फ़ेसबुक और सेल्फ-कंट्रोल

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फ़ेसबुक के जमाने में सेल्फ कंट्रोल?

अमां, क्या बात करते हो!

निगोड़े फ़ेसबुक ने तो सचमुच हम सबका स्व-नियंत्रण खत्म ही कर डाला है

और इस बात को इस लिए सच न मानें कि दुनिया जहान के फेसबुक मित्रों के उनके स्टेटस संदेशों में घोर ऊटपटांग-अनियंत्रित किस्म की बातें पढ़ कर कही जा रही हैं.

दरअसल, यह बात एक शोध निष्कर्ष में सामने आई है.

और आखिर स्व-नियंत्रण हो भी क्यों? जब एक दूसरे की फ़ेसबुक वाल पोतने के लिए सामने खाली पड़ी हो तो जो मर्जी आए रंग भरो. और, लोगों का प्रिय शगल जाति-धर्म जैसा विषय मिल जाए तो फिर बात ही क्या. कभी कभी तो लगता है कि फ़ेसबुक की लोकप्रियता के पीछे शायद एक मात्र यही वजह भी हो, और शायद इसे डिजाइन ही इसीलिए और इस तरह किया गया हो. आखिर, पूरी दुनिया की एक चौथाई आबादी फ़ेसबुक में क्यों पिली पड़ी रहती है. दूसरे तरीके से सोचें तो यह भी संभव दिखता है कि आदमी अपना स्व-नियंत्रण यहाँ आराम से बड़ी बे-तकल्लुफ़ी से एक ओर रख कर अपना काम कर सकता है.

अब आप अपने आम जीवन में चलते फिरते लोगों को गाली-गलौच नहीं कर सकते. सभ्यता का झूठा आवरण ओढ़ना पड़ता है. फ़ेसबुक में फर्जी प्रोफ़ाइल बनाइए और अपना शून्य स्व-नियंत्रण युक्त मसौदा सबके सामने परोसिए.

वैसे देखा जाए तो स्व-नियंत्रण के मामले में फ़ेसबुक ने हिंदुस्तान में नेताओं पर सबसे ज्यादा असर डाला है. वे फ़ेसबुक का उपयोग करते हों या नहीं, जैसा कि पैसिव स्मोकिंग का प्रभाव होता है, ठीक उसी तरह हिंदुस्तानी जनता के फ़ेसबुकिया इस्तेमाल के कारण हिंदुस्तानी नेता स्व-नियंत्रण से बाहर हो गए हैं. कम से कम उनकी बयानबाजी को देख कर तो लगता ही है. जहाँ देश में सीमा के भीतर और सीमा पर बहुत कुछ ठीक नहीं चल रहा हो, वहाँ प्रधान मंत्री यूं तो कभी कुछ कहता नहीं, और जब कहता है तो बस, ठीक है कहता है.

लेखकों साहित्यकारों पर भी फ़ेसबुकिया स्व-नियंत्रण खत्म होने के आसार स्पष्ट नजर आ रहे हैं. एक मशहूर शायर कसाब और अमिताभ बच्चन को बराबर के तराजू में तौलते हैं और बताते हैं कि एक ने एक को बनाया और एक और ने दूसरे को. पर, अब लाख टके का सवाल ये भी तो है कि उन शायर महोदय को किसने बनाया?

यूँ तो इस तरह प्रत्यक्ष और परोक्ष फ़ेसबुकिया प्रभाव के तहत स्व-नियंत्रण खत्म होने के सैकड़ों उदाहरण पेश किए जा सकते हैं, मगर इससे पहले कि यह आरोप इस ब्लॉग पोस्ट पर भी लगे, आपसे आज्ञा चाहता हूँ.

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अभिव्यक्ति का अनियन्त्रित प्रवाह देखने हम भी चले जाते हैं फेसबुक पर।

अभी देखिये और देखते जाईये यह कमबख्त शगल क्या क्या गुल खिलाती है

है। पते की बात है। लेकिन अपनी कहूँ - पहली जनवरी से फेस बुक बन्‍द कर रखी है। केवल अपनी ब्‍लॉग पोस्‍ट साझा करने और उस पर आई टिप्‍पणियों के ि‍लए ही फेस बुक को फेस कर रहा हूँ।

जुड़ने की कोशिश की थी पर झेलना मुश्किल हो गया!

लोग पहले कॉपी में कवि‍ता लि‍ख कर लेते थे, कोई फंस गया तो टि‍का भी देते थे, अब कवि‍ता ही क्‍यों कुछ भी कहने के लि‍ए फ़ेसबुक है न

फेसबुक दुनिया भर के लोगो से जुङने का सकारात्मक जरिया है पर कई लोग इस माध्यम का नकारात्मक इस्तेमाल कर रहे है ।

फेसबुक एक सशक्त माध्यम है अपने विचारों को प्रचारित करने का. लेकिन शेयर और टैगिंग कर कर के लोगों ने इसका बोझ बढ़ा दिया है. सही तरह से उपयोग किया जाए तो बहुत अच्छा होगा.

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