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January, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सत्ता के लड्डू जो न खाए रोए, जो खाए ज्यादा रोए!

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आपके लिए पैसे का क्या उपयोग है?

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मेरे पास होता तो कुछ यूँ उपयोग करता-याच खरीदतानिजी ड्रीमलाइनर खरीदता (बैटरी खराब है तो क्या, ठीक करवा लेता)बीच समंदर में कोई द्वीप खरीद लेतामंगल ग्रह की यात्रा करता... इत्यादि, इत्यादि.

फ़ेसबुक और सेल्फ-कंट्रोल

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फ़ेसबुक के जमाने में सेल्फ कंट्रोल? अमां, क्या बात करते हो! निगोड़े फ़ेसबुक ने तो सचमुच हम सबका स्व-नियंत्रण खत्म ही कर डाला है और इस बात को इस लिए सच न मानें कि दुनिया जहान के फेसबुक मित्रों के उनके स्टेटस संदेशों में घोर ऊटपटांग-अनियंत्रित किस्म की बातें पढ़ कर कही जा रही हैं. दरअसल, यह बात एक शोध निष्कर्ष में सामने आई है. और आखिर स्व-नियंत्रण हो भी क्यों? जब एक दूसरे की फ़ेसबुक वाल पोतने के लिए सामने खाली पड़ी हो तो जो मर्जी आए रंग भरो. और, लोगों का प्रिय शगल जाति-धर्म जैसा विषय मिल जाए तो फिर बात ही क्या. कभी कभी तो लगता है कि फ़ेसबुक की लोकप्रियता के पीछे शायद एक मात्र यही वजह भी हो, और शायद इसे डिजाइन ही इसीलिए और इस तरह किया गया हो. आखिर, पूरी दुनिया की एक चौथाई आबादी फ़ेसबुक में क्यों पिली पड़ी रहती है. दूसरे तरीके से सोचें तो यह भी संभव दिखता है कि आदमी अपना स्व-नियंत्रण यहाँ आराम से बड़ी बे-तकल्लुफ़ी से एक ओर रख कर अपना काम कर सकता है. अब आप अपने आम जीवन में चलते फिरते लोगों को गाली-गलौच नहीं कर सकते. सभ्यता का झूठा आवरण ओढ़ना पड़ता है. फ़ेसबुक में फर्जी प्रोफ़ाइल बनाइ…

ओह, तो यह है संकट की असली वजह!

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बहुधा, असली वजहें कुछ और ही होती हैं.अगर आपको याद होगा तो पिछले पूरे वर्ष भर बारदाना का भारी संकट रहा. गेहूं की फसल जब पक कर तैयार हुई तो उसके भंडारण के लिए बारदाना ढूंढे नहीं मिल रहा था. और, जैसी कि परंपरा है, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो सीधे केंद्र पर आरोप लगा दिया कि बारदाना का संकट उसकी वजह से हो रहा है. और लगता है यह समस्या इस वर्ष भी जारी रहेगी, आरोपों प्रत्यारोपों की झड़ी इस वर्ष भी चलती रहेगी.ख़ैर, यह तो राजनीति की बात है.और, लगता है असली वजह कुछ और है. ये देखें -मखमल में टाट का पैबंद? अरे, ये तो पूरा टाट ही टाट है. मेरा मतलब, बारदाना के ठाठ हैं.अब जब फ़ैशनों में, परिधानों में बारदाना का प्रयोग धड़ल्ले से होगा, सुंदरियाँ और भद्र पुरुष अपने परिधान बारदाना के कपड़े से बनवा कर शान बघारते फिरेंगे तो बेचारे इंडियन गेहूं को तो खुले आसमान में नग्न ही सोना, सड़ना पड़ेगा!मैंने भी एक जोड़ा बारदाना ड्रेस सिलवाने का आदेश दे दिया है. इन्हें पहन कर मैं भी फैशन परस्त और स्मार्ट होने की कोशिश तो कर ही सकता हूँ. और बारदाना की और अधिक कमी हो तो मेरी बला से!

