टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

August 2012

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जीरो लॉस की थिअरी का जेनरेलाइजेशन अपने फायदे के लिए आप भी कर सकते हैं. ये देखिए कुछ नमूने:

· फिब्बल : योर ऑनर, बेशक मेरे मुवक्किल ने चोरी किया है, मगर उसने उस चोरी के माल का कोई जायज नाजायज उपयोग निजी या सार्वजनिक उपयोग हेतु नहीं किया है. जब उसका उपयोग ही नहीं हुआ तो जीरो लॉस थ्योरी के मुताबिक उसका कोई अपराध ही नहीं हुआ. यानी जीरो क्राइम... (स्रोत - तरकश )

· फिब्बल : योर ऑनर, बेशक मेरे मुवक्किल ने ये हत्या की है. मगर योर ऑनर, ये संसार नश्वर है. जो आता है वो जाता है. हर किसी को किसी न किसी दिन मरना है. यमराज किसी को जल्द बुलाता है तो किसी को देर से. फिर इस नश्वर संसार में आत्मा तो अजर अमर अमिट है. तो ऐसे में जीरो लॉस थ्योरी के मुताबिक कोई अपराध ही नहीं बनता...

· फिब्बल : योर ऑनर, मेरे मुवक्किल ने बेशक भ्रष्टाचार कर करोड़ों बनाये हैं, मगर उसने उन्हें सुरक्षित स्विस बैंक में रखा है. इस तरह से देश का पैसा विश्व के सबसे सुरक्षित बैंक में सुरक्षित है योर ऑनर! जीरो लॉस थ्योरी के मुताबिक यहाँ भी कोई अपराध नहीं बनता. यानी जीरो करप्शन...

· फिब्बल : योर ऑनर, मेरे मुवक्किल ने घूसखोरी, कमीशन बाजी कर आय से अधिक संपत्ति हासिल की है तो यह सारी संपत्ति देश में ही तो है योर ऑनर! करोड़ों की कोठियाँ शहर और राज्य ही नहीं पूरे देश को गौरवान्वित कर रही हैं. यहाँ तो जीरो लॉस क्या, नेट गेन का मामला बनता है योर ऑनर...

· फिब्बल : योर ऑनर, मेरे मुवक्किलों ने खुले आम सार्वजनिक लूट पाट, आतंकवाद, दंगाफसाद किए हैं. मगर इन्होंने अपने ही शहर में, अपने ही मुहल्ले में अपने ही भाई बंधुओं को मारा काटा और लूटा है योर ऑनर! अपना खुद का नुकसान कोई नुकसान होता है योर ऑनर? यहाँ तो टोटल जीरो लॉस है योर ऑनर...

 

दलीलें अभी जारी हैं....


यदि आप मैथिली भाषी हैं, तो आपके लिए यह हर्ष का समय है.

लोकप्रिय ब्राउज़र फायरफाक्स अब मैथिली भाषा में उपलब्ध हो गया है.

मैथिली भाषा में फायरफाक्स कुछ इस तरह दिखेगा -




(चित्रों को बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)



अधिक जानकारी के लिए मैथिल आर मिथिला ब्लॉग की यह पोस्ट देखें

अपने आप को रोक नहीं पा रहे? ठीक है, आपके लिए मैथिली फायरफाक्स की डायरेक्ट डाउनलोड कड़ी यह है. यहाँ पर सबसे नीचे जाएं और लोकलाइजेशन टेस्टिंग विभाग में मैथिली डाउनलोड देखें. वहाँ आपको विंडोज, मैक तथा लिनक्स तीनों के लिए डाउनलोड लिंक मिलेंगे.

फायरफाक्स भोजपुरी व हिंदी समेत कई अन्य भारतीय भाषाएं - तेलुगु, असमी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयाली, मराठी, ओड़िया, पंजाबी व तमिल में पहले से ही उपलब्ध है.

इस उपलब्धि हेतु राजेश रंजन, संगीता कुमारी व पूरी मैथिली टीम को बधाई!
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हिंदी से अब सचमुच डर लगता है भाई!

भले ही आप लाख कसम खा लें, मगर आप भी मेरी तरह हिंदी से डरते होंगे. हिंदी ने मुझे बहुत डराया है. शुरू से. और अब भी डरता हूं. जब मैं हिंदी मीडियम में हिंदी स्कूल में पढ़ता था तो अपनी ‘उस हिंदी मीडियम’ के कारण मुहल्ले के कॉन्वेंटी छात्रों से बेहद डरता था. उच्च शिक्षा की बारी आई तो वहाँ भी हिंदी ने बहुत डराया. मेरी हिंदी भाषा वहाँ थी ही नहीं. मुझे एक विदेशी – अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पढ़ाई करनी पड़ी. तो मैं पढ़ता अंग्रेज़ी में था, और उसका तर्जुमा मन ही मन हिंदी में कर फिर उसे हिंदी में समझता था. परीक्षा में अंग्रेजी माध्यम में उत्तर लिखने होते थे तो उत्तर पहले सोचता हिंदी में था, फिर उसका तर्जुमा मन ही मन अंग्रेजी में करता था और लिखता था. यही हाल अंग़्रेजी में मौखिक परीक्षा के समय होता था. इस तरह मेरी हिंदी ने मुझे बहुत बहुत डराया.

