टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

December 2012

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पर हो सकता है कि आप पहले पूछ लें कि भई आखिर वो कौन सा गॅजेट है जो अभी सर्वाधिक बिक रहा है?

वर्तमान में गरमा-गरम पकौड़ों की तरह बिक रहे आई-फ़ोन5 के बारे में बताया जा रहा है कि यह अब तक के इतिहास में सर्वाधिक बिकने वाला इलेक्ट्रॉनिक गॅजेट बनने जा रहा है.

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पर, आप बता सकते हैं कि आज से 30 साल पहले उस वक्त तक के इतिहास के हिसाब से सर्वाधिक बिकने वाला इलेक्ट्रॉनिक गॅजेट क्या था?

आपका अनुमान कुछ कुछ सही है. उस वक्त रेडियो कॅसेट रेकॉर्डर ही सबसे ज्यादा बिकते थे.

अपने भारत में बुश कंपनी का रेडियो कॅसेट रेकॉर्डर सबसे ज्यादा बिकता था. हाथ कंगन को आरसी क्या? ये देखिए 30 वर्ष पहले छपा इसका विज्ञापन - जो सरिता पत्रिका के 1980 के किसी अंक में छपा था -

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इन तीस वर्षों में दुनिया बहुत बदल गई है, मगर गॅजेट के प्रति मनुष्यों की दीवानगी अभी भी नहीं बदली है!



                 हमें चाहिये देश भर में बलात्कारों के विरुद्ध फास्ट ट्रैक कोर्ट

चित्र के लिए श्री काजल कुमार व श्री गिरिजेश राव का शुक्रिया.
 विवरण के लिए यहाँ देखें - http://girijeshrao.blogspot.in/2012/12/blog-post_28.html 

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आर्ची तो मुझे आज भी पसंद है. उन्मुक्त जी को भी यह पसंद है. आपको पसंद है या नहीं? कुछ अरसा पहले आर्ची के हिंदी में आने की खबर सुनी थी तो बड़ी उत्सुकता बनी हुई थी.

परंतु उस खबर के बाद लंबे समय हिंदी आर्ची तक आस-पास के न्यूज-स्टैंड पर दिखाई नहीं दिया और न ही इसके किसी ऑनलाइन खरीदी-बिक्री का लिंक मिला तो यह फिर दिमाग से एक तरह से उतर ही गया था.

अभी कुछ दिनों पूर्व पुस्तक मेले में एक स्टाल पर यह दिख गया. उत्सुकतावश इसके भाग 5 के कुल 7 अंकों में से तीन खरीद लिए.

परंतु हिंदी-आर्ची ने मुझे पूरी तरह निराश कर दिया. एक तरह से पूरा पैसा बरबाद!

अब आपको कुछेक कारण तो गिनाने ही होंगे.

