September 2012



पिछली पोस्ट पर उन्मुक्त जी ने दुखी होकर कहा - ये तो लिनक्स में नहीं चलेगा. प्रवीण पाण्डेय जी ने मैक पर नहीं चला पाने का अफसोस जताया.

तो पेश है ब्राउजर आधारित हिंदी वर्तनी जांच का नया, अपडेटेड संस्करण, जिसमें पौने दो लाख हिंदी शब्दों का संग्रह युक्त शब्दकोश है.

इसके लिए आपको फायरफाक्स ब्राउज़र ही प्रयोग करना होगा. यदि आप फायरफ़ाक्स ब्राउजर प्रयोग करते हैं तब तो यह आपके बेहद काम का है. नहीं करते हैं तब भी फायरफाक्स का प्रयोग करना प्रारंभ कर दीजिए. क्योंकि अभी तो इससे उत्तम हिंदी वर्तनी जांच की सुविधा, वह भी लिखते-लिखते (ऑन-द-फ़्लाई) और किसी ब्राउजर में उपलब्ध भी नहीं है. गूगल क्रोम में है, परंतु उसमें भी हिंदी शब्द भंडार बेहद कम है.

इसके लिए आपको क्या करना होगा?

आसान  है, यदि आप फायरफाक्स ब्राउजर का प्रयोग करते हैं तो.

नीचे दी गई कड़ी से फायरफाक्स हिंदी वर्तनी जांच प्लगइन डाउनलोड करें और फायरफाक्स के फ़ाइल ओपन डायलाग से खोल कर इंस्टाल करें. फायरफाक्स रीस्टार्ट करें और फायरफाक्स ब्राउजर के इनपुट बक्से में  जहाँ भी आप हिंदी लिखते हैं - जैसे कि इस ब्लॉगर डैशबोर्ड पर मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ, वहाँ दायाँ क्लिक करें और स्पेलिंग चुन कर हिंदी चुनें. बस यह अब अपने आप आपके हिंदी की वर्तनी जांच करता चलेगा जैसे जैसे आप लिखते चलेंगे.

हिंदी वर्तनी जांच फायरफाक्स प्लगइन डाउनलोड कड़ी  -

http://goo.gl/5sh07

यहाँ से hindi_spell_checker-0.05.xpi नाम की फ़ाइल डाउनलोड होगी

डाउनलोड / इंस्टालेशन इत्यादि में कोई समस्या हो तो बताएं.

ऊपर की डाउनलोड कड़ी में यदि समस्या आए तो नीचे लिंक पर जाकर उक्त फ़ाइल को डाउनलोड हेतु चुनें

http://goo.gl/xssZo

यदि आपने पहले ही फायरफाक्स में हिंदी वर्तनी जांच इसके ऑफीशियल डाउनलोड साइट से डाउनलोड किया है तो उसे निकाल कर इस नए, ज्यादा शब्द संग्रह वाले को लगाएं. दरअसल है यह वही प्लगइन, बस इसमें हिंदी शब्द संग्रह की फ़ाइल को नए, बेहतर वाले से बदल दिया गया है.

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यदि आप हिंदी ब्लॉग लिखने के लिए विंडोज लाइव राइटर का प्रयोग करते हैं, तब तो यह आपके लिए ही है. यदि आप लाइव राइटर का प्रयोग नहीं करते हैं तो इसे एक बार आजमा कर जरूर देखें. कमल ने इस औजार के बारे में एक शानदार आलेख लिखा है - विंडोज लाइव राइटर चिट्ठाकारों के लिए वरदान - इसे जरूर पढ़ें.

 

तो, यदि आप विंडोज लाइव राइटर प्रयोग करते हैं, वह भी एकदम नया ताजातरीन संस्करण (पुराने संस्करणों में यह ढंग से काम नहीं करेगा और बेहद धीमा चलेगा) तो सीधे चरण 2 में जाएं. यदि आपने अभी तक विंडोज लाइव राइटर नहीं आजमाया है, या इसका नया संस्करण इंस्टाल करना चाहते हैं तो इसे डाउनलोड करने व इंस्टाल करने की विधि ई-पण्डित के ब्लॉग से साभार नीचे दिया जा रहा है -

 

चरण 1

विण्डोज़ लाइव राइटर एक लोकप्रिय ब्लॉग क्लाइंट है जो कि चिट्ठा लिखना आसान एवं बेहतर बनाता है। इसमें चिट्ठा लिखना ब्लॉग के वेब ऍडीटर की तुलना में ज्यादा आनन्ददायक है। कई सुविधाओं से युक्त इसका ऍमऍस वर्ड जैसा ऍडीटर लिखने हेतु बेहतर वातावरण प्रदान करता है।

पढ़ें – विण्डोज़ लाइव राइटर समीक्षा एवं डाउनलोड

विण्डोज़ लाइव राइटर की तरह माइक्रोसॉफ्ट के कुछ दूसरे मुफ्त सॉफ्टवेयर जैसे स्काइड्राइव, विण्डोज़ मूवी मेकर, विण्डोज़ लाइव मैसेंजर आदि भी ऑनलाइन ही इंस्टाल होते हैं। सौभाग्य से इनको ऑफलाइन इंस्टाल करने हेतु फुल सैटअप का डाउनलोड लिंक उपलब्ध है हालाँकि विण्डोज़ असैंशियल्स में शामिल सभी सॉफ्टवेयरों हेतु एक ही संयुक्त डाउनलोड लिंक है, अलग-अलग डाउनलोड लिंक उपलब्ध नहीं हैं।

डायरैक्ट डाउनलोड लिंक

विण्डोज़ लाइव राइटर २०१२ तथा अन्य विण्डोज़ असैंशियल्स  के लिये वर्तमान में इसका डायरैक्ट डाउनलोड लिंक निम्नलिखित है।

» विण्डोज़ असैंशियल्स फुल सैटअप डाउनलोड करें (आकार:- १३१.३० ऍमबी)

हिन्दी संस्करण हेतु डाउनलोड लिंक में en की जगह hi कर दें। हालाँकि मैंने पाया कि हिन्दी संस्करण में मैन्यू के टैक्स्ट का फॉण्ट आकार काफी छोटा होने से सुपाठ्य नहीं होता इसलिये मैंने उसे हटाकर अंग्रेजी संस्करण ही स्थापित कर दिया। इसी प्रकार अन्य भारतीय भाषायी संस्करणों हेतु en की जगह उनके भाषा कोड प्रयोग करें जैसे मराठी के लिये mr, गुजराती के लिये gu, तमिल के लिये ta, तेलुगू के लिये te, कन्नड़ के लिये kn तथा मलयालम के लिये ml-in प्रयोग करें।

भविष्य में यह डाउनलोड लिंक परिवर्तित हो सकता है तो यदि आप यह लेख कभी बाद में पढ़ रहे हैं तो नीचे बताये गये तरीके से नवीनतम लिंक प्राप्त करें।

डायरैक्ट डाउनलोड लिंक प्राप्त करने का तरीका

» अपने ब्राउजर में विण्डोज़ असैंशियल्स के डाउनलोड पेज पर जायें। इस पेज पर विभिन्न भाषाओं हेतु वेब सैटअप के डाउनलोड लिंक दिये गये हैं। यहाँ होमपेज पर दिये गये आसमानी नीले रंग के Download Now बटन के नीचे भाषा बदलने के लिंक change पर क्लिक करके भी पहुँचा जा सकता है।

image

» यहाँ विभिन्न भाषाओं के वेब सैटअपों हेतु डाउनलोड लिंक दिये गये हैं।

image

अपनी वाँछित भाषा (जैसे English, हिन्दी आदि)  के नाम पर राइट क्लिक करके लिंक कॉपी कर लें (फायरफॉक्स – Copy Link Location, गूगल क्रोम – Copy link address, इंटरनेट ऍक्सप्लोरर – Copy shortcut) तथा इसे ब्राउजर के ऍड्रैस बार में पेस्ट कर लें।

image

यह लिंक कुछ इस तरह होगा। ध्यान दें कि भविष्य के संस्करणों में यह अलग प्रकार का भी हो सकता है।

http://g.live.com/1rewlive5-web/en/wlsetup-web.exe

» इस लिंक में दोनों जगह web शब्द को बदलकर all कर दें। नया लिंक कुछ इस तरह होगा।

http://g.live.com/1rewlive5-all/en/wlsetup-all.exe

» ऍण्टर बटन दबायें, डाउनलोड चालू हो जायेगा।

इस सैटअप में मैसेंजर, फोटो गैलरी, मूवी मेकर, मेल, लाइव राइटर, फैमिली सेफ्टी, माइक्रोसॉफ्ट स्काइड्राइव तथा आउटलुक कनैक्टर पैक  आदि शामिल हैं। सैटअप चलाने पर आप अपनी आवश्यकतानुसार सॉफ्टवेयर चुनकर इंस्टाल कर सकते हैं

 

चरण 2

विंडोज लाइव राइटर इंस्टाल हो जाने के बाद सिर्फ आपको हिंदी शब्द संग्रह की डिक्शनरी फ़ाइल जोड़नी होगी जो कि बेहद आसान है. इसके बाद आपका विंडोज लाइव राइटर हिंदी वर्तनी जांच ऑन-द-फ्लाई करने लगेगा. और, यकीन मानिए, इसकी जांच एमएस वर्ड हिंदी से कई मामलों में बेहतर होगी. अलबत्ता इसमें आपको सही वर्तनी क्या हों इसके विकल्प नहीं मिलेंगे. फिर भी, आपके पोस्टों में संभावित ( ध्यान रहे कि हिंदी के सारे शब्द इस संग्रह में नहीं हैं, अतः बहुत से सही वर्तनी वाले शब्दों को भी यह गलत दिखा सकता है. इसके लिए आपको इन शब्दों को डिक्शनरी में जोड़ना होगा) गलत वर्तनी पर लाल लकीर दिखने लगेगी जिससे आप भूले से भी गलत वर्तनी युक्त पोस्ट प्रकाशित नहीं कर पाएंगे.

