टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

February 2012

 

sunil handa story book stories from here and there in Hindi

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

425

समर्पण - स्टालिन और चर्चिल

राष्ट्रपति ट्रूमैन ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आयोजित हुये याल्टा सम्मेलन में भाग लिया था। उन्हें विंस्टन चर्चिल बहुत जटिल, अडिग और आसानी से कोई बात न मानने वाले व्यक्ति लगे जबकि रूस के जोसेफ स्टालिन बहुत मिलनसार, मित्रतापूर्ण और आसानी से बात मानने वाले व्यक्ति लगे।

किसी भी समझौते या संशोधन पर हस्ताक्षर करने के पूर्व चर्चिल बाकायदा झगड़ा करते थे। इसके विपरीत स्टालिन किसी भी समझौते पर आसानी से हस्ताक्षर करने और सहयोग प्रदान करने को तत्पर रहते।

याल्टा सम्मेलन संपन्न हुआ। सम्मेलन में तय हुये समझौतों के क्रियान्वयन का प्रबंध शुरू हुआ। ट्रूमैन ने पाया कि विंस्टन चर्चिल ने सभी समझौतों का पूरी गंभीरता से पालन और क्रियान्वयन किया जबकि जोसेफ स्टालिन ने समझौतों की कोई परवाह नहीं की और अपना गुप्त एजेंडा ही क्रियान्वित करते रहे। इन दोनों के कार्य का परिणाम अब इतिहास के पन्नों में है।

ट्रूमैन को समझ में आया कि चर्चिल इसलिए अड़ियल थे क्योंकि उनका इरादा समझौतों के प्रति गंभीर रहने का था जबकि स्टालिन इसलिए मिलनसार और समझौते करने में तत्पर बने रहे क्योंकि उनका इरादा समझौतों के पालन का नहीं था।

426

भिक्षाम देहि

भिक्षाम देहि!......दोपहर के अंतिम प्रहर में जब एक गृहिणी को यह स्वर सुनायी दिया तो वह दरवाज़े पर आए भिक्षुक के लिए एक कटोरा चावल लेकर आ गयी। चावल देते - देते उसने कहा - "महाराज! मेरे मन में आपके लिए एक प्रश्न है। आखिर लोग एक - दूसरे से झगड़ते क्यों हैं?"

भिक्षुक ने उत्तर दिया - "मैं यहाँ भिखा मांगने के लिए आया हूं, आपके मूर्खतापूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के लिए नहीं।"

यह सुनकर वह गृहिणी दंग रह गयी। सोचने लगी - यह भिक्षुक कितना असभ्य है! वह भिक्षा लेने वाला और मैं दान कर्ता हूं! उसकी हिम्मत कैसे हुयी मुझसे ऐसे बात करने की! फिर वह बोली - "तुम कितने घमंडी और कृतघ्न हो। तुम्हारे अंदर सभ्यता और लिहाज नाम की कोई चीज नहीं है।" .....और वह देर तक उसके ऊपर चिल्लाती रही।

जब वह थोड़ा शांत हुयी, तब भिक्षुक बोला - "जैसे ही मैंने कुछ बोला, तुम गुस्से से भर गयीं। वास्तव में केवल गुस्सा ही सभी झगड़ों के मूल में है। यदि लोग अपने गुस्से पर काबू रखना सीख जायें तो दुनिया में कम झगड़े होंगे।"

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174

मीठा बदला

एक बार एक देश के सिपाहियों ने शत्रुदेश का एक जासूस पकड़ लिया. जासूस के पास यूँ तो कोई आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली, मगर उसके पास स्वादिष्ट प्रतीत हो रहे मिठाइयों का एक डब्बा जरूर मिला.

सिपाहियों को मिठाइयों को देख लालच आया. परंतु उन्हें लगा कि कहीं यह जासूस उसमें जहर मिलाकर तो नहीं लाया है. तो इसकी परीक्षा करने के लिए उन्होंने पहले जासूस को मिठाई खिलाई. और जब जासूस ने प्रेम पूर्वक थोड़ी सी मिठाई खा ली तो सिपाहियों ने मिल कर मिठाई का पूरा डिब्बा हजम कर लिया और उस जासूस को जेल में डालने हेतु पकड़ कर ले जाने लगे.

इतने में उस जासूस को चक्कर आने लगे और वो उबकाइयाँ लेने लगा. उसकी इस स्थिति को देख कर सिपाहियों के होश उड़ गए. वह जासूस बोला – लगता है मिठाइयों में धीमा जहर मिला हुआ था. खाने के कुछ देर बाद इसका असर होना चालू होता है लगता है. और ऐसा कहते कहते वह जासूस जमीन में ढेर हो गया. वह बेहोश हो गया था.

सिपाहियों की तो हवा निकल गई. वे जासूस को वहीं छोड़ कर चिकित्सक की तलाश में भाग निकले.

इधर जब सभी सिपाही भाग निकले तो जासूस उठ खड़ा हुआ और इस तरह अपने भाग निकलने के मीठे तरीके पर विजयी मुस्कान मारता हुआ वहां से छूमंतर हो हो गया.

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175

गांधी जी के जूते

एक बार गांधी जी जब ट्रेन पर चढ़ रहे थे तो ट्रेन ने थोड़ी सी रफ़्तार पकड़ ली थी. चढ़ते समय हड़बड़ी में गांधी जी के एक पैर का जूता नीचे पटरी पर गिर गया.

अब चूंकि ट्रेन रुक नहीं सकती थी तो गांधी जी ने तुरंत दूसरे पैर का जूता निकाला और उसे भी नीचे फेंक दिया और अपने सहायक से कहा - जिस किसी को भी एक जूता मिलता तो उसका प्रयोग नहीं हो पाता. अब दोनों जूते कम से कम किसी के काम तो आ सकेंगे.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

423

जाल

एक बार जंगल का राजा शेर बहुत बीमार पड़ गया। वह बहुत कमजोर हो गया। उसकी दहाड़ बिल्ली की म्याँऊ की तरह हो गयी थी।

लोमड़ी को छोड़कर बाकी सभी जानवर शेर का हालचाल पूछने उसके पास आये। भेड़िया और लोमड़ी में पुरानी दुश्मनी थी। भेड़िये ने सोचा कि लोमड़ी से बदला लेने का यही सही वक्त है।

भेड़िए ने दबी हुयी आवाज़ में शेर से कहा -"हे जंगल के राजा! आपकी बीमारी की खबर सुनकर सभी जानवर दुःखी हैं, सिवाए लोमड़ी के। तभी तो सिर्फ लोमड़ी ही आपसे मिलने नहीं आयी।"

जैसे ही भेड़िए ने अपनी बात पूरी की, लोमड़ी वहां आ धमकी। उसने भेड़िए की बातें सुन लीं। वह बोली - " हे राजा, भेड़िया महोदय बिल्कुल सही फ़रमा रहे हैं। यह सत्य है कि मैं आपको देखने नहीं आयी। लेकिन किसी जानवर ने वह नहीं किया होगा, जो मैंने किया है। सभी जानवर यहाँ आपके पास आकर घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं, और मैं सभी जगह भटक कर आपके लिए उपचार की तलाश कर रही थी। और अंततः मैंने उपचार तलाश ही लिया।"

शेर ने कराहते हुए कहा - "प्रिय लोमड़ी! मुझे जल्द बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए?"

लोमड़ी ने उत्तर दिया - "यह बहुत ही सरल उपचार है। बस आपको एक भेड़िए को मारकर उसकी खाल लपेटनी है।"

यह सुनते ही भेड़िया सिर पर पैर रखकर भाग खड़ा हुआ। उसने तय कर लिया कि फिर कभी घटिया हरकत नहीं करेगा।

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424

हम मनुष्यों की जड़ें

जब एक नौजवान लड़के की दादी बीमार पड़ गयीं और चलने-फिरने में असमर्थ हो गयीं, तब उन्होंने उसे बुलाकर कहा कि वह उसके बगीचे में लगे पेड़-पौधों का ध्यान रखे ताकि वे मुरझा न जायें। उस लड़के ने वायदा किया कि वह बगीचे को ध्यान रखेगा।

एक माह के बाद जब दादी स्वस्थ और टहलने लायक हो गयीं, तो वे बगीचे में पहुँची। उन्होंने देखा कि बगीचे के कुछ पौधे सूखकर मर गए हैं और कई बुरी स्थिति में हैं। उन्होंने लड़के से कहा कि उसने अपना वायदा पूरा नहीं किया। लड़के ने रोते हुए कहा - "मैं तो रोज ही पत्तियों को पोछा करता था और पेड़ों की जड़ों में रोटी के टुकड़े डाला करता था, फिर भी वे सूख गए। इसमें मेरा क्या दोष है?"

दादी ने लड़के से कहा - "तुम्हें पेड़ की जड़ों में पानी डालना चाहिए था। पेड़ों में इतनी शक्ति होती है कि वे मिट्टी से भोजन प्राप्त कर लेते हैं और बढ़ते रहते हैं।"

लड़का विचार-मग्न हो गया। कुछ समय बाद उसने पूछा - "हम मनुष्यों की जड़ें कहाँ हैं?" दादी ने उत्तर दिया - "साहस और भुजाओं में हमारी जड़ें होती हैं। यदि इनको रोजाना पोषण नहीं मिलेगा तो हम जीवित नहीं रह सकते।" लड़के ने फैसला किया कि वह एक बड़ा नेता बनेगा और अपने समूह के साथियों को रोजाना पोषण देगा।

आगे चलकर यही लड़का माओ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 

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168

राजकपूर की नीति

स्वर्गीय राजकपूर से एक बार कांग्रेस पार्टी के किसी बड़े ओहदेदार ने राज्य सभा सदस्य बनने का प्रस्ताव दिया.

यह प्रस्ताव सुनकर राजकपूर बोले – “मैं संसद में मूर्ख का रोल करने के बजाए फ़िल्म में जोकर का रोल करना ज्यादा पसंद करूंगा.”

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169

पथ का रोड़ा

पुराने जमाने की बात है. एक बार एक राजा वेश बदल कर निकले और अपनी प्रजा की परीक्षा लेनी चाही.

राजपथ पर उन्होंने बीच सड़क में एक बड़ा सा पत्थर रख दिया और उसके नीचे एक बटुए में कुछ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं और उसमें लिखा कि जो व्यक्ति इस राह के रोड़े को हटा देगा उसे इनाम स्वरूप यह स्वर्ण मुद्राएं राजा की तरफ से दी जाती हैं.

पत्थर रख कर राजा इंतजार करने लगे कि देखें कि इनाम का हकदार कौन होता है और इससे बड़ी बात यह कि राह के रोड़े को कौन हटाता है.

उस रास्ते से राज्य के अधिकारी, व्यापारी सब गुजरे. परंतु कई ने ध्यान नहीं दिया, कई ने उस पत्थर से किनारा करते हुए रास्ता पार किया और कई को उस पत्थर से ठोकर भी लगा और वे राजा और उनके राजकाज को लानत मलामत भेजते हुए आगे बढ़ गए.

राजा निराश हो चला था कि उसके राज्य में ऐसा कोई भला बंदा नहीं है जो इस बीच सड़क पर पड़े पत्थर को हटाने की सोचे भी.

राजा जाने वाला था ही कि इतने में एक किसान अपनी पीठ पर ताजा सब्जियाँ लाद कर आता दिखा. वह अपना माल मंडी में बेचने आया था. उसने उस पत्थर को बीच सड़क में देखा तो उसने पहले अपना बोझा एक किनारे पर रखा और फिर उस पत्थर को प्रयत्न से सड़क के एक किनारे कर दिया.

जाहिर है जब उसने उस पत्थर को हटाया तो नीचे वहाँ रखा उसका इनाम मिल गया. राह के रोड़े को हटाने का इनाम मिलता ही है.

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170

अपशकुनी कौन

एक राजा शिकार के लिए निकला तो महल से निकलते ही मुल्ला नसरूद्दीन पर उसकी नजर पड़ गई.

राजा ने इसे अपशकुन समझा और मुल्ला को चार कोड़े मारने के आदेश दे दिए कि जब राजा की सवारी निकल रही थी तो वह रास्ते में सामने क्यों आ गया.

परंतु उस दिन राजा के शिकार के लिए बहुत उम्दा रहा. ढेर शिकार मिले. राजा जब शिकार से वापस आया तो उसे मुल्ला की याद आई. उसने मुल्ला को बुलवा भेजा.

राजा ने मुल्ला को दिलासा दिलाते हुए कहा – “हम क्षमा चाहते हैं मुल्ला, हमने आपको देखने से दिन के लिए अपशकुन माना था, मगर आज का दिन तो भाग्यशाली रहा – हमें बढ़िया शिकार मिले.”

“मगर हुजूर, मेरा दिन तो बेहद अपशकुन वाला रहा. सुबह चार कोड़े खाए, दिन भर भूखा रहा और अभी मैं खाना खाने जा रहा था कि सिपाहियों ने हुक्म दिया कि राजा ने बुलाया है और मुझे भरी थाली छोड़कर आना पड़ा. मेरे लिए तो आपको देखना ही अपशकुन हो गया.” – मुल्ला ने जवाब दिया.

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171

सबकुछ

एडीसन एक बार गेस्टबुक में हस्ताक्षर कर रहे थे. वहाँ आखिरी कॉलम में लिखा था – आपकी रूचियाँ. जिसमें गेस्ट अपनी रूचियाँ या रुचि के विषय के बारे में लिखते थे.

एडीसन ने लिखा – सबकुछ.

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172

लामा और जनरल

तिब्बत में जब विदेशी सैनिकों का आक्रमण हुआ तो सिपाहियों के अत्याचार के किस्से सुन सुनकर एक गांव के लोग भय से पहले ही पलायन कर गए.

सैनिक जब गांव पहुँचे तो वह पूरा सुनसान मिला. एक स्थान पर एक लामा ध्यानस्थ अवस्था में सैनिकों को मिला. खबर जनरल तक पहुँची, तो वह उस लामा के पास पहुँचा और लामा पर चीखते हुए बोला – “तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हें मालूम नहीं मैं कौन हूँ? मैं पलक झपकते ही अभी तुम्हारा सिर कलम कर सकता हूँ.”

यह सुनकर लामा ने जवाब दिया – “तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हें मालूम नहीं मैं कौन हूँ? मैं पलक झपकते ही अभी अपना सिर कलम करवा सकता हूँ.”

यह सुनकर जनरल अवाक् रह गए. उन्होंने लामा को प्रणाम किया और उस गांव से अपने दल बल समेत वापस चले गए.

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173

चौथा बंदर

गांधी जी के तीन बंदर हैं – बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो और बुरा मत कहो.

परंतु एकलव्य के एक वरिष्ठ शिक्षक का कहना था – एक चौथा बंदर भी होना चाहिए.

बुरा मत सोचो.

बुरा करने की क्रिया और भावना बुरी सोच से ही आती है. यदि सोच सही होगी तो कहीं बुरा नहीं होगा.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

421

अहंकार ऐसे पथ तलाशता है

मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी उनसे झगड़ रही थीं। वह गुस्से में बोलीं - "सुनिए जी, आखिर यह क्या मामला है। आज तुम साफ-साफ बता ही दो कि तुम मेरे सभी रिश्तेदारों को नफरत और घृणा से क्यों देखते हो?"