लीजिए -

  • अनुवाद - अनुवाद और भाषा सामान्य है. अनुवाद का स्तर और भाषा प्रवाह थोड़ा सा और युवा केंद्रित और बेहतर हो सकता था.
  • एक अंक की कीमत है तीस रुपए. जो बहुत ही ज्यादा है. 30 रुपए और वह भी ज्यादा? जी हाँ. तीस रुपए में आपको मिलते हैं सिर्फ 2 - 3 छोटी छोटी कहानियाँ. छोटे-छोटे 11 पन्ने (22 पृष्ठ) की कीमत 30 रुपए! यह तो सरासर लूट है. और, शायद इसीलिए, कहानी के किसी भी पन्ने पर पृष्ठ संख्या नहीं लिखी है. और शायद इसीलिए एक अंक में पृष्ठ उलटे पुलटे लग गए हैं!
  • आधे अधूरे अंक - आप तीस रुपए का कोई एक अंक खरीदते हैं, और अपने प्रिय आर्ची की कोई कहानी पढ़ते पढ़ते पाते हैं आखिरी पन्ने में क्रमश: लिखा मिलता है - यानी कहानी अधूरी रह गई, और उस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए आपको उसका अगला अंक खरीदना होगा. वह भी पूरे 30 रुपए में, ऊपर से, भाग्य से यदि मिल जाए तो. हद है!
  • किताब का आकार - मूल आर्ची कॉमिक्स का आकार पॉकेट बुक साइज का होता है और वो आमतौर पर रीसाइकल पेपर में प्रिंट होता है. हिंदी आर्ची का आकार एकदम बेहूदा किस्म का है. न तो वो पत्रिका के आकार का है, न वो अपने मूल आकार में है. एकदम बेसुरे, आकार में है. ऊपर से गिनती के दस पन्ने! लगता है कोई विज्ञापन पैम्प्लेट पढ़ रहे हों.
  • आज के जमाने में फ़िजूल-खर्ची? ना ना! पर हिंदी आर्ची तो फिज़ूलखर्च है. दोनों ही इनर कवर कोरे हैं. इनमें में न तो कोई आर्टवर्क है और न ही कोई कार्टून स्ट्रिप. जब पत्रिका इतनी पतली सी है तो खाली स्थान का भरपूर उपयोग भी तो होना चाहिए था - वह भी नहीं!

कुल मिलाकर, आर्ची को हिंदी में लाने में प्रोफ़ेशनल टच कहीं नहीं दिखा. पूरा चलताऊ एटीट्यूड ही नजर आया जिससे इसका फ्लॉप होना तय है. मैंने तीन अंक खरीदे थे - नब्बे रुपए देकर. वह शायद मेरी पहली और आखिरी खरीद थी.

मुझे एक ईमेल प्राप्त हुआ  -
Dear Raviji,
I am management consultant at Indore and very much intersted in research in computer how ever I am not having any formal computer training. Now a days I am trying to work on Ubuntu and able to install it, and also installed Ibus keyboard for remington keyboard, however I am not able to write बडी इ using the same. As evident hear. I am now well conversant with webdunia's indic IME in windows.
I would be very grateful to if you can spare your some time and provide me solutions.

मुझे लगा कि ये कौन सी बड़ी बात है, कहीं पर ई की कुंजी छुपी होगी, और बस खोज कर बता दूंगा.
आमतौर पर रेमिंगट की-बोर्ड में ई लिखने के लिए bZ कुंजियों का कॉम्बीनेशन प्रयोग में लेना होता है. परंतु यहाँ इस कॉम्बीनेशन से इर् लिखा जा रहा था.

फिर मैंने यहाँ दिए गए रेमिंगटन कुंजीपट का लेआउट देखा.

जरा आप भी देखें - और जरा ध्यान से!

हे भगवान! ये कैसा की-बोर्ड है?
आप देखेंगे कि इस पूरे की-बोर्ड में तथा लिखने के लिए कोई भी कुंजी आबंटित नहीं है!
तो यदि आप लिनक्स में रेमिंगटन की-बोर्ड का प्रयोग कर हिंदी लिख रहे होंगे तो ई लिखने के लिए आपको कुछ अन्य जुगाड़ करना पड़ रहा होगा या फिर आप इसके बगैर ही काम चला रहे होंगे.

परंतु लिनक्स तंत्र की ख़ूबी यह है कि इसमें सबकुछ आप अपने मुताबिक कर सकते हैं और यह कोई रॉकेट साइंस नहीं होता है.

तो इसके लिए आपको अपने लिनक्स तंत्र में उपलब्ध रेमिंगटन कुंजीपट लेआउट फ़ाइल को थोड़ा सा संपादित करना होगा और बस आपका काम हो जाएगा.