खैर, जैसे तैसे पढ़ाई पूरी की. नौकरी में आए. यहाँ भी तमाम सरकारी पत्राचार अंग्रेज़ी में. ऊपर से तुर्रा ये कि हर साल 14 सितम्बर को ये फरमान आए कि हिंदी में काम करो हिंदी में काम करो. उस दौरान ऐसे ही उत्साह में एक बार हमने अपने एक उच्चाधिकारी के अंग्रेजी में लिखे पत्र का जवाब हिंदी में लिख मारा. दुर्भाग्य से पता नहीं था कि वो साउथ से था और करुणानिधि के विचारों का समर्थक था. मेरी इस लिखी हुई हिंदी से वो उच्चाधिकारी इतना आहत हुआ और मुझे इतना डराया कि अक्खा नौकरी बजाते तक हिंदी में दोबारा लिखने का साहस डरते-डरते भी फिर कभी नहीं किया.

इस बीच कंप्यूटरों पर काम करने लगे. हिंदी यहाँ भी भयंकर रूप से हमें डराती रही. कहीं फ़ॉन्ट नहीं दिखता था तो कहीं कीबोर्ड नहीं चलता था. किसी को बढ़िया हिंदी में लिखकर ईमेल भेजा तो एनकोडिंग और फ़ॉन्ट की समस्या के कारण सामने वाले ने वापस डराया कि क्या कचरा भेज दिया है – ईमेल लिखना नहीं आता क्या - हिंदी में भी कोई ईमेल लिखा जाता है? आज भी सही हिंदी लिखने के लिए कंप्यूटर पर एक ढंग का न तो स्पैल चेकर है और न व्याकरण जांचक. अब भला कौन हिंदी लिखने वाला लिखते लिखते नहीं डरेगा ही कि वो कि लिखे कि की!

और, हमें ही क्या. हिंदी तो खुद कंप्यूटरों को भयंकर डराती है. कंप्यूटरों के लिए हिंदी बेहद कॉम्प्लैक्स यानी बेहद जटिल भाषा है. चीनी से भी ज्यादा जटिल. इसीलिए हिंदी के कंप्यूटर प्रोग्राम ज्यादा बन नहीं पाते हैं. कंप्यूटरों में प्रयोग होने वाला जटिल से जटिल लॉजिक भी ये नहीं समझ पाता कि क में छोटी ई की मात्रा बाद में लगती है और छपते समय पहले क्यों आ जाती है, और दो आधे अक्षर एक दूसरे पर ऊटपटांग तरीके से युग्म कैसे बना डालते हैं. आप अपने कंप्यूटर में हिंदी इंटरफेस एनेबल कर देखें - आपके कंप्यूटर के प्रोसेसर को एकदम से चालीस प्रतिशत ज्यादा काम करना पड़ेगा और हो सकता है कि वो हाँफने भी लगे. एक विद्वान ने एक फोरम में बताया था कि हिंदी के तमाम युग्म शब्दों को आज तक कोई भी माई का लाल सूची बद्ध नहीं कर पाया है. इतना डराती है हींदि - ओह, सॉरी,  हिंदी या हिन्दी?

चूंकि हम अपने पढ़ाई के जमाने से हिंदी से डरे हुए थे, और यह समस्या अपने बच्चों को न हो इसीलिए हमने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में डाला. परंतु हमसे यहीं बड़ी भूल हो गई. हम हिंदी से और ज्यादा डरने लगे. बच्चे सनडे मनडे तो जानते हैं, मगर सोमवार रविवार नहीं. उनसे पत्राचार करने के लिए देवनागरी हिंदी के बजाए महा डरावनी रोमन हिंदी पर उतरना पड़ता है. ऊपर से न तो वो अंग्रेजी ढंग से जानते हैं न हिंदी. पता नहीं क्या होगा इस देश का!

 

हिंदी से डरते रहो!

 

व्यंज़ल

 

जाने कितनों को डराता है

वो फकत हिंदी बोलता है

 

उसे अब कौन पूछता है

जो फकत हिंदी लिखता है

 

वो बड़ा देसी बनता है

बीच में हिंदी फेंकता है

 

उसका तो खुदा भी नहीं

अब जो हिंदी पढ़ता है

 

आधुनिक बन गया रवि

वो हिंदी को कोसता है

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डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के संपादन में 250 से अधिक पृष्ठों में हिंदी ब्लॉगिंग संबंधी पचासेक उम्दा आलेखों को समेटे यह किताब हिंदी ब्लॉगिंग के भूत, वर्तमान और कुछ-कुछ भविष्य के परिदृश्य पर अच्छा खासा प्रकाश डालता है.

आलेखों में कहीं कहीं विषय और कथ्य का दोहराव हुआ है, मगर इससे इस उम्दा किताब के कलेवर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. किताब की बहुत सी सामग्री इंटरनेट पर यत्र-तत्र प्रकाशित हो चुकी है, मगर उन्हें तरतीब से और विषयानुरूप उम्दा तरीके से सजाकर परोसा गया है जिससे पाठकों को हिंदी ब्लॉगिंग के स्वरूप को समझने में मदद मिलती है.

किताब में ब्लॉग के तकनीकी पक्ष को अनछुआ रखा गया है, जो शायद इस किताब के विषय-वस्तु के अनुरूप ही रहा होगा, मगर यदि एक दो अध्याय तकनीकी पक्ष को लेकर दिए जाते तो यह किताब अपने आप में हिंदी ब्लॉगिंग की एक परिपूर्ण किताब का दर्जा प्राप्त कर सकती थी.

तकनीकी पक्ष के अलावा इसमें सबकुछ है - इतिहास से लेकर इसके आज के स्वरूप में विस्तार लेने तक और यहां तक कि इसके सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव और सरकारी लगाम लगाने के प्रयासों - सभी की गहराई से चर्चा की गई है.

