March 2012

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आखिर क्यों?

विवरण यहाँ देखें -

सावधान! ऊर्जा बचत के लिए ‘अर्थ आवर’ बन सकता है ‘डिज़ॉस्टर आवर’

(चित्र - साभार : जागरण)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

467

दर्द -हाँ, पीड़ा - वैकल्पिक

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी तरह की चोट या क्षति, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, दर्द का कारण बनती है। दर्द होना तय है परंतु उसकी पीड़ा वैकल्पिक है - चाहे महसूस करो या नहीं।

एक सर्जन का साक्षात्कार आ रहा था जिसने एक संत के नितंब का ऑपरेशन किया था। सर्जन ने बताया कि सर्जरी के बाद जब संत ने दर्द की कोई शिकायत नहीं की तो उन्हें यह कहना पड़ा - "स्वामी जी, यदि आप अपने दर्द के बारे में नहीं बतायेंगे तो मुझे कैसे पता चलेगा कि घाव ठीक हो रहा है या नहीं? आपके कथन से तो मुझे कुछ स्पष्ट ही नहीं हो रहा है।"

संत ने उत्तर दिया - "इसमें कोई संदेह नहीं कि शरीर को दर्द महसूस हो रहा है परंतु मुझे इसकी पीड़ा नहीं है।"

 

468

गंगा में स्नान करने से सभी पाप धुल जायेंगे?

एक व्यक्ति ने स्वामी रामकृष्ण से कहा - "मैं गंगा में स्नान करने जा रहा हूं। क्या आप मानते हैं कि पवित्र गंगा में स्नान करने से सभी पाप धुल जायेंगे?"

स्वामी रामकृष्ण बहुत साधारण व्यक्ति थे। वे बोले - "निश्चित रूप से गंगा में स्नान करने से आपके सभी पाप धुल जायेंगे। जब आप पवित्र गंगा में डुबकी लेंगे तो सभी पाप आपसे अलग होकर गंगा के तट पर लगे पेड़ के ऊपर बैठ जायेंगे। लेकिन स्नान के बाद जैसे ही आप गंगा से बाहर आयेंगे, सभी पाप पेड़ पर से वापस आपके ऊपर छलांग लगा देंगे। पवित्र गंगा के कारण ही वे आपसे दूर गए थे न कि आपके कारण। यदि तुम गंगा से बाहर ही न आओ और हमेशा के लिए वहीं रह जाओ तभी तुम्हें पापों से मुक्ति मिल सकती है।"

उस व्यक्ति ने कहा - "लेकिन यह कैसे संभव है? मुझे कभी तो बाहर आना ही होगा।"

रामकृष्ण ने उत्तर दिया - "तब फिर गंगा में स्नान करने का कोई फायदा नहीं है।"

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आप गीत-संगीत के दीवाने हैं. ठीक है. परंतु क्या आप उच्च-गुणवत्ता के, हाई-डेफ़िनिशन संगीत के दीवाने हैं? यदि हाँ तो ये डाउनलोड आपके लिए ही है.

संगीत को लेकर गंभीर बहस छिड़ सकती है कि वो स्टीरियो मोड में परिपूर्ण है या फिर अब नए 5.1 या 7.1 फ़ॉर्मेट में ज्यादा बेहतर है. परंतु यदि आप बहस से ऊपर उठकर 5.1 या सराउंड मोड में कुछ बेहतर संगीत का आनंद लेना चाहते हैं तो आपके पास न्यूनतम 5.1 डॉल्बी सराउंड सिस्टम मैच करते स्पीकर सेट के साथ होना आवश्यक है. और यदि ये ब्रांड बोस/मरांज/डेनन/यामाहा हो तो क्या कहने. ओन्क्यो भी चलेगा.

वैसे, आजकल बहुत से पर्सनल कंप्यूटरों व लैपटॉप में 5.1 सराउंड सिस्टम की भी सुविधा होती है और आपके हाई-फ़ाई / होमथिएटर से जोड़ने के लिए ऑप्टिकल/डिजिटल कोएक्सिएल आउट पोर्ट भी उपलब्ध रहता है.  आपको अपने कंप्यूटर के एसपीडीएफ डिजिटल आउट को होमथिएटर से कोएक्सिएल केबल के जरिए जोड़ना होगा , और कंप्यूटर के साउंड सेटिंग में साउंड आउटपुट स्पीकर के बजाए डिजिटल एसपीडीएफ आउट पर सेट करना होगा.

ये डाउनलोड फ्लैक (FLAC) फ़ाइल फ़ॉर्मेट में हैं जो ध्वनि की पूरी गुणवत्ता को बनाए रखते हैं. इन फ्लैक फ़ाइलों के बारे में विवरण कुछ इस तरह से दर्ज है -

FLAC is a lossless encoding of WAV-files derived directly from our production original used for the SACD and Pure Audio Blu-ray. All resolutions and encodings are derived from the same original DXD source files.

 

फ्लैक फ़ाइल को बजाने का सपोर्ट आपके होम-थिएटर में हो सकता है कि न हो, परंतु कंप्यूटर में विनएम्प म्यूजिक प्लेयर में इन्हें बजाया जा सकता है.

तो देर किस बात की? डाउनलोड हेतु यहाँ   http://www.2l.no/hires/index.html   जाएँ.  और, यदि आप सादा स्टीरियो फ़ॉर्मेट में इन्हें सुनना चाहते हैं तो वे भी वहाँ उपलब्ध हैं.

 

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(चित्र - साभार गूगल)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

247

स्वर्ग से ऊपर

एक संत हर दूसरे चौथे दिन अपने मठ से कुछ घंटों के लिए बिना बताए कहीं चले जाते थे.

संत के भक्तों व शिष्यों ने सोचा कि गुरु अवश्य ही किसी स्वर्गिक गुप्त स्थल पर जाते हैं जहाँ शायद वे ईश्वर से गुप्त रूप से मिलते हों.

इस बात का पता लगाने के लिए उन्होंने एक भक्त को जासूसी करने भेजा.

अगली दफा जब गुरु चुप चाप बिना बताए कहीं निकले तो उन पर नजर रखने वाला भक्त भी चुपचाप पीछे हो लिया.

भक्त ने देखा कि संत एक गरीब, बेसहारा बूढ़ी औरत की कुटिया में गए, वहाँ साफ सफाई की, खाने पीने की चीजों का इंतजाम किया और उनकी सेवा करने लगे.

भक्त यह देख वापस आ गया.

साथियों ने पूछा कि कुछ पता चला कि संत कहाँ जाते हैं?

“संत तो स्वर्ग से भी ऊपर की जगह पर जाते हैं” जासूस का जवाब था.

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248

अभी भी जेल में

नाजी कंसनट्रेशन कैंप में रह चुका एक व्यक्ति अपने मित्र से मिलने पहुँचा. मित्र भी कैंप में साथ था और अत्याचारों का गवाह था.

बात बात में बात निकली तो मित्र ने पूछा –

“क्या तुम नाजी अत्याचारों को भूल गए हो? और क्या तुमने उन्हें माफ कर दिया”

“हाँ”

“मैं तो नहीं भूला, और उन्हें माफ करने का तो सवाल ही नहीं है”

“ऐसी स्थिति में तो नाजियों ने अब भी तुम्हें बंधक बनाया हुआ है और मानसिक अत्याचार दे रहे हैं!”

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249

सबकी मृत्यु निश्चित है

जेन गुरु इक्कयु बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे. उनके शिक्षक के पास एक बेशकीमती एंटीक चाय का कप था जिसे वे बड़े ध्यान और प्यार से रखते थे. इक्कयु एक दिन उस कप को उलट पुलट कर देख रहे थे. अचानक उनके हाथ से वह कप छूट कर जमीन पर जा गिरा और टूट गया.

इक्कयु को कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने कप के टुकड़ों को अपने जेब में रख लिया. उन्हें लगा कि उनके शिक्षक अब उनसे बेहद नाराज होंगे.

डरते डरते इक्कयु अपने शिक्षक के पास पहुँचे और उनसे प्रश्न किया – “लोग मरते क्यों हैं?”

“क्योंकि एक न एक दिन सबको मरना है. यह प्राकृतिक है. लोगों का क्या, ये चाँद, तारे, पृथ्वी सब के सब एक न एक दिन मृत्यु को प्राप्त होंगे.” शिक्षक ने बताया.

इक्कुयु अपनी जेब से कप के टुकड़े निकालते हुए बोला – “आज आपके कप को मृत्यु को प्राप्त होना था”

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250

ज्ञान की प्राप्ति के लिए कितना समय?

एक युवक भगवान महावीर के पास पहुँचा और पूछा –

“ज्ञान प्राप्ति के लिए कितना समय लगेगा”

“दस वर्ष” भगवान महावीर ने कहा.

“बाप रे! दस वर्ष!”

“नहीं, मैंने गलती से दस वर्ष कह दिया, दरअसल बीस वर्ष लगेंगे.”

“अरे, आपने तो दोगुना समय कर दिया!”

“नहीं, तुम्हारे लिए तो शायद तीस वर्ष भी कम पड़ेंगे.” भगवान महावीर बोले.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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कल सुबह सुबह मेरे मोबाइल पर एक फ़ोन कॉल आया.

वैसे तो मैं अपने मोबाइल फ़ोन के नंबर के प्रति बेहद सचेत रहता हूँ, और इस कोशिश में रहता हूँ कि ऐन-केन-प्रकारेण मेरा नंबर किसी को मिले नहीं. क्योंकि आज के जमाने में मोबाइल तो उस जिन्न की तरह है जो जब तब, बिना आगा पीछा सोचे प्रकट हो जाता है और बजने लगता है और कहता है - मेरे आका! बात करो. और कभी कभी तो 500 - 1000 की गेदरिंग में जहाँ पिनड्रॉप सन्नाटा होता है, किसी न किसी का मोबाइल बज ही जाता है. भले ही इसके लिए पहले से ताकीद की हुई हो कि भइए, मोबाइल बंद कर लो या साइलेंट में कर लो. पर शायद लोगों को या तो मोबाइल बंद करना नहीं आता या साइलेंट मोड में डालना नहीं आता.

बहरहाल, मैं बता रहा था कि मेरे मोबाइल पर एक कॉल आया था.

उस बंदे ने पहले पुष्टि की कि मेरा नाम रवि है. इसका अर्थ यह हुआ कि वह कोई रेंडम नंबर डायल नहीं कर रहा था. उसे किसी विश्वस्त सूत्र से यह नंबर मिला होगा.

मेरे हाँ कहने पर  अपना नाम बताया और बोला - "यदि आप आज शाम खुलने वाले सट्टे पर नंबर लगाकर रुपया कमाना चाहते हैं तो मैं वह श्योर शॉट नंबर आपको बता सकता हूँ."

मेरा माथा ठनका. यह तो पूरा का पूरा मोबाइल फ़िशिंग का मामला था.

मैंने जवाब दिया - "भाई साहब, आप खुद क्यों नहीं कमा लेते?"

"हम भी कमाते हैं, पर हम रोज सिर्फ पांच लोगों को यह नंबर बताते हैं. आज आप पांच भाग्यशाली लोगों में से एक हैं."

"तो जनाब पहले अपने खानदान को भाग्यशाली क्यों नहीं बनाते? अपने बीवी बच्चों को यह नंबर पहले बताओ, उनको जिताओ."

"अरे साहब आप समझ नहीं रहे हैं. ऐसी अपार्चुनिटी आपको कभी कहीं नहीं मिलेगी."

"बकवास बंद करो और आइंदा इस नंबर पर फ़ोन मत करना. और पहले खुद का और अपने खानदान का सट्टा निकलवा लो फिर दूसरों की चिंता करना."

यह कह कर मैंने फ़ोन काट दिया.

मुझे नहीं पता कि वो बंदा सही था या नहीं. अगर वो सही रहा होगा तो मेरा तो अच्छा खासा नुकसान हो गया. मैं अमीर बनते बनते रह गया. मगर यदि आपको सट्टे का  श्योरशॉट खुलने वाला नंबर चाहिए तो आप उस बंदे को फ़ोन लगा सकते हैं. उसका फ़ोन नंबर मेरे मोबाइल में सुरक्षित है.

 

आपको चाहिए वह नंबर?

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(चित्र - गूगल से साभार)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

243

गरीब स्त्री का दान

यीशु मसीह देवालय में बैठे थे. वहां दान पात्र में भक्तगण अपने सामर्थ्यानुसार सिक्के डाल रहे थे. अमीर अपने बटुए खोलते और खनखनाते सोने की अशर्फियों में से कुछ निकालते और गर्व से कुछ इस तरह पात्र में डालते कि लोगों को एकाध झलक तो मिल ही जाए.

इतने में एक गरीब स्त्री वहाँ आई. उसने अपनी मुट्ठी में तांबे का एक सिक्का दबा रखा था. वह बड़ी देर से हिम्मत जुटा रही थी कि अशर्फियों के दान के बीच वह अपना तांबे का सिक्का डाले तो कैसे.

अंततः उसने थोड़ी हिम्मत दिखाई और जब दानपात्र के पास कोई नहीं था तो उसने चुपके से वह पैसा दानपात्र में डाल दिया.

यीशु बड़ी और उनके अनुयायी दूर से उस स्त्री को देख रहे थे, जबकि उस स्त्री को इसका भान नहीं था. यीशु ने अपने अनुयायियों से कहा – ईश्वर इस स्त्री के एक सिक्के से ज्यादा प्रसन्न होगा बजाए उन धनिकों की अशर्फियों से.

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244

अच्छे शासन के मूलभूत तत्व

कन्फ़्यूशियस से उसके एक शिष्य ने एक बार पूछा – “अच्छे शासन के मूलभूत तत्व क्या हैं?”

कन्फ़्यूशियस ने उत्तर दिया – “भोजन, हथियार और जनता का विश्वास.”

“परंतु इनमें से यदि किसी एक चीज को आपको हटाने को कहा जाए तो आप किसे हटाएंगे?”

“हथियारों को”

“और बाकी दो में से भी किसी एक को हटाने कहा जाए तो?”

“भोजन”

“परंतु भोजन के बगैर तो जनता जिंदा कैसे रहेगी!”

“जनता अपने भोजन का जुगाड़ तो कर ही लेगी, परंतु सरकार यदि जनता का विश्वास खो देगी तो वह खुद समाप्त हो जाएगी.”

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245

तुर्की भाषा में पत्र

एक दिन नसरूद्दीन कहीं जा रहा था तो एक आदमी ने उसे रोका और एक पत्र थमाते हुए पूछा कि क्या वो यह पत्र पढ़ सकता है, क्योंकि यह पत्र तुर्की भाषा में है और वो तुर्की भाषा पढ़ नहीं सकता.

नसरूद्दीन ने वह पत्र उस आदमी के हाथ से लिया और पढ़ना चाहा. परंतु वह भी तुर्की नहीं पढ़ सकता था. अतः उसने उस आदमी से कहा – माफ करना भाई, मैं भी इसे नहीं पढ़ सकता. मुझे भी तुर्की नहीं आती.

उस आदमी को गुस्सा आ गया. उसने नसरूद्दीन से गुस्से से कहा – यदि तुम्हें तुर्की नहीं आती है तो तुमने ये तुर्की टोपी क्यों पहनी हुई है?

इस पर नसरूद्दीन ने मुस्कुराते हुए कहा – यदि तुर्की टोपी पहनने से तुर्की पढ़ी जा सकती हो तो यह टोपी तुम पहन लो!

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246

सफल जीवन के सूत्र

एक बार एक व्यवसायी ने एक प्रसिद्ध संत से पूछा कि सफल जीवन का सूत्र क्या है.

संत ने जवाब दिया – प्रतिदिन एक व्यक्ति को प्रसन्न करो.

फिर कुछ देर ठहर कर संत ने आगे जोड़ा – यदि वह व्यक्ति आप स्वयं हो तब भी.

