टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

May 2013

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अपने आधार कार्ड बनाने की करूण कहानी मैंने पहले भी लिखी है. पर, जब अब कुत्ते, पेड़ और यहाँ तक कि कुर्सियों के भी आधार कार्ड बनने लगे हैं तो मैं भी सोचता हूँ कि अपने माउस और कुंजीपटल का एक-एक आधार कार्ड बनवा लूं. कौन जाने कब काम आ जावे!

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यूँ तो हर देशभक्त भारतीय पाकिस्तान के हर कदम का ठीक वैसा ही विरोध करेगा जैसे भारतीय संसद में सरकारी पक्ष के किसी भी प्रस्ताव का विपक्षी दल बाई डिफ़ॉल्ट विरोध करता है. अलबत्ता इसमें अरुंधती राय जैसे धारा के विपरीत बहने वाले शामिल नहीं होंगे, मगर फिर ऐसे लोगों की चिंता तो बूकर पुरस्कार बांटने वाले ही करें, हमें क्या!

 

हाँ, तो बात पाकिस्तान के हर कदम के विरोध का चल रहा था. परंतु इस बार पाकिस्तान ने एक ऐसा दांव खेला है कि उसकी वजह से दुनिया का हर पुरुष - इसमें भारतीय पुरुष भी शामिल हैं, उसके इस कदम का स्वागत करेगा. वह भी कदमबोसी कर! जैसे भारतीय संसद में सरकारी-विपक्षी दल जब अपने वेतन भत्ते के बिल को पास करने की बारी आती है तो सुर से सुर मिलाकर एक हो जाते हैं उसी तरह पाकिस्तान के इस मामले में पाकिस्तानी-हिंदुस्तानी सब सुर मिला रहे हैं.

 

ठीक है, बहुत हो गया. आखिर पाकिस्तान ने ऐसा क्या कर दिया जो दुनिया का हर पुरुष, जिसमें हर भारतीय पुरुष भी शामिल है, उसका प्रशंसक हो गया. पाकिस्तान ने वो काम किया है जिसे दुनिया के हर देश को करना चाहिए. पुरुषों के मोजे पहनने पर प्रतिबंध! पाकिस्तान अब तक एक फेल्ड स्टेट माना जाता था. मगर उसने मोज़ों पर प्रतिबंध लगाकर यह सिद्ध कर दिया है कि वो दुनिया के तमाम देशों से कहीं आगे है - एकदम सफल!

 

वैसे भी मोज़े, मर्द जात के लिए शुरू से ही कष्टकारी रहे हैं. जब मर्द शिशु होता है तो माता बड़े ऐहतियात और प्रेम से,  चाहे वो ठंडी बयार हो या गर्मी की लू, उससे बचाने के लिए मां अपने बच्चे के इंच भर पैर में सवा पांच इंच का मोज़ा पहनाना शुरु करती है, तो फिर मोज़ा मर्द की ज़िंदगी में ऐसे जुड़ जाता है जैसा उसका कोई दूसरी त्वचा हो, और फिर इस दुनिया से निर्वाण मिलने तक वो मोज़ा उसके पैर से चिपका रहता है.  एक अदद मोज़ा, मर्द को... पता नहीं क्या से क्या बना देता है.

 

अपनी युवावस्था में पुरुष अपने मोज़े से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भयाक्रांत रहता है. अपनी संभावित गर्लफ्रेंड को इम्प्रेस करने के चककर में वो अपने शानदार जूते का सत्यानाश अक्सर अपने फटे मोज़े या फिर मिस-मैच रंग के मोज़े से करता फिरता है. और कभी इम्प्रेशन भूले भटके जम भी गया तो वो कहीं पर यह भूल कर बैठता है - वो अपने जूते के फीते ढीले कर जूता उतार देता है और अपने मोज़ों के जरिए अपनी गर्लफ्रेंड के आसपास की दुनिया में अपना खास पर्सनल डियोडोरेंट फैला देता है, और उसकी गर्लफ्रेंड को वास्तविकता का अहसास हो जाता है कि भली प्रतीत हो रही यह दुनिया, उतनी भी अच्छी नहीं है.

