टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

January 2012

 

sunil handa story book stories from here and there in Hindi

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

383

अनुकूलन

एक नौजवान ने विरासत में मिली अपनी सारी दौलत गंवा दी। जैसा कि ऐसे मामलों में अक्सर होता है, गरीब होते ही उसके सभी मित्र भी उससे किनारा कर गए।

अपनी बुद्धि के अनुसार वह एक स्वामी जी की शरण में पहुंचा और उनसे बोला - "मेरा अब क्या होगा? न मेरे पास धन है, न ही मित्र।"

स्वामी जी ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा - "चिंता मत करो बेटे। मेरे शब्दों को याद रखना। कुछ दिनों में सब कुछ ठीक हो जायेगा।"

नौजवान की आँखों में आशा की किरण दिखायी दी। उसने पूछा - "क्या मैं फिर से धनवान हो जाऊंगा?"

स्वामी जी ने उत्तर दिया - "नहीं। तुम्हें गरीबी और अकेले रहने की आदत हो जायेगी।"

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384

सत्य और असत्य

एक बार एक आदमी की परछाई ने उससे कहा - "यह देखो। मैं तुमसे कितने गुना बड़ी हो गयी हूं और तुम जैसे थे वैसे ही हो।"

कुछ देर चुप रहने के बाद वह व्यक्ति बोला - "यही सत्य और असत्य के बीच का फ़र्क है। सत्य जितना है, उतना ही रहता है और असत्य पल-पल में घटता-बढ़ता रहता है।"

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127

अर्थ का अर्थ

एक गुरु के आश्रम में ज्ञान चर्चा के लिए एक बड़े अधिकारी पधारे. आरंभिक दुआ-सलाम के बाद अधिकारी ने गुरु से पूछा “गुरुदेव कृपा कर बताएँ कि हमारे दैनिक जीवन में हमारे सामने रहते हुए भी वह क्या चीज है जिसे हम देख नहीं पाते हैं”

गुरु शांत रहे. उन्होंने अधिकारी को नाश्ते में फल दिए. पीने को पेय प्रस्तुत किया. खान-पान के बाद यह सोचकर कि गुरु ने शायद उनके प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया, अपना प्रश्न फिर से दोहराया.

“बिलकुल सही,” गुरु ने अब अपना मुंह खोला – “इसका यही अर्थ है – हालाकि अपने दैनिक जीवन में वह रहता है, मगर फिर भी हम देख नहीं पाते हैं!”

 

ज्ञानी बोलते नहीं,

जो बोलते हैं जानते नहीं,

बुद्धिमान मौन रहते हैं,

चतुर थोड़ा बोलते हैं,

मूर्ख बहस करते हैं

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128

मैं असली हूँ!

पूरा परिवार रेस्त्राँ में खाना खाने गया. जब वे टेबल पर अपने-अपने स्थान पर बैठ गए तो वेटर खाने का आर्डर लेने आया.

सब अपनी पसंद की चीजें लिखवाने लगे.

एक बच्चे ने अपनी पसंद लिखवाया – मेरे लिए हॉट डॉग!

परंतु उसकी माँ ने प्रतिवाद किया – नहीं, कोई हॉट डॉग नहीं. इसके लिए सादी रोटी और दाल ले आओ.

मगर वेटर ने माँ की बात नहीं सुनी और बच्चे से बोला – बेटे, हॉट डॉग में आप कैचप लेना पसंद करेंगे या जीरा चटनी?

बच्चे ने खुश होकर कहा – कैचप!

वेटर आदेश लेकर चला गया. बड़े-बूढ़ों में सन्नाटा छा गया.

इधर बच्चा खुशी से चिल्लाया – “देखा! वेटर मुझे असली समझता है!”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

381

व्यावहारिकता

एक शिष्या अपने विवाह की तैयारियों में लगी हुयी थी। इस अवसर पर होने वाले प्रीतिभोज के लिए उसने घोषणा की कि गरीबों के प्रति अगाध प्रेम के कारण उसने यह तय किया है कि समारोह में सबसे आगे की पंक्तियों में गरीब लोग ही बैठेंगे और अमीर मेहमान पीछे की पंक्तियों में रहेंगे। भोजन में भी यही क्रम रहेगा।

यह बात कहकर उसने अपने गुरूजी की आँखों में देखा तथा उनकी स्वीकृति चाही।

गुरूजी ने एक पल विचार करने के बाद कहा -"मेरे विचार से यह सर्वथा ग़लत होगा। किसी को भी विवाह समारोह में मजा नहीं आएगा। तुम्हारे परिवार को शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी। तुम्हारे अमीर मेहमानों को अपमान महसूस होगा और गरीब मेहमान भी बेझिझक भोजन नहीं कर पायेंगे।"

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382

ड्यूटी का बहाना

एक गुरूजी ने राज्यपाल को सख्त शिकायती पत्र लिखकर यह आपत्ति जतायी कि नस्लभेद विरोधी शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया है।

राज्यपाल ने पत्र लिखकर यह उत्तर दिया कि उन्होंने सिर्फ अपनी ड्यूटी की है।

गुरूजी बोले - "जब भी कोई बेवकूफ व्यक्ति गलती करता है तो उस पर शर्मिंदा होने की बजाए वह यही कहता है कि यह उसकी ड्यूटी थी।"

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126

मदर टेरेसा की 3 कहानियाँ

(1)

एक बार मदर टेरेसा के आश्रम में दो व्यक्ति उनसे मिलने एक ही वक्त पर पहुँचे. पहला व्यक्ति धनी था और मदर की चैरिटी के लिए बहुत सा धन देने के इरादे से आया था. उसे विश्वास था कि चैरिटी में उन्हें हाथों हाथ लिया जाएगा और उनका गर्मागर्म स्वागत होगा. दूसरा व्यक्ति निम्नवर्गीय था जो अपनी नौकरी की पहली तनख्वाह मदर टेरेसा को अर्पित करने आया था. दरअसल वह युवक बहुत दिनों से बेरोजगार था, और उसने सोचा था कि पहली तनख्वाह पर वो कोई अच्छा काम करेगा.

मदर टेरेसा ने निम्नवर्गीय व्यक्ति को पहले बुलावा भेजा. और उनसे कहा कि वह अपनी पहली तनख्वाह चैरिटी को देने के बजाए अपनी माँ को अर्पित करे. मगर उस युवक ने बताया कि उनकी माँ ने ही उन्हें इसके लिए प्रेरणा दी है, और साथ ही उनकी बहन ने भी इसके लिए सहमति दी है.

यह सुनकर मदर टेरेसा की आंखें नम हो गईं.

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(2)

मदर टेरेसा अपनी जन्मभूमि देश – अल्बानिया में अपना एक आश्रम खोलना चाहती थीं. अल्बानिया को पूरे विश्व में ऐसा पहला देश होने का सौभाग्य है जो पूरी तरह नास्तिक देश बना. वहां की राजाज्ञा के अनुरूप तमाम चर्च, मस्जिद, मंदिर और अन्य धर्मस्थल बन्द कर दिए गये थे. 1946 में कम्यूनिस्टों ने किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगा दी थी.

परंतु अल्बानिया के शासकों ने मदर टेरेसा का मिशनरीज ऑफ चैरिटी का एक आश्रम खोलने के प्रस्ताव का न सिर्फ स्वागत किया, बल्कि उन्हें मदर टेरेसा ऑफ अल्बानिया का खिताब भी दिया और 1991 में चैरिटी का शुभारंभ भी हो गया.

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(3)

मदर टेरेसा न सिर्फ सादगी की मिसाल थीं, बल्कि दीन-दुखियों की सहायता करने में भी वे बेमिसाल थीं.

जब पोप भारत यात्रा पर आए, तो मदर टेरेसा से मिले. जाते जाते उन्होंने अपनी कार, जिसका उन्होंने भारत यात्रा में प्रयोग किया था, मदर टेरेसा को भेंट कर दिया. मदर टेरेसा के लिए वह कार बेहद अहम और बहुमूल्य था. परंतु उन्होंने उस कार को नीलाम करवा दिया और प्राप्त राशि से कोढ़ियों के लिए एक बड़ी कॉलोनी बनवा दी, जिनके बारे में वे बड़े समय से विचार कर रही थीं.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

379

पुण्य कैसे मिलता है

एक प्रसिद्ध साधु मरने के बाद सीधे स्वर्ग पहुंचे। स्वर्ग के द्वार पर चित्रगुप्त महाराज अपना बहीखाता लिए बैठे थे। उन्होंने साधू से उनका नाम, पता इत्यादि पूछा। गर्व और घमंड से भरे हुए साधु ने कहा - "क्या तुम नहीं जानते कि मैं पृथ्वीलोक पर कितना प्रसिद्ध था?"

चित्रगुप्त ने पूछा - "अपने जीवन में तुमने क्या किया है?"

साधु ने उत्तर दिया - "अपने जीवन के पहले भाग में मैं सांसारिक रूप से सक्रिय था और मेरे मन में सभी के लिए प्रेम और अपनत्व का भाव था। जीवन के दूसरे भाग में मैंने सभी चीजों को त्याग दिया और घनघोर तपस्या की।"

चित्रगुप्त ने अपना बहीखाता खंगाला और साधु से बोले - "मेरे बहीखाते के हिसाब से तो तुमने सारा पुण्य जीवन के पहले ही भाग में अर्जित किया है, दूसरे भाग में नहीं।"

आश्चर्यचकित होकर साधु ने कहा - "यह तो मेरे कथन के विपरीत है। अपने जीवन के पहले भाग में तो मैंने सांसारिक जीवन व्यतीत किया है और दूसरे भाग में मैंने अकेले रहकर प्रभु की आराधना और तपस्या की है।"

चित्रगुप्त ने उत्तर दिया - "पृथ्वीलोक में सांसारिक बने रहने, अच्छे काम करने, सभी से प्रेम करने, और एक-दूसरे की मदद करने से ही पुण्य प्राप्त होता है। इसी कारण तुम स्वर्गलोक में आए हो।"

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380

जैसा हो अन्न, वैसा हो मन

भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर पड़े थे। सभी पांडव उनके नजदीक खड़े थे और युधिष्ठिर पूर्ण तन्मयता से उनके धर्मोपदेश सुन रहे थे। तभी एकाएक द्रौपदी बोली - "हे पितामह! यदि आपकी अनुमति हो तो क्या मैं आपसे एक प्रश्न कर सकती हूं?"

"हां बेटी! तुम प्रश्न कर सकती हो।" - भीष्म ने उत्तर दिया।

द्रौपदी ने कहा - "महाराज! प्रश्न पूछने के पूर्व मैं क्षमा प्रार्थी हूं। संभवतः आपको मेरा प्रश्न अच्छा नहीं लगेगा।"

पितामह ने उत्तर दिया - "मुझे तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं लगेगा। तुम जो चाहो पूछ सकती है।"

तब द्रौपदी ने कहा - "पितामह! आपको याद होगा, जब दुःशासन भरे दरबार में मेरा चीरहरण कर रहा था और मैं चीख-चीख कर रो रही थी, तब आप भी उस समय वहां मौजूद थे। मैंने आपसे सहायता की पुकार की थी। आज आप उपदेश देकर ये समझा रहे हैं कि 'धर्म क्या है'। उस समय आपका यह धर्मज्ञान कहां गया था जब एक अबला नारी को भरे दरबार अपमानित किया जा रहा था?"

भीष्म पितामह ने उत्तर दिया - "तुम ठीक कह रही हो बेटी! उस समय मैं दुर्योधन का पाप से भरा अन्न खा रहा था जिसने मेरी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था। इसलिए उस समय मैं धर्म के मार्ग पर नहीं चल सका, यद्यपि मैं तुम्हारी सहायता करना चाहता था। अब अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर में से पाप से भरे दूषित रक्त को निकाल दिया है। मैं काफी दिनों से बाणों की शैय्या पर पड़ा हुआ हूं। सारा दूषित रक्त मेरे शरीर में से बह चुका है। इसीलिए मैं अब धर्म की बात कर रहा हूं।"

मनुष्य पर अन्न का यही प्रभाव होता है। जैसा हो अन्न, वैसा हो मन।

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124

राजा की पगड़ी

एक बार नसरूद्दीन ने एक सुंदर पगड़ी खरीदी और बड़े शान से पहन कर राजदरबार पहुँचा. उसे यह विश्वास था कि राजा जरूर उसकी पगड़ी की प्रशंसा करेगा और बहुत संभव है कि राजा उस सुंदर पगड़ी को अच्छे दामों में खरीद भी ले.

और, जैसा कि अंदेशा था, राजा ने नसरूद्दीन की पगड़ी की खूब तारीफ़ की. जवाब में नसरूद्दीन ने राजा को गर्व से बताया कि वो पगड़ी उसने हजार स्वर्ण अशर्फियों से खरीदी है.

राजा के वजीर ने राजा के कान में धीरे से कहा – कोई मूर्ख ही इतनी बेकार सी पगड़ी के लिए इतनी रकम देगा. मुल्ला हमें मूर्ख बना रहा है.

राजा को पगड़ी अच्छी लग रही थी, मगर फिर भी तसदीक के लिए मुल्ला से पूछा – तुमने इस पगड़ी के लिए इतना ज्यादा धन कैसे दे दिया. यह सुंदर तो है, मगर इतना भी कीमती नहीं.

इस पर नसरूद्दीन ने जवाब दिया – राजन्, मैंने इस पगड़ी को इतनी कीमत देकर इसलिए खरीदा कि तमाम विश्व में एक ही राजा इसकी कीमत पहचान सकता है और वो हैं आप. और इसीलिए इस पगड़ी को मैं आपकी नजर करता हूँ.

इस पर राजा प्रसन्न हो गया और उसने मुल्ला को दो हजार अशर्फियाँ ईनाम में देने का आदेश दिया.

बाद में अशर्फियाँ खनकाते हुए मुल्ला वजीर के पास पहुँचा और उसके कान में धीरे से कहा – तुम्हें पगड़ी की असली कीमत भले ही मालूम हो, मगर मुझे भी राजा की असली कमजोरी खूब पता है!

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125

दो कहानियाँ

(1)

सुमी की कक्षा वैसे तो ग्यारह बजे सुबह से शाम चार बजे तक लगती थी, परंतु वह रोज सुबह स्कूल देर से आती थी और उसकी टीचर उसे दंडस्वरूप आधा घंटा कक्षा के बाहर रखती थी. महीनों से यही क्रम चलता रहा.

एक दिन सुमी अपनी कक्षा में सही समय पर पहुँच गई. उसकी टीचर ने उससे पूछा कि आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया.

सुमी ने नम आंखों से बताया कि उसका छोटा भाई विकलांग, बीमार था. वह उसकी देखरेख तब तक करती थी जब तक कि उसकी मां काम पर से वापस नहीं आ जाती थी. मां के वापस आने के बाद ही वह स्कूल आ पाती थी. अब उसका भाई नहीं रहा. अब वो रोज समय पर स्कूल आ सकती है.

