आज के दैनिक भास्कर का स्कूप : पेन ड्राइव में पूरा कम्प्यूटर?

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वैसे तो यह मसाला बालेंदु दाधीच के वाह! मीडिया के लिए ज्यादा उचित था, परंतु चूंकि मामला कंप्यूटिंग से जुड़ा हुआ है, इसीलिए यहाँ छापने से अपने आप को रोक नहीं पाया.

यह समाचार आज के दैनिक भास्कर के मुख्य पृष्ठ पर प्रमुखता से छपा है, और पूरे राष्ट्र के लगभग तमाम एडीशन में है.

इस समाचार को पढ़ कर कोई भी तकनीकी जानकार हँस देगा कि दैनिक भास्कर जैसे बड़े अखबारों में भी समाचारों को चयन कर छापते समय पूरा चलताऊ एटीट्यूड दिखाते हैं.

कुछ समय पूर्व फ़ेसबुक में तथाकथित एक महान लिक्खाड़ ने सरकार व माइक्रोसॉफ़्ट को श्रेय दिया था यूनिकोड हिंदी फ़ॉन्ट तैयार करने में. यह समाचार भी उसी श्रेणी का है.

दरअसल समाचार में जो बताया गया है वो पेन ड्राइव से कंप्यूटर बूट करने का मामला है. यह काम कंप्यूटिंग के बाबा आदम के जमाने से होता आ रहा है. लिनक्स तंत्र के तमाम वेरिएंटों को आप यूएसबी पेन ड्राइव में इंस्टाल कर किसी भी कंपेटिबल कंप्यूटर को बूट कर सकते हैं. और जो बात लिखी  गई है वो कोई भी महज एक दो क्लिक से कर सकता है, आपके पास 128 मेबा या इससे अधिक का पेन ड्राइव होना चाहिए, और इसे तैयार करने के एक दो प्रोग्राम. कहने का अर्थ ये कि न तो इसमें कोई नई बात है और न ही कोई नया इन्नोवेशन. मैं पिछले चार वर्षों से अपने विंडोज लैपटॉप में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग ऐसे ही करता आ रहा हूँ.  शायद औरंगाबाद के किसी अल्पज्ञानी (हम सभी कई मामलों में अल्पज्ञानी होते हैं, कोई सर्वज्ञ सर्वज्ञानी नहीं होता) पत्रकार ने बिना किसी तसदीक किए यह खबर बना दी और राष्ट्रीय एडीशन के उतने ही बड़े अल्पज्ञानी संपादक ने इसे जस का तस छाप दिया. और समाचार का शीर्षक भी गलत लिखा गया है - पेन ड्राइव में पूरा कम्प्यूटर - जबकि सही शीर्षक ये होगा - पेन ड्राइव में पूरा ऑपरेटिंग सिस्टम.

 

दैनिक भास्कर जैसे बड़े राष्ट्रीय अखबार से ऐसी उम्मीद नहीं थी. भास्कर हिंदी का बड़ा पाठक वर्ग है और इस समाचार से सारे पाठक मूर्ख बन गए!

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मैं तो दस सैकंड में ही समझ गया कि माजरा क्या है. असल में ज्यादातर लोग लिनक्स के बारे में जानते ही नहीं है इसलिए ऐसी गफ्लतें होती हैं.

तकनीकी बातों पर जब कोई गैर-तकनीकी व्यक्ति कलम चलाता है तो ऐसी मूर्खता की बातें हो ही जाती हैं। आप संपादक महोदय को इस हास्यास्पद खबर की सच्चाई जरूर लिख भेजिए। :)

धन्यवाद।
अब अखबार को चाहिए कि इसे पढ़कर भूल सुधार प्रकाशित करे। शीर्षक छापे...एक ब्लॉगर ने खोल दी आँखें।

जैसे लण्ठ भास्कर वाले हैं, वैसी लण्ठई हम भी दिखाते हुये कह सकते हैं कि कम्प्यूटर टेक्नॉलॉजी में आनन्द खत्री जी को नोबल पुरस्कार मिलने वाला है!

