टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

महंगाई से कौन साला दुःखी होता है?

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आज के जमाने में महंगाई से दुःखी तो सिर्फ और सिर्फ आपका सुबह का अख़बार होता है. वो भी कहीं दो कॉलम सेंटीमीटर के नामालूम से समाचार फ्लैश में. बाकी तो हर तरफ खुशी ही खुशी छलकती और झलकती नजर आती है.

महंगाई से सबसे ज्यादा खुश नेता होता है. महंगाई के चलते उसके भी रेट जो बढ़ जाते हैं. ट्रांसफर-पोस्टिंग और ठेके के लिए पहले चालीस प्रतिशत मिलते थे. मिलते तो अब भी चालीस प्रतिशत हैं, मगर चहुँओर महंगाई के चलते मामला लाखों से आगे बढ़ कर करोड़ों में पहुँच जाता है. अब, नेताजी खुश नहीं होंगे तो और कौन होगा?

महंगाई से अफसर भी बहुत खुश रहता है. उसे वैसे भी बाजार में घेला भर भी खर्च नहीं करना पड़ता. घर का सारा राशन, सब्जी-भाजी और दीगर सामान तो मातहतों के जिम्मे है. ऊपर से महंगाई बढ़ने से महंगाई-भत्ता भी हर छठे चौमासे बढ़ जाता है. फिर, मलाईदार पद में बढ़ी हुई महंगाई के मुताबिक महंगी चाँदी जो काटने को मिलती है.

महंगाई से उत्पादक और व्यापारी भी खुश रहता है. इधर पेट्रोल प्रति लीटर पाँच रुपए महंगा होता है तो व्यापारी के उत्पाद में एमआरपी में सात रुपए का इजाफ़ा हो जाता है. वो अपना उत्पाद दो रुपए महंगा कर खुश हो लेता है.

इधर ऑटो और टैक्सी वाले भी महंगाई से खुश रहते हैं. वस्तुतः ये तो किराया बढ़ाने के लिए महंगाई बढ़ने के इंतजार में रहते हैं. पेट्रोल और डीजल की तो छोड़ दें, आलू प्याज के दाम में बढ़ोत्तरी से भी इनके रेट बढ़ जाते हैं. ऊपर से महंगाई का कंपनसेशन मीटर में छेड़छाड के साथ साथ किराए में प्रीमियम बढ़ाकर – दोतरफा करते हैं. महंगाई से दुःखी आदमी तो मैंने भी आज तक किसी को नहीं देखा. आपने देखा हो तो बता दें. बड़ी कृपा होगी.

मैं भी महंगाई से बहुत खुश होता हूँ. मर्सिडीज़ बैंज सी क्लास के सपने बरसों से देखता आ रहा हूँ. तब से जब उसकी कीमत दस लाख थी. अब साठ लाख है. मेरा सपना उच्च स्तरीय, बेहद महंगा हो गया है. क्या यह खुशी की बात नहीं है?

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बहुत ही सटीक फ़रमाया है आपने.....सबकी होली-दिवाली मन रही हैं,इस मंहगाई तोहफे से |

"मन के कोने से..."

आपका सपना यूं हो उच्‍च स्‍तरीय होता रहे, अपुन की यही शुभकामनाएं हैं। :)
............
डायन का तिलिस्‍म!

हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं...मंहगाई के दर्द को समेटे सच्चाई...

तब लोग दुखी क्यों,

आनन्द मने, हे मँहगाई,
क्यों इतने दिन में आ पाई

आपने सामयिक जीवन दर्शन का परम ज्ञान प्रदान किया।

इसे मैंने अंग्रेजी में कुछ इस तरह से पढा था - 'जब बलात्‍कार अपरिहार्य हो जाए तो उसका आनन्‍द लेना चाहिए।'

आपकी सीख, सर-माथे पर।

यह भी एक अनोखा व्यवहार है अपना अपना अंदाज़ है

मंत्री जी ईमानदार हैं।

स्टीक व्यंग ,बढ़िया प्रस्तुति,हार्दिक बधाई

बचपन में पढ़ता था कि राष्ट्रपति का वेतन दस हजार रूपये महीना होता है। कभी अपना जेब खर्च 'पाँच पैसा' देखता कभी दांतो तले उंगलियाँ दबाता। अब मैं दस हजार से भी अधिक पाता हूँ। बचपन वाले राष्ट्रपति से भी अधिक! यह खुशी महंगाई की ही देन है।:)

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