विंडोज लाइव राइटर की डिक्शनरी फ़ाइल आमतौर पर विंडोज 7 में (विंडोज एक्सपी के लिए थोड़ा खोजबीन करें) निम्न डिरेक्ट्री में होती है -

C:\Users\a\AppData\Roaming\Windows Live Writer\Dictionaries

यहाँ Users के बाद a उपयोगकर्ता का नाम है, यदि आपका उपयोगकर्ता नाम suresh है तो a के बदले suresh हो जाएगा.

Dictionaries फ़ोल्डर  में आपको user.dic नाम की एक फ़ाइल दिखेगी.

अब नीचे दिए गए लिंक से hindi.dic फ़ाइल डाउनलोड करें. यह 3 मेबा की फ़ाइल है.

http://goo.gl/JILPZ

यदि यह कड़ी काम न करे तो नीचे दी गई कड़ी में जाएं और वहां से hindi.dic फ़ाइल डाउनलोड करें -

http://goo.gl/xssZo

डाउनलोड के बाद इस फ़ाइल का नाम बदल कर (दायां क्लिक कर रीनेम चुनें ) user.dic कर दें.

अब इस user.dic फ़ाइल को विंडोज लाइव राइटर की डिक्शनरीज़ फ़ोल्डर में पुरानी फ़ाइल से रीप्लेस कर दें.

विंडोज लाइव राइटर रीस्टार्ट करें और हिंदी वर्तनी जांच का लाभ उठाएं.

 

नीचे दो स्क्रीनशॉट दिए जा रहे हैं. जो अपनी कहानी खुद कहते हैं.

 

पहला - एमएस वर्ड हिंदी 2010 वर्तनी जांच

ms office hindi spell check

दूसरा - विंडोज लाइव राइटर हिंदी वर्तनी जांच

windows live writer spell check new

पहले, पहली बात.

कोई आठ-दस महीने पूर्व एक स्थानीय विश्वविद्यालय से एक काम लायक हिंदी वर्तनी जाँचक प्रोग्राम बनाने का प्रस्ताव आया था. प्रस्ताव दिया गया और शुरूआती उत्साहवर्धन और लंबे चौड़े वादों  के पश्चात मंजूरी के वक्त यह प्रस्ताव भी अन्य दूसरे सरकारी प्रस्तावों की तरह टाँय-टाँय फिस्स हो गया.

मगर कुछ शुरूआत हमने कर ही ली थी. आशीष श्रीवास्तव का पुराना अनुभव काम आया था और उन्होंने इसी बहाने डॉट.नेट सीख कर लेखनी का एक नया बीटा संस्करण आनन फानन में तैयार कर दिया था. तो इसे ही कुछ परिष्कृत कर आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है.

मगर वर्तनी जांच प्रोग्राम के लिए एक और महत्वपूर्ण बात होती है वह है शब्द संग्रह की.

शब्दों का संग्रह करना एक बड़ा काम था और उन्हें जांचना परखना तो बहुत बड़ा, बेहद ऊबाऊ काम था.

इस कार्य में अहम योगदान दिया - विश्व-प्रसिद्ध कोशकार - अरविंद कुमार ने. उन्होंने अपने कोश के लिए संकलित शब्दों का विशाल डेटाबेस हमें निःशुल्क उपयोग हेतु मुहैया करवा दिया.

अनुनाद सिंह भी हिंदी तकनीकी के क्षेत्र में अरसे से काम कर रहे हैं. उन्होंने भी शब्द संग्रह, छांटन इत्यादि में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है.

आशीष, अनुनाद व अरविंद जी का बहुत बहुत धन्यवाद. आप सभी के सहयोग के बगैर यह प्रकल्प असंभव था.

अब आइए देखें कि यह प्रोग्राम कैसे डाउनलोड करें और इंस्टाल करें.

सबसे पहले लेखनी 1 बीटा निम्न कड़ी से डाउनलोड करें -

http://greatashish.tripod.com/sitebuildercontent/sitebuilderfiles/lekhani.zip

इसे किसी फ़ोल्डर में अनजिप करें और इसका सेटअप इंस्टालर चलाएं.

सेटअप पूरा होने के बाद नीचे दी गई कड़ी से हिंदी वर्तनी जांच हेतु नया परिष्कृत फ़ाइल hindi.dic डाउनलोड करें.

http://goo.gl/JILPZ

यदि यह कड़ी काम न करे तो नीचे दी गई कड़ी में जाएं और वहां से hindi.dic फ़ाइल डाउनलोड करें -

http://goo.gl/xssZo

अब इस hindi.dic फ़ाइल को आपको अपनी लेखनी के इंस्टाल फ़ोल्डर में पुरानी hindi.dic फ़ाइल से रीप्लेस  करना है. घबराइए नहीं, यह बेहद आसान है.

लेखनी आमतौर पर डिफ़ॉल्ट रूप में प्रोग्राम फ़ाइल > हिंदीग्राम > लेखनी 1.0 में इंस्टाल होता है. इस फ़ोल्डर में जाएं और पुरानी hindi.dic फ़ाइल को हटा दें और जो आपने नया फ़ाइल डाउनलोड किया है उसे वहाँ कॉपी-पेस्ट कर दें.

अब आप अपना इंस्टाल किया प्रोग्राम लेखनी 1.0 चलाएं. वर्तनी जांच हेतु उपकरण मेनू में जाकर वर्तनी जांच चुनें या F7 कुंजी दबाएं. इसमें हिंदी वर्तनी जांच आपको संकेतक (कर्सर) के बाद के पाठों में मिलेगा. आप चाहें तो इस प्रोग्राम में इनस्क्रिप्ट, फ़ोनेटिक या रेमिंगटन कीबोर्ड  से यूनिकोड हिंदी लिख भी सकते हैं.

image

अभी इस प्रोग्राम में लिखते-लिखते (ऑन-द-फ्लाई) हिंदी वर्तनी जांच की सुविधा नहीं है (जैसा कि एमएस वर्ड में होता है - जहाँ गलत वर्तनी वाले अक्षरों के नीचे लाल लकीर खिंच जाती है), यह अभी एक एक शब्दों को जांचता परखता और सही वर्तनी के संभावित विकल्पों को बदाता है. पर संभव है कि अगले संस्करणों में यह सुविधा आपको मिले.

परंतु यदि आप विंडोज लाइव राइटर का ताजातरीन संस्करण प्रयोग करते हैं तो आप यह सुविधा पा सकते हैं. इसके लिए आपको अपने लाइव राइटर संस्करण में हिंदी वर्तनी का शब्द संग्रह डिक्शनरी फ़ाइल इंस्टाल करना होगा. यह भी बेहद आसान है. इसके बारे में जानकारी अगले पोस्ट में दी जाएगी.  तब आप लाइव राइटर में निम्न स्क्रीन शॉट में दिए तरीके से हिंदी वर्तनी जांच का प्रयोग कर पाएंगे:

image

                         (विंडोज लाइव राइटर में ऑन-द-फ़्लाई हिंदी वर्तनी जांच)

टीप : उपर्युक्त कड़ी में दिए गए सॉफ्टवेयर बिना किसी गारंटी या वारंटी के जारी किए गए हैं. वर्तनी जांच शब्द संग्रह फ़ाइल के शब्दों की शुद्धता बाबत पूरा प्रयास किया गया है फिर भी बहुत से शब्द गलत वर्तनी के या विवादित हो सकते हैं. अतः अपने स्वयं के रिस्क पर इनका प्रयोग करें.

सॉफ़्टवेयर चलाने में किसी भी प्रकार की समस्या आए तो उसे नीचे अपनी टिप्पणी में दर्ज करें.


"मैं कभी-कभी सोचते हुए गहरे हताशा से भर जाता हूं कि मेरी पहचान किस हद तक सीमित है कि अगर मैंने अदना सा ये ब्लॉग शुरु नहीं करता तो जितने लोग मुझे अब जानते हैं, बमुश्किल उनमें से दस फीसद लोग मुझे जान रहे होते. इतना ही नहीं, चाहे जितने भी लोग किसी न किसी रुप में मेरे आसपास हैं उनमें से आधे से ज्यादा लोग ब्लॉगिंग न करने पर नहीं होते. सुख-दुख,छोटी-बड़ी दुनियाभर की न जाने कितनी सारी बातें मैं उनसे साझा करता हूं. मैं इन सबसे बिना पूछे रिश्तेदारी क्लेम करने लग जाउं तो आज इस देश का कोई भी ऐसा शहर/कस्बा नहीं है जहां कोई दोस्त न मिल जाए. मुझे तो अब देश के किसी भी कोने में जाने में हिचक ही नहीं होती..लगता है, मुसीबत आने पर उस शहर में ब्लॉगर तो होगा. हम इस अर्थ में अतिजातिवादी हो गए हैं और ब्लॉग नाम की जाति की तलाश और उम्मीद से पूरे देश में भटकते रहते हैं. - विनीत कुमार"
 
--- और, यह कहानी लगभग हर प्रतिबद्ध ब्लॉगर की है. चाहे वो रतन सिंह शेखावत हों जिन्हें राजस्थान के गांव गांव के बच्चे बच्चे भी भगतपुरा डॉट काम वाला के नाम से जानते हैं या कोई और.
विनीत कुमार ने अपनी ब्लॉगिंग के पांच साल पूरे होने पर हमेशा की तरह एक धारदार, अपनी अलग बेलौस देसी शैली में, लड़भक और लड़चट जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए अपना अनुभव अपने ब्लॉग हुंकार पर लिखा है, जिसे हर संजीदा ब्लॉगर को पढ़ना चाहिए.  उनकी यह प्रविष्टि साभार यहाँ प्रकाशित की जा रही है. छींटे और बौछारें की तरफ से हुंकार को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं! 
विनीत कुमार का दो वर्ष पहले लिया गया ब्लॉग साक्षात्कार का वीडियो यू-ट्यूब पर यहाँ तथा यहाँ देखें.

