गुरुवार, 12 सितंबर 2013

सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण में मानक लाने के लिए FUEL के बढ़ते कदम

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(फ़्यूल के जनक - राजेश रंजन जिन्होंने कंप्यूटरों के स्थानीयकरण के लिए हिंदी का स्टाइल गाइड भी लिखा है)

फ़्यूल (FUEL – फ्रिक्वेंटली यूज्ड एन्ट्रीज़ फ़ॉर लोकलाइज़ेशन) के बारे में मैं कोई पांच वर्ष पूर्व लिख चुका हूं - कि यह क्या है, इसकी अहमियत क्या है और सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामों के स्थानीयकरण के लिए क्यों यह एक जरूरी औजार है.

हर्ष की बात यह है कि फ़्यूल परियोजना की शुरुआत राजेश रंजन ने सॉफ़्टवेयरों में प्रयोग में होने वाले हिंदी के शब्दों से सन 2008 में की और सन 2013 तक आते आते यह 40 से अधिक भाषाओं में स्थानीयकरण हेतु इस परियोजना को अपना लिया गया है और यह विस्तार जारी है.

शुरूआत में केवल डेस्कटॉप कंप्यूटिंग की चुनिंदा शब्दावली का मानकीकरण किया गया था, अब इसे विस्तार देकर मोबाइल कंप्यूटिंग तथा वेब कंप्यूटिंग के लिए भी जारी किया गया है. भविष्य में इसके और भी क्षेत्रों में विस्तार करने के प्रयास जारी हैं.

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पिछले दिनों 6-7 सितम्बर को कोर्टयार्ड बाय मैरियट, पुणे में सीडैक व रेडहैट के संयुक्त प्रायोजन में फ़्यूल की द्वि-दिवसीय संगोष्ठी संपन्न हुई जिसमें विषय-विशेषज्ञ वक्ता के रूप में मैं भी शामिल हुआ था.

संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता सैम पित्रोदा अपरिहार्य कारणों से पहुंच नहीं सके तो उन्होंने शिकागो से इंटरनेट के जरिए अपनी लाइव प्रस्तुति दी तथा सवाल जवाब खंड में श्रोताओं के बेबाक प्रश्नों के ठोस जवाब दिए.

सैम पित्रोदा से पूछा गया कि सीडैक समेत तमाम विश्वविद्यालयों में सरकारी पैसे - जो कि जनता की जेब से टैक्स के रूप में लिया गया पैसा है - से तैयार किए गए प्रोग्राम और डेटा आम जनता के लिए निःशुल्क उपयोग हेतु क्यों नहीं उपलब्ध करवाए जाते. सैम पित्रोदा ने कहा कि उनके व्यक्तिगत राय में ऐसा होना ही चाहिए, और वे भरसक प्रयास करते हैं, मगर उन्होंने माना कि भारतीय बाबूगिरी और विविध राज्यों की सरकारों में जमी लालफीता शाही और अनिर्णय की क्षमता इन कामों में आड़े आती है. उन्होंने विश्वास दिलाया कि इस बाबत वे अवश्य ही कुछ करेंगे.

मैंने अपनी प्रस्तुति में उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की कि विशाल परियोजनाओं में जब कई टीमें सॉफ़्टवेयर-अनुवादों में एक साथ लगी होती हैं तो उनमें एकरूपता बनाए रखने में - खासकर तकनीकी शब्दावली, विदेशी स्थान व व्यक्तियों के नामों में - बहुत समस्याएं आती हैं - और इन मामलों में ट्रांसलेशन मेमोरी भी आमतौर पर काम में नहीं आती. तो ऐसे में फ़्यूल का विस्तार बेहद उपयोगी हो सकता है.

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(बाएं - इंडलिनक्स के संयोजक जी. करुणाकर, बीच में - आलोक कुमार)

संगोष्ठी में सुखद रूप से हिंदी ब्लॉग के आदिपुरुष - जिन्होंने 9211 नाम का पहला हिंदी का ब्लॉग अप्रैल 2003 में बनाया, और आरंभिक दिनों में नेट पर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय भूमिका निभाई - आलोक कुमार से खास, बहुत दिनों से लंबित और बहु-प्रतीक्षित, पहली मुलाकात हुई.

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(आलोक कुमार और मैं)

समस्याओं को उठाने व उनके निदान के उपाय ढूंढने में संगोष्ठी बेहद सफल रही जिसके लिए इस संगोष्ठी से जुड़े समस्त व्यक्ति व संगठनों को बधाई व शुभकामनाएं.

8 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. अनुकरणीय व सराहनीय दिशा

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  2. एक जगह टाइपिंग की गड़बड़ी हो गई है।
    "संगोष्ठी में सुखद रूप से हिंदी ब्लॉग के आदिपुरुष - जिन्होंने 9211 नाम का पहला हिंदी का ब्लॉग अप्रैल 2013 में बनाया,"
    इसे अप्रैल 2003 पढ़ा जाए।

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  3. संजीत जी, त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद. आवश्यक सुधार कर दिया है.

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  4. पीडीएफ फाइल को लॉक कैसे किया जाये? ताकि उसके डाटा को किसी भी तरह से न तो कापी किया जा सके और न तो कन्वर्ट किया जा सके।
    क्या कोई ऐसा तरीका नहीं है कि मैं पीडीएफ फाइल को जिसे भी दूं उस फाइल को पासवर्ड से लॉक कर दूं और फाइल और पासवर्ड जिसे दूं तो वह फाइल में पासवर्ड डाले तो फाइल खुल जाये और वह व्यक्ति फाइल को देख सके लेकिन जब वह फाइल को क्लोज कर दे तो वह पासवर्ड लॉक हो जाये और जो पासवर्ड मैंने उसे दिया था वह काम न करे, आर्थात पासवर्ड केवल एक बार ही काम करे?

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  5. अरे न केवल यह गोष्टी वरन् आप और आलोक भाई से मिलने से भी वंचित रह गया!

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  6. बहुत अच्छा लगा. मैं इस दफा शामिल नहीं हो सका लेकिन आशा है की भविष्य में मुलाकात होगी.

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  7. उम्दा पोस्ट।

    हमारा ब्लॉग पढ़ें और मार्गदर्शन करें अपने ब्लॉग पर पेज नम्बर का विजेट कैसे लगायें

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  8. बहुत ही अच्छा प्रयास..
    सुंदर प्रस्तुति..
    prathamprayaas.blogspot.in-

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आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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