June 2013

जेड डी नेट ने सूचित किया है कि उसका भारतीय संस्करण जारी हो गया है और उसके लेखक भारतीय ही हैं:
ZDNet has launched a dedicated India edition, adding to its current list of global editions that includes Asia, Australia, the US and UK, and connecting India with the rest of the world via the site's unique "local-global" platform.

चित्र डाउनलोड करेंA team of writers in India will cover key segments including startups, SMBs, and ICT innovation, as well as the "SMAC" stack comprising social, mobile, analytics, and cloud. Based in Bangalore, Mumbai, and New Delhi, the writers are: Mahesh Sharma, Swati Prasad, Abhishek Baxi, Nitin Puri, and Srinivas Kulkarni.

गूगल रीडर जुलाई से बंद हो रहा है.

पर, राहत की बात यह है कि आप गूगल रीडर से अपने सब्सक्राइब किए फ़ीड की सूची एक्सएमएल फ़ाइल के रूप में निर्यात कर सकते हैं जिसे आप अन्य फ़ीड रीडरों में इम्पोर्ट कर उपयोग में बखूबी ला सकते हैं.

और, आपके पास फ़ीड पढ़ने के लिए, इंटरनेट पर मुफ़्त के विकल्पों की कमी नहीं है.

एक शानदार फ़ीड रीडर है ऑपेरा ब्राउज़र का अंतर्निर्मित फ़ीड-रीडर. यह कुछ मामलों में गूगल रीडर से भी बेहतर है, और ऑफ़लाइन रीडिंग की भी सुविधा प्रदान करता है.

तो आइए, अपनी फ़ीड सूची गूगल रीडर से एक्सपोर्ट कर ओपेरा ब्राउज़र में इम्पोर्ट करते हैं.

सबसे पहले पसंदीदा ब्राउज़र में अपने जीमेल खाते में लॉगइन करें. फिर गूगल टेकआउट साइट [लिंक - https://www.google.com/takeout/ ] पर जाएं. टेकआउट यह सुविधा है जिससे आप अपने गूगल खाता की सामग्री को डाउनलोड कर संग्रह कर सकते हैं. हो सकता है कि आपको फिर से यूजरनेम व पासवर्ड के लिए पूछा जाए. गूगल टेकआउट में अपने खाते पर जाने के उपरांत आपको कुछ इस तरह से दिखेगा -

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यहाँ पर सेवाएं चुनें बटन पर क्लिक करें और अगले विंडो पर रीडर बटन पर क्लिक करें. आपको कुछ ऐसा दिखेगा –

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संग्रह बनाएं पर क्लिक करें. कुछ समय पश्चात आपका संग्रह बन जाएगा और फिर उसके बाद डाउनलोड बटन पर क्लिक करें. आपको कुछ ऐसा दिखेगा

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यहाँ फिर से डाउनलोड करें नामक नीले बटन को क्लिक करें.

यह जिप फ़ाइल के रूप में आपके कंप्यूटर पर आपके वांछित स्थान पर सहेज लिया जाएगा. इसे अनजिप करें. इसमें आपको अन्य फ़ाइलों के साथ एक subscriptions.xml नाम की फ़ाइल मिलेगी. इसी में आपके तमाम फ़ीड के पते दर्ज हैं.

अब आप ओपेरा ब्राउज़र चालू करें. या फिर कोई अन्य फ़ीड रीडर भी जिसमें एक्सएमएल फ़ाइल से फ़ीड सूची आयात करने की सुविधा हो. ओपेरा ब्राउज़र में फ़ाइल > आयात और निर्यात > फ़ीड सूची आयात करें मेनू में जाएं और इस subscriptions.xml नाम की फ़ाइल को आयात कर लें.

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बस, आपका काम हो गया.

अब आप ओपेरा ब्राउज़र के आपूर्तियाँ मेनू में जाकर अपने पसंदीदा फ़ीड को ऑनलाइन-ऑफ़लाइन पढ़ सकते हैं.

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हैप्पी फ़ीड रीडिंग!

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आधुनिक बोध कथा -

पुनर्मंत्रीभव:

भारत देश में एक पहुँचा हुआ, सिद्ध साधु था.

 

साधु के पास एक दिन भारत का एक मंत्री पहुँचा और अपनी व्यथा सुनाई -

"मुझे लॉबीइस्ट धमकाते हैं!"