आज ब्लॉगिंग करते हुए कुल पांच साल हो गए. आज ही के दिन मैंने मेनस्ट्रीम मीडिया की मामूली( सैलरी के लिहाज से) नौकरी छोड़कर अकादमिक दुनिया में पूरी तरह वापस आने का फैसला लिया था. ब्लॉगिंग करते हुए साल-दर-साल गुजरते चले जा रहे हैं लेकिन मैं इस रात को और अगली सुबह को अक्सर याद करता हूं जब हम उस आदिम सपने से बाहर निकलकर कि बड़ा होकर पत्रकार बनना है, आजतक में काम करना है वर्चुअल स्पेस पर कीबोर्डघसीटी करने लग गए.


ब्लॉगिंग के जब भी साल पूरे होते हैं, मैं फ्लैशबैक में चला जाता हूं. मैं अपने पीछे के उन सालों को उसी क्रम में याद करने लग जाता हूं. इतनी जतन और सावधानी से जैसे कि इसके पहले की कोई तारीख या दिन मेरी जिंदगी के लिए कोई खास मायने नहीं रखते. इससे ठीक एक महीने पहले मेरा जन्मदिन आता है और हर बार घसीट-घसाटकर बीत जाता है. पिछले दो बार से तो हॉस्पिटल में और अबकी बार तो इतना खराब कि मैं शायद ही अपने जन्मदिन को याद करना चाहूंगा. दिनभर मयूर विहार के घर को छोड़ने और कचोटने में बीत गया. ये सच है कि हमारी मौत की तारीखें मुकर्रर नहीं होती लेकिन कुछ तारीखें ऐसी जरुर होती है जो अक्सर जिंदगी के आसपास नाचती रहती है और मौत जैसी ही तकलीफ देती रहती है. शायद इन तारीखों में से मेरे जन्मदिन की एक ऐसी ही तारीख है. खैर,

अपने जन्मदिन को लेकर मैं जितना ही शिथिल,बेपरवाह और लगभग उदास रहता हूं, ब्लॉगिंग की तारीख को लेकर उतना ही उत्साहित, संजीदा और तरल. मैं धीरे-धीरे अपने जन्मदिन की तारीख को खिसकाकर 19 सितंबर तक ले आना चाहता हूं ताकि 17 अगस्त के आसपास मौत जैसी तकलीफ नाचनी बंद हो जाए. मुझे अक्सर लगता है कि मेरी असल पैदाईश इसी दिन हुई. जिस विनीत को आप जानते हैं, वो इस तारीख के पहले आपके बीच नहीं था. वो पहले साहित्य का छात्र था, किसी चैनल का ट्रेनी थी, रिसर्चर था, मां का दुलारा बेटा था, पापा का दुत्कारा कुपुत्र था, बिहार-झारखंड छोड़कर हमेशा के लिए दिल्ली में बसने की चाहत लिए एक शख्स था. वो कदम-कदम पर प्रशांत प्रियदर्शी, ललित, गिरीन्द्र, शैलेश भारतवासी जैसे को परेशान करनेवाला ब्लॉगर नहीं था. वो बात/मुद्दे पीछे पोस्ट तान देनेवाला ब्लॉग राइटर नहीं था. मैं कभी-कभी सोचते हुए गहरे हताशा से भर जाता हूं कि मेरी पहचान किस हद तक सीमित है कि अगर मैंने अदना सा ये ब्लॉग शुरु नहीं करता तो जितने लोग मुझे अब जानते हैं, बमुश्किल उनमें से दस फीसद लोग मुझे जान रहे होते. इतना ही नहीं, चाहे जितने भी लोग किसी न किसी रुप में मेरे आसपास हैं उनमें से आधे से ज्यादा लोग ब्लॉगिंग न करने पर नहीं होते. सुख-दुख,छोटी-बड़ी दुनियाभर की न जाने कितनी सारी बातें मैं उनसे साझा करता हूं. लंबे समय तक जीमेल से उनसे चैट होती रही है इसलिए अब वे इस मंच से छूट भी गए हैं तो भी फोन करते हुए रत्तीभर भी ख्याल नहीं आता कि हम जबलपुर फोन कर रहे हैं कि गिरीन्द्र अब पूर्णिया चला गया है कि पीडी जब किस्सा सुनाना शुरु करता है तो कब चेन्नई से उठाकर पटना की जलेबीनुमा सड़कों और उतनी ही घुमावदार यादों की तरफ लेकर चला जाता है. मैं इन सबसे बिना पूछे रिश्तेदारी क्लेम करने लग जाउं तो आज इस देश का कोई भी ऐसा शहर/कस्बा नहीं है जहां कोई दोस्त न मिल जाए. मुझे तो अब देश के किसी भी कोने में जाने में हिचक ही नहीं होती..लगता है, मुसीबत आने पर उस शहर में ब्लॉगर तो होगा. हम इस अर्थ में अतिजातिवादी हो गए हैं और ब्लॉग नाम की जाति की तलाश और उम्मीद से पूरे देश में भटकते रहते हैं. अब तो फ़ेसबुक ने पहले से भी ज्यादा मामले को आसान कर दिया है.

पिछले पांच साल की तरफ पलटकर देखता हूं तो लगता है इसी ब्लॉगिंग ने मेरे भीतर कितना साहस, कितने सारे जिद्दी धुन भर दिए हैं. सोचिए न, संत जेवियर्स कॉलेज,रांची के स्कूल जैसी सख्ती भरे माहौल से निकलकर आया ग्रेजुएट, हिन्दू कॉलेज दिल्ली में आकर सबकुछ नए सिरे से समझने की कोशिश करता है. बनने से पहले उसके भीतर की कई सारी चीजें टूटती है, चटकती है..इसी जद्दोजहद में कब पैसे कमाने की जरुरत होने लगी,पता तक नहीं चला. ये वो समय था जब जोड़-तोड़,चेला-चमचई, अग्गा-पिच्छा को आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता बताया जा रहा था. हम एक बेहतर लेखक,पत्रकार,रिसर्चर बनने के सपने लेकर,ट्रेनिंग लेकर तैयार हुए थे और अब हमें बने रहने और सफल होने के लिए निहायत अव्वल दर्जे का हरामी,कमीना, चाटुकार,सेटर बनना था. ऐसे में मुझे गहरी उदासी के बीच भी अपने ब्लॉग पर बेइंतहा प्यार उमड़ता है- हुंकारः हां जी सर कल्चर के खिलाफ.

कभी-कभी तो मैं सोचकर कांप जाता हूं कि अगर मैंने ब्लॉगिंग न की होती तो देश-दुनिया और समाज को देखने का तरीका मेरा कितना अलग होता. अलग अभी जिस तरह से देख पा रहा हूं, उससे . नहीं तो जमाने के हिसाब से तो अधिकांश लोगों की तरह ही होता. हम हर शख्स को अकादमिक चश्में में कैद करके देखते- वो ब्राह्मण है, वो राजपूत है, वो भूमिहार है, ओबीसी है,दलित है. उसकी गर्लफ्रैंड एससी है, जान-बूझकर पटाया है कि कोई नहीं तो कम से कम एक की तो नौकरी पक्की हो जाए. उसका गाइड यूपी का है, बनारस-बनारस कार्ड खेला है. वो हरियाणा का है, वो जाट है, ये लड़की ओबीसी है..ब्ला,ब्ला. इस अकदामिक चश्मे से जो कि जाहिर तौर पर तमाम तरह के वैचारिक खुलेपन और देरिदा,फूको,ल्योतार की किताबों को सेल्फ में सजा लेने और वैल्यू लोडेड वर्ड्स के बीच-बीच में झोंकते रहने के बावजूद अलग से कुछ समझ नहीं आता. पूर्ववर्ती साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के डिब्बाबंद विचार बस क्लासरुम और आगे चलकर उत्तर-पुस्तिकाओं/थीसिस तक में जाकर सिमट जाती है, मुझे लगता है इस ब्लॉग ने ही मुझे लोगों को,चीजों को इस चश्मे से देखने से मना कर दिया. इसे ऐसे कह लें कि अकादमिक दुनिया की वो बारीकी मेरे भीतर पैदा ही नहीं होने दी जिसमें इस तरह के भेदभाव को बरतते हुए भी ज्ञान की बदौलत प्रगतिशील होने के कला सीख-समझ सकें. ब्लॉगिंग ने एक ही साथ हमें साहसी और ठस्स बना दिया.

साहसी इस अर्थ में कि जब हम अपनी लैपटॉप पर घुप्प अंधेरे में बैठकर किसी भी मठाधीश पर लिख रहे होते हैं तो दिमाग में रत्तीभर भी ख्याल नहीं आता कि वो मेरा किस हद तक नुकसान करेंगे ? बस एक किस्म का इत्मीनान होता है कि इस कमरे तक किसी की पहुंच नहीं है और अगर हो भी तो तब तक हम अपनी बात तो कह लेंगे. दुनिया की व्यावहारिकता से पूरी तरह निस्संग तो नहीं लेकिन हां एक हद तक इसने हमें पूरी तरह उसमें लिथड़ने से बचा लिया..आज हम ब्लॉगिंग करते हुए अच्छा चाहे खराब जो कि बहुत ही सब्जेक्टिव मामला है, वो हो पाए जो कि खालिस रिसर्चर होते हुए शायद कभी नहीं हो पाते..इसने हमारे भीतर वो अकूत ताकत पैदा की है कि हम किसी भी घटना और व्यक्ति के प्रति असहमत होने की स्थिति में लिख सकते हैं, प्रतिरोध जाहिर कर सकते हैं. निराला, बाबा नागार्जुन, मुक्तिबोध, प्रेमचंद, रेणू जैसे  अपने पुराने साहित्यकारों में अस्वीकार का जो साहस रहा है, अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का जो माद्दा रहा है, वो उनकी रचनाओं के पढ़ने के बाद क्लासरुम और अकादमिक दुनिया से नहीं, इसी ब्लॉगिंग से थोड़ा-बहुत ही सही अपने भीतर संरक्षित रह पाया.