और फिर एक पल बाद आगे कहा – यदि वह व्यक्ति आप हैं तब तो विशेष रूप से.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

238

कीमती रत्नों से भी कीमती

भारत के अंतिम वायसराय अर्ल माउन्टबेटन के भतीजे राजकुमार फिलिप का विवाह राजकुमारी एलिजाबेथ से तय हो गया तो यह समाचार सुनकर महात्मा गांधी ने वायसराय को बधाई देते हुए कहा – बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आपका भतीजा भविष्य की रानी से शादी कर रहा है. इस शुभ अवसर पर मैं उन्हें कोई उपहार देना चाहता हूँ. सोच रहा हूँ कि क्या दूं. मेरे पास तो कोई मूल्यवान वस्तु नहीं है.

इस पर वायसराय ने कहा – “आपके पास चरखा है. आप इनके लिए कुछ बुन सकते हैं.”

और गांधी जी ने एक बढ़िया टेबल-क्लॉथ बुनकर तैयार किया. जिसे माउन्टबेटन ने राजकुमारी एलिजाबेथ को इस टिप्पणी के साथ भिजवाया – “इस उपहार को कीमती रत्नों के साथ तालबंद कर रखना... यह भी उतना ही कीमती है. इसे उस व्यक्ति ने खुद अपने हाथों से बुनकर तैयार किया है जो भारत के अहिंसात्मक स्वतंत्रता आंदोलन के अगुआ हैं...”

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239

नम्रता

बुद्ध ने सत्य की तलाश में लगे एक व्यक्ति से कहा – “यदि तुम सचमुच सत्य की तलाश में लगे हो तो एक चीज का पता तुम्हें होना चाहिए जो सर्वोपरि है...”

“हाँ, मुझे पता है – उसे प्राप्त करने की अजीम लालसा..” उस व्यक्ति ने टोका.

“नहीं.” बुद्ध ने आगे जवाब दिया – “अपनी गलती को स्वीकारने की क्षमता.”

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240

मेरा काम सिर्फ आदेश फरमाना है

आँधी तूफान से रास्ते में एक पेड़ गिर गया और रास्ता जाम हो गया. उसी समय सैनिकों की एक जीप उधर से गुजरी तो सैनिक उतर कर पेड़ को हटाने का नाकाम प्रयास करने लगे. जीप में कारपोरल भी बैठा था, परंतु वह जीप से नहीं उतरा.

इतने में एक घुड़सवार उधर से गुजरा. उसने देखा कि कुछ सैनिक तो पेड़ हटाने की कोशिश कर रहे हैं, मगर एक सैनिक जीप में ही बैठा है. घुड़सवार जीप के पास गया और बोला – “क्या आपकी तबीयत खराब है?”

“नहीं” कारपोरल ने जवाब दिया.

“तो फिर आप सैनिकों की सहायता उस पेड़ को हटाने के लिए क्यों नहीं करते?”

“मैं कॉरपोरल हूँ. मेरा काम सैनिकों को आर्डर देना है.” कॉरपोरल ने जवाब दिया.

घुड़सवार घोड़े से उतरा, सैनिकों के पास गया और पेड़ हटाने में मदद देने लगा. थोड़ी ही देर में घुड़सवार की मदद से सैनिकों ने उस पेड़ को किनारे कर दिया.

घुड़सवार अब वापस कॉरपोरल के पास आया और बोला – “अगली दफा जब कहीं रास्ते में ऐसा पेड़ गिर जाए तो मदद के लिए कमांडर-इन-चीफ़ को याद कर लेना.”

बाद में उस कॉरपोरल को पता चला कि वह घुड़सवार और कोई नहीं, जॉर्ज वाशिंगटन थे!

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241

पवित्रता पल-पल मौजूद है.

बुद्ध से किसी ने पूछा “मनुष्य पवित्र कैसे बनता है?”

“दिन भर में चौबीस घंटे होते हैं. और इन घंटों में सैकड़ों हजारों पल. कोई भी जो इन प्रत्येक पलों में पूरी तरह मौजूद रहता है, वही पवित्र है.”

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242

गलत सूक्ति

अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर को हाईवे पुलिस ने तेज गति से गाड़ी चलाते हुए पकड़ लिया.

पुलिस ने जब प्रोफ़ेसर से पूछा कि किस बात की जल्दी थी तो प्रोफ़ेसर ने रॉबर्ट फ्रास्ट की कविता सुनाई – “मुझे अपना वादा पूरा करना है. और सोने से पहले सैकड़ों मील जाना है. मुझे सैकड़ों मील जाना है.”

पुलिस भी साहित्यप्रेमी प्रतीत होता था. उसने दहला मारा – “मगर महोदय, रॉबर्ट फ्रास्ट का रास्ता यह नहीं था. वे हाईवे के बजाए क्रास कंट्री ट्रैवल करते थे जहाँ जरा भी ट्रैफ़िक नहीं होता.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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सरकारी स्कूल के बच्चों के नक्सली बनने के सैकड़ों कारणों में से यह है एक कारण. एक दो कारण तो आपको भी पता होंगे. नहीं?

 

(समाचार कतरन - साभार दैनिक भास्कर)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

465

ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं

एक सज्जन और सम्मानित वृद्ध ने एक दिन यह निश्चय किया कि वह अपने घर के नजदीक स्थित चर्च की सदस्यता ग्रहण करेगा। उसने उस पुराने तौरतरीकों वाले चर्च के पादरी को बुलाया एवं अपनी इच्छा व्यक्त की।

पादरी ने अलगाव दिखाते हुए कहा - "मेरे प्रिय सज्जन, मुझे नहीं लगता कि आप चर्च की सदस्यता ग्रहण करके खुश होंगे, यद्यपि मैं आपके नेक इरादों की सराहना करता हूं। बल्कि आपको चर्च में मेरे लोगों के बीच आकर अच्छा नहीं लगेगा। मुझे भय है कि वहां आकर आपको शर्मिंदगी महसूस होगी और शायद वे लोग भी असहज हो जायेंगे। मैं आपको यह सलाह दूंगा कि आप अपने फैसले पर पुनर्विचार करें। ईश्वर आपको सही राह दिखाये।"

एक सप्ताह बाद उस वृद्ध सज्जन की पादरी से राह चलते फिर मुलाकात हो गयी। उन्होंने पादरी को रोकते हुए कहा - "आदरणीय महोदय, मैंने आपकी सलाह मानते हुए अपने फैसले पर विचार किया। अंततः ईश्वर ने मुझे एक संदेश भेजा। ईश्वर ने मुझसे कहा कि मैं चर्च की सदस्यता ग्रहण करने के चक्कर में न पड़ूं। फिर वे बोले कि वे स्वयं भी कई वर्ष से चर्च में जाने का प्रयास कर रहे हैं परंतु अब तक सफल नहीं हो पाये।

466

पापी

दस चीनी किसान खेत में काम कर रहे थे कि अचानक आकाश काले बादलों से घिर गया। जोर - जोर से बिजली कड़कने लगी और जोरदार बारिश होने लग गयी। अपनी लंबी टोपियों को थामे हुये सभी किसानों ने पास ही स्थित एक पुराने मंदिर के खंडहर में शरण ली।

बार - बार बिजली गरज रही थी और भीषण गर्जना से हर बार उस पुराने खंडहर की दीवारें हिल जातीं जिसमें किसानों ने शरण ली थी।

भय से कांपते हुए एक किसान बोला - "शायद ईश्वर हमसे नाराज़ है।"

दूसरे ने पूछा - "क्यों?"

भय से कांपते हुए तीसरे किसान ने कहा - "जरूर हमारे बीच कोई घोर पापी है। हमें जल्दी से उस पापी को ढ़ूंढ़कर बाहर कर देना चाहिए अन्यथा हम सभी मारे जायेंगे।"

चौथा किसान बोला - "मेरे पास एक योजना है। चलो हम सभी लोग अपनी टोपी खिड़की से बाहर लहराये। ईश्वर ही पापी का चयन कर लेगा।"

अतः उन सभी ने अपनी टोपियाँ खिड़की से बाहर लहरा दीं। तत्काल बिजली कड़की और एक टोपी राख में बदल गयी। वह टोपी एक अधबूढ़े किसान की थी जिसने अब तक एक भी शब्द नहीं बोला था। वह अपने साथियों से रहम की भीख मांगने लगा।

वह विनती करते हुए बोला - "मेरे घर में एक पत्नी, तीन बच्चे और बूढ़े माता-पिता हैं। यदि मैं नहीं रहूंगा तो उनका क्या होगा?"

लेकिन किसी ने भी उसके ऊपर दया नहीं की और उसे धक्के मारते हुए मंदिर से बाहर निकाल दिया। लड़खड़ाते हुए उस किसान ने भागकर पास ही के एक पेड़ के नीचे शरण ली।

मुश्किल से वह उस पेड़ के नीचे पहुंच ही पाया था कि फिर से बिजली कड़की और उस मंदिर पर गिरी जहां बाकी सभी किसान मौजूद थे।

अब तक उन सभी की जान केवल उसी किसान के पुण्य प्रताप से बची हुयी थी जिसे उन्होंने निकाल बाहर कर दिया था।

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232

प्रार्थना और जूता

नसरूद्दीन मजार पर गया और जूता पहन कर ही दुआ मांगने लगा.

वह नक्काशीदार चमरौंधे जूते पहना था जिसमें बढ़िया आवाज आ रही थी और उस पर काम की गई जरी की चमक कौंध रही थी.

वहीं मंडरा रहे एक फोकटिया छाप आदमी की नजर नसरुद्दीन के जूतों पर पड़ी. उसे लगा कि काश यह जूता उसके पास होता. जूते पर हाथ साफ करने की गरज से वो नसरुद्दीन के पास गया और उसके कान में धीरे से बोला –

“जूते पहन कर प्रार्थना करने से, दुआ मांगने से ईश्वर हमारी प्रार्थना नहीं सुनता.”

“मेरी प्रार्थना न पहुंचे तो भी कोई बात नहीं, कम से कम मेरे जूते मेरे पास तो रहेंगे.” – नसरूद्दीन का उत्तर था.

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233

ज्ञान का राजसी मार्ग

जब यूक्लिड अपने एक कठिन ज्यामितीय प्रमेय को अलेक्सांद्रिया के राजा टॉल्मी को समझा रहा था तो राजा की समझ में कुछ आ नहीं रहा था.

राजा टॉल्मी ने यूक्लिड से कहा – क्या कोई छोटा, सरल तरीका नहीं है तुम्हारे प्रमेय को सीखने का?

इस पर यूक्लिड ने उत्तर दिया – महोदय, इस देश में आवागमन के लिए दो तरह के रास्ते हैं. एक तो आम जनता के लिए लंबा, उबाऊ, कांटों, गड्ढों और पत्थरों भरा रास्ता और दूसरा शानदार, आसान रास्ता राजसी परिवार के लोगों के लिए. परंतु ज्यामिती में कोई राजसी रास्ता नहीं है. सभी को एक ही रास्ते से जाना होगा. चाहे वो राजा हो या रंक!

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234

सही ताले की ग़लत चाबी

अमीर जमींदार के घर में मुल्ला लंबे समय से काम कर रहा था. 11 वर्षों तक निरंतर काम करने के बाद एक दिन मुल्ला जमींदार से बोला – “अब मैं भर पाया. मैं अब यहाँ काम नहीं करूंगा. मैं यहाँ काम करके बोर हो गया. मैं काम छोड़कर जाना चाहता हूँ. वैसे भी आप मुझ पर भरोसा ही नहीं करते!”

जमींदार को झटका लगा. बोला – “भरोसा नहीं करते? क्या कह रहे हो मुल्ला! मैं तुम्हें पिछले 11 वर्षों से अपने छोटे भाई सा सम्मान दे रहा हूँ. और घर की चाबियाँ यहीं टेबल पर तुम्हारे सामने पड़ी रहती हैं और तुम कहते हो कि मैं तुम पर भरोसा नहीं करता!”

“भरोसे की बात तो छोड़ ही दो,” मुल्ला ने आगे कहा – “इनमें से कोई भी चाबी तिजोरी में नहीं लगती.”

हमारे पास भी बहुत सी चाबियाँ नहीं हैं जो कहीं नहीं लगतीं?

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235

सेंसरशिप

सेंसरशिप के विरोध में अपना मत दर्ज करवाने एक प्रतिनिधि मंडल गवर्नर से मिलने गया और उनसे मिलकर अपना पक्ष रखा.

गवर्नर ने तीखे स्वर में प्रतिनिधि मंडल से कहा – “आपको पता नहीं है कि आजकल प्रेस (press) कितना खतरनाक हो गया है.”

इस पर किसी ने टिप्पणी ली – “सिर्फ सप्रेस्ड (supressed) शब्द ही खतरनाक हैं.”

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236

एक परिपूर्ण दुनिया

मुल्ला भीड़ भरे बाजार में पहुँचा और एक कोने पर खड़ा होकर भाषण झाड़ने लगा.

थोड़ी ही देर में अच्छी खासी भीड़ एकत्र हो गई.

वो भाषण दे रहा था – “क्रांति होगी तो हमारी दुनिया परिपूर्ण हो जाएगी, परफेक्ट हो जाएगी. क्रांति होगी तो सभी के पास कारें होंगी. क्रांति होगी तो सभी के पास मोबाइल होगा. क्रांति होगी तो रहने के लिए सभी के पास घर होगा...”

इतने में भीड़ में से कोई विरोध में चिल्लाया – “मुझे न कार चाहिए न मोबाइल और न घर!”

मुल्ला का भाषण जारी था – “क्रांति होगी तो विरोध में बोलने वाले ऐसे आदमी भी न रहेंगे...”

यदि आप परिपूर्ण, परफ़ेक्ट दुनिया चाहते हैं तो वहाँ से आपको मनुष्यों को रफादफा करना होगा.

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237

सुझाव

एक दिन मुल्ला नसरूद्दीन एक अमीर सेठ के पास गया और कुछ रुपए उधार मांगे.

“तुम्हें रुपया क्यों चाहिए?”

“मुझे एक हाथी खरीदना है.”

“यदि तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तुम उधारी के पैसे से हाथी खरीद रहे हो तो तुम हाथी को चारा कैसे खिलाओगे?”

“मैं उधारी मांग रहा हूँ, सुझाव नहीं!”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

463

लाला लाजपत राय

आज ही मैंने लाला लाजपतराय द्वारा लिखित आर्यसमाज का इतिहास नामक पुस्तक पढ़कर समाप्त की है।

पिछले रविवार मैं अध्यापिका के पद पर नियुक्ति हेतु एक महिला का साक्षात्कार ले रहा था। मैंने उससे पूछा कि वह किस स्कूल में पढ़ी है। उसने उत्तर दिया कि उसने लाला लाजपतराय कॉलेज से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की है। उस समय मैं यह पुस्तक पढ़ रहा था, इसलिए मैंने उससे पूछा - "क्या आप लाला लाजपतराय को जानती हैं? मुझे लाला लाजपतराय के बारे में कुछ बताओ?"

वह कोई उत्तर नहीं दे सकी। उसे कुछ पता ही नहीं था।

464

मेरे हाथ .....एवं मेरा ईश्वर

एक गरीब महिला को उसके पति ने बेसहारा छोड़ दिया। जब यह मामला अदालत में पहुंचा तो न्यायाधीश ने उनसे पूछा - "क्या आपके जीवन का कोई सहारा है?"

महिला ने उत्तर दिया - "जी हां हुजूर, मेरे पास तीन सहारे हैं।"

"तीन?"

"जी श्रीमान"

"वो क्या हैं?" - आश्चर्य से भरे न्यायाधीश ने पूछा।

"मेरे हाथ, मेरा अच्छा स्वास्थ्य और मेरा ईश्वर।" - महिला ने उत्तर दिया।

उस महिला की साधन संपन्नता, उसकी आत्मनिर्भरता, और ईश्वर के ऊपर विश्वास हम सभी के लिए एक सबक हो सकता है। यह पुरानी कहावत अभी भी सत्य है कि "ईश्वर उसकी मदद करते हैं, जो अपनी मदद करता है।" ईश्वर के ऊपर विश्वास करने से हमें अपने-आप पर विश्वास करने की शक्ति मिलती है।

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230

प्रबंधन का गुर

जंगल का राजा सिंह युद्ध की तैयारी कर रहा था. सभी जानवरों को उनके बल-बुद्धि के अनुरूप कार्य दिए जा रहे थे. गधे और गिलहरी की जब बारी आई तो रणनीतिकारों ने गधे को मूर्ख समझ और गिलहरी को नाजुक मान कर युद्ध से बाहर रखने की सलाह सिंह को दी.

