टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

ओह! तो मेरी चिंता, असुरक्षा की भावना के पीछे वो नहीं, ये हैं!

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एक शोध से पता चला है कि ब्लॉग, फ़ेसबुक और ट्विटर आपके दिल दिमाग में चिंता, असुरक्षा की भावनाएँ भरने का काम ज्यादा करते हैं. इसमें शोध की क्या जरूरत थी? जिस दिन से हम ब्लॉगिंग में घुसे हैं, ट्विटर पर खाता खोला है और फ़ेसबुक में पहला लाइक मारे हैं, कसम से दुनिया बदल गई है. चिंता के मारे हलाकान हो गए हैं. रात दो बजे भी ईमेल अलर्ट आता है तो उठ कर कमेंट एप्रूव करते हैं, एक ट्वीट मारते हैं और फेसबुक वाल में किसी को चिकोटी काट कर फिर दोबारा सोने की बेकार कोशिश करते हैं.

दुनिया इतनी कमीनी कभी नहीं रही. फ़ेसबुक से पहले दुनिया कितनी शांत और आरामप्रद थी! है ना? न थी इस तरह रात दो बजे उठने की चिंता और न किसी तरह की ब्लॉग-ट्विटर-फ़ेसबुकिया असुरक्षा की भावना!!!

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व्यंज़ल

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जितना ट्विटरिया रहा हूँ मैं

उतना ही चिंतिया रहा हूँ मैं

 

दुनिया में क्या कम गम थे

ऊपर से फ़ेसबुकिया रहा हूँ मैं

 

लोग कहते बस फकत हैं झूठ

बहुत बड़ा ब्लॉगिया रहा हूँ मैं

 

उठते बैठते सोते नहाते धोते

कहां नहीं इंटरनेटिया रहा हूँ मैं

 

जिंदगी में बचा क्या रवि

जब देखो गूगलिया रहा हूँ मैं

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हा हा हा हा हा, मल्‍टी टास्किंग भी कहां थी। एक समय में एक ही काम हो सकता था।


अब तो... अब क्‍या कहें, समय के साथ असुरक्षा बढ़ रही है... पर क्‍या खोने की यह समझ में नहीं आता... :)

क्या खूब व्यंजलिया दिया है आपने.....हा हा हा हा...बहुत खूब , पढ़कर आनंद आ गया रवि जी ।

बहुत बढ़िया रवि जी...

मुझे तो लगा था 'ऐसा' अकेला हूँ मैं
'ऐसों' की भीड में रगडा रहा हूँ मैं

फ़ेसबुक बिना चैन कहां नहीं! ट्विटर ने किया बेचैन ! :)

सच में, बहुतों को सुबह सुबह उठते ही यह लगता है कि न जाने कितने लोगों ने रात में लाइक कर दिया होगा।

फेसबुकीय युग में विशुद्ध फेसबुकीय-‍ट्विटरीय परिघटना को परिभाषित करती फेसबुकिया व्‍यंजल!

पढ़ के थोडा सा चिन्तिया गए हम भी :)

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