और ठस्स इस अर्थ में कि इसने मेरे भीतर वो कभी कलात्मक बोध पैदा नहीं होने दिया जिसका इस्तेमाल हम भाषिक सौन्दर्य विधान पैदा करने के बजाय उस झीने पर्दे की तरह करते जो हमें स्टैंड राइटिंग के बजाय मैनेज्ड राइटिंग की तरफ ले जाता. हम सिर्फ उन्हीं रचनाओं,लेखकों और मूर्धन्यों के बारे में लिखते जो हमारी जेब की सेहत और बौद्धिक छवि दुरुस्त करने के काम आते. मतलब हम चूजी राइटर होने से बच गए और इससे हुआ ये कि हमारे हिस्से कई ऐसे मुद्दे,कई ऐसे लोग आ गए जो मेनस्ट्रीम मीडिया की डस्टबिन में फेंक दिए गए थे, जो अकामदिक दुनिया में सिरमौर करार दे दिए गए थे, जो मीडिया में मसीहा नाम से समादृत थे. हमने लेखन के नाम पर ठिठई ज्यादा की है और ये सब बस इसलिए कि ब्लॉग नाम की एक चीज हमारे पास थी और जिसके उपर किसी की सत्ता नहीं थी. ये अलग बात है कि अब इस विधा में भी एक से एक लड़भक और लड़चट लोग आ गए हैं. मैं तो अपने उन पुराने ब्लॉगर साथियों को याद करता हूं जो अपनी भाषिक खूबसूरती के साथ ऐसी धज्जियां उड़ाते थे कि पायजामे का सिला बुश्शर्ट तक को पता न चले. हम इस अकेले ब्लॉग की बदौलत( आर्थिक रुप से जेआरएफ की बदौलत) लंबे समय तक सिस्टम का कल-पुर्जा,चेला-चपाटी बनने से बचते रहे. नहीं तो हम कभी ब्लॉगर नहीं, चम्पू या फिर जमाने पहले ही एस्सिटेंट/ एसोशिएट पदनाम से सुशोभित हो गए होते.

कई बार कुछ घटनाएं,कुछ प्रसंग बहुत ही ज्यादा मन को कचोटती है. लगता है किससे कहें. मोबाइल की टच स्क्रीन पर उंगलियां सरकने लग जाती है. फिर हम उसे साइड कर देते हैं जैसे कि किसी पर यकीन न हो और फिर एक नई पोस्ट लिख देते हैं. कौन ऐसा पात्र खोजने जाए जो ठीक-ठीक मेरी मनःस्थिति को समझ सकेगा,लाओ यहीं उतार दो. आप जो मुझे लगातार पढ़ते हैं न, कई बार वो मेरे मन की कबाड़ है, उचाट मन को उचटने न देने की कवायद. उसमें न तो रिपोर्टिंग है, न खबर है, न कथा है और न ही साहित्यिकता. उसमें वो सब है,जिससे हम छूटना चाहते हैं, जिसके छूटते जाने पर भारी तकलीफ होती है.
अपने इस ब्लॉग के एक कोने में अक्सर मेरी मां होती है. न्यूज बुलेटिन की तरह खेल,राजनीति,मनोरंजन की तरह एक अनिवार्य सेग्मेंट. वो मां जो अक्सर मजाक में कहा करती है- तुमको पैदा तो किए लेकिन चीन्हें( पहचानना) बहुत बाद में. वो इसके जरिए मुझे रोज चीन्ह रही है. जमशेदपुर के चार कमरे की फ्लैट में, बालकनी में बैठकर गुजरती बकरियों,गाड़ियों और डॉगिज को देखते हुए. प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, जागरण में छपी मेरी पोस्टों से गुजरते हुए. मुझे लगता है कि अगर मैं ब्लॉगिंग नहीं कर रहा होता तो मां के इस कोने को कहां व्यक्त कर पाता. कौन माई का लाल मेरी इस "बिसूरन कथा" को छापता. बचपन की मेरी उन फटीचर यादों को अपने अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर जगह देता.

हम सबके बीच साग-सब्जी-दूध-फल-गाड़ी-मोटर के बाजारों के बीच अफवाहों का भी एक बड़ा बाजार है. ये बाजार बिना किसी ईंधन के अफवाहों से गर्म रहता है. इसी बाजार में अक्सर अटकलें लगती हैं. इन्हीं में  ये अटकल अक्सर लगती रही है- ये कुछ दिन का खेल है, देखिएगा लाइफ सेट होते ही ब्लॉग-स्लॉग सब छोड़ देगा. अरे देख नहीं रहे हैं, जनसत्ता, तहलका में लिखने और चैनल पर आने के बाद से कितना कम हो गया है लिखना ? बनने दिए एस्सिटेंट प्रोफेसर, सब ब्लॉगिंग पर बरफ जम जाएगा. इन अटकलों का हम क्या कर सकते हैं ? वैसे भी अफवाहें और अटकलें जब तक जिंदा रहे, उसी शक्ल में जिंदा रहे तो अच्छा है. उनका रुपांतरण घातक ही है..लेकिन इतना तो जरुर है कि हम ब्लॉगिंग तो तभी छोड़ सकते हैं न जब मीडिया में किसी घटना से गुजरने के बाद उबाल आने बंद हो जाएं. आसपास की चीजों के चटकने के बाद भीतर से कुछ रिसने का एहसास खत्म हो जाए. मां के फोन पर यादों की गलियों में गुम होने बंद हो जाए..जब तक ये होते रहेंगे, आखिर विचारों के कबाड़ और कचोट को कहां रखेंगे. यहीं न. ऐसे में तो हम बस इतना ही कह सकते हैं न कि हमारी निरंतरता भले ही टूटती-अटकती रहे लेकिन तासीर बनी रहे, मैं अपनी कोशिश तो बस इतनी ही कर सकता हूं और अटकलों के बाजार के बीच आप मेरे लिए यही कामना कर सकते हैं, बाकी का क्या है ?

मेरे इस ब्लॉग में और ब्लॉगिंग करते हुए कई संबंध दर्ज है, कईयों से जुड़ने के संबंध और कईयों से जुड़कर अलग होने के संदर्भ. कुछ हमारे रोज के टिप्पणीकार हुआ करते थे, अब वे भूले-बिसरे गीत की तरह बनकर रह गए हैं. कुछ हमारे लेखन के बीच अचानक से संदर्भहीन हो गए हैं. अगर किसी रात मैं उन तमाम पुरानी पोस्टों को एक-एक करके पढ़ना शुरु करुं तो ऐसा लगेगा कि हम किसी कस्बे से गुजर रहे हैं जहां कभी हमारी गली हुआ करती थी, अब वो किसी का मकान हो गया है. जिसके साथ कभी हम अक्सर लुकाछिपी खेला करते थे वो हमारी पकड़ से छूट गए हैं. ये इतिहास जैसा प्रामाणिक न होते हुए भी, उससे कम दिलचस्प नहीं है. देर रात उन सबको याद करना कभी पागलपन लगता है और कभी हाथ गर्दन की तरफ बढ़ते हैं कि कोई दुपट्टा रखा होगा कि हम भभका मारकर रोने से पहले ही उसे अपने मुंह में ठूंस लें. संभावनाओं का ऐसा एल्बम सच में कितना दिलचस्प है न. !














कंप्यूटर-क्षमता में हम और हिंदी कहाँ हैं, हमारी ताक़तें और कमज़ोरियाँ क्या हैं? कंप्यूटरी भाषा में पूछें तो क्या हिंदी कंप्यूटर-फ़्रैंडली है? क्या कंप्यूटर हिंदी-फ़्रैंडली है? और यह भी क्या हम हिंदी-फ़्रैंडली हैं?

कोशकार अरविंद कुमार द्वारा विहंगावलोकन

कंप्यूटर-फ़्रैंडली, हिंदी-फ़्रैंडली, विश्व-फ़्रैंडली

यह युग सूचना प्रौद्योगिकी का यानी कंप्यूटर युग है. जो काम पहले कभी बरसों में हुआ करते थे अब कंप्यूटर की सहायता से कुछ दिनों, घंटों या मिनटों में हो जाते हैं. संसार का ज्ञान सिमट कर हमारी मेज़ पर या हमारी गोदी में रखे लैपटाप पर आ सकता है. प्रबंधन की गहन समस्याएँ, उत्पादन प्रक्रिया का स्वचालनीकरण, बैंकों का हिसाब किताब, वायुयान या रेलवे की बुकिंग सब कुछ तत्काल. देश के किसी भी कोने में अपने रुपए निकाल लो. बैंक जाओ पूरे साल के ब्योरे का प्रिंटआउट ले आओ.

यह संभव करने वाली गणना प्रणाली का नाम है कंप्यूटर की दो अंकों वाली बाइनेरी (द्वितीय लव, युग्मक, द्वैत) प्रणाली. इसमें कुल दो अंक हैं – एक और शून्य, हाँ और ना. [उदाहरण – हमारी प्रचलित दशम लव प्रणाली के 1, 2, 3, 4 बाइनेरी में लिखे जाते हैं 1, 10, 11, 100] इस गणन विधि की क्षमता अपरंपार है. इस की सहायता से कंप्यूटर के मानीटर (स्क्रीन) पर चित्र/ध्वनि दिखाए जा सकते हैं, समाचार-लेख-ग्रंथ लिखे और छापे जाते हैं. संदेश कुछ ही पलों में पृथ्वी के किसी भी कोने में पहुँच जाते हैं.

नतीजा यह हुआ है कि काग़ज़ क़लम की जगह कंप्यूटर लेता जा रहा है. सारी किताबें, दैनिक पत्र, टीवी के डिजिटल चैनल, उन के सारे सीरियल और समाचार – सब के सब – इन्हीं 1 और 0 के सहारे हमारे पास आते हैं. आम आदमी की ज़िंदगी में कंप्यूटर की लिखने पढ़ने की क्षमता ही सब से ज़्यादा काम आती है. कुछ प्रमुख लिपि हैं: चित्रलिपि (जैसे चीनी लिपि), अक्षर लिपि (जैसे रोमन - इंग्लिश), उच्चारण लिपि (ब्राह्मी से निकली देवनागरी आदि).