इस पर सिंह ने कहा - “युद्ध में जीतने के लिए सही काम के लिए सही जानवर होना जरूरी है. हर जानवर का सर्वोत्तम प्रयोग में लेना होगा. गधे की रेंक दूर दूर तक जाती है तो उसका उपयोग हम युद्ध घोष के लिए करेंगे और गिलहरी दौड़ भाग करने में माहिर है तो हम उसका उपयोग सूचना आदान-प्रदान के लिए करेंगे.”

घनश्याम दास बिड़ला ने एक बार कहा था – सही काम के लिए सही आदमी ही प्रबंधक का एकमात्र गुर है.

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231

हाँ, मेरा यही मतलब था

ऑर्केस्ट्रा का अभ्यास चल रहा था. संगीतकार ने एक तुरही वादक से कहा – “मेरे विचार में जब हम यहाँ पर होते हैं तो तुम्हें कुछ और आर्टिस्टिक एप्रोच लाना चाहिए. यदि तुम समझ रहे हो कि मैं क्या चाहता हूँ तो वो यह है कि तुम्हें कुछ ज्यादा निश्चयी होना चाहिए, थोड़ा ज्यादा स्वराघात देना चाहिए जिसमें कुछ ज्यादा जीवन हो, गहराई हो, और अधिक....”

तुरही वादक ने बीच में टोका – “क्या आप चाहते हैं कि मैं थोड़ा तेज बजाऊं?”

इस पर बेचारा संगीतकार सिर्फ यही कह सका – “हाँ, मेरे कहने का यही मतलब था!”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

461

सही नाप

एक मजिस्ट्रेट ने दर्जी से उनकी नाप का सूट सिलने को कहा।

दर्जी ने निवेदन किया - "महोदय, पहले तो आप मुझे यह बतायें कि आप किसी स्तर के अधिकारी हैं? आप हाल ही में अधिकारी बने हैं, या आप नए पद पर नियुक्त हुए हैं या काफी समय से अधिकारी हैं?"

असमंजस में पड़े मजिस्ट्रेट ने दर्जी से पूछा - "इस बात का सूट की सिलाई से क्या लेना-देना है?"

दर्जी ने उत्तर दिया - "सूट की सिलाई का इससे सीधा संबंध है। यदि आप नए - नए अधिकारी बने हैं तो आपको ज्यादातर समय कोर्ट में खड़ा रहना पड़ेगा। इस स्थिति में आपके सूट का अगला और पिछला भाग एक समान रखना होगा। यदि आप नए पद पर पदोन्नत हुए हैं तो आपके सूट का अगला हिस्सा लंबा एवं पिछला हिस्सा छोटा करना होगा क्योंकि पदोन्नत अधिकारी का सिर गर्व से ऊंचा और सीना फूला होता है। यदि आप काफी लंबे समय से अधिकारी हैं तो आपको प्रायः उच्च अधिकारियों से डाँट - फटकार खाने एवं उनके समक्ष घुटने टेकने की आदत होगी। ऐसी स्थिति में आपके सूट का अगला हिस्सा छोटा और पिछला हिस्सा लंबा रखना होगा। यदि मुझे आपके स्तर का सही-सही जानकारी नहीं होगी तो सही नाप का सूट कैसे बना सकूंगा?"

462

अहिंसा की शक्ति

महात्मा गांधी अहिंसा संस्थान के संस्थापक एवं महात्मा गांधी के पोते डॉ. अरुण गांधी ने पोर्ट रीको विश्वविद्यालय में 9 जून को व्याख्यान देते हुए निम्नलिखित घटना का उल्लेख किया -

मैं उस समय 16 साल का था एवं अपने माता-पिता के साथ दादा द्वारा डरबन, दक्षिण अफ्रीका में स्थापित संस्थान में रहता था। हमारा निवास डरबन शहर से 18 मील दूर गन्ने के खेतों के बीचोंबीच था। हमारे घर के आस-पास कोई पड़ोसी नहीं था। इसलिए मैं और मेरी दोनों बहिनें हमेशा शहर जाने, मित्रों से मिलने और फिल्म देखने की फिराक में रहते।

एक दिन मेरे पिता ने मुझसे कार चलाकर शहर चलने को कहा। वहां उन्हें एक सम्मेलन में भाग लेना था। शहर जाने के नाम पर मैं बहुत रोमांचित था। चूंकि मैं शहर जा ही रहा था इसलिए मां ने मुझे रोजमर्रा के सामानों की एक लंबी सूची पकड़ा दी। पिताजी ने भी दिन भर में सारे बचे हुए कामों को निपटाने को कहा, जिसमें कार की सर्विस कराना भी एक था।

सुबह मैंने अपने पिताजी को सही समय पर सम्मेलन स्थल पर छोड़ दिया। वे बोले -"शाम को ठीक पांच बजे मिलेंगे और साथ-साथ घर चलेंगे।"

मैंने जल्दी-जल्दी सारे काम निपटाये और नजदीक ही स्थित एक सिनेमाघर पहुंच गया। जॉन बायने की डबलरोल वाली उस फिल्म को देखने में मैं इतना मगन हो गया कि शाम के 05.30 बज गए। मैं भागता हुआ कार गैरेज पहुंचा और कार लेकर पिताजी के पास पहुंचा। तब तक शाम के 06 बज चुके थे।

पिता जी ने चिंतित स्वर में पूछा - "तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी?"

मुझे यह बताने में बहुत शर्म आयी कि मैं फिल्म में इतना मगन हो गया था कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। मैंने झूठ बोलते हुए कहा - "कार की सर्विस समय पर नहीं हो पायी थी इसलिए मुझे इंतजार करना पड़ा।" मुझे यह पता नहीं था कि पिताजी पहले ही गैरेज में जाकर पूछताछ कर चुके थे। मेरा झूठ पकड़ने के बाद उन्होंने मुझसे कहा - "मुझसे तुम्हारे लालन-पालन में जरूर ऐसी कोई गलती हो गयी होगी कि तुम्हें मुझसे सत्य बोलने का साहस नहीं है। यह पता लगाने के लिए कि मुझसे कहां गलती हो गयी, मैं घर तक 18 मील पैदल चलकर जाऊंगा।"

सूट और जूते पहने हुए पिताजी अंधेरे रास्ते में पैदल ही चल दिए।

मैं उनको छोड़ नहीं सकता था इसलिए साढ़े पांच घंटे तक मैं कार से उनके पीछे-पीछे चलता रहा। मुझे उनका कष्ट देखकर दुःख हो रहा था कि मेरे एक जरा से झूठ के कारण उन्हें कष्ट उठना पड़ रहा है। मैंने उसी दिन प्रतिज्ञा कर ली कि फिर कभी झूठ नहीं बोलूंगा। मैं अब भी प्रायः उस घटना के बारे में सोचता हूं और आश्चर्य करता हूं कि यदि उन्होंने मुझे उस तरह से दंड दिया होता जैसे आजकल के माता-पिता देते हैं, तो मुझे ऐसा सबक कभी नहीं मिलता। मैं दंडित होता और सबकुछ भूलकर फिर गलती करता। लेकिन अहिंसा इस एक ही सबक ने मुझपर इतना गहरा प्रभाव डाला जैसे यह कल ही की बात हो। यही अहिंसा की शक्ति है।

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224

कैप्टन और मेजर

एक युवा कैप्टन गलती से कुएं में गिर गया. सिपाहियों ने जब यह देखा तो वे दौड़े और तत्काल कुएं में रस्सी फेंकी और कैप्टन को कुएं से बाहर खींचने लगे. पर जैसे ही कैप्टन कुएं के मुहाने पर पहुँचे, सिपाहियों ने आदतन और दी गई ट्रेनिंग के हिसाब से सावधान होकर कैप्टन को सलाम ठोंका.

नतीजा यह हुआ कि सिपाहियों के हाथ से रस्सी छूट गई और कैप्टन वापस नीचे.

इस भाग दौड़ में यूनिट का मेजर भी वहाँ पहुंच चुका था. यह नजारा देख कर उसने सिपाहियों को पीछे किया और खुद रस्सी थामी और बड़ी मेहनत से कैप्टन को ऊपर खींचा.

मुहाने पर पहुंचते ही कैप्टन ने देखा कि उसका मेजर वहाँ है. उसने आदतन सैल्यूट ठोंका. और उसके हाथ से रस्सी छूट गई और वो वापस कुएं में जा गिरा.

प्रोटोकॉल व्यवस्था के लिए बनाए जाते हैं. परंतु इसका अतिरेक व्यवस्था को खा जाती है

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225

थोड़ा तो ठहर जाओ!

वैज्ञानिक रदरफ़ोर्ड ने ध्यान दिया कि उनके लैब में उनका एक विद्यार्थी देर रात में भी काम करता रहता है.

एक दिन रदरफ़ोर्ड ने उस विद्यार्थी से पूछा – “तुम देर रात काम करते रहते हो, क्या सुबह से काम नहीं करते?”

“मैं सुबह भी काम करता हूँ.” विद्यार्थी ने गर्व से कहा.

“ओह, पर फिर तुम सोचते कब हो?” रदरफ़ोर्ड ने आश्चर्य से पूछा.

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226

पसंद अपनी अपनी

पशु चिकित्सक ने दिनेश को टॉमी को कॉड लिवर आइल पिलाने की सलाह दी. दिनेश दवाई की दुकान से कॉड लिवर आइल ले आया. वह पहले भी अपने प्रिय कुत्ते को दवाइयाँ पिलाता रहा था. उसका कुत्ता दवाइयाँ पीने में बहुत विरोध करता था और हर बार दिनेश कुत्ते को पकड़ कर उसका मुंह अपने घुटने में दबा कर दवाई कुत्ते के गले के भीतर डालता था.

दिनेश कुत्ते को कॉड लिवर आइल इसी तरह पिलाता रहा. एक दिन इसी मारामारी में थोड़ा सा कॉड लिवर आइल नीचे बिखर गया. और दिनेश ने आश्चर्य से देखा कि टॉमी उस बिखरे कॉड लिवर आइल को प्रेम से चाट रहा है!

पिछले दो हफ्ते से दिनेश और टॉमी के बीच कॉड लिवर आइल पिलाने के लिए जंग होती रही थी, परंतु यह दवाई के लिए नहीं थी, बल्कि उसे पिलाने की विधि के लिए थी!

आप चीजों को अपने मुताबिक और अपनी विधि से करने के लिए जंग लड़ते हैं. इसके बजाए उन्हें प्यार से और प्राकृतिक रूप से होने दें तो कहीं ज्यादा अच्छा होगा.

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227

जल्दी चलो

एक भुलक्कड़ व्याख्याता को व्याख्यान के लिए एक जगह जाना था. वह पहले ही लेट हो गया था.

उसने एक टैक्सी को रोका और बैठते हुए बोला – चलो जल्दी चलो.

टैक्सी वाला टॉप स्पीड में चलने लगा.

थोड़ी देर बाद व्याख्याता को याद आया कि उसने तो टैक्सी ड्राइवर को कहाँ जाना है यह तो बताया ही नहीं.

उसने टैक्सी ड्राइवर से पूछा – “तुम्हें पता है कि मुझे जाना कहाँ है?”

“नहीं सर,” टैक्सी ड्राइवर ने जवाब दिया – “पर, मैं जल्दी चल रहा हूँ, जैसा कि आपने कहा था.”

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228

दुर्योधन की समझ

महाभारत युद्ध के दौरान एक दिन दुर्योधन भीष्म के पास पहुंचे और उनके सामने अपनी गलती स्वीकारी और कहा कि राज्य के लालच से उनसे यह भूल हो गई और इतना बड़ा संग्राम हो गया. और इस संग्राम की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी इसका भी उन्हें अंदाजा है.

परंतु इस स्वीकारोक्ति के बाद भी दुर्योधन ने अपना लड़ाई झगड़े का व्यवहार छोड़ा नहीं और पांडवों से युद्ध करते रहे.

आपकी सोच, समझ और स्वीकारोक्ति की कोई कीमत नहीं यदि आपके कार्य उस अनुरूप न हों.

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229

शांति

तीन साधु शांति से ध्यान करना चाहते थे. परंतु उन्हें कोई शांतिप्रद स्थल नहीं मिला. अंत में वे हिमालय की कंदराओं में चले गए. वहाँ गुफ़ा में परिपूर्ण, पिन-ड्रॉप शांति थी.

एक वर्ष बीत गया. पहले साधु ने कहा – “बड़ी ही शान्ति प्रिय जगह है यह”

एक और वर्ष बीत गया. दूसरे साधु ने कहा – “हाँ”

तीसरा वर्ष बीतने हो आया. तीसरे साधु ने कहा – “आप दोनों बहुत बातें करते हैं. मैं तो कहीं और जाकर ध्यान करता हूँ.”

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

naxli shri shri ravishankar art of living

कल देर रात एक बजे जब मैं सुनहरे सपने देखने में तल्लीन था, अचानक मेरी नींद खुल गई. मुझे लगा कि कोई दरवाजे की घंटी बजाए जा रहा है. शुरू में तो लगा कि शायद यह भी सपने का ही हिस्सा है. मैं सपने के इस हिस्से का आनंद लेने लगा क्योंकि आजकल तो घरों में काम वाली बाई और दूध-अख़बार वाले के अलावा कोई आता जाता नहीं है. किसी के पास न तो समय है न इच्छा. वैसे भी फ़ेसबुक के जमाने में जब दुनिया अपने सोफे में बैठ कर कंप्यूटरों और अपने मोबाइल डिवाइसों के सहारे सोशल हो रही है तो भौतिक रूप से मिलने जुलने में क्या धरा है!

पर जब डोरबेल लगातार बजता रहा और साथ ही दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी तो लगा कि मामला कुछ गड़बड़ है. सचमुच ही कोई आया है. अहोभाग्य हमारे. चलो कोई तो इस घर में आया, भले ही वह रात के एक बजे आ रहा हो.

प्रसन्नता पूर्वक, उत्साह से लबरेज दरवाजे पर पहुँचा अतिथि का स्वागत करने. आखिर रात के एक बजे यदि कोई आया है तो वह जाना पहचाना, रिश्तेदार या मित्र ही होगा. या शायद इस रात्रिकालीन आपात समय में शायद किसी को कोई आपात सहायता की जरूरत हो.

पर जब मैंने दरवाजा खोला तो दिल धक से हो गया. सामने एक हवलदार खड़ा था. वो अपनी वर्दी के पूरे रौब में था. क्षण मात्र में ही मेरे दिमाग में विचारों का तूफान सा बह गया. न जाने क्यों यह हवलदार यहाँ चला आया है. कैसी आपात स्थिति आ गई है जो यह इस समय घर पर आ गया है. विचारों की तंद्रा जल्द ही टूट गई, जब उसने अपनी लाठी हड़काई और बोला –

“क्यों बे, नक्सली *ले माद*** बहन** यहाँ छुपा बैठा है, चल थाने और अपनी बीवी को भी उठा और साथ ले चल!”

“देखिए, आपको कोई गलतफहमी हो गई है, हमारा नक्सलियों से कोई लेना देना नहीं, हम एक इज्जतदार शहरी हैं...”

“तेरी इज्जत की तो... ऑर्ट आफ लिविंग के बारे में कुछ पता भी है? इज्जत की बात करता है. भोस* के ज्यादा पचपच मत कर, चुपचाप चल नहीं तो यह लाठी पूरी घुसेड़ दूंगा...”