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(2)

एकलव्य में 21 प्रतिशत छात्रों को उनके फीस इत्यादि के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है. उन्हें जो भी वे भुगतान कर सकते हैं उसके लिए प्रेरित किया जाता है. पिछली फरवरी को एक परिवार मुझसे मिला और उन्होंने अपनी पूरी फीस भरने की इच्छा बताते हुए बताया – उनकी माँ को कैंसर था और उनके इलाज में बहुत खर्च हो गया था, इसीलिए वित्तीय स्थिति ठीक नहीं थी. परंतु अब परिस्थितियाँ ठीक हैं और इसलिए वे पूरी फीस भरना चाहते हैं.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

375

नसरुद्दीन और अल्लाह की मर्ज़ी

एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति ने किसी बारे में अपनी राय व्यक्ति करते हुए कहा - "जैसी अल्लाह की मर्ज़ी!"

यह सुनकर मुल्ला नसरुद्दीन तपाक से बोले - "वैसे भी हर मामले में अल्लाह की ही मर्ज़ी चलती है!"

उस व्यक्ति ने पूछा - "नसरुद्दीन! तुम यह कैसे सिद्ध कर सकते हो?"

नसरुद्दीन ने उत्तर दिया - "बहुत सरल है। यदि हर मामले में अल्लाह की मर्ज़ी न चल रही होती तो कभी ऐसा भी हो सकता है कि मेरी मर्ज़ी चलने लग जाए। है ना?"

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376

अपंग हाथ

एक बार फू शांग ने चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस से पूछा - "आखिर तुम किस तरह के संत हो क्योंकि तुम कहते हो कि येन हुई तुमसे ज्यादा स्पष्टवादी है? चीजों को समझाने में चुआन-म्यू-ज़ू तुमसे ज्यादा श्रेष्ठ है?चंग यू तुमसे ज्यादा साहसी है? और चुआन-सुन तुमसे ज्यादा गरिमापूर्ण है?"

तुरंत उत्तर प्राप्त करने की उत्सुकता में फू शांग चटाई के किनारे तक पहुंच गया और गिरते-गिरते बचा। और बोला - "यदि ये बात सत्य है तो ये चारों किस तरह तुम्हारे शिष्य हैं?"

कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया -"जहां हो वहीं खड़े रहो। मैं तुम्हें बताता हूं। येन हुई मुझसे ज्यादा स्पष्टवादी है परंतु वह लचीला होना नहीं जानता। चीजों को समझाने में चुआन-म्यू-ज़ू मुझसे ज्यादा श्रेष्ठ है परंतु वह हां और ना में सरल उत्तर देना नहीं जानता। चंग यू बहुत साहसी है परंतु वह नहीं जानता कि कब सावधान होना है। चुआन-सुन जानता है कि कैसे गरिमापूर्ण रहा जाये परंतु वह यह नहीं जानता कि कैसे विनम्र हुआ जाए। इसीलिए ये चारों लोग खुशी-खुशी मेरे शिष्य हैं।"

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377

छत टपकना

एक बार महात्मा गांधी रेल यात्रा पर थे। यात्रा के दौरान ही उनके डिब्बे की छत टपकने लग गयी। तभी एक रेल कर्मचारी गांधी जी के पास आया और बोला - "बापू आप मेरे साथ आयें। मैं आपको दूसरे डिब्बे में ले चलता हूं जहाँ आप आराम से यात्रा कर सकते हैं।"

गांधी जी ने उससे पूछा - "और इसका क्या होगा। क्या अन्य लोग इस डिब्बे में बैठे रहेंगे? और क्या उन्हें इस टपकन से कष्ट नहीं होगा? इससे तो अच्छा यह होगा कि मैं यहीं बैठा रहूं और दूसरे यात्रियों को कष्ट से बचाऊं।"

रेल कर्मचारी के पास कोई जबाब नहीं था। वह बोला - "बापू यदि मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूं तो कृपया बतायें। यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात होगी।"

गांधी जी ने कहा - "तुम्हारा कार्य सभी यात्रियों के आराम का प्रबंध करना है। नौजवान, अपना कर्तव्य प्रसन्नतापूर्वक करो। यही मेरे प्रति तुम्हारी सर्वश्रेष्ठ सेवा होगी।"

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378

मछली के लिए बंदर का मोक्ष

एक यात्री ने जब एक बंदर को पानी में से मछली निकालकर पेड़ के नीचे रखते हुए देखा तो उससे पूछा - "इस धरती पर तुम क्या कर रहे हो?"

बंदर ने उत्तर दिया - "मैं इसे डूबने से बचा रहा हूं।"

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

373

यंत्रणायें

एक शिष्य (जिसका यह मानना था कि उसने अपने जीवन में कई यंत्रणायें झेली हैं।) अपने गुरू से पूछता है - "क्या यंत्रणायें मनुष्य को परिपक्व करती हैं?"

गुरूजी ने उत्तर दिया - "यंत्रणाओं से अधिक महत्त्वपूर्ण है मनुष्य का स्वभाव, कि वह इन यंत्रणाओं को किस तरह झेलता है। यंत्रणायें कुम्हार की उस अग्नि की तरह हैं जो मिट्टी के बर्तनों को पकाती भी है और जलाती भी है।"

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374

ईश्वर को उपहार

एक राजा बहुत धार्मिक स्वभाव का था। उसने सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उन्हें एक अनूठा उपहार देने का निश्चय किया।

उसने अपने सभी दरबारियों और प्रधानमंत्री से परामर्श मांगा कि ईश्वर को कौन सा उपहार दिया जाये? कुछ ने कहा कि स्वर्ण का मंदिर बनवा दो, कुछ ने कहा कि अपना सारा स्वर्ण दान कर दो......इत्यादि-इत्यादि।

फिर राजा अपने राजगुरू के पास विचार-विमर्श के लिए गया। राजा ने उसे अपनी इच्छा और अब तक मिले सभी परामर्श बताये। राजगुरू ने कुछ देर तक विचार करने के बाद कहा -"तुम्हारा यह शरीर ईश्वर द्वारा तुम्हें दिया गया सर्वश्रेष्ठ उपहार है और अपने सारे जीवन में तुम इस शरीर का जो उपयोग करते हो, वही तुम्हारी ओर से ईश्वर को सर्वश्रेष्ठ उपहार होगा।"

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122

मनोचिकित्सक

नसरूद्दीन को एक विचित्र बीमारी हो गई. उसके इलाज के लिए वह मनोचिकित्सक के पास गया और उसे अपनी समस्या सुनाई – “डॉक्टर, मैं पिछले महीने भर से सो नहीं पा रहा हूँ. जब मैं पलंग पर सोता हूँ तो मुझे लगता है कि पलंग के नीचे कोई है. और मैं डर कर नीचे झांकता हूं परंतु पलंग के नीचे कोई नहीं होता. फिर मैं भयभीत होकर पलंग के नीचे सोता हूं तो लगता है कि पलंग के ऊपर कोई है. मैं बहुत परेशान हूं. मेरा इलाज कर दो.”

मनोचिकित्सक ने नसरूद्दीन से कहा कि तुम्हारी समस्या बड़ी विचित्र है, और इसका इलाज महंगा है और लंबा चलेगा. हर हफ़्ते तुम्हें मेरे पास मनोचिकित्सा के लिए आना होगा, जिसकी फीस 300 रुपये होगी और इलाज कोई दो वर्ष लगातार लेना होगा. इलाज की पूरी गारंटी है.

नसरुद्दीन यह सुनकर घबराया और कल बताता हूँ कह कर वह डाक्टर के पास से चला गया. दूसरे दिन नसरूद्दीन ने डॉक्टर को फ़ोन लगाया और उसे धन्यवाद देते हुए कहा कि उसकी समस्या का इलाज हो गया है. डॉक्टर को विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने पूछा कि कैसे?

“मैंने अपने पलंग के पाए ही काट दिए हैं”. नसरूद्दीन ने खुलासा किया – “न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!”

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123

रात है कि दिन

पुराने जमाने की बात है. एक दिन धर्मगुरू ने अपने शिष्यों से पूछा कि यह कैसे समझते हो कि रात बीत गई है और दिन हो गया है?

एक ने कहा – मुर्गा बांग देता है तो समझो दिन हो गया.

गुरु ने कहा – गलत.

दूसरे ने सुझाया – जब बाहर अँधेरा खत्म हो जाता है.

गुरु ने कहा – गलत.

तीसरे ने सुझाया – जब हम बाहर देखते हैं तो पेड़ पीपल का है या वटवृक्ष है यह समझ में आ जाए तो समझो दिन हो गया.

गुरु ने कहा – गलत.

इस तरह से तमाम शिष्यों ने अपने तर्क रखे. परंतु गुरु किसी से भी सहमत नहीं हुए. अंत में छात्रों ने एक स्वर से कहा कि गुरु स्वयं बताएं कि दिन हो गया कैसे पता चलेगा.

“जब तुम किसी भी स्त्री या पुरुष के चेहरे को देखते हो तो उसमें यदि तुम्हें अपना भाई दिखता है या अपनी बहन नजर आती है तब तो समझो कि दिन हो गया, नहीं तो तुम सबके लिए अभी भी रात ही है.” – गुरु ने स्पष्ट किया.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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वाटरफ़ॉक्स को खास तेज गति की ब्राउजिंग / इंटरनेट सर्फिंग के लिए ही बनाया गया है.

वाटरफ़ॉक्स की परिभाषा कुछ यूँ दी गई है -

Waterfox is a high performance browser based on the Mozilla Firefox source code. Made specifically for 64-Bit systems, Waterfox has one thing in mind: speed.

यह 64 बिट ब्राउजर है, जो आधुनिक 64 बिट सिस्टमों के लिए खासतौर पर उपयोगी है.

यानी इसके सर्वोत्तम प्रयोग हेतु आपका कंप्यूटर आधुनिक और 64 बिट का होना चाहिए.

तो, यदि आप अपने ब्राउजर - चाहे वो क्रोम, फ़ायरफ़ॉक्स, ओपेरा, सफारी या इंटरनेट एक्सप्लोरर कोई भी हो, उसकी धीमी पेज रेंडरिंग से परेशान हों तो वाटरफ़ॉक्स एक बार जरूर आजमाएं.

मैंने इसका प्रयोग किया और पाया कि यह कई मामलों में क्रोम, फ़ायरफ़ॉक्स, ओपेरा और इंटरनेट एक्सप्लोरर के अधुनातन संस्करणों से ज्यादा तेज है. वैसे भी क्रोम का 64 बिट संस्करण विंडोज सिस्टम के लिए अभी उपलब्ध नहीं है. फ़ायरफ़ॉक्स और इंटरनेट एक्सप्लोरर 9 के 64 बिट संस्करण उपलब्ध हैं, मगर ये भी स्पीड के मामले में वाटरफ़ॉक्स से कई मामलों में पीछे हैं. वाटरफ़ॉक्स की पेज रेंडरिंग कमाल की है. इससे पहले मैं क्रोम व ओपेरा दोनों ही ब्राउजरों का प्रयोग करता था, मगर अब सिर्फ वाटरफ़ॉक्स ही तमाम कार्यों में उपयोगी हो रहा है.

वाटरफ़ॉक्स को मोजिल्ला फ़ायरफ़ॉक्स के मुक्त सोर्सकोड से ही बनाया गया है, मगर खासतौर पर 64 बिट सिस्टमों और तेज गति की ब्राउजिंग को ध्यान में रख कर इसमें परिवर्तन किए गए हैं.

वाटरफ़ॉक्स यहाँ से डाउनलोड करें - http://waterfoxproject.org/downloads/ 

ध्यान रहे कि विंडोज तंत्र में पहले आप विजुअल सी++2010 रीडिस्ट्रीब्यूटेबल यहाँ  http://www.microsoft.com/downloads/en/details.aspx?displaylang=en&FamilyID=bd512d9e-43c8-4655-81bf-9350143d5867 से इंस्टाल कर लें.

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

371

गप्प

एक शिष्य ने अपने गुरू से इस बात के लिए पश्चाताप किया कि उसे गप्प मारने की आदत है।

गुरूजी ने बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से कहा कि "यदि तुम गप्प में नया मिर्चमसाला नहीं डालते तो यह इतनी बुरी बात नहीं है।"


372

संघर्ष से ही शक्ति और विवेक प्राप्त होता है

महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य को कौरवों का सेनापति बनाया गया। युद्ध के पहले ही दिन वे अत्यंत वीरता और उत्साह के साथ लड़े किंतु अंत में उन्हें अर्जुन द्वारा पराजय का सामना करना पड़ा।

पहले ही दिन पराजय होने से दुर्योधन को बहुत बुरा लगा और वह द्रोणाचार्य के पास जाकर बोला - "गुरूदेव! अर्जुन आपका शिष्य रहा है। आप उसे कुछ ही पलों में हरा सकते हैं। फिर आप इतना बिलंब क्यों कर रहे हैं?"

कुछ देर चुप रहने के बाद द्रोणाचार्य बोले - "तुम ठीक कह रहे हो दुर्योधन! उसके द्वारा युद्ध में प्रयोग की जाने वाली युक्ति और रणनीति से मैं भलीभांति अवगत हूं परंतु मैंने अपना सारा जीवन शाही विलासितापूर्ण तरीके से व्यतीत किया है जबकि अर्जुन ने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है। संघर्ष के ही कारण उसने मुझसे ज्यादा शक्ति और विवेक प्राप्त कर लिया है।"

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120

तेल का तेल, पानी का पानी

पानी भरे हुए कलश के ऊपर रखे तेल का दीपक जल रहा था और अपने प्रकाश से दिग् दिगन्त को आलोकित कर रहा था.

पानी को ईर्ष्या हो रही थी. उसे अपने ऊपर रखे तेल का जलना जरा भी नहीं भा रहा था. मगर तेल शांति से स्वयं जल कर दुनिया में प्रकाश फैला रहा था.

कलश ने पानी से कहा – तेल से व्यर्थ ईर्ष्या मत करो. वह तप कर निकला है. बीजों को जमीन में बोया गया, वे अंकुरित हुए, फिर पौधे बने, फिर वे फले-फूले और ज्यादा मात्रा में बीज हुए, उन्हें सप्रयास एकत्र किया गया फिर तेल निकालने के लिए बीजों को घानी में पेरा गया, फिर छाना गया और फिर यहाँ दुनिया को आलोकित करने की खातिर स्वयं को जलाए दे रहा है...

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121

द फेमस नॉटी गर्ल

सरोजिनी नायडू को महात्मागांधी ने नाइटिंगेल ऑफ इंडिया नाम दिया था. एक बार सरोजिनी नायडू दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर थीं. वहाँ खोजा समुदाय के लोगों के बीच उनका एक कार्यक्रम था. कार्यक्रम के एक वक्ता को सरोजिनी नायडू का परिचय का पाठ करना था जिसे किसी अन्य लेखक ने लिखा था.

परिचय में एक स्थान पर सरोजिनी नायडू के लिए नाइटिंगेल ऑफ इंडिया का जिक्र भी था. मगर अंग्रेजी में कमजोर वक्ता ने यह शब्द पहले कभी पढ़ा नहीं था और सरोजिनी के इस नामकरण के बारे में भी उसे मालूम नहीं था. तो परिचय पढ़ने के दौरान यह शब्द आने पर वक्ता ने सोचा कि शायद वर्तनी की गलती है, अतः उन्होंने पढ़ा – द फेमस नॉटी गर्ल ऑफ इंडिया - सरोजिनी नायडू....