 

शादीशुदा पुरुषों का तो नंबर  1 दुश्मन है मोज़ा. आपको ऑफिस के लिए देर हो रही है, और आपको आपका निगोड़ा मोज़ा ढूंढे नहीं मिल रहा. मिला भी तो जोड़े का एक या दो हैं तो भिन्न जोड़े के. किसी हाथ आए मोज़े का इलास्टिक ढीला है तो किसी का तंग. कोई धुला नहीं है तो कोई धुला तो है, मगर धुलने से उसका कलर फैल गया है. जैसे तैसे एक अदद मोज़ा जुगाड़ कर पहनने की कोशिश करते हैं तो आपकी उत्तमार्ध का दनदनाता स्वर गूंज उठता है - ये क्या पहन रहे हो जी, जरा भी कलर सेंस नहीं है तुममें. नाईकी के ग्रे जूते में गुलाबी मोज़े पहन रहे हो? हद है! और ये गुलाबी मोज़ा तुम्हारा नहीं मेरा है. ये ल्लो, अब अगर मोज़ा है, और खालिस मर्द के लिए है तो उसे गुलाबी तो होना ही नहीं चाहिए, और उसे नाईकी के ग्रे रंग के जूते पर तो पहना ही नहीं जाना चाहिए. शादीशुदा मर्दों, जरा कलर सेंस तो ले आओ, जहाँ कहीं से भी मिलता हो. और याद से गुलाबी, पीले या हरे, छींटदार मोज़े पर निगाह मत डालो. वो तुम्हारा हो ही नहीं सकता. मोज़ों ने दुनिया का बहुत सारा समय, रिसोर्स, मेनपॉवर बर्बाद किया है. और, मुझे तो लगता है कि दुनिया में बढ़ते तलाक का कारण मोज़े ही हैं.

 

और, जब आप ऑफ़िस में होते हैं तो और आफ़त. आपका आफ़िस-लंगोटिया मित्र लंच के समय आपके केबिन में अनौपचारिक चला आता है और गर्मी के बहाने अपनी नई जुराबें नुमाया करवाने लगता है. पर इस कोशिश में वो ये भूल जाता है कि उसकी जुराबों यानी वही मोज़ों से निकलने वाली गंध ही आपके लिए दुनिया में सर्वाधिक अप्रिय है.

 

शाम को घर वापस लौटते हैं तो फिर से वही मोज़ा पुराण. थक हार कर घर में घुसे, जूते उतारे और यदि आपने कहीं भूले भटके मोज़ों को सही स्थान पर उतार कर सही जगह पर तह कर नहीं रखा या धोने में नहीं डाला तो फिर हो गई आपकी शाम की चाय का सत्यानाश! इन्हीं समस्याओं के चलते मैंने मोज़े जूते का सार्वजनिक परित्याग अरसे से कर रखा है और चप्पलों पर आ गया हूँ. बहुत से जूताधारी मर्द मुझसे रश्क रखते हैं. परंतु वे जूतों से उतर कर चप्पलों पर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. उनकी उत्तमार्धें जो उनके जूते-मोज़ों के परित्याग के राह में रोड़ा जो बनी हुई हैं.

 

ऐसे में पाकिस्तान ने मोज़े पर प्रतिबंध लगाया है, तो पुरुषों के लिए बहुप्रतीक्षित, बहुत भला काम किया है. हिंदुस्तान में भी यह मानवीय क़ानून यथाशीघ्र लागू हो जाना चाहिए.

जीवे जीवे पाकिस्तान! पाकिस्तान जिंदाबाद!!

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स्पॉट फ़िक्सिंग क्या क्रिकेटरों और बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ की ही बपौती है? कतई नहीं. पता चला है कि चंद हाईप्रोफ़ाइल ब्लॉगर और लेखक भी अब स्पॉट फ़िक्सिंग में शामिल हो गए हैं. सीबीआई जो वाकई में तोता नहीं हो, उससे जाँच करवाई जाए तो और राज निकल सकते हैं. बहरहाल हाल ही में एक फ़ोन टेपिंग में यह खुलासा हुआ है. टेलिफ़ोन टेपिंग की आधी-अधूरी ट्रांसस्क्रिप्ट जो हासिल होते होते रह गई है, वो कुछ इस तरह है -

 

- भाई, अब तो पंगा हो गया हे ना. क्रिकेट में तो मामला जमेगा नहीं. उधर बड़ा रिक्स हो रियेला है. कोई बुकी बचा इ नई. इब तो  कोई और एरिया पकड़ना पड़ेगा. कोई नया एरिया ढूंढना पड़ेगा, नईं तो अपना क्या होएंगा, अपने धंधे का क्या होएंगा?