भारतीय ट्रैफ़िक और भारतीय पुलिस से तो भगवान बचाए. मरते क्या न करते, चुपचाप उस पुलिस वाले के साथ हो लिए. सोचा शायद इन्हें गलतफहमी हो गई है, जल्दी ही मामला साफ हो जाएगा और उन्हें अपनी गलती का अहसास हो जाएगा. ये बात जुदा है कि भारतीय पुलिस कभी गलती करती ही नहीं, और यदि करती भी है तो स्वीकारती नहीं.

जब हम हवलदार के साथ थाने पहुँचे तो पाए कि वहाँ भयंकर भीड़भाड़ थी. मेला सा लगा हुआ था. तमाम जनता – बड़े-बूढ़े, बच्चे जवान सभी को हांक कर लाया गया था. सब लाइन में खड़े थे और सभी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज किया जा रहा था.

हमारी तरह उन सबके विरुद्ध नक्सलाइट होने के आरोप थे. बाद में आसपास पूछताछ से पता चला कि सरकार को आज ही इलहाम हुआ है कि सरकारी स्कूलों से पढ़कर निकलने वाले तमाम छात्र नक्सलाइट बनते हैं इसीलिए एहतियातन उन सभी लोगों को जो कभी सरकारी स्कूलों में पढ़े हों या पढ़ रहे हों जेल में बंद किया जा रहा है और उनके विरुद्ध नक्सलाइट होने का, देशद्रोही होने का मुकदमा चलाया जाएगा. सरकार को भी यह बात अभी अभी पता चली है. किसी पहुँचे हुए बाबा ने इस गुप्त बात का खुलासा किया है.

मेरे बाजू में एक फटे पुराने कपड़े पहने हुए दीन हीन सा एक बच्चा खड़ा था. वह खड़ा खड़ा ही झपकियाँ मार रहा था. जाहिर है, उसे भी सोते से जगाकर लाया गया था. उसे उसकी मां सम्हालने व जगाए रखने की कोशिश कर रही थी. मैंने उसकी मां से पूछा –

“तुम अपने साथ इस बच्चे को क्यों ले आई हो?”

“मैं नी लाई. पुलिस वाले इस बच्चे को ले आए. पूछे कि ये कौन से स्कूल में पढ़ता है. मैंने बताया कि सरकारी स्कूल में पहली क्लास में पढ़ता है तो उठा कर ले आए. क्या करती में भी साथ आई.”

“तो पुलिस तुम्हें नहीं लाई? तुम क्या सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ी हो? क्या कॉन्वेंट में पढ़ी हो?”

“कॉन्वेंट? उ तो हमरे बस का नईं है बाबू. हम तो झुग्गी में रहते हैं बाबू, और हम तो कुछ पढ़े ही नहीं. इ बबुआ को कुछ पढ़ा लिखा दें सोच रहे थे इस लाने इसे सरकारी स्कूल में भरती करा दिए थे. का पता था कि ये नक्सली बन जाएगा.”

और वह औरत जार जार रोने लगी.

मेरी स्थिति भी कोई अच्छी नहीं थी. भीतर से तो मैं भी रो रहा था. काश! मेरे मातापिता मुझे सरकारी स्कूल के बजाए कॉन्वेंट में, निजी स्कूलों में पढ़ाए होते तो यह दिन देखना नहीं पड़ता!

इतने में पीछे से एक डंडा मुझपर पड़ा और आवाज सुनाई दी – “चल आगे बढ़ बे... क्या देखता है अपना नाम पता लिखवा...”

और इस तरह सरकारी रेकॉर्ड में एक और नक्सली का नाम दर्ज हो चुका था.

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

459

मम्मी, मैं आपसे प्यार करता हूं

एक व्यक्ति फूलों की एक दुकान के पास रुका। वह अपनी माँ के लिए फूलों का एक गुलदस्ता भेजना चाहता था जो वहाँ से 200 मील दूर रहती थीं। जैसे ही वह अपनी कार से उतरा, उसने देखा कि एक लड़की वहाँ बैठी सुबक रही थी। उसने लड़की से इसका कारण पूछा। लड़की ने उत्तर दिया - "मैं अपनी माँ के लिए एक गुलाब खरीदना चाहती हूं। लेकिन मेरे पास सिर्फ 75 पैसे हैं जबकि एक गुलाब की कीमत रु. 2/- है।"

उस व्यक्ति ने मुस्कराते हुए कहा - "मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें गुलाब दिला देता हूं।" फिर उसने उस लड़की के लिए गुलाब तथा अपनी माँ के लिए फूलों का गुलदस्ता खरीदा। दुकान से बाहर आते समय उस व्यक्ति ने लड़की को घर तक छोड़ने का प्रस्ताव दिया। लड़की ने कहा - "ठीक है, आप मुझे मेरी माँ के पास ले चलिए।"

वह लड़की उसे एक कब्रिस्तान में ले गयी और अपनी माँ की कब्र पर वह गुलाब रखा। जैसे ही उस व्यक्ति ने यह दृश्य देखा, उसने तुरंत अपनी माँ को डाक द्वारा भेजे लाने वाले पार्सल को रद्द किया एवं वह गुलदस्ता लेकर स्वयं अपनी माँ के पास जाने के लिए रवाना हो गया।

माता-पिता के जीवित और स्वस्थ रहते ही उनकी सेवा करना बेहतर है न कि मृत्यु उपरांत आदर व्यक्त करना।

460

मैं फिर भी तुम्हें प्यार करती रहूंगी

अस्वीकृति का डर मानव स्वभाव का एक आधारभूत भय है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने आखिरकार अपने बॉस से वेतन बढ़ाने के लिए बात करने का निर्णय लिया। उस दिन शुक्रवार था। उसने सुबह ही अपनी पत्नी को बता दिया कि आज वो अपने बॉस से दो-टूक बात कर लेगा। पूरे दिन वह व्यक्ति नर्वस और डरा-डरा रहा। शाम के समय उसने बॉस से बात करने की हिम्मत जुटायी। अच्छी बात यह हुई कि बॉस उसका वेतन बढ़ाने को राजी हो गये।

शाम को वह व्यक्ति खुशी-खुशी अपने घर आया। उसकी पत्नी ने बेहतरीन व्यंजन बनाए हुए थे। उसे ऐसे लगा कि शायद ऑफिस के किसी व्यक्ति ने उसकी पत्नी को यह सुराग दे दिया है कि मेरा वेतन बढ़ गया है।

उसने किचन में जाकर अपनी पत्नी को यह शुभ समाचार सुनाया। यह सुनकर पत्नी बहुत खुश हुयी। वे लोग साथ-साथ भोजन करने बैठे। तभी उस व्यक्ति को प्लेट के नीचे एक कागज़ दिखा, जिस पर लिखा हुआ था - "बधाई हो प्रिये! मुझे पता था कि तुम्हारा वेतन बढ़ जाएगा। इससे तुम्हें पता चलेगा कि मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूं।"

जब पत्नी कुछ सामान लेने किचन की ओर जाने लगी, उसकी जेब से एक दूसरा कागज़ गिरा। जब व्यक्ति ने दूसरे कागज़ को भी उठाकर पढ़ा। उसमें लिखा था - "क्या हुआ यदि तुम्हारा वेतन नहीं बढ़ा। यद्यपि तुम अधिक वेतन पाने के हकदार थे, लेकिन फिर भी दुःखी होने की जरूरत नहीं है। इससे तुम्हें पता चलेगा कि मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूं।"

पूर्ण स्वीकृति! पूर्ण प्रेम! उस व्यक्ति के प्रति उसकी पत्नी का प्यार उसकी सफलता का मोहताज़ नहीं था। बल्कि इसके विपरीत था। भले ही उस व्यक्ति की बात उसके बॉस के द्वारा नकार दी जाती, भले ही वह ऑफिस में असफल रहता, लेकिन फिर भी घर में उसके प्रति पूर्ण स्वीकृति थी। हर परिस्थिति में वह उसके साथ थी। किसी एक व्यक्ति का सच्चा प्यार पाने के लिए हम किसी की भी अस्वीकृति को बर्दाश्त कर सकते हैं।

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220

सही वरदान

एक राजा शिव भक्त था. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और अपने भक्त से कोई वरदान मांगने को कहा.

राजा दयालु था और अपने देश की जनता का मंगल सदैव चाहता था. तो राजा ने भगवान से यह वरदान मांगा कि उसके पास यह शक्ति आ जाए कि राज्य की तमाम जनता अपने राजा से सदा सर्वदा प्रसन्न और खुश रहे.

भगवान शिव सोच में पड़ गए. फिर बोले – हर किसी को हर समय खुश रखना तो जादू करने जैसा काम होगा. एक राजा यह काम कभी नहीं कर सकता. एक ही समय में आप सेठ और सेठ के घर चोरी करने वाले को एक साथ कैसे खुश रखोगे. तुम्हें न्याय स्वरूप चोर को दंड देना ही होगा और इससे वह खुश कैसे होगा?

राजा को यह बात समझ में आ गई और उन्होंने भगवान से क्षमा मांगते हुए यह वरदान मांगा कि वह अपने राज्य में सबको सही सही न्याय प्रदान करने में समर्थ बने.

राजा की यह इच्छा भगवान शिव ने पूरी कर दी.

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221

मरते दम तक

प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात को मृत्युदंड की सज़ा सुना दी गई थी. वे अपनी कोठरी में मृत्युदंड के दिन का इंतजार कर रहे थे. एक दिन उन्होंने बगल की कोठरी में एक कैदी को एक गीत गाते सुना.

सुकरात ने उस कैदी से निवेदन किया कि क्या वह उसे यह गीत सिखा सकता है?

उस कैदी ने आश्चर्य से पूछा – तुम्हें तो कुछ ही दिनों में मृत्युदंड दिया जाना है, यह गीत सीख कर क्या करोगे?

“एक न एक दिन मरना सभी को है. तो मैं एक चीज और सीख कर मरूंगा.” सुकरात का जवाब था.

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222

स्वर्ग में सुई

गुरु नानक एक बार एक धनी सेठ धूनी चंद से मिले. धूनी चंद के कंजूसी के किस्से बहुत प्रचलित थे. गुरु नानक ने एक सुई मंगवाया और धूनी चंद को देते हुए कहा – “इस सुई को अपने पास सम्हाल कर रखो. जब हम स्वर्ग में मिलेंगे तब तुम मुझे इसे लौटा देना.”

धूनी चंद ने आश्चर्य से कहा – “मैं इसे अपने पास सम्हाल कर तो रख लूंगा, परंतु इसे मैं स्वर्ग कैसे ले जा सकता हूँ?”

“यह बात तो -” गुरु देव ने आगे कहा – “तुम्हारे धन के साथ भी लागू होती है!”

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223

सादगी

लुइ पास्चर को फ्रांसीसी सरकार ने देश का प्रतिनिधित्व करने अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा कांग्रेस लंदन भेजा.

लुइ पास्चर की ख्याति इतनी अधिक थी कि जब वे सम्मेलन स्थल सेंट जेम्स हॉल पहुँचे तो सभी ने खड़े होकर उनके लिए तालियाँ बजाई.

परंतु लुइ पास्चर सीधे सादे इंसान थे. उन्हें इस बात का न तो भान था न प्रत्याशा थी. उन्होंने अपने एस्कोर्ट से कहा – “लगता है मैं थोड़ा लेट हो गया. शायद इंग्लैंड के महाराजा आए हैं और उनके लिए तालियाँ बज रही हैं.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

· सचिन का महाशतक तो शायद द्रविड़ के रिटायरमेंट का इंतजार कर रहा था.

· सचिन का महाशतक सीनियर-रिटायर्ड खिलाड़ियों द्वारा सचिन के रिटायरमेंट ले लेने की धमकी का इंतजार कर रहा था.

· यदि भारत सिर्फ और सिर्फ बांग्लादेश और केन्या के साथ ही क्रिकेट मैच खेलता होता तो अभी सचिन का महाशतक क्या, अभी महाद्विशतक होता या फिर इससे आधे समय में महाशतक हो चुका होता.

· इस महाशतक से सचिन अभी और दस वर्ष तक भारतीय क्रिकेट टीम में बने रह सकते हैं भले ही सीनियर और डबल सीनियर खिलाड़ियों द्वारा रिटायरमेंट की धमकी गाहे बगाहे मिलती रहे.

· महाशतक ज्यादा महत्वपूर्ण है – जीत नहीं, क्योंकि हार-जीत तो चलते रहता है, और आमतौर पर फिक्स रहता है.

· सचिन के महाशतक ने भारत को हराया – थोड़ी खुशी, थोड़ा गम (कभी खुशी कभी गम)

· महाशतक के बाद सचिन को भारतीय टीम में और दस साल बने रहना चाहिए – उनके अनुभव का लाभ जूनियर खिलाड़ियों व भारतीय क्रिकेट को मिलना ही चाहिए.

· महाशतक के बाद भारतीय टीम का स्थाई खिलाड़ी सचिन को मान लेना चाहिए - उनके अनुपलब्ध रहने पर भी उनके फोटो को टीम के बारहवें खिलाड़ी का दर्जा देना चाहिए.

· एक बार यह कहावत फिर से सिद्ध हो गया. इंतजार का फल महाशतक होता है.

· निठल्लों के लिए हालिया क्रिकेट के ओवरडोज के बीच सचिन का महाशतक आइसक्रीम/कॉफ़ी की तरह है.

· सचिन के महाशतक के लिए पान के ठेलों पर गपियाते और टिप्स और ट्रिक्स देने वाली जनता के लिए अब काम का टोटा पड़ गया है.

· जनता अब सचिन के सन्यास का बेसब्री से इंतजार करने लगी है.

· अन्ना हजारे और सचिन के महाशतक में क्या समानता है? अन्ना हजारे भी सचिन का महाशतक देख रहे थे.

· इधर सचिन का महाशतक पूरा हुआ उधर भारतीय केंद्रीय बजट में टैक्स बढ़ाने की घोषणा हुई - इधर खुशी उधर गम.

 

 

आपके पास भी ऐसे ही कुछ थॉट्स होंगे? हमें भी बताइए. टिप्पणी बक्सा है ना!

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

457

हाथी कितना दूर था? ?

एक राजा के दरबार में विद्वानों की सभा चल रही थी। एक विद्वान भागवत पुराण में वर्णित ‘गजेन्‍द्र मोक्ष’ नामक रोचक कथा सुना रहे थे। वे बोले – ‘गजराज की करुण पुकार सुनते ही भगवान नारायण भागते हुए चले आये। जल्‍दी में वे अपना शंख और चक्र लेना भी भूल गए। यहां तक कि उन्‍होंने अपनी संगिनी देवी लक्ष्‍मी को भी सूचित नहीं किया।’

विद्वान की बात सुनते ही राजा ने उनसे प्रश्‍न किया – ‘स्‍वामी जी, कृपया मुझे यह बतलायें कि उस जगह से बैकुण्‍ठ कितनी दूर है जहां से हाथी ने पुकार लगायी थी?’