साधु ने मंत्री के ऊपर अपना हाथ रखा, आशीर्वाद दिया. मंत्री को लॉबीइस्ट बना दिया.

 

कुछ दिनों के बाद लॉबीइस्ट बना मंत्री फिर से साधु के पास पहुँचा, और अपनी व्यथा सुनाई -

"मुझे सीनियर आईएएस अफसर धमकाते हैं"

साधु ने उसे एक सीनियर आईएएस अफसर बना दिया.

 

कुछ समय बाद वह सीनियर आईएएस अफसर फिर साधु के पास आया. अपना दुखड़ा सुनाया -

"मुझे मंत्री धमकाते हैं"

 

साधु ने अपने उस अनन्य, प्रिय भक्त के ऊपर अपनी दया दृष्टि डाली, आशीर्वाद देने के लिए अपना हाथ उठाया और कहा -

"पुनर्मंत्रीभव:"

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बर है कि सरकार खाद्य सुरक्षा अधिनियम एक अध्यादेश के जरिए ला रही है. लोकसभा चुनाव जो होने हैं अगले साल. इधर अपने एमपी में एक योजना चालू हुई है, जाहिर है अपने इधर भी चुनाव होने का है - 1 रुपया किलो गेहूं-चावल की, जिसका टैगलाइन है – एक दिन कमाओ, महीने भर खाओ. यानी कि एक दिन कमा लो, बाकी के 29 दिन ठलुहा बैठे रहो और बस बैठे बैठे खाते रहो. उधर छत्तीसगढ़ में 2 रुपए किलो चावल प्रदान कर एक चाउर वाले बाबा प्रसिद्ध भी हो गए हैं – लोगों को अलाल बना कर – सुना है वहाँ लोगों को महीने में बस चार दिन काम करना होता है – महीने भर बैठ कर खाने के लिए. इस मामले में अपना एमपी आगे आ गया है. यहाँ आपको महीने में केवल एक दिन ही काम करना होगा, महीने भर खाने के लिए. और यदि खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लागू हो गया तो आपके खाने की गारंटी जब सरकार ले ही रही है तो फिर एक या दो दिन भी काम करने की जरूरत ही क्या है.

ऐसे में यदि मुझे खाद्य सुरक्षा अधिनियम के साथ साथ इंटरनेट सुरक्षा अधिनियम जैसा कुछ मिल जाए, तो मेरे तो बल्ले बल्ले. मुझे किसी काम-धाम की कौनो जरूरत नाहीं, भले ही वो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ काम क्यों न हो. जब घर बैठे बिना काम धाम किए खाना पीना और इंटरनेट मिलता रहे तो आदमी आखिर काम क्यों, किसलिए करे? और अगर यह योजना चल निकले तो कुछ दिनों बाद पता चलेगा कि इस देश का कोई भी आदमी काम ही नहीं करता है!

इसलिए, खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे बिल के बजाय सरकार को मॉल सुरक्षा अधिनियम बनाना चाहिए, जिसमें हर भारतीय को यह अधिकार मिले कि उसके रहने के ठौर ठिकाने के अधिकतम पाँच किलोमीटर के भीतर कोई न कोई एक मॉल (जी हाँ, शॉपिंग मॉल) हो.

अब आप पूछेंगे कि इससे होगा क्या? भाई, जरा ठंड रखिए और धीरज से सोचिए –

· शहर-शहर, गांव-गांव, मुहल्ले-मुहल्ले में शॉपिंग मॉल होने से सोचिए, कितनी नौकरियाँ निकलेंगी, कितना इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा होगा, कितना जीडीपी बढ़ेगा, कितना फ़ॉरेन इन्वेस्टमेंट आएगा!

· हजारों वर्गफुट में फैले मॉल में नित्य जा-जा कर घूम-घूम कर लोगों का बढ़िया व्यायाम होता रहेगा और स्वास्थ्य भी बढ़िया रहेगा. लोगों का दवाई दारू का खर्चा कम होगा.

· रीबॉक, नाईकी, बेन्नेटॉन और कलरप्लस के परिधानों और एपेरल की दुकानों में टंगे वस्त्रों और फ़ैशन परिधानों को देख देख कर लोगों में और ज्यादा धन कमाने की लालसा जागृत होगी, न कि एक दिन कमाओ तीस दिन खाओ जैसी अलाली प्रवृत्ति आएगी. आदमी इस तरह से दो-दो, तीन-तीन शिफ़्ट में काम करना प्रारंभ कर देगा. वो एक साथ एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन-तीन नौकरियाँ करेगा – दिन में तीन-तीन शिफ़्ट में काम करेगा – जिससे – जीडीपी फिर से बढ़ेगा. कहाँ तो महीने में एक दिन काम करने वाली योजना और कहाँ यह – दिन में तीन शिफ़्ट में काम करने की योजना – अब बताइए भला, है कोई तुलना?

