यात्रा संस्मरण : मॉल की एक यात्रा

क जमाना था जब गरमी की छुट्टियों में लोग बाग़ पहाड़ों की ओर जाते थे. परंतु धन्य है! गर्मियाँ भले ही अब कई मामलों में उससे ज्यादा पड़ रही हो, सोनू-मोनू के सेमेस्टर के कारण छुट्टियाँ जरा भी नहीं पड़ रहीं. और ऐन-केन-प्रकारेण अगर छुट्टियाँ मिल भी गईं तो भाई रेलवे के रिजर्वेशन का क्या होगा. तो कौन भला आदमी धक्के खाकर पहाड़ों की ओर जाएगा. और यदि आप ठान लें कि पहाड़ों पर जाना ही है तो महंगी हवाई यात्रा पकड़ लें, मगर वह भी टुकड़ों में होगी और फिर इन टुकड़ों में की गई यात्रा के अपने अलग दुखड़े होंगे.

इसीलिए, आज का मानव पहाड़ों के बजाए मॉल की ओर चला जाता है. तफरीह करने. जब भी जैसी भी जितनी भी छुट्टी मिलती है, वो मॉल की ओर दौड़ लेता है. सेंट्रलाइज्ड एयरकंडीशनिंग से उसे वहाँ का मौसम पहाड़ों जैसा ही ठंडा लगता है.

एक दिन जरा सी छुट्टी मिली तो अपने राम ने भी सोचा कि चलिए माल की तफरीह कर लें. इधर गर्मी बड़ी पड़ रही थी तो बिजली रानी भी बारंबार बंद हो रही थी. आदमी के साथ जब समस्या आती है तो एक तरफ से नहीं आती. वो कई तरफ से एक साथ आती है. गरमी आती है तो अपने साथ बिजली की कमी भी ले आती है. घरों की बिजली बारंबार गुल होती है – शेड्यूल-नॉन-शेड्यूल बिजली बंद होती है, मगर मॉलों की नहीं. वहाँ तो फेल-सेफ सिस्टम लगा रहता है. एक तरफ से बिजली बंद होती है तो दूसरे फीडर से मिलती है. वहाँ से भी नहीं मिलती तो जेनसेट चालू हो जाता है. यानी आप अपनी पूरी दोपहरी मॉल में बिना बिजली की चिंता किए सेंट्रल एसी की ठंडक में बिता सकते हैं.

तो मैं मॉल पहुँचा. वहाँ प्रवेश द्वार पर सुरक्षा गार्ड खड़े थे. प्रत्येक व्यक्ति की गहराई से सुरक्षा जांच कर रहे थे. लगता है अमरीकी भी भी इसी तरह जाँच करते होंगे इसीलिए शाहरूख को समस्या होती होगी. मेरी बारी आई तो मुझे भी बड़ी समस्या हुई कि मेरी खाली जेबों और पुराने कुर्ते पजामे में इन्हें क्या मिलेगा. एकबारगी लगा कि मॉल यात्रा की ऐसी की तैसी, चलो, वापस लौट चलें, मगर फिर लगा कि ऐसा किया तो शर्तिया पकड़े जाएंगे. सिक्योरिटी जाँच से बचकर जो बंदा भागेगा वो तो चोर की दाढ़ी में तिनका की तरह होगा. पर यह बड़ा अजीब था कि पुरुषों की तो जबरदस्त जाँच हो रही थी, मगर स्त्रियों की जाँच नहीं हो रही थी. बल्कि स्त्रियों के बैगों को खुलवा कर देखा जा रहा था. सही है. आज के जमाने में पुरुषों के जेब और स्त्रियों के बैग ही खतरनाक हो सकते हैं. बाकी की औकात क्या!

मॉल में घुसते ही मॉल कल्चर से मुकाबला हो गया. चारों और बड़ी बड़ी दुकानें. बीच में एक पियानो वादक कोई अंग्रेज़ी धुन बजा रहा था. परंतु उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा था. ऊपर से सब तरफ चिल्ल पों और दीगर शोरगुल था. इतने में एक छोटे से बच्चे को वह पियानो, पियानोवादक और संगीत जम गया तो वह अपनी माँ की गोद से मचल कर उतरा और पियानो वादक की के बाजू में जाकर बैठ गया और ताबड़तोड़ पियानो की कुंजियाँ दबाने लगा. इतने बड़े मॉल में एक वही संगीत की समझ और संगीत प्रेमी मिला. परंतु उसकी माता को अपने बच्चे का यह संगीत प्रेम पसंद नहीं आया और जबरन उस बच्चे को उठाकर ले जाने लगी. तब बच्चे ने शिव रूप धारण कर तांडव नृत्य मचाया जो वाकई दर्शनीय था. साथ में चल रही बच्चे की दादी माँ ने तब तुरुप का पत्ता चला और पास में खड़े एक गार्ड की ओर इशारा किया कि ज्यादा तांडव दिखाओगे तो उस पुलिस वाले को पकड़वा देंगे. भारतीयों के मन में इस तरह से पुलिस वालों का भय बचपन से ही बिठा दिया जाता है. भइए, बच के रहना नहीं तो पकड़वा देंगे. बच्चा शायद थोड़ा सा समझदार भी था. पुलिस का नाम आते ही शांत हो गया.

मैंने पियानो वादक से गुजारिश की कि क्या वो आनंद फ़िल्म का गाना – जिंदगी कैसी है पहेली बजा देगा. उसने पास में रखे सोफ़े की ओर इशारा किया और बोला बैठो, बजाता हूँ. मैं बैठ गया और उस शोरगुल में भी मैंने उस संगीत का आनंद लिया. मैंने अपने मोबाइल कैमरे से उसका वीडियो भी बना लिया. आप भी देखें –

 

मॉल की यात्रा अभी जारी है... (आप पाठकों की रुचि पर निर्भर – यदि आप चाहें...)

पुनश्च: आप सभी सुधी पाठकों ने इस ब्लॉग को परिकल्पना पुरस्कार तथा सर्बसे-प्रिय-ब्लॉग पुरस्कार हेतु सदाशयता से चुना. मैं आप सभी का दिल से आभारी हूँ. आप सभी का बहुत-2 धन्यवाद.

एक टिप्पणी भेजें

भारत में माल के नाम से ही डर लगने लगता है। पियानो वाला प्रयोग पहली बार देखा और सुनने में मधुर लगा।

दूसरी पोस्ट में भारी बैग, खाली जेब पढ़ने को मिलेगी शायद।:) जरूर लिखिये..

रोचक संस्मरण ..........कृपया जारी रखें......

कुछ अपने जैसा अनुभव लग रहा है..जारी रखिये..

लगता है आप भी उनके साथ ही मॉल में थे...हा हा हा

मॉल कोई सा भी हो और जानेवाला कोई भी हो - अनुभूति एक समान। सच्‍चा समाजवादी है यह तो।

ज्यादा गर्मी हो तो हमारे गाँव में लोग एटीम में भी जाते हैं इसी का आनंद लेने. मॉल के एसी से याद आया :)

अच्छा लगा। जरुर पढ़ना चाहूंगा अगली किश्त।

mall ki yahi to khubi hai

हाँ, यह प्रयोग बड़ा दिलचस्प लगा, और यदि शोर नहीं होता तो और मधुर लगता.

जी, जरूर लिखता हूँ. जल्द ही.

जी, जारी रखते हैं. अनुभव तो एक जैसे होते हैं, बस नजरिया अलग होता है :)

यह बात आपने सही कही. सच्चा समाजवादी है यह. पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री सबको एक ही ट्रीटमेंट देता है यह.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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