मुल्ला ने उत्तर दिया - "नहीं बेगम! यह सही नहीं है और मैं तुम्हें इसका प्रमाण भी दे सकता हूं। और इसका प्रमाण यह है कि मैं तुमसे प्यार करता हूं और तुम्हारी सास को अपनी सास से अधिक प्यार करता हूं।"

422

हर कोई नायक है

एक दिन एक गणितज्ञ ने जीरो से लेकर नौ अंक तक की सभा आयोजित की। सभा में जीरो कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था। सभी ने उसकी तलाश की और अंततः उसे एक झाड़ी के पीछे छुपा हुआ पाया। अंक एक और सात उसे सभा में लेकर आये।

गणितज्ञ ने जीरो से पूछा - "तुम छुप क्यों रहे थे?"

जीरो से उत्तर दिया - "श्रीमान, मैं जीरो हूं। मेरा कोई मूल्य नहीं है। मैं इतना दुःखी हूं कि झाड़ी के पीछे छुप गया।"

गणितज्ञ ने एक पल विचार किया और तब अंक एक से कहा कि समूह के सामने खड़े हो जाओ। अंक एक की ओर इशारा करते हुए उसने पूछा - "इसका मूल्य क्या है?" सभी ने कहा - "एक"। इसके बाद उसने जीरो को एक के दाहिनी ओर खड़े होने को कहा। फिर उसने सबसे पूछा कि अब इनका क्या मल्य है? सभी ने कहा - "दस"। इसके बाद उसने एक के दाहिनी ओर कई जीरो बना दिए। जिससे उसका मूल्य इकाई अंक से बढ़कर दहाई, सैंकड़ा, हजार और लाख हो गया।

गणितज्ञ जीरो से बोला - "अब देखिये। अंक एक का अपने आप में अधिक मूल्य नहीं था परंतु जब तुम इसके साथ खड़े हो गए, इसका मूल्य बढ़कर कई गुना हो गया। तुमने अपना योगदान दिया और बहुमूल्य हो गए।"

उस दिन के बाद से जीरो ने अपनेआप को हीन नहीं समझा। वह यह सोचने लगा - "यदि मैं अपनी भूमिका का सर्वश्रेष्ठ तरीके से निर्वहन करूं तो कुछ सार्थक होगा। जब हम एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करते हैं तो हम सभी का मूल्य बढ़ता है।"

जब हम एक दूसरे के साथ कार्य करते हैं, तो बेहतर कार्य करते हैं।

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166

प्रार्थना 5

एक दिन एक मोची रब्बी के पास पहुँचा और अपनी व्यथा बताई.

मैं मोची का काम करता हूँ. मेरे ग्राहक गरीब मजदूर हैं. वे शाम को जब आते हैं तब उनके जूते चप्पल खराब रहते हैं. मैं उन्हें रात में ठीक करता हूँ. कई बार सुबह भी यह काम करना पड़ता है क्योंकि मजदूर सुबह सुबह काम पर जाते हैं. इस वजह से मैं सुबह व शाम को भगवान का ध्यान और पूजा नहीं कर पाता इससे मैं अपने आप को अपराधी मानता हूँ.

रब्बी ने कहा – यदि मैं भगवान होता तो मैं तुम्हारे कार्य को पूजा और प्रार्थना से ज्यादा अच्छा समझता.

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167

प्रार्थना 6

शाम को खेत से वापस आते समय गरीब किसान को अहसास हुआ कि आज तो वह अपनी आरती की किताब साथ लाना भूल गया था. चूंकि उसे घर लौटते अकसर देर हो जाती थी तो वह कहीं पर बीच में बैठ कर किताब से पढ़कर आरती गा लेता था.

चूंकि उसे आरती याद नहीं रहता था तो उसने बचपन में पढ़े स्वर और व्यंजनों यानी अक्षरों का पाठ पाँच बार किया और मन ही मन भगवान से बोला – भगवान इसमें से आरती वाले शब्द चुनकर अपनी आरती स्वीकार कर लो.

और चूंकि यह विचित्र प्रार्थना दिल से निकली थी. सीधे भगवान के पास पहुँची.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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हाल ही में भारत की यात्रा पर आए रिचर्ड एम स्टॉलमन से अपने मोबाइल फ़ोन प्रयोग नहीं करने और मुक्त सॉफ़्टवेयर, स्टीव जॉब्स, फ़ेसबुक इत्यादि के बारे में ईएफवाईटाइम्स से बात की. मुख्य अंश पढ़ें ...


जब भी मुफ्त सॉफ्टवेयर की बात की जाती है, वहाँ आरएमएस के रूप में विख्यात रिचर्ड एम स्टॉलमेन का नाम आता है. और क्यों न हो, उनके जैसा मुक्त सॉफ़्टवेयर का मुखर प्रयोगकर्ता व एक्टिविस्ट और दूसरा कोई नहीं है. स्टॉलमेन के मुताबिक विंडोज या एपल मैक जैसा मालिकाना सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर आपकी स्वतंत्रता को पूरी तरह समाप्त करता है और यह बात उन्हें पूरी तरह से अस्वीकार्य है.

आप फ़ेसबुक को सिरे से नकारते हैं. क्यों?


फ़ेसबुक किसी का मित्र नहीं है, और निश्चित रूप से मेरा तो मित्र नहीं ही है. फ़ेसबुक, का एकमात्र काम है अपने प्रयोगकर्ताओं का डेटा इकट्ठा करना. फ़ेसबुक की तथाकथित तमाम सुविधाएँ उपयोगकर्ताओं द्वारा उपयोग में ली जाती हैं तो उनका इस्तेमाल फ़ेसबुक अपने फायदे के लिए डेटा एकत्रित करने के लिए करता है. यदि आप फ़ेसबुक में मेरी एक तस्वीर पोस्ट करेंगे और उसमें लेबल के रूप में रिचर्ड स्टॉलमेन लिखेंगे तो उनके डेटाबेस में मेरे बारे में जानकारी एकत्र हो जाएगी कि रिचर्ड स्टॉलमेन को कौन पसंद करता है. और मैं किसी दूसरे के डेटाबेस में अपने बारे में किसी किस्म की जानकारी साझा नहीं करना चाहता.


आपने Stallman.org के माध्यम से अपने अनुयायियों से कहा है कि अमेज़न के साथ व्यापार कतई न करें?


अमेज़न का स्विंडल तो ठगी का मालवेयर है. स्विंडल इसका आधिकारिक नाम नहीं है, मगर मैं उसके उसी प्रसिद्ध गॅजेट के बारे में कह रहा हूं जो आप समझ रहे हैं. इसे पाठकों को पढ़ने के उनके पारंपरिक स्वतंत्रता को ठगने के लिए डिज़ाइन किया गया है. मैं एक ई-किताब और उसके पाठक की बात कर रहा हूँ. किताबें खरीदने का एक ही तरीका है. आप दुकान पर जाते हैं, नकद भुगतान कर गुमनाम तरीके से पुस्तक खरीदते हैं. यह खरीदने की स्वतंत्रता है. अमेजन में यह स्वतंत्रता नहीं है. मैं कभी नहीं चाहूंगा कि कि मेरा नाम किसी भी डेटाबेस में रखा जाए कि मैंने कौन सी किताबें खरीदी हैं. अमेजन यही करता है. वो सारे आंकड़े अपने साथ रखता है कि आपने कब कब क्या खरीदा क्या क्या पढ़ा. यह आपकी स्वतंत्रता पर हमला है. अमेज़न के पास विशाल डेटाबेस है कि प्रत्येक पुस्तक जो उसकी साइट से बेची गई है उसे किन लोगों ने और कितने लोगों ने खरीदा है. और इस तरह के डेटाबेस, लोगों को लगता हो कि इसमें कोई बुरी बात नहीं है परंतु यह सोच गलत है. यह तो मानव अधिकारों के लिए एक खतरा है. और हमें इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए.


फिर जब आप कोई किताब खरीदते हैं तो उसे पढ़ने के बाद रद्दी में बेच देते हैं या किसी मित्र को उपहार में दे देते हैं या अपनी लाइब्रेरी में सहेज कर रख लेते हैं. अमेज़न तो डिजिटल हथकड़ी के साथ आपको किताब बेचता है. आपकी इस स्वतंत्रता का हनन होता है. इसके उपयोगकर्ता लाइसेंस समझौते के साथ जब आप खरीदते हैं तो आपको ये सब सुविधाएं नहीं मिलतीं.


आप अमेजन से खरीदी किताबें किसी को नहीं दे सकते. कानूनी तौर पर अपने वारिस, अपने बच्चे को भी नहीं. अमेज़न चोर दरवाजे से आपकी इस स्वतंत्रता का हनन करता है. हमें अमेजन के इस चोर दरवाजे के और भी बुरे सलूकों के बारे में पता है. अमेजन ने 2009 में उपयोगकर्ताओं के ईबुक संग्रह से एक विशेष पुस्तक की प्रतियों को गुपचुप तरीके से डिलीट कर दिया. यह पुस्तक जॉर्ज ऑरवेल द्वारा लिखी गई 1984 नामक पुस्तक है. सोचिए, कोई व्यक्ति आपके घर की लाइब्रेरी में सेंधमारी करे और कोई किताब उठा कर ले जाए और कूड़ेदान में फेंक दे. सबसे बड़ी विडंबना है इस उत्पाद का आधिकारिक नाम. इसका अर्थ है आग शुरू करना. जाहिर है, इस उत्पाद को प्रिंट माध्यम की किताबों को जलाने के लिए डिजाइन किया गया है. ठीक है, मगर हम हमारी अपनी किताबों को तो ऐसा नहीं करने दे सकते इसी लिए यह या ऐसे उत्पादों का उपयोग कतई नहीं करें.


आपने कहा था कि "मैं खुश हूं कि जॉब्स चला गया.” क्या आप स्पष्ट कर सकते हैं कि आपने ऐसा क्यों कहा?
लोगों ने मेरी बात को विकृत तरीके से समझा. मैंने यह नहीं कहा कि अच्छा है कि उसकी मृत्यु हो गई. कोई भी सही दिमाग का व्यक्ति ऐसा नहीं कहेगा. मैंने भी ऐसा नहीं कहा. परंतु मैंने यह जरूर कहा कि यह अच्छा है कि वह चला गया. मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वह एक शातिर, ज्ञानी शैतान था जिसने दुनिया का बहुत नुकसान किया.

उसने ऐसे कंप्यूटर बनाए जो उन कंप्यूटर के उपयोगकर्ताओं के लिए जेल की तरह थे. उसने कंप्यूटरों को आकर्षक, ग्लैमरस बनाया ताकि उपयोगकर्ता ग्लैमर की ओर आकर्षित हों और जाकर एपल की हथकड़ी पहन लें. एपल के बाद यही काम माइक्रोसॉफ़्ट ने किया. कंप्यूटिंग दुनिया बद से बदतर होती चली गई. अभी भी खासा नुकसान हो रहा है. और हम इससे आजादी के लिए, मुक्त सॉफ़्टवेयर के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. और इसीलिए मैंने यह कहा था कि अच्छा हुआ कि वह चला गया. जॉब्स ने बहुत से अच्छे काम भी किए. मगर एपल के रूप में उसका सबसे खराब काम था यह. मुझे खुशी है कि अब वह इस तरह और अधिक नुकसान करने में सक्षम नहीं है. मुझे आशा है कि इन कार्यों में उनके उत्तराधिकारी उतने सफल नहीं होंगे.


आप मोबाइल फोन का प्रयोग क्यों नहीं करते?
क्योंकि मोबाइल फोन मेरे या किसी के साथ मेरी बातचीत के स्थान को ट्रैक कर सकते हैं. अधिकांश मोबाइल फोन भले ही वे स्मार्टफ़ोन नहीं हों उनमें प्रोसेसर होता है, सॉफ्टवेयर चलता रहता है और सभी सॉफ्टवेयर (स्वामित्व वाले) मालवेयर हैं, क्योंकि वे रिमोट पर अपने डेवलपरों को उपयोगकर्ताओं के स्थानों के बारे में जानकारी भेज सकते हैं. इनमें एक तरह का बैक-डोर होता है जो दूर से आपके वार्तालाप सुन सकते हैं. यूँ भी लगभग सभी सॉफ्टवेयर में बग (बगिंग उपकरण जो जासूसी के काम आता है) होता है. और अपने आप में सॉफ्टवेयर भी एक बग ही है.


भारत में अपने सामुदायिक संबंधों के आधार पर भारत में फ्री सॉफ्टवेयर आंदोलन के बारे में आपकी टिप्पणी?
यहाँ बहुत से एक्टिविस्ट हैं जो मुक्त सॉफ़्टवेयर के लिए अभियान चलाए हुए हैं और उन्हें बहुत कुछ सफलता भी मिली है. केरल के कुछ स्कूलों में मुक्त सॉफ़्टवेयर का प्रयोग शुरू किया गया है. परंतु भारतीय मुक्त सॉफ़्टवेयर समुदाय स्वतंत्रता के बारे में नहीं सोचता. फिर सरकारी स्तर की बाधाएँ भी हैं. स्कूलों को (कुछ विशिष्ट विद्यालयों में तो निश्चित तौर पर क्योंकि इसकी उन्हें आवश्यकता भी है) मालिकाना सॉफ़्टवेयर सिखाने के लिए बाध्य किया जाता है. तो यह पूरी तरह गलत है. किसी भी देश की सरकार यदि अपने छात्रों को मालिकाना हक के सॉफ़्टवेयरों के बारे में प्रशिक्षित करती है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि वह देश को उस कंपनी के हाथों बेच रही है. तमिलनाडु में स्कूली बच्चों को लैपटॉप दिये जा रहे हैं जिसमें विंडो ऑपरेटिंग सिस्टम है. यह तो कंपनी को अपना भविष्य बेचने जैसा हुआ. फिर किसी ने बताया कि अब उनमें ड्यूअल बूट सिस्टम डाला जा रहा है. इसका मतलब ये है कि आधे हिस्से में नैतिक माल है और बाकी आधे हिस्से में अनैतिक चीज. दूसरे अर्थों में बच्चों को लंच टाइम में पानी के साथ साथ व्हिस्की भी दी जा रही है ताकि वे दोनों चीजों को चख कर देख सकें. इसलिए उन्हें मालिकाना हक वाले सॉफ़्टवेयरों का वितरण करना बंद कर देना चाहिए. बच्चों के बीच तो बिलकुल नहीं.

