर का स्थानीयकरण पारदर्शी और समुदाय चालित प्रक्रिया है. यही वजह है कि स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप सॉफ़्टवेयर को पसंदीदा करना आसान है. कभी-कभी सांस्कृतिक विभिन्नताओं के चलते लोग पश्चिमी उपयोक्ता अंतरफलक के साथ सुविधा महसूस नहीं करते. लेकिन कठिनाई यहीं समाप्त नहीं हो जाती. फोल्डर्स और रिसाइकिल बींस को समझने के लिए होने वाले विशिष्ट ग्रामीण भारतीय संघर्ष की कल्पना करें! ख़ासकर व्यापक भाषा हिन्दी के मामले में और बंगाली व पंजाबी के मामले में जो दो भिन्न देशों में बोली जाती है. एक सच्चाई है कि पूरी भाषा बुनियादी तौर पर दो पड़ोसी देशों में विभिन्न क्षेत्रों में विभक्त है. भारत की आधी से अधिक आबादी में हिन्दी बोली और समझी जाती है और इसकी अनगिनत बोलियाँ है. ओपन सोर्स के माहोल में लाभ-हानि के सिद्धांत को ध्यान दिये बग़ैर विशिष्ट जरूरतों के मुताबिक़ वस्तुओं को ढालना ज़्यादा आसान है. ओपन सोर्स मॉडेल न सिर्फ़ स्थानीय आवश्यकताओं को पाने में मदद करता है, बल्कि स्थानीय भावनाओं के आदर का भी ख्याल रखता है. यहाँ अगर समुदाय की इच्छा हो तो वह भाषा की सांस्कृतिक अंतरों के आधार पर भाषा के लिए अलग अलग लोकेल की मांग भी कर सकती है और ऐसा कोई मुक्त स्रोत की दुनिया में अनजाना नहीं है. मुख्य रूप से ओपेन सोर्स के लोकलाइज़ेशन में ही भविष्य में भाषाई कंप्यूटिग के सच को सभी भाषाओं में करने की ताक़त है.

स्थानीयकरण हेतु प्रयास को सफलीभूत व रोचक बनाने में रेड हैट का योगदान बेमिसाल है. पाँच भारतीय भाषाओं (हिन्दी, बंगाली, तमिल पंजाबी एवं गुजराती) का चयन 2004 में ही कर रेड हैट ने भारतीय आवश्यकताओं से संबंधित लोकलाइज़ेशन (l10n) और अंतरराष्ट्रीयकरण (i18n) कार्यों को अपने उत्पाद में बड़ी व्यापकता से सम्मलित किया था. स्थानीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करना कभी भी इतना आसान नहीं था. आज रेड हैट एन्टरप्राइज़ लिनक्स ग्यारह भारतीय भाषाओं में काम कर रही है और उसे न केवल अनुप्रयोगों के स्तर बल्कि ऑपरेटिंग सिस्टम के स्तर पर भी स्थानीयकृत किया गया. भारत एवं इसकी स्थानीय भाषा कंप्यूटिंग उद्योग के प्रति रेड हैट की संवेदना एवं वचनवद्धता को दर्शाने के लिए यह काफ़ी है.

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने एक बार कहा- ''भारत में ओपेन सोर्स कोड सॉफ़्टवेयर को हमारे करोड़ों लोगों के हित के लिए आना और स्थायी रूप से ठहरना होगा''. भारत जैसे ग़रीब मुल्क में जहाँ प्रति व्यक्ति आय औसत से बहुत कम है, जनाब कलाम साहब के लफ़्ज़ इस देश के लिए महत्वपूर्ण आधार वाक्य होना चाहिए. ये सभी स्थानीयकृत कंप्यूटर ग्रामीण कंप्यूटिंग के क्षेत्र में बड़े लाभदायक होंगे. देहाती भारत के लोग सिर्फ़ अपनी देसी ज़बान बोलते हैं. उनके लिए अंग्रेज़ी ब्रिटानिया प्रभाव तथा शोषण की भाषा एवं संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है. भारत में, ख़ासकर देहाती क्षेत्रों में रेडियो एवं टीवी के गहरे प्रभाव के कारण का विश्लेषण करने से हम समझ सकते हैं कि इसका मुख्य कारण स्थानीय भाषाओं में टी.वी. कार्यक्रमों के प्रस्तुति की उपलब्धता है. भारत में स्थानीयकरण आन्दोलन ने विदेशी कंप्यूटर को देशी में बदल दिया है - हमारा कंप्यूटर, आपका कंप्यूटर. स्थानीय भाषा आईटी बाज़ार विकासशील अवस्था में है और यह लगातार बढ़ रहा है. ई-गर्वर्‌नेंस एक बृहत क्षेत्र हैं जहाँ लोकलाइज़ेशन सॉफ़्टवेयर की नितांत आवश्यकता है. हार्डवेयर की कीमत बड़ी तेजी से गिरती जा रही है और इस संदर्भ में स्थानीयकृत ओपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर श्रेष्ठ व भरोसेमंद है.