- हाँ, ये बात तो है. कोई और एरिया पकड़ना पड़ेगा. रिच, नॉन प्रेडिक्टिव किस्म का.

- आँय, क्या बोला भाई?

- अबे तेरे को समझ नईं आने का. जरा दिमाग लगाने दे. हाँ, एक आइडिया आया.

- हाँ, भाई क्या आइडिया आया?

- अरे माँ की आँख, मेरे को बोलने देगा? देख, अब अपन हिंदी लेखक जगत और हिंदी ब्लॉग जगत में लेखकों और रचनाकारों को हूल देते हैं. ठीक है. उनसे अब फ़िक्स करवाते हैं कि कौन *ला लेखक/ब्लॉगर कब किसी दूसरे के ** में लात मारता हुआ, उसकी धज्जियाँ उड़ाता हुआ लेख लिखेगा.

- हें हें हें भाई वाह! क्या कमाल का आइडिया निकाला है. वाह! आपका जवाब नहीं.

- हाँ, जरा चुपकर और आगे सुन बे, हिंदी के सेलिब्रिटीज  ब्लॉगरों की लिस्ट बना और उनको हूल दे कि कौन कब क्या क्या लिखेगा. वो कब कौन सी लाइन में फुलस्टॉप और कॉमा लगाएगा. अपने किस सड़े पोस्ट में किस और सड़े पोस्ट की लिंक मारेगा और किसको किसके फ़ेसबुक स्टेटस में लाइक करेगा. सट्टा लगाने के लिए एकदम झकास आइटम  बनेगा ये तो. स्पॉट फ़िक्सिंग में तो यह भी बड़ा दौड़ेगा कि किस सड़ेले पोस्ट में टिप्पणी का सैकड़ा पार होएंगे और, कौन अपाठक किस ब्लॉगर के ब्लॉग पोस्ट में बिना पढ़े कट-पेस्ट टिप्पणी मारेगा और स्माइली लगाएगा.

- वाह! वाह!! भाई!!! क्या आइडिया लाया है. अब तो साल में हर दिन, हर घड़ी स्पॉट फ़िक्सिंग का मज़ा रहेगा. ये क्या कि सालभर आईपीएल के लिए इंतजार करते रहते थे. पर भाई, आपने कवियों के लिए कुछ प्लान नहीं बनाया - वो तो संख्या में और भी ज्यादा हैं...

- *&&^%%#$# (*&%$#^&  *ले ले अब मेरी ताज़ा कविता सुन..

टूं टां टूं टां टूं टां

(कॉल अचानक ड्रॉप हो गई)

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बाजार में यूँ तो दर्जनों ज़िप टूल हैं. फिर मैं क्यों हिंदीज़िप का इस्तेमाल करूं?

तो, सबसे पहली बात तो यह कि इसे खास हिंदी वालों के लिए बनाया गया है और इसका इंटरफ़ेस हिंदी में ही है. साथ ही यह तेज-तर्रार, नो-नॉनसेंस किस्म का ज़िप टूल है. और यह पूरी तरह निःशुल्क है.

इसे खासतौर पर हिंदी भाषा-भाषी उपयोगकर्ताओं की समस्याओं को ध्यान में रखकर हिंदी भाषा के जाने माने कंप्यूटिंग विशेषज्ञ बालेंदु दाधीच ने तैयार किया है.

हिंदीज़िप की कुछ और विशेषताएँ -

हिंदीज़िप एक सरल, सुगम किंतु शक्तिशाली फ़ाइल कम्प्रेशन सॉफ्टवेयर है। इसकी खास विशेषताएँ हैं-
- यह एक फ़्रीवेयर (निःशुल्क सॉफ्टवेयर है)


- यह आपकी सामग्री को पासवर्ड-सुरक्षित करने की सुविधा देता है।


- सिर्फ एक बार पासवर्ड बताने की ज़रूरत है, हर बार नहीं। पासवर्ड बदलना भी आसान है।


- यह ड्रैग एंड ड्रॉप आधारित है। ज़िप या अनज़िप करने के लिए फ़ाइल/फ़ोल्डर को बस ड्रैग एंड ड्रॉप करें।