उनके यह पढ़ते ही पूरा सभागार हंसी के ठहाकों से गूंज पड़ा. सरोजिनी नायडू भी अपनी हँसी नहीं रोक पाईं.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

367

पेपर क्लिप

अपना एक शोधपत्र लिखने के बाद आइंस्टीन और उनके एक सहयोगी ने कागज़ों को नत्थी करने के लिए पेपर क्लिप को ढूंढना शुरू किया। अंततः उन्हें एक टेढ़ी-मेढ़ी पेपर क्लिप मिली जो प्रयोग में लाने योग्य नहीं थी।

फिर उन लोगों ने उस क्लिप को सीधा करने का निर्णय लिया तथा उसके लिए उपकरण की तलाश शुरू की। अल्मारी की कई दराजों में तलाश करने के बाद अंततः उन्हें अच्छी क्लिपों का एक डिब्बा मिला। जिसमें से एक क्लिप को निकालकर आइंस्टीन ने उपकरण बनाना शुरू कर दिया। उनके सहयोगी ने हतप्रभ होते हुए पूछा कि जब इतनी सारी अच्छी क्लिप मौजूद हैं तो आप उस टेढ़ी-मेढ़ी क्लिप को ही सीधा करने पर क्यों उतारू हैं?

आइंस्टीन ने उत्तर दिया - "यदि एकबार मैं किसी काम को करने का निर्णय ले लेता हूँ, तो चाहे कितनी भी परेशानियां आयें मैं उस काम को पूरा करके ही दम लेता हूँ।"

प्रैंस्टन में अपने एक सहयोगी को यह कथा सुनाते हुए आइंस्टीन ने कहा था

कि इस कथा से उनके व्यक्तित्व के बारे में पूरी जानकारी मिलती है।

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368

इससे मरने में आसानी होगी

एक स्वामी जी के शिष्य को जब अपने घर में आग लगने की जानकारी मिली तो वह अपने घर की ओर दौड़ा। तब तक पूरा घर जलकर स्वाहा हो चुका था।

वह शिष्य भी बूढ़ा था और उसकी सारी संपत्ति जल गयी थी। आश्रम के सभी लोग उससे सहानुभति प्रकट करने लगे। इस घटना पर स्वामी जी ने सिर्फ यही कहा कि "इससे मरने में आसानी होगी।"

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369

निष्ठावान

एक राजा रात के समय अपने साम्राज्य के भ्रमण पर था। वह नशे में धुत्त था। नशे में उसने अपनी प्रजा की बहु-बेटियों के साथ छेड़खानी शुरू कर दी। राजा के साथ कई सैनिक और सेवक थे परंतु किसी ने भी राजा को रोकने की हिम्मत नहीं दिखायी। अंततः एक वृद्ध सेवक ने आगे बढ़कर राजा को रोका तथा पकड़कर महल में वापस ले आया।

अगले दिन भरे दरबार में उसे राजा के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। दरबारियों ने राजा से उस सेवक की गुस्ताखी का जिक्र करते हुए मर्यादा के प्रतिकूल कार्य करने के लिए उसे सख्त से सख्त सज़ा देने का अनुरोध किया।

कुछ देर के सन्नाटे के बाद राजा उठे और बोले कि एक सच्चा निष्ठावान सेवक ही अपने राजा को हमेशा अन्यायपूर्ण कार्य करने से रोकेगा तथा पथभ्रष्ट नहीं होने देगा। राजा ने उस सेवक को उसकी निष्ठा के लिए पुरस्कृत किया तथा उसे उच्च पद पर पदोन्नत किया।

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370

पवित्रता

पूरे देश में दूर पर्वत पर बनी कुटिया में रहने वाले एक पवित्र संत की ख्याति फैल गयी थी। वहां से काफी दूर स्थित एक गांव में रहने वाले व्यक्ति ने कठिन यात्रा कर उस संत के पास जाने का निर्णय लिया।

कई दिनों की कठिन यात्रा के उपरांत जब वह व्यक्ति इस संत की कुटिया तक पहुंचा तो उसने दरवाज़े पर एक नौकर को खड़ा हुआ पाया। उसने नौकर से कुटिया के भीतर जाकर पवित्र संत को दर्शन करने की अभिलाषा प्रकट की। नौकर मुस्कराया और उस व्यक्ति को लेकर कुटिया के अंदर गया। जैसे ही उस व्यक्ति ने कुटिया में प्रवेश किया उसकी नज़रें पवित्र संत को तलाशने लगीं जिनके दर्शन के लिए वह इतनी दूर चलकर आया था। पर वहाँ कोई नहीं था।

इसके पहले कि वह कुछ समझ पाता वह नौकर उसे बाहर ले आया। वह व्यक्ति मुड़ा और नौकर से बोला - "परंतु मैं पवित्र संत के दर्शन करना चाहता हूँ।"

नौकर ने उत्तर दिया - "दर्शन तो तुम पहले ही कर चुके हो। अपने जीवन में तुम जिस किसी भी व्यक्ति से मिलो, उसे बुद्धिमान पवित्र व्यक्ति ही समझो चाहे वह कितना भी साधारण दिखायी दे रहा हो। यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम्हारी वे सभी समस्यायें जिन्हें लेकर तुम यहाँ आए हो अपनेआप दूर हो जाएगीं।"

 

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

365

मक्‍खी और हाथी

गुरू रोज़ी मनोविश्‍लेषकों के एक समूह को चीनी विद्या ज़ेन की शिक्षा प्रदान करने के लिए सहमत हो गए। उस संस्‍थान के निदेशक द्वारा परिचय कराए जाने के बाद रो़ज़ी फर्श पर डले एक गद्दे पर बैठ गए। एक छात्र ने कक्ष में प्रवेश करने के बाद रोज़ी को दंडवत प्रणाम किया और उनके सामने पड़े गद्दे पर बैठ गया।

छात्र ने पूछा - "ज़ेन क्‍या है?"

रोज़ी ने एक केला निकाला और उसे छीलकर खाने लगे।

छात्र ने पूछा - "बस हो गया? क्या आप मुझे ज़ेन विद्या के बारे में कुछ और भी बता सकते हैं?"

रोज़ी ने कहा - "थोड़ा पास आओ।"

छात्र सरककर उनके पास पहुँच गया। रोज़ी ने छात्र के सामने ही बचा हुआ केला भी खाना शुरू कर दिया।

छात्र ने उन्‍हें दंडवत प्रणाम किया और वहॉं से चला गया।

एक दूसरा छात्र दर्शकों को संबोधित करते हुए बोला - "आप लोगों को कुछ समझ में आया? "

जब दर्शकों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी तो छात्र फिर बोला - "आप लोगों ने अभी-अभी ज़ेन विद्या के बारे में प्रत्‍यक्ष प्रस्‍तुति देखी है। क्‍या आपके मन में कोई प्रश्‍न है? "

काफी देर के सन्‍नाटे के बाद एक व्‍यक्‍ति बोला -"रोज़ी जी, मैं आपके प्रदर्शन से जरा भी संतुष्‍ट नहीं हूँ। आपके प्रदर्शन से स्‍पष्‍ट रूप से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आपका प्रदर्शन ऐसा होना चाहिए जिससे ज़ेन विद्या के बारे में स्‍पष्‍ट रूप से समझ में आये।"

रोज़ी ने उत्‍तर दिया - "अगर आप शब्‍दों में सुनना चाहते है? तो सुनिए.......ज़ेन विद्या एक ऐसे हाथी की तरह है जो मक्‍खी के साथ मैथुन करता है।"

 

366

सांसारिक आकांक्षाओं के परे

वर्ष 1952 में चैम विह्ज़मैन के निधन के बाद अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन से इज़राइल का राष्‍ट्रपति बनने का निवेदन किया गया। आइंस्‍टीन ने उस प्रस्ताव को नकार दिया और इज़राइल के राजदूत अब्‍बा इबान को साफ-साफ मना करते हुए कहा - "मुझे प्रकृति की तो थोड़ी कहुत समझ है परंतु मैं मानव स्वभाव के बारे में जरा भी जानकारी नहीं रखता। इज़राइल की ओर से इस प्रकार के प्रस्ताव ने मेरे दिल को तो छुआ है परंतु मैं दुख व अपरोधबोध से भी भर गया हूं क्योंकि मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकता।"

अपने पत्र में आइंस्टीन ने आगे लिखा कि "अपना सारा जीवन मैंने भौतिक वस्तुओं के साथ गुजारा है। मानव व्यवहार और शासकीय कामकाज के बारे में न तो मेरा कोई अनुभव है और न ही क्षमता। इन दो कारणों से ही मैं इस उच्च पद के लायक नहीं हूं।

इसके अलावा वृद्धावस्था के कारण भी मेरी शारीरिक क्षमतायें कम हो गयीं हैं।"

स्टीवन हॉकिंग ने अपनी पुस्तक "द यूनीवर्स इन अ नटशैल" में इस कथा का एक अन्य संस्करण लिखते हुए बताया है कि आइंस्टीन ने राष्ट्रपति पद का प्रस्ताव इस लिए ठुकरा दिया था क्योंकि वे जानते थे कि "राजनीति तो कुछ देर की ही मेहमान है परंतु जो वैज्ञानिक सूत्र वे दे रहे हैं, वे सांसारिकता से परे एवं शाश्वत हैं।"

 

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118

स्वर्ण के लिए खुदाई

एंड्र्यू कार्नेगी युवावस्था में ही अमेरिका चले आए थे, और वहाँ आजीविका के लिए छोटी-मोटी नौकरी करने लगे थे. बाद में वे अमेरिका के सबसे बड़े स्टील निर्माता बने.

एक समय उनकी कंपनी में 43 करोड़पति काम करते थे. किसी ने उनसे कभी पूछा था कि वे अपनी कंपनी के कर्मचारियों के साथ कैसे काम करते हैं. एंड्र्यू कार्नेगी ने जवाब दिया – “लोगों के साथ काम करना तो सोने के खदान में काम करने जैसा है. आपको एक तोला सोना पाने के लिए टनों में मिट्टी खोदना पड़ता है. और जब आप खोदते रहते हैं तो आप मिट्टी को नहीं देखते. आपकी निगाहें चमकीले सोने के टुकड़े ढूंढने में लगी रहती है.”

हर व्यक्ति में, हर परिस्थिति में कुछ न कुछ उत्तम रहता ही है. अलबत्ता इन्हें पाने के लिए यदा कदा खुदाई गहरी करनी पड़ती है, क्योंकि ये सतह पर दिखाई नहीं देते.

सफल व्यक्ति हंस की तरह काम करते हैं - हंस मिलावटी दूध के पात्र में से दूध को पी लेता है, और जल को छोड़ देता है.

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चतुर जौहरी

शहर में एक बेहद सफल, धनवान जौहरी था. उसकी जवाहरातों की दुकान का बड़ा नाम था. बीच बाजार में बड़ी सी दुकान थी, और बड़े बड़े शोकेस में चमचमाते जवाहरात हर एक का ध्यान बरबस खींच लेते थे.

एक दिन नवाब उस दुकान में खरीदारी करने पहुँचे. दुकानदार और कर्मचारी नवाब के सामने एक से एक जवाहरात और नई डिजाइन के गहने पेश करने लगे.

मगर नवाब को उनमें से कोई पसंद नहीं आए. वो जल्दी ही इस सिलसिले से बोर होने लगा.

अंत में नवाब जब चलने को हुआ तो उसकी नजर कोने पर पड़े रत्नजटित एक साड़ी-पिन पर पड़ी, जिसे उसके सामने पेश नहीं किया गया था.

नवाब ने जौहरी से उसके बारे में पूछा, तो जौहरी ने नवाब को बताया कि वह एक अलग किस्म का, प्राचीन, परंतु बेहद कीमती जेवर है. डिजाइन भले ही आज के हिसाब से आकर्षक न लगे, मगर जेवर पुश्तैनी, भाग्यवर्धक है. जौहरी ने नवाब की दृष्टि की भी तारीफ की कि उन्हें यह छोटा, परंतु खास जेवर अलग से दिखाई दिया.

नवाब ने वह साड़ी-पिन ऊंची कीमत देख कर खरीद लिया.

नवाब के जाने के बाद जौहरी के पुत्र ने जो व्यापार के गुर अपने पिता से सीख रहा था, अपने पिता से कहा – “यह साड़ी-पिन तो बेहद साधारण था, यह मूल्यवान भी नहीं था, इसमें कुछ कमी थी, और इसे तुड़वाकर आप नया डिजाइन बनवाने वाले थे...”

चतुर जौहरी ने अपने पुत्र को व्यापार का गुर समझाया - “कीमतें ग्राहकों के मुताबिक तय होती हैं. नवाब के लिए यहाँ मौजूद हर जवाहरातों और जेवरों की कीमत धूल बराबर ही थी. सवाल उनके पसंद के जेवर का था. एक बार उनके पसंद कर लेने के बाद कीमत तो हमें ही तय करनी थी. यदि नवाब की हैसियत मुताबिक कीमत नहीं बताता तो वह उसे खरीदता ही नहीं!...”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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जकल हर कोई फ़ेसबुक से दुःखी है. सबसे ज्यादा दुःखी तो सरकार है. सरकार फ़ेसबुक से इतना दुःखी हो चुकी है कि वो इस पर बैन करने की बात कहने लगी है. और अब तो न्यायालय भी चीनी तर्ज पर फ़ेसबुक को ब्लॉक करने की धमकियाँ देने लगी है. उधर फ़ेसबुक में घुसे पड़े रहने वाले और तमाम वजहों के अलावा इस वजह से भी दुःखी हुए जा रहे हैं कि सरकार या न्यायालय अब किसी भी दिन फ़ेसबुक पर बैन लगा देगी तो उनके अनगिनत फ़ेसबुक मित्रों, चिकोटियों, स्टेटस मैसेज, वॉल पोस्टिंग और पसंद का क्या होगा!

फ़ेसबुक से मैं तो दुःखी हूँ ही, मेरी पत्नी मुझसे ज्यादा दुःखी है. अलबत्ता दोनों के कारण जुदा जुदा हैं. फ़ेसबुक से तो मैं तब से दुःखी था जब से मैं फ़ेसबुक से जुड़ा भी नहीं था. तब जहाँ कहीँ भी जाता, लोग गर्व से बताते कि वे फ़ेसबुक पर हैं. मैं उनके गर्व के सामने निरीह हो जाता और दुःखी हो जाता. फिर पूछते – आप भी फ़ेसबुक पर हैं? और चूंकि मैं फ़ेसबुक पर नहीं होता था तो और ज्यादा दुःखी हो जाता था कि मैं कितना पिछड़ा, नॉन-टेक्नीकल आदमी हूँ कि देखो तमाम दुनिया तो फ़ेसबुक पर पहुँच चुकी है, और हम हैं कि अभी जाने कहाँ अटके हैं.

तो एक अच्छे भले दिन (पत्नी के हिसाब से एक बेहद खराब दिन) मैं भी इधर उधर से जुगत भिड़ाकर फ़ेसबुक पर आ ही गया. और, मैं फ़ेसबुक पर आ क्या गया, मेरे और ज्यादा दुःखी होने के दिन भी साथ आ गए.