यदि आप हिंदी ब्लॉगिंग विषय पर गहराई से जानना समझना चाहते हैं और यह आपके रुचि का विषय है तो यह किताब आपके काम आएगी.

किताब का लेआउट, प्रिंट और कागज बेहद उम्दा क्वालिटी का, आकर्षक है.

किताब का लोकार्पण 27 अगस्त को लखनऊ में प्रस्तावित है.

 

अन्य विवरण निम्न हैं

हिंदी ब्लॉगिंग - स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं

संपादक - डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

पृष्ठ - 260

मूल्य - 400 रुपए

प्रकाशक - युवा साहित्य चेतना मंडल

एन - 23, श्रीनिवास पुरी, नयी दिल्ली - 110065

 

किताब प्राप्त करने के लिए संपादक - डॉ. मनीष मिश्रा से ईमेल - manishmuntazir@gmail.com पर संपर्क करें.

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आज के जमाने में महंगाई से दुःखी तो सिर्फ और सिर्फ आपका सुबह का अख़बार होता है. वो भी कहीं दो कॉलम सेंटीमीटर के नामालूम से समाचार फ्लैश में. बाकी तो हर तरफ खुशी ही खुशी छलकती और झलकती नजर आती है.

महंगाई से सबसे ज्यादा खुश नेता होता है. महंगाई के चलते उसके भी रेट जो बढ़ जाते हैं. ट्रांसफर-पोस्टिंग और ठेके के लिए पहले चालीस प्रतिशत मिलते थे. मिलते तो अब भी चालीस प्रतिशत हैं, मगर चहुँओर महंगाई के चलते मामला लाखों से आगे बढ़ कर करोड़ों में पहुँच जाता है. अब, नेताजी खुश नहीं होंगे तो और कौन होगा?

महंगाई से अफसर भी बहुत खुश रहता है. उसे वैसे भी बाजार में घेला भर भी खर्च नहीं करना पड़ता. घर का सारा राशन, सब्जी-भाजी और दीगर सामान तो मातहतों के जिम्मे है. ऊपर से महंगाई बढ़ने से महंगाई-भत्ता भी हर छठे चौमासे बढ़ जाता है. फिर, मलाईदार पद में बढ़ी हुई महंगाई के मुताबिक महंगी चाँदी जो काटने को मिलती है.

महंगाई से उत्पादक और व्यापारी भी खुश रहता है. इधर पेट्रोल प्रति लीटर पाँच रुपए महंगा होता है तो व्यापारी के उत्पाद में एमआरपी में सात रुपए का इजाफ़ा हो जाता है. वो अपना उत्पाद दो रुपए महंगा कर खुश हो लेता है.

इधर ऑटो और टैक्सी वाले भी महंगाई से खुश रहते हैं. वस्तुतः ये तो किराया बढ़ाने के लिए महंगाई बढ़ने के इंतजार में रहते हैं. पेट्रोल और डीजल की तो छोड़ दें, आलू प्याज के दाम में बढ़ोत्तरी से भी इनके रेट बढ़ जाते हैं. ऊपर से महंगाई का कंपनसेशन मीटर में छेड़छाड के साथ साथ किराए में प्रीमियम बढ़ाकर – दोतरफा करते हैं. महंगाई से दुःखी आदमी तो मैंने भी आज तक किसी को नहीं देखा. आपने देखा हो तो बता दें. बड़ी कृपा होगी.

मैं भी महंगाई से बहुत खुश होता हूँ. मर्सिडीज़ बैंज सी क्लास के सपने बरसों से देखता आ रहा हूँ. तब से जब उसकी कीमत दस लाख थी. अब साठ लाख है. मेरा सपना उच्च स्तरीय, बेहद महंगा हो गया है. क्या यह खुशी की बात नहीं है?

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करे कोई, भरे कोई!

(दृश्य एक - हाईकोर्ट जज के सामने)

सरकारी वकील (जिरह करता हुआ) - योर ऑनर! ये आम आदमी है. इसका जुर्म है कि इसने अपने तय कोटे 10 यूनिट बिजली से 0.1 यूनिट अधिक यानी 10.1 यूनिट बिजली जला ली. इसके इस शर्मनाक कुकृत्य ने देश के नेशनल ग्रिड को ठप्प होने में बेहद अहम भूमिका निभाई जिसके कारण पूरा देश कई घंटों तक अंधेरे में डूबा रहा और अरबों रुपयों का नुकसान हुआ. सबूत के तौर पर इसका बिजली का बिल पेश है योर ऑनर. इस अभियुक्त के विरुद्ध तमाम आरोप स्वयंसिद्ध हैं योर ऑनर. इसने देश के नेशनल पॉवर ग्रिड को कई घंटों तक ठप्प रखने की भयंकर साजिश की है ताकि देश की इकॉनामी बर्बाद हो जाए. यह एक तरह से भारत पर आतंकी हमला है योर ऑनर. देशद्रोह है. इसी लिए अभियुक्त को उसके इस कृत्य के लिए कड़ी से कड़ी सजा दी जाए.