इसके लिए, एक फ़ाइल - hi-remington.mim ढूंढें. यह आमतौर पर यहाँ होता है -
/usr/share/m17n/hi-remington.mim
इसे आपको रूट उपयोगकर्ता (सुपर-यूजर मोड) में संपादित करना होगा.
इसके लिए कमांड दें (gedit की जगह कोई भी टैक्स्ट एडीटर चलेगा) -
sudo gedit /usr/share/m17n/hi-remington.mim
जीएडिट खुलेगा और hi-remington.mim फ़ाइल को लोड कर लेगा. अब आप नीचे स्क्रॉल करते जाएं और यह पंक्ति देखें -
("$" "+")

यहाँ पर अंग्रेजी के $ के बदले + का चिह्न हिंदी में मैप किया गया है जो कि आमतौर पर ज्यादा काम नहीं आता इसीलिए यहाँ हम ई को प्रतिस्थापित करेंगे. तो यह लाइन हो जाएगी -
("$" "ई")

[यहाँ आपको ई यहीँ से कॉपी करना होगा - इसीलिए जब आप ऊपर दिए गए फ़ाइल को संपादित करने जाएं तो इस पृष्ठ को पहले से लोड कर लें और ई को + से प्रतिस्थापित करने के लिए यहीँ से, या अनयत्र किसी अन्य वेबसाइट की सामग्री से कॉपी करें.]

इसी तरह, ऊ के लिए,
("@" "/") पर जाएं और उसे इस तरह बदलें -
("@" "ऊ")

बस अब आप इस फ़ाइल को सहेज लीजिए और अपने लिनक्स तंत्र को रीस्टार्ट कर लीजिए  (यदि एडवांस यूजर हैं तो इनपुट मैथड एडीटर इंजिन को ही रीलोड कर लीजिए) और आपकी समस्या हो गई गुल! अब जब भी ई छापना होगा तो अंग्रेज़ी के $ कुंजी को दबाइए (यानी शिफ़्ट4) और ऊ छापना हो तो @ कुंजी दबाइए (यानी - शिफ़्ट 2).

अब भी यदि कोई समस्या है तो टिप्पणी बक्से में पूछें.







सड़क पर चलते चलते एक पेड़ के तने पर रखे इस उपकरण ने मेरा ध्यान खींचा -

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यह एक सोलर पैनल था जिसे बड़े तरतीब से पेड़ के तने पर इस तरह से रखा गया था कि दिन भर उस पर धूप पड़ती रहे.

उसे देख मैं रुका. पास ही एक पान का ठेला था. सोलर पैनल से तार का कनेक्शन पान के ठेले तक जा रहा था जहाँ पर एक बैटरी व चार्जर जुड़े थे.

और पान के ठेले पर मौजूद था - घनश्याम साहू. 'हरित पुरुष' - घनश्याम साहू -

Image014 (Small)

पेड़ के तने पर रखे सोलर पैनल को लेकर मेरी जिज्ञासा बढ़ी तो घनश्याम साहू ने बताया -

पहले वो आस पास से वैध-अवैध कनेक्शन लेकर और इमर्जेंसी लाइट जैसे साधनों से अपनी गुमटी को रात में रौशन रखता था. परंतु एक बार कहीं से पता चला कि 3 हजार रुपए (किसी गुमटी धारक के लिए यह रकम बड़ी है) में यह सोलर पैनल मिलता है जिससे इन सबकी जरूरत नहीं रहती तो पैसे जमा कर यह खरीद लिया और अब उसे अपनी गुमटी को रौशन करने के लिए किसी चीज के लिए एक पैसा भी खर्च करने की जरूरत नहीं रहती. उसने गुमटी को रौशन करने के लिए बेहद कम खपत करने वाले एलईडी लैंप की पट्टी भी लगवा ली है. उसका सोलर पैनल बरसात के दिनों में भी उसकी गुमटी को 5 घंटे तक भरपूर रौशन करने लायक बैटरी तो चार्ज कर ही लेता है.

क्या आप भी घनश्याम साहू की तरह हरित नहीं होना चाहेंगे?