मेरे फ़ेसबुक पर आने के कई कई दिनों तक मेरे पास किसी का कोई मित्र निवेदन नहीं आया. आप समझ सकते हैं कि मेरे दुखों का क्या पारावार रहा होगा. यही नहीं, मैंने दर्जनों, सैकड़ों मित्र निवेदन भेजे. मगर फ़ेसबुक में आपसी मित्रों में उलझी मित्रमंडली में से किसी ने गवारा नहीं किया कि वो मेरे मित्र निवेदन का जवाब भेजे. स्वीकारना तो खैर, दूर की बात थी. अब जब आप बड़ी आशा से मित्र निवेदन भेजें और सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आए, तो आप क्या खुश होंगे? और, जब पता चले कि गली के नुक्कड़ पर चायवाले के पाँच हजार फ़ेसबुक मित्र हैं, और आप खाता खोलने के लिए भी तरस रहे हैं तो अपने दुःख की सीमा का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं.

अब चूंकि मैं फ़ेसबुक पर आ चुका तो यहाँ थोड़ी चहल कदमी भी करने लगा. लोगों की देखा-देखी एक दिन मैंने भी अपना स्टेटस लगाया – आज मुझे जुकाम है, और मेरी नाक म्यूनिसिपल्टी के टोंटी विहीन नल की तरह बह रही है. मुझे लगा कि दूसरों के भरे पूरे फ़ेसबुक वॉल की तरह इस धांसू फ़ेसबुक स्टेटस पर टिप्पणियों की भरमार आ जाएगी और मेरा वाल भी टिप्पणियों, प्रतिटिप्पणियों से भर जाएगा. मगर मुझे तब फ़ेसबुक में टिके रहने वालों की असलियत पता चली कि उनमें जरा सा भी सेंस ऑफ़ ह्यूमर नहीं है, जब मेरे इस धांसू स्टेटस मैसेज पर एक भी टिप्पणी दर्ज नहीं हुई. और, जहाँ फ़ेसबुक के अरबों प्रयोक्ता हों, लोग बाग़ चौबीसों घंटे वहाँ पिले पड़े रहते हों, वहाँ जीरो टिप्पणी वाली स्टेटस मैसेज का मालिक क्या खुश होगा?

इसी तरह मैंने अपने वाल पर तमाम टीका टिप्पणियाँ भरीं, दूसरों के सार्वजनिक वाल पर आशा-प्रत्याशा में टीप मारे, मगर मामला वही, ढाक के तीन पात. मेरी वाल सदा सर्वदा से खाली ही बनी रही, और मुझे अच्छा खासा दुःखी करती रही.

अपना फ़ेसबुकिया जीवन संवारने व कुछ कम दुःखी होने की खातिर एक दिन मैंने कुछ टिप हासिल करने की खातिर एक अत्यंत सफल फ़ेसबुकिया से संपर्क किया. उसके पाँच हजार फ़ेसबुक मित्र थे, उसकी वॉल सदा हरी भरी रहती थी. वो एक टिप्पणी मारता था तो प्रत्युत्तर में सोलह सौ पचास प्रतिटिप्पणियाँ हासिल होती थीं. मगर जो बात उसने मुझे अपना नाम सार्वजनिक न करने की कसम देते हुए कही, वो मुझे और दुःखी कर गई. उस सफल फ़ेसबुकिये ने बताया कि उसे अपने तमाम पाँच हजार मित्रों के स्टेटस संदेश पर हाहा-हीही किस्म की टिप्पणियाँ मारनी पड़ती हैं, उनके जन्मदिनों में याद से उनके वॉल पर बधाईयाँ टिकानी पड़ती है, उनकी टिप्पणियों का जवाब देना मांगता है, उनकी चिकोटियों पर उलटे चिकोटी मारनी पड़ती है और उनमें से लोग जो दीगर लिंक टिकाते हैं, फोटो चेंपते हैं उनमें भी अपनी टिप्पणी और पसंद मारनी पड़ती है इत्यादि इत्यादि. और इन्हीं सब में दिन रात उलझ कर वो अपना चैन (माने नौकरी, प्रेमिका इत्यादि...) खो चुका है, लिहाजा आजकल बेहद दुःखी रहता है!

आह! फ़ेसबुक! तूने तो सबको दुःखी कर डाला है रे! फ़ेसबुक से गूगल, एमएसएन और याहू तो दुःखी हैं ही, क्या पता शायद खुद मार्क जुगरबर्ग भी दुःखी हो!

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

363

कछुआ

चीन के राजा ने अपने राजदूत को उत्तरी पर्वतमाला में रहने वाले एक संन्यासी के पास भेजा। वे उन्हें राज्य का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे। कई दिनों की यात्रा के बाद राजदूत उत्तरी पर्वतमाला में स्थित उनके आश्रम पर पहुंचा। लेकिन आश्रम में कोई नहीं था। परंतु आश्रम के ही पास बहती नदी के बीचोंबीच स्थित एक चट्टान पर एक व्यक्ति अर्धनग्न हालत में बैठा हुआ मछलियाँ पकड़ रहा था। यह सोचकर कि यही वह संन्यासी है जिसे राजा अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं, उसने वहाँ के ग्रामीणों से पूछताछ की। ग्रामीणों ने उसे बताया कि यही वे संन्यासी हैं। राजदूत अत्यंत विनम्रता के साथ संन्यासी के पास पहुँचा और उनका ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया।

पैदल ही नदी को पार करते हुए वह संन्यासी राजदूत के समक्ष कमर पर हांथ रखकर खड़े हो गए और बोले - "तुम क्या चाहते हो? "

राजदूत ने उत्तर दिया - "हे महामानव, राजा ने आपके ज्ञान और पवित्रता की ख्याति सुनकर मुझे आपके पास इन उपहारों के साथ भेजा है। उन्होंने आपको साम्राज्य का प्रधानमंत्री बनने का निमंत्रण भेजा है। "

"साम्राज्य का प्रधानमंत्री? "

"जी हां श्रीमान! "

"और मैं ? "

"जी हां श्रीमान! "

"क्या तुम्हारे महाराज पागल हो गए हैं? " - कहकर संन्यासी जोर-जोर से हँसने लगा। उनकी हँसी देखकर वह राजदूत परेशान हो उठा।

जब उनका हँसना बंद हुआ तो उन्होंने राजदूत से कहा - "मुझे यह बताओ कि क्या तुम्हारे महाराज के पूजाघर में एक ऐसा कछुआ है जिसकी पीठ पर चमकते हुए हीरे जड़े हैं? "

"वह कछुआ तो बहुत ही पूजनीय है श्रीमान!"

"और तुम्हारे महाराज अपने परिवार के साथ दिन में एक बार उस कछुए की पूजा-अर्चना के लिए आते हैं?"

"जी हाँ श्रीमान!"

"अब यदि उस कछुए को यहाँ लाकर उसकी पूँछ गोबर में सान दी जाए तो क्या गोबर में सना हुआ कछुआ उस चमकते कछुए की जगह ले सकता है?"

"जी नहीं श्रीमान! "

"तो जाकर अपने महाराज से कह दो कि मैं भी प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं हूँ।"

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364

भ्रम

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरूजी से पूछा - "मैं शाश्वत जीवन कब प्राप्त करूंगा?"

गुरूजी ने उत्तर दिया -"यही समय शाश्वत जीवन है। वर्तमान में जियो।"

"लेकिन मैं तो वर्तमान में ही जी रहा हूँ। क्या मैं वर्तमान में नहीं हूँ?" - शिष्य ने प्रश्न किया।

"नहीं "

"क्यों गुरूजी?"

"क्योंकि तुमने अपने भूतकाल को नहीं छोड़ा है। "

"लेकिन मैं अपने भूतकाल को क्यों छोड़ूँ? ये बुरा थोड़े ही था।"

गुरूजी ने कहा - "भूतकाल चाहे अच्छा हो या बुरा, छोड़ ही दिया जाना चाहिए क्योंकि वह मृत होता है। "

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116

आँखों की पट्टी उतारने का भी टैम नईं?

जब गुरु ने राज्यपाल को ध्यान-योग के लिए न्योता भेजा तो राज्यपाल ने जवाब दिया कि वो बेहद व्यस्त है. इस पर गुरु ने प्रत्युत्तर भेजा – “आपका जवाब मुझे उस बात की याद दिलाता है कि जैसे किसी व्यक्ति को जंगल में आँखों में पट्टी बांधकर जंगल में छोड़ दिया हो, और वो उसी स्थिति में रास्ता तलाश रहा हो. उसे अपने आँखों की पट्टी हटाने की भी फुर्सत नहीं है.”

एक लकड़हारा था. वह बेहद शक्तिशाली था. परंतु वह जरा सी लकड़ियाँ काट कर ही बेहद थक जाता. दरअसल उसकी कुल्हाड़ी भोथरी थी. न तो उसे अपनी कुल्हाड़ी को धार करने का भान था और न ही समय! उसकी ऊर्जा यूँ व्यर्थ ही नष्ट होते रहती थी.

अपनी ऊर्जाएँ लकड़हारे की माफिक नष्ट न करें. अपनी आँखों से पट्टी हटाएँ!

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117

खिड़की पर लटकता चेहरा

खोजा नसरूद्दीन ने अपने घर की खिड़की से देखा कि उसका मित्र चला आ रहा है. खोजा ने मित्र से रुपये उधार ले रखे थे और शायद वह मित्र तगादा करने आ रहा था.

खोजा ने अपनी बीवी से कहा कि वो उस मित्र को कह दे कि खोजा घर पर नहीं है.

बीवी ने उस मित्र से कहा कि खोजा घर पर नहीं है, वह तो बाहर गया हुआ है. उस मित्र ने खोजा को खिड़की से देख लिया था. परंतु उसने बीवी के बहाना बनाने पर उससे कहा – “ठीक है, कोई बात नहीं, परंतु उससे कहना कि अगली बार जब वो बाहर जाए, तो खिड़की पर अपनी सूरत लटका कर मत जाया करे.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

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सुनहरा चील

एक व्यक्ति को चील का एक अंडा मिला जिसे उसने अंडा सेती हुई मिर्गी के पास रख दिया। कुछ समय बाद अंडों से चूजे निकले। चूजों ने अपने स्वभाव के अनुरूप इधर-उधर टहल कर भोजन के लिए कीड़ों की तलाश शुरू कर दी तथा वे अपने पंखों को फड़फड़ाकर थोड़ी दूर तक उड़ लेते। चील का बच्चा भी अन्य चूजों की देखादेखी उनकी ही तरह व्यवहार करता।

कुछ वर्ष बाद जब वह चील का बच्चा वयस्क हो गया, तब उसने एक दिन ऊँचे आकाश में उड़ान भरते हुए एक पक्षी को देखा जो अपने सुनहरे एवं ताकतवर पंखों की सहायता से गगन की ऊँचाईयों में हवा को चीरता हुआ उड़ रहा था।

अचरज से भरे चील ने पूछा - "वह कौन है?"

उसके पड़ोसी ने कहा - "वह चील है, पक्षियों का राजा, आकाश में उसका साम्राज्य है। हम महज चूजे हैं इसलिए हम धरती पर रहते हैं। "

इस तरह वह चील अपनेआप का पहचान सकने के कारण जीवन पर्यन्त

एक चूजे की तरह ही रहा और मरा।

 

360

अमीर

पति अपनी पत्नी से बोला - "प्रिय, मैं बहुत परिश्रम कर रहा हूँ, इससे एक दिन हम लोग बहुत अमीर हो जायेंगे। "

पत्नी - "पर हम लोग पहले से ही अमीर हैं, क्योंकि हम लोग एक दूसरे के नजदीक हैं। और किसी दिन हमारे पास धन भी होगा। "

 

361

जुनैद एवं नाई

पुण्यात्मा जुनैद ने एक बार भिखारी का वेश धारण किया और मक्का में एक नाई की दुकान पर पहुँच गए। वह नाई उस समय एक रईस ग्राहक की दाढ़ी बना रहा था। उसने तुरंत उस रईस व्यक्ति की दाढ़ी बनाना छोड़कर पहले भिखारी की दाढ़ी बनाने का निर्णय लिया। उसने न केवल भिखारी का वेश धारण किए जुनैद से पैसे नहीं लिए वरन उन्हें भिक्षा भी दी।

जुनैद उस नाई से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने निश्चय किया कि वे उस दिन जो कुछ भी भिक्षा के रूप में प्राप्त करेंगे, उस नाई को दे देंगे।

उसी दिन एक अमीर तीर्थयात्री ने जुनैद को सोने के सिक्कों से भरा पर्स भिक्षा के रूप में दिया। जुनैद खुशी-खुशी उस नाई की दुकान पर पहुंचे और उसे वह पर्स दे दिया।

जब नाई को यह ज्ञात हुआ कि जुनैद ने उसे वह पर्स क्यों दिया है तो वह क्रोधित हो गया और बोला - "आखिर तुम किस तरह के पुण्यात्मा व्यक्ति हो? तुम मुझे मेरे प्रेम के बदले में यह पुरस्कार दे रहे हो ! "

"जब आप अपने उपकार के बदले में कुछ चाहते हैं

तो आपका उपहार रिश्वत बन जाता है। "

 

362

बयाज़िद ने नियम तोड़ा

संत बयाज़िद कभी-कभी अपने संप्रदाय के नियम और परंपराओं के विरुद्ध कार्य किया करते थे। एक बार वे तीर्थयात्रा से लौटते समय एक नगर में पहुंचे। वहां के नागरिकों ने श्रद्धाभाव से उनका स्वागत किया। उनके नगर आगमन के कारण लोगों में हलचल मच गयी।

बयाज़िद जब लोगों की चापलूसी से थक गए तो बाज़ार के बीचोबीच पहुंचकर उन्होंने सब लोगों के सामने ही ब्रेड का पैकेट उठाकर खाना शुरू कर दिया। रमज़ान की पवित्र महीना होने के कारण उस दिन उपवास था। यद्यपि वह उपवास का दिन था परंतु बयाज़िद जानते थे कि यात्रा में होने के कारण उन्हें उपवास तोड़ने की अनुमति थी।

परंतु उनके अनुयायियों को यह अच्छा नहीं लगा। वे उनके व्यवहार से इतने क्षुब्ध हुए कि उन्हें छोड़कर अपने घरों को चले गए।

बयाज़िद ने अपने शिष्य से कहा - "जैसे ही मैंने उनकी आकांक्षा के अनुरूप आचरण नहीं किया, उनकी सारी श्रृद्धा गायब हो गयी। "

"श्रद्धा की कीमत आपको अपेक्षा अनुरूप आचरण करके चुकानी पड़ती है। "

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

357

गुलाब की छटा

एक बार महात्मा गांधी, गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर के निमंत्रण पर शांति निकेतन गए। एक सुबह वे दोनों उद्यान की सैर पर निकले। सूरज की पहली किरण जब उस उद्यान के गुलाब पर पड़ी तो उसकी निराली छटा देखने के लिए दोनों के पाँव ठिठक गए। गुलाब देखकर गुरूदेव बोले -"गुलाब की यह कली मुझे एक कविता लिखने के लिए प्रेरित कर रही है। तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है? "

गांधीजी ने उत्तर दिया - "मेरे दिमाग में कोई कविता जन्म नहीं ले रही है। लेकिन मैं हर भारतीय बच्चे का चेहरा इस गुलाब की तरह ताजा, खिला हुआ और आशाओं से भरा हुआ देखना चाहता हूं। "

गुलाब की एक ही कली ने दो महापुरूषों के मन में दो महान विचारों को जन्म दिया।

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358

आखिर आप किस तरह लोगों की मदद करते हैं?

