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आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 64

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

359

सुनहरा चील

एक व्यक्ति को चील का एक अंडा मिला जिसे उसने अंडा सेती हुई मिर्गी के पास रख दिया। कुछ समय बाद अंडों से चूजे निकले। चूजों ने अपने स्वभाव के अनुरूप इधर-उधर टहल कर भोजन के लिए कीड़ों की तलाश शुरू कर दी तथा वे अपने पंखों को फड़फड़ाकर थोड़ी दूर तक उड़ लेते। चील का बच्चा भी अन्य चूजों की देखादेखी उनकी ही तरह व्यवहार करता।

कुछ वर्ष बाद जब वह चील का बच्चा वयस्क हो गया, तब उसने एक दिन ऊँचे आकाश में उड़ान भरते हुए एक पक्षी को देखा जो अपने सुनहरे एवं ताकतवर पंखों की सहायता से गगन की ऊँचाईयों में हवा को चीरता हुआ उड़ रहा था।

अचरज से भरे चील ने पूछा - "वह कौन है?"

उसके पड़ोसी ने कहा - "वह चील है, पक्षियों का राजा, आकाश में उसका साम्राज्य है। हम महज चूजे हैं इसलिए हम धरती पर रहते हैं। "

इस तरह वह चील अपनेआप का पहचान सकने के कारण जीवन पर्यन्त

एक चूजे की तरह ही रहा और मरा।

 

360

अमीर

पति अपनी पत्नी से बोला - "प्रिय, मैं बहुत परिश्रम कर रहा हूँ, इससे एक दिन हम लोग बहुत अमीर हो जायेंगे। "

पत्नी - "पर हम लोग पहले से ही अमीर हैं, क्योंकि हम लोग एक दूसरे के नजदीक हैं। और किसी दिन हमारे पास धन भी होगा। "

 

361

जुनैद एवं नाई

पुण्यात्मा जुनैद ने एक बार भिखारी का वेश धारण किया और मक्का में एक नाई की दुकान पर पहुँच गए। वह नाई उस समय एक रईस ग्राहक की दाढ़ी बना रहा था। उसने तुरंत उस रईस व्यक्ति की दाढ़ी बनाना छोड़कर पहले भिखारी की दाढ़ी बनाने का निर्णय लिया। उसने न केवल भिखारी का वेश धारण किए जुनैद से पैसे नहीं लिए वरन उन्हें भिक्षा भी दी।

जुनैद उस नाई से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने निश्चय किया कि वे उस दिन जो कुछ भी भिक्षा के रूप में प्राप्त करेंगे, उस नाई को दे देंगे।

उसी दिन एक अमीर तीर्थयात्री ने जुनैद को सोने के सिक्कों से भरा पर्स भिक्षा के रूप में दिया। जुनैद खुशी-खुशी उस नाई की दुकान पर पहुंचे और उसे वह पर्स दे दिया।

जब नाई को यह ज्ञात हुआ कि जुनैद ने उसे वह पर्स क्यों दिया है तो वह क्रोधित हो गया और बोला - "आखिर तुम किस तरह के पुण्यात्मा व्यक्ति हो? तुम मुझे मेरे प्रेम के बदले में यह पुरस्कार दे रहे हो ! "

"जब आप अपने उपकार के बदले में कुछ चाहते हैं

तो आपका उपहार रिश्वत बन जाता है। "

 

362

बयाज़िद ने नियम तोड़ा

संत बयाज़िद कभी-कभी अपने संप्रदाय के नियम और परंपराओं के विरुद्ध कार्य किया करते थे। एक बार वे तीर्थयात्रा से लौटते समय एक नगर में पहुंचे। वहां के नागरिकों ने श्रद्धाभाव से उनका स्वागत किया। उनके नगर आगमन के कारण लोगों में हलचल मच गयी।

बयाज़िद जब लोगों की चापलूसी से थक गए तो बाज़ार के बीचोबीच पहुंचकर उन्होंने सब लोगों के सामने ही ब्रेड का पैकेट उठाकर खाना शुरू कर दिया। रमज़ान की पवित्र महीना होने के कारण उस दिन उपवास था। यद्यपि वह उपवास का दिन था परंतु बयाज़िद जानते थे कि यात्रा में होने के कारण उन्हें उपवास तोड़ने की अनुमति थी।

परंतु उनके अनुयायियों को यह अच्छा नहीं लगा। वे उनके व्यवहार से इतने क्षुब्ध हुए कि उन्हें छोड़कर अपने घरों को चले गए।

बयाज़िद ने अपने शिष्य से कहा - "जैसे ही मैंने उनकी आकांक्षा के अनुरूप आचरण नहीं किया, उनकी सारी श्रृद्धा गायब हो गयी। "

"श्रद्धा की कीमत आपको अपेक्षा अनुरूप आचरण करके चुकानी पड़ती है। "

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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