विद्वान ने उत्‍तर दिया – ‘क्षमा कीजिए, मैं इस प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं दे सकता। ऐसे बहुत कम सौभागयशाली हैं जो इस प्रश्‍न का उत्‍तर दे सकते हैं।’

दरबार में मौजूद बाकी सभी विद्वानों ने भी इस प्रश्‍न का उत्‍तर दे पाने में असमर्थता जतायी। अचानक राजा के पीछे खड़ा एक व्‍यक्‍ति धीरे से बोला – ‘महाराज, यदि आप मुझे अनुमति दें तो मैं इस प्रश्‍न का उत्‍तर बता सकता हूं।’ राजा की अनुमति मिलते ही वह बोला - ‘हे महाराज, उस जगह से बैकुण्‍ठ उतना ही दूर था जितनी दूर से उस हाथी की पुकार सुनी जा सके।’

भगवान नारायण का एक नाम ‘हृदयनिवासी’ भी है।

458

क्‍योंकि यह तुम्‍हारा बच्‍चा नहीं था

ऐंडीज़ पर्वत श्रंखला में दो योद्धा प्रजातियां थीं। एक प्रजाति निचले इलाके में रहती थी तथा दूसरी पर्वतों के ऊपर। एक दिन ऊंचे पर्वतों पर रहने वाली प्रजाति ने निचले इलाके पर हमला बोल दिया। अपने बहुसंख्‍यक योद्धाओं के बल पर उन्‍होंने निचले इलाके में तबाही मचा दी और वापस जाते समय एक नवजात बच्‍चे को अपहृत करके अपने साथ ले गए।

निचले इलाके के लोग ऊंचे पर्वतों पर चढ़ने की कला नहीं जानते थे। वे यह भी नहीं जानते थे कि पर्वतीय इलाकों में छुपे लोगों को किस तरह तलाश किया जाये। अत: बच्‍चे को उनके कब्‍जे से वापस लाने के उन्‍होंने अपने सर्वश्रेष्‍ठ योद्धाओं की टीम भेजी।

उन योद्धाओं ने दुर्गम पर्वतीय ढलानों पर चढ़ने के लिए एक के बाद एक कई युक्‍तियां अपनायीं परंतु नाकामयाब रहे। कई दिनों के परिश्रम के बाद जब वे कुछ सौ फुट ही चढ़ पाए तो निराश होकर उन्‍होंने इस अभियान को समाप्‍त करने एवं खाली हाथ घर वापस लौटने का निर्णय लिया।

जैसे ही वे घर वापस जाने के लिए मुड़े, उन्‍होंने देखा कि उस बच्‍चे की माँ अपनी पीठ पर बच्‍चे को लादे वापस लौट रही थी। उनमें से एक व्‍यक्‍ति ने उस महिला को बधाई देते हुए पूछा – ‘जब हमारे इतने नौजवान और ताकतवर योद्धा इस पर्वत पर चढ़ने में सफल नहीं हो पाए तो आखिर आपने कैसे सफलता पायी?’

महिला ने अपने कंधों को उचकाते हुए कहा –‘क्‍योंकि यह तुम्‍हारा बच्‍चा नहीं था।’

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214

ब्यूरोक्रेसी

एक छात्र भाषा-लेबोरेट्री में पहुँचा और वहाँ के भंडार क्लर्क से एक खाली (ब्लैंक) टेप मांगा.

क्लर्क ने छात्र से पूछा – “किस भाषा का ब्लैंक टेप आपको चाहिए?”

“फ्रांसीसी” – छात्र ने जवाब दिया.

“हमारे पास इस भाषा का कोई ब्लैंक टेप नहीं है.” – क्लर्क ने बताया.

“क्या आपके पास अंग्रेज़ी भाषा का ब्लैंक टेप है?” – छात्र ने कुछ सोचते हुए पूछा.

“हाँ है.” – क्लर्क ने बताया.

“बहुत बढ़िया” – छात्र ने आगे कहा – “एक दे दीजिए. मैं इसी से काम चला लूंगा.”

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215

सत्य की खोज

एक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु की तलाश थी. इसके लिए वह एक प्रसिद्ध ऋषि के आश्रम पहुँचा और ऋषि से अपना चेला बना लेने का निवेदन किया.

ऋषि ने उस व्यक्ति से कहा – ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बहुत कठिन है. क्या तुम उस पर चल पाओगे?

व्यक्ति ने जब अपनी सहमति दी तो ऋषि ने कहा – ठीक है, कल से तुम आश्रम में पानी भरोगे, जलाऊ लकड़ियाँ काटोगे और सभी के लिए खाना बनाओगे.

मैं आपके पास ज्ञान की तलाश में आया था, रोजगार की तलाश में नहीं ! – उस व्यक्ति ने ऋषि से कहा और बढ़ लिया.

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216

नाम में क्या रखा है?

एक दंपत्ति का पहला बच्चा हुआ तो वे बड़े प्रसन्न हुए. जब बच्चे के नामकरण की बारी आई तो पति-पत्नी में वाद विवाद हो गया. विवाद इतना बढ़ गया कि वे इसे सुलझाने के लिए मुल्ला नसरूद्दीन के पास पहुँचे.

“समस्या आखिर क्या है?” – मुल्ला ने पूछा.

“मैं बच्चे का नाम अपने पिता के नाम पर रखना चाहता हूँ.” पति ने कहा.

“मैं बच्चे का नाम इनके नहीं, अपने पिता के नाम पर रखना चाहती हूँ.” पत्नी ने कहा.

“आपके पिता का नाम क्या है?” मुल्ला ने पति से पूछा.

“अहमद” पति का जवाब था.

“और आपके पिता का?”

“अहमद” पत्नी ने जवाब दिया.

झगड़ने के लिए कारण की जरूरत नहीं होती!

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217

अफवाह की सत्यता

एक बार एक क्षेत्र में यह अफवाह फैल गया कि खड़ी फसल हफ्ते भर के भीतर सूख कर मुर्झा जाएगी और अकाल पड़ जाएगा.

जबकि इसके विपरीत फसल अच्छी खासी खड़ी थी और पैदावार की प्रत्याशा आशा से अधिक थी.

परंतु अफवाह के कारण किसान बदहवास हो गए और अपने खेतों को छोड़ कर रोजगार की तलाश में शहरों को पलायन कर गए.

इधर खेतों में खड़ी फसल की देखभाल नहीं हुई और हफ्ते भर में फसलें सूख गईं और सचमुच में क्षेत्र में अकाल पड़ गया.

अफवाह सच हो गया.

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219

अगला वक्ता कौन

एक बार टाउन हाल में सम्मेलन हो रहा था. एक वरिष्ठ राजनेता को बीज वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने जो भाषण देना चालू किया तो बन्द ही नहीं किया.

श्रोताओं में से एक एक कर लोग उठने लगे.

स्थिति यह हो गई कि श्रोता के नाम पर सिर्फ मुल्ला नसरूद्दीन बैठा रह गया था.

वक्ता बड़ा खुश हुआ और मुल्ला को धन्यवाद देते हुए कहा – लोग मूर्ख हैं, जो मेरी बात नहीं सुनते. आप बड़े बुद्धिमान पुरुष हैं जिन्होंने मुझे पूरा सुना.

“नहीं नहीं, यह बात नहीं है -” मुल्ला ने बात पूरी की “दरअसल, अगला वक्ता मैं हूँ.”

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219

उपहास

एक बार गौतम बुद्ध तथागत के साथ एक गांव से गुजर रहे थे. एक अज्ञानी ग्रामवासी बुद्ध का उपहास उड़ाने लगा.

तथागत को बड़ा क्रोध आया, परंतु बुद्ध शांत बने रहे.

बाद में तथागत ने बुद्ध से पूछा – “स्वामी, उस अदने से व्यक्ति ने आपका उपहास उड़ाया, परंतु आपने उसे कुछ भी नहीं कहा.”

“तथागत, यदि मैं अपने पास का थैला भर कर अनाज तुम्हें देना चाहूँ और तुम उसे स्वीकार नहीं करो तो अनाज का क्या होगा?”

“वह मेरे पास ही रहेगा” - तथागत ने कहा.

“यही बात उपहास के साथ भी लागू होती है.” – बुद्ध ने उत्तर दिया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

455

सत्य का अभ्यास

एक संत तपस्या में लीन थे। तपस्या की अवधि के दौरान वे दो सिद्धांतों पर अडिग थे - "सत्यनास्ति परम धर्मः" अर्थात सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है और "अहिंसा परमो धर्मः" अर्थात अहिंसा से बढ़कर कोई धर्म नहीं।

संत से ईर्ष्या करने वाला एक व्यक्ति उनका व्रत तोड़ना चाहता था। वह हमेशा इस प्रयास में रहता कि किसी तरह संत को झूठ बोलने या हिंसा करने के लिए विवश किया जाए। एक दिन वह संत की कुटिया में शिकारी का वेश धारण करके पहुंचा। वह एक हिरन का पीछा करते हुए वहां पहुंचा था जो कुछ समय पूर्व ही कुटिया में घुसा था।

एक भोलेभाले आदमी की तरह उसने संत से पूछा कि क्या उन्होंने किसी हिरन को अंदर आते हुए देखा है? संत असमंजस में पड़ गए। उन्होंने हिरन को अंदर आते देखा था अतः वे झूठ नहीं बोल सकते थे। लेकिन यदि वे सत्य बोल देते तो उस हिरन का वध तय था। उन्होंने एक पल विचार करने के बाद कहा - "हे मानव! जो देखा है उसे कहा नहीं जा सकता और जो कहा जा सकता है उसे देखा नहीं।" संत की गूढ़ बात का अर्थ समझ में नहीं आने पर वह व्यक्ति वहां से चला गया।

संत की बात में गहरा सार छुपा था। आँखों ने हिरन को देखा था पर आँखें बोल नहीं सकतीं, और मुँह बोल सकता है किंतु देख नहीं सकता।

ऐसा सत्य जिससे किसी निर्दोष को हानि पहुंचे उसे कहा नहीं जाना चाहिए। लेकिन अहिंसक होने के लिए व्यक्ति को झूठ बोलने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे असमंजस के क्षणों में मनुष्य को युक्ति पूर्वक काम करना चाहिए।

456

अंततः उपाधि मिल ही गयी

विश्वामित्र इस बात से बहुत नाराज़ थे कि उनकी वर्षों की तपस्या और संन्यास के बावजूद उनके चिरप्रतिद्वंद्वी महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें राजश्री कहकर संबोधित किया जबकि वे ब्रहर्षि की उपाधि पाना चाहते थे।

इसलिए एक चांदनी रात को जब महर्षि वशिष्ठ अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे, विश्वामित्र छुपते-छुपाते उनके आसन तक पहुंच गए। वे अपनी तलवार से उनका वध करने के इरादे से वहां गए थे। हमला करने के पूर्व झाड़ियों के पीछे छुपकर वे कुछ देर के लिए वशिष्ठ की बातों को सुनने लगे।

उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने महर्षि वशिष्ठ को शीतल चाँदनी की तुलना विश्वामित्र से करते हुए सुना। वशिष्ठ अपने शिष्यों से कह रहे थे कि यह चांदनी रात विश्वामित्र की ही तरह शीतल, चमकदार, उपचारात्मक, स्वर्गीय, वैश्विक एवं मोहक है।

यह सुनकर विश्वामित्र के हाथ से तलवार छूट गयी। वे वशिष्ठ के चरणों में गिर पड़े। विश्वामित्र को पहचानते ही वशिष्ठ ने उन्हें आदरपूर्वक अपने आसन पर बैठाया।

फिर वशिष्ठ ने उनसे कहा कि जब तक मन मे अहंकार रहा, वे ब्रहर्षि की उपाधि प्राप्त नहीं कर पाये। और जब उनके मन से यह अहंकार जाता रहा और वे अपने प्रतिद्वंद्वी के चरणों में गिर गए, उसी समय से वे ब्रहर्षि की उपाधि के पात्र हो गए।

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209

जियो तो ऐसे जैसे हर पल आखिरी हो

हांगकांग के प्रसिद्ध कानूनविद और सांसद मार्टिन ली ने एक बार अपना अनुभव सुनाया.

उनके फुटबाल कोच ने एक दिन सारे खिलाड़ियों को बीच मैदान में जमा किया और एक प्रश्न उनकी ओर दागा – “यदि तुम कोई मैच खेल रहे हो और तुम्हें यह पता चले कि यह तुम्हारे जीवन का आखिरी 15 मिनट है तो तुम क्या करोगे?”

एक ने कहा – “मैं ईश्वर से अपने पापों का प्रायश्चित करूंगा.”

दूसरे ने कहा – “मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा.”

तीसरे ने कहा – “मैं अपनी मां को कॉल करूंगा.”

और इसी तरह बहुत से उत्तर आए. मगर कोच को संतुष्टि नहीं हुई.

अंत में कोच ने कहा – “अरे मूर्खों, तुम सब खिलाड़ी हो – तुम्हारे जीवन के अंतिम 15 मिनट में जान की बाजी वैसे भी लगी हुई है. जाओ और गोल दागो!”

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210

साहस

1865 में लुई पास्चर को रेशम के कीड़ों में हो रही बीमारी के बारे में पता लगाने व उसकी रोकथाम के लिए उपाय तलाशने का जिम्मा सौंपा गया. तीन वर्षों के लगातार अनथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होंने न सिर्फ उस बीमारी का पता लगाया जिससे कीड़े मर रहे थे, बल्कि इलाज भी ढूंढ निकाला.

जब लुई इस महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम दे रहे थे तब उसी दौरान एक के बाद एक उनके तीन बच्चों की मृत्यु हो गई. इस पर एक बार उनके एक मित्र ने उनके साहस की तारीफ करते हुए कहा “आपके साहस की दाद देनी पड़ेगी कि ऐसे कठिन समय में भी आपने अपना कार्य पूरा किया.”

इस पर लुई ने कहा – “मैं साहस-वाहस को तो नहीं जानता, मगर मैं अपनी जिम्मेदारी निभाना खूब जानता हूँ, और वही मैंने किया.”

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211

सुंदरता तो देखने वाले की निगाहों में होती है

अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को एक बच्ची ने जब चित्र में देखा तो अपने पिता से कहा कि राष्ट्रपति तो कुरूप हैं.

संयोग से कुछ समय बाद पिता व पुत्री को अब्राहम लिंकन से रूबरू मिलने का मौका मिल गया.

लिंकन ने जब उस प्यारी सी बच्ची को देखा तो गोद में उठा लिया और उससे प्यारी प्यारी मजेदार बातें करने लगे.

अचानक वह बच्ची मुड़ी और अपने पिता की ओर देख कर बोली – “डैडी, अपने राष्ट्रपति लिंकन बदसूरत नहीं हैं, बल्कि ये तो बड़े खूबसूरत इंसान हैं.”

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212

उम्र का गणित

एक उम्रदराज महिला जो अपने आप को जवान दिखने के लिए तमाम जतन करती रहती थी, एक बार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से मिली. और बातों बातों में जॉर्ज से पूछा – “आपकी नजरों में मेरी उम्र कितनी होगी?”

जॉर्ज ने उस महिला को ऊपर से नीचे देखा और कहा – “आपकी दाँतों के मुताबिक आपकी उम्र सोलह वर्ष है, आपके बालों के मुताबिक कोई सत्रह वर्ष, आपके चिकने गालों के अनुसार कहें तो चौदह वर्ष से बिलकुल भी अधिक नहीं.”

वह महिला बड़ी खुश हो गई और प्रसन्नता से बोली – “वाह! क्या मैं सचमुच इतने कम उम्र की लगती हूँ?”

“कम है या ज्यादा यह तो मैं नहीं जानता, परंतु मैंने अपना अंदाजा लगाया है बस आप इन सभी को जोड़ लीजिए” – जॉर्ज ने खुलासा किया.

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213

विश्व की धरोहर

कैंसर के उपचार में रेडियम के प्रभावी उपयोग की खोज करने के तुरंत बाद क्यूरी दंपत्ति के मित्रों ने सलाह दी कि इसका पेटेंट वे अपने नाम से करवा लें.

इस प्रस्ताव को दंपत्ति द्वारा सिरे से नकार दिया गया. उनका जवाब था – “यह विश्व की, मानवता की धरोहर है. और उसी की सेवा में इसका प्रयोग किया जाना चाहिए.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

453

भगवान को सिर्फ पत्थर की मूर्ति मत समझो

दक्षिणेश्वर, कलकत्ता में भगवान कृष्ण का एक भव्य मंदिर है जो आचार्य रामकृष्ण परमहंस के प्रसिद्ध काली माता मंदिर से कुछ ही दूर पर स्थित है।

एक दिन कृष्ण मंदिर के पुजारी ने देखा कि कृष्ण भगवान की मूर्ति का एक पैर टूटा हुआ है। उन्होंने तत्काल मंदिर के यजमान माथुर बाबू और रानी रस्मानी को इसकी जानकारी दी।

रानी रस्मानी ने इस मामले में कई पंडितों से परामर्श लिया। सभी लोग एक मत थे कि खंडित मूर्ति पूजा के योग्य नहीं होती, भले ही इसे ठीक कर दिया जाये। सभी ने यही परामर्श दिया कि खंडित मूर्ति की जगह एक नई मूर्ति लाकर लगायी जानी चाहिए।

रानी रस्मानी ने इस मामले में रामकृष्ण परमहंस से भी परामर्श करना उचित समझा। उन्होंने रामकृष्ण जी को पंडितों की राय से अवगत कराया। रामकृष्ण परमहंस ने धाराप्रवाह स्वर में उत्तर दिया -"हे माँ, कृपया इस बारे में पुनः विचार करें। यदि आपके दामाद किसी दुर्घटना में घायल हो जायें और उनका पैर टूट जाए तो आप क्या करेंगी? उन्हें अस्पताल ले जायेंगी या अपनी पुत्री के के लिए दूसरा वर तलाश करेंगी?"