मैंने अपने घर को सोलर पैनल से ऊर्जित करने के लिए कुछ समय पूर्व कुछ सोच-विचार किया भी था, परंतु इसकी उच्च आरंभिक लागत (750 वॉट के लिए कोई 80-90 हजार, वह भी 30 प्रतिशत सरकारी सबसिडी के उपरांत) ने मेरे पांव वापस खींच लिए. यदि इसकी कीमतें और भी कम हों - 750 वॉट के लिए 30-35 हजार के रेंज पर - तो मुझे लगता है कि मेरे जैसे ढेरों लोग इस पद्धति को अपनाएंगे और फलस्वरूप न सिर्फ वातावरण का भला होगा, बिजली की कमी से जूझ रहे देश को भी राहत मिलेगी.




अब यह बात मैं नहीं कर रहा हूँ. नहीं तो लोग मुझ पर पिल पड़ेंगे और मेरी खुद की पोस्टों में से वर्तनी की सैकड़ों गलतियाँ निकाल कर दिखा देंगे. भई, यह बात मैं नहीं, स्पेलगुरू कह रहे हैं. और यदि वे स्पेलगुरू हैं, तो जरूर सही ही कह रहे होंगे. यह स्क्रीनशॉट देखें -



और, यदि सचमुच में ऐसा है तो आपको निराश होने की जरूरत नहीं है. अब आप मात्र 399 रुपए में अपनी वर्तनी सुधार सकते हैं. यह ऑफर सीमित समय के लिए ही है.

वैसे तो यह बेहद सस्ता मगर काम का सॉफ़्टवेयर वर्तनी जांच में आपकी सचमुच में सहायता करेगा, मगर पूरी तरह नहीं. क्योंकि कहाँ कि का प्रयोग करना है और कहाँ की का, वो ये नहीं बता पाएगा (आखिर यह भी तो एक तरह की गलत वर्तनी हुई ना)! फिर भी यह है तो काम का.

स्पेलगुरू की एक विस्तृत समीक्षा पहले भी दी जा चुकी है.

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जो पारम्परिक मीडिया पंडित यह मान बैठे थे कि इंटरनेट के नए मीडिया की पैठ और असर कभी भी अख़बार या टीवी जितनी नहीं हो सकते, उनकी खुशफहमी अब टूटने लगी है। जो स्वर पहले नए मीडिया को नामंजूर करने के लिए उठ रहे थे, अब वे उसे समझने के लिए सवाल पूछ रहे हैं. जो लोग नए मीडिया को खाए-पिए-अघाए, प्रतिक्रियावादी, उपभोक्तावादी, ‘साइबर नागरिकों’ का शगल कहते थे वे अपनी इस राय पर दोबारा सोच रहे हैं. कल तक नए मीडिया को नामंजूर करने वाला पारम्परिक मीडिया भी अब नए मीडिया से कंटेंट ले रहा है, यहाँ तक कि उसकी मौजूदगी को महत्वपूर्ण खबर बना रहा है. ब्लॉग पोस्ट करने या घटनाओं को रिकार्ड करने वाले किसी भी दर्शक का मोबाइल फोन जैसा छोटा उपकरण अब समाचार पत्रों और चैनलों का स्रोत बन रहा है.

आर. अनुराधा द्वारा संपादित, 'न्यू मीडिया – इंटरनेट की भाषायी चुनौतियाँ और सम्भावनाएँ' नामक पुस्तक के बैक कवर पर छपा यह संक्षिप्त उद्धरण साबित करता है कि पुस्तक में विषय वस्तु को वर्णित करने में कहीं कोई कोर कसर छोड़ी नहीं गई है.