 

(दृश्य दो - जिला जज के सामने)

सरकारी वकील (जिरह करता हुआ) - योर ऑनर! ये आम आदमी है. इसका जुर्म है कि इसने अपने तय कोटे से 250 ग्राम अधिक शक्कर का उपयोग कर लिया. इसके इस शर्मनाक कु-कृत्य ने देश की इकॉनामी बर्बाद होने में अहम भूमिका निभाई क्योंकि इसके इस कृत्य की वजह से देश में शक्कर का टोटा पड़ गया, और सारा डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम ध्वस्त हो गया. महंगाई बढ़ गई और संसद भवन के सब्सिडाइज्ड भोजन शाला को शक्कर उपलब्ध नहीं हुआ, जिससे सांसदों को फीके भोजन से काम चलाना पड़ा. इसका यह कृत्य न सिर्फ देशद्रोह की श्रेणी में आता है योर ऑनर, बल्कि संसद का, संसदीय प्रतिनिधियों का घोर अपमान करने का भी मामला बनता है. लिहाजा इस अभियुक्त को ऐसी कड़ी से कड़ी सजा दी जाए जिससे समाज में एक उदाहरण पेश हो और लोग फिर इस तरह के अपराध करने से दूर रहें.

 

(दश्य तीन - सुप्रीम कोर्ट जज के सामने)

सरकारी वकील (जिरह करता हुआ) - योर ऑनर! ये आम आदमी है. इसका जुर्म है कि %$#@&^%*(&%$#$@!$%&**(()()(*&%%$#%$%^$##^&&....

या यह इस बात का सबूत है कि अब स्पैमरों को यह मालूम हो गया है कि भारतीय स्त्रियाँ भी अब इंटरनेट का प्रयोग धड़ल्ले से करने लगी हैं!

और, शायद ऐसे स्पैम-ईमेल तो स्त्रियाँ स्वयं सब्सक्राइब करें. नहीं?

अपने स्पैम फोल्डर में निगाह फेर रहा था कि कहीं कोई महत्वपूर्ण ईमेल स्पैम तो नहीं हो गया है तो ये दिखा - पीले रंग में चमकाया हुआ -

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यूरेका! जार्जेट साड़ी - सुंदर कलात्मक. दिमाग की बत्ती जली. ये अपनी अक्खा ऑनलाइन जिंदगी का साड़ी का पहला स्पैम मिला था मुझे. अब तक सड़ियल नाईजीरियाई / लाटरी और वायग्रा जैसे स्पैमों से ही अधिकतर सामना होता रहा था. फ़ौरन लिंक को क्लिक किया. भले ही स्पैम क्यों न हो - था तो यह साड़ी के लिए ही न. क्या पता कोई नई डिजाइन, रंग की साड़ी दिख जाए. देखने में क्या जाता है.

आप भी देखें :

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कोई साड़ी जमी? बीच वाला तो बड़ा प्यारा कलर है. है न? तो, लिंक आपको भी फारवर्ड करूँ?

अरविंद लैक्सिकन इंटरनैट पर शब्दोँ का महाभंडार है, और उस की वैबसाइट पर अनेक प्रकार की रोचक पाठ्य सामग्री भी मिलती है. उस पर उपलब्ध कोश से लाभ उठाने के लिए इस साइट पर आप को ढेरोँ हिंदी इंग्लिश पर्याय ज़रूर मिलेँगे. साथ ही आप किसी भी शब्द पर क्लिक कर के, उस शब्द के भिन्न अर्थ भी देख पाएँगे, हिंदी या इंग्लिश भाषाओँ मेँ लिखने के लिए, हिंदी या इंग्लिश भाषाएँ सीखने, उन की समृद्ध शब्द संपदा मेँ पैठने के लिए, उन के शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए आप, आप के मित्र अरविंद लैक्सिकन के निश्शुल्क संस्करण को बेहद उपयोगी पाएँगे. यह दोनोँ भाषाओँ की शब्दावली का संसार मेँ विशालतम संकलन है. रजिस्टर करने के लिए अपना नाम रोमन लिपि के लोअरकेस अक्षरोँ मेँ दो शब्दोँ के बीच कोई ख़ाली जगह छोड़े बिना अपना नाम इस प्रकार  arvindkumar  लिखेँ.  रजिस्टर किए बना कोश का लाभ नहीँ उठाया जा सकेगा.

http://arvindlexicon.com/lexicon

अरविंद लैक्सिकन मेँ हिंदी वर्तनी को पूरी तरह मानक और प्रामाणिक रखने की कोशिश की गई है.

आज हिंदी पढ़ने वाले ‘अं’ ‘अँ’, ‘हंस’ ‘हँस’ की ही तरह ‘क’ ‘क़’, ‘ख’ ‘ख़’ और ‘ज’ ‘ज़’ जैसी ध्वनियोँ का अंतर लगभग भूल चुके हैँ. इस का एकमात्र कारण है हैंडकंपोज़िंग मेँ होने वाली कठिनाइयाँ. यह विषय पूरी तरह तकनीकी है, और आम पाठक के पास इतनी बारीक़ी मेँ जाने की न तो रुचि है, न समय. मोटे मोटे शब्दोँ और दो चित्रोँ मेँ :

एक समय था जब आजकल की कंप्यूटरी टाइपसैटिंग की जगह हाथ से कंपोज़िंग की जाती थी. ऐसी कंपोज़िंग का मतलब है स्टिक (चित्र 1) नाम के उपकरण मेँ एक एक अक्षर को एक के बाद एक रखना या लगाना. (छपाई की भाषा मेँ ऐसे एकल अक्षर को टाइप कहते हैँ.)