इंग्लिश अक्षर ग्राफिक (तस्वीर) होते हैं. उनकी अपनी कोई एक सुनिश्चित ध्वनि नहीं होती. स्वर ‘ए’ कभी ‘अ’ होता है, कभी ‘आ’, कभी ‘ए’, ‘ऐ’. व्यंजन ‘सी’ कभी ‘स’ होता है, कभी ‘क’ और ‘च’ भी. ‘ऐस’ अकसर ‘स’ है, लेकिन ‘ज़’ भी है, ‘श’ भी है. इंग्लिश उच्चारण कई बार संदर्भ पर भी निर्भर करता है: इंग्लिश में लिखा minute एकम घंटे के साठवें भाग के तौर पर मिनट बोला जाता है, लेकिन सूक्ष्म के अर्थ में माइन्यूट! ये उच्चारण स्वयं इंग्लिश बोलने वालों को बचपन से सीखने होते हैं.

ब्राह्मी से निकली लिपियोँ की ख़ूबी है: जैसा लिखना वैसा बोलना. यानी वे सब ध्वनि आधारित हैं. सब का उच्चारण सुनिश्चित है. ‘क’ का उच्चारण कबूतर वाला ‘क’ ही होगा. यह तथ्य हिंदी आदि को पूरी तरह कंप्यूटर-फ़्रैंडली बनाता है.

इनस्क्रिप्ट और फिर यूनिकोड क्रांति...

कुछ साल पहले तक हिंदी टंकण (पहले टाइपराइटर और बाद में कंप्यूटर पर) ग्राफिक मोड में होता था. इम मोड में ‘आ’ टाइप करने के लिए पहले ‘अ’ और उसके बाद ‘आ का डंडा’ टाइप करते थे, ‘कि’ लिखने के लिए पहले ‘इ की मात्रा टाइप’ करते थे, बाद में ‘क’. हर कंप्यूटर कंपनी पर अलग अलग फ़ौंट होते थे. इस अराजकता का सीधा दुष्प्रभाव हिंदी को संसार के हर कंप्यूटर तक पहुँचाने में सब से बड़ी बाधा था. देखने वाले के कंप्यूटर पर भेजने वाले का फ़ौंट न हो तो वह कुछ नहीं देख पाता था.

1985-86 के आसपास हमारे मेधावी कंप्यूटरविदोँ ने टाइपिंग की एक नई विधि (इनस्क्रिप्ट) बनाई. इसमें कंप्यूटर पर हम अक्षर नहीं ध्वनि (उच्चारण) टाइप करते हैं. अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ जैसे स्वरों, उनकी मात्राओं तथा हलंत चिह्न के लिए स्वतंत्र कुंजियां बनाई गईं. इसी तरह सभी व्यंजनों की ध्वनियोँ की भी कुंजियाँ बनीं. सभी व्यंजनों को आधा करने के लिए हलंत लगाने का प्रावधान किया गया. अब ‘कि’ लिखने के लिए हम पहले ‘क’ टाइप करते हैँ, फिर ‘इ’ की मात्रा. और भी अच्छा उदाहरण है ‘क्ति’ टाइप करना. पहले ‘क’ टाइप करो, फिर हलंत, फिर ‘त’ और अब छोटी ‘इ’ की मात्रा. बन गया ‘क्ति’!

इस आविष्कार से एक महत्वपूर्ण लाभ और हुआ. अब हिंदी में डाटाबेस बनाना संभव हो गया. [डाटाबेस - डाटा (तथ्य/सूचना) का इस प्रकार संकलन कि वांछित सूचना को आसानी से और लगभग तत्काल खोजा/निकाला जा सके. बैंकों के सारे खाते, जमा या निकाली रक़म की जानकारी या रेलवे टिकटों की क़ीमत/बुकिंग आदि का हिसाब-किताब डाटाबेस या विशाल तालिका होता है.] पहले हिंदी में केवल आरंभिक स्तर की टाइपिंग (डीटीपी – डैस्क टाप पब्लिशिंग) हो सकती थी. अब डाटाबेस बनने शुरू हुए. मेरे दो भागोँ वाले समांतर कोश (प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट-इंडिया, नई दिल्ली) और तीन भागोँ वाले द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी (अब मेरी कंपनी - अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि., ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065 - से उपलब्ध) के विशाल डाटाबेस इस क्षमता के कारण ही बन पाए.

और अब इंटरनैट पर उपलब्घ बृहद द्विभाषी कोश अरविंद लैक्सिकन (http://arvindlexicon.com/lexicon) इसी की देन है. इसी के सहारे पर इंटरनैट पर तरह तरह के हिंदी, हिंदी-इंग्लिश, इंग्लिश-हिंदी कोश मिलते हैं. इस के ज़रिए दुनिया भर के लोगों को हिंदी सीखने-सिखाने-सुधारने का रास्ता खुल गया. इन की सहायता से विदेशों में बसे भारतीयों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी के बच्चोँ के लिए अब इंग्लिश शब्दों के द्वारा हिंदी सीखने-सिखाने और सुधारने का सर्वोत्तम साधन. हर दिन यह उपयोगिता और लोकप्रियता की नई मंज़िलें छू रहा है.

फिर भी आज से दस-बारह साल पहले तक भारतीय लिपियों में इंटरनैट का उपयोग आकाश कुसुम ही था. यह समस्या अकेली हिंदी या तमिल की ही नहीं थी. रोमन लिपि के अतिरिक्त संसार की सभी भाषाओं के सामने यही कठिनाई थी. इसे दूर करने के लिए कोई दस साल पहले यूनिकोड नाम की एक और क्रांति हुई. संसार की सारी लिपियोँ को एक ही कीबोर्ड पर टाइप करने की क्षमता देने वाला यूनिकोड बना. यह सारी दुनिया के भाषाविदों और कंप्यूटर पंडितों ने मिल बैठ कर तैयार किया. सारी लिपियाँ और भाषाएँ एक ही कुंजीपटल पर टाइप करने की क्षमता पैदा हुई. दुनिया के किसी भी कोने में उन्हें देख पढ़ पाने की सुविधा मिली. इस प्रकार कंप्यूटर पूरी तरह विश्व-फ़्रैंडली बन गए.

आख़िर यूनिकोड है क्या?

यह संसार की सभी लिपियोँ को एक माला में पिरोने के प्रयासोँ का सफल परिणाम है. इस में संसार की हर लिपि के एक एक अक्षर को एक सुनिश्चित संख्या दी गई है और इंस्क्रिप्ट को भी उस मेँ समाहित कर लिया गया है. कंप्यूटर और डिजिटल संप्रेषण (ईमेल, इंटरनैट आदि) को विश्व-फ़्रैंडली बनाने के लिए यह मूलभूत आवश्यकता थी. तभी इंटरनैट की फ़ौंट अराजकता समाप्त हो सकती थी और हमारी सभी भाषाओँ विशेषकर हिंदी को दुनिया तक बड़े सहज भाव से पहुँचाया जा सकता था. इसके 1991 से ही प्रयास आरंभ किए गए. यूनिकोड कंसौर्शियम नामक अलाभ संस्था ने इसके मानक तैयार किए.

यूनिकोड करता क्या है? यह प्रत्येक अक्षर के लिए एक विशेष नंबर प्रदान करता है, चाहे कोई भी प्लैटफॉर्म हो, चाहे कोई भी प्रोग्राम हो, चाहे कोई भी भाषा हो. यूनिकोड स्टैंडर्ड को ऐपल, एचपी, आईबीएम, जस्ट सिस्टम, माईक्रोसाफ़्ट, औरेकल, सैप, सन, साईबेस, यूनिसिस जैसी उद्योग की प्रमुख कंपनियों ने इस अपनाया और अब यह सर्वमान्य हो चुका है. इस का हिंदी कोड नीचे के चित्र में दिखाया गया है-

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यूनिकोड में देवनागरी के हर अक्षर की क्रम संख्या ऊपर के चित्र में दिखाई गई है. यूनिकोड में यह क्रम बिल्कुल वही है जो इंस्क्रिप्ट में था. बत्तीस बिट वाली संपूर्ण तालिका में देवनागरी को U+090 से U+097 तक की संख्याएँ दी गई हैं. इस से कम और अधिक वाली संख्याएँ अन्य लिपियोँ के लिए हैँ.

कोई त्रुटिहीन वर्तनी जाँचक नहीं अभी तक नहीँ बना है. रुकावट है - हिंदी में हर अख़बार की, हर प्रकाशक की और लेखक की भी अपनी अलग वर्तनी. हिज्ज़ों का कोई मानकीकरण नहीं है. कोई ‘गयी’ लिखता है, कोई ‘गई’. कोई भी संस्थान दूसरे की वर्तनी स्वीकार नहीं करता. हरएक को अपना जाँचक चाहिए. दूसरी बाधा है किसी के पास पूरी हिंदी शब्दावली का डाटा नहीं है. शब्दावली है भी, तो शब्दों के भिन्न रूप नहीं हैं. जाना क्रिया के वर्तनी भेद से इतने सारे रूप बनते हैं – (अकारादि क्रम से) गई, गए, गया, गयी, गये जा, जाइए, जाइएगा, जाऊँगा, जाऊँगी, जाएंगी, जाएँगे, जाएंगे, जाए, जाएगा, जाएगी, जाओ, जाओगी, जाओगे, जाने. हिंदी के सभी शब्दों के रूप अभी तक किसी ने जैनरेट नहीं किए हैं. [मैंने कुछ चुने शब्दों के ऐसे रूप जैनरेट कर के अरविंद लैक्सिकन में डालना शुरू किया है. काम ऊबाऊ पर कर रहा हूँ. बरसों लगेंगे. कब तक कर पाऊँगा? – बयासी पूरे कर चुका हूँ. पता नहीं कितने बाक़ी हैं?]

कितने कंप्यूटर-फ़्रैंडली हुए अब तक हम?