रानी रस्मानी कोई उत्तर नहीं दे सकीं। वे रामकृष्ण परमहंस के विचार समझ गयीं और सहमत भी थीं। लेकिन टूटे हुए पैर को कैसे सही किया जाये? रामकृष्ण परमहंस ने तुरंत कहा - "आप जरा भी चिंता न करें। मैं मूर्ति का टूटा हुया पैर सही कर सकता हूं। बचपन से ही मुझे मूर्तिकला और चित्रकारी आती है।"

454

दया

एक बार एक भैंस दुर्घटनावश कीचड़ से भरे तालाब में गिर गयी और लाख प्रयत्न करने पर भी बाहर नहीं आ पा रही थी। जैसे ही वह एक पैर बाहर निकालती, दूसरा पैर कीचड़ में और गहरे धंस जाता। भैंस बाहर आने के लिए जी-जान से जुटी हुयी थी।

वहां से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति उस भैंस को निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था क्योंकि सभी को उस दलदल में स्वयं फंस जाने का भय था। कुछ शरारती बच्चे उस भैंस का संघर्ष देखकर मजे ले रहे थे।

तभी वहां से गुजर रहे एक दुर्बल से संत भैंस को बचाने के लिए तत्काल कीचड़ में कूद गए। आसपास खड़े सभी लोग अचरज से भर यह बात करने लग गए कि ये दुबले-पतले संत किस तरह इतने बड़े जानवर को बाहर निकाल पायेंगे। संत ने उनकी बातों के ऊपर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने ईश्वर से शक्ति देने की प्रार्थना की और काफी मेहनत के बाद वे भैंस को बाहर निकालने में सफल हुए।

शरारती बच्चों ने उपहास उड़ाते हुए बोले - "वाह जी वाह! आपने भी क्या खूब काम किया है। यदि आप बीच में न कूद पड़े होते तो हम लोग थोड़ी देर और आनंद ले सकते थे।"

संत ने उत्तर दिया - "मैंने भैंस को बचाकर उसके ऊपर कोई एहसान नहीं किया है। मैंने अपने दर्द को कम करने के लिए ही उस जानवर की जान बचायी है। भैंस को जान बचाने के लिए छटपटाता देख मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। अब मैं अपने दर्द से छुटकारा पा चुका हूं।" यह कहकर वह संत अपनी राह चल दिया।

किसी के दुःख को अपना दुःख समझना ही सच्ची मानता है। गांधी जी को यह भजन अत्यंत प्रिय था -

"वैष्णव जन तो तेने ही कहिए रे, पीर पराई जाने रे।"

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206

असली चेले तो गिनती के

प्रसिद्ध जेन गुरु लिन ची के मठ में जब राजा पधारे तो वहाँ शिष्यों की भीड़ देख कर चकित रह गए. उन्हें किसी ने बताया कि वहां दस हजार से ऊपर शिष्य रहते हैं.

राजा की जिज्ञासा बढ़ी तो उन्होंने स्वयं गुरु लिन ची से यह बात पूछी – “मठ में आपके कितने शिष्य हैं?”

“यही कोई तीन चार. और बहुत से बहुत पाँच” लिन ची ने जवाब दिया.

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207

मां को समर्पण

रामकृष्ण परमहंस को उनके जीवन के अंतिम समय में गले का कैंसर हो गया था. दवाइयों से कोई फर्क नहीं पड़ा और मर्ज बढ़ता गया. इसी बीच कलकत्ता के एक प्रसिद्ध विद्वान उनसे मिलने आए और बातों बातों में परमहंस से कहा – “डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं. अब एक ही आसरा है – देवी मां से प्रार्थना करें कि वे आप पर दया करें और आपको दुःख से मुक्ति प्रदान करें.”

इस बात पर परमहंस ने कहा – “शशिधर! कैसी बात कहते हो. मैं मां से भला ऐसी बात कह सकता हूँ? मैंने देवी माँ से आज तक कुछ नहीं मांगा और न आगे कभी मांगूंगा.”

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208

नीति निर्माता

कनखजूरे ने उल्लू से अपनी समस्या बताई कि उसके पैरों में दर्द रहता है और उसका उपाय पूछा.

उल्लू ने उसे भरपूर देखा और बताया – तुम्हारे तो बहुत सारे पैर हैं. तुम चूहा क्यों नहीं बन जाते. फिर तुम्हारे सिर्फ चार ही पैर हो जाएंगे. इससे तुम्हें दर्द भी पच्चीसवें हिस्से जितना होगा.

इस बात पर कनखजूरा खुश हो गया. उसने उल्लू से पूछा – कि वो चूहा कैसे बन सकता है.

मेरा काम तो तुम्हें उपाय बताना था. उपाय पर अमल में कैसे लाना है यह तो तुम देखो - उल्लू ने स्पष्ट किया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

451

अपने पास मत रखो, दान दो

एक बालक को यह समझ में नहीं आता था कि उसकी गरीब माँ दिनभर की कमाई में से आधा भोजन क्यों दान कर देती है। माँ कहा करती कि वो एक उपेक्षित बूढ़ी महिला है और सिर्फ शिव ही समझ सकते हैं कि वह ऐसा क्यों करती है। बालक ने शिव को ढूंढने का निश्चय किया ताकि वह जान सके कि उसकी माँ आधा भोजन क्यों दान कर देती हैं।

घर से चलने पर उसे एक राजा मिला जिसने एक टंकी का निर्माण कराया था किंतु वह खाली थी, एक सांप मिला जो बिल में फंसा हुआ था, एक वृक्ष मिला जिस पर फल नहीं लगते थे, एक मनुष्य मिला जिसके पैरों पर लकवा मार गया था। सभी ने उससे कहा कि सिर्फ शिव ही उनकी समस्या का हल जानते हैं।

जिस समय वह बालक भगवान शिव से मिला, उस समय वे पार्वती जी के साथ सुपारी चबा रहे थे। उन्होंने बालक को बताया कि उन सभी लोगों ने अपने लिए कुछ न कुछ बचा रखा है - राजा की एक वयस्क पुत्री है जिसका विवाह नहीं हुआ है, सांप के फन में मणि है, लकवाग्रस्त मनुष्य के पास काफी ज्ञान है, वृक्ष की जड़ों में खजाना छुपा हुआ है।

वे सभी उस बालक को आभूषण, ज्ञान, खजाना, और राजकुमारी देने को उत्सुक हैं जिसका एकमात्र कारण उसकी माँ द्वारा अर्जित पुण्य हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार पुत्री, धनसंपदा, ज्ञान और भोजन को हमेशा चलायमान रहना चाहिए। ये सभी ऐसे दान हैं जिन्हें हर मनुष्य को करना चाहिए।

452

संसार का खींच और धक्का प्रभाव

लेह ज़ू ने स्वयं मछली पकड़ना सीखने का निश्चय किया। उसने एक छड़ी ली और उस पर तार बांधने के बाद शीर्ष पर लगे हुक में चारा लगा दिया। इसके बाद वह नदी के पास गया और तार डाल दिया। कुछ समय बाद एक बड़ी सी मछली फँस गयी। लेह ज़ू ने अति उत्साहित होकर पूरी ताकत के साथ छड़ी को खींचा। तनाव के कारण छड़ी बीच से टूट गयी।

लेह ज़ू ने दोबारा प्रयास किया। इस बार भी एक बड़ी सी मछली कांटे में फँस गयी। लेह ज़ू ने इस बार इतने धीरे से छड़ी को खींचा कि मछली छूट गयी और वह फिर से खाली हाथ रह गया।

लेह ज़ू ने फिर प्रयास किया। इस बार थोड़े देर बाद मछली फंसी। लेह ज़ू ने इस बार उतनी ही ताकत से तार को खींचा जितना मछली लगा रही थी। इस बार छड़ी नहीं टूटी। मछली भी थक गयी और आसानी से बाहर खींच ली गयी।

उस शाम लेह ज़ू ने अपने शिष्यों से कहा - आज मैंने एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत जाना है कि सांसारिक शक्तियों से कैसे निपटा जाये। जब यह संसार आपको किसी दिशा में खींच रहा हो तो तुम उतनी ही ताकत से इसका विरोध करो जितनी ताकत से तुम्हें खींचा जा रहा है। यदि तुम ज्यादा ताकत का इस्तेमाल करोगे तो स्वयं को तबाह कर लोगे और यदि कम ताकत का इस्तेमाल करोगे तो संसार तुम्हें तबाह कर देगा।"

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203

फल पाने की कोशिश

एक इल्ली बेर के झाड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रही थी. वह अभी जमीन के पास तने पर ही थी, मगर वह मनोयोग से ऊपर ऊंडी डगाल पर पहुँचने का अपना अभियान जारी रखे हुए थी.

एक गौरैया ने उसे देखा तो उसका उपहास उड़ाते हुए कहा – अरे ओ बेवकूफ इल्ली, क्या तुझे इतना भी नहीं पता है कि अभी बेर के फल नहीं लगे हैं!

इल्ली ने इत्मीनान से अपना अभियान जारी रखते हुए कहा – यह तो नहीं पता, मगर मुझे बखूबी पता है कि जब मैं इस वृक्ष की ऊपरी शाखाओं तक पहुँच जाऊंगी तो वहाँ मुझे खूब सारे बेर फले हुए मिलेंगे.

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204

ईश्वरीय दयालुता

एक गाड़ीवान बहुत लंबी यात्रा पर निकला था. गर्मी अधिक थी अतएव उसके पास का सारा पानी समाप्त हो गया था और रास्ते में भी उसे कहीं पानी नहीं मिला. गरमी और प्यास के कारण उसका और उसके घोड़े का बड़ा बुरा हाल हो रहा था. इतने में उसे दूर कहीं एक झोंपड़ी दिखाई दी.

शायद झोंपड़ी में पीने को कुछ पानी मिल जाए यह सोचकर उसने गाड़ी का मुंह उस ओर मोड़ दिया.

और जब वह उस झोंपड़ी के पास पहुँचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा.

एक किशोर बड़ी सी बाल्टी और एक लोटे में शीतल जल लेकर उसका इंतजार कर रहा था.

गाड़ीवान ने लोटे के जल से अपना गला तर किया, घोड़े को पानी पिलाया और जब थोड़ी शान्ति हुई तो उसने उस किशोर को इस सेवा के बदले कुछ पैसे देने चाहे.

परंतु उस किशोर ने पैसे लेने से इंकार करते हुए कहा – मेरी मां का कहना है कि प्यासे को पानी पिलाना तो ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है. और इस सेवा का मूल्य मैं नहीं ले सकता.

गाड़ीवान को इस ईश्वरीय दयालुता आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई. वह उस किशोर का और ईश्वर का धन्यवाद करता हुआ अपनी यात्रा में आगे बढ़ चला.

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205

सच कितना कड़वा

एक देश का राजा असुंदर और काना था. एक बार उसके मन में आया कि क्यों न वह किसी अच्छे चित्रकार से अपना पोर्ट्रेट बनवाए.

एक प्रसिद्ध चित्रकार को राजा का पोर्ट्रेट चित्रित करने बुलवाया गया. चित्रकार ने सोचा कि राजा तो काना है, उसे यदि मैं काना बना दूंगा तो वह नाराज हो जाएगा और मुझे प्राणदंड दे देगा. यह सोचकर उसने राजा को सुंदर, दो आखों वाला बना दिया.

राजा ने जब यह देखा तो क्रोधित हुआ और उसे दंड दे दिया क्योंकि उसने नकली चित्र बना दिया था.

एक दूसरे देश के प्रसिद्ध चित्रकार को बुलाया गया. उस चित्रकार ने सोचा कि राजा का हूबहू चित्र बनाएगा ताकि राजा प्रसन्न होकर उसे अच्छा खासा ईनाम दें. उसने राजा का जैसे का तैसा असुंदर और काना चित्र बना दिया.

राजा ने जब यह चित्र देखा तो और क्रोधित हुआ और उसे भी दण्ड दिया क्योंकि राजा के मुताबिक चित्र में राजा ज्यादा बदसूरत और खूंखार नजर आ रहा था.

फिर एक और चित्रकार को ढूंढा गया. उसने राजा को देखा तो उसका पोर्ट्रेट बनाने से पहले अपना दिमाग लगाया.

फिर उसने बड़ी मेहनत और समय लेकर राजा का चित्र बनाया. इसे देख राजा प्रसन्न हुए. और मुंहमांगा ईनाम दिया.

चित्रकार ने इस चित्र में राजा को तीर का निशाना साधते दिखाया गया था जिसमें उनकी कानी आँख सफाई और सुंदरता से छिप गई थी.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

449

सभी को एक समान प्रेम करो

एक बार चार बच्चों की माँ ने श्री शारदा देवी से पूछा - "सभी से एक समान प्रेम कैसे करें?"

उन्होंने उत्तर दिया - "जिनसे तुम प्रेम करते हो, उनसे कोई अपेक्षा मत करो। यदि तुम उनसे कुछ मांगोगी, तो कुछ तुम्हारे ऊपर सर्वस्व न्यौछावर कर देंगे और कुछ कम देंगे। जो तुम्हें अधिक देंगे, उनसे तुम अधिक प्रेम करोगी और जो कम देंगे, उनसे कम प्रेम करोगी। इससे तुम सभी से एक समान प्रेम नहीं कर पाओगी।"

450

हाथों में हाथ लिए - पिता और पुत्री

एक छोटी बच्ची और उसके पिता एक पुल को पार कर रहे थे। चिंतित पिता ने अपनी बेटी से कहा - "बेटी, तुम मेरा हाथ कसकर पकड़ लो ताकि तुम नदी में न गिर जाओ।"

छोटी बच्ची ने कहा - "नहीं पापा, आप मेरा हाथ पकड़ लीजिए।"

पिता ने पूछा - "इससे क्या फ़र्क पड़ता है।?"

बच्ची ने उत्तर दिया - "इसमें बहुत फ़र्क है। यदि मैं आपका हाथ पकड़ती हूं और मेरे साथ कुछ घटित होता है तो संभव है कि मुझसे आपका हाथ छूट जाये। किंतु यदि आप यदि मेरा हाथ पकड़ेंगे तो चाहे कुछ भी हो जाए, आप मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे।"

गुरू नारायण जी प्रायः एक बिल्ली और बंदरिया की कहानी का उदाहरण दिया करते थे। बिल्ली अपने बच्चों को मुँह में दबाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। उसके बच्चे उस समय पूर्ण उदासीन रहते हैं तथा इस परिवहन में उनका कोई योगदान नहीं होता। सारी जिम्मेदारी बिल्ली की ही होती है। जबकि बंदरिया के बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के दौरान जोर लगाकर अपनी माँ के पेट से चिपके रहना होता है। बंदरिया अपने बच्चों को सिर्फ सहारा प्रदान करती है और बाकी कार्य उसके बच्चों को ही करना होता है।

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201

सवाल यह है कि आपकी मूर्खता कहाँ से झांकती है

महान वैज्ञानिक न्यूटन अपने हास्यबोध व हाजिरजवाबी के लिए भी जाने जाते थे. वे अपने पहनावे पर अधिक ध्यान नहीं देते थे.

एक दिन एक पार्टी में न्यूटन को किसी ने उनके पुराने कोट में हो गए छेद की ओर दिखाते हुए टोका – “सर, आपकी गरीबी आपके इस फटे पुराने कोट के इस छेद से झांक रही है.”