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áचित्र नं. 1. कंपोज़िंग केस मेँ रखे टाइप, और कंपोज़ीटर के हाथ मेँ रहने वाली स्टिक. कंपोज़ीटर स्टिक पर एक एक टाइप रखता था. मात्रा वाले अक्षरोँ के टाइप का अधिकांश भाग नीचे से कटा होता था, और नाज़ुक सी मात्रा वहाँ घुसाई जाती थी. ज़रा सा ज़ोर पड़ते ही ‘मेँ, मैँ’ वाली मात्राएँ टूट जाती थीँ.

मेँ, मैँ, मोँ, मौँ…

इंग्लिश वाली रोमन लिपि मेँ कुल 26 अक्षर हैँ. हर रोमन अक्षर के कैपिटल A, स्माल कैपिटल a, लोअर केस a, बोल्ड A, a, a और इटैलिक A, a, a टाइपोँ को रख कर भी कंपोज़ीटर का काम कुल दो केसोँ से चल जाता था(देखिए अगला चित्र). इंग्लिश के मुक़ाबले हिंदी मेँ 52 अक्षर हैँ. इन मेँ से 23 व्यंजन हैँ. साथ ही क़, ख़, ग़, ज़ ड़ ढ़ जैसे अतिरिक्त अक्षर. और अब इन मेँ शामिल कीजिए हर व्यंजन का आधे अक्षरोँ वाला अलग टाइप. और उन के बोल्ड और इटैलिक रूप. साथ ही आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ऋ, ओ, औ, अँ, अं की मात्राएँ या बिंदु चिह्न जो सभी व्यंजनोँ के ऊपर या नीचे लगाए जाते थे. और इन के भी बोल्ड और इटैलिक रूप. इस पेचीदा समस्या को सुलझाने के लिए सभी व्यंजनोँ के टाइपोँ के नीचे से घुसाने की तरक़ीब निकाली गई थी. सभी अत्यावश्यक टाइपोँ को समाने के लिए हिंदी कंपोज़ीटर के लिए चार केसोँ का प्रावधान किया गया था. पर ये भी कम पड़ते थे. जो भी हो, े ै ो ौ आदि चंद्रानुस्वार लगी मात्राएँ (मेँ, मैँ, मोँ, मौँ) छपते छपते टूट जाती थीँ. उदाहरण के लिए और ‘मेँ’ ‘मैँ’ छपते छपते ‘म’ तथा ‘हैँ’ ‘ह’ बन जाते थे, और ‘औँधा’ ‘आधा’ रह जाता था.

अब कंप्यूटरोँ ने यह समस्या हल कर दी है तो एक बार फिर हमेँ सही वर्तनी की ओर लौटना होगा. भारत सरकार के ‘वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली’ आयोग ने अपनी पुस्तक ‘प्रशासनिक शब्दावली हिंदी – अंग्रेजी ’ (2010) की पृष्ठ संख्या 465 पर चंद्रानुस्वार वाली वर्तनी ‘मेँ, मैँ, हैँ’ आदि को मानक बताया है. साथ ही ‘में, मैं और हैं ’ रूपोँ के प्रचलन की भी अनुमति दी गई है. हमारे इन दोनोँ कोशोँ मेँ सही वर्तनी (मेँ, मैँ और हैँ) के उपयोग पर ज़ोर दिया गया है.

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á रोमन लिपि मेँ टाइपोँ के सभी प्रकार दो केसोँ मेँ आ जाते थे. देवनागरी मेँ इतने सारे अक्षर होते हैँ कि उन के सभी विकल्पोँ के लिए चार केस भी कम पड़ते हैँ. कल्पना कीजिए कि इंग्लिश के इन दो केसोँ के बाएँ और दहिने एक एक केस और रखा है. अब आप हैंड कंपोज़िंग मेँ हिंदी वर्तनी की समस्या का कुछ अनुमान लगा पाएँगे. अक्षरोँ की संख्या सीमित रखना ज़रूरी था. शिकार हुई ‘क़, ख़, ग़’ जैसे नुक़्तोँ वाले व्यंजनोँ और ‘मेँ, मैँ’ जैसी मात्राओँ वाली सही वर्तनी.

कंप्यूटरोँ की कृपा से अब ‘गल्ला = कपोल (cheek)’ और ‘ग़ल्ला = रोकड़ (cash in the till)’, ‘राज (kingdom)’ और ‘राज़ = रहस्य (mystery)’ का भी सही इस्तेमाल हो सकता है. इन कोशोँ मेँ ये भी हर जगह अपने सही रूप मेँ मौजूद हैँ.

नया - नई, नए // गया - गई, गए // खाया - खाई, खाए

हिंदी मेँ इस तरह के शब्दोँ के बारे मेँ एक अनोखी अराजकता देखने को मिलती है. जहाँ तक मेरी जानकारी है कई दशक पहले कुछ साहित्यकारोँ ने एक पत्रिका मेँ उपसंपादन करते समय ऐसे हिज्जोँ की विविधता और भ्रामकता से घबरा कर एक अजीब सा (लेकिन पूरी तरह ग़लत और निराधार) नियम बना लिया कि यदि किसी शब्द के अंत मेँ ‘या ’ है तो उस के स्त्रीलिंग और बहुवचन रूपोँ मेँ ‘यी ’ और ‘ये ’ का प्रयोग किया जाए. यानी ‘जायेगा, जायेंगे’ लिखे जाएँगे. इस विषय पर भी ‘प्रशासनिक शब्दावली – हिंदी - अग्रेजी’ (2010) की पृष्ठ संख्या 465 मेँ पूरी तरह खड़ी बोली वाली हिंदी की उच्चारण प्रक्रिया के अनुरूप और सभी आधिकारिक वैयाकरणोँ द्वारा पूरी तरह सम्मत नीति को सही समर्थन दिया है. वहाँ नया/नई हुवा/हुई शीर्षक के अंतर्गत लिखा है : किए-किये, नई-नयी, हुआ-हुवा आदि मेँ से पहले स्वरात्मक रूप का ही प्रयोग किया जाए. यह नियम सभी रूपोँ मेँ लागू माना जाए, जैसे – दिखाए गए, राम के लिए, पुस्तक लिए हुए, नई दिल्ली.