 

इस पुस्तक में नौ अलग अलग शोधपूर्ण आलेखों को समायोजित किया गया है –

1. नए संचार माध्यम – एक परिचय - आर. अनुराधा

2. न्यू मीडिया व नागर पत्रकारिता : अनाहूत क्रांति – पृथ्वी परिहार

3. अभिव्यक्ति की निलम्बित आजादी और न्यू मीडिया – दिलीप मंडल

4. फेसबुक का समाज और हमारे समाज में फेसबुक – आशीष भारद्वाज

5. भाषा कम्प्यूटरी _ हिन्दी विकास का नया दौर – अनुनाद सिंह

6. हिन्दी ब्लॉग का सफर – रविशंकर श्रीवास्तव

7. हिन्दी में इंटरनेट – अवरूद्ध विकास की गाथा – आर. अनुराधा

8. वर्चुअल स्पेस में चोखेरबाली

9. कबाड़खाना : एक ब्लॉग का फलसफा – अशोक पाण्डे

उपर्युक्त शीर्षक युक्त आलेखों से पुस्तक की प्रकृति का अंदाजा आप लगा सकते हैं. वैसे, पुस्तक की सामग्री में विषय के तकनीकी पक्ष को जानबूझ कर छोड़ दिया गया है और आमतौर पर न्यू मीडिया के बढ़ते कदम और समाज में इसके व्यापक रूप से अपनाए जाने के कारणों व साधनों संसाधनों पर विशद चर्चाएं की गई है.

इस विषय में रुचि रखने वालों व विषय के विद्यार्थियों व संदर्भ के लिए यह पुस्तक बेहद उपयोगी व संकलन योग्य है.

--

पुस्तक – न्यू मीडिया - इंटरनेट की भाषायी चुनौतियाँ और सम्भावनाएँ

संपादक – आर. अनुराधा

पृष्ठ – 131, हार्ड कवर, मूल्य 200 रुपए.

प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 7/31 अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002

यूनिकोड हिंदी डिस्प्ले की समस्या यदा कदा मुंह मारते ही रहती है. हाल ही में एक पाठक ने अपनी समस्या रखी -

 

आदरणीय रतलामी जी ,
सादर सप्रेम प्रणाम ।

जब जीमेल पृष्ठ पर टाइप मैटर एम एस वर्ड पर पेस्ट करता हूँ तो सिर्फ
डिब्बे दिखाई पड़ते हैं ।

मैं चाहता हूँ कि आज तक जीमेल में संरक्षित समस्त रचनाएँ एम एस वर्ड में
पेस्ट कर मेमॉरीकार्ड में रख लूँ ।

कृपया अवगत कराएँ कम्प्यूटर में कौन-सा फॉन्ट होना जरूरी होगा ।उसकी कोई
लिंक हो तो बेहतर ।

कृपया आपके अति व्यस्त समय में विघ्न डालने का अपराध माफ कीजिएगा ।

आपका स्नेहाकांक्षी
****
 
यह एक बड़ी समस्या है. वैसे आमतौर पर ऐसी समस्या तब आती है जब यूनिकोड सामग्री का फ़ॉन्ट सिस्टम में इंस्टाल न हो. मगर यहाँ ऊपर दी गई समस्या में यह बात नहीं है. आप कोई यूनिकोड टैक्स्ट कॉपी पेस्ट करते हैं तो पाते हैं कि गंतव्य में तो डब्बा दिख रहा है. लगता है यह सारा मैटर कूड़ा हो गया. परंतु ऐसा नहीं होता, दरअसल पाठ तो मौजूद रहता है, बस डिस्प्ले में समस्या के कारण डिब्बे दिखते हैं.
ये डिब्बे आमतौर पर एमएस वर्ड 2007 तथा कुछ एमएस वर्ड 2010 की फ़ाइलों में होता है. इसके लिए कुछ सरल से उपाय हैं -
1 - ऐसी फ़ाइलों का मैटर कॉपी कर नोटपैड में पेस्ट करें और इसे सेव-एज विकल्प लेकर एनकोडिंग में यूटीएफ -8 एनकोडिंग चुन कर फ़ाइल सहेजें और फिर फ़ाइल बंद कर फिर से ओपन करें. आपका मैटर अब सही दिखना चाहिए. यदि इससे भी काम नहीं बनता है या यह झंझट वाला लगता है और यदि आपकी समस्या वर्ड 2010 में है तो आपके लिए यह दूसरा विकल्प उत्तम है -
2 - ऐसी फ़ाइलों को एमएस वर्ड 2010 में सेव एज विकल्प चुन कर docx फ़ॉर्मेट (ध्यान दें कि doc फ़ॉर्मेट में नहीं,)में सहेज लें और फ़ाइल बन्द कर दें. एमएस वर्ड भी बन्द कर दें. अब जो नई फ़ाइल docx फ़ॉर्मेट में सहेजी गई है उसे खोलें. डब्बे गायब हो गए होंगे और आपका मैटर सही दिख रहा होगा. यह एमएस ऑफिस का एक बग है जो उम्मीद है कि नए संस्करणों में दूर कर लिया जाएगा.
3 - यदि आपके पास विंडोज लाइव राइटर है तो डब्बे-दार सामग्री को वहाँ कॉपी-पेस्ट करें. आपको तत्काल ही सामग्री देवनागरी में दिखने लगेगी.
4 - यदि आपके पास वर्ड 2010 नहीं है तो डब्बेदार पाठ सामग्री को एचटीएमएल फ़ाइल के रूप में सहेजें, और फिर इस फ़ाइल को किसी ब्राउजर में खोले. ब्राउजर में हिंदी बढ़िया दिखेगी. अब यहाँ से सामग्री कॉपी-पेस्ट कर काम में लें.
 