पढने के बाद हमने थोडी देर के लिए सोचा कि कहीं आज अप्रैल की एक तारीख तो नहीं?
पर आज तो जुलै 1 है।
अब देखते हैं कि सम्पादक के नाम इस विषय पर कितनी चिट्टियाँ छपती हैं।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

उनके पास अखबार है। वेचाहे जो छाप सकते हैं - भले ही गलत हो। आपके पास अखबार नहीं है। इसलिए, आपकी बात उन्‍हीं तक पहुँचेगी जो 'नेट' से जुडे हैं। वैसे, मैं यदि ऐसे प्रकाशन से जुडा होता तो आपकी इस पोस्‍ट का नोटिस लेकर, आपकी बात को उतनी ही प्रमुखता से, समस्‍त संस्‍करणों में छापता। लेकिन यह भी आपका अभाग्‍य ही है कि मैं उस स्थिति और हैसियत में नहीं हूँ :) :) :)।

संभवतः जानकर ही रोचक दिखाने का प्रयास किया है..

पढ कर हंसी तो आई मगर आप लोंगो के ब्लाग का नियमित पाठक हूं एवम इमेल फ़ीड भी लेता हूं अतः मालुम था तम्बूरा तो बजना ही था दैनिक भास्कर और मकरन्द को इस के लिये दन्डवत हो कर माफ़ी मागना चाहिये यदि भारत मे इसका श्रेय ऐसे लोग लेते हैं तो साइबर क्राइम सेल का मालिक भगवान के अलावा मेरे जैसा नवसिखिया ही हो सकता है

पढ कर हसीं तो आई, मगर आप लोगों के ब्लोग का पुराना पाठक हूं अतः मालुम था इसका तम्बूरा तो बजना जरुरी था । दैनिक भास्कर एवम मकरन्द को तुरन्त दन्डवत हो कर माफ़ी मांगना चाहिये भारत मे ऐसे ही ग्यानी हैं तो भारत के साइबर क्राइम ब्रान्च का मालिक भगवान ही है । मेरे जैसे नवसिखिये के पास आप लोंगो की दया से हर किस्म के साफ़्ट्वेयर उप्लब्ध है जो इनका बाजा बजा सकता है

जी, आपने सही कहा, लिनक्स लोकप्रिय नहीं है, इसीलिए गफलतें होती हैं. मगर जब समाचार छापनी हो तो तकनीकी जानकारों से तसदीक भी तो कर लेनी चाहिए.

जी, मैंने अपने अजित भाई को लिखा है, उन्होंने मकरंद जी को प्रेषित भी कर दिया है.

वे तो शायद ही भूल सुधार छापें... चुप कर जाएंगे..

आनन्द खत्री जी का क्यों नाम लें, हम अपना ही नाम आगे बढ़ा देते हैं :)

हाँ, शीर्षक देखते ही मैंने भी सबसे पहले इसी पीस को पढ़ा कि ये क्या नई टेक्नोलॉजी आ गई. अभी तो मिनिएचर कंप्यूटर के नाम पर दुनिया रॉस्पबेरी पाई की दीवानी है. तो ये नया यूएसबी कंप्यूटर कहाँ से आ गया. और जब खबर पूरी पढ़ी, जो कि लिखी भी बेकार तरीके से है, तो माजरा समझ में आया.

जी, आपने सही कहा उनके पास अखबार है, जो चाहे छाप सकते हैं. पर अब अपने पास ब्लॉग है. हम उनकी पोल खोल सकते हैं, और उन पर हँस सकते हैं. यही ब्लॉग और सोशल मीडिया की ताकत है.

शायद नहीं... मामला अधूरी जानकारी का ज्यादा लगता है. एक कहावत भी तो है - लिटिल नॉलेज इज डेंजरस... :)

राणा जी, धन्यवाद.

जी, आपको भी धन्यवाद

जी हाँ, हँसी की बात ही है ये..