बात को आगे बढ़ाते हुए और भ्रम को दूर करने के लिए लिखा गया है – जहाँ ‘य’ शब्द का ही मूल तत्व हो, वहाँ स्वरात्मक परिवर्तन की आवश्यकता नहीँ है. जैसे – स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि. इन्हेँ स्थाई, अव्यईभाव, दाइत्व नहीँ लिखा जाएगा.

इन कोशोँ मेँ इस नियम का पालन अक्षरशः किया गया है.

टेस्ट, टैस्ट; डाक्टर, डॉक्टर…

हिंदी मेँ स्वरोँ की संख्या बारह मानी गई है. इन मेँ अं और अः भी शामिल हैँ. इन्हेँ न गिन कर इंग्लिश मेँ चौदह स्वर उच्चारण हैँ, जिन्हेँ एक या दो स्वर साथ साथ लिख कर व्यक्त किया जाता है. कोशिश की गई है कि ऐसे शब्दोँ को उन के इंग्लिश उच्चारण के निकटतम लिखा जाए. जैसे स्वाद के लिए ‘टेस्ट, परीक्षा के लिए ‘टैस्ट, भाव (दर) के लिए ‘रेट और चूहे के लिए ‘रैट. ऐसे ही और कुछ अन्य शब्द हैँ - ट्रैंड, फ़ैस्टिवल. चिकित्सक या विद्वान के लिए ‘डाक्टर शब्द के उच्चारण की इंग्लिश मेँ जो दो प्रमुख शैलियाँ हैँ उन मेँ से एक इसी रूप का समर्थन करती है. हिंदी बोलचाल मेँ भी डाक्टर प्रचलित है, जबकि आजकल डॉक्टर आदि लिखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है. कई जगह तो हिंदी मूल का शब्द ‘शाल’ इंग्लिश मेँ लिखे गए shawl के अनुकरण पर ‘शॉल’ लिखा मिलता है, और ‘पाल’ बन जाता है ‘पॉल’! ऐसा लिखने या छापने मेँ एक समस्या और भी है. कोशोँ मेँ ‘’ ’ को कहाँ स्थान दिया जाए, यह अनिश्चित है, ‘के साथ,के साथ या ‘के साथ. तीनोँ से पहले या बाद मेँ? अतः हमारे डाटा मेँ हर जगह ‘डाक्टर’ आदि ही मिलते हैँ.

वर्तनी के आधार कोश

समांतर कोश तथा हमारे अन्य कोशोँ की ही तरह इन दोनोँ कोशोँ मेँ भी हम ने हिंदी हिज्जोँ के लिए ‘भारतीय ज्ञान मंडल, वाराणसी’ द्वारा प्रकाशित ‘बृहत् हिंदी कोश ’ को प्रामाणिक माना है और यथासंभव उस का अनुपालन किया है. नुक़्ते वाले शब्दोँ के हिज्जोँ के लिए दुबधा होने पर ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (हिंदी समिति प्रयाग)’ द्वारा प्रकाशित और बहुसम्मानित ‘उर्दू-हिंदी शब्दकोश ’ (संपादक : मुहम्मद मुस्तफ़ा ख़ाँ मद्दाह) का अनुपालन किया गया है.

अरविंद कुमार

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बीजेपी का पीएम बनने के ख्वाब देखने का अधिकार तो सिर्फ मेरा और सिर्फ मेरा है!

 

व्यंज़ल

 

दूसरे की थाली में ज्यादा माल

किसी सूरत मैं ये होने नहीं दूंगा

 

मेरे सामने किसी और का फंडा

शर्तिया ये मैं चलने नहीं दूंगा

 

इस हमाम में सिर्फ मेरी धुलेगी

किसी और को धोने नहीं दूंगा

 

मुल्क मेरी विरासत है इसलिए

बाकियों को मैं हगने नहीं दूंगा

 

जब व्यंज़लों की बात हो  रवि

किसी और को जमने नहीं दूंगा

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ईमानदारों के प्रयास ने रंग लाया और अंततः भारतीय इतिहास में पहली ईमानदार सरकार भारी बहुमतों से चुन ली गई. जनता ने भ्रष्ट उम्मीदवारों, भ्रष्ट पार्टी के उम्मीदवारों की जमानतें जब्त करवा दीं. और इस तरह आखिरकार भारत की पहली ईमानदार सरकार ने शपथ ले ही लिया. अत्यंत प्रसन्नता की बात थी कि अब प्रधान मंत्री भी ईमानदार थे, वित्त मंत्री भी और  दूरसंचार मंत्री भी. यहाँ तक कि विपक्ष के नेता भी ईमानदार थे और लोकसभा अध्यक्ष भी. जब प्रत्येक संसद सदस्य ईमानदार होगा तो ये सब तो ईमानदार होंगे ही.