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(ईएफवाईटाईम्स.कॉम में मूल अंग्रेजी में प्रकाशित दीक्षा पी. गुप्ता के आलेख से साभार अनुवादित)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

419

सर्वश्रेष्ठ दान

तीन भाईयों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गयी कि सर्वश्रेष्ठ दान कौन सा है? पहले ने कहा कि धन का दान ही सर्वश्रेष्ठ दान है, दूसरे ने कहा कि गौ-दान सर्वश्रेष्ठ दान है, तीसरे ने कहा कि भूमि-दान ही सर्वश्रेष्ठ दान है। निर्णय न हो पाने के कारण वे तीनों अपने पिता के पास पहुंचे।

पिता ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सबसे बड़े पुत्र को धन देकर रवाना कर दिया। वह पुत्र गली में पहुंचा और एक भिखारी को वह धन दान में दे दिया। इसी तरह उन्होंने दूसरे पुत्र को गाय दी। दूसरे पुत्र ने भी उसी भिखारी को गाय दान में दे दी। फिर तीसरा पुत्र भी उसी भिखारी को भूमि दान देकर लोट आया।

कुछ दिनों बाद पिता अपने तीनों पुत्रों के साथ उसी गली में टहल रहे थे जहां वह भिखारी प्रायः मिलता था। उन लोगों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह अब भी भीख मांग रहा था। उस भिखारी ने गाय और भूमि बेचने के पश्चात प्राप्त हुआ पूरा पैसा मौजमस्ती में उड़ा दिया था। पिता ने समझाया - "वही दान सर्वश्रेष्ठ दान है जिसका सदुपयोग किया जा सके। ज्ञानदान ही सर्वश्रेष्ठ दान है।"

(एक बार विशाखापटनम में मैंने गुरू मूर्तिगारू से पूछा - "कौन सा दान सर्वश्रेष्ठ है?" तो उन्होंने उत्तर दिया - "वही दान सर्वश्रेष्ठ है जिसकी पाने वाले को उस समय सबसे अधिक आवश्यकता हो। और विद्यादान ही सर्वश्रेष्ठ दान है")

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420

यह रोना क्यों ?

एक माँ की तीन संतानें युद्ध में भाग लेने के लिए गयीं। कुछ दिन बाद यह खबर आयी कि पहला पुत्र युद्ध में मारा गया है।

माँ ने मुस्कराते हुए कहा - "वह भाग्यशाली है कि उसने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर किया है।" कुछ ही दिनों बाद दूसरा पुत्र भी युद्धभूमि में शहीद हो गया। माँ ने कहा - "मुझे ऐसे पुत्र की माँ होने का गर्व है जिसने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर किया हो।"

कुछ समय बाद उसका तीसरा पुत्र भी शहीद हो गया। इस बार जब उसने तीसरे पुत्र के निधन का समाचार सुना तो मुस्कराहट के साथ माँ की आँखों में आँसू भी थे। उनके पास में खड़े एक व्यक्ति ने कहा - "आखिर आपकी आँखों में आँसू आ ही गए?"

माँ ने कहा - "मेरी आँखों में आँसू इसलिए हैं क्योंकि मेरे प्यारे देश पर न्योछावर करने के लिए अब मेरे पास और पुत्र नहीं बचे हैं।"

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164

एक प्राचार्य का पत्र

एक स्कूल में एक नए प्राचार्य ने पदभार ग्रहण किया. पदभार ग्रहण करने के पश्चात उन्होंने तमाम शिक्षकों के नाम निम्न परिपत्र जारी किया :

मेरे प्रिय शिक्षक बंधु,

मैं एक युद्धबंदी यातना शिविर का बंदी रह चुका हूं. मैंने वह सब अत्याचार और दारूण दृश्य देखे हैं जो लोगों की कल्पना शक्ति से भी परे है.

शिक्षित इंजीनियरों ने गैस चैम्बर बनाए थे. प्रशिक्षित डॉक्टरों ने लोगों को तड़पा कर मारने वाले टीके ईजाद किए थे. प्रशिक्षित नर्सों ने नवजात शिशुओं को मौत के घाट उतारा था.

युवाओं, महिलाओं और बच्चों को हाई-स्कूल और कॉलेज पढ़े सैनिकों ने गोलियों से भूना था.

इसीलिए मैं शिक्षा को संदेह की दृष्टि से देखता हूँ.

मेरा निवेदन है कि अपने विद्यार्थियों को मनुष्यता, मानवता का पाठ पहले पढ़ाएं. आपकी मेहनत शिक्षित और प्रशिक्षित दानव और मनोरोगी बनाने में नहीं लगनी चाहिए.

पढ़ना लिखना तभी सफल है जब हमारे बच्चे मनुष्य बनें.

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165

संतोष का वरदान

भगवान विष्णु अपने एक भक्त की तपस्या से प्रसन्न हुए और उनको दर्शन देकर बोले – वत्स, कोई वरदान मांगो.

भक्त के दिमाग में तत्काल कोई खयाल नहीं आया. तो उसने भगवान से कहा कि वो सोचकर वरदान मांगेगा.

भक्त ने यह समस्या अपने मित्रों व रिश्तेदारों से साझा किया.

एक ने कहा – अमर होने का वरदान मांग लो.

दूसरे ने कहा – अमर होने का क्या फायदा. यदि बीमारी व तकलीफ झेलते रहे. तो अच्छा स्वास्थ्य मांगो.

तीसरे ने सुझाव दिया – अमरता या अच्छे स्वास्थ्य का अचार डालोगे यदि आपके पास पैसा नहीं हो? पैसा मांगो. पैसा.

इस तरह से हर कोई अपनी अपनी थ्योरी बताने लगा.

थक हार कर भक्त फिर से भगवान की शरण में गया और बोला – भगवान, मैं क्या वरदान मांगूं, यही मुझे समझ में नहीं आ रहा है. आप ही मुझ पर कृपा करें और समुचित वरदान दे दें.

भगवान मुस्कुराए और भक्त को संतोषी बने रहने का वरदान दे दिया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

417

पंखे के बिना रहना

अपने पिता के निधन के बाद एक पुत्र ने अपनी माँ को वृद्धाश्रम भेज दिया। इस फैसले में उसकी पत्नी की इच्छा भी शामिल थी। वृद्धाश्रम में कमरे तो थे परंतु किसी कमरे में पंखा नहीं था। कई वर्ष तक वहाँ रहने के बाद वह वृद्ध महिला बहुत बीमार पड़ गयी। डॉक्टरों ने भी ऐसे वक्त में उसके पुत्र को बुलाना उचित समझा।

माँ और पुत्र की बहुत दिनों के बाद मुलाकात तथा बातचीत हुयी। पुत्र ने माँ का हालचाल जाना और पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज की आवश्यकता है? माँ ने उससे वृद्धाश्रम के कमरों में पंखा लगवाने को कहा।(उसका पुत्र व्यापार में अच्छी तरक्की कर रहा था और आर्थिक रूप से संपन्न था।)

आश्चर्यचकित होकर पुत्र ने पूछा - "माँ, तुम इतने वर्षों तक इस जगह पर रह चुकी हो, लेकिन तुमने पहले मुझसे इस बारे में कभी नहीं कहा? अब क्यों, जबकि आपके जीवन में बहुत कम समय बचा है?"

"बेटे, मुझे तुम्हारी चिंता है। क्योंकि मैं तो पंखे के बिना रह सकती हूं परंतु तुम नहीं।"

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418

ईश्वर पापियों के ज्यादा करीब है

एक संत की एक चिंताजनक एवं मनोरंजक शिक्षा यह है कि ईश्वर संतों की तुलना में पापियों के ज्यादा करीब है।

वह इस तरह इसे सिद्ध करते हैं कि स्वर्ग में ईश्वर हर व्यक्ति को एक धागे से बांधकर रखता है। जब आप पाप करते हैं तो इस धागे को काट देते हैं।

तब ईश्वर इस धागे को गांठ बनाकर पुनः बांधते हैं और इस तरह आपको अपने नजदीक ले आते हैं। इस तरह हर बार आप पाप करके धागे को काटते हैं और गांठ लगाकर ईश्वर आपको अपने और अधिक करीब ले आते हैं।

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162

मृत्यु के बाद क्या?

शहंशाह गोयोजेई अपने जेन गुरु ग्यूडो से धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे. एक दिन शहंशाह ने गुरु से पूछा – मृत्यु के पश्चात् ज्ञानी व्यक्ति की आत्मा कहाँ जाती है?

गुरु ने कहा – मुझे नहीं पता.

शहंशाह ने कहा – आप तो ज्ञानी हैं. आपको भी नहीं पता?

हाँ, मुझे सचमुच नहीं पता. क्योंकि अभी तक मैं मरा नहीं हूँ - गुरु ने स्पष्ट किया.

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163

राजा भोज और गंगू बुढ़िया

राजा भोज सामान्य नागरिक के रूप में वेश बदल कर कवि माघ के साथ घूमने निकले और प्राकृतिक सुंदरता में खो कर घने जंगलों में गए और वहाँ रास्ता भटक गए.

भटकते हुए उन्हें वहाँ बेर एकत्र करती हुई एक बुढ़िया मिल गई. राजा भोज ने विनम्रता से बुढ़िया से पूछा – “माता जी, हम रास्ता भटक गए हैं. यह रास्ता किधर जाता है?”

“यह रास्ता कहीं नहीं जाता. यह तो बरसों से यहीं पर है. वैसे आप हैं कौन?” बुढ़िया ने पूछा.

“हम लोग यात्री हैं.”

“यात्री तो केवल दो हैं – चाँद और सूरज. इन दो में से आप कौन हैं?”

“तो हमें अपना मेहमान समझ लें.”

“मेहमान तो केवल दो होते हैं – पैसा और युवावस्था. इनमें से आप हैं कौन?”

“हमें बस रास्ता भटका साधु समझ लें और कृपया रास्ता बताएं.”

“सत्य में तो साधु सिर्फ शांति और प्रसन्नता का दूसरा नाम है. आप क्या हैं?”

बुढ़िया से हो रहे इस वार्तालाप से राजा भोज व कवि माघ चमत्कृत हो गए. उन्होंने एक स्वर से कहा – “माता, हम लोग सामान्य, बुद्धिहीन व्यक्ति हैं. कृपया हमारा मार्गदर्शन करें.”

बुढ़िया ने हँसकर कहा – “आप सामान्य नहीं हैं. आपको तो मैंने देखते ही पहचान लिया था कि आप राजा भोज और आप कवि माघ हैं. यह रास्ता सीधे धार नगरी को ही जाता है.”

राजा भोज व कवि माघ ने बुढ़िया की बुद्धिमत्ता व प्रत्युत्पन्नमति का लोहा मानते हुए उन्हें प्रणाम किया और आगे बढ़ चले.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

415

अमीर

एक बार एक अमीर व्यापारी एक संन्यासी के आश्रम में पहुंचा। संन्यासी को प्रणाम करने के उपरांत उसने पूछा - "किस तरह से आध्यात्म मुझ जैसे सांसारिक व्यक्ति को सहायता प्रदान कर सकता है?"

संन्यासी ने कहा - "इससे तुम और अधिक अमीर हो जाओगे।"

ललचायी आँखों के साथ व्यापारी ने पूछा - "कैसे?"

संन्यासी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया - "तुम्हें इच्छाओं से मुक्त होने की शिक्षा देकर।"

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416

कथाएं और दृष्टांत

एक गुरूजी अपने शिष्यों को कथाओं और दृष्टांतों के माध्यम से शिक्षा देते थे, जिसे उनके शिष्य खूब पसंद करते परंतु उन्हें कभी-कभी यह शिकायत भी होती कि गुरूजी गंभीर विषय पर व्याख्यान नहीं देते हैं।

गुरूजी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। शिष्यों की शिकायत पर वे कहते -"प्रिय शिष्यों! तुम लोगों का अब भी यह समझना बाकी है कि मनुष्यमात्र और सत्य के मध्य केवल कथा ही है।"

कुछ देर चुप रहने के बाद वे पुनः बोले - "कथाओं से घृणा मत करो। एक खोये हुए सिक्के को सिर्फ सस्ती मोमबत्ती के माध्यम से खोजा जा सकता है। सरल कथाओं के माध्यम से ही गंभीर सत्य प्राप्त किया जा सकता है।"

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160

किसका, कैसा ऋण

बादशाह सिकंदर लोधी के जमाने में जैन-उद्-दीन नामक प्रसिद्ध संत हुए थे. उनका मठ धनी था और संत दयालु थे. मठ का अधिकांश धन उन्होंने दीन दुखियों की सेवा सुश्रूषा में लगा दिया था.

समय बीतता गया और उनका मठ धन विहीन हो गया. एक दिन संत ने मठ में रखे कुछ कागजातों को छाना और उन्हें जलाने का हुक्म दिया. उनके एक शिष्य ने इन कागजातों को देखा तो पाया कि ये तो मठ द्वारा शहर के कई सेठों को दिए गए ऋण के कागजात हैं. यदि ये ऋण वसूल हो जाएं तो मठ फिर से धन्-धान्य से भरपूर हो सकता है. शिष्य ने यह बात संत को बताई.

संत ने कहा – “जब मठ धनी था तब जिन लोगों ने मठ से रुपए उधार लिए थे, तब भी मुझे यह प्रत्याशा नहीं थी कि यह धन मठ को वापस मिलेगा. उन लोगों ने तो महज विश्वास बनाए रखने के नाम पर और शासकीय जरूरतों के मुताबिक ये कागजात सौंप दिए थे. अब मठ गरीब हो गया है. ऐसी स्थिति में हमारे मन में लालच आ सकता है और बिलकुल वही बात आ सकती है जैसा कि तुमने कहा है. इसीलिए मैं इन कागजातों को जला रहा हूँ ताकि मैं इस तरह की संभावना को पूरी तरह समाप्त कर सकूं.”

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161

एक रुपए में महल को कैसे भरोगे

एक बुद्धिमान राजा के तीन पुत्र थे. राजा वृद्ध हो चला तो उसने अपने तीनों पुत्रों में से किसी एक को राज्य का उत्तराधिकारी बनाने का सोचा. वह पारंपरिक रूप से ज्येष्ठ पुत्र को राजा बनाने के विरुद्ध था. वह चाहता था कि बुद्धिमान पुत्र राजा बने ताकि राज्य का कल्याण हो.

तो राजा ने इसके लिए अपने पुत्रों की परीक्षा लेने के लिए एक दिन अपने पास बुलाया और प्रत्येक को एक एक रूपए देकर कहा कि यह रुपया ले जाओ और उससे कुछ खरीद कर महल को पूरा भर दो.

ज्येष्ठ पुत्र ने सोचा कि पिता शायद पागल हो गया है. एक रूपए में आजकल क्या आता है जिससे महल को भरा जा सकता है! उसने वह रुपया एक भिखारी को दे दिया.

मंझले ने सोचा कि एक रूपए में तो महल को पूरा भरने लायक कबाड़ ही मिलेगा. वह कबाड़ी बाजार पहुँचा और सबसे सस्ता कबाड़ खरीद कर ले आया. फिर भी उससे महल का सबसे छोटा कमरा ही भर पाया.

कनिष्ठ पुत्र ने थोड़ा विचार किया और बाजार चला गया. जब वह वापस आया तो उसके हाथ में अगरबत्ती का पैकेट था.