- ज़िप-अनज़िप सुविधा मेनू के माध्यम से भी उपलब्ध है।


- इसका फॉरमैट विंडोज़ फाइल कम्प्रेशन, विनज़िप आदि अन्य फ़ाइल कम्प्रेशन सॉफ्टवेयरों के अनुकूल (Compatible) है। यानी उनकी फ़ाइलों को हिंदीज़िप में तथा हिंदीज़िप की फ़ाइलों को उन सॉफ्टवेयरों में खोलना संभव है।

 

इसके नाम में 'हिंदी' क्यों है?

- हिंदीज़िप यूनिकोड एनकोडिंग का पूर्ण समर्थन करता है इसलिए हिंदी यूनिकोड में बनी फ़ाइलों को त्रुटि के बिना ज़िप या अनज़िप करने में सक्षम है। वह पुराने हिंदी फ़ॉन्ट्स में बनी फ़ाइलों को भी आराम से ज़िप करता है। हालांकि यूनिकोड एनकोडिंग आधारित होने के कारण वह अन्य भाषाओं की फ़ाइलों के भी अनुकूल है।


- हिंदीज़िप का इंटरफ़ेस (चेहरा-मोहरा, मेनू और संदेश आदि) हिंदी में हैं।


- यह हिंदी के उपयोक्ताओं को विशेष रूप से लक्ष्य बनाकर विकसित किया गया है। हालाँकि ऐसे अन्य भाषा-भाषी भी इसका प्रयोग कर सकते हैं जिन्हें हिंदी इंटरफ़ेस के प्रयोग में कोई दिक्कत नहीं है

इसका बीटा संस्करण यहाँ - http://www.balendu.com/labs/hindizip/  से डाउनलोड करें.

टीप - जाँच परख के दौरान इस सॉफ़्टवेयर से जिप किए गए हिंदी नामधारी फ़ाइल और फ़ोल्डर तो इस सॉफ़्टवेयर से आसानी से और सही तरीके से अनजिप हो गए परंतु अन्य तृतीय पक्ष के ज़िप टूल जैसे कि विनरार में खोलने पर त्रुटि दर्शाया गया.

आप भी इसे डाउनलोड करें और आजमाएँ और सॉफ़्टवेयर में किसी तरह की समस्या की रिपोर्ट करने या सुविधा निवेदन हेतु सहायता मेनू में दिए गए सम्पर्क लिंक का प्रयोग करें. याद रखें, उपयोगकर्ताओं के फ़ीडबैक से ही सॉफ़्टवेयर समृद्ध बनते हैं.

अमर उजाला पोर्टल में भी अब जागरण जंक्शन और नवभारत टाइम्स की तर्ज पर हिंदी ब्लॉगरों की चौपाल सजेगी. इसमें इन दोनों के विपरीत खूबी यह है कि इसमें हिंदी ब्लॉग एग्रीगेटर भी सम्मिलित रहेगा. अभी तो आमंत्रण मिला है. देखते हैं आगे क्या सुविधा मिलती है. जो भी हो, यह है शुभ समाचार.

आमंत्रण निम्न है, जो सार्वजनिक है. यानी आपके लिए भी मुस्‍कान

 

प्रिय ब्लॉगर,
जैसा कि आपको विदित है अमर उजाला ब्लॉग पोर्टल आरंभ हो रहा है। हमें बेहद खुशी होगी कि यदि आपके ब्लाग पोस्ट भी हमारे इस मंच का हिस्सा बनें।
अमर उजाला का ब्लाग प्लेटफॉर्म आपकी बेहतरीन रचनाओं को और ज्यादा लोगों तक पहुँचाएगा। आइए जानें कैसे- 


प्रिंट सिंडीकेशनः
आने वाले समय में बेहतरीन ब्लॉग को अमर उजाला के संपादकीय पेज पर - 'संपादक की पसंद' के नाम से प्रकाशित करने की योजना है।
इसके अलावा विभिन्न मुद्दों पर ब्लागर्स की राय भी हम अखबार में प्रकाशित की जा सकती है