बीते वर्षों में सरकार ने सभी 22 राजकीय भाषाओं में सीडी जारी करने का व्यापक कार्यक्रम शुरू किया है और लगभग सभी भाषाओं में सीडी पहले ही लॉन्च कर चुकी है. सीडी पर उपलब्ध ज़्यादातर अनुप्रयोग जनरल पब्लिक लाइसेंस के तहत जारी किये गये. यह भारत में स्थानीयकरण आन्दोलन की कामयाबी की बड़ी कहानी है. यह भारत सरकार द्वारा वित्त प्रदत्त है. इसके तहत करोड़ों सीडी आम लोगों के बीच भेजे जा रहे हैं. कोई भी व्यक्ति मुफ्त की भाषा सीडी के लिए आवेदन कर सकता है. इंडिक्स (www.cdacmumbai.in/projects/indix ) भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास (http://tdil.mit.gov.in ) द्वारा वित्त पोषित एक और परियोजना है जो लिनक्स की सहायता के लिए भारतीय भाषा में कार्य करता है. सरकारी संगठन सीडैक (http://www.cdac.in) ने भी ओपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर के स्थानीयकरण के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है और इन सरकारी प्रयासों से मूलभूत रूप से जुड़ा है.

भारत में अनेक लोग एवं कई संगठन हैं जो ओपेन सोर्स विचारधारा के पक्षधर रहे हैं. इसका एक प्रभावशाली व अनोखा उदाहरण है - महात्मा गांधी अर्न्तराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा जिसकी 1997 ई. में स्थापना हिन्दी का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार के लिए की गई थी. प्रख्यात हिन्दी कवि एवं भारत सरकार में संस्कृति मंत्रालय में सचिव रह चुके अशोक वाजपेयी इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति थे और उन्होंने विश्वविद्यालय को पूर्ण रूपेण ओपेन सोर्स के जरिये चलाने का निर्णय लिया था. अपने कार्यकाल के दौरान वाजपेयी ने दो किताबें (हिन्दी में) और एक द्विभाषिक पत्रिका लीला (हिन्दी और अंग्रेज़ी) पूर्ण रूप से ओपेन सोर्स टेक्नालोजी के आधार पर प्रकाशित करवाए थे. स्थानीय भाषा में कार्य करने वाले सॉफ़्टवेयर ख़ासकर हिन्दी में ओपन सोर्स कंप्यूटर आधारित तकनीक को अपने परिसर में स्थान देना यही विश्वविद्यालय का मुख्य लक्ष्य था. इसे ओपन स्रोत का दुर्भाग्य कहेंगे कि उनके कार्यावधि के बाद स्थिति उतनी सकारात्मक नहीं रही.

दिल्ली स्थित ग़ैर लाभकारी संस्था सराय-सीएसडीएस (www.sarai.net) मुक्त सॉफ़्टवेयर का उपयोग, प्रचार एवं विकास के प्रति पूर्ण रूपेण वचनबद्ध है. मैथिली, हिन्दी, छत्तीसगढ़ी सहित कुछ भारतीय भाषाओं के स्थानीयकरण में सराय-सीएसडीएस ने मुख्य भूमिका अदा की है. सराय-सीएसडीएस ने अनेक लोगों को संग-साथ देकर एवं कई कार्यशाला आयोजित कर इस क्षेत्र में भाग लेने तथा इसे परिवर्द्धित करने के लिए प्रोत्साहित किया है और लगातार कर रहा है.