उसने उन अगरबत्तियों को जलाया, और महल के हर कमरे में एक एक अगरबत्ती लगा दी. पूरा महल सुगंध और दैवीय माहौल से भर गया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

413

कभी मत बदलो, इस्तीफा दो और मुक्ति पाओ

मुल्ला नसरुद्दीन एक ऑफिस में काम करने लगे। हर कोई उससे नाराज़ रहता। वह कोई काम नहीं करता था और सारा समय सोता ही रहता था। ऑफिस के लोग उससे इतने तंग आ चुके थे कि धीरे-धीरे उन्होंने उसके ऊपर चिल्लाना शुरू कर दिया। जल्द ही ऑफिस के बॉस ने भी नसरुद्दीन को डाँट पिला दी। लेकिन उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया।

एक दिन नसरुद्दीन रोज-रोज के तानों, आलोचना और डाँट से तंग आ गया और उसने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देना उसके लिए अपनेआप को बदलने से ज्यादा आसान था।(इस दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जो बदलना नहीं चाहते इसलिए वे इस्तीफा देकर भाग खड़े होते हैं।)

नसरुद्दीन ने इस्तीफा दे दिया। सभी लोग बहुत खुश हो गए। बॉस तो अत्यधिक खुश होकर बोला - "चूंकि नसरुद्दीन ने अपने आप ही इस्तीफा दिया है इसलिए हम सभी को उदारता दिखाते हुए उसे विदाई पार्टी देनी चाहिए। हम सभी उससे इतने नाखुश थे कि इसके अलावा और कोई चारा नहीं था।"

इसलिए नसरुद्दीन के सम्मान में एक बेहतरीन रात्रिभोज का आयोजन किया गया जिसमें तरह-तरह के व्यंजन, मिष्ठान और संगीत आदि की व्यवस्था थी। इस समारोह में ऑफिस के सभी लोग उपस्थित थे। यह सोचते हुए कि नसरुद्दीन तो जा ही रहा है, कई लोगों ने नसरुद्दीन के सम्मान में अच्छी-अच्छी बातें बोली। नसरुद्दीन आश्चर्यचकित थे।

तभी नसरुद्दीन उठ खड़े हुए। अपनी आँखों में आँसू भरकर बोले - "मुझे नहीं पता था कि सभी लोगों के मन में मेरे प्रति इतना प्रेम और सम्मान है। मुझे इतना अधिक प्रेम और कहाँ मिलेगा? मैंने निर्णय लिया है कि आप सभी को छोड़कर कभी नहीं जाऊंगा। मैं अपना इस्तीफा वापस ले रहा हूं!"

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414

गुरू के प्रति राजकुमारों की भक्ति

ख़लीफ़ा मामू के मन में विद्वानों के प्रति आदर सम्मान था। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को शिक्षित करने के लिए एक गुरूजी को नियुक्त किया। एक दिन जब कक्षा समाप्त हो गयी और गुरूजी अपने घर जाने को खड़े हुए, दोनों राजकुमार दौड़कर उनके जुते उठा लाये। दोनों एक साथ उनके पास पहुंचे थे अतः उनके मध्य यह विवाद हो गया कि गुरूजी को जूता पहनाने का नेक काम कोन करेगा। अंत में यह निर्णय हुआ कि दोनों राजकुमार एक - एक जूता पहनायेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया।

जब ख़लीफ़ाने इसके बारे में सुना तो उन्होंने गुरूजी से पूछा -"इस संसार में सबसे अधिक प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति कौन है?"

गुरूजी ने उत्तर दिया - "मुस्लिमों के नेता ख़लीफ़ा से ज्यादा इस संसार में और कौन प्रतिष्ठित और सम्मानित हो सकता है?"

ख़लीफ़ा मामू ने कहा - "नहीं सबसे अधिक प्रतिष्ठित और सम्मानित वह है जिसे जूता पहनाने के लिए ख़लीफ़ा के दोनों पुत्र आपस में झगड़ पड़े हों।"

गुरूजी ने कहा - "पहले मैं उन्हें ऐसा करने से रोकने वाला था, फिर मेरे मन में यह विचार आया कि मैं उनकी श्रृद्धा के आड़े क्यों आऊँ।"

ख़लीफ़ा मामू ने कहा - "यदि आपने ऐसा किया होता तो मैं बहुत नाराज़ होता। उनका यह कार्य उन्हें अपमानित नहीं करता बल्कि यह दर्शाता है कि दोनों राजकुमार कितने भले और सभ्य हैं। राजा, पिता और गुरू के प्रति सेवा का भाव रखने से प्रतिष्ठा गिरने के बजाए बढ़ती है।"

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158

राजा का मालिक कौन?

एक बार राजा की मुलाकात दूसरे देश के दरवेश से हुई. जैसी की परंपरा थी, दूसरे देश के अतिथि को राजा सौहार्द स्वरूप कुछ भेंट करता था. राजा ने दरवेश से पूछा - “मांगो, तुम क्या चाहते हो”

दरवेश ने जवाब दिया - “यह उचित नहीं होगा कि मैं अपने गुलाम से कुछ मांगूं!”

राजा को क्रोध आ गया कि यह अदना सा दरवेश उसे अपना गुलाम कहे. उसने दरवेश से कहा – “तुम राजा से इस तरह कैसे बोल सकते हो? स्पष्ट करो नहीं तो तुम्हारा सिर कलम करवा दिया जाएगा.”

“मेरे पास एक गुलाम है जो कि आपका स्वामी है. इस लिहाज से आप भी तो मेरे गुलाम हुए!” दरवेश ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

“कौन है मेरा स्वामी?” राजा ने पूछा.

“सिंहासन खोने का भय” – दरवेश ने जवाब दिया.

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159

चूहे का दिल

अति-प्रसिद्ध, अति-प्राचीन भारतीय लोककथा है यह. चूहा सदैव बिल्लियों से आतंकित रहता था. वह एक साधु के पास पहुँचा और उसे अपनी व्यथा बताई. साधु ने चूहे को बिल्ली बना दिया. बिल्ली कुत्तों से आतंकित रहने लगी. बिल्ली बनी चूहा साधु के पास पहुँचा और अपनी व्यथा बताई. साधु ने उसे कुत्ता बना दिया. कुत्ता शेरों से डरने लगा. जाहिर है, साधु ने उसे शेर बना दिया. परंतु शेर शिकारियों से डरने लगा और साधु की शरण में फिर से जा पहुँचा.

यह देख साधु ने उसे फिर से चूहा बना दिया और कहा – “कोई कुछ भी कर ले, परंतु तुम्हारी समस्या दूर नहीं होगी क्योंकि तुम्हारा दिल तो चूहे का है!”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

411

पुत्रों का उपहार

एक माँ के तीन बच्चों ने अपने भविष्य को संवारने के लिए घर छोड़ दिया था एवं अपनी - अपनी राह पर चले गए थे। तीनों सफल रहे। जब वे एक साथ लौटे तो अपनी वृद्ध माँ को उपहार देने योग्य बन चुके थे।

पहले पुत्र ने कहा - "मैंने माँ के लिए एक बड़ा सा बंगला बनवाया है।"

दूसरे ने कहा - "मैंने माँ के लिए एक शानदार मर्सडीज़ कार और ड्राइवर भेजा है।

तीसरे ने मुस्कराते हुए कहा - "मैंने तुम दोनों को पीछे छोड़ दिया है। तुम्हें याद है, माँ किस तरह बाईबिल पढ़ना पसंद किया करती थी? क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि अब वे ठीक से देख भी नहीं पाती हैं? मैंने उन्हें एक अद्वितीय तोता उपहार में भेजा है जो पूरी बाईबिल का उच्चारण कर सकता है। उसे 12 वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद प्रशिक्षित किया गया है। वह अपनी तरह का अनूठा तोता है। बाईबिल के अध्याय और छंद का नाम लेते ही वह तोता उसका सस्वर उच्चारण करने लगता है।"

कुछ ही समय बाद माँ ने तीनों पुत्रों को धन्यवाद पत्र लिखा। अपने पुत्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा - "मिल्टन!, तुमने जो घर बनवाया है वह बहुत बड़ा है। मैं केवल एक कमरे में ही रहती हूं। लेकिन मुझे पूरा घर साफ करना पड़ता है।"

"गेराल्ड! मैं इतनी बूढ़ी हो चुकी हूं कि घूमने-फिरने में असमर्थ हूं। मेरी आँखों की रोशनी भी अब पहले जैसी नहीं रही। मैं ज्यादातर समय घर पर ही रहती हूं जिस कारण मैं तुम्हारी कार का इस्तेमाल नहीं कर पाती और उस ड्राइवर का व्यवहार भी रूखा है।"

"प्रिय डोनाल्ड! केवल तुम ही यह बात जान पाये कि तुम्हारी माँ को क्या पसंद है। तुम्हारे द्वारा भेजा गया चिकन बेहद लज़ीज़ था।"

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412

कभी बेवकूफों को सलाह मत दो

एक समय की बात है, नर्मदा नदी के तट पर एक बड़ा सा बरगद का पेड़ था जिसकी मोटी शाखाऐं दूर-दूर तक फैली हुयी थीं। उस पेड़ पर चिड़ियों का एक परिवार रहता था। बरगद का पेड़ भारी बारिश के दिनों में भी चिड़ियों की रक्षा करता था।

मानसून के समय एक दिन आकाश में काले बादल छाए हुए थे। जल्द ही भयंकर बारिश शुरू हो गयी। भयंकर तूफानी बारिश से बचने के लिए बंदरों का एक समूह उस पेड़ के नीचे शरण लिए हुए था। वे ठंड के मारे कांप रहे थे। चिड़ियों ने बंदरों की दुर्दशा देखी।

उनमें से एक चिड़िया ने बंदरों से कहा - "अरे बंदरों! हर बारिश के मौसम में तुम लोग इसी तरह क्यों परेशान होते रहते हो? हमें देखो, हम लोग अपनी सुरक्षा के लिए इस चोंच की सहायता से घास का तिनका-तिनका जोड़ कर घोंसला बनाते हैं। परंतु ईश्वर ने तुम्हें दो हाथ और दो पैर दिए हैं जिनका उपयोग तुम लोग खेलने-कूदने में ही करते हो। तुम लोग अपनी सुरक्षा के लिए घर क्यों नहीं बनाते?"

इन शब्दों को सुनकर बंदरों को गुस्सा आ गया। उन्होंने सोचा कि चिड़ियों की हमसे इस तरह से बोलने की हिम्मत कैसे हुयी। बंदरों के सरदार ने कहा - "सुरक्षित तरीके से अपने घोसले में बैठकर हमे उपदेश दे रही हैं। रुकने दो बारिश को, तब हम उन्हें मजा चखायेंगे।"

जैसे ही बारिश रुकी, बंदर पेड़ पर चढ़ गये और उन्होंने चिड़ियों को घोंसलों को तबाह करना शुरू कर दिया। उन्होंने घोंसलों और उसमें रखे अंडों को उठाकर जमीन पर पटक दिया। बेचारी चिड़ियाँ अपनी जान बचाकर इधर-उधर भागने लगीं।

किसी ने सही ही कहा है, सच्ची सलाह केवल गंभीर लोगों को ही देनी चाहिए और वह भी केवल मांगे जाने पर। बेवकूफ व्यक्ति को सलाह देने का अर्थ है

अपने विरुद्ध उसके गुस्से को भड़काना।

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156

स्वयं पर नियंत्रण

चीन में एक बौद्ध भिक्षु ध्यान योग में तल्लीन रहता था. उसकी देखभाल एक बूढ़ी स्त्री करती थी. कई वर्षों की सेवा-सुश्रूषा के बाद एक दिन बूढ़ी महिला ने उस बौद्ध भिक्षु की परीक्षा लेनी चाही.

उसने एक युवती को बुला कर कहा कि वो ध्यानस्थ बौद्ध भिक्षु के कमरे में जाए और उसे आलिंगन में ले ले और उससे प्यार जताए.

युवती ने ऐसा ही किया. मगर बौद्ध भिक्षु यह अप्रत्याशित हरकत देख कर ताव में आ गया और आनन फानन में उस युवती को झाड़ू से मारते हुए बाहर कर दिया.

यह देख उस बूढ़ी स्त्री ने उस बौद्ध भिक्षु से दूरी बना ली क्योंकि उसके अनुसार इतने दिनों की तपस्या और ध्यान योग के बाद भिक्षु को युवती की आवश्यकताओं की समझ होनी चाहिए थी और इस हेतु उसे शांति पूर्वक समझाना था. साथ ही उसे स्वयं पर भी नियंत्रण बनाए रखना था.

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157

व्याकरण की गलती

खोजा नसरूद्दीन एक बार बैलगाड़ी की सवारी कर कहीं जा रहा था. यात्रा लंबी थी और साथ में एक सहयात्री भी था. अतः समय पास करने के लिए खोजा ने सहयात्री से बातें शुरू कर दी. सहयात्री थोड़ा अनपढ़ किस्म का था अतः वह बातचीत में वर्तनी, व्याकरण और लिंग भेद की गलतियाँ कर रहा था. तो खोजा ने उसे डांट दिया कि या तो वह शुद्धता से बोले या फिर बोले ही नहीं.

जाहिर है, अब दोनों के बीच वार्तालाप बंद हो गया. थोड़ी ही देर में खोजा झपकियाँ लेने लगा. इस बीच खोजा के थैले का मुंह खुल गया और बैलगाड़ी के हिचकोलों में उसके थैले में रखे सामान एक एक कर गिरने लगे.

कुछ देर बाद जब खोजा की नींद खुली तो उसने देखा कि उसका थैला तो खाली है. खोजा ने सहयात्री से पूछा कि उसका सामान कहाँ है.

सहयात्री ने इशारे से खोजा को बताया कि उसका सामान तो रास्ते में ही गिर गया था, परंतु चूंकि खोजा ने उसे सिर्फ और सिर्फ शुद्ध बोलने को कहा था और चूंकि उसे नहीं पता था कि क्या वो शुद्ध बोल पा रहा है, लिहाजा उसने खोजा से यह बात बोली ही नहीं!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

409

मुझे अपना अहंकार दे दो

एक संन्यासी एक राजा के पास पहुचे। राजा ने उनका आदर सत्कार किया। कुछ दिन उनके राज्य में रुकने के पश्चात संन्यासी ने जाते समय राजा से अपने लिए उपहार मांगा।

राजा ने एक पल सोचा और कहा - "जो कुछ भी खजाने में है, आप ले सकते हैं।"

संन्यासी ने उत्तर दिया - "लेकिन खजाना तुम्हारी संपत्ति नहीं है, वह तो राज्य का है और तुम सिर्फ ट्रस्टी हो।"

"तो यह महल ले लो।"

"यह भी प्रजा का है।" - संन्यासी ने हंसते हुए कहा।

"तो मेरा यह शरीर ले लो। आपकी जो भी मर्जी हो, आप पूरी कर सकते हैं।" - राजा बोला।

"लेकिन यह तो तुम्हारी संतान का है। मैं इसे कैसे ले सकता हूं?" -संन्यासी ने उत्तर दिया।

"तो महाराज आप ही बतायें कि ऐसा क्या है जो मेरा हो और आपके लायक हो?" - राजा ने पूछा।

संन्यासी ने उत्तर दिया - "हे राजा, यदि आप सच में मुझे कुछ उपहार देना चाहते हैं, तो अपना अहंकार, अपना अहम दे दो।"

अहंकार पराजय का द्वार है। अहंकार यश का नाश करता है।

यह खोखलेपन का परिचायक है।

410

दो गलत मिलकर सही नहीं होते

हमने ऐसा सुना है कि अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार की हत्या करके मगध की राजगद्दी हथिया ली थी। जब कुछ समय गुजर गया तो अजातशत्रु को बहुत पश्चाताप हुआ। उसने अपने पापों का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। इसने अपने राजगुरू को बुलाकर पूछा कि वह किस तरह अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता है?