यदि अब भी कोई समस्या हो तो नीचे टिप्पणी में विस्तार से लिखें. कोई न कोई समाधान अवश्य निकलेगा.

पर, ये वो कहानी नहीं है जिसमें शेर है. अलबत्ता कंप्यूटरी दुनिया का एक ऐसा शेर है जो चहुंओर तहलका मचा रहा है, दहाड़ें मार रहा है.

मैंने पहले भी थोड़ी सी झलकी इस बारे में दिखाई थी.

पर, पहले पहली बात.

मैंने अपना सबसे पहला कंप्यूटर, कोई 18 वर्ष पहले, 1994 में खरीदा था, 40 हजार रुपयों में, अपने जीपीएफ़ के पैसे से लोन लेकर. उसका स्पेसिफ़िकेशन था –

486 प्रोसेसर 433 मे. हर्त्ज, 8 मे.बा. रैम, 1 जीबी हार्ड-डिस्क. चूंकि यह रतलाम में उस वक्त उपलब्ध नहीं था, तो इसे मुंबई से मंगवाया गया था – पूरे पैसे एक हफ़्ते पहले एडवांस में देकर. यह मिनि-टॉवर केबिनेट विशाल आकार में आता था, जो नया नया चला था. चलते समय यह गर्म हो जाता था और इसके पावर सप्लाई का पंखा बड़ी आवाजें करता था.  कुल पॉवर खपत था - 80 वॉट से अधिक (मॉनीटर का अलग)

और, अभी हाल ही में मैंने अपना नया कंप्यूटर खरीदा. क्रेडिट कार्ड के आकार का. महज 2400 रुपयों में. (वैसे तो इसकी असली कीमत 1200 रुपए (25 डॉलर) है, परंतु तमाम टैक्स और शिपिंग खर्चे मिलाकर यह मुझे दो-गुनी कीमत में मिला).  अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि टेक्नोलॉजी कहाँ से कहाँ पहुँच गई है!

 

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(सेमसुंग 22 इंच मॉनीटर के नीचे वास्तविक आकार के गौरैया के पैरों के पास वास्तविक आकार का रास्पबेरी पाई कंप्यूटर है - जो कि वस्तुतः एक सर्किट बोर्ड ही है)

इस क्रेडिट-कार्ड आकार कंप्यूटर का स्पेसिफ़िकेशन है –

ARM प्रोसेसर - 700 मे.हर्त्ज, 512 मेबा रैम, 2 जीबी एसडी कार्ड. इसे मैंने इंटरनेट पर घर बैठे खरीदा, कैश ऑन डिलीवरी पर. – और इस सेंसेशनल कंप्यूटर का नाम है – रास्पबेरी पाई. चूंकि इसका आकार ही क्रेडिट कार्ड जितना है, अतः इसकी बिजली की खपत बेहद कम है. चार पेंसिल सेल से अथवा अपने मोबाइल चार्जर से इसे चला सकते हैं. और, सांसें थाम लीजिए - कुल पॉवर खपत है 1 वॉट से भी कम. पंखा-आवाज-रहित.