एक सामाजिक कार्यक्रम में अपने गुरूजी से मिलने पर एक मनोचिकित्सक ने अपने मन में उमड़ रहे एक प्रश्न को पूछने का निर्णय लिया।

उसने पूछा - "आखिर आप किस तरह लोगों की मदद करते हैं?"

गुरू जी ने उत्तर दिया - "मैं उनको उस सीमा तक ले जाता हूं कि उनके मन में कोई भी प्रश्न शेष न रहे। "

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114

एक पंडित चार ठग

पंडित जी यजमान के यहाँ से पूजा पाठ समाप्त कर अपने घर की ओर चले. यजमान ने उन्हें दान स्वरुप एक जर्सी नस्ल का बढ़िया बछिया दिया था, वह भी पंडित जी साथ ले चले. पंडित का घर कोई दस मील दूर था.

रास्ते में चार ठगों ने पंडित को बढ़िया जर्सी बछिया ले जाते हुए देखा तो पंडित को ठगने की योजना बनाई.

पहला ठग पंडित के पास पहुँचा और साष्टांग दंडवत करते हुए पंडित को बोला “पालागी पंडिज्जी. आज ई का हुई गवा है जो आप अपने संग कुतिया को लिये जा रहे हैं. पवित्र पंडितों के संग कुत्तों का क्या काम?”

“मूर्ख, तुम अपनी आँखों का इलाज करवाओ. यह तो जर्सी गाय की बछिया है” पंडित ने जवाब दिया, और आगे बढ़ गए.

कुछ दूर जाने के बाद पंडित के पास दूसरा ठग पहुँचा और उन्हें नमस्कार कर बोला – “पंडित जी कहीं जजमानी से आ रहे हैं? और आज का जजमान ने आपको दक्षिणा में कुतिया दिया है?”

पंडित ने बछिया की ओर एक निगाह डाली, और कहा – “ठीक से देख बदमाश कहीं का. तेरी नजर कमजोर तो नहीं. यह बछिया है, कुतिया नहीं.”

थोड़ी देर आगे बढ़ने के बाद तीसरा ठग पंडित के पास पहुँचा और वही बात दोहराई कि पंडित कुतिया को लेकर क्यों जा रहे हैं. पंडित ने तीसरी बार फिर उसे स्पष्ट किया कि यह बछिया है, कुतिया नहीं. मगर इस बार पंडित का विश्वास थोड़ा हिल गया था. तीसरे ठग के चले जाने के बाद उन्होंने बड़ी देर तक बछिया को सिर से लेकर पूंछ तक बारंबार छूकर-देखकर तसल्ली कर ली कि यह बछिया ही है. संयोग से उस वक्त उस मार्ग में अन्य कोई यात्री नहीं था जिससे यह स्पष्ट कर लिया जाता कि बछिया बछिया ही है, कुतिया नहीं.

पंडित जी के एकाध किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद मौका देखकर चौथा ठग पंडित के पास आया और उन्हें प्रणाम कर बड़ी देर तक प्रेमपूर्वक देश-दुनिया और दुनियादारी का वार्तालाप करता रहा. उसने पंडित को लालच भी दिया कि अगले हफ़्ते वो अपने घर पर सत्यनारायण की कथा का आयोजन करवाना चाहता है जिसमें पंडित जी जजमानी स्वीकारें. चलते चलते ठग ने योजनानुसार पंडित से कहा –“महाराज, आप आज कुतिया को अपने साथ क्यों लिए जा रहे हैं? क्या घर पर पालने का इरादा है?”

अब तो पंडित को पक्का यकीन हो गया कि यह हो न हो कुतिया ही है, जो उन्हें बछिया दिखाई दे रही है. शायद जजमान ने कुछ जादू कर दिया हो...

घर पहुंचने पर उनके साथ कुतिया को देख कर कहीं पंडिताइन उनका उपहास न कर दे, ऐसा सोचकर पंडित ने बछिया को वहीं छोड़ दिया और आगे बढ़ गए.

चारों ठग इस बात का तो जैसे सदियों से इंतजार कर ही रहे थे!

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115

साहस के प्रतिमान – नेताजी

एक बार नेताजी सुभाष चंद्र बोस रंगून में सैनिकों के एक कार्यक्रम में मार्चपास्ट पर सैल्यूट ले रहे थे.

मार्च पास्ट में रानी झांसी रेजीमेंट की महिला सैनिकों की बारी थी. इसी बीच आकाश में ब्रितानी हवाई जहाज दिखाई दिए जो हवाई हमले करने आ चुके थे.

आसपास के दूसरे जरनल और सैनिक जान बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की ओर दौड़े. देखते देखते हवाई हमले शुरू भी हो गए. मगर नेताजी अपनी जगह से हिले भी नहीं. यह देखकर महिला सैनिकों की टुकड़ी ने भी अपना मार्चपास्ट बेधड़क सम्पन्न किया.

नेताजी सचमुच साहस के प्रतिमान थे.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

355

किसका मनोरंजन - तुम्हारा या उसका

जब नसरुद्दीन चार साल के हुए तो आसपड़ोस की महिलाओं ने उनके जन्मदिन के अवसर पर एक पार्टी आयोजित की जिसमें विभिन्न खेलकूद प्रतियोंगिताओं का आयोजन हुआ।

जब काफी देर तक महिलाओं का खेलकूद जारी रहा तो नसरुद्दीन बोले - "आखिर ये सब कब खत्म होगा और मेरा नंबर कब आएगा।"

 

356

तीन छन्नी परीक्षण

प्राचीन यूनान में सुकरात नामक एक विख्यात दार्शनिक एवं ज्ञानी व्यक्ति रहा करते थे। एक दिन उनका एक परिचित उनसे मिलने आया और बोला - "क्या तुम जानते हो कि मैंने तुम्हारे मित्र के बारे में क्या सुना है?"

सुकरात ने उसे टोकते हुए कहा - "एक मिनट रुको। इसके पहले कि तुम मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताओ, उसके पहले मैं तीन छन्नी परीक्षण करना चाहता हूं।"

"तीन छन्नी परीक्षण?"

सुकरात ने कहा - "जी हां मैं इसे तीन छन्नी परीक्षण इसलिए कहता हूं क्योंकि जो भी बात आप मुझसे कहेंगे, उसे तीन छन्नी से गुजारने के बाद ही कहें।"

"पहली छन्नी है "सत्य "। क्या आप यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि जो बात आप मुझसे कहने जा रहे हैं, वह पूर्ण सत्य है?"

"व्यक्ति ने उत्तर दिया - "जी नहीं, दरअसल वह बात मैंने अभी-अभी सुनी है और...."

सुकरात बोले - "तो तुम्हें इस बारे में ठीक से कुछ नहीं पता है। "

"आओ अब दूसरी छन्नी लगाकर देखते हैं। दूसरी छन्नी है "भलाई "। क्या तुम मुझसे मेरे मित्र के बारे में कोई अच्छी बात कहने जा रहे हो?"

"जी नहीं, बल्कि मैं तो...... "

"तो तुम मुझे कोई बुरी बात बताने जा रहे थे लेकिन तुम्हें यह भी नहीं मालूम है कि यह बात सत्य है या नहीं।"- सुकरात बोले।

"तुम एक और परीक्षण से गुजर सकते हो। तीसरी छन्नी है "उपयोगिता "। क्या वह बात जो तुम मुझे बताने जा रहे हो, मेरे लिए उपयोगी है?"

"शायद नहीं..."

यह सुनकर सुकरात ने कहा - "जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, न तो वह सत्य है, न अच्छी और न ही उपयोगी। तो फिर ऐसी बात कहने का क्या फायदा?"

"तो जब भी आप अपने परिचित, मित्र, सगे संबंधी के बारे में कुछ गलत बात सुने,

ये तीन छन्नी परीक्षण अवश्य करें। "

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112

कोई मेरे सारे पाप धो दो!

गंगा नदी के घाट पर स्नानार्थियों की भीड़ थी. शुभ मुहूर्त पर सब अपने पाप गंगा नदी में धोने दूर-दराज से मुंह अंधेरे चले आए थे.

सब अपने अपने समय से स्नान ध्यान कर जा रहे थे. वहीं पर आगे एक गड्ढे में एक स्त्री गिरी हुई पड़ी थी. वह मदद के लिए हाथ उठाकर चिल्ला रही थी कि कोई उसे उस गड्ढे से बाहर निकलने में मदद करे!

लोग मदद के लिए हाथ बढ़ाते, मगर वह स्त्री हाथ पकड़ने से पहले उनसे पूछती – “यदि आप पूरी तरह निष्पाप हों. तभी आप मुझे बाहर निकालें. नहीं तो जो श्राप मुझपर है, वह आप पर स्थानांतरित हो जाएगा. और मैं यह भार अपने ऊपर लेना नहीं चाहती.”

लोग सहम जाते, कुछ क्षण विचार कर फिर आगे बढ़ जाते. बहुत देर हो गई. यही सिलसिला चलता रहा.

आखिर में एक युवक आया. वह गंगा में अभी हाल ही में स्नान कर आया था. उसके शरीर से नदी का पानी ढंग से सूखा भी नहीं था. उस स्त्री के क्रंदन सुनकर वह उसके पास पहुँचा. उस स्त्री ने उससे फिर वही बात दोहराई.

उस युवक ने पूरी बात सुनकर मुस्कुराते हुए कहा – “बिलकुल. मैं पूरी तरह निष्पाप व्यक्ति हूँ. देख नहीं रही कि मैं अभी गंगा से स्नान कर निकला हूँ. मेरे सारे पूर्व पाप पवित्र गंगा की नदी की धारा में धुल चुके हैं. और अभी तक मुझसे कोई नया पाप नहीं हुआ है. यदि मैं तुम्हें नहीं बचाऊं तो एक नया पाप जरूर हो जाएगा. अब जल्द अपना हाथ मुझे दो...”

हम सभी अपने कर्मकांड विश्वास-रहित तरीके से करते हैं. जिस दिन हममें विश्वास पैदा हो जाएगा, उस दिन चमत्कार भी हो जाएगा.

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113

पत्थरों का थैला

एक युवक को मुंह अंधेरे किसी दूसरे नगर जाना था. समय का भ्रम होने से वह घर से थोड़ा पहले निकल गया. रास्ते में नदी पड़ती थी. तय समय से यदि वह घर से निकलता तो सूर्योदय पर नदी तक पहुँच जाता जिससे उसे नदी पार करने में सहूलियत होती. मगर चूंकि वह जल्दी निकल गया था, अतः अभी भी घनघोर अँधेरा था. युवक ने सूर्योदय तक का समय नदी के किनारे काटने का निश्चय किया. वह बैठने के लिए समुचित चट्टान तलाशने लगा. इतने में उसके पैर से कोई चीज टकराई. उसने टटोला तो पाया कि वह एक थैला था. थैले के अंदर उसे लगा कि किसी ने पत्थरों के छोटे छोटे टुकड़े जमा कर रखे हैं. उसने बेध्यानी में थैला हाथ में ले लिया.

उसे नदी के किनारे पर ही बैठने लायक एक चट्टान मिल गया. नदी की कल कल धारा बह रही थी और वातावरण में सुमधुर संगीत की रचना कर रही थी.

युवक ने थैले से एक पत्थर निकाला और नदी की धारा में उछाल दिया. छप् की आवाज हुई और वो देर तर गूंजती रही. युवक ने दूसरा पत्थर थैले से निकाला और नदी की धारा में उछाल दिया. फिर से छप्प की आवाज हुई और एक नया संगीत बज उठा. युवक ने थैले के पत्थरों से देर तक संगीत की रचना की.

इतने में यकायक क्षितिज में सूर्य की किरणें चमकने लगीं. युवक के हाथ में थैले का आखिरी पत्थर था. वह उसे नदी की ओर उछालने ही वाला था कि एक चमकीली रौशनी उसके आँखों में पड़ी. वह रौशनी उसके हाथ में रखे पत्थर से परिवर्तित हो कर आ रही थी. उसके हाथ में हीरा था जो सूर्य प्रकाश से दमकने लगा था.

युवक ने अपना माथा पकड़ लिया. तो, वह अब तक थैले में भरी सामग्री को पत्थरों के टुकड़े समझ कर फेंक रहा था!

हम सभी क्षणिक आनंद की खातिर अपना बहुत सारा जीवन इसी  प्रकार पत्थर की तरह फेंकते रहते हैं, और तभी उसके महत्व को समझ पाते हैं जब जीवन का क्षीणांश बचता है.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

109

बापू का पर्यावरणमित्र दातुन

यरवदा जेल में एक बार गांधी जी ने नोटिस किया कि आश्रम के उनके सहयोगी काका कालेलकर नीम की कुछ पत्तियों की आवश्यकता होने पर भी पूरी की पूरी टहनी तोड़ लाते थे. बापू ने उन्हें समझाया कि यह भी एक किस्म की हिंसा है. और यदि हमें दो पत्ते भी किसी वृक्ष से तोड़ने हैं तो हमें वह प्रेमपूर्वक तोड़ना चाहिए, और पेड़-पौधों से क्षमायाचना करते हुए तोड़ना चाहिए.

काका कालेलकर ने अपने संस्मरण में इससे संबंधित एक अन्य वृत्तांत को बताया – “हमें बाहर से दातुन मिलना बंद हो गया, तो मैंने बापू के लिए नीम का एक बढ़िया दातुन तैयार किया, उसके सिरे को कुचल कर बढ़िया ब्रश बनाया और बापू को दिया. बापू ने ब्रश करने के बाद मुझे उसे दिया और कहा कि इसे फेंकना नहीं, बल्कि इसके ब्रश वाले हिस्से को काट कर फेंको और बाकी का पूरा अच्छा हिस्सा कल के लिए बचा कर रखो. इसका प्रयोग इसी तरह तब तक होना चाहिए जब तक कि यह पूरी तरह सूख ना जाए या फिर आसानी से पकड़ में न आए.

मैंने बापू से प्रतिवाद किया कि हम तो नित्य नया दातुन तोड़ सकते हैं क्योंकि आश्रम में नीम के पेड़ों की भरमार है. बापू ने कहा कि यह बात उन्हें भी मालूम है, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि हम इस तरह प्रकृति पर अत्याचार करें.”

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110

गुस्सा न करें

पांडवों को उनके गुरु ने पहला सबक यह सिखाया कि जो सबक वे उन्हें सिखाते हैं उन्हें वे अपने जीवन में भी उतारें. एक बार गुरु ने एक और सबक सिखाया – गुस्सा न हों. फिर गुरु ने अपने शिष्यों को कहा कि वे आज के सबक की परीक्षा कल लेंगे.

दूसरे दिन गुरु ने पांडव बंधुओं से पूछा कि क्या उन्होंने कल का सबक सीख लिया? युधिष्ठिर को छोड़कर बाकी चारों भाइयों ने स्वीकृति में सर हिलाया.

गुरु ने तीक्ष्ण दृष्टि से युधिष्ठिर की ओर देखा और पूछा – युधिष्ठिर, तुम्हें यह जरा सा सबक सीखने में क्या समस्या है? तुम्हारे चारों छोटे भाई इसे सीख लिए. सबक याद करो और मैं फिर कल तुमसे पूछूंगा.