राजगुरू ने उसे पशुबलि यज्ञ करने का परामर्श दिया। सारे राज्य में पशुबलि यज्ञ की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर के साथ की गयीं।

भगवान बुद्ध उसी दौरान उसके राज्य में पधारे। उनके आगमन का समाचार सुनकर अजातशत्रु उनसे मिलने आया।

भगवान बुद्ध ने उससे पास की एक झाड़ी से फूल तोड़कर लाने को कहा। अजातशत्रु ने ऐसा ही किया। उन्होंने अजातशत्रु से फिर कहा - "अब दूसरा फूल तोड़कर लाओ ताकि पहला फूल खिल सके।"

अजातशत्रु ने निवेदन किया - "लेकिन महात्मा यह असंभव है। एक टूटा हुआ फूल दूसरे फूल को तोड़ने से कैसे खिल सकता है?"

बुद्ध ने उत्तर दिया - "उसी तरह जैसे तुम एक हत्या के पश्चाताप के लिए दूसरी हत्या करने जा रहे हो। एक गलत कार्य को तुम दूसरे गलत कार्य से कभी सही नहीं कर सकते। इसके बजाए तुम अपना सारा जीवन मनुष्यों, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की सेवा में समर्पित कर दो।"

यह सुनकर अजातशत्रु उनके चरणों में गिर पड़ा और आजीवन उनका समर्पित अनुयायी बना रहा।

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153

कुछ नहीं

खोजा अपने मित्र अली की फलों की दुकान पर केले खरीदने गया. अली को शरारत सूझी. खोजा ने एक दर्जन केले के भाव पूछे.

अली ने जवाब में कहा – दाम कुछ नहीं

खोजा ने कहा – अच्छा! तब तो एक दर्जन दे दो.

केले लेकर खोजा जाने लगा.

पीछे से अली ने पुकारा – अरे, दाम तो देते जाओ.

खोजा ने आश्चर्य से पूछा – अभी तो तुमने दाम कुछ नहीं कहा था, फिर काहे का दाम?

अली ने शरारत से कहा – हाँ, तो मैं भी तो वही मांग रहा हूं. दाम जो बताया ‘कुछ नहीं’ वह तो देते जाओ.

अच्छा – खोजा ने आगे कहा – तो ये बात है.

फिर खोजा ने एक खाली थैला अली की ओर बढ़ाया और पूछा – इस थैले में क्या है?

बेध्यानी में अली ने कहा – कुछ नहीं.

तो फिर अपना दाम ले लो – खोजा ने वार पलटा.

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154

दिल और जुबान

वह दो वरदान क्या हैं जो मनुष्यत्व को प्राप्त हैं? वे हैं – दिल और जुबान

और वह दो अभिशाप क्या हैं जो मनुष्यत्व को प्राप्त हैं? वे हैं दिल और जुबान

क्रूर, कठोर हृदय मनुष्य को अपराधी बना देता है, वहीं कोमलहृदयी मनुष्य महान होता है. वहीं, चटोरी और कड़वी जुबान जहाँ मनुष्य के लिए घातक है, संतोषी और मीठी जुबान सर्वत्र सुखदायी व प्रशंसनीय होती है.

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155

अधिकार नहीं, अनुग्रह

एक दम्पत्ति गुरु के पास पहुँचा और प्रार्थना की कि उनका दाम्पत्य जीवन खटाई में पड़ गया है, उसे बचाने का कोई गुर दें.

गुरु ने धीरज से उनकी समस्याएं सुनी और उन्हें यह गुरुमंत्र दिया -

अधिकार जताना छोड़ो. अनुग्रह करना सीखो.

उस दिन के बाद उस दम्पत्ति का दाम्पत्य जीवन खुशहाल हो गया.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

407

कोई भी बात गलत नहीं, बस अधूरी

एक सूफी संत अपने सहयोगी के साथ एक शहर में शिक्षा प्रदान करने पहुंचे। जल्द ही उनका एक अनुयायी उनके पास आया और बोला - "हे महात्मा, इस शहर में सिवाए बेवकूफों के और कोई नहीं रहता। यहाँ के निवासी इतने जिद्दी और बेवकूफ हैं कि आप एक भी व्यक्ति के विचार नहीं बदल सकते।"

संत ने उत्तर दिया - "आप सही कह रहे हैं।"

इसके ठीक बाद एक और व्यक्ति वहां आया और प्रसन्नतापूर्वक बोला - "हे महात्मा, आप एक भाग्यशाली शहर में हैं। यहां के लोग सच्ची शिक्षा चाहते हैं और वे आपके वचनों पर न्यौछावर हो जायेंगे।"

संत ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया - "आप सही कह रहे हैं।"

संत की बात सुनकर उनका सहयोगी बोला - "हे महात्मा, आपने पहले व्यक्ति से कहा कि वह सही कह रहा है। और दूसरा व्यक्ति जो उसके ठीक विपरीत बात बोल रहा था, उसे भी आपने कहा कि वह सही बोल रहा है। आखिर यह कैसे संभव है कि काला रंग सफेद हो जाये।"

संत ने उत्तर दिया - "हर व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार इस संसार को देखता है। मैं उन दोनों की बात का क्यों खंडन करूं? एक व्यक्ति अच्छी बात देख रहा है, दूसरा बुरी। क्या तुम यह कहोगे कि उनमें से एक गलत समझ रहा है। क्या हर जगह अच्छे और बुरे लोग नहीं होते? इन दोनों में से किसी ने भी गलत बात नहीं कही, बस अधूरी बात कही।"

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408

परीक्षण का जोखिम उठाने का साहस

एक राजा के दरबार में एक महत्त्वपूर्ण पद रिक्त था। इस पद के लिए वह योग्य उम्मीदवार की तलाश में था। उसके दरबार में बहुत से बुद्धिमान और शक्तिशाली उम्मीदवार मौजूद थे।

राजा ने उनसे कहा - "मेरे बुद्धिमान साथियों! मेरे समक्ष एक समस्या है और मैं यह देखना चाहता हूं कि तुम लोगों में से कौन इसे सुलझा पाता है।"

इसके उपरांत वह सभी लोगों को लेकर एक विशाल दरवाज़े के पास पहुंचा। इतना बड़ा दरवाज़ा उनमें से किसी ने नहीं देखा था। राजा बोला - "यह मेरे राज्य का सबसे बड़ा और भारी दरवाज़ा है। तुममें से कौन इसे खोल सकता है?"

कुछ दरबारियों ने इंकार की मुद्रा में तुरंत अपने सिर हिला दिए। कुछ अन्य बुद्धिमान दरबारियों ने नजदीकी से दरवाज़े को देखा ओर अपनी असमर्थता जाहिर की।

बुद्धिमान दरबारियों को इंकार करते देख बाकी सभी दरबारी भी इस बात पर सहमत हो गए कि यह बहुत बड़ी समस्या है और इसका सुलझना असंभव है।

केवल एक दरबारी उस दरवाज़े के पास तक गया। उसने अपनी आँखों और अंगुलियों से दरवाज़े का परीक्षण किया तथा उसे हिलाने की कोशिश की। अंततः काफी ताकत लगाकर उसने दरवाज़े को खींचा और दरवाज़ा खुल गया। हालाकि दरवाज़ा अधखुला ही रह गया था परंतु इसे बंद करने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि उसके साहस की परीक्षा हो चुकी थी।

राजा ने कहा - "तुम ही दरबार में उस महत्त्वपूर्ण पद पर बैठने के योग्य हो क्योंकि तुमने सिर्फ देखकर और सुनकर ही विश्वास नहीं कर लिया। तुमने कार्य को संपन्न करने के लिए अपनी ताकत का प्रयोग किया और परीक्षण का जोखिम उठाया।"

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147

फ़ीयर इज द की

खाने का शौकीन एक राजा खा खाकर इतना मोटा हो गया कि उसका चलना फिरना दूभर हो गया . उसने कई डॉक्टरों से अपने मोटापे का इलाज करवाया मगर इलाज का कुछ असर नहीं हुआ क्योंकि राजा खाना छोड़ नहीं सकता था .

जो डॉक्टर उसे कम खाने या नहीं खाने की सलाह देते , उन्हें वह प्राण दण्ड दे देता .

राजा ने अंततः अपने मोटापे के इलाज के लिए बड़े इनाम की घोषणा की . परंतु प्राणदण्ड के भय के कारण कोई डॉक्टर आया ही नहीं .

एक दिन एक भविष्यवक्ता राज दरबार में आया और उसने भविष्यवाणी की कि अब राजा का कोई इलाज नहीं हो सकता . क्योंकि राजा के दिन गिने चुने हैं . राजा अब सिर्फ एक महीने का मेहमान है . आज से ठीक एक महीने के बाद राजा की मृत्यु हो जाएगी . और इस बीच यदि राजा ने आईना देख लिया तो उसकी मृत्यु की तिथि और पहले खिसक आएगी .

राजा घबरा गया . उसने ज्योतिषी को कैद कर लिया और कहा कि यदि उसकी भविष्यवाणी सच नहीं हुई तो एक महीने बाद राजा नहीं , वह ज्योतिषी मरेगा .

राजा रोज दिन गिनने लगा . दरअसल वह घंटा मिनट और सेकंड गिनने लगा . एक महीना उसे एकदम पास और प्रत्यक्ष दिख रहा था . सामने मौत दिख रही थी . उसकी भूख - प्यास मिट गई थी .

रोते गाते एक महीना बीत गया . राजा को कुछ नहीं हुआ . राजा ने ज्योतिषी को बुलवा भेजा और व्यंग्य से कहा - महीना बीत गया और मैं जिंदा हूँ . तुम्हारी भविष्यवाणी गलत निकली . तुम्हें फांसी पर लटकाया जाने का हुक्म दिया जाता है .

उस भविष्यवक्ता ने कहा - पहली बात तो यह कि मैं भविष्यवक्ता नहीं हूँ . दूसरी बात यह कि मैं पेशे से डाक्टर हूँ . तीसरी बात यह कि आपने पिछले तीस दिनों से आईना नहीं देखा होगा , तो जरा देखें .

राजा ने तुरंत आईना मंगा कर देखा . राजा का मुंह खुला रह गया . उसका मोटापा जाता रहा था . पिछले तीस दिनों से मृत्यु भय से उसने कुछ खाया पीया जो नहीं था !

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१४८

सही कीमत

एक गरीब आदमी को राह चलते एक चमकीला पत्थर मिला . वास्तव में वह चमकीला पत्थर बिना तराशा हीरा था . इसकी कीमत वह गरीब आदमी जानता नहीं था . संयोग से उसी वक्त एक जौहरी उधर से गुजर रहा था . उसने वह चमकीला पत्थर गरीब के हाथ में देखा तो उसने वह हीरा उससे सौ रुपए में खरीदना चाहा . जौहरी की पारखी नजरों ने उसकी सही कीमत पहचान ली थी .

उस गरीब को थोड़ा संदेह हुआ कि जौहरी इस पत्थर की इतनी कीमत क्यों दे रहा है . तो उसने उस पत्थर को सौ रुपए में बेचने से इंकार कर दिया . उसने जौहरी से कहा कि वो इसके पांच सौ लेगा .

जौहरी ने गरीब से कहा कि मूर्ख , इस सड़े पत्थर के पांच सौ कौन देगा . चल चार सौ में दे दे .

गरीब ने सोचा कि चलो ये भी फायदे का सौदा है , तो उसने हामी भर दी .

परंतु जब जौहरी ने अपनी जेब टटोली तो उसमें सिर्फ तीन सौ निकले . जौहरी ने गरीब से कहा कि वो इंतजार करे , जल्दी ही मैं बाकी रुपये लेकर लौटता हूं .

और जब जौहरी पूरे पैसे लेकर वापस आया तो उसने देखा कि गरीब के हाथ में चमकीले पत्थर की जगह रुपए थे . जौहरी ने गरीब से पूछा कि माजरा क्या है .

गरीब ने जौहरी को बताया कि उस पत्थर की सही कीमत तुम लगा ही नहीं रहे थे . उसकी असली कीमत तो उस दूसरे जौहरी ने लगाई , और मुझे पूरे हजार रुपए दिए !

इस पर वह जौहरी झल्लाया और बोला - मूर्ख ! उस पत्थर की असली कीमत लाख रूपए थी . तुम्हें तो वो हजार रुपए में मूर्ख बना गया !

मूर्ख तो तुम बन गए - गरीब आगे बोला - तुम तो मुझे चार सौ रुपल्ली में मूर्ख बनाने चले थे कि नहीं ? और मैंने तुम्हें मूर्ख बना दिया .

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१४९

लकीर छोटी या बड़ी

कक्षा में गुरूजी ने एक लकीर खींची और प्रश्न पूछा कि इस लकीर को छोटा कैसे किया जा सकता है .

अधिकांश बच्चों ने कहा कि किसी एक तरफ से लकीर को मिटाकर .

परंतु एक बच्चा खड़ा हुआ , उसने गुरुजी के हाथ से कलम ली और उस लकीर के ऊपर एक बड़ी लकीर खींच दी . फिर गुरूजी से मुखातिब होकर बोला - लीजिए गुरुजी , यह लकीर मैंने छोटी कर दी . इस बड़ी लकीर के सामने यह छोटी है . और यदि आप कहें तो मैं बड़ी भी बना सकता हूँ !

अपनी लकीर आप स्वयं के कृत्य से बड़ा बनाएं , न कि दूसरों की लकीरें छोटी कर !

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150

बादामी दिमाग

पहले मेरी मां मुझे रोज सुबह नाश्ते में पांच बादाम देती थी और कहती थी कि इससे दिमाग सुधरेगा . बाद में मेरी बीवी भी नाश्ते में पांच बादाम देती रही .

परंतु मेरे पिता अकसर मुझे बादाम खाते देखते और मुझसे कहते - बादाम खाने से दिमाग तेज नहीं होता .

मैंने उनके इस वाक्य को सैकड़ों मर्तबा सुना था . मगर फिर भी मैं इंतजार करता . उनके आगे के वाक्य का . आगे वे कहते -

दिमाग सुधरता है जीवन के थपेड़े खाने से !

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151

दुनिया एक सराय है

एक सूफी संत राजा के दरबार में आए और राजा से बोले - मुझे इस सराय में सोने के लिए थोड़ी सी जगह चाहिए .

राजा ने अप्रसन्नता से कहा - यह सराय नहीं है , यह राजमहल है !

संत ने राजा से पूछा - तुमसे पहले यहाँ कौन रहता था ?

राजा ने कहा - मेरे पिता .

संत ने फिर पूछा - और उससे पहले ?

राजा ने फिर तनिक अप्रसन्नता से बताया - मेरे पितामह .

तो , जब लोग यहाँ आते जाते रहते हैं , फिर भी तुम कहते हो यह सराय नहीं है ! संत ने राजा से प्रश्न किया .

हर कोई सराय में रहता है ! कोई उसे प्रासाद कहता है , कोई होम , स्वीट होम .

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१५२

सोचने के लिए एक दिन दे दो

खोजा ने अपने मित्र अब्दुल के साथ शर्त लगाया कि मैच में पाकिस्तान नहीं , इंडिया जीतेगा . और जब खोजा अपने मित्र से शर्त हार गया तो उसने अपने मित्र को कहा कि वो शर्त जीतने के उपलक्ष्य में खोजा से कुछ मांग ले .

अब्दुल ने खोजा से कहा कि अभी तो कुछ सूझ नहीं रहा है , अतः सोचने के लिए खोजा उसे एक दिन का समय दे .