रास्पबेरी पाई – पिछले छः महीने से अधिक समय से इसकी इतनी मांग है कि पूर्ति नहीं हो पा रही है और लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है. मैंने भी बैक-ऑर्डर बुकिंग कर इसे मंगवाया तो कोई पंद्रह दिन बाद मेरा नंबर लगा. पहले यह प्रतीक्षा समय और भी अधिक था.

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(रास्पबेरी पाई कंप्यूटर - गौरैया भी हो गई दीवानी? एक यूएसबी पोर्ट में नेटगीयर वाई-फाई डांगल लगा है)

आखिर क्या है इस रास्पबेरी पाई के प्रति लोगों की दीवानगी में?

आप कुछ अंदाजा यहाँ से लगा सकते हैं.

पाई के साथ मेरा पहला दिन

चूंकि पाई को आप अपने मोबाइल चार्जर से चला सकते हैं, तो मैंने पाई को अपने मोबाइल चार्जर से जोड़ा, इसके एचडीएमआई पोर्ट (वीडियो आउट भी है) को मॉनीटर/टीवी स्क्रीन से जोड़ा, यूएसबी पोर्ट में कीबोर्ड और माउस को जोड़ा और पहले से तैयार रास्पबेरी ओएस (वस्तुतः लिनक्स का एक रूप) युक्त 2 जीबी एसडी कार्ड को एसडी कार्ड स्लॉट में लगाया और चार्जर का स्विच ऑन कर दिया.

पंद्रह सेकण्ड के भीतर मेरा रास्पबेरी पाई कंप्यूटर – वह भी मल्टीमीडिया युक्त - चालू हो गया.

अब बारी थी

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(रास्पबेरी पाई डेस्कटॉप)

हिंदी समर्थन के जांच-परख की. इंटरनेट (लैन पोर्ट व यूएसबी डांगल दोनों का ही बढ़िया समर्थन है) पर रचनाकार.ऑर्ग शानदार दिख रहा था. याने हिंदी (व अन्य भारतीय भाषाओं के) के फ़ॉन्ट डिफ़ॉल्ट रूप में शामिल किए गए हैं.

हिंदी की-बोर्ड जोड़ने (एनेबल करने) के लिए थोड़ा उपक्रम करना पड़ा, हालांकि यह भी सिस्टम में अंतर्निर्मित ही है.

बस यह एक कमांड दिया और काम बन गया –

setxkbmap in,us -option grp:ctrl_shift_toggle

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(पाई में इंटरनेट पर हिंदी साइट रचनाकार, टैक्स्ट एडीटर पर हिंदी टाइपिंग, एसेसरीज फ़ोल्डर)

पाई के साथ एडवेंचर चालू है...

 

(बहुत से पाठकों ने रास्पबेरी पाई के प्रति अपनी जिज्ञासा जाहिर की है. इस कंप्यूटर के बारे में बिगिनर गाइड यहाँ है - http://elinux.org/RaspberryPiBoardBeginners तथा  रास्पबेरी पाई सचित्र गाइड बुक पीडीएफ में यहाँ है. )

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और यदि अब तक नहीं देखा है तो कभी देखिएगा भी मत!

ठंड रखिए. जल्द ही बताता हूँ कि क्यों.

जब से भारत का पहला एचडी म्यूजिक चैनल एमट्यून्स एचडी चालू हुआ था, तब से बड़ी इच्छा थी कि इसे देखा जाए. मेरे टाटा स्काई एचडी में यह बंडल नहीं था, और कहीं और इसे देखने का सौभाग्य भी नहीं मिला था. मैंने एमट्यून्स और टाटा स्काई में विशलिस्ट में भी लिखा कि इसे जल्द ही टाटास्काई में बंडल किया जाए.