बेनामी

“पेन ड्राइव में पूरा कम्प्यूटर” श्री खत्री साहब के इनोवेशन की खबर दैनिक भास्कर में छपते ही कम्प्यूटर बनाने वाली बड़ी बड़ी कंपनियाँ सदमे में आ गईं थी कि अब उनका क्या होगा? परन्तु भला हो हमारे रतलामी जी का जिन्होंने उक्त खबर पर अपनी रिपोर्ट लिखकर इन बड़ी बड़ी कंपनियों को सदमे से उबार दिया। धन्यवाद। - हरि सिंह ठाकुर

प्रिंट मीडिया में पांच हजार से दस हजार रुपए महीने के कमाने वाले पत्रकार हैं। यह बुरा मानने वाली बात नहीं है। प्रिंट हमेशा रोना लगाता रहता है कि संसाधनों का अभाव है। इसके चलते सस्‍ते पत्रकार रखता है। इसका नतीजा यही होना है।

दूसरी ओर एक्‍सक्‍लूजिव खबरें लाने का दबाव भी ऐसी गलतियां कराता है।

बहुत से पत्रकार तो ऐसे हैं जिन्‍हें अपने ऑफिस में ही कम्‍प्‍यूटर देखने को मिलता है।

आप एडवांस तकनीक की बात करते हैं, बहुत से अखबारों में 2008 तक विंडो 98 चलता रहा। विरोध करने वालों को कटु शब्‍द बोलकर चुप करा दिया जाता। अब भी ज्‍यादातर एक्‍सपी में ही काम कर रहे हैं। विंडो सेवन के दर्शन भी नहीं किए होंगे कईयों ने तो। ऐसे में आप क्‍या उम्‍मीद कर सकते हैं।

एक ओर विदेशी मीडिया है जो एक विषय पर विशेषज्ञ को काम पर रखता है। भारत में जब युवक किसी और काम का नहीं रह जाता तो पत्रकार बन जाता है। यह खबर उसी की बानगी है...

हा हा हा ... आपने खूब कही!

आपने सच बयान किया है. पर भारत के अग्रणी कहे जाने वाले अखबार के लिए इस तरह की गलतियाँ अक्षम्य हैं.

जो इस बारे मे नही जानते उनके लिये तो सही खबर है

यूनिक तकनीकी ब्‍लाग

ये समाचार पढ़कर मैं भी खूब हंसा था

हा हा, फिर तो हमारे-आपके जैसों ने तो पता नहीं कितने आविष्कार कर रखे हैं। हमें तो नोबल पुरस्कार मिलना ही चाहिये।

इन तकनीकी पत्रकारों की तो क्या कहें। सुनते कुछ हैं, समझते कुछ हैं और लिखते कुछ हैं। मेरा ही एक वाकया सुनिये। एक ऐसे ही स्थानीय पत्रकार महोदय को मेरे एक मित्र ने मेरा परिचय देते हुये बताया कि इन्होंने चाणक्य फॉण्ट में इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड लेआउट से टाइप करने के लिये टूल बनाया है। कुछ समय बाद ब्लॉगरों सम्बन्धी एक खबर छापने के सिलसिले में एक दिन वे पत्रकार मिले और पहचानते हुये बोले कि हाँ जी आप तो वही हैं न जिन्होने इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड बनाया है। मैंने तुरन्त उन्हें टोका भाई जी, कहीं ऐसा छाप कर मेरी भद्द न पिटवा देना। इन्स्क्रिप्ट मैंने नहीं बनाया सीडैक ने बनाया है, मैंने तो उस पर आधारित एक टूल बनाया है।

इन अख़बारों में एक ही ख़बर पर ध्यान दिया जाता है कि फ़लाँ नेता के बारे में कुछ अनर्गल तो नहीं जा रहा . बाक़ी की फ़ुर्सत किसे हैं कोई कुछ भी लिख मारे इनके यहां, सब चलता है. आपको भी पता है कि सामग्री का चयन कैसे होता है इन अख़बारों में :)

शुक्र मनाओ कि उसने ये नहीं पूछा कि ये टूल क्या होता है

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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