खोजा ने कहा - दिया , खुशी खुशी दिया .

दूसरे दिन अब्दुल खोजा के पास पहुँचा और उसका सबसे ताकतवर घोड़ा शर्त जीतने के नाम पर मांगने लगा .

परंतु खोजा ने स्पष्ट किया - मैंने तुम्हें शर्त जीतने पर मुझसे कुछ मांगने को कहा था . तो तुमने एक दिन सोचने के लिए मांगा था . तो वो मैंने तुम्हें दे दिया था . दिया था कि नहीं ?

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सधन्यवाद,
रवि
http://raviratlami.blogspot.com/
http://rachanakar.blogspot.com/

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

इंडिया टुडे हिंदी के हालिया अंक में मनीषा पांडेय ने हिंदी ब्लॉगिंग पर एक धारदार आलेख लिखा है. आलेख साभार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है. आप भी बांचें:

बच्चा पैदा हुआ तो आस-पास के  लोगों ने माना कि वह स्वस्थ है. एक समय ऐसा आया कि हिंदी ब्लॉग की संख्या 18,000 को पार कर गई और हर दिन 150 नए हिंदी ब्लॉग जुड़ने लगे. फिर इसे किसी की नजर लग गई. सभी मानते हैं कि हिंदी ब्लॉग की दुनिया में ठहराव आ गया है. यह दुनिया लगभग आठ साल पुरानी है. आठ साल लंबा वक्त होता है. इतने समय में फेसबुक ने दुनिया भर में 80 करोड़ यूजर जुटा लिए.

हिंदी के प्रमुख ब्लॉग एग्रीगेटर (एक ऐसी साइट जहां ढेर सारे ब्लॉग इकट्ठे देखे जा सकते हैं) नारद, चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी बंद हो गए. कई सक्रिय ब्लॉगर दृश्य से गायब हो गए, कई फेसबुक पाकर ब्लॉग को भुला बैठे, कुछ ट्विटर पर जम गए. हिंदी ब्लॉग का यह सफर कई सवाल खड़े करता है. कुछ साल पहले इसे लेकर देखे जा रहे सपने क्या हकीकत से दूर थे?

क्या हिंदी में ब्लॉग की स्थिति इसलिए बुरी है? क्योंकि इंटरनेट पर ही हिंदी की स्थिति बुरी है. क्या हिंदी की राजनीति ब्लॉग को ले डूबी? क्या 'इंस्टैंट' के दौर में फेसबुक और ट्विटर ने ब्लॉग की जगह खा ली? सवाल कई हैं और जवाब जटिल.

टीवी पत्रकार और ब्लॉग कस्बा चलाने वाले रवीश कुमार कहते हैं, ''ब्लॉग का खत्म होना दरअसल उसके बनने में ही निहित था. ब्लॉग अभिव्यक्ति के एक वैकल्पिक माध्यम के रूप में उभरा और एसएमएस, फेसबुक, ट्विटर के समय में खुद ही निष्क्रिय भी हो गया. यह कुछ ऐसा ही है कि जैसे डीवीडी के आने से कैसेट चलन से बाहर हो गए.''

लेकिन टीवी लेखक और ब्लॉग निर्मल आनंद के लेखक अभय तिवारी की राय इससे कुछ अलग है. इस बात से सहमत होने के बावजूद कि फेसबुक काफी हद तक हिंदी ब्लॉगिंग के निष्क्रिय होते जाने के लिए जिम्मेदार है, वे कहते हैं, ''फेसबुक सोशल नेटवर्किंग के लिए की जाने वाली अड्डेबाजी है, जबकि ब्लॉग एक किस्म की सार्वजनिक डायरी है. कुछ लोग डायरी में कौड़ी-पाई का हिसाब रखते हैं, कुछ मन की गांठें टटोलते हैं तो कुछ अपनी पसंद की चिंता पर विचार प्रवाह खोलते हैं. कौड़ी-पाई और मन की गांठें भले अब फेसबुक पर खिलने और खुलने लगी हों पर तात्कालिकता से परे गंभीर चिंतन और विमर्श के लिए ब्लॉग की उपयोगिता  हमेशा बनी रहेगी.''

                          ब्लॉगिंग का भविष्य - कौन क्या कह रहा है:

blogs.qxp

बेशक हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां हर दिन एक नई चीज बाजार में आ रही है और पुरानी को अप्रासंगिक किए दे रही है. दरअसल, फेसबुक की गति और ट्विटर की चंद शब्दों में अपनी बात को समेट देने की सीमा ने भारी-भरकम ब्लॉग को चलन से बाहर कर दिया. जैसा कि रवीश चुटकी लेते हैं, ''मैं यह देखने के लिए उत्साहित हूं कि दुनिया के किस कोने में कौन-सा ऐसा नया मंच बन रहा है, जो फेसबुक और ट्विटर को भी खत्म कर देगा.''

आज हिंदी ब्लॉगों की संख्या 30,000 के आसपास है, जिसमें से महज 3,000 ही नियमित लिखे जाते हैं. वहीं देश में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या तकरीबन 10 करोड़ है, जिसमें से 3.4 करोड़ सक्रिय फेसबुक यूजर हैं. इनमें से अगर देश के बड़े शहरों को निकाल दें तो भी राजधानी समेत हिंदी राज्यों के बड़े-मझेले और छोटे शहरों में फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों की संख्या डेढ़ करोड़ से ज्यादा है. इन आंकड़ों के मुकाबले हिंदी ब्लॉगिंग के आंकड़े बहुत कम हैं. हिंदी के सबसे ज्यादा चर्चित और पढ़े जाने वाले ब्लॉगों पर प्रतिदिन 200 से 300 हिट्स होती हैं. हालांकि ऐसे ब्लॉग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं, जबकि अन्य ब्लॉगों पर हिट्स का आंकड़ा प्रतिदिन 25 से लेकर 100 तक है.

ब्लॉग के मरणासन्न होते जाने पर स्यापा करने वालों और फेसबुक को तनी भौंहों से देखने वालों का तर्क है कि फेसबुक तत्काल छप जाने और प्रतिक्रिया पा लेने को लालायित लोगों का शगल है. यहां लोगों के पास हर मुद्दे पर देने के लिए कुछ रेडीमेड विचार हैं, जबकि ब्लॉग ज्यादा गंभीर और विचारशील थे. ''लेकिन यही विचारशीलता  उसकी सबसे बड़ी दिक्कत भी थी.

ब्लॉग पर कोई गंभीर, दार्शनिक विचार हासिल करने नहीं आता. यहां लोग लाइट रीडिंग और हल्की-फुल्की मनोरंजक चीजें चाहते हैं.'' यह कहना है ब्लॉग एग्रीगेटर चिट्ठाजगत के संस्थापक और पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर विपुल जैन का.

वे कहते हैं, ''अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि सबसे ज्यादा पॉपुलर वही ब्लॉग थे, जो रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी बातें और रोचक किस्से मस्त किस्सागोर्ई वाले अंदाज में बयां करते थे.'' ब्लॉग को पॉपुलर करने में जरूरी भूमिका निभाने वाले मोहल्ला ब्लॉग के मॉडरेटर अविनाश को भी स्पीडी फेसबुक से कोई गुरेज नहीं है. उनके मुताबिक इस तेज रफ्तार समय में लंबी पोस्ट पढ़ने की फुरसत किसी के पास नहीं.

क्या आम पाठक ब्लॉग के साथ इसलिए नहीं जुड़ पाए क्योंकि उसकी भाषा और विषयवस्तु 'मास कम्युनिकेशन' के साधारण से तर्क को पूरा नहीं करती थी. जैसा कि शब्दों का सफर ब्लॉग के लेखक और पेशे से अखबार सरीखे मास कम्युनिकेशन के माध्यम से जुड़े अजीत वडनेरकर कहते हैं, ''ब्लॉग बहुत-से लोगों के लिए अपनी छपास की भूख शांत करने का माध्यम था. उसमें गुणवत्ता नहीं थी. बेशक अच्छे ब्लॉगर भी थे, लेकिन ब्लॉग उनके लिए छपने के माध्यम से ज्यादा अपने लिखे का डॉक्युमेंटेशन करने का एक माध्यम था.

ब्लॉग की ताकत ही यह है कि यहां हर कोई लेखक या संभावित लेखक है. यह ताकत है, लेकिन हिंदी पब्लिक स्पेस में यही बात समस्या बन गई. यहां ब्लॉगर ही ब्लॉग के पाठक भी थे. यह माध्यम अपने लिए पाठक नहीं बना पाया.''

ब्लॉग पर महिलाओं के साझा मंच चोखेर बाली की मॉडरेटर सुजाता कहती हैं, ''यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आपके ब्लॉग का पाठक कौन है? चोखेर बाली के निष्क्रिय होने की एक वजह यह थी कि उससे नए लोग नहीं जुड़ रहे थे. ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणियां करने वाले ज्यादातर ब्लॉगर ही होते थे. हम आपस में ही एक-दूसरे की पीठ थपथपाने और आलोचना करने में मुब्तिला थे. अगर नए लोग नहीं जुड़ते, नए विचार नहीं आते तो एक ठहराव-सा आ ही जाता है.''

सुस्त पड़ रहे हिंदी ब्लॉग को जिस एक एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी के बंद हो जाने से आखिरी धक्का लगा, उसके संचालक मैथिली गुप्त भी इस बात का समर्थन करते हैं, ''ब्लॉगवाणी का ट्रैफिक  ज्यादातर ब्लॉगर से ही आ रहा था. सिर्फ ब्लॉग पढ़ने के लिए आने वाले पाठकों की संख्या न के बराबर थी.'' यह एक पक्ष है, लेकिन संगीत के चर्चित ब्लॉग रेडियोवाणी के लेखक व रेडियो एनाउंसर यूनुस खान हिंदी दुनिया की उस दुखती रग पर हाथ रखते हैं, जो साहित्य से लेकर ब्लॉग और अब फेसबुक पर भी अपने पैर पसार रही है.

वे कहते हैं, ''ब्लॉगवाणी हिंदी की कुटिल राजनीति के चलते बंद हुआ. लोग उसका रचनात्मक इस्तेमाल करने की बजाए उसे अपनी कुंठाएं शांत करने का माध्यम समझ्ते थे. यही पॉलिटिक्स अब फेसबुक पर भी नजर आती है, लेकिन उसका असर इतना व्यापक नहीं कि जुकेरबर्ग तंग आकर फेसबुक को ही बंद कर दे.'' बेशक यहां आप अपने दोस्त चुन सकते हैं और नापसंदीदों से छुटकारा भी पा सकते हैं.

मौजूदा स्थितियां आखिर किस ओर इशारा कर रही हैं? क्या हिंदी में ब्लॉग अप्रासंगिक होते-होते खत्म हो जाएंगे? विपुल जैन ब्लॉगिंग की कुछ गंभीर तकनीकी खामियों की ओर इशारा करते हैं. समस्या हिंदी ब्लॉगिंग से कहीं ज्‍यादा इंटरनेट में हिंदी को लेकर है. चीन और कोरिया के उलट भारत में इंटरनेट इंग्लिश में आया और वह स्थिति अब भी कमोबेश बनी हुई है.

हिंदी में यूनिकोड देर से आया, इस वजह से अरसे तक फॉन्ट की समस्या बनी रही. विपुल कहते हैं, ''जिस तरह अरब देशों में कोई कंपनी अरबी फॉन्ट के बगैर कंप्यूटर नहीं बेच सकती, उसी तरह भारत में भी देवनागरी और राज्यों की भाषाएं कंप्यूटर की बोर्ड में अनिवार्य कर दी जानी चाहिए.''

आंकड़ों से इतर एक बड़ा तबका अभी भी ब्लॉग के भविष्य को लेकर आशान्वित है. ब्लॉग फुरसतिया के लेखक अनूप शुक्ल ब्लॉग के हाशिए पर जाने की बात को सिरे से खारिज करते हैं, ''ब्लॉग निष्क्रिय नहीं हुआ है? कल मैं अकेला ब्लॉगर था, लेकिन आज मेरे मुहल्ले में ही चार और पूरे शहर में 100 ब्लॉगर हैं. फेसबुक तो आभासी है. 5,000 के बाद फ्रेंड लिस्ट भी खत्म हो जाती है. लेकिन ब्लॉग के जरिए तो दोस्त और मुरीद मिलते हैं.'' ब्लॉग ढार्ई आखर के लेखक और पत्रकार नसीरुद्दीन हैदर भी यह मानते हैं कि जब तक कहने की इच्छा रहेगी, कहने को कुछ बात होगी, तब तक ब्लॉग बने रहेंगे.

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

405

वायदा करना और निभाना

एक नवविवाहित जोड़ा विवाह करने के तुरंत बाद अपने प्रोफेसर के पास आशीर्वाद लेने पहुँचा।

प्रोफेसर ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा - "सुखी भव!"

लड़के ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा - "महोदय, कोई व्यक्ति शादी करके सुखी कैसे हो सकता है?"

प्रोफसर ने उत्तर दिया - "यह एक राज की बात है। ध्यान से सुनो! पहली बात यह है कि तुम अपनी पत्नी से किए गए सभी वायदों को पूरा करो। और दूसरी बात यह कि कभी वायदा मत करो।"

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406

भाग्य और नियति

अपनी नियति के बारे में शिकायत रखने वाली एक महिला को उत्तर देते हुए स्वामी जी बोले - "सिर्फ तुम ही अपनी नियति को बना सकती हो, कोई और नहीं।"

महिला ने शिकायती लहजे में कहा - "लेकिन एक स्त्री के रूप में जन्म लेने के लिए तो मैं जिम्मेदार नहीं हूं?"

स्वामीजी ने उत्तर दिया - "स्त्री के रूप में जन्म लेना तेरी नियति नहीं है। यह तेरा भाग्य है। नियति तो यह है कि तुम अपने स्त्रीत्व को किस तरह ग्रहण करती हो और क्या बनती हो।"

---.

1 45

समस्या की समझ

एक शेर जाल में फांस लिया गया और उसे कैद कर लिया गया. बाद में उसे एक कंसनट्रेशन कैंप में छोड़ दिया गया जहाँ उसकी तरह कई शेर कैद थे.

उस शेर ने देखा कि वहाँ रह रहे शेर आपस में झगड़ा करते. खाने के हिस्से के लिए, अपने क्षेत्र के लिए तथा ऐसे ही अन्य छोटी छोटी बातों के लिए. कुछ ऊंघते रहते तो कुछ यहाँ से वहाँ बेमतलब चक्कर काटते रहते. बाड़े से कोई निकल नहीं पाता था क्योंकि बाड़ा खतरनाक, ऊँचा और पहुँच से दूर था.

परंतु एक शेर सबसे दूर अलग थलग रहता, शांत. ध्यान से बाड़े को व आसपास की चीजों को देखता. नव आगंतुक शेर उसके पास पहुँचा और उस अलग रहने वाले शेर से पूछा – तुम एकदम अलग थलग क्यों रहते हो?

“मैं लंबे समय से इस बाड़े से निकलने में आने वाली समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहा था, और मैं आज उसमें कामयाब हो गया हूं” उस शेर ने नवागंतुक शेर को बताया.

और अगले दिन नवागंतुक शेर ने पाया कि वह शेर बाड़े में नहीं है.