वस्तुतः मुक्त स्रोत के प्रयास बचे हुए बैबल की मीनार को पूरा करने के काम जैसा है. बाइबिल में वर्णित एक कथा के मुताबिक़ पहले इतनी भाषाएँ नहीं थीं. सिर्फ़ एक भाषा थी जिसमें लोग अपनी भावना, पीड़ा, दुख-सुख, मौज-मस्ती बाँटते थे. वही एक भाषा ज्ञान की भाषा थी, वही विज्ञान की भाषा थी. भाषा एक - मानवता एक. समग्र मानवता ने एकबार सोचा कि क्यों न ऐसी मीनार बनाई जाए जो स्वर्ग तक जा सके ताकि स्वर्ग की हकीकत सामने आ सके. ताकि अंतिम सत्य पाया जा सके. लेकिन ईश्वर को यह कहाँ मंजूर था. यह तो ईश्वर की सत्ता को खुली चुनौती थी. उन्होंने सोचा कि सबसे बढ़िया तरीक़ा है कि सबों की भाषाएँ अलग-अलग कर दी जाए...और फिर सबों की भाषाएँ अलग-अलग हो गईं. एक ऐसी दुनिया रच दी ईश्वर ने जिसमें कोई किसी की भाषा नहीं समझता था...मीनार वहीं रूक गई. स्वर्ग तक न पहुँचा जा सका. जिह्वा-भ्रम की वह स्थिति आज भी ज्ञान के विकेंद्रीकरण के बीच बड़ी दीवार बनकर खड़ी है. ख़ासकर कंप्यूटर व आईटी जैसे क्षेत्रों में यह बड़ी रूकावट है. शासन व शोषण की भाषा अंग्रेज़ी में कंप्यूटर आम आदमी की समझ से बाहर है...वैसे में ओपन सोर्स एक रास्ता दिखाती है जिसपर हर कोई आ-जा सकता है. वहाँ हर भाषा समान है चाहे वह करोड़ों के द्वारा बोली जाती हो या कुछ चंद लोगों के द्वारा. गौरतलब है मुक्त स्रोत सर्वोत्तम की उत्तरजीविता के बजाय सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का काम करती है. तभी तो इनके द्वारा पंजीकृत भाषाओं की सूची में पाँच-दस रणनीतिक रूप से सबल भाषाएँ नहीं दिखती बल्कि करीब सौ भाषाएँ दिखाई देती हैं, जिसपर काम करने के लिए कोई स्वामित्ववादी कंपनियाँ सोच भी नहीं सकती हैं.

यह आंदोलन खुला है...इसका आप भी हिस्सा हो सकते हैं, आप भी शिरकत कर सकते हैं. बड़े स्तर पर भाषा के लिए की जा रही इस कार सेवा में आप भी योगदान दे सकते हैं. यह समुदाय समर्थित दुनिया है, जो मुक्त स्रोत सॉफ़्टवेयर की दुनिया है. एक ऐसी बड़ी, व्यापक और ज़्यादा भरोसेमंद दुनिया जो पूरा का पूरा दरवाजा खोलकर आपको गले से लगाती है और कहती है कि आइए और हमारे साथ, जहाँ तकनीक एक खास किस्म की बपौती न हो...यानी जहाँ ज्ञान दीवार विहीन हो...ज्ञान मुक्त हो. स्वामित्ववादी कंपनियाँ अपने केंद्र में लाभ को रखती है और ज़ाहिर है अगर आप उनकी पूंजी में इजाफा नहीं कर सकते हैं... तो आप बेकार हैं, आपकी भाषा फालतू है. यही नहीं भारत जैसे औपनिवेशिक स्वरूप वाले देश में जहाँ अंग्रेज़ी आम भारतीय के लिए अनिवार्य सर दर्द बनकर साथ चल रहा है वहाँ वे कंपनियां यह भी सोचती हैं कि आख़िर भारत में ज़रूरत क्या है अपने सामानों को भाषाओं में रखने की. ज़्यादा से ज़्यादा हम हिन्दी में दे देंगे वह भी किसी एजेंसी से अनुवाद करवाकर. उन्हें खाना पूर्ति के लिए भाषा चाहिए पर आपके और हमारे लिए भाषा हमारी साँसें हैं हमारी ज़िंदगी है. इसलिए अगर कोई कंप्यूटर उत्पाद का निर्माता स्थानीय भाषा में करने की मशक़्क़त भी करता है तो हिन्दी और दो-एक महत्वपूर्ण भाषाओं में. शेष भाषाएँ तकनीक की भागम-भाग में पीछे छूटती जा रही है. पन्नों के स्थान वेब पेज ले रहें हैं. किताबों का स्थान ई-पुस्तकें ले रही हैं. कहीं तकनीक सबल भाषाएँ कमजोर भाषाओं को लील न ले. चिंता और चिंतन दोनों जरूरी है कि कैसे इससे बचा जाए. हम बचा सकते हैं अपनी भाषा को इस आभासी मायावी दुनिया में खोने से. और निश्चित रूप से तरीक़ा हमें ओपन सोर्स सुझाता है... समुदाय के जनपथ पर बढ़ें और हासिल करें वह सब जिसे आप कल तक सपना समझते थे.