हिंदी के लगभग सभी अख़बार, पत्रपत्रिकाएँ और उनके दफ़्तर कंप्यूटरित हो चुके हैं. सामान्य हिंदी पत्रकार कंप्यूटर-सक्षम है. लेखक-साहित्यकार कंप्यूटर से लाभ नहीं उठा रहे. पुराने ज़माने के लोगों की बात करेँ तो इंग्लिश में लिखने वाले ख़ुशवंत सिंह (अब तो वह बहुत बूढ़े गए, पर पंदरह साल पहले भी) काग़ज़ क़लम का ही इस्तेमाल करते हैं. कमलेश्वर पलंग पर पालथी मार कर हाथ से लिखते रहे. ऐसे लोग अज्ञानवश कंप्यूटर से दूर भागते हैं. उनके मन में डर था और है कि वे कंप्यूटर पर काम कर पाएँगे भी या नहीं. उनके सामने मैं अपना उदाहरण रखना चाहता हूँ. तिरेसठ बरस पूरे करने के बाद मैंने कंप्यूटर लिया, और बड़ी आसानी से उस पर काम करने लगा. बेहद आसान था यह - तब क्रांतिकारी इनस्क्रिप्ट कुंजीपटल बन चुका था.

एक दिक्क़त और है. धन की. नौजवान हिंदी वालोँ के पास कंप्यूटर के लिए पैसा नहीं होता. यहाँ काम आएँगे सस्ते टौबलेट और लैपटाप.

टैबलेट लैपटाप बन सकते हैं महान मानव संसाधन!

अब अगर सरकारें सभी छात्रों को टैबलेट (ऐंड्राइड) या लैपटाप कंप्यूटर देने का वादा पूरा कर पाईं, तो हमारे पास एक पूरी कंप्यूटर-फ़्रैंडली हिंदी सेना तैयार हो जाएगी. जनसांख्यिक आकलनों और भावी संभावनाओँ के आधार पर पच्चीस साल बाद यह सेना जनसंख्या में संसार की सबसे बड़ी युवा सेना होगी. एक महान मानव संसाधन! हिंदी का प्रचार तो तेज़ी से होगा ही. इस से जो नई पीढ़ी बड़ी होगी वह पुरातन से अधुनातम की और स्वयं बढेगी, हिंदी को और देश को दुनिया भर में बढ़ाएगी.

हर दसवीँ-पास को टैबलेट पर बारहवीं की सभी पाठ्य पुस्तकें और बारहवीँ-पास को बी.ए. की सभी पुस्तकेँ प्रीलोडित मिलनी चाहिए. इस से किताबें छापने पर जो काग़ज़ और स्याही ख़र्च होते हैं, वे बचेंगे. वन संरक्षण में भारी सहायता मिलेगी. मेरा प्रस्ताव है कि प्रति ऐंड्राइड के हिसाब से प्रति पुस्तक और कोश के लिए अगर पाँच पाँच रुपए रायल्टी दी जाए तो प्रकाशक बड़ी आसानी से राज़ी हो जाएँगे. उन का छपाई-बँधाई-बिकाई का सारा व्यय जो बच रहा है. सवाल एक दो कंप्यूटरों का नहीं लाखोँ करोड़ों का है.

स्पष्ट है - इस से प्रति कंप्यूटर लागत बढ़ जाएगी. मेरा अनुमान है कि यह लागत लगभग ढाई-तीन सौ रुपए बैठेगी. लेकिन राष्ट्रीय बचत तो अनुमानातीत होगी. अरबों रुपए हर साल! हर छात्र का किताबोँ का कितना ख़र्च बचेगा! देश का काग़ज़ और छपाई का ख़र्च! (वन संरक्षण अलग से होगा.)

हर टैबलेट (ऐंड्राइड) या लैपटाप पर औफ़लाइन हिंदी-इंग्लिश कोश-थिसारस भी मिलना चाहिए, क्योंकि इंटरनैट कनेक्शन हर वक़्त औन रखना छात्रों की जेब से परे होगा.

हिंदी और इंग्लिश देश की राजभाषाएँ हैं. दोनों की अच्छी जानकारी के सारे संसाधन छात्रों के हाथोँ में होने ही चाहिएँ. इंग्लिश के प्रति अपना पुराना पराधीनता वाला संकुचित दृष्टिकोण हम अब अपनाए नहीं रह सकते. तब वह ग़ुलामी का प्रतीक थी. अब सबसे अधिक प्रचलित विश्व भाषा और हमारे लिए ज्ञानविज्ञान की कुंजी और दुनिया से संपर्क की साधन है. हमारे युवाओँ को इंग्लिश-सक्षम होना ही होगा. उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लायक़ बनाना हमारा कर्तव्य और दायित्व दोनों हैं. मुझे इसमें हिंदी-विरोध या इंग्लिशपरस्ती नहीं, देश की क्षमता का विकास नज़र आता है.

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(दैनिक जागरण के पुनर्नवा में छपे अरविंद कुमार के लेख का परिवर्धित और परिष्कृत रूप)

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अरविंद कुमार

प्रधान संपादक, अरविंद लैक्सिकन - इंटरनैट पर हिंदी इंग्लिश महाथिसारस

सी-18 चंद्र नगर, गाज़ियाबाद 201 011

 

E-mail:

samantarkosh@gmail.com

Website:

http://arvindlexicon.com

कुछ लोग घेले भर का काम करते हैं और टनों हल्‍ला मचाते हैं. कुछ हैं जो शांति से चुपचाप अपना काम पूरी शिद्दत से, पूरे मनोयोग से, पूरे समर्पण से करते रहते हैं. ऐसे लोगों को न तो प्रसिद्धि की चाह होती है न लाइमलाइट की. हिंदी कंप्‍यूटिंग व इंटरनेटी हिंदी के लिए समर्पित भाव से काम कर रहे ऐसे ही हिंदी के कुछ मनीषियों से आपका परिचय करवाते हैं.

कंप्‍यूटिंग के लिहाज से हिंदी को बेहद जटिल भाषा माना जाता रहा है. क्‍योंकि इसके वर्ण आपस में असीमित संभावनाओं के साथ युग्‍म बना सकने की क्षमता रखते हैं जिन्‍हें समझ कर सही तरीके से प्रदर्शित कर पाना बड़े बड़े कंप्‍यूटर और सॉफ़टवेयर के बूते का भी नहीं हो पाया है आजतक. पेजमेकर और फोटो शॉप के नवीनतम संस्‍करणों में भी यूनिकोड हिंदी सही तरीके से आज भी नहीं दिखती. परंतु कंप्‍यूटरों में हिंदी को स्‍थापित करने के प्रयास कंप्‍यूटिंग इतिहास के जमाने से ही हो रहे हैं. आज हिंदी में विंडोज और लिनक्‍स आपरेटिंग सिस्‍टम उपलब्‍ध हैं. आपरेटिंग सिस्‍टम को हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में लाने का एक प्रयास सीडैक द्वारा इंडिक्‍स नाम की परियोजना से किया गया था, परंतु वह असफल रहा था. इसी दौरान एक शख्‍स के दिमाग में आया कि क्‍यों न भारतीय भाषाओं में लिनक्‍स आपरेटिंग सिस्‍टम को लाया जाए. और उन्‍होंने अपनी कंपनी में एक अलग डेडिकेटेड सेल स्‍थापित किया और इंडलिनक्‍स नाम की परियोजना को पोषित किया. वह शख्‍स हैं - प्रकाश आडवाणी.

 

प्रकाश आडवाणी

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प्रकाश आडवाणी ने 1999 के आसपास फ्री-ओएस.कॉम नामक लिनक्‍स सेवा प्रदाता कंपनी की स्‍थापना की. इन्‍होंने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर इंडलिनक्‍स नामक ईग्रुप की स्‍थापना की, जिसका उद्देश्‍य था भारतीय भाषाओं में कंप्‍यूटिंग सुविधा प्रदान करना. इंडलिनक्‍स नामक यह ईग्रुप बाद में इंडलिनक्‍स परियोजना बन गया और इसमें लिनक्‍स आपरेटिंग सिस्‍टम को भारतीय भाषाओं में लाने के प्रयोग प्रारंभ कर दिए गए. इसके लिए आरंभिक आधार भाषा हिंदी चुनी गई. प्रकाश आडवाणी ने इंडलिनक्‍स को अपनी कंपनी फ्री-ओएस.कॉम के जरिए पोषित करना जारी रखा. और जब प्रकाश आडवाणी बाद में अपनी कंपनी बंद कर नेटकोर सॉल्‍यूशन में अपनी सेवा देने चले गए तो इंडलिनक्‍स परियोजना को भी वहाँ ले गए और लंबे समय तक आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करते रहे.

तकनीकी दक्ष प्रकाश आडवाणी ने जल्‍द ही महसूस किया कि इंडलिनक्‍स परियोजना के लिए किसी सॉफ़टवेयर इंजीनियर की पूर्णकालिक सेवा लेना आवश्‍यक है तो उन्‍होंने जी. करूणाकर को इस काम के लिए रखा. करूणाकर की दक्षता से जल्‍द ही परिणाम आने लगे और वर्ष 2000 में लिनक्‍स तंत्र में पहला स्‍थानीयकृत प्रोग्राम सुषा फ़ॉन्‍ट की सहायता से तैयार कर लिया गया. उसी वर्ष विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी का यूनिकोड फ़ॉन्‍ट बना लिया गया, लिनक्‍स तंत्र में यूनिकोड समर्थन आ गया और यूनिकोड हिंदी प्रदर्शन हेतु भी तकनीक धीरे धीरे परिपूर्ण होने लगी. इसका प्रतिफल ये रहा कि वर्ष 2002 के आते आते लिनक्‍स बैंगलोर में हिंदी लिनक्‍स को जनता के समक्ष प्रदर्शित भी कर दिया गया.

प्रकाश आडवाणी तकनीकी लेखक भी हैं और अपने ब्‍लॉग http://cityblogger.com/  पर कंप्‍यूटिंग की नई तकनीकों के बारे में नित्‍य लिखते हैं.