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146

तीर निशाने पर

एक बार एक राजा अपने मंत्री के साथ शिकार पर गया.

वे दिन भर भटकते रहे मगर कोई शिकार हाथ नहीं आया.

जब वे थक हार कर शाम के समय वापस आ रहे थे तो खूबसूरत डूबते सूरज के दृश्य के बीच एक सुंदर हिरन शावक उन्हें दिखाई दिया.

राजा ने देर नहीं की. धनुष पर तीर चढ़ाया, निशाना लगाया और बाण चला दिया.

तीर हिरन के पास से गुजर कर पेड़ के तने में धंस गया. हिरन चौकन्ना हुआ और कुलांचे भरता हुआ आँखों से ओझल हो गया.

मंत्री ने राजा के निशाने की तारीफ कुछ यूँ की “बहुत खूब! वाह! क्या निशाना मारा है. बेहतरीन!”

राजा नाराज हो गया. बोला – “बेवकूफ, तुम मेरी तारीफ कर रहे हो या मेरा मजाक उड़ा रहे हो?”

“नहीं, राजन. मैं आपका मजाक उड़ाने की जुर्रत कैसे कर सकता हूँ भला? आपने सचमुच तीर निशाने पर ही मारा है. आप चाहते थे कि यह सुंदर हिरन शावक चौकन्ना रहे और इस तरह किसी शिकारी के जद में न रहे इसीलिए आपने उसे होशियार करने को तीर चलाया जो उसे छूता हुआ पेड़ पर जा धंसा” मंत्री ने खुलासा किया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

403

संसार का सबसे दुःखी इंसान

राजा का दरबार लगा हुआ था। उस दिन दरबार मे चर्चा का विषय था कि इस संसार में सबसे दुःखी इंसान कौन है?

सभी दरबारियों ने अपनी-अपनी राय रखी। सभी दरबारियों में आपस में मतभेद था। अंततः वे सभी इस नतीजे पर पहुंचे कि यदि कोई गरीब और बीमार हैं तो वह सबसे ज्यादा दुःखी है।

इस नतीजे से राजा संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने अपने सबसे समझदार दरबारी चतुरनाथ की ओर देखा, जिसने सारी बहस चुपचाप सुनी थी। राजा ने चतुरनाथ से पूछा - "तुम्हारी इस बारे में क्या राय है?"

चतुरनाथ ने उत्तर दिया - "हे महाराज! मेरी इस बारे में विनम्र राय यह है कि जो व्यक्ति ईर्ष्यालु और द्वेषी है, वह हमेशा दुःखी रहता है। वह दूसरा को अच्छा कार्य करते हुए देखकर दुःखी होता है। उसका चित्त कभी शांत नहीं रहता। वह हमेशा शंकालु रहता है। वह दूसरों का भला होते देख नफरत से भर जाता है। ऐसा इंसान ही संसार में सबसे ज्यादा दुःखी होता है।"

404

गुरू की जरूरत

गुरूकुल में आये एक आगंतुक ने वहां रहने वाले एक अंतःवासी से पूछा - "तुम्हें गुरू की जरूरत क्यों है?"

अंतःवासी ने उत्तर दिया - "जिस तरह पानी को गर्म करने के लिए पानी और आग के मध्य एक बर्तन का होना जरूरी है। उसी तरह हमारे जीवन में गुरू की जरूरत है।"

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143

अवज्ञा परीक्षण

गुरु बारी बारी से अपने शिष्यों को दीक्षा दे रहे थे. प्रत्येक शिष्य के कान में वे गुरु मंत्र फूंकते और उन्हें बताते कि इस मंत्र का ताउम्र पाठ करते रहें और इसे किसी को न बताएं.

एक शिष्य को जब गुरु ने गुरुमंत्र फूंका और यही निर्देश दिए तो शिष्य ने गुरु से प्रतिप्रश्न किया – “गुरूदेव, आपने कहा है कि इस मंत्र को किसी को न बताऊं. तो मेरे ऐसा करने से क्या हो जाएगा?”

गुरु ने कहा – “होगा तो कुछ नहीं, गुरु मंत्र अप्रभावशाली हो जाएगा और तुम्हारी दीक्षा खत्म हो जाएगी.”

वह शिष्य तत्क्षण उठा और सीधे बीच बाजार में पहुँच गया. वहाँ उसने लोगों की भीड़ एकत्र की और उस गुरु मंत्र को सबको बता दिया.

गुरु के पास जब यह वाकया पहुँचा और जब कुछ शिष्यों ने इस कांड पर कार्यवाही करने की बात कही तो गुरु ने कहा – “कुछ करने की जरूरत नहीं है. उसका यह कृत्य ही अपने आप में यह कहता है कि वह भी अपने स्वयं के विचारों के लिहाज से गुरु है.”

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144

अंधा कानून

चार मित्रों का रूई का साझा कारोबार था. उनके पास एक भंडार गृह था जिसमें रूई की गांठें रखी रहती थीं. भंडार गृह में रुई की गाठों को चूहे कुतरते थे जिससे उन्हें अच्छा खासा नुकसान सहना पड़ता था. चारों मित्रों ने सोचविचार कर एक बिल्ली पाल ली. बिल्ली की वजह से चूहों की समस्या से निजात मिल गई. जल्द ही बिल्ली चारों मित्रों की चहेती बन गई. चारों ने एक दिन मजाक में यह करार कर लिया कि बिल्ली की चारों टांगे वे आपस में बांट लेते हैं. और ऐसा सोच कर हर एक ने उस बिल्ली की चारों टांगों में अपने अपने पसंद से सोने के घुंघरू बाँध दिए. बिल्ली अपने पैरों के घुंघरू से आवाज निकालते इधर उधर उछलकूद मचाती रहती.

एक दिन बिल्ली के एक पैर में चोट लग गई और वह लंगड़ाने लगी. जिस मित्र के हिस्से की टाँग थी, उसने उस पैर में पट्टी बाँध दी ताकि बिल्ली जल्द ठीक हो सके. बिल्ली के उछल कूद से पट्टी जल्द ही ढीली हो गई और उसका एक सिरा खुल गया और जमीन में लपटने लगा.

संयोग वश एक शाम जब चारों मित्र भंडार में आरती कर रहे थे तो बिल्ली ने ऊपर से से छलांग लगाई. बिल्ली के पैर में बंधी पट्टी का खुला सिरा जलते दीपक की लौ पर पड़ा और उसमें आग लग गई. इस कारण से वहीं पर रखे रूई की गांठ में भी आग लग गई. इससे बिल्ली घबरा गई और उछल कूद मचाने लगी. देखते ही देखते पूरा रूई का गोदाम खाक में बदल गया.

अब मित्रों ने बिल्ली को लेकर आपस में एक दूसरे को भला बुरा कहना शुरू कर दिया. बात यहाँ तक आ गई कि लंगड़ी टाँग का मालिक बाकी के तीन मित्रों को हर्जाना दे क्योंकि उस टाँग की पट्टी के कारण ही आग लगी.

बात बढ़ती गई और न्यायाधीश के सामने निराकरण के लिए पहुँची. न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की बातचीत सुनी और निर्णय दिया – “यह सच है कि बिल्ली के लंगड़े पैर में बंधी पट्टी में आग लगी थी परंतु बिल्ली ने इस आग को फैलाने में अपने बाकी तीन अच्छे पैरों का प्रयोग किया अतः इन अच्छे पैरों के मालिक लंगड़े पैर के मालिक को हर्जाना दें.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

401

आखिर तुम कब छोड़ोगे !.......

एक व्यक्ति जीवन भर कपड़े का सफल व्यवसायी रहा था। अब वह 78 वर्ष का हो गया था। उसके दोनों पुत्र कारोबार को भलीभांति संभाल रहे थे लेकिन वह फिर भी दुकान आता और हर मामले में हस्तक्षेप करता रहता था। उसे अब भी अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की लालसा थी।

तंग आकर उसके पुत्रों ने अपने पारिवारिक पंडित को बुलाया और उनसे निवेदन किया कि वे उनके पिताजी को अपने साथ वर्ष भर की तीर्थयात्रा पर ले जायें ताकि उनका ध्यान धनसंपत्ति से हटकर पूजापाठ में लगे। पंडित जी सहमत हो गए और वे दोनों तीर्थयात्रा पर चले गए।

एक वर्ष तक बद्रीनाथ, केदारनाथ और भारत के समस्त तीर्थस्थलों की यात्रा के बाद भी व्यापारी के मन से धनसंपदा के प्रति लालसा जरा भी कम नहीं हुई। निराश होकर पंडितजी उन्हें अंत में वाराणसी के एक बड़े श्मशान घाट पर ले गए।

अचानक पंडितजी ने यह पाया कि बूढ़े व्यापारी को एकाएक कुछ हुआ। उसके चेहरे पर नई आभा बिखर गई। इसकी आँखें सूरज की तरह दमकने लगीं। उसके शरीर की भाषा एकदम बदल गयी और वह फुर्तीला और ऊर्जावान लगने लगा।

और वह बुजुर्ग व्यापारी बोला - "अरे पंडित जी, तुम मुझे इस स्थान पर पहले क्यों नहीं लाये? तुमने तो मेरी आँखें खोल दीं। सारा जीवन मैं कपड़े का व्यापार करता रहा लेकिन आज मुझे लगा कि मैं गलत था। मुझे तो लकड़ी का कारोबार करना चाहिए था। देखो यहाँ लकड़ी की कितनी मांग है। मैने अब तक कितना मुनाफा कमा लिया होता।"

आखिर तुम कब छोड़ोगे !.......

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402

सब कुछ एक साथ नहीं

एक धर्मोपदेशक मुल्ला जी उपदेश देने के लिए हॉल में पहुंचे। एक दूल्हे को छोड़कर उस हॉल में और कोई मौजूद नहीं था। वह दूल्हा सामने की सीट पर बैठा था।

असमंजस में पड़े मुल्ला जी ने दूल्हे से पूछा - "सिर्फ तुम ही यहाँ मौजूद हो। मुझे उपदेश देना चाहिए या नहीं?"

दूल्हे ने उनसे कहा - "श्रीमान। मैं बहुत साधारण आदमी हूं और मुझे यह सब ठीक से समझ में नही आता। लेकिन यदि मैं एक अस्तबल में आऊँ और यह देखूं कि एक घोड़े को छोड़कर सभी घोड़े भाग गए हैं, तब भी मैं उस अकेले घोड़े को खाने के लिए चारा तो दूंगा ही।"

मुल्ला जी को यह बात लग गई और उन्होंने उस अकेले व्यक्ति को दो घंटे तक उपदेश दिया। इसके बाद मुल्ला जी ने अतिउत्साहित होकर उससे पूछा - "तो तुम्हें मेरा उपदेश कैसा लगा?"

दूल्हे ने उत्तर दिया - "मैंने आपको पहले ही कहा था कि मैं बहुत साधारण आदमी हूं और मुझे यह सब ठीक से समझ में नही आता। लेकिन यदि मैं एक अस्तबल में आऊँ और यह देखूं कि एक घोड़े को छोड़कर सभी घोड़े भाग गए हैं, तब मैं उस अकेले घोड़े को खाने के लिए चारा तो दूंगा परंतु सारा चारा एकबार में ही नहीं दे दूंगा।"

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141

देश के लिए बलिदान

भगत सिंह को पढ़ने लिखने में भी रूचि थी (भगत सिंह का लिखा मैं नास्तिक क्यों हूँ आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं). वे जितना स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ते, इस संग्राम में सक्रिय रूप से जुड़ने की उनकी इच्छा उतनी ही बलवती होती जाती. उन्होंने रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल होने के लिए शचीन्द्रनाथ सान्याल को पत्र लिखा. रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल होने की एक शर्त यह भी थी – पार्टी के बुलावे पर बिना किसी देरी किए तुंरत ही घर परिवार छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना होगा.

इस बीच भगत सिंह की दादी की इच्छा-स्वरूप उनकी शादी तय कर दी गई. शादी की तारीख करीब आ गई. उसी दौरान, शादी के कुछ दिन पहले रिवोल्यूशनरी पार्टी से बुलावा आ गया. भगत सिंह ने चुपचाप बिना किसी को बताए घर छोड़ दिया और पार्टी कार्यालय लाहौर चले गए.

परंतु घर छोड़ने से पहले उन्होंने एक पत्र लिखा. पत्र में उन्होंने लिखा था “मेरे जीवन का उद्देश्य है भारत की स्वतंत्रता के लिए मर मिटना. मेरे उपनयन संस्कार के समय मुझसे मन में कोई शपथ लेने को कहा गया था. मैंने शपथ ली थी कि मैं देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा. अब समय आ गया है और मैं देश की सेवा के लिए जा रहा हूं.”

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142

गांधी की फटी धोती

गांधी जी जब एक बार ट्रेन से यात्रा कर रहे थे. जब ट्रेन स्टेशन पर आई तो उनकी धोती फट गई. ट्रेन से उतरते ही गांधी जी को सम्मेलन स्थल पर जाना था. साथ चल रहे कार्यकर्ता ने कहा कि ट्रेन थोड़ा समय ही रुकती है अतः वे जल्दी से अपनी धोती ट्रेन के टॉयलट में बदल लें.

गांधी जी ने कहा, क्यों बदल लूं? और फिर वे टायलट में गए और धोती को उलटी तरफ से पहन कर आधे मिनट में ही बाहर आ गए. धोती का फटा हिस्सा अंदर की तरफ पहनने से छुप गया था. फिर उतरते हुए कार्यकर्ता से बोले – “जब मैं लंदन में पढ़ता था तो अपने बाल संवारने के लिए दस मिनट लगाता था. अब मैं आधे मिनट में ही तैयार हो जाता हूँ!”

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

399

दुनिया का विनाश

एक बौद्धलामा "दुनिया का विनाश" विषय पर एक व्याख्यान देने वाले थे। उनके इस व्याख्यान का बहुत प्रचार-प्रसार किया गया, जिसके परिणामस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उन्हें सुनने के लिए मठ में एकत्र हो गयी।

लामाजी का व्याख्यान एक मिनट से कम समय में समाप्त हो गया।

उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा - "ये सारी चीजें मानवजाति का विनाश कर देंगी - अनुकंपा के बिना राजनीति, काम के बिना दौलत, मौन के बिना शिक्षा, निडरता के बिना धर्म और जागरूकता के बिना उपासना।"

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400

खानपान पर नियंत्रण रखो

एक सेठ था। उसे कई दिनों से बहुत खांसी आ रही थी लेकिन उसे खट्टी चीजें - खट्टा दही, खट्टा मट्ठा, अचार आदि खाने की बुरी आदत थी। वह खांसी के उपचार के लिए कई वैद्यों के पास गया। सभी ने उसे खट्टी चीजें न खाने की सलाह दी ताकि उनकी दवाऐं कुछ असर दिखा सकें परंतु सब व्यर्थ।

अंत में वह एक बुजुर्ग वैद्य के पास गया जिसने उस सेठ को अपनी दवाओं के साथ कोई भी मनचाही चीज खाने की अनुमति दे दी। वैद्य ने उसे दवाऐं दी और सेठ अपनी आदत के अनुसार खट्टी चीजें खाता रहा। कुछ दिनों बाद जब वह वैद्य के पास पहुंचा तो वैद्य ने उसका हालचाल पूछा। उसने कहा - "खांसी में और बढ़ोत्तरी तो नहीं हुई परंतु कुछ खास फायदा भी नहीं हुआ।"

वैद्य ने उससे कहा - "तुम मेरी दवाओं के साथ - साथ खट्टी चीजें खाते रहो। इससे तुम्हें तीन फायदे होंगे।"

सेठ ने व्यग्रता से पूछा - "कौन से तीन फायदे?"