अगले दिन गुरु ने कक्षा प्रारंभ होते ही सबसे पहले युधिष्ठिर से पूछा कि क्या उन्होंने सबक सीख लिया? युधिष्ठिर ने फिर से इंकार में सर हिलाकर जवाब दिया – “अभी नहीं गुरूदेव!”

गुरु ने आव देखा न ताव और तड़ से युधिष्ठिर को एक तमाचा जड़ दिया. और कहा “कैसे मूर्ख हो! जरा सा एक लाइन का सबक सीख नहीं सकते!”

युधिष्ठिर मार खाकर भी मुस्कुराते खड़े थे. गुरु को और ताव आ गया. बोले “मूर्ख, दंड पाकर भी किसलिए मुस्कुरा रहे हो! कारण बताओ नहीं तो तुम्हें और सज़ा मिलेगी.”

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया – “गुरुदेव, अब मैंने सबक सीख लिया!”

एक क्षण को गुरु को समझ में नहीं आया कि युधिष्ठिर क्या कह रहे हैं. परंतु दूसरे ही क्षण वे जड़वत हो गए. जो बात वे युधिष्ठिर को, अपने शिष्यों को सिखाना चाह रहे थे, वह बात युधिष्ठिर ने उन्हें सिखा दी थी!

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111

संसदीय हास-परिहास -5

राजाजी की बुद्धिमत्ता, सेंस ऑफ़ ह्यूमर और प्रत्युत्पन्नमति बेमिसाल थी. संसद में आयकर संबंधी चर्चा में एक बार उन्होंने बयान दिया –

“सरकार जनता पर दो तरीके से कर लगाती है. प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर. प्रत्यक्ष कर धनिकों पर लगता है और अप्रत्यक्ष कर आम, गरीब जनता पर. सरकार प्रत्यक्ष कर धनिकों पर उनके बर्दाश्त की सीमा तक लगाती है जब कि अप्रत्यक्ष कर आम जनता पर उस सीमा तक लगाती है जब तक कि वे इसे समझ नहीं सकते.”

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

353

उसका कोई परिवार नहीं है

एक परिवार रात्रिभोज के समय एकत्रित था। तभी घर के सबसे बड़े पुत्र ने घोषणा की कि वह गली के मोड़ पर रहने वाली लड़की से शादी करने जा रहा है।

यह सुनकर उसके पिता बोले – “लेकिन उस लड़की के परिवार ने तो उसके लिए एक भी पैसा नहीं छोड़ा है।”

माताजी बोलीं – “और उसने भी कोई बचत नहीं की है।”

छोटे भाई ने कहा – “वह फुटबॉल के बारे में भी कुछ नहीं जानती।”

बहन बोली – “और उसके बाल तो बिल्‍कुल जोकरों जैसे हैं।”

चाचाजी बोले – “वह हर समय सिर्फ उपन्‍यास ही पढ़ती रहती है।”

दादीजी बोलीं – “और वह बिल्‍कुल भी किफायती नहीं है।”

“आप सभी बिल्‍कुल सही कह रहे हैं परंतु वह फिर भी इस घर में आने के योग्‍य है।” – लड़के ने कहा।

“वह कैसे?” – सभी ने जानना चाहा।

लड़के ने कहा - “क्‍योंकि उसका कोई परिवार नहीं है।”

 

354

वास्‍तविक जीवन में तुलनात्‍मकता

एक नौजवान अमेरिकी युवक को व्‍हाइट हाउस में क्‍लर्क की नौकरी मिल गयी और उस राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाले भोज का आमंत्रण प्राप्‍त हुआ।

उसने सोचा कि उसकी माँ को यह जानकर बहुत खुशी होगी कि मैं व्‍हाइट हाउस से बोल रहा हूँ। अत: उसने अपनी माँ को फाने लगाया और बोला – “माँ, आज का दिन मेरे लिए बहुत बड़ा दिन है। तुम जानती हो क्‍यों? मैं इस समय व्‍हाइट हाउस से बोल रहा हूँ।”

लेकिन उसे माँ की ओर से अपेक्षा के अनुरूप प्रतिक्रिया नहीं मिली। बात के अंत में उन्‍होंने कहा – “बेटा आज मेरे लिए भी बहुत बड़ा दिन है।”

“सच माँ। कैसे?” – बेटा बोला।

“आखिरकार आज मैंने अपने घर की अटारी साफ कर ली है।” - माँ ने उत्‍तर दिया।

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107

अपने आप को प्रकाशित करें

जब बुद्ध मृत्युशैय्या पर थे, तो एक समय उनका एक शिष्य आनंद जार जार रोने लगा. बुद्ध ने क्षीण आवाज में उससे रोने का कारण पूछा.

आनंद ने कहा – “तथागत, मेरे जीवन का प्रकाश तो खत्म हो रहा है. आपके बगैर मेरे जीवन का क्या होगा? मैं आपके बगैर नहीं रह सकता.”

बुद्ध ने धीरे से कहा – “इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातें मत करो. अपने आप को प्रकाशित करो. प्रकाश तुम्हारे भीतर स्वयं है. उसे पहचानो.”

आपके भीतर भी बुद्ध जैसा प्रकाश है. उसे पहचानें. पहले अपने आप पर विश्वास करना सीखें.

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108

क्या आपके बगैर दुनिया रह लेगी?

एक व्यक्ति दुनियादारी छोड़कर सन्यास लेने का विचार कर रहा था. उसने अपने गुरु से यह बात बताई, परंतु साथ ही यह कहा कि उसका घर परिवार, बच्चे और पत्नी उसे सन्यास लेने नहीं दे रहे क्योंकि वे मुझसे बेहद प्यार करते हैं.

“प्यार!” गुरु ने कहा – “यह तो किसी सूरत प्यार नहीं है. अच्छा ठीक है सुनो...” और फिर गुरु ने उसे वह योग विद्या सिखाई जिससे वह अपनी सांसें रोककर मुर्दा जैसी अवस्था में घंटों रह सकता था.

दूसरे दिन वह व्यक्ति अपने घर पर मुर्दा पाया गया. परिवार के सारे लोग इकट्ठे हो गए. सभी जार जार रो रहे थे, विलाप कर रहे थे, क्रंदन कर रहे थे. पत्नी सबसे ज्यादा दुःखी प्रतीत हो रही थी.

वह व्यक्ति मुर्दा अवस्था में था, मगर योग अवस्था में आसपास के माहोल को महसूस कर सकता था, सुन सकता था. उसे बड़ा सुकून मिला कि उसका परिवार उसे कितना प्यार करता है. और वह सन्यास का इरादा त्यागने का फैसला कर लिया.

इतने में वहाँ उसका गुरु पहुँचा. उसने परिवार को सांत्वना दी और कहा कि वह इस मुर्दे में वापस जान फूंक सकता है. परंतु इसके लिए परिवार के किसी अन्य सदस्य को अपना प्राण त्यागना होगा.

और, यह क्या! सबकी सांसें ऊपर की ऊपर ही रह गईं. हरेक ने अपनी जिम्मेदारियाँ सुनानी शुरू कर दीं कि उसका जीना ज्यादा जरूरी है.

अंत में उसकी पत्नी की ओर गुरु ने देखा. पत्नी ने कहा – “हम इनके बगैर जी लेंगे...”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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46. ​​translate.google.com - वेब पेज, पीडीएफ़ और ऑफ़िस दस्तावेज़ों का अनुवाद करें.
. 47 kleki.com -विविध किस्म के ब्रश के साथ चित्र और रेखाचित्र बनाएं.
48. similarsites.com - अपनी पसंदीदा किस्म की नई साइटों की खोजबीन करें.
49 wordle.net - टैक्स्ट क्लाउड के साथ अपने लंबे पाठ का सार संक्षेप शीघ्रता से बनाएँ.
50. bubbl.us - ब्राउज़र में ही माइंड मैप बनाएं, ब्रेनस्टार्मिंग आइडियाबनाएं.
51. kuler.adobe.com - रंग के आइडिया प्राप्त करें तस्वीरों से रंग निकालें .
52. liveshare.com - किसी एलबम में अपनी तस्वीरों को तुरन्त साझा करें.
53 lmgtfy.com - जब आपके मित्र अपने दम पर गूगल का उपयोग करने में बेहद आलसी हों.
54. midomi.com - जब आपको किसी गीत का नाम जानना हो .
. 55 bing.com / को स्वचालित रूप से हर तरह के आकार वाले मोबाइल फोनों के लिए वॉलपेपर ढूंढें.
56 faxzero.com - मुक्त में ऑनलाइन फ़ैक्स भेजें - और भी फ़ैक्स सेवाएँ देखें.
. feedmyinbox.com 57 - ईमेल न्यूज़लेटर के रूप में आरएसएस फ़ीड प्राप्त करें.
58. ge.tt - जल्दी से किसी को कोई फ़ाइल भेजें, वे इसे डाउनलोड करने से पहले पूर्वावलोकन कर सकते हैं.
59 pipebytes.com - थर्ड पार्टी सर्वर पर अपलोड किए बगैर किसी भी आकार के फ़ाइल को हस्तांतरित करें.
. 60 tinychat.com - माइक्रो सेकंड में एक निजी चैट रुम सेटअप करें.
. 61 privnote.com - नोट्स बनाएँ जो पढ़े जाने के बाद खुद ही मिट जाता है.
62. boxoh.com - - गूगल मैप्स पर किसी भी शिपमेंट की स्थिति पर नजर रखें और विकल्प .
63. chipin.com -किसी अच्छे काम के लिए ऑनलाइन धन जुटाएं.
. downforeveryoneorjustme.com 64 - देखें कि आपकी पसंदीदा वेबसाइट ऑफ़लाइन है या नहीं है?
. ewhois.com 65 - किसी व्यक्ति के अन्य वेबसाइटों को रिवर्स एनॉलिटिक्स लुकअप के के जरिए देखें.
. whoishostingthis.com 66 - किसी भी वेबसाइट का वेब होस्ट खोजें.
67. google.com/history – गूगल में कुछ मिला था, परंतु अभी याद नहीं आ रहा?
68. aviary.com/myna – ऑनलाइन ऑडियो संपादक जिसमें ऑडियो क्लिपों को ऑनलाइन रेकॉर्ड व रीमिक्स कर सकते हैं.
69 disposablewebpage.com - कोई अस्थायी वेब पेज बनाएं जो खुद मिट जाता है.
70 urbandictionary.com - गालियों और अनौपचारिक शब्दों की परिभाषा ढूंढें.
. 71 seatguru.com - अपनी अगली उड़ान के लिए सीट बुक करने से पहले इस साइट से परामर्श करें .
72. Sxc.hu - डाउनलोड करें स्टॉक तस्वीरें बिल्कुल मुफ्त में.
73. zoom.it - स्क्रॉल किए बिना अपने ब्राउज़र में हाई रिजॉल्यूशन चित्रों को देखें.
74. scribblemaps.com - मनमाफिक गूगल मैप्स आसानी से बनाएं .
75 alertful.com - महत्वपूर्ण तिथियों के लिए ईमेल रिमाइंडर सेटअप करें.
. 76 encrypted.google.com - अपने आईएसपी और अपने बॉस की नजरों से अपनी खोज क्वेरियों को दूर रखें .
. 77 formspring.me - यहाँ पर आप व्यक्तिगत सवाल-जवाब कर सकते हैं.
78 sumopaint.com लेयर आधारित एक उत्कृष्ट ऑनलाइन छवि संपादक.
. snopes.com 79 - लॉटरी खुलने की खबर बताता ईमेल असली है या नकली यह पता करें .
80 typingweb.com - टच टाइपिंग में महारत हासिल करने के लिए अभ्यास करें .
. 81 mailvu.com - अपने वेब कैम का उपयोग कर किसी को वीडियो ईमेल भेजें.
82. timerime.com - ऑडियो, वीडियो और छवियों के साथ टाइमलाइन बनाएँ.
83 stupeflix.com - अपनी छवियों, ऑडियो और वीडियो क्लिप से एक फिल्म बनाएं.
84. safeweb.norton.com - किसी भी वेबसाइट के ट्रस्ट लेयर की जाँच करें.
85 teuxdeux.com - कार्य सूची बनाने के लिए एक सुंदर एप्प जो कागज की डायरी जैसा दिखता है.
86. deadurl.com - जब आपके बुकमार्क किए गए वेब पृष्ठ हटा लिए जाएंगे तब आपको इसकी जरूरत पड़ सकती है.
87. minutes.io - बैठक के दौरान त्वरित नोट्स लेने के लिए.
88. youtube.com / leanback - यूट्यूब चैनल टीवी मोड में देखें.
89. youtube.com/disco – अपने पसंदीदा कलाकार का वीडियो प्लेलिस्ट बनाएं.
90. talltweets.com - 140 अक्षरों से अधिक लंबे ट्वीट भेजें.
. 91 pancake.io - अपने ड्रॉपबॉक्स खाते का उपयोग कर एक निःशुल्क और सरल वेबसाइट बनाएँ.
92. builtwith.com - किसी भी वेबसाइट का टेक्नोलॉजी स्टैक ढूंढें.
93. woorank.com - एसईओ के नजरिए से किसी वेबसाइट का अनुसंधान करें.
94 mixlr.com वेब पर लाइव ऑडियो ब्रॉडकास्ट करें.
95. radbox.me - ऑनलाइन वीडियो बुकमार्क करें और उन्हें बाद में देखें ( समीक्षा ).
96 tagmydoc.com - अपने दस्तावेज़ों और प्रस्तुतियों में (QR कोड जोड़ें समीक्षा ).
97 notes.io ब्राउज़र में लघु पाठ नोट्स लिखने का आसान तरीका - .
98. ctrlq.org/html-mail – किसी को भी बेनामी रिच टैक्स्ट ईमेल भेजें.
99. fiverr.com  - $ 5 की छोटी सी रकम में कुछ छोटी-छोटी चीजें करने के लिए लोगों को काम पर रखें .
100 otixo.com - अपनी ऑनलाइन फ़ाइलें ड्रॉपबॉक्स, गूगल डॉक्स, आदि में आसानी से प्रबंधित करें
101. ifttt.com - अपने सभी ऑनलाइन खातों के बीच एक कनेक्शन बनाएं.

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( मूल अंग्रेजी आलेख http://labnol.org से साभार अनुवादित)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

351

क्या मुझे ही हर चीज के बारे में सोचना होगा?

एक समय की बात है अहमदाबाद शहर में कई दिनों तक एक निर्माण कार्य चलता रहा। उस कार्य में लगे श्रमिकों ने निर्माण कार्य समाप्त होने के बाद गंदगी और धूल का ढेर नहीं समेटा जिससे चारों ओर गंदगी के ढ़ेर नज़र आने लगे।

"वो देखो कितनी गंदगी पड़ी हुयी है!", "कोई है जो इसकी सफाई का प्रबंध करे!", "उनके गंदगी न समेटने के कारण उड़ती धूल से मेरे कीमती कपड़े गंदे हो गए है!", "आखिर नगर निगम कब इस गंदगी को साफ कराएगा!", "इस गंदगी के कारण हमारा शहर भिखारियों का अड्डा लगने लगा है!"