निःशुल्क हिंदी लेखक : चाणक्य, कृतिदेव व यूनिकोड फ़ॉन्ट परिवर्तन व हिंदी वर्तनी जांचक सहित

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पिछली पोस्ट में मैंने निःशुल्क चाणक्य फ़ॉन्ट हिन्दी वर्तनी जाँचक के बारे में बताया था.वस्तुतः यह औजार उसी का एक्सटेंशन है.इसमें हिन्दी टाइपिंग व हिन्दी के विविध फ़ॉन्टों की सामग्री में आपसी कन्वर्जन की सुविधा है. कन्वर्शन विजार्ड से एक क्लिक में फ़ॉन्ट कन्वर्जन की सुविधा है.आप यूनिकोड <> कृतिदेव <> चाणक्य में फ़ॉन्टों को आपस में परिवर्तन कर सकते हैं. फ़ॉन्ट परिवर्तन बेहद शुद्धता से होता है.इसमें हिंदी वर्तनी जाँच की भी सुविधा है - यूनिकोड व चाणक्य फ़ॉन्ट में.वैसे इसे तकनीकी हिंदी समूह के कन्वर्टर फ़ाइलों की सहायता से बनाया गया है -इसे यहाँ से सीधे ऑनलाइन उपयोग करें. ऑफ़लाइन उपयोग हेतु डाउनलोड करने की कड़ी भी वहीं मिलेगी. यह फायरफाक्स ब्राउजर में बेहतर कार्य करता है.

लीजिए, पेश है चाणक्य फ़ॉन्ट के लिए निःशुल्क हिंदी वर्तनी जांचक

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यूनिकोड हिंदी में लिखी सामग्री की वर्तनी जाँच के लिए तो अब हमारे पास कई अच्छे और निःशुल्क विकल्प हैं, परंतु प्रिंट मीडिया में धुंआधार उपयोग में लिया जाने वाला चाणक्य फ़ॉन्ट के लिए निःशुल्क वर्तनी जाँचक अब तक - कम से कम मेरी जानकारी में - नहीं था. परंतु अब आपके लिए चाणक्य फ़ॉन्ट में लिखी हिंदी सामग्री का निःशुल्क वर्तनी जांचक उपलब्ध है.वस्तुतः यह एक द्वि-फ़ॉन्ट वर्तनी जांचक है जिसमें आपको यूनिकोड तथा चाणक्य दोनों में ही हिंदी वर्तनी जाँच की सुविधा मिलती है.आपको अपनी सामग्री को इसके विंडो में पेस्ट करना होगा (या इसमें टाइप करना होगा) और चेक स्पेल नामक बटन को क्लिक करना होगा. यह लिखते लिखते तो वर्तनी नहीं जाँचता, मगर टाइप किए या पेस्ट किए मैटर का वर्तनी बढ़िया, तेज गति से जाँचता है. और गलत वर्तनी के शब्दों के लिए ठीक-ठीक विकल्प सुझाता है. इसका शब्दभंडार डाटाबेस भी विशाल - 51 हजार शब्दों का है.इस औजार को यहाँ से अथवा यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. यह जिप फ़ाइल होता है जिसे आपको अनजिप करना होगा, फिर उसके फ़ोल्डर में जाकर इंडेक्स एचटीएमएल को किसी ब्राउजर में खोलना होगा. यह औजार ब्राउजर आधारि…

इंसान बनाओ, माँ!

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(प्रस्तुत आलेख  - राजस्थान पत्रिका के संपादक श्री गुलाब कोठारी के ब्लॉग से साभार पुनर्प्रकाशित. संदर्भ के लिए यहाँ देखें)कोई सोचकर देखे कि “दामिनी” की मां क्या सोच रही होगी- कि दामिनी उसके पेट से पैदा ही क्यों हुई। उसे कौनसे कर्म की सजा मिली है। आज देश में रोजाना कितनी दामिनियां इस पीड़ा से गुजर रही हैं। सम्पूर्ण लोकतंत्र- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका मौन है। स्वयं को चौथा स्तंभ कहने वाला मीडिया दोगला व्यवहार करता हुआ दिखाई पड़ रहा है। उसे देश में होते सैंकड़ों गैंग रेप दिखाई नहीं देते। तीनों स्तंभों के मौन को सहज मान रहा है। क्यों?इस देश में यह वातावरण क्यों बना, इस पर विचार ही नहीं राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए। प्रत्येक संत का धर्म है कि वह इस विषय पर अपने सम्प्रदाय में मन्थन शुरू करवाए। यह तो तय है कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ इस समस्या का मूल हैं। “सरकारें” और अधिकारी कालेधन और भुजबल एवं माफिया के साथ सीधे जुड़ गए हैं। इतनी बड़ी राशि केवल माफिया ही खपा सकता है। फिर बाकी खेल उसके भुजबल का परिणाम है। उसे सत्ता का भय नहीं रह गया है। जितने घोटाले दिल्ली में, सरकारों में, सामने आए,…

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