फेसबुक:
करीब 58 हजार लोगों से जुड़े अमर उजाला के फेसबुक पेज की वाल पर नियमित तौर पर दो ब्लॉग पोस्ट प्रकाशित करने की योजना है।
इसके माध्यम से आपकी पोस्ट वायरल होकर लगभग एक लाख लोगों तक पहुंच सकती है।


समसामयिक:
करेंट अफेयर और खास मौकों पर आ‌धारित ब्लॉग कांटेस्ट की योजना है, जिसके विजेता ब्लॉगर की रचना को हम प्रिंट एडिशन में भी स्थान देंगे।

 
कुछ अपेक्षाएं :
रचनाएं मौलिक होने के साथ साथ शाब्दिक स्तर पर संपन्न हों।
राष्ट्रीय और समाजिक नैतिकता का ध्यान रखें।
भड़काऊ और आपत्तिजनक सामग्री से परहेज रखें।


हमारी योजना:
अमर उजाला पर खुद का ब्लाग बनाएँ -  अमर उजाला का ब्लाग लांच होते ही आपको सूचना भेजी जाएगी। आप सीधे अपनी लॉगिन आईडी बनाकर हमारे प्लेटफार्म पर ब्लॉग लिख सकते हैं।
एग्रीगेटर -अमर उजाला एग्रीगेटर के जरिए भी विभिन्न ब्लॉग RSS फीड लेने की योजना बना रहा है। इसके लिए हमें चाहिए सिर्फ आपकी सहमति और आपके ब्लाग का नाम।


क्या करें :
तो अमर उजाला के ब्लॉगर परिवार में आपका स्वागत है। अपनी सहमति vinita@del.amarujala.com पर भेजें।
Vineeta Vashisth

Deputy News Editor
Amar Ujala Publication
C-21-22, Sec-59, Noida

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किस्सा आधुनिक तोता मैना

वर्तमान समय की बात है. भारत नाम का एक देश है. इस देश में कई सरकारें हैं. एक केंद्र सरकार है और बहुत से राज्य सरकार हैं. इन सरकारों की आत्मा उद्योग-पतियों, पूंजी-पतियों और आला-अफ़सरों नामक तोतों में बसती हैं. ये तोते जो भी जब भी चाहते हैं वही होता है.

इस देश के इन सरकारों में काम-काज के लिए बहुत से विभाग होते हैं. इन विभागों की भी आत्मा जाहिर है, सरकार की आत्मा की तरह, दिखती कहीं है और बसती कहीं है. जैसे कि सीबीआई नामक विभाग की आत्मा पीएमओ नामक तोते में बसती है. पुलिस विभाग की आत्मा वसूली में बसती है. शिक्षा विभाग की आत्मा प्राइवेट ट्यूशनों, कोचिंग कक्षाओं में बसती है. अफसरों की आत्मा मलाईदार पोस्टों में बसती है. सांसदों, विधायकों की आत्मा मंत्रीपद की कुर्सी में बसती है. और, अब आप पूछेंगे, इस देश के मंत्रियों की?

तो, इस देश के मंत्रियों की आत्मा पुत्र, दामाद, भाई, भतीजे और भांजों नामक तोतों में बसती है - ये तोते आला-अफ़सरों के ट्रांसफ़र, पोस्टिंग, नियुक्तियाँ, निविदाएँ इत्यादि करवाने में एक्सपर्ट होते हैं, और दरअसल भारत देश में कहीं कुछ चल रहा होता है तो इनकी दया-कृपा से.

इस देश में सुप्रीम कोर्ट नाम की एक मैना है जो कूक-कूक कर जब-तब अपनी पुंगी बजाती रहती है. मगर देश के तमाम तोता इस मैना की हर कूक का जम कर खिल्ली उड़ाते रहते हैं.

 

भारत नाम के इस देश के तमाम निवासियों की आत्मा क्रिकेट नामक तोते में बसती है. यहाँ के निवासी सिर्फ यही काम करते पाए जाते हैं - ईट क्रिकेट, ड्रिंक क्रिकेट, स्लीप क्रिकेट. अभी भारतवासियों की आत्मा धिंग-धपाक करते आईपीएल क्रिकेट नामक विशेष तोते में बसी हुई है. इसीलिए भारतवासियों को सरकारी तोते क्या करते फिरते हैं इससे कभी कोई वास्ता नहीं होता.

 

इति किस्सा आधुनिक तोता मैना समाप्तम्.

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