इस तरह की बातें सुनते-सुनते जब नसरुद्दीन ऊब गए तो एक दिन उन्होंने एक गडढ़ा बनाना शुरू कर दिया। उस गडढ़े की खुदाई के कारण गंदगी और धूल का एक और ढ़ेर बनने लगा।

यह देखकर एक नागरिक ने उनसे कहा - "नसरुद्दीन तुम गडढ़ा क्यों कर रहे हो?"

नसरुद्दीन ने उत्तर दिया - "मैं लोगों की शिकायतें सुनते-सुनते थक गया हूँ और मैंने यह निर्णय लिया है कि एक गडढ़ा खोदकर सारी गंदगी उसमे दफना दूं।"

"लेकिन तुम्हारे गडढ़ा खोदने से तो गंदगी का एक नया ढ़ेर बन रहा है।"- उस व्यक्ति ने कहा।

नसरुद्दीन चिल्लाये - "क्या मुझे ही हर चीज के बारे में सोचना होगा?"

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352

तुम्हारे बच्चों को इसकी जरूरत पड़ सकती है।

एक किसान इतना बूढ़ा हो गया था कि शारीरिक श्रम नहीं कर पाता था। वह अपने घर के छज्जे पर ही बैठा रहता और अपने बेटे को खेती करते हुए देखता रहता। उसका बेटा भी खेती करते समय थोड़ी-थोड़ी देर में अपने बाप को छज्जे पर बैठा देखता रहता। वह सोचने लगा कि उसका बाप बहुत बूढ़ा हो गया और किसी काम का नहीं है। उसका मर जाना ही अच्छा होगा।

एक दिन वह इतना परेशान हो उठा कि उसने अपने बाप के लिए एक ताबूत बनाया। छज्जे पर जाकर वह अपने बाप से बोला कि वह उस ताबूत में लेट जाए। बाप बिना एक भी शब्द बोले चुपचाप उस ताबूत में जाकर लेट गया। उसका बेटा ताबूत को सरकाता हुआ खेत के उस कोने तक ले गया जहाँ एक गहरी खाई थी। वह उस ताबूत को खाई में फेंकने ही वाला था कि उसे ताबूत में कुछ हलचल महसूस हुई। उसने ताबूत का ढक्कन सरकाया तो बूढ़ा बाप बोला - "मुझे मालूम है कि तुम मुझे खाई में फेकने जा रहे हो पर तुम इस ताबूत को मेरे साथ मत फेंको, तुम्हारे बच्चों को इसकी जरूरत पड़ सकती है।"

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105

बीच रस्ते से अपने आप को हटा लें

एक काष्ठ शिल्पी था, जिसकी मूर्तियाँ सजीव प्रतीत होती थीं. किसी ने उससे पूछा कि उसकी मूर्तियाँ इतनी सजीव कैसे होती हैं.

शिल्पी ने बताया – “जब मैं कोई शिल्प बनाने जाता हूँ तो सबसे पहले मन में एक आकार ले आता हूँ. फिर उस आकार के हिसाब से लकड़ी ढूंढने जंगल में चला जाता हूँ. वहाँ वृक्षों में उस आकृति को ढूंढता हूँ, और जब वह आकृति मुझे किसी वृक्ष में दिखाई दे जाती है तो मैं उसका वह हिस्सा काट कर ले आता हूँ और मनोयोग से शिल्प उकेरता हूँ.”

मनोयोग से किए गए कार्य जीवन से परिपूर्ण होते हैं. एक विश्वप्रसिद्ध वायलिन वादक ने कभी कहा था – मेरे पास शानदार संगीत के नोट्स हैं, शानदार वायलिन है. मैं इन दोनों को मिलाकर इनके रास्ते से हट जाता हूँ!

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106

अपने आप को बख्श दें

एक संत को किसी मुद्दे पर अपने आप पर गुस्सा आ गया और शर्मिंदा होकर उन्होंने अपना वह आश्रम छोड़कर जाने की ठान ली.

वे उठे और अपना खड़ाऊँ पहनने लगे.

थोड़ी ही दूरी पर ठीक उनके जैसा ही दिखने वाला संत भी खड़ाऊं पहन रहा था. इस संत ने उससे पूछा कि वो कौन है और कहाँ से आया है. क्योंकि इससे पहले उस संत को वहाँ कभी देखा नहीं गया था.

उस संत ने कहा – मैं आप ही हूँ. आपका प्रतिरूप. यदि आप मेरी वजह से आश्रम छोड़कर जा रहे हैं तो मैं भी यह आश्रम छोड़कर जाऊंगा. स्वर्ग हो या नरक, जहाँ आप जाएंगे, वहीं मैं भी जाऊंगा!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

349

कोई भी वरदान मांग लो

उपनिषदों में एक कहानी का जिक्र है। प्रभु ने एक व्यक्ति की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होते हुए कहा - "हे मनुष्य! तुम मुझसे कोई भी वरदान मांग लो।"

भक्त ने कहा - "भगवन! मैं ठहरा अज्ञानी। मुझे इस बात का ज्ञान नहीं है कि मुझे आपसे क्या वरदान मांगना चाहिए। मुझे इस बात की भी जानकारी नहीं है कि मेरे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। आप मेरे लिए जो भी अच्छा समझें, वही मुझे प्रदान करें।"

इस तरह वह भक्त परीक्षा में खरा उतरा।

 

350

छोटी मछली

एक बार एक नैतिकतावादी दार्शनिक मुल्ला नसरुद्दीन के गांव से गुजर रहे थे। उन्होंने नसरुद्दीन से एक अच्छे भोजनालय के बारे में पूछा। नसरुद्दीन ने उन्हें भोजनालय का रास्ता बता दिया। दार्शनिक महोदय नसरुद्दीन के साथ शास्त्रार्थ के इच्छुक थे अतः उन्होंने नसरुद्दीन को भी भोजन के लिए आमंत्रित कर लिया। नसरुद्दीन खुशी-खुशी उनके साथ भोजनालय पहुंच गए। उन्होंने भोजनालय के बैरे से सबसे अच्छे व्यंजन के बारे में पूछा।

बैरे ने उत्तर दिया - "मछली! ताजी मछली!"

उन्होंने बैरे को दो मछली परोसने का आदेश दिया।

कुछ देर बाद वह बैरा एक बड़ी सी प्लेट में दो मछलियां लेकर आया। उनमें से एक मछली दूसरी से पर्याप्त बड़ी थी। बिना किसी झिझक के नसरुद्दीन ने बड़ी मछली उठाकर अपनी प्लेट में रख ली। दार्शनिक ने नसरुद्दीन की ओर गुस्से और अविश्वास के साथ देखा और कहने लगा कि उसका यह कार्य स्वार्थ की श्रेणी में आता है और यह नैतिक, धार्मिक और सदाचार मूल्यों का सरासर उल्लंघन है.......। नसरुद्दीन ने दार्शनिक का भाषण पूर्ण शांति के साथ सुना और जब वे चुप हो गए तो नसरुद्दीन ने उनसे कहा - "तो ऐसे में आप क्या करते?"

दार्शनिक ने उत्तर दिया - "एक भला इंसान होने के नाते मैं अपने लिए छोटी मछली उठाता।"

नसरुद्दीन ने तपाक से छोटी मछली उनकी प्लेट में रखते हुए कहा - "तो ये लीजिए जनाब। मैं भी तो यही कर रहा हूं।"

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103

एक फूटे हुए घड़े की कहानी

उस गांव के निवासियों को दूर नदी से पानी लाना पड़ता था. गांव के एक निवासी के पास दो घड़े थे जिसे वह कांवर में दोनों सिरों पर टाँग लेता था और उनमें पानी लाता था. एक घड़ा सही था, पर दूसरे घड़े में छेद था जिससे पानी टपकता था. नदी से घर तक आते आते सही वाले घड़े में तो पूरा पानी रहता था, मगर छेद वाले घड़े का पानी आधा रह जाता था.

एक दिन उसकी पत्नी ने उससे कहा – तुम यह छेद वाला घड़ा बदल क्यों नहीं देते हो. तुम जो पानी लेकर आते हो वो सारे रास्ते में एक तो गिराते हुए आते हो और फालतू की मेहनत भी करते हो.

उस निवासी ने पत्नी को जवाब देने के बजाए कहा कि वो कल उसके साथ पानी लेने को चले.

दूसरे दिन नियत समय पर वह निवासी अपनी पत्नी के साथ पानी लेने गया. लौटते समय उसके फूटे घड़े से पानी बूंद बूंद रास्ते भर टपक रहा था. और, उसकी पत्नी ने देखा कि पूरे रास्ते रंगबिरंगे फूलों के पौधे उगे हुए हैं उनमें टपक विधि से सिंचाई हो रही है. अब उसे ध्यान आया कि उसका पति रोज सुबह पूजा के लिए ताजे फूल इन्हीं पौधों से लेकर आता था.

हम सभी में कुछ न कुछ खामियाँ होती हैं. हम सभी फूटे घड़े के माफिक हैं. हमें अपनी खामियों को समझते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ देने की सदैव कोशिश करना चाहिए.

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104

शिष्टता की स्वर्णजयंती

एक दंपति ने अपनी वैवाहिक स्वर्णजयंती धूमधाम से मनाई. दूसरे दिन सुबह रोज की तरह दंपति नाश्ते की टेबल पर बैठे. आज स्त्री ने सोचा – “पिछले पचास वर्षों से नित्य ही मैंने अपने पति को ब्रेकफास्ट रोल का बढ़िया कुरकुरा ऊपरी हिस्सा खाने को दिया है और हमेशा अपने लिए निचला हिस्सा रखा है. आज मैं इस ऊपरी हिस्से को अपने लिए रखती हूँ, और उन्हें इसका निचला हिस्सा पेश करती हूँ.”

और उसने ऊपरी हिस्से में बढ़िया, डबल बटर लगाया और उसे अपने लिए रख लिया. और रोल का निचला हिस्सा बटर लगाकर पति को पेश किया.

यह देख उसका पति बेहद प्रसन्न हो गया और बोला – “डार्लिंग, आज तो मजा आ गया. पिछले पचास वर्षों से मैंने इस रोल का निचला हिस्सा खाया नहीं था, जो सदा से मुझे बेहद पसंद रहा है. परंतु मैंने कभी कहा नहीं क्योंकि तुम्हें यह खाना हमेशा अच्छा लगता रहा है.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक का नया  वर्जन 2.2.5.0 जारी हो गया है जिसमें मिश्रित सामग्री को भी शुद्धता से परिवर्तिक करने का विकल्प है.

प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक के नए संस्करण में आप द्विभाषी - अंग्रेज़ी-हिंदी मिश्रित सामग्री को (वर्ड, एक्सेल से कॉपी-पेस्ट किए गए) भी जस का तस फ़ॉर्मेटिंग इत्यादि बनाए रखते हुए, टेबल इत्यादि को उसी रूप में रखते हुए भी यूनिकोड में बदल सकते हैं. परिवर्तन करते समय द्विभाषी फ़ॉन्ट के लिए - परिवर्तनीय पाठ्य सामग्री द्वि-भाषी फ़ॉन्ट में है वाले चेक बक्से में सही का निशान लगाना न भूलें.

इस फ़ॉन्ट परिवर्तक में 262 हिंदी - देवनागरी फ़ॉन्ट को यूनिकोड में परिवर्तित करने का विकल्प भी है - यह तमाम सुविधाएँ किसी भी अन्य परिवर्तक में उपलब्ध नहीं है. पूरी फ़ॉन्ट सूची आपकी सुविधा के लिए नीचे दी गई है.

 

image

इस सॉफ़्टवेयर का डेमो संस्करण आप मुफ़्त डाउनलोड कर प्रयोग कर देख सकते हैं कि यह आपकी आवश्यकतानुरूप कार्य कर रहा है या नहीं. डाउनलोड लिंक है -

Demo Link:-

http://www.4shared.com/zip/zXERndaY/prakharfontparivartak.html

फ़ॉन्ट सूची जो प्रखर फ़ॉन्ट परिवर्तक इन में लिखी सामग्री को शत प्रतिशत शुद्धता के साथ यूनिकोड में परिवर्तित कर सकता है :-

1.) 4CBabu {४सीबाबू}**

2.) 4CGandhi {४सीगाँधी}**

3.) 4CHindBody {४सीहिन्दबॉडी}

4.) AADevAksharReg {एएदेवअक्षररीज}

5.) AADevApsBil {एएदेवएपीएसबाईएल}

6.) AADevApsReg {एएदेवएपीएसरीज}

7.) AADevIndicaReg {एएदेवइंडिकारीज}

8.) AADevIsfocBil {एएदेवआइएसएफओसीबाईएल}

9.) AADevIsfocReg {एएदेवआइएसएफओसीरीज}

10.) AADevKrutiReg {एएदेवकृतिरीज}

11.) AADevPrakashakReg {एएदेवप्रकाशकरैग्}

12.) AADevShreeLipiBil {एएदेवश्रीलिपिबाईएल}

13.) AADevShreeLipiReg {एएदेवश्रीलिपिरीज}

14.) AADevSulipiReg {एएदेवसुलिपिरीज}

15.) AADevSushaReg {एएदेवशुषारीज}

16.) AARitu {आऋतु}**

17.) AARituCompare {आऋतुकम्पेयर}**

18.) AARituPlus {आऋतुप्लस}**

19.) AARituPlus2-Numbers **{आऋतुप्लस२—नम्बर्स}

20.) AARituPlus2 {आऋतुप्लस२}**

21.) Aarti {आरती}

22.) Agra {आगरा}

23.) Agra Thin {आगरा थिन}

24.) Ajay Normal {अजय नॉर्मल}

25.) AkLitePriya {एकेलाईटप्रिया}

26.) AkrutiDev_BYogini {अकृतिदेव_बीयोगिनि}

27.) AkrutiDevWeb {अकृतिदेववेब}

28.) AkrutiDevYogini {अकृतिदेवयोगिनि}

29.) AkrutiDynamicYogini {अकृतिडायनामिकयोगिनि}

30.) AkrutiOfficePriya {अकृतिऑफिसप्रिया}

31.) AkrutiSanPriya {अकृतिसंप्रिया}

32.) Aman {अमन}

33.) Ankit {अंकित}

34.) APS-C-DV-Prakash {एपीएस-सी—डीवी-प्रकाश}

35.) APS-DV-Prakash {एपीएस-डीवी-प्रकाश}

36.) APS-DV-Priyanka {एपीएस-डीवी-प्रियंका}

37.) Arjun {अर्जुन}

38.) Aryan2 {आर्यन २}

39.) AU {अमर उजाला}

40.) B Bharati Kautilya {बी भारती कौटिल्या}

41.) B Bharati Santosh {बी भारती संतोष}

42.) BF_Devanagari {बीएफ_देवनागरी}

43.) Bhaskar {भास्कर} 236KB

44.) Bhaskar {भास्कर} 63.1KB

45.) Bhaskar {भास्कर} 69.4KB

46.) BRH Devanagari {बरहा देवनागरी}

47.) CCDV-AKRPUB-LAYOUT {अकृति—लेआउट}

48.) CCDV-AKS-LAYOUT {अक्षर—लेआउट}

49.) CCDV-AU-LAYOUT {अमर उजाला—लेआउट}

50.) CCDV-IND-LAYOUT {इंडिका—लेआउट}

51.) CCDV-ISM-BI-LAYOUT {आइएसएम—बाई—लेआउट}

52.) CCDV-ISM-LAYOUT {आइएसएम—लेआउट}

53.) CCDV-ITR-LAYOUT {आइटीआर—लेआउट}

54.) CCDV-KRT-LAYOUT {कृति—लेआउट}

55.) CCDV-PRK-LAYOUT {प्रकाशक—लेआउट}

56.) CCDV-RNG1-LAYOUT {रंगोली१—लेआउट}

57.) CCDV-RNG2-LAYOUT {रंगोली२—लेआउट}

58.) CCDV-SRI2-LAYOUT {श्री२—लेआउट}

59.) CCDV-SRI3-LAYOUT {श्री३—लेआउट}

60.) CCDV-SRI708-LAYOUT {श्री७०८—लेआउट}

61.) CCDV-SULIPI-LAYOUT {सुलिपि—लेआउट}

62.) CCDV-SUSHA-LAYOUT {शुषा—लेआउट}

63.) CCDV-WEBDUNIA-LAYOUT {वेबदुनिया—लेआउट}

64.) Chanakya {चाणक्य}

65.) Chanakya {चाणक्य}** : (Type1 Font)