देश भर में हफ़्ते भर तक जश्न चलता रहा. चहुँओर खूब जुलूस निकाले गए, फटाके फोड़े गए, आतिशबाजियाँ हुईं. ईमानदारी के गुण गाए गए. जीते हुए ईमानदार प्रत्याशियों ने घर घर घूम घूम कर तमाम वोटरों को धन्यवाद दिया जिन्होंने अपने ईमानदार मतों का उतनी ही ईमानदारी से प्रयोग कर उन्हें बड़ी ईमानदारी से जिताया था.

 

भोंदूराम भी बड़ा ईमानदार था. दरअसल अब तक उसके पास बेईमानी करने का न तो कोई संसाधन था और न तरीका. वो एक दिहाड़ी मजदूर था. सुबह काम पर निकलता, शाम तक काम करता, अपनी रोजी कमाता और मजे में रहता. ऐसे में उसके पास ईमानदारी के अलावा और क्या मिलता भला? उसने भी उत्साह में आकर अपना ईमानदार वोट ईमानदार प्रत्याशी को दिया था जिसके फलस्वरूप देश की पहली ईमानदार सरकार बनी थी. हफ्ते भर वो भी अपना भूख प्यास भूल कर देश के पहले ईमानदार सरकार बनने के उत्सव में डूबा रहा था.

 

हफ़्ते भर बाद वो फिर से काम पर गया. पता चला कि काम बन्द है. वो पैटी कांट्रैक्टर के पास गया. पूछा भई, काम क्यों बंद है. पैटी कांट्रैक्टर ने बताया कि ईमानदार सरकार आ गई है, अब सब कुछ ईमानदारी से होगा इसीलिए अभी काम बन्द है. और काम कब तक चालू होगा इसकी कोई गारंटी नहीं. भोंदूराम के सामने तो  जैसे खाने-पीने की समस्या आ गई. उसे लगा कि अरे! ये उसने क्या कर डाला! उसने ये कैसी ईमानदार सरकार चुन ली! हे भगवान!!!

 

इधर पैटी कांट्रैक्टर को कांट्रैक्टर ने कह दिया था कि चूंकि ईमानदार सरकार आ गई है अतः आगे कांट्रैक्ट मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है, इसीलिए वो अपना कोई दूसरा धंधा देख ले. पैटी कांट्रैक्टर को धक्का लगा. उसने भी ईमानदार सरकार बनाने में एक वोट का अपना योगदान दिया था. पर इससे तो उसका धंधा ही चौपट हो गया था. अरे! ये तो बहुत बुरा हुआ!

कांट्रैक्टर, चीफ इंजीनियर से चालीस परसेंट सेट कर कांट्रैक्ट हथियाता था तो उसे मालूम था कि ईमानदार सरकार आ गई है तो अब ऐसी दाल गलनी नहीं है. उसे भी कांट्रैक्टरी में नए रीति-रिवाज सीखने होंगे तब तक वेट एंड वाच.

 

चीफ इंजीनियर की नौकरी के छः महीने बचे थे. पहले की सरकार में उसे पूरी उम्मीद थी कि मंत्रालय में एक खोखा भेंट देने पर उसे एक्सटेंशन मिल जाएगा पर अब तो ईमानदारी का तख्तापलट हो गया था. करोड़ों के एस्टीमेट और वर्कऑर्डर अब उसे मुँह चिढ़ाते थे - ईमानदारी के कीटाणुओं से घेला भर कमीशन मिलने की उम्मीद नहीं दिखती थी. तो वह पेंशन की उम्मीद में अपना टाइम पास करने लगा और फ़ाइलों को दूर से नमस्कार करने लगा. लोग फ़ाइलों के बारे में काम की स्वीकृति के बारे में पूछते तो वो कहता - भई, ईमानदारी से उस पर काम जारी है.

 

कमोबेश यह स्थिति चहुँओर होने लगी. लोगों के पासपोर्ट बनने बंद हो गए - ईमानदारी से बनने में वक्त तो लगता है. ड्राइविंग लाइसेंस मिलना दूभर हो गया - ईमानदारी से ड्राइविंग टेस्ट देने में अधिकांश भारतीय जनता फेल होने लगी. राशनकार्ड बनने बंद हो गये - पता चला कि भारत की अधिकांश जनता तो बांग्लादेशी है जिन्हें ईमानदारी से राशनकार्ड दिया ही नहीं जा सकता. बाजारों से सामान गायब होने लगे - ईमानदारी से ऑक्ट्रॉय और उत्पाद शुल्क भरने के चक्कर में कंपनियों को घाटा होने लगा तो उन्होंने प्रोडक्शन ही बंद कर दिया.

 

इधर ईमानदार नेताओं के घरों बंगलों में ईमानदार कार्यकर्ता अपने अपने ईमानदार कार्यों को करवाने के लिए डोलने लगे. ईमानदार नेता हर काम को ईमानदारी से करने के लिए अफसरों से बोलते थे. चूंकि सरकार ईमानदार हो गई थी, अफसर भी ईमानदार हो गए थे तो वे बड़ी ईमानदारी से हर काम की परख करते थे और नियमानुसार करने के लिए अपने मातहतों को लिखते थे. ईमानदारी का जुनून हर सर पर चढ़ कर बोल रहा था तो कर्मचारी भी पहले आओ पहले पाओ के तहत बड़ी ईमानदारी से काम में जुटे थे. ईमानदारी की रौ में उन्हें ऊपरी कमाई से दूर रहना था तो वे फ़ाइलों में अपनी पूरी तवज्जो देते और पूरी ईमानदारी से बारीक से बारीक नुक्स निकाल कर - यहाँ तक कि टाइपिंग त्रुटियों की ओर भी इंगित कर स्वीकृत किए बगैर उन्हें दुरुस्त करने के लिए वापस लौटा देते.