वैद्य ने उत्तर दिया - "पहला यह कि तुम्हारे घर में कभी चोर नहीं आयेंगे। दूसरा यह कि तुम्हें कुत्ता नहीं काटेगा। तीसरा यह कि तुम बूढ़े नहीं होगे।"

सेठ ने फिर पूछा - "ये सब तो अच्छी बात है परंतु इनका खट्टी चीजों से क्या संबंध?"

वैद्य ने उत्तर दिया - "यदि तुम खट्टी चीजें खाते रहोगे तो तुम्हारी खांसी कभी ठीक नहीं होगी। तुम दिन-रात खांसते रहोगे तो चोर तुम्हारे घर कैसे आयेंगे? और खांसी से तुम इतने कमजोर हो जाओगे कि बिना छड़ी की सहायता के तुम चल भी नहीं सकोगे। तुम्हारे हाथ में छड़ी देखकर कुत्ते तुम्हारे पास नहीं फटकेंगे। कमजोरी के चलते भरी जवानी में ही मर जाओगे इसलिए तुम बूढ़े ही नहीं होगे।"

जो व्यक्ति अपने खान-पान को लेकर लापरवाह है,

वह कभी भी बीमारियों से मुक्त नहीं हो सकता।

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139

जलियाँ वाला बाग़

जब जलियाँ वाला बाग़ कांड हुआ था जिसमें जनरल डायर की गोलियों से दो हजार से अधिक निहत्थे शहीद हुए थे, भगत सिंह की उम्र बारह वर्ष थी. यह समाचार सुनकर भगत सिंह अंग्रेजों के प्रति गुस्से से भर गए थे और स्कूल जाने के बजाए चुपचाप जलियाँ वाला बाग़ पहुँच गए और वहां की खून से सनी मिट्टी अपने साथ घर ले आए.

उन्होंने वह मिट्टी एक शीशी में रख ली और पुष्प अर्पित किए जैसे कि वे शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हों.

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140

रायफल की खेती

भगत सिंह का पूरा परिवार क्रांतिकारी था. उनके पितामह, पिता व चाचा सभी ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था.

एक बार उनके पिता कृशन सिंह अपने मित्र नंद किशोर मेहता को अपना आम का बग़ीचा दिखाने ले गए. बगीचे में भगत सिंह अकेले काम कर रहे थे. मित्र ने सामान्य उत्सुकतावश पूछा कि बेटे तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे हो.

भगत सिंह ने उत्तर दिया – रायफल की खेती करने के लिए बीज बो रहा हूं.

मित्र को आश्चर्य हुआ. उन्होंने प्रश्न किया – रायफल की खेती?

हाँ, ताकि मैं अपने देश को फिरंगियों से मुक्त करवा सकूं – भगत सिंह ने उत्तर दिया.

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संकलन – सुनील हांडा

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397

दो खरगोशों का पीछा करना

एक शिष्य, जो अपने समय के सुप्रसिद्ध गुरूजी से धनुर्विद्या सीख रहा था, उनके समक्ष एक प्रश्न लेकर गया - मैं धनुर्विद्या की कला में और पारंगत होना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आपसे धनुर्विद्या सीखने के अलावा मैं दूसरे गुरूजी के पास भी धनुर्विद्या सीखने जाऊं ताकि मैं कुछ और गुर सीख सकूं। इस बारे में आपका क्या विचार है।"

गुरूजी ने उत्तर दिया - "वह शिकारी जो एकबार में दो खरगोशों का पीछा करता है, उसके हाथ एक भी खरगोश नहीं लगता।"

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398

बेसुरा गाओ लेकिन गाते रहो.......

जब भी उसे समय मिलता, वह कमरे में अकेला जा बैठता, प्रार्थना करता और प्रेरणादायी गाने गाया करता। वह गाने में इतना तल्लीन हो जाता कि उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि उसके आस-पास क्या घटित हो रहा है।

एकबार उसके मित्र ने उससे कहा - "तुम किसी दूसरे का गाना भी सुन सकते हो। तुम रेडियो या टेपरिकॉर्डर भी बजा सकते हो। आखिर तुम इतना बेसुरा होने के बावजूद भी क्यों गाते हो?"

उसने उत्तर दिया - "तो क्या हुआ यदि मैं बेसुरा हूं? जब मैं गाता हूं तो मैं सुधबुध खोकर इतना मगन हो जाता हूं कि मेरी आत्मा जागृत हो उठती है। जो आनन्द मुझे इसमें प्राप्त होता है, वह टेपरिकॉर्डर से कभी प्राप्त नहीं हो सकता।"

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137

उधारी

एक शाम नसरूद्दीन अपने घर के बरामदे में बड़ी चिंतित मुद्रा में घूम रहा था. बार बार पसीना पोंछे जा रहा था. उसकी पत्नी से आखिर रहा नहीं गया तो पूछा – “क्या बात है, बहुत चिंतित लग रहे हो?”

“मैंने इब्राहीम से सौ दीनार उधार लिया था. आज शाम को यह उधारी चुकानी थी. मेरे पास आज यह उधारी चुकाने को पैसा नहीं है”

“इब्राहीम तो बहुत ही भला आदमी है. उससे जाकर बोल क्यों नहीं देते कि आज उधारी नहीं चुका पाओगे. वो भला आदमी जरूर मान जाएगा.”

“तुम ठीक कहती हो.” यह कहकर नसरूद्दीन इब्राहीम के पास चला गया.

जब नसरूद्दीन वापस आया तो उसकी बीवी ने पूछा – “क्या हुआ?”

“हुआ तो कुछ खास नहीं, मगर जब मैंने उसे अपनी परेशानी बताई तो अब वो अपने बरामदे में टहल रहा है और पसीना पोंछे जा रहा है.” नसरूद्दीन ने बताया.

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138

बराबर न्याय

नसरूद्दीन एक बार कहीं जा रहा था. पीछे से किसी आदमी ने उसके सिर पर चपत लगाया और पुकारा अफजल!

नसरूद्दीन ने उस आदमी से पूछा कि अकारण उसने सिर पर चांटा क्यों मारा. उस आदमी ने बताया कि नसरूद्दीन पीछे से ठीक उसके दोस्त अफजल की तरह दिखता है और उसी गफलत में उसने उसे चांटा मार दिया.

नसरूद्दीन को यह बात हजम नहीं हुई और उसने पंचायत में जाकर शिकायत कर दी.

पंच ने मामला सुना और निर्णय दिया कि वह आदमी नुकसान व दंड स्वरूप नसरूद्दीन को दो पैसा भुगतान करे.

नसरूद्दीन को यह बात नागवार गुजरी. उसने आव देखा न ताव और पंच के सिर पर चांटा जड़ दिया.

पंच ने नाराज होकर पूछा कि यह क्या बदतमीजी है.

“कोई बदतमीजी नहीं है. एक चांटे की कीमत दो पैसे है. तो इस आदमी ने मुझे चांटा मारा, मैंने आपको. अब आप इस आदमी से दो पैसा ले लें. हिसाब बराबर.” नसरूद्दीन ने कहा.

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

395

ईश्वर ने हमें पलकें भी दी हैं

जब गुरूजी का एक शिष्य गंभीर गलती करते हुए पकड़ा गया तो सभी लोगों को गुरूजी से यह अपेक्षा हुई कि वे उसे कठोरतम दंड देंगे। जब एक माह गुजरने के बाद भी गुरूजी ने उसे कोई दंड नहीं दिया तो किसी ने यह कहते हुए अपनी आपत्ति व्यक्त की - "जो कुछ भी घटित हुआ है, हम उसे भूल नहीं सकते आखिर ईश्वर ने हमें आँखें दी हैं।"

गुरूजी ने उत्तर दिया - "तुमने बिल्कुल सही कहा। परंतु ईश्वर ने हमें पलकें भी दी हैं।"

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396

जीत का बिंदु

यह उस समय की बात है जब अब्राहम लिंकन वकालत करते थे। एक व्यक्ति उनके पास अपना मुकदमा सौंपने गया। लिंकन ने उसकी फाइल को पढ़ा और कहा - "कानूनी दाँवपेंच के हिसाब से तुम यह मुकदमा जीत सकते हो।"

यह कहने के तुरंत बाद उन्होंन उसकी फाइल को लौटा दिया और कहा - "सत्य के आधार पर तुम्हारा मुकदमा जीतना असंभव है। बेहतर होगा तुम कोई दूसरा वकील तलाश लो। यदि मैं तुम्हारा मुकदमा लड़ूंगा तो मेरे मन में हर समय यह दबाब बना रहेगा कि मैं अदालत में झूठ बोल रहा हूँ। और यह भी हो सकता है कि ज्यादा दबाब के चलते मैं अदालत में सब कुछ सत्य बोल दूं और तुम मुकदमा हार जाओ।"

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135

श्रीनिवास रामानुजन – भागफल

गुरुजी गणित के सवाल पढ़ा रहे थे. गुरुजी ने एक प्रश्न पूछा “यदि हमारे पास 3 केले हों, और तीन छात्र हों और इन केले को सबको बराबर बराबर बांटना हो तो हर छात्र को कितने केले मिलेंगे?”

पहली पंक्ति में बैठे एक बुद्धिमान छात्र ने उत्तर दिया – “हर एक को एक केला मिलेगा.”

“बहुत सही.” गुरूजी ने कहा और वे भाग व भागफल के बारे में विस्तार से बताने लगे.

परंतु एक छात्र से रहा नहीं गया और उठ खड़ा होकर उसने पूछा “गुरूजी, यदि कोई भी छात्र को को कोई भी केला नहीं दिया जाए तो क्या इनमें से हरेक को एक केला मिलेगा?”

इस मूर्खता भरे प्रश्न को सुन सारे छात्र हो हो कर हंस पड़े.

मगर गुरूजी गंभीर हो गए. उन्होंने छात्रों से कहा – इसमें हंसने जैसी कोई बात नहीं है. यह वह प्रश्न है, जिसका उत्तर ढूंढने के लिए गणितज्ञों को सौ साल लग गए. यह छात्र पूछ रहा है कि शून्य को यदि शून्य से भाग दे दिया जाए तो परिणाम क्या होगा?

यह प्रश्न पूछने वाले छात्र थे श्रीनिवास रामानुजन जो आगे चलकर महान गणितज्ञ बने.

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136

मछली रानी जीवन दायिनी

नसरूद्दीन यात्रा पर थे. रास्ते में उन्हें एक योगी मिला. योगी समाधिस्थ थे और ध्यान कर रहे थे. नसरूद्दीन ने सोचा कि इस योगी से कुछ सीखने को मिलेगा और वहीं इंतजार करने लगे. योगी की समाधि टूटी तो मुल्ला को सामने बैठे देख योगी ने प्रश्न किया – “तुम कौन हो और क्या चाहते हो?”

नसरूद्दीन ने कहा – “महात्मा, मैं दूर देश से आया हूँ. ज्ञान की तलाश में. आपके पास जो ज्ञान है वह मुझ अज्ञानी को भी दे दें तो बड़ी कृपा होगी”

योगी ने अपना ज्ञान बांटा – “मैं विश्वास करता हूँ कि प्रत्येक जीव जंतु में आत्मा होती है. यहाँ तक कि पशुओं में भी और कीट पतंगों में भी. जो उन्हें उनके जीवन में अच्छा बुरा करने की शक्ति प्रदान करती है.”

“आपका बिलकुल सही कहना है,” मुल्ला ने कहा – “एक बार जब मैं मर रहा था तो मछली ने मेरा जीवन बचाया था.”

“अच्छा!,” योगी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा – “यह तो सचमुच आश्चर्यजनक है. तुम तो सचमुच ईश्वरीय दुआ प्राप्त व्यक्ति प्रतीत होते हो. मैंने आज तक ऐसा नहीं सुना कि किसी की जान मछली ने बचाई हो. खैर, आखिर वो किस्सा क्या था?”

“ओह, किस्सा कुछ यूँ है,” मुल्ला ने विस्तार से बताया – “एक बार मैं दूर देश की यात्रा पर था. जंगल में मैं भटक गया. भूख प्यास से मेरी हालत खराब हो गई. कई दिनों तक न तो खाना मिला न पीने को पानी. आखिर में चलते चलते मुझे एक तालाब दिखा. मैंने पानी पीने के लिए दौड़ लगा दी.”

“अच्छा, तो तुम बेध्यानी और जल्दबाजी में कुंड में गिर गए होगे और कोई ईश्वरीय चमत्कार हुआ होगा, और दैवीय शक्ति संपन्न मछली ने तुम्हें तालाब से निकाला होगा..” योगी के स्वर में आतुरता थी.

“नहीं, जैसे ही मैं तालाब में कूदा, मेरे पैर के नीचे एक बड़ी सी मछली फंस गई. मैंने उसे पकड़ लिया और वहीं भून कर खा गया. भूख के मारे मैं तो मरा जा रहा था. उस मछली ने सचमुच मेरा जीवन बचाया. ईश्वर उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें!” नसरूद्दीन ने खुलासा किया.

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संकलन – सुनील हांडा
अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

393

विचार शुद्धि

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के एक पक्के शिष्य मथुराबाबू ने एकबार उन्हें बहुत महंगे वस्त्र भेंट किए। परमहंस ने उन वस्त्रों को धारण किया और माँ काली का ध्यान करने बैठ गए। ध्यान के बाद जब वे दंडवत प्रणाम करने लगे तब उनके दिमाग में वह विचार कौंधा कि कही ये महंगे वस्त्र मैले न हो जायें।

    बाद में जब उन्होंने विचार मंथन किया तो यह पाया कि उन्हें ऐसे वस्त्र कतई नहीं पहनने चाहिए जो ध्यान में बाधा पहुंचाते हों और उन्होंने वे वस्त्र वापस कर दिए।
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394

प्रवाह के साथ बहना


    ताओ दंतकथा के अनुसार एक बार एक वयस्क व्यक्ति दुर्घटनावश नदी में गिर कर भंवर में फंस गया और एक खतरनाक जलप्रपात की ओर बहने लगा।

    सभी प्रत्यक्षदर्शी यह दृश्य देखकर घबड़ा गए क्योंकि उस प्रपात में गिरकर मनुष्य का मरना तय था। तभी आश्चर्यजनक रूप से वह व्यक्ति जलप्रपात में गिरकर भी सकुशल नदी से बाहर निकल आया। लोगों ने उससे पूछा कि उसके जीवित बचने का क्या राज़ है?

    उस व्यक्ति ने उत्तर दिया - "मैंने नदी के प्रवाह को अपने अनुरूप बदलने के बजाए स्वयं को नदी के प्रवाह के अनुरूप ढ़ाल लिया। बिना कुछ भी सोचे हुए मैं नदी के प्रवाह के अनुरूप बहने लगा। मैं भंवर के साथ ही डूबा और भंवर के साथ ही ऊपर निकल आया। इस तरह मैं जीवित बच गया।"  
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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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