 

जी. करूणाकर

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बेहद मितभाषी और शांत स्‍वभाव के जी. करुणाकर ने इंडलिनक्‍स परियोजना में अपनी सेवाएं जून 2000 से देना शुरु किया. प्रारंभ में हिंदी कंप्‍यूटिंग या भाषाई कंप्‍यूटिंग की तकनीकों पर न कोई दस्‍तावेज उपलब्‍ध थे और न ही कोई गाइडलाइन. तकनीक भी धीरे धीरे उपलब्‍ध हो रही थी. जी. करूणाकर ने ईंट-पर-ईंट रख कर इन बिखरी हुई चीजों को जोड़ा और दर्जनों फ़ोरमों में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए न सिर्फ अपने लिए भाषाई कंप्‍यूटिंग का ज्ञान अर्जित किया, बल्‍कि दूसरों को भी शिक्षित किया. तेलुगु भाषी जी. करुणाकर लिनक्‍स के हिंदी स्‍थानीयकरण के आरंभिक हिंदी अनुवादक भी रहे और दो वर्ष के अल्‍प समय में ही जी. करूणाकर ने अथक प्रयास कर विश्‍व का पहला, भारतीय बहुभाषी लाइव लिनक्‍स सीडी मिलन व लिनक्‍स रंगोली के संस्‍करण जारी किए जो बेहद सफल रहे थे.

जी. करुणाकर ने अपने भाषाई कंप्‍यूटिंग संबंधी तकनीकी ज्ञान को समुद्र पारीय देशों में भी पहुँचाया है. मध्‍यपूर्व के देश और नेपाल और भूटान जाकर वहाँ के भाषाओं में भाषाई कंप्‍यूटिंग की नींव रखने में मदद की है. इंडलिनक्‍स के कोआर्डिनेटर के रूप में इन्‍होंने ग्‍नोम और केडीई के न सिर्फ हिंदी भाषा में स्‍थानीयकरण को कोआर्डिनेट किया बल्‍कि अन्‍य भारतीय भाषाओं के लिए भी तकनीकी सहायता मुहैया करवाई. खगोलशास्‍त्र के भी शौकीन जी. करूणाकर पिछले सूर्य ग्रहण के समय अपनी बड़ी सी दूरबीन लेकर सूर्य ग्रहण का पीछा करने निकल पड़े थे. अभी वर्तमान में इंटरनेट व कंप्‍यूटरों की सुरक्षा प्रदान करने हेतु एंटीवायरस बनाने वाली कंपनी सायमन्‍टेक में भाषाई इंजीनियर के रूप में कार्य कर रहे हैं.

 

देबाशीष चक्रवर्ती

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देबाशीष चक्रवर्ती इलेक्‍ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्‍नातक हैं और अपनी सेवाएं आरंभ में इन्‍होंने इलेक्‍ट्रिकल इंजीनियरिंग इंडस्‍ट्री में देना प्रारंभ किया. परंतु कुछ तो किशोर-वय के शौक और कुछ नया और विशिष्‍ट करने के शौक के तहत इन्‍होंने वेब दुनिया को अपनी सेवाएं देनी प्रारंभ की तो हिंदी कंप्‍यूटिंग व इंटरनेटी हिंदी व भाषाई कंप्‍यूटिंग टेक्‍नोलॉजी से परिचय हुआ. वर्तमान में वरिष्‍ठ सॉफ़टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती को भारत के वरिष्‍ठ चिट्ठाकारों में गिना जाता है. वे कई चिट्ठे (ब्‍लॉग) लिखते हैं जिनमें भारतीय भाषाओं में कम्‍प्‍यूटिंग से लेकर जावा प्रोग्रामिंग तक के विषयों पर सामग्रियाँ होती हैं. उन्‍होंने विश्‍व का पहला हिंदी ब्‍लॉग एग्रीगेटर - चिट्ठा-विश्‍व बनाया. बाद में उन्‍होंने इंडीब्‍लॉगीज़ नाम का एक पोर्टल संस्‍थापित जिसने 2003 से 2008 तक भारतीय चिट्ठाजगत के सभी भारतीय भाषाओं के सर्वोत्‍कृष्‍ट चिट्ठों को प्रशंसित और पुर‍स्‍कृत कर विश्‍व के सम्‍मुख लाने का कार्य किया.

देबाशीष.डीमॉज संपादक.रहे हैं, तथा भारतीय भाषाओं में चिट्ठों के बारे में जानकारियाँ देने वाला पोर्टल चिट्ठाविश्‍व, अक्षरग्राम, निरंतर व सामयिकी नामक हिंदी ब्‍लॉग जीन और हिंदी पॉडकास्‍ट पॉडभारती जैसे प्रकल्‍पों को भी प्रारंभ किया या उनसे जुड़े. आपने बहुत सारे सॉफ़टवेयर जैसे कि वर्डप्रेस, इंडिकजूमला, आई-जूमला,पेबल, स्‍कटल इत्‍यादि के स्‍थानीयकरण (सॉफ़टवेयर इंटरफ़ेसों का हिन्‍दी में अनुवाद) का कार्य भी किया है. आपने हिंदी इंटरनेट जगत में बहुत से नए विचारों को जन्‍म दिया जैसे कि बुनो-कहानी नाम का समूह चिट्ठा, जिसमें बहुत से चिट्ठाकार मिल जुल कर एक ही कहानी को अपने अंदाज से आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं तथा अनुगूंज जिसमें एक ही विषय पर तमाम चिट्ठाकार अपने विचारों को अपने अंदाज में लिखते हैं इत्‍यादि. उन्‍होंने हिन्‍दी विकिपीडिया, सर्वज्ञ तथा शून्‍य.कॉम पर भी हिन्‍दी संदर्भित विषयों पर अच्‍छा खासा लिखा. देबाशीष चक्रवर्ती हालांकि आजकल हिंदी कंप्‍यूटिंग व हिंदी इंटरनेट पर उतने सक्रिय नहीं हैं, मगर इनके आरंभिक योगदान को नकारा नहीं जा सकता.

 

आलोक कुमार

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आदि चिट्ठाकार के नाम से मशहूर आलोक कुमार को हिंदी के पहले ब्‍लॉगर होने का श्रेय जाता है. वैसे तो विनय जैन ने अपने मूल अंग्रेजी भाषी चिट्ठे हिंदी में जांच परख हेतु हिंदी में सर्वप्रथम ब्‍लॉग पोस्‍ट लिख लिया था, मगर हिंदी का परिपूर्ण, पहला ब्‍लॉग आलोक कुमार ने नौ-दो-ग्‍यारह नाम से बनाया. आलोक ने जब देखा कि कंप्‍यूटरों में यूनिकोड हिंदी में काम करने में लोगों को बड़ी समस्‍या आती है तो उन्‍होंने देवनागरी.नेट नाम का एक हिंदी-संसाधन साइट बनाया जिसमें हिंदी कंप्‍यूटिंग से संबंधी तमाम समस्‍याओं को दूर करने के उपाय व अन्‍य संसाधन उसमें मुहैया करवाए. सैकड़ों हजारों लोगों ने इस साइट का प्रयोग हिंदी कंप्‍यूटिंग व इंटरनेटी हिंदी सेटअप करने में प्रयोग किया और अभी भी करते हैं. देवनागरी.नेट नाम की साइट अगर नहीं होती तो हिंदी कंप्‍यूटिंग के लिए लोग बाग़ और भटकते तथा लोगों के लिए हिंदी कंप्‍यूटिंग की राह उतनी आसान नहीं होती. आलोक कुमार ने हिंदी ब्‍लॉग के बहुभाषी, लोकप्रिय एग्रीगेटर चिट्ठाजगत को बनाने व मेंटेन करने में भी अपनी सेवाएं दी तथा गिरगिट नामक लिपि-परिवर्तक को आनलाइन प्रस्‍तुत करने में भी योगदान दिया. आपने लिनक्‍स के अंग्रेजी गाइड को हिंदी में अनुवाद कर प्रस्‍तुत करने का आरंभिक काम भी किया.

 

अनुनाद सिंह

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हिंदी के प्रति जी जान से समर्पित अनुनाद सिंह बिना किसी शोर के, बिना किसी लाइम लाइट में आए, अपना काम करते रहते हैं. उनके द्वारा किए गए योगदानों को अगर यहाँ सूचीबद्ध किया जाए तो इस पत्रिका के पूरे पन्ने भी कम पड़ें और एक अतिरिक्त विशेषांक निकालना पड़े. यही नहीं, नाम व यश से निस्‍पृह अनुनाद सिंह ने अपना प्रोफ़ाइल इंटरनेट पर कहीं भी सार्वजनिक नहीं किया है. अनुनाद सिंह हिंदी कंप्‍यूटिंग व हिंदी इंटरनेट टेक्‍नोलॉजी की ओर अपनी व्‍यक्तिगत रुचि से जुड़े और सैकड़ों लोगों की हिंदी तकनीकी संबंधी समस्‍याओं को स्‍वयं सीख कर फिर दूसरों को समझाने व सुलझाने का प्रयास किया. तकनीकी हिंदी समूह के मॉडरेटर के रूप में हिंदी कंप्‍यूटिंग संबंधी हजारों प्रश्‍नों के त्‍वरित उत्तर प्रदान किए तथा श्री नारायण प्रसाद के साथ मिलकर सैकड़ों फ़ॉन्‍टों हेतु ब्राउजर आधारित फॉन्‍ट कन्‍वर्टरों को निःशुल्‍क प्रयोग के लिए जारी किया. इस पत्रिका समेत तमाम दुनियाभर में त्‍वरित फ़ॉन्‍ट कन्‍वर्टरों के लिए इसी समूह के फ़ॉन्‍ट कन्‍वर्टरों का ही प्रयोग करते हैं. आपने यूनिकोड हिंदी से ब्रेल लिपि परिवर्तक भी तैयार किया जिससे हिंदी के किसी भी पन्ने का ब्रेल लिपि प्रिंटर पर प्रिंटआउट लिया जा सकता है.

हिंदी विकिपीडिया में एक लाख से अधिक पन्ने जोड़ने का काम अनुनाद सिंह के अथक प्रयत्‍नों के जरिए ही संभव हुआ. मोजिल्‍ला फायरफाक्‍स के हिंदी के लिए कई एक्‍सटेंशन आपने बनाए तथा अभी हाल ही में आपने हिंदी के सिंपल डिक्‍शनरी एप्‍लीकेशन हेतु शब्‍दकोश मुहैया कराने में बड़ी भूमिका निभाई है.

वैसे तो और भी महारथी हुए हैं हिंदी कंप्‍यूटिंग और इंटरनेटी हिंदी के क्षेत्र में, मगर सभी के बारे में चर्चा कर सकना यहाँ संभव नहीं है, अतः उनके बारे में भविष्‍य में फिर कभी बातें होंगी.