स्थिति ये हो गई कि सरकार की और जनता की ईमानदारी की वजह से हर काम हर जगह अटकने लगे. हालात ये हो गए कि लोगों के घरों में गैस टंकी पहुँचनी बंद हो गई तो वे भूखे मरने लगे.

आखिर में वही हुआ जिसका अंदेशा था. जनता और कार्यकर्ता ईमानदार नेताओं और ईमानदार सरकार से आक्रोशित होने लगे. ईमानदार नेताओं को कहीं जूते मारे जाने लगे तो कहीं ईमानदार नेताओं का मुंह काला ईमानदार गधों की सवारी करवाई जाने लगी. ईमानदार नेताओं के पुतले फूंके जाने लगे. ईमानदार अफसरों की पिटाई होने लगी.

ईमानदार सरकार को महीने भर बीता नहीं था कि जनता त्राहिमाम! त्राहिमाम!! करने लगी.

और, महीने बीतते बीतते देश में एक पूर्ण क्रांति हो गई. सरकार का तख्ता पलट गया. ईमानदार सरकार के कुछ नेताओं ने ईमानदार पार्टी छोड़ी, एक नई न्यू-भारतीय-ईमानदार पार्टी बनाई और पुरानी सरकार को गिराकर नया सरकार बना लिया. जल्द ही भारतीय कामकाज पुराने ढर्रे पर वापस आ गया और भारतीय जनता ने चैन की सांस ली.

भारतीयों के दिन वापस फिर गए और भारतीयों ने चैन की सांस लेनी शुरू की. भोंदूराम को वापस मजदूरी का काम मिल गया था.

माइक्रोसॉफ़्ट ने हॉटमेल को री-ब्रांड कर एक नया अवतार दिया है. आउटलुक.कॉम के नाम से. उद्योग के पंडित इसे जीमेल का तोड़ और बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करने में जुटे हैं. मैंने भी इसकी थोड़ी जांच परख की.

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विस्तृत समीक्षा नीचे है -

अगर आपके पास विंडोज लाइव खाता है या हॉटमेल का खाता है तो आपको आउटलुक.कॉम के लिए अलग से नया खाता बनाने की जरूरत नहीं है. आप आउटलुक.कॉम पर इन खातों से लॉगइन कर सकते हैं. वस्तुतः यदि आपका हॉटमेल खाता है तो आपसे पूछा जाता है कि आप नया आउटलुक.कॉम वाला इंटरफेस रखना चाहेंगे या पुराना हॉटमेल का इंटरफेस. अब चूंकि नया आउटलुक.कॉम का इंटरफेस साफ सुथरा है तो अधिकांश जनता इसे ही चुनेगी. और यह एक बड़ी वजह है कि आउटलुक.कॉम की प्रशंसा के गीत गाए जा रहे हैं.

 

मैंने आउटलुक का थोड़ा सा प्रयोग करने की कोशिश की तो पाया कि ये तो हम हिंदी वालों के लिए तो बिलकुल बेकार है. और जीमेल के सामने तो अभी इसमें हिंदी संबंधी कोई भी सुविधा नहीं.

 

  • हिंदी लिखने के लिए अंतर्निर्मित औजार नहीं - जीमेल में आपको ट्रांसलिट्रेशन के जरिए हिंदी लिखने की सुविधा मिलती है. आउटलुक में अभी यह सुविधा नहीं है, और शायद आगे भी न मिले. माइक्रोसॉफ़्ट कहेगी - आईएमई इंस्टाल करो भई! परंतु यह कोई उत्तर नहीं है. आप एण्ड्राइड और टैबलेटों में जब काम करते हैं तब यह सुविधा तो आपके लिए देवदूत की तरह होती है.
  • हिंदी वर्तनी जांच की सुविधा नहीं - जीमेल में आपको हिंदी वर्तनी जांच की अंतर्निर्मित सुविधा मिलती है. आउटलुक में यह नहीं है और शायद आगे भी न मिले, क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट अपनी व्यापारिक रणनीति के तहत इन अतिरिक्त सुविधाओं को विक्रय कर पैसे बनाता है.
  • हिंदी भाषा में उपलब्ध नहीं - जीमेल में हिंदी का भरा पूरा समर्थन है. हॉटमेल की सेटिंग में ढेर सारी भाषाओं सहित हिंदी भाषा का भी समर्थन मिलता है.  परंतु आउटलुक.कॉम में बहुत सी भाषाओं को अभी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. हिंदी भाषा का समर्थन भी नदारद है. अलबत्ता यदि आपने अपने हॉटमेल खाते में हिंदी को सक्षम बनाया हुआ है और आप आउटलुक का विकल्प चुनकर आउटलुक.कॉम में आते हैं तो हिंदी सुविधा आपको उपलब्ध रहती है. परंतु यहाँ भी अनुवादों में भारी गलतियाँ है और बेहद घटिया किस्म का, चलताऊ किस्म का अनुवाद है जिसे आप चित्र में लाल पेन से चिह्नित किया देख सकते हैं.

 

कुल मिलाकर गूगलमेल के सामने आउटलुक.कॉम मेल अपन हिंदी वालों के लिए कोई काम का नहीं. भले ही बाकी अन्य सुविधाओं, ओएस इंटीग्रेशन, सिंक्रोनाइजेशन इत्यादि में, लोगों के मुताबिक, बाजी मार ले जाए!

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