· नक्सली समस्या का चुटकियों में हल होगा - नक्सली इलाकों में हर पाँच किलोमीटर की दूरी पर मॉल खुल जाने से पहले तो नक्सली हथियार फेंक मॉल में चले आएगें, मॉल की वजह से जंगल कट जाएंगे उन्हें छिपने का स्थान ही नहीं मिलेगा, गांव के गांव मॉल में तबदील हो जाएंगे तो जंगल, गांव बचाने का नक्सलियों का एजेंडा ही ध्वस्त हो जाएगा, और इस तरह से नक्सली ही ध्वस्त हो जाएंगे बिना किसी प्रयास किए. हार्डकोर नक्सली भी मॉल में जब एक बार आएंगे तो उन्हें अपने दर्शन अपनी आइडियोलॉजी की फूहड़ता का अहसास हो जाएगा और वे भी आत्मसमर्पण कर मॉल कल्चर में शामिल हो जाएंगे.

· गांव वासी भी जब अपने गांव में खुले मॉल के आईनॉक्स में नई सुपरमैन फिल्म देखेंगे तो अरुंधतियों, मेधापाटकरों को जी भर कोसेंगे कि अभी तक उन्होंने अपने पर्सनल एजेंडे के तहत, गांव और संस्कृति बचाने के नाम पर उनका भयादोहन ही किया है, और गांवों में विकास नहीं होने दिया है – असली मजा तो शहर और मॉल में ही है, जिसके आनंद से अछूते रहे थे अब तक – बुरा हो इन जैसे विदेशी पैसों से पल रहे कार्यकर्ताओं का और धन्यवाद सरकार का कि उसने गांव वालों की सुन ली और मॉल सुरक्षा अधिनियम ले आए जिससे अब गांव-गांव मॉल खुल गए हैं और अब वे किसी मामले में शहर वालों से कम नहीं हैं.

· गांव के गांव मॉल खुल जाएंगे तो इकॉनामी भी तेज रफ़्तार पकड़ेगी और फिर अकाल-अवर्षा-सूखा जैसी बात भी नहीं रहेगी. मॉल में तो खाने पीने की चीजें, कोल्डड्रिंक, मिनरल वॉटर भरी पड़ी रहती हैं और अकसर इनमें एक खरीदो एक मुफ़्त पाओ की योजना भी चलती रहती है.

वैसे मॉल महिमा सूची अंतहीन है इतने कि गूगल के सर्वर भी टें बोल जाएं. मूल मुद्दा ये है कि सरकार को मॉल सुरक्षा अधिनियम जल्द से जल्द लाना चाहिए! देश के हर राज्य, हर शहर, हर गांव, हर मुहल्ले के हर नागरिक को मॉल मिले!

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विश्व की सर्वश्रेष्ठ नौकरी वैसे तो अंधों का हाथी जैसा ही होगा, मगर फिर भी कुछ लोगों ने इस नौकरी को सर्वश्रेष्ठ माना है तो कुछ लोगों ने इस नौकरी को.

मगर मेरे लिए तो एक दूसरे किस्म का ही प्रस्ताव ईमेल से आया है. जो ऊपर स्क्रीनशॉट में दर्ज है. सोच रहा हूँ कि यह नौकरी ज्वाइन कर ही लूं.

वैसे, अगले को कैसे पता चला कि बंदा नौकरी पर नहीं है, बल्कि देश का 'बहुमूल्य' पेंशन समय से पहले ही खाए चला जा रहा है, तो यह इस हाउसकीपर नामक नौकरी का परफ़ेक्ट उम्मीदवार होगा?

आपकी राय चाहिए. इस नौकरी को स्वीकारूं या ठुकराऊँ?

आम तौर पर तितलियों के पंख रंगीन होते हैं, पर इस सुंदर तितली के पंखों के बजाए इसका शरीर रंगीन है। यह मुझे अपने किचन गार्डन में सुबह पौधों को पानी देते समय नजर आई।

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