टायलेट मंदिर दोऊ सामने जाऊं काके बताय, बलिहारी प्रेशर आपनो जल्दी टायलेट जाय

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टायलेट मंदिर दोऊ सामने जाऊं काके बताय

बलिहारी प्रेशर आपनो जल्दी टायलेट जाय

वैसे, समस्त ब्रह्मांड में किसी मंत्री का सर्वकालिक सत्यवचन इसे माना जाना चाहिए. या ये भी कहा जा सकता है कि भारत के किसी मंत्री ने पहली बार सत्यवचन कहे हैं.

सवाल ये है कि टायलेट (शौचालय से गरीबी की बू आती है, जबकि टायलेट से अमीरी की खुशबू, इसीलिए हम इसी शब्द का प्रयोग करेंगे) मंदिर से ज्यादा पवित्र क्यों है. आइए, जरा पड़ताल करें.

तो पहले ये देखें कि आप मंदिर क्यों जाते हैं? (मंदिर की जगह आप गिरिजाघर, मस्जिद, गुरुद्वारा कुछ भी प्रतिस्थापित करने को स्वतंत्र हैं)

  • · मंदिर में आप अपने पिछले कर्मों के पाप धोने जाते हैं.
  • · मंदिर आप शांति की तलाश में जाते हैं
  • · मंदिर आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर की पूजा प्रार्थना करने जाते हैं
  • · मंदिर आप मृत्युपरांत स्वर्ग प्राप्ति के लिए जाते हैं
  • · मंदिर आप अपने अगले जन्म में शानदार जीवन प्राप्ति के लिए जाते हैं

अब जरा देखें कि आप टायलेट क्यों जाते हैं.

  • · टायलेट में आप पिछले दिन का पाप धोने जाते हैं. चाहे वो मूली के पराँठे हों या केएफसी का बर्गर सब कुछ धुलता है, और आपके किए गए पाप (खानपान) के मुताबिक होता है. यहाँ भी आप वही दुआ करते हैं कि कल बहुत पाप हो गया था, अब आगे कोई पाप नहीं करेंगे, मगर टायलेट से बाहर आने के घंटे भर बाद भूल कर उन्हीं मॅकडोनल्ड्स और डोमिनोज़ के चक्कर लगाते नजर आते हैं.
  • · टायलेट के भीतर की शांति का कोई मुकाबला कर सकता है? आपकी खुद की सांसें भी यहाँ सुनाई पड़ती हैं. और कभी कभी तो शांति के (शांति से निपटने) के लिए अपनी खुद की सांसें भी रोकनी पड़ती हैं.
  • · टायलेट आप इस लिए जाते हैं कि आप फिर से, ज्यादा अच्छे से पेट पूजा कर सकें. पेट पूजा से बड़ी बड़ी पूजा इस दुनिया में है ही नहीं. सर्वशक्तिमान परमेश्वर की भी नहीं!
  • · टायलेट आप टायलेटोपरांत की स्वर्गिक अनुभूति के लिए जाते हैं. जरा एक नंबर और दो नंबर के प्रेशर को घंटे भर क्या, दस पंद्रह मिनट के लिए ही सही, रिलीज होने से रोक देखिए. और इसके बाद जब आपका प्रेशर रिलीज होगा तो उस स्वर्गिक अनुभूति की कल्पना इस या उस जीवन के स्वर्ग से शर्तिया कम ही होगी. और, लगता है कि मनुष्य ने स्वर्ग की कल्पना इसी अनुभूति को भोग कर ही की होगी.
  • · टायलेट आप इसलिए जाते हैं कि आपका आगे का आने वाला समय शानदार हो. यही नहीं, आपके आसपास का वातावरण भी दुर्गंध रहित, आवाज रहित, कष्टरहित हो.

अब तो आप मानेंगे न कि टायलेट मंदिर से ज्यादा पवित्र है.

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पोपट रात को एक भोज में छककर दही बड़े खा रहा था। अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़कर खाया।

अगली सुबह उसके टॉयलेट में से चिल्‍लाने की आवाज आ रही थी।

"ऊपरवाले या तो दहीबड़ा निकाल दे या जान निकाल देSSSSSSSS"

देखा आपने कई बार टॉयलेट में भी भगवान याद आ जाते हैं;.. ;)

शौचालय को 'चिन्‍तन कक्ष' तो बरसों से कहता चला आ रहा हूँ किन्‍तु शौचालाय पर और शौच क्रिया पर ऐसा चिन्‍तन पहली ही बार देखने का अवसर मिला।
मैं धन्‍य हुआ।

और आपका ये लेख ? हा हा हा कहीं ये भी तो प्रेशर से ...........................

जहाँ ईश्वर करे, उन्हें वहाँ शान्ति मिले..

मानना पड़ेगा किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है .

हा हा हा हा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हाहा हा हा हो हो हो हो

लोटपोट हो गया मैं तो :)

हास्‍य-विनोद से भरपूर पोस्‍ट। वैसे एक कहावत है कि दुनिया के तमाम महान विचारों का जन्‍म शौचालय में ही हुआ है।

हँस-हँस के बुरा हाल हो गया ,टायलेट जाने की नौबत आ गयी.
जयराम रमेश जी का ई-मेल पता दें,उन्हें भेजनी है.

करारा व्यंग्य :)

मुझे आपका ब्लोग मालुम नहीँ था मैने ये पोस्ट अनतरवासना फोरम से ली थी यहाँ का लिँक इसलिए नहीँ दिया क्योकि ये AUDELT ज्ञेणी मेँ आता हैँ क्षमा करे।।।अब आपकी पोस्ट हटाकर आपके ब्लोग का बर्णन शामिल कर दिया गया हैँ।

मुझे आपका ब्लोग मालुम नहीँ था मैने ये पोस्ट अनतरवासना फोरम से ली थी यहाँ का लिँक इसलिए नहीँ दिया क्योकि ये AUDELT ज्ञेणी मेँ आता हैँ क्षमा करे।।।अब आपकी पोस्ट हटाकर आपके ब्लोग का बर्णन शामिल कर दिया गया हैँ।

वरुण जी, धन्यवाद.
और, तभी मैं सोचूं कि अचानक मेरे ब्लॉग पर स्पैम कमेंटरों की बाढ़ क्यों आ गई. तो ये अंतरवासना साइट से आने वाले बॉट्स की कृपा है!

हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा

विकास

वैसे मैंने कल रात को मिर्ची खा ली थी सुबह शोचालय गया तो असर पता लगा। पानी का प्रयोग ज्यादा करना पड़ा। वैसे अभी ध्यान आया की टॉयलेट का नाम शौचालय क्यों है क्योकि यहा बहुत से विचार दिमाग मैं आते है। टॉयलेट करते हुए मेरे दिमाग मैं बहुत विचार आते है अगर मैं उनको लिखू तो एक पूरी किताब छप जाये पर क्या करे बाहर आने के बाद सब कुछ भूल जाता हु। अब तो मैं ये सोच रहा हु की टॉयलेट मैं ही कॉपी पेन लेके जाऊ जब भी कोई विचार आये उसे लिख लू। शौच करते हुए बहुत सी बातें सोच ली जाती है शायद इसी लिए टॉयलेट को शौचालय कहते है।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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