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हिंदी सप्ताह में आपके लिए एक धमाकेदार खबर लेकर आने वाले हैं. तो देखते रहिए इन पृष्ठों को.

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रोवेन एटकिंसन उर्फ फनी ‘मि. बीन’ ने जब मुझे समस्त हर्जे-खर्चे समेत मेलबोर्न यात्रा के दस्तावेज़ – टिकट, वीज़ा इत्यादि और साथ में सोने में सुहागा के तौर पर खर्चने के लिए हजार ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अतिरिक्त सौंपे तो लगा कि जैसे मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा होने जा रहा है.

और हो क्यों न. यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं तो दूरस्थ देश प्रदेश की यात्रा में आपको आनंद आएगा ही. और आप ऐसे मौकों की तलाश में हमेशा रहेंगे ही. शायद ही ऐसा कोई मनुष्य हो जिसे यात्रा में आनंद नहीं आता हो. जहाँ आप रहते हैं वहाँ अपने गांव शहर के उन्हीं इमारतों, उन्हीं सड़कों, उन्हीं लोगों और उन्हीं कारों को देख देख कर कुछ दिनों में बोर हो जाते हैं. ऐसे में छठे चौमासे यदि कहीं आसपास की भी यात्रा कर ली जाए तो मामला रीफ्रेश रहता है और जिंदगानी में रूचि बरकरार रहती है. और फिर, यहाँ तो ऑस्ट्रेलिया, मेलबोर्न की बात हो रही है. दूर, सात समंदर पार. एक ऐसा देश जो मुझे बचपन से लुभाता आ रहा था. ऐसा एकमात्र देश जहाँ कंगारू बसते हैं – जो अपने बच्चों को अपने शरीर के थैले में ही भीतर सुरक्षित छुपा कर रखते हैं – पारिवारिक प्रेम प्यार और केअरिंग का एक अप्रतिम उदाहरण!

आईजीआई इंटरनेशनल टर्मिनल 3 से जब मेरी एयरबस ने उड़ान भरी तो आसमान काली घटाओं से आच्छादित था और बारिश हो रही थी. मेरा मन भी उत्साह से भीगा हुआ था. विंडो सीट से देख रहा था कि विमान ने जब टेकऑफ किया तो आसमान में कहीं दूर बिजली चमकी. मेरे मन के भीतर भी अब तक अपरिचित अनजाने देश और खासकर मेलबोर्न को देखने समझने की उत्कंठाओं की बिजलियाँ चमक रही थीं.

सत्रह घंटों की उड़ान के बाद जब मैं मेलबोर्न हवाई अड्डे पर उतरा, तो थोड़ी सी अकड़ी कमर और जरा से सूजे पैरों के बावजूद स्फूर्ति और जोश से लबालब था. जब आप कोई काम उत्साह से, मन से करते हैं तो कहीं कोई थकान महसूस नहीं होती, दुःख दर्द का पता नहीं चलता. इस यात्रा के लिए मेरे मन में शुरू से ही उत्साह था तो इतनी लंबी यात्रा में ऊब का सवाल ही नहीं था. जल्द ही इमिग्रेशन की कार्यवाही पूरी हो गई और ऑफ़ीसर ने कागज़ातों पर अपनी मुहर लगाते हुए मुस्कुरा कर कहा – “वेलकम टू मेलबोर्न! ‘It's your time to visit Melbourne NOW!’

होटल पहुँच कर मैंने सामानों को एक ओर फेंका और फ्रेश होने के लिए बाथरूम की ओर दौड़ लगाई. जल्द से जल्द तैयार होकर मेलबोर्न का नया टूरिस्ट एट्रैक्शन यूरेका स्काईडैक 88 देखने जो जाना था. बाथरूम विशाल और लाजवाब था. यदि साइट सीइंग देखने की जल्दी न होती तो शर्तिया मैं उस आलीशान विशाल बाथरूम के उतने ही विशाल बाथटब में घंटों घुसा रहता. बहरहाल जल्द ही तैयार होकर मैं बाहर आ गया. यूरेका स्काईडैक 88 ले जाने के लिए एक लिमोजीन टैक्सी पहले से ही तैयार खड़ी थी.

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(यूरेका स्काईडैक 88)

ड्राइवर बातूनी था. सड़क पर आते ही उसने दूर एक बेहद ऊंची बिल्डिंग की ओर इशारा कर बताया कि ये है यूरेका स्काईडैक. वो यूरेका स्काईडैक के अपने स्वयं के यात्रा अनुभवों को सविस्तार रस लेकर बता रहा था. परंतु मेरे कान उधर थे नहीं. मैं बस हाँ हूँ करता रहा और उस ऊंची बिल्डिंग को चमत्कृत होकर देखता रहा.

यूरेका स्काईडैक की हाई स्पीड लिफ़्ट जब ऊपर जाने को चालू हुई तो दिल एक बार धक से रह गया. और ये तो होना ही था क्योंकि महज चालीस सेकंड के भीतर हम मेलबोर्न की सबसे ऊंची बिल्डिंग के सबसे ऊंचे माले पर थे. और उतनी ही आश्चर्यजनक बात ये थी कि पूरा का पूरा कांच का लिफ़्ट का कूपा बाहर निकल कर एक किनारे आ लगा और हमें पूरे आधे घंटे का समय मिला मेलबोर्न को उतनी ऊँचाई से चारों तरफ से जीभर निहारने का.

यूरेका स्काईडैक के थीम्ड शॉपिंग मॉल और विशिष्ट आईमैक्स 3डी थियेटर में फ़िल्म देखते देखते समय कब खत्म हो गया पता ही नहीं चला. वहीं लाजवाब डिनर लेकर वापस जब होटल पर आए और वहाँ के वाटरबैड पर लुढ़के तो क्षण भर में ही नींद कब लगी पता ही नहीं चला.

सपने में हैप्पीफ़ीट नजर आ रहा था अपने लाजवाब डांस सीक्वेंस के साथ. कल फ़िलिप आईलैंड नेशनल पार्क जाना था. हैप्पीफ़ीट से मिलने.

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(पेंगुइन परेड)

कोई दो घंटे में ही हम फ़िलिप आईलैंड नेशनल पार्क पहुँच गए थे. वहाँ देखने को बहुत कुछ था. शायद हफ़्तों भी कम पड़ जाएं. परंतु मैं सीधा पेंगुइन परेड की ओर चला गया और पेंगुइन स्काईबॉक्स में घुस गया. पेंगुइनों को करीब से देखने. जिजीविषा की चलती फिरती मिसालें इन मासूम से पेंगुइनो से कौन नहीं मिलना चाहेगा. सैकड़ों की तादाद में पेंगुइन अपनी मटकती चाल में दिखे. मेरी निगाहें हैप्पीफ़ीट को ढूंढ रही थीं. आखिर में वो दिखा. अपनी ही मस्ती में चलता हुआ. और उसकी चाल लाजवाब थी. नृत्य की एक अलग ही शैली जिसे देख कर प्रसन्नता और आह्लाद से आपके रौंगटे खड़े हो जाएं.

सोना किसे पसंद नहीं है. चाहे सोफे में धंस कर सोना हो या बिस्कुट-गहनों वाला सोना. मुझे भी सोना पसंद है. परंतु अपने टर्मिनल के सामने कुर्सी पर टेक लगा कर. बहरहाल, यहाँ मैं उस सोने की बात कर रहा हूँ जो प्रागैतिहासिक काल से इंसानों को अपने हर रूप में लुभाता रहा है. जी हाँ, आज हम मेलबोर्न के विश्वप्रसिद्ध सोने की खानों – सेंट्रल डेबोरा गोल्डमाइन देखने जाने वाले हैं जहाँ हम जमीन के नीचे सुरंग में जाकर उस अनछुए सोने को छूकर देखेंगे जिसके लिए दुनिया हजारों वर्षों से पागल है.

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(सेंट्रल डेबोरा गोल्डमाइन)

यात्रा के दिन तेजी से बीतते जा रहे थे. अब तो वापस लौटने का दिन भी आ गया था. इस बीच मेलबोर्न में और भी बहुत कुछ देख डाला. खाने-पीने और सोने के आठ घंटे छोड़ दें तो बाकी समय या तो साइट सीईंग में व्यतीत हुआ या आसपास की यात्राओं में. परंतु यदि आप भारतीय हैं तो मेलबोर्न की आपकी यात्रा अधूरी ही रहेगी यदि आप एक खास स्थान को न देखें. मैंने अपनी मेलबोर्न यात्रा इस खास अजूबे को देख कर पूरी की.

और वो खास स्थान है – मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड

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भारतीय जनता क्रिकेट के पीछे पागल है. भले ही यह पागलपन सिर्फ टीवी स्क्रीन के सामने और आलू-चिप्स चबाते रन और विकेट पर अपनी टिप्पणियों तक ही सीमित है. वहीं दूसरी ओर आस्ट्रेलियाई क्रिकेट प्रेमियों का पागलपन मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड से झलकता है. जिस वक्त मैं यहाँ गया, वहाँ कोई मैच तो नहीं हो रहा था, मगर मैं कल्पना कर सकता था कि जब यहाँ मैच चलता होगा तो ये विशाल, शानदार, सुविधाओं से लबरेज क्रिकेट स्टेडियम किस तरह से जीवंत हो जाता होगा. यदि इस जीवन में कभी इस ग्राउंड पर भारत-पाकिस्तान का विश्वकप का फ़ाइनल मैच देखने को मिल जाए, तो लगेगा कि जीवन का एक और बड़ा सपना पूरा हो गया. आप कहेंगे कि कितने सपने देखते हो. पर यदि सपने न देखें तो पूरे होने के चांसेज भी तो न होंगे!

टीप – यह काल्पनिक यात्रा संस्मरण भविष्य का, अभी से छः माह बाद का है. इसे खासतौर पर इंडीब्लॉगर.इन के इट्स योर टाइम टू विजिट मेलबोर्न नाऊ के लिए लिखा गया है. मेलबोर्न के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें - http://www.visitmelbourne.com/in

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