परंतु न्यूटन ने उन्हें अपने जवाब से शर्मसार कर दिया. न्यूटन ने कहा – “नहीं सर, दरअसल आपकी मूर्खता इस छेद के भीतर कुछ झांक लेने की कोशिश कर रही है.”

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202

प्रोफ़ेसर केल्विन की कक्षाएं

प्रोफेसर केल्विन आज अन्यत्र व्यस्त थे, और अपनी कक्षा ले नहीं सकते थे तो उन्होंने कक्षा के दरवाजे पर यह सूचना चिपका दी –

प्रोफेसर केल्विन आज अपनी classes नहीं लेंगे.

बच्चों में से किसी को शरारत सूझी तो क्लास का ई मिटा दिया. इस तरह नई इबारत हो गई –

प्रोफेसर केल्विन आज अपनी lasses नहीं लेंगे.

परंतु अगले दिन जब बच्चे अपनी कक्षा में पहुँचे तो देखते हैं कि प्रोफेसर केल्विन पहले से ही कक्षा में मौजूद हैं, और दरवाजे पर सूचना कुछ यूँ दिख रही थी –

प्रोफेसर केल्विन आज अपनी asses नहीं लेंगे.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

447

न्याय करने से इन्कार

विनम्रता और दूसरों के बारे में निर्णय देना ऐसे सबक हैं जो किसी "नैतिक शिक्षा" की कक्षा में नहीं बल्कि जीवन के साथ सीखे जाते हैं।

एक बार एक व्यक्ति ने कुछ अपराध कर दिया। न्याय करने हेतु पंचायत बुलायी गयी। गांव के एक सम्मानित वृद्ध ने पंचायत की बैठक में जाने से इन्कार कर दिया। गांव के पुजारी ने उनको बुलाने के लिए एक व्यक्ति को भेजा। उस व्यक्ति ने वृद्ध से कहा - "चलिए श्रीमान! सभी लोग आपका इंतजार कर रहे हैं।"

बड़े अनमने मन से वह वृद्ध सज्जन चलने को तैयार हुए। चलते समय उन्होंने अपने कंधे पर पानी से भरा हुआ एक जग रख लिया, जिसमें से पानी रिस रहा था।

एक व्यक्ति ने उनसे पूछा - "महोदय, यह क्या है?"

वृद्ध सज्जन ने उत्तर दिया - "मेरे पाप मेरे पीछे रहते हैं और मैं उनकी ओर नहीं देखता। लेकिन फिर भी मैं आज किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में निर्णय देने के लिए आया हूं।"

यह सुनकर पंचायत ने उस व्यक्ति को माफ कर दिया।

448

जो ऊँघ रहे हैं, उन्हें जगाओ

कुछ गंभीर और चिंतित पादरी अपने गुरू के पास पहुंचे और बोले - "यदि हम किसी व्यक्ति को चर्च में ऊंघता हुआ पायें, तो हमें उसे जगाना चाहिए ताकि वह चर्च में ध्यानपूर्वक बैठे।"

गुरू जी ने धीरे से कहा - "यदि मैं अपने किसी भाई को ऊंघता हुआ पाता हूं तो उसका सिर अपने घुटनों पर रख लेता हूं ताकि वह चैन से आराम कर सके।"

मानवीयता ही सर्वोपरि गुण है।

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196

मुर्गे की बांग

दड़बे का एकमात्र मुर्गा बुरी तरह बीमार हो गया. वह आँखें भी नहीं खोल पा रहा था. दड़बे की सारी मुर्गियाँ बेहद चिंतित हो गईं.

मुर्गियों ने जब से होश सम्हाला था, यह देखा था कि सुबह जब मुर्गा बांग देता है तभी सूरज उगता है.

सूरज डूब चुका था, और इधर मुर्गे की तबीयत खराब थी. वह बांग देने लायक स्थिति में नहीं था.

सभी मुर्गियाँ मुर्गे को घेरकर पूरी रात खड़ी रहीं. दुश्चिंता में घिरी रहीं कि मुर्गा यदि अब उठेगा नहीं, बांग नहीं देगा तो सूरज निकलेगा नहीं और इस तरह से प्रलय आ जाएगी.

मगर यथासमय सूरज उग आया. मुर्गियों के भ्रम का सदा सर्वदा के लिए निवारण हो गया.

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197

हनुमान चालीसा -3

आपन तेज सम्हारो आपे

तीनो लोक हांक ते कांपे

आपके (हर सृजनधर्मी व्यक्ति का) प्रताप (आपकी सृजनात्मकता) को आपके सिवाय कोई नहीं रोक सकता. जब आप दहाड़ते (सृजन करते हैं) हैं तो तीनों लोकों में उसकी गूंज सुनाई देती है.

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198

भिखमंगा अकबर

मुसलिम संत फरीद अपने गांव की खुशहाली के लिए कुछ दान दक्षिणा मांगने अकबर बादशाह के दरबार में जा पहुँचा.

जब वह दरबार में पहुँचा तो उसने पाया कि अकबर खुदा से दुआ कर रहा है और प्रार्थना कर रहा है.

फरीद ने बादशाह से पूछा कि वो क्या दुआ कर रहे थे.

बादशाह ने बताया कि वे अपनी खुशहाली, प्रसन्नता और धन-धान्य के लिए खुदा से दुआ कर रहे थे.

यह सुनते ही संत फरीद ने कहा – मैं बादशाह के दरवाजे पर आया था. मगर यहाँ तो औरों की तरह एक भिखमंगा बैठा हुआ है. और वे दरबार से उलटे पाँव वापस लौट गए.

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199

अपने आप को बदलो

बुद्ध का एक शिष्य था जो हर हमेशा दूसरों की बुराईयाँ निकालता रहता था.

एक दिन बुद्ध ने उसे बुलाया और कहा कि बाहर जाकर कुछ फल ले आए.

बाहर बरसात हो रही थी, और सर्वत्र कीचड़ था. शिष्य ने कीचड़ से बचने के लिए पादुका पहनी और जाने लगा.

बुद्ध ने शिष्य से पूछा - तुमने पादुका क्यों पहनी?

कीचड़ से बचने - शिष्य ने कहा.

कीचड़ से बचने के लिए तुम सिर्फ अपने ही पैर में पादुका क्यों पहनते हो? तुम पूरी धरती के ऊपर चटाई क्यों नहीं बिछा देते हो?

दूसरों में बुराइयाँ देखने के बजाए स्वयं को खंगालें, और दूसरों को बदलने के बजाए स्वयं बदलें.

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200

बच्चे और फूल

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ सौंदर्य प्रेमी थे. उनका मानना था कि जीवन में साहित्य और सुंदरता का अभिन्न स्थान होता है.

एक बार उनके एक मेहमान ने उनसे कहा – “आपको फूल बड़े अच्छे लगते हैं, मगर आपने अपने इस सुंदर से ड्राइंग रूम में एक भी गुलदस्ता नहीं रखा है. जबकि आपका बग़ीचा फूलों से लदा पड़ा है.”

“तुम ठीक कहते हो” – जॉर्ज ने आगे कहा – “परंतु मुझे बच्चे भी बड़े प्यारे लगते हैं!”

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

445

अनकहा सुनो

एक व्यक्ति, जिसकी शादी टूटने के कगार पर थी, स्वामी जी के पास परामर्श लेने पहुंचा। स्वामी जी ने उससे कहा - "तुम्हें अपनी पत्नी की बातों को सुनना सीखना चाहिए।"

उस व्यक्ति ने स्वामीजी के परामर्श का अक्षरशः पालन किया और एक महीने के बाद यह बताने के लिए लौटा कि उसने अपनी पत्नी के प्रत्येक शब्द को सुनने का अभ्यास कर लिया है।

स्वामी जी ने उससे मुस्कराते हुए कहा - "अब फिर अपने घर जाओ और पत्नी के अनकहे शब्दों को सुनो।"

अदृश्य को देखो, अनकहा सुनो, अस्वीकृत को स्वीकृत करो,

रुके हुए कार्य पूरे करो।

446

अच्छे और बुरे व्यक्ति की तलाश

एक प्रश्न का उत्तर ज्ञात करने के लिए कृष्ण और भीष्म ने एक तरीका खोजा।

उन्होंने एक दिन सुबह के समय दुर्योधन को अपने पास बुलाया और कहा कि वह आज अपने पूरे राज्य में भ्रमण करे और सूर्यास्त होने तक एक अच्छे व्यक्ति को ढ़ूंढ कर अपने साथ लाये।

फिर उन्होंने युधिष्ठिर को अपने पास बुलाया और कहा कि वह आज अपने पूरे राज्य में भ्रमण करे और सूर्यास्त होने तक एक बुरे व्यक्ति को ढ़ूंढ कर अपने साथ लाये।

सूर्यास्त के वक्त दोनों, युधिष्ठिर और दुर्योधन, खाली हाथ लौट आये और बोले कि वे सारे राज्य में ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं खोज सके।

हम जैसे स्वयं होते हैं, वैसा ही दुनिया को पाते हैं।

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192

आप कितने मूर्ख हैं?

मुल्ला को रंगे हाथों पकड़ लिया गया. वह अनाज की दुकान में दूसरे ग्राहक के थैले से गेहूँ निकाल कर अपने थैले में भर रहा था.

उसे न्यायाधीश के सामने ले जाया गया.

तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है? – न्यायाधीश ने मुल्ला से पूछा.

मैं तो मूर्ख हूँ, मुझे अपने व उसके गेहूँ में कोई फर्क नहीं नजर आया था – मुल्ला ने सफाई दी.

तब तुमने अपने थैले से गेहूँ निकाल कर दूसरे ग्राहक के थैले में क्यों नहीं डाली? – न्यायाधीश ने जिरह की.

आह! - मुल्ला ने प्रतिवाद किया – मैं इतना मूर्ख भी नहीं हूँ!

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193

तेरी दुनिया में सब सर्वश्रेष्ठ है.

ज्ञान की खोज में एक संत भटक रहा था. भटकते हुए वह कसाई की दुकान के सामने जा पहुँचा. भीतर वार्तालाप चल रहा था.

ग्राहक – मुझे बकरे का सबसे बढ़िया मांस चाहिए.

कसाई – मेरी दुकान में सबसे बढ़िया मांस ही मिलता है. यदि सबसे बढ़िया नहीं होगा तो वह मेरी दुकान में नहीं मिलेगा.

संत के ज्ञान चक्षु में प्रकाश चमक गया.

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194

गांधी जी का 1 मिनट

गांधी जी के सामने महादेव भाई (1917 से 1942 तक गांधी जी के निजी सचिव) बैठे थे. गांधी जी ने उनसे समय पूछा.

महादेव भाई ने बताया – पाँच बजे हैं.

इतने में गांधी जी को महादेव भाई की घड़ी दिख गई. उसमें अभी पाँच बजने में एक मिनट बाकी था.

बस फिर क्या था – गांधी जी ने महादेव भाई को एक एक मिनट की महत्ता के बारे में बताया, इस बात पर भी प्रश्न किया कि क्या सही समय, पाँच बजने में एक मिनट बचे हैं बताने में क्या जोर लगता?

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195

ईश्वर हमें कष्ट दे, परेशानी दे

महाभारत के युद्ध के पश्चात् भगवान कृष्ण वापस द्वारका जा रहे थे. चलते चलते उन्होंने अपनी माता से आशीर्वाद लिए और उनसे पूछा कि वे उनकी क्या सेवा कर सकते हैं.

माता ने जवाब दिया – तुम मुझे कष्ट दो, परेशानी दो.

कृष्ण को अचरज हुआ. बोले – माता, ऐसा क्यों कह रही हैं!

क्योंकि कष्ट और परेशानी में ही तुम याद आओगे और उनका निवारण करने तुम मेरे पास रहोगे – माता ने स्पष्ट किया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

443

ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग

एक शिष्य ने पूछा - "ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग कठिन है या सरल?"

उत्तर मिला - "इनमें से कोई नहीं।"

शिष्य ने फिर पूछा - "ऐसा क्यों?"

"क्योंकि ऐसा कोई मार्ग है ही नहीं।"

"तो फिर कोई मनुष्य अपने लक्ष्य तक कैसे पहुंचेगा?"

"कैसे भी नहीं। यह कभी न खत्म होने वाली यात्रा है। जैसे ही तुम यात्रा करना छोड़ दोगे, पहुंच जाओगे।" - उत्तर मिला।

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444

यात्रा और गंतव्य - सिद्धाबरी के स्वामीजी

स्वामी चिन्मयानंद जी परम ज्ञानी, सिद्धांत-परायण एवं सदाचारी संत थे। उनका आश्रम उत्तर दिशा में बर्फीले पर्वतों पर सिद्धाबरी नामक जगह पर स्थित था। उन्होंने दिल्ली में गीता ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया। लखनऊ के रहने वाले श्री सुरेश पंत उनके परम शिष्य बन गए थे। सुरेश एम.बी.ए. डिग्री धारक थे एवं अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कृतसंकल्प थे। स्वामी जी की ओर सुरेश चुंबकीय आकर्षण रखते थे और उनका शिष्य बनकर स्वयं संन्यासी बनना चाहते थे। उन्होंने स्वामी जी के साथ सिद्धाबरी जाने का निश्चय किया।

सिद्धाबरी से 30 किमी. पूर्व स्वामी जी कार से उतर गए और बोले - "सुरेश! आओ यहां से हम लोग पैदल चलें।" सुरेश भी कार से उतर गए और बोले - "कहां?" स्वामीजी ने उतर दिया - "आश्रम।" सुरेश ने कहा - "किंतु आप तो कह रहे थे कि यह सड़क सीधे सिद्धाबरी जाती है। तो क्यों न हम लोग कार से चलें? इससे हम लोग जल्दी पहुंच जायेंगे और मैं बिना वक्त गंवाए अपनी शिक्षा-दीक्षा शुरू कर दूंगा। स्वामी जी बोले - "चलो पैदल ही चलते हैं।" सुरेश उनके साथ चलने लगा।

स्वामी जी 65 वर्ष के थे। वे दुर्बल किंतु फुर्तीले थे। वे अपनी चहलकदमी का पूरा आनंद ले रहे थे। कुछ देर तक चलने के बाद सुरेश ऊब गए। वे एक वृक्ष के पास रुके और सुरेश ने पूछा - "स्वामी जी, यहां से आश्रम कितना दूर है?" स्वामी जी बोले - "इस पेड़ पर लगे सूबसूरत सफेद फूलों को देखो। ये कितने सुंदर हैं।" वे लोग चलते रहे और एक नदी के प्रपात के पास पहुंचे। सुरेश ने पूछा - "स्वामी जी, हम लोग सिद्धाबरी कब तक पहुंच जायेंगे?" स्वामी जी मुस्कराते हुए बोले -"सुरेश! तुमने इस जलप्रपात का संगीत सुना? कितना कर्णप्रिय है?" वे चलते रहे।

वे लोग पश्चिम दिशा की ओर बढ़ते रहे। सुरेश ने फिर पूछा - "अब आश्रम कितनी दूर है? स्वामी जी ने आँखें मटकाते हुए उत्तर दिया - "सुरेश, वो देखो सूरज अस्त होते समय कितना सुंदर लग रहा है।" सुरेश रुककर स्वामीजी को देखने लगा और विस्मय से बोला - "स्वामी जी, निश्चित रूप से कुछ गड़बड़ है। या तो मैं गलत हूं या आप। मैं आपसे जो कुछ भी पूछ रहा हूं, आप उसका सही से उत्तर नहीं दे रहे हैं।"

स्वामीजी ने सहानुभूति पूर्वक उत्तर दिया - "मेरे बच्चे! तुम सिर्फ गंतव्य की ओर ध्यान दे रहे हो और मैं तुम्हें यात्रा मनोरंजक करने के तरीके बता रहा हूं।"

यात्रा अपने आप में एक मनोरंजन है।

गंतव्य या लक्ष्य तो सिर्फ एक बिंदु है।

यात्रा के दौरान प्रत्येक चरण का आनंद लो।

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190

पाँच महंत

दक्षिण के लामा ने उत्तर के लामा को संदेश भेजा कि उनके क्षेत्र में बौद्ध धर्म के बारे में लोगों को जागरूक करने हेतु एक महंत भेज दें.