स्थानीयकरण का कार्य काफ़ी पहले शुरू हुआ और अब यह आन्दोलन का रूप ले चुका है. इन्टरनेट की उपलब्धता, संसाधनों का अभाव और निरक्षरता स्थानीय भाषा कंप्यूटिंग के रास्ते में कुछ बाधाएँ है. सबसे बड़ी बाधा अंग्रेज़ी बोलने वालों की मानसिकता है जो स्थानीय भाषा में कंप्यूटिंग की कोशिशों का मज़ाक उड़ाती है. ऐसे लोगो के पास ज़मीनी अनुभव नहीं हैं, लेकिन अभी भी वे लोग प्रशासन एवं वित्त में बड़ी पहुँच क़ायम किए हुए हैं लेकिन अन्तत: उन्हें स्थानीय भाषा कंप्यूटिंग बाज़ार के सामने झुकना होगा. दो दशक पूर्व, दूरदर्शन उद्योग की स्थिति भारत में वर्तमान कंप्यूटर उद्योग के तरह ही थी. सकारात्मक बदलाव अवश्यम्भावी है और कंप्यूटर के क्षेत्र में भी यह बहुत दूर नहीं है. कवि अशोक वाजपेयी ने एक मर्तबा लिखा था कि ज्ञान के नि:स्वार्थ प्रसार की भारतीय परंपरा बहुत पुरानी और वैश्विक है. हम लोग कह सकते हैं कि फ़्री सॉफ्टवयेर आन्दोलन पुरानी भारतीय परंपरा का ही पाश्चात्य संस्करण है. श्री वाजपेयी की बात बहुत ठीक है और इसीलिए भविष्य में लंबी अवधि में भारतीय मिट्टी ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के वास्ते ख़ुद को उर्वर साबित करेगी. 'जहाँ ज्ञान हो मुक्त' नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर का अपने राष्ट्र के लिए सपना था. समय अब उस स्वप्नलोक की ओर आगे बढ़ रहा है.

 

(समाप्त. आलेख श्रृंखला के पिछले भाग क्रमशः यहाँ देखें - भाग 1, भाग 2, भाग 3, भाग 4, भाग 5, भाग 6)

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राजेश रंजन का आलेख - अपना कंप्यूटर अपनी भाषा में - भाग 1

राजेश रंजन विगत कई वर्षों से हिन्दी कंप्यूटरीकरण
के कार्य से जुड़े हुए हैं. वे अभी एक बहुदेशीय
सॉफ्टवेयर कंपनी रेड हैट में बतौर लैंग्वेज मेंटेनर हिन्दी
के रूप में कार्यरत हैं. वे कंप्यूटर स्थानीयकरण की कई
परियोजनाओं जैसे फेडोरा, गनोम, केडीई, ओपनऑफिस,
मोज़िला आदि से जुड़े हैं. साथ ही कंप्यूटर अनुवाद में
मानकीकरण के लिए चलाए गए एक महत्वाकांक्षी सामुदायिक
परियोजना फ़्यूल के समन्वयक भी हैं. इसके अलावे उन्होंने
मैथिली कंप्यूटिंग के कार्यों को भी अपनी देख-रेख में
मैथिली समुदाय के साथ पूरा किया है. वे प्रतिष्ठित मीडिया
समूह इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के जनसत्ता और लिटरेट
वर्ल्ड के साथ काम कर चुके हैं.

हिन्दी पत्रकारिता में भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
से स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाने के पहले इन्होंने नेतरहाट विद्यालय,
साइंस कॉलेज, पटना और किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली जैसे
जाने-माने संस्थानों में अध्ययन किया है. भाषाई तकनीक, इंटरनेट,
कंप्यूटर पर इनके लेखादि लगातार प्रकाशित होते रहते हैं.

 

 

कॉपीराइट © राजेश रंजन, सर्वाधिकार सुरक्षित.

क्रियेटिव कॉमन्स एट्रीब्यूशन शेयर एलाइक लाइसेंस के अंतर्गत.

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भाषाओं में कम्प्यूटर के विकास पर संग्रहणीय लेख।

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