और, मेरी मुंह मांगी मुराद दो दिन पहले पूरी भी हो गई.

टाटा स्काई एचडी चैनल में एमट्यून्स एचडी आने लगा.

मैं तो मारे खुशी के उछल पड़ा और जल्द ही एमट्यून्स एचडी लगाया. एचडी ऑडियो-वीडियो के साथ संगीत के आनंद का अपना अलग ही मजा है. मैं आसन जमा कर अपने टीवी स्क्रीन के सामने बैठ गया.

परंतु यह क्या? जैसे ही एमट्यून्स एचडी चालू हुआ मुझे लगा कि मैं ठगा गया. घंटे भर में तो मेरी सारी आशाएं धूल धूसरित हो गईं और दूसरे घंटे से मैंने उस चैनल को अपने पसंदीदा से हटा लिया.

लगा कि मन में फालतू ही इच्छा पाले बैठे थे एमट्यून्स एचडी देखने को.

अगर आपके मन में भी इस एचडी म्यूजिक चैनल को देखने की इच्छा हो, तो बिलकुल त्याग दीजिए.

कारण?

कोई एक हो तो बताएं. फिर भी, -

  • इसका एचडी वीडियो स्पष्टतः अपस्केल्ड है, और बेहद पैची वीडियो आता है, जिसे देखने में बिलकुल भी मजा नहीं आता.
  • इसमें विज्ञापनों की भरमार रहती है, वो भी प्रायः एसडी क्वालिटी वाले, जो कि एचडी फार्मेट में फूले-फैले और बिगड़े हुए नजर आते हैं.
  • गानों के नाम पर प्रोमो के अलावा और कुछ नहीं आता

पर, अभी बम फूटना बाकी है -

इसका ऑडियो एकदम घटिया क्वालिटी का मोनो है. जी हाँ, आपने सही पढ़ा! एचडी ऑडियों में 5.1 - 7.1 चैनल होते हैं, और स्टीरियो में 2. परंतु इस तथाकथित एचडी चैनल में वीडियो गानों के साथ बहुत ही घटिया क्वालिटी का 'मोनो ऑडियो' प्रसारित होता है.

 

यानी, कुल मिलाकर दर्शकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है, उनका मजाक बनाया जा रहा है. एचडी के नाम पर कूड़ा परोसा जा रहा है. किसी अन्य सेवा से मैं इतना डिसएप्वाइंट नहीं हुआ था जितना इससे.

ऐसा नहीं है कि इस चैनल में कैपेबिलिटी नहीं है या टाटास्काई की स्ट्रीमिंग में समस्या है. दरअसल इस चैनल में प्रसारित होने वाले कुछ अच्छे क्वालिटी के विज्ञापनों में वीडियो और ऑडियो बाकायदा अच्छे, एचडी क्वालिटी के ही आते हैं. जिससे यह पता चलता है कि चैनल को चलाने वाले साउंड इंजीनियर्स इसे बेहद चलताऊ अंदाज में चलाते हैं, और क्वालिटी पर कोई ध्यान ही नहीं देते.

वैसे, गीत-संगीत के एकाध चैनलों को छोड़कर सभी के यही हाल हैं, और सभी ऑडियो के मोनो प्रसारण करते रहते हैं. एमटीवी और सोनी मिक्स में स्टीरियो प्रसारण होता है मगर उसमें भी ट्रेबल हाई और बास गायब रहता है.

जीटीवी एचडी का भी यही हाल है. उसका वीडियो तो भले ही थोड़ा ठीक रहता है, मगर सारेगामापा जैसे संगीत के प्रोग्रामों में इसका एचडी ऑडियो बेहद घटिया रहता है और यह बारी बारी से कभी सेंटर, कभी लेफ्ट तो कभी राइट से आता रहता है!

एमट्यून्स एचडी - एचडी? माई फूट!

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