प्रत्युत्तर में उत्तर के लामा ने एक के बजाए पाँच महंत भेज दिए.

पांचों महंतों ने दक्षिण की अपनी लंबी यात्रा प्रारंभ की.

रास्ते में महंतों ने एक गांव में रात्रि बिताई. उस गांव का पादरी पिछले दिनों शांत हो गया था और गांव वासी अपने गिरिजाघर के लिए एक पादरी की तलाश कर रहे थे. पादरी की तनख्वाह अच्छी खासी थी.

पाँच में से एक महंत ने गांव के पादरी की भूमिका स्वीकार ली. उसने कहा – यदि मैं इन ग्रामीणों की आवश्यकताओं को नहीं समझूंगा और उनकी सहायता नहीं करूंगा तो मैं पक्का बौद्ध कैसे कहलाऊंगा. अतः मैं अब से इस गांव को अपनी सेवाएं दूंगा.

बाकी बचे चारों महंत आगे बढ़ चले. रास्ते में एक राज्य के राजा ने महंतों का एक रात्रि के लिए आतिथ्य किया. सुबह जब चारों चलने लगे तो राजा ने उनमें से एक महंत से कहा – आप यहीं रुक जाएं, और राज्य की न्याय व्यवस्था में अपना योगदान दें. मेरी इकलौती बेटी राजकुमारी विवाह योग्य है आप उनके लिए उपयुक्त वर प्रतीत होते हैं, उनसे विवाह कर लें. तब आप मेरी मृत्यु के पश्चात आप ही इस राज्य के उत्तराधिकारी होंगे.

उस महंत ने अपने साथी महंतों से कहा – यदि मैं राजा का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेता हूं तो मैं पूरे राज्य में अपने धर्म का डंका बजवा सकता हूँ. यदि मैं यह दायित्व नहीं स्वीकारता हूँ तो मैं पक्का बौद्ध कैसे कहलाऊंगा.

बाकी के तीन महंत आगे बढ़ चले. और कुछ इसी तरह के किस्से बाकी के अन्य दो महंतों के साथ भी हुआ और वे वहीं बीच में साथ छोड़ते गए.

अंत में एक महंत बच रहा. वह एकमात्र ही दक्षिणी क्षेत्र के लामा के पास पहुँचा.

अपने लक्ष्यों को बहुत से अन्य अतिआवश्यक (आकर्षक?) कारणों के कारण हम बीच में छोड़ देते हैं. और, कर्मकांड तो वास्तव में ईश्वर से दूर भागने का लोकप्रिय तरीका है. और आज यह सर्वाधिक फलते-फूलते उद्योग में भी शामिल हो गया है – जहाँ इनपुट न्यूनतम है और आउटपुट अकल्पनीय अधिकतम!

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191

एक बार में बस एक कदम

रात्रि हो चली थी. अंधकार अपना साम्राज्य फैला चुका था. एक तीर्थ यात्री चाहता था कि वह रात्रि में ही पहाड़ी स्थित मंदिर का दर्शन कर लौट आए, तो सुबह वह वापस अपने गांव जाने वाली एकमात्र गाड़ी को समय पर पकड़ लेगा.

उसने पास ही एक कुटिया में रह रहे बुजुर्गवार से पूछा कि रौशनी की कोई व्यवस्था हो सकती है क्या.

बुजुर्गवार ने अपना टिमटिमाता लालटेन उसे थमा दिया. लालटेन की लौ बेहद धीमी थी और बमुश्किल दो कदम अँधेरा छंट रहा था.

तीर्थयात्री ने बुजुर्गवार से कहा – बाबा, इस लालटेन की रौशनी तो सिर्फ दो कदम तक ही मिलती है. आगे तो अँधेरा ही छाया रहता है, और आगे दिखता कुछ नहीं.

बुजुर्गवार ने तीर्थयात्री की ओर एक गहन दृष्टि डाली और कहा – बेटे, मुझे तो नहीं लगता कि तुम एक बार में एक से ज्यादा कदम भर पाते होगे!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

इंटरनेट में एक दिन में बहुत कुछ घट जाता है. जरा नीचे दिए चित्र (साभार - टेकरिपब्लिक ब्लॉग) को देखें और अपने दांतों तले अपनी उंगली दबाएं! - टीप- चित्र आकार में बड़ा है इसलिए लोड होने में समय ले सकता है.

 

और, आखिरी ग्राफिक्स को ध्यान से देखिए. एक दिन में 3.71 लाख बच्चे जन्म लेते हैं, जबकि उतने ही समय में 3.78 लाख आईफ़ोन की बिक्री हो जाती है. यानी आने वाले किसी समय में दुनिया के हर आदमी - जी हाँ, हर आदमी के हाथ में एक से अधिक आईफ़ोन होगा!

हमारे देश के केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि भारत में स्त्रियों को टॉयलेट नहीं, मोबाइल फ़ोन ज्यादा जरूरी होता है, तो, इन आंकड़ों के हिसाब से क्या वो गलत कहते हैं?

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

440

कभी अपने सपनों को मत छोड़ो

एक बार की बात है, छोटे मेंढकों का एक समूह था। उनके मध्य एक दौड़ प्रतियोगिता की घोषणा हुयी। एक बहुत ऊँची मीनार के शीर्ष पर पहुँचना उनका लक्ष्य था। मीनार के चारों ओर इस दौड़ को देखने के लिए काफी संख्या में भीड़ एकत्र हो गयी।

आखिरकार दौड़ शुरू हुयी।

भीड़ में सभी को यही उम्मीद थी कि कोई भी मेंढक मीनार के शीर्ष तक नहीं पहुंच पायेगा। सभी तरफ से यही आवाजें सुनाई दे रहीं थीं - "शायद ही कोई ऊपर तक पहुंच पाए! वे लोग कभी भी ऊपर तक नहीं पहुंच पायेंगे! कहाँ इतनी ऊँची मीनार और कहाँ छोटे से मेंढक!....."

धीरे - धीरे छोटे मेंढक क्रमशः गिरना शुरू हो गए। परंतु उनमें से कुछ मेंढक जोश और ऊर्जा से भरे हुए थे। वे चढ़ते रहे।

भीड़ की ओर से निरंतर यही सुनायी दे रहा था - "ऊपर तक पहुंचना तो असंभव है।"

अब तक कई मेंढक थक चुके थे और हार मान चुके थे। लेकिन एक मेंढक लगातार ऊपर चढ़ता रहा। वह हार मानने वाला नहीं लग रहा था।

अंत में सभी मेंढकों ने हार मान ली, सिवाए एक छोटे मेंढक के। काफी प्रयासों के बाद वह मीनार के शीर्ष तक पहुँच गया। सभी छोटे मेंढक उसकी सफलता का राज़ जानना चाहते थे।

एक मेंढक ने विजेता से पूछा कि आखिर उसने मीनार के शीर्ष तक पहुंचने का साहस कैसे जुटाया?

बाद में पता चला कि वह मेंढक तो बहरा था। दूसरों की हताशा और निराशा से भरी बातों को कभी मत सुनें क्योंकि वे आपसे आपके सपनों को छीन सकते हैं। आपके दिल में जो भी अरमान हो, उसे पूरा करने के लिए हमेशा सकारात्मक बातें करें। क्योंकि जो भी बातें आप सोचते और सुनते हैं, उनका आपके ऊपर प्रभाव पड़ता है।

अतः हमेशा सकारात्मक सोचें। और जब भी कोई आपके सपनों को लेकर नकारात्मक बातें करे तो उस पर कभी ध्यान न दें।

441

काँटों के बिना गुलाब नहीं

एक बार राजा भोज ने अपनी प्रजा को शानदार दावत दी। लाखों लोग दावत में शरीक हुये और उन्होंने स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठाया। सभी से अपने बारे में खुशामद और चाटुकारिता पूर्ण बातें सुनकर राजा भोज को गर्व महसूस हुआ।

सायंकाल राजधानी के मुख्य द्वार पर कुछ लोगों को अपने सिर पर लकड़ियों का गठ्ठर ले जाता एक लकड़हारा दिखायी दिया। लोगों ने उससे कहा - "अरे क्या तुम्हें यह नहीं पता कि आज राजा भोज ने सारी प्रजा को शानदार दावत दी थी? तुम व्यर्थ ही मेहनत करते रहे।"

लकड़हारे ने उत्तर दिया - "जी नहीं, मुझे आज के भोज के बारे में पूरी जानकारी थी। लेकिन यदि मैं मेहनत करके अपने भोजन का प्रबंध कर सकता हूँ तो दावत की परवाह क्यों करूं? परिश्रम की सूखी रोटी का आनंद मुफ्त के पकवानों में कहाँ?"

442

धार्मिक शास्त्रार्थ

कुछ शताब्दी पूर्व, ईसाईयों के धर्मगुरू पोप ने यह घोषणा की कि सारे यहूदियों को इटली छोड़ना पड़ेगा। यह सुनकर सारे यहूदियों में आक्रोश फैल गया। तब पोप ने यहूदियों के सामने एक शर्त रखी। उनके साथ किसी भी यहूदी नेता को धार्मिक शास्त्रार्थ करना था। शर्त यह थी कि यदि यहूदी नेता जीते तो उन्हें इटली में रहने का अनुमति होगी और यदि हारे तो इटली छोड़ना पड़ेगा।

यहूदी समुदाय ने आपसी विचार-विमर्श करके वयोवृद्ध रब्बी मोज़ी को शास्त्रार्थ में उनकी ओर से भाग लेने के लिए चुना। रब्बी मोज़ी लैटिन बोलना नहीं जानते थे और पोप को यहूदी भाषा बोलना नहीं आता था। इसलिए यह तय हुआ कि शास्त्रार्थ मौन रूप से होगा।

शास्त्रार्थ वाले दिन रब्बी और पोप एक दूसरे के सामने बैठ गए। पोप ने हाथ उठाकर तीन अंगुलियाँ दिख्रायीं।

रब्बी मोज़ी ने पीछे देखा और एक अंगुली दिखायी।

इसके बाद पोप ने अपने सिर के चारों ओर अंगुली घुमायी।

रब्बी ने अपनी अंगुली से जमीन की ओर इशारा किया।

फिर पोप कुछ चिप्स और शराब का प्याला लेकर आये।

रब्बी ने एक सेब को उठा लिया।

यह देखते ही पोप खड़े हो गए और बोले - "मैं शास्त्रार्थ में हार स्वीकार करता हूं। यहूदी यहाँ रह सकते हैं।"

बाद में कई कार्डिनल पोप के इर्द-गिर्द एकत्रित हो गए और उनसे पूछा कि आखिर क्या बात हुयी है?

पोप ने कहा - "सबसे पहले मैंने तीन अंगुली उठाकर ट्रिनिटी या त्रित्व की ओर इशारा किया। इसके उत्तर में उसने एक अंगुली उठाकर मुझे याद दिलाया कि हम दोनों समुदायों का ईश्वर एक ही है। इसके बाद मैंने अपने सिर के चारों ओर अंगुली घुमाकर यह इशारा किया कि ईश्वर हमारे चारों ओर है। इसके उत्तर में उसने अपनी अंगुली से धरती की ओर इशारा करते हुए बताया कि ईश्वर हमारे साथ वहां भी मौजूद है। मैंने शराब और चिप्स उठाकर उसे यह बताया कि ईश्वर ने हमारे पापों को माफ कर दिया है। इसके उत्तर में उसने सेब उठाकर मुझे मनुष्य के मूल पाप की याद दिलायी। उसके पास मेरे सभी प्रश्नों के उत्तर थे। आखिर मैं और कर भी क्या सकता था?"

इसीबीच, यहूदी समुदाय के लोग भी रब्बी के चारों ओर एकत्रित हो गए और पूछने लगे कि क्या हुआ?

रब्बी ने उत्तर दिया - "सबसे पहले उसने मुझे तीन अंगुलियाँ दिखाकर यह कहा कि तीन दिन में हमें इटली छोड़कर जाना होगा। मैंने उत्तर दिया कि यह आपके ऊपर है। फिर उन्होंने मुझसे कहा कि सारा शहर यहूदियों से खाली हो जाएगा। मैंने धरती की ओर अंगुली दिखा कर उनसे साफ-साफ कह दिया कि हम लोग यहीं रहेंगे।"

तभी एक औरत ने उनसे पूछा - "और फिर?"

रब्बी ने उत्तर दिया - " क्या पता? फिर खाना-पीना शुरू हो गया।

एक ही घटना को दो व्यक्ति अलग नजरिए से देख सकते हैं।

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मरूद्यान और ऋषि

एक रेगिस्तानी गांव के पास एक सदा हरा भरा रहने वाला मरुद्यान था. वहाँ पर एक कुंआ भी था जो कभी सूखता नहीं था. सूखा और ग्रीष्म में ग्रामीण उस पर निर्भर हो जाते थे.

एक बार एक ऋषि मरूद्यान पहुँचे और वहाँ उन्होंने अपना डेरा जमाया. कुछ दिनों के बाद ऋषि के कई शिष्य वहाँ रहने आ गए. धीरे से डेरा विशाल आश्रम बन गया.

गर्मी में जब गांव में पानी की किल्लत हुई तो ग्रामीण आदतानुसार मरुद्यान के कुएं पर पहुँचे तो ऋषि के शिष्यों ने ग्रामीणों को खदेड़ दिया.

कुछ समय बाद ऋषि के मठ से व्यवसाय प्रारंभ हो गया. मरुद्यान के उत्पादों को ग्रामीणों को विक्रय करने लगे. ऋषि का व्यवसाय फलने फूलने लगा.

ग्रामीणों ने अवृष्टि और भूख के कारण अपनी जमीनें ऋषि को गिरवी रख दीं.

बहुत समय बीत गया. कई वर्षों बाद गांव के एक निवासी को जब यह सब देखा नहीं गया तो उसने ऋषि और उनके शिष्यों के प्रति विद्रोह कर दिया. उसने अपने कुछ साथियों को लेकर ऋषि व उनके चेलों का शक्ति से प्रतिकार किया और उनके द्वारा हड़पी गई सम्पत्ति से उन्हें बेदखल कर दिया. चेले भाग गए और ऋषि का नामलेवा

मरुद्यान में फिर जान आ गई थी और गांव फिर से हरा भरा हो गया था.

हममें से बहुत से गुरुओं की शरण में जाकर अपना मन गिरवी रख देते हैं. इससे उद्धार नहीं हो सकता. उद्धार तो मुक्ति से ही संभव है. आपका मन जो आपकी अपनी सम्पत्ति है उसे किसी दूसरे के हाथ गिरवी कैसे रख सकते हैं?

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असली सुख

एक धनी आदमी संत शेनगाई के पास पहुँचा और उनसे प्रार्थना की कि उनके व उनके परिवार के सदा सर्वदा खुशहाली के लिए आशीर्वाद दें.

शेनगाई ने एक कागज का टुकड़ा लिया और उसमें लिखा – पिता मरे, पुत्र मरे, पौत्र मरे. और फिर यह कागज का टुकड़ा उस धनी आदमी को दे दिया.

उस धनी आदमी ने इसे पढ़ा तो उसका माथा खराब हो गया. क्रोधित हो उसने संत से कहा – मैं आपसे आशीर्वाद मांगने आया हूँ और आप मुझसे ठिठोली कर रहे हैं. यह किस किस्म का मजाक है?

संत ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया – यह कोई मजाक नहीं है. यदि तुम्हारे सामने तुम्हारा पुत्र मर जाए, तुम्हारा पौत्र मर जाए तो तुम्हें क्या खुशी होगी? नहीं न? तो यही आशीर्वाद तो मैंने तुम्हें दिया है. प्रकृति के मुताबिक पहले पिता मरे, फिर पुत्र फिर पौत्र. यही असली सुख और खुशहाली है.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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