66.) Chandini {चाँदनी}

67.) ChandiniE {चाँदनीइ}

68.) Devanagari {देवनागरी}

69.) Devanagari New {देवनागरी न्यू}

70.) DevLys 010 {देवलिस ०१०}

71.) DevLys 020 {देवलिस ०२०}

72.) DevLys 020 Thin {देवलिस ०२० थिन}

73.) DevLys 030 {देवलिस ०३०}

74.) DevLys 110 {देवलिस ११०}

75.) DevLys 140 {देवलिस १४०}

76.) Devmarathi {देवमराठी}

77.) Divyansh {दिव्याँश}

78.) Dtyash {डीटीयश}

79.) DV-AakashExBold {डीवी-आकाशएक्सबोल्ड}

80.) DV-TTAakash {डीवी-टीटी आकाश}

81.) DV-TTBhima {डीवी-टीटी भीमा}

82.) DV-TTGanesh {डीवी-टीटी गणेश}

83.) DV-TTGaneshEN {डीवी-टीटी गणेश इएन}

84.) DV-TTManohar {डीवी-टीटी मनोहर}

85.) DV-TTMayur {डीवी-टीटी मयूर}

86.) DV-TTNatraj {डीवी-टीटी नटराज}

87.) DV-TTRadhika {डीवी-टीटी राधिका}

88.) DV-TTSurekh {डीवी-टीटी सुरेख}

89.) DV-TTSurekhEN {डीवी-टीटी सुरेख इएन}

90.) DV-TTVasundhara {डीवी-टीटी वसुन्धरा}

91.) DV-TTYogesh {डीवी-टीटी योगेश}

92.) DV-TTYogeshEN {डीवी-टीटी योगेश इएन}

93.) DV_Divya {डीवी—दिव्या}

94.) DV_Divyae {डीवी—दिव्याइ}

95.) DV_ME_Shree.... {डीवी_एमइ_श्री....}

96.) DVB-TTSurekh {डीवीबी-टीटी सुरेख}

97.) DVB-TTSurekhEN {डीवीबी-टीटी सुरेख इएन}

98.) DVB-TTYogesh {डीवीबी-टीटी योगेश}

99.) DVB-TTYogeshEN {डीवीबी-टीटी योगेश इएन}

100.) DVBW-TTSurekh {डीवीबीडब्ल्यू-टीटी सुरेख}

101.) DVBW-TTYogeshEN {डीवीबीडब्ल्यू-टीटी योगेश इएन}

102.) DVBW Surekh Avid {डीवीबीडब्ल्यू सुरेख ऐविड}

103.) DVTTGita {डीवीटीटीगीता}

104.) DVW-TTSurekh {डीवीडब्ल्यू-टीटी सुरेख}

105.) DVW-TTYogeshEN {डीवीडब्ल्यू-टीटी योगेश इएन}

106.) ePatrika {ईपत्रिका}

107.) GIST-DVTTAjay {जिस्ट-डीवीटीटी अजय}

108.) GIST-DVTTAniket {जिस्ट-डीवीटीटी अनिकेत}

109.) GIST-DVTTAnjali {जिस्ट-डीवीटीटी अंजली}

110.) GIST-DVTTBrinda {जिस्ट-डीवीटीटी ब्रिंदा}

111.) GIST-DVTTDhruv {जिस्ट-डीवीटीटी ध्रुव}

112.) GIST-DVTTDiwakar {जिस्ट-डीवीटीटी दिवाकर}

113.) GIST-DVTTJamuna {जिस्ट-डीवीटीटी जमुना}

114.) GIST-DVTTJanaki {जिस्ट-डीवीटीटी जानकी}

115.) GIST-DVTTKishor {जिस्ट-डीवीटीटी किशोर}

116.) GIST-DVTTKundan {जिस्ट-डीवीटीटी कुंदन}

117.) GIST-DVTTMadhu {जिस्ट-डीवीटीटी मधु}

118.) GIST-DVTTMalini {जिस्ट-डीवीटीटी मालिनी}

119.) GIST-DVTTManohar {जिस्ट-डीवीटीटी मनोहर}

120.) GIST-DVTTMayur {जिस्ट-डीवीटीटी मयूर}

121.) GIST-DVTTMegha {जिस्ट-डीवीटीटी मेघा}

122.) GIST-DVTTMohini {जिस्ट-डीवीटीटी मोहिनी}

123.) GIST-DVTTNayan {जिस्ट-डीवीटीटी नयन}

124.) GIST-DVTTNeha {जिस्ट-डीवीटीटी नेहा}

125.) GIST-DVTTNinad {जिस्ट-डीवीटीटी निनाद}

126.) GIST-DVTTPrakash {जिस्ट-डीवीटीटी प्रकाश}

127.) GIST-DVTTPreetam {जिस्ट-डीवीटीटी प्रीतम}

128.) GIST-DVTTRajashri {जिस्ट-डीवीटीटी राजश्री}

129.) GIST-DVTTRanjita {जिस्ट-डीवीटीटी रंजीता}

130.) GIST-DVTTSagar {जिस्ट-डीवीटीटी सागर}

131.) GIST-DVTTSamata {जिस्ट-डीवीटीटी समता}

132.) GIST-DVTTSamir {जिस्ट-डीवीटीटी समीर}

133.) GIST-DVTTShital {जिस्ट-डीवीटीटी शीतल}

134.) GIST-DVTTShweta {जिस्ट-डीवीटीटी श्वेता}

135.) GIST-DVTTSumeet {जिस्ट-डीवीटीटी सुमीत}

136.) GIST-DVTTSwapnil {जिस्ट-डीवीटीटी स्वपनिल}

137.) GIST-DVTTVasundhara {जिस्ट-डीवीटीटी वसुन्धरा}

138.) GIST-DVTTVijay {जिस्ट-डीवीटीटी विजय}

139.) GIST Hindi Tall {जिस्ट हिन्दी टॉल}

140.) Hemant {हेमन्त}

141.) Hemant Condensed {हेमन्त कण्डेंस्ड}

142.) Hemant Thin {हेमन्त थिन}

143.) Hemant Wide {हेमन्त वाईड}

144.) Hindi Saral-1 {हिन्दी सरल—१}

145.) HINDI012 {हिन्दी०१२}

146.) Hinmith... {हिंमिथ...}

147.) HINmith018 {हिंमिथ०१८}

148.) HINmith033 {हिंमिथ०३३}

149.) HTChanakya {एचटी-चाणक्य}

150.) iitmhind {आईआईटीएमहिंदी}

151.) iitmsans {आईआईटीएमसंस्कृत}

152.) Jagran {जागरण}

153.) JC-BELA {जेसी—बेला}**

154.) JC_Hindi {जेसी_हिन्दी}

155.) Kanika {कनिका}

156.) Kautilya {कौटिल्या}

157.) KBC_25 {केबीसी_२५}

158.) KF-Kiran {केएफ—किरण}

159.) Kiran {किरण}

160.) Krishna {कृष्णा}

161.) Kruti Dev 010 {कृतिदेव ०१०} 56.2KB

162.) Kruti Dev 010 {कृतिदेव ०१०} 59.2KB

163.) Kruti Dev 010 Condensed {कृतिदेव ०१० कण्डेंस्ड}

164.) Kruti Dev 016 {कृतिदेव ०१६}

165.) Kruti Dev 020 {कृतिदेव ०२० }

166.) Kruti Dev 020 {कृतिदेव ०२०}

167.) Kruti Dev 030 {कृतिदेव ०३०}

168.) Kruti Dev 040 {कृतिदेव ०४०}

169.) Kruti Dev 180 {कृतिदेव १८०}

170.) Kruti Dev 501 {कृतिदेव ५०१}

171.) KrutiPad 010 {कृतिपैड ०१०}

172.) KrutiPad 030 {कृतिपैड ०३०}

173.) Kundli {कुण्डली}

174.) LangscapeDevPooja {लैंगस्केपदेवपूजा}

175.) LangscapeDevPriya {लैंगस्केपदेवप्रिया}

176.) LokWeb {लोकवेब}

177.) ManjushaMedium {मंजुषामीडियम}

178.) Marathi-Kanak {मराठी—कनक}

179.) Marathi-Kanchan {मराठी—कंचन}

180.) Marathi-Lekhani-Ital {मराठी—लेखनी—इटाल}

181.) Marathi-Lekhani {मराठी—लेखनी}

182.) Marathi-Roupya {मराठी—रॉउप्या}

183.) Marathi-Saras {मराठी—सरस}

184.) Marathi-Tirkas {मराठी—तिर्कस}

185.) Marathi-Vakra {मराठी—विक्रा}

186.) Marathi Sharada {मराठी शारदा}

187.) Marathi Tirkas {मराठी तिर्कस}

188.) MARmith0 {मराठीमिथ०}

189.) Maya {माया}

190.) MillenniumNilimaFX {मिलेनियम निलिमाएफएक्स}

191.) MillenniumVarun {मिलेनियम वरुण}

192.) MillenniumVarunFX {मिलेनियम वरुणएफएक्स}

193.) MillenniumVarunWeb {मिलेनियम वरुणवेब}

194.) MONARCH_devnagri {मोनॉर्क_देवनागरी}

195.) MONARCH_devnagri2 {मोनॉर्क_देवनागरी२}

196.) MSANGAM {एमसंगम}

197.) Naidunia {नईदुनिया}

198.) Narad-... {नारद—...}

199.) Narad {नारद}**

200.) NewDelhi {न्यूदेल्ही}

201.) NewDelhi {न्यूदेल्ही}**

202.) Pankaj {पंकज}

203.) Paras-Hindi {पारस—हिन्दी}**

204.) Paru {पारु}

205.) Patrika {पत्रिका}

206.) PIC {पीआर्इसी}

207.) Radhika {राधिका}**

208.) Richa {रिचा}

209.) RK Sanskrit {आरके संस्कृत}

210.) ROHINI {रोहिणी}**

211.) Ruchi-Normal {रुचि—नॉर्मल}

212.) Saji-Hindi {साज़ि—हिन्दी}

213.) Sanskrit {संस्कृत}

214.) Sanskrit 1.2 {संस्कृत १.२}

215.) Sanskrit 98 {संस्कृत ९८}

216.) Sanskrit 99 {संस्कृत ९९}

217.) Sanskrit 99 ps {संस्कृत ९९ पीएस}**

218.) Sanskrit New {संस्कृत न्यू}

219.) Sanskrit99classic {संस्कृत९९क्लासिक}

220.) Sanskritpc {संस्कृतपीसी}

221.) SansPost {संस्कृत पोस्ट}**

222.) Saroj {सरोज}

223.) SD-TTSurekh {एसडी-टीटी सुरेख}

224.) Shiva-Medium {शिवा—मीडियम}**

225.) Shiva {शिवा}**

226.) Shivaji01 {शिवाजी ०१}

227.) Shivaji02 {शिवाजी ०२}

228.) Shivaji05 {शिवाजी ०५}

229.) ShivaMedium {शिवा मीडियम}

230.) Shree-Dev-001 {श्री—देव—००१}

231.) Shree-Dev-0702 {श्री—देव—०७०२}**

232.) Shree-Dev-0708 {श्री—देव—०७०८} 53.1KB

233.) Shree-Dev-0708 {श्री—देव—०७०८} 57.0KB

234.) Shree-Dev-0714 {श्री—देव—०७१४}

235.) SHREE-DEV-0726-S00 {श्री—देव—०७२६—एस००}

236.) SHREE-DEV-0726-S01 {श्री—देव—०७२६—एस०१}

237.) Shree-Pud-77NW {श्री—पुढ—77एनडब्ल्यू}

238.) SHREE-PUDHARI {श्री—पुढरी}

239.) SHREE708 {श्री७०८}

240.) Shusha {शुषा}

241.) Shusha02 {शुषा ०२}

242.) Shusha05 {शुषा ०५}

243.) st01web {एसटी०१वेब}

244.) SUBAK-1 {सुबक—१}

245.) SUBAK {सुबक}

246.) tbdsunil {टीबीडीसुनील}

247.) Udgam {उद्गम}

248.) Varsha {वर्षा}

249.) Vigyapti {विज्ञप्ति}

250.) Vimal {विमल}

251.) W-C-905 {डब्ल्यू-सी-९०५}**

252.) Walkman-Chanakya-901 **{वॉकमैन-चाणक्य-९०१}

253.) Walkman-Chanakya-902 {वॉकमैन-चाणक्य-९०२}

254.) Walkman-Chanakya-905 **{वॉकमैन-चाणक्य-९०५}

255.) Walkman-Yogesh-Outline-1003 **{वॉकमैन-योगेश-आउटलाइन-१००३}

256.) Webdunia {वेबदुनिया}

257.) Xdvng {एक्सदेवनागरी}

258.) XdvngMod {एक्सदेवनागरीमॉड}

259.) YogeshBold {योगेशबोल्ड}

260.) YogeshMedium {योगेशमीडियम}

261.) Yogeshweb {योगेशवेब}

262.) Yuvraj {युवराज}

Note:- फ़ॉन्ट सूची में ** टाइप-१ फ़ॉन्ट को दर्शित करता है। शेष ट्रू टाइप फ़ॉन्ट हैं। बेव पर कुछ फ़ॉन्ट एक ही नाम से उपलब्ध हैं जबकि उनकी कैरेक्ट तालिका में कैरेक्ट कोड भिन्न हैं। उनको हमने फ़ाइल साइज के रूप में अन्तर से दिखाया गया है। जैसे किः-

Bhaskar {भास्कर} 236KB

Bhaskar {भास्कर} 63.1KB

Bhaskar {भास्कर} 69.4KB

Kruti Dev 010 {कृतिदेव ०१०} 56.2KB

Kruti Dev 010 {कृतिदेव ०१०} 59.2KB

Shree-Dev-0708 {श्री—देव—०७०८} 53.1KB

Shree-Dev-0708 {श्री—देव—०७०८} 57.0KB

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सॉफ़्टवेयर से संबंधित अधिक जानकारी के लिए इसके डेवलपर श्री जगदीप डांगी से उनके ईमेल - dangijs@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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