टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

July 2011

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(स्कूटी की चाबी का चित्र - मेरे मोबाइल के कैमरे से.)

सुबह-सुबह 5 बजे मेरे मोबाइल के अलार्म की घंटी की हल्की सी आवाज सुनाई दी तो मेरी नींद खुली.  आवाज बेहद हल्की आ रही थी. मुझे लगा कि कहीं किताब या तकिये इत्यादि के नीचे वह दब गया होगा और इस वजह से उसकी आवाज दब रही होगी.

चूंकि अलार्म पूरे 1 मिनट बजता है इसीलिए मैं उठा और उसे बंद करने के लिए ढूंढने लगा. वह कमरे में कहीं नहीं मिला, मगर उसकी घंटी की बेहद हल्की आवाज आ रही थी - यह आवाज अन्य किसी मोबाइल के अलार्म की नहीं हो सकती थी क्योंकि मैंने बड़ा विशिष्ट किस्म का अलार्म टोन लगाया हुआ था. जल्द ही अलार्म बंद भी हो गया. परंतु अलार्म हर दस मिनट के अंतराल से बजता रहता है जब तक कि उसे बंद न कर दिया जाए, अतः मैंने मोबाइल को ढूंढने की गरज से घर के दूसरे फ़ोन से काल किया. मेरे मोबाइल की घंटी कुछ इस तरह से बजी जैसे कहीं सुदूर मंदिर में घंटी बज रही हो.

मेरा माथा ठनका. दिमाग की बत्ती जली. मैं तुरंत नीचे बाहर की ओर दौड़ा.

मेरा मोबाइल बाहर सड़क पर रखी मेरी स्कूटी की सीट पर पड़ा था. सुरक्षित. पूरी तरह से. रात में बारिश के मौसम के बावजूद पानी भी नहीं गिरा था.

दरअसल हुआ यूँ था कि रात में साप्ताहिक हाट से सब्जी-भाजी की खरीदारी कर वापस घर आने पर स्कूटी में से पेट्रोल लीक होने लगा, तो लीक का उद्गम देखने के लिए अपने मोबाइल के ब्राइट-एलसीडी स्क्रीन का सहारा लिया. लीक बंद करने के उठापटक में मोबाइल स्कूटी के सीट पर छूट गई  गया और वहीं रह गई थी गया था. स्कूटी घर के बाहर (पार्किंग की व्यवस्था न होने से, जबकि मकान सरकारी है,) सड़क पर ही खड़ी रहती है, और जाहिर है सीट पर मोबाइल भी रात भर, खुले में बाहर पड़ा रह गया.

कहानी अभी थोड़ी बाकी है...

इससे पहले, उसी रोज साप्ताहिक हाट में खरीदारी करने जाते समय अन-अटैण्डेड पार्किंग में स्कूटी में चाबी (घर की चाबियाँ भी उसमें लगी थीं) लगी रह गई, और आधे घंटे  के उपरांत भी वह सुरक्षित मिल गई. जबकि यही स्कूटी कुछ समय पूर्व इसी क्षेत्र में स्थित लाइब्रेरी के अटेंडेड पार्किंग लाट से दिन दहाड़े, ताला तोड़ कर चोरी कर ली गई थी. वो तो बाद में पता नहीं कैसे, पुलिस वालों द्वारा बरामद कर ली गई और थाने से वापस भी मिल गई थी.

जाको राखे साइंया...

यह है नो-नॉनसेंस, ईडियटों का गाइड - किसी मित्र के गूगल+ पर किए गए पब्लिक बकवासों की फ़ीड प्राप्त करने के लिए.
अपने मित्र का गूगल+ प्रोफ़ाइल नंबर प्राप्त करें. यह बेहद लंबे अंकों का होता है जो गूगल+ के प्रोफ़ाइल यूआरएल में क्लिक करने पर ब्राउजर के एड्रेसबार में नमूदार होता है. उदाहरण के लिए, ई-पण्डित का प्रोफ़ाइल नंबर  है 113298719968436587792.
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इस नंबर को प्लसफ़ीड.एप्पस्पॉट.कॉम यूआरएल के आगे जोड़ कर उस गूगल+ प्रोफ़ाइल के सार्वजनिक सामग्री (पब्लिक कंटेंट) का फ़ीड का यूआरएल बना सकते हैं.
जैसे कि यूआरएल -  http://plusfeed.appspot.com/113298719968436587792
के जरिए ई-पण्डित की पब्लिक बकवासों की फ़ीड अपने फ़ीड रीडर पर पढ़ सकते हैं. और जब भी नया सार्वजनिक सामग्री प्रकाशित होगा, वो आपके फ़ीड रीडर में स्वयंमेव आ जाएगा. यानी आपको गूगल+ पर बारंबार झांकने की जरूरत नहीं!
ई-पण्डित का गूगल+ पर पब्लिक सामग्री फ़ीड रीडर पर  कुछ इस किस्म का दिखेगा -
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हैप्पी +  रीडिंग!
टीप - मेरे गूगल+ प्रोफ़ाइल नंबर की फ़ीड प्राप्त करने की कोशिश करेंगे तो आपको शून्य परिणाम मिलेगा. वहाँ कोई सार्वजनिक सामग्री अभी नहीं है!

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वैसे तो, इस फ़ीचर को ईमेल के साथ पहले दिन से ही उपलब्ध होना था, मगर ख़ैर ये बात तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि बुरे लोग किसी प्रयोक्ता के ईमेल खाते को हैक कर उसके तमाम संपर्कों को स्पैम भेज कर लूट-खसोट की भी कोशिशें करेंगे.
ईमेल खातों को हैक कर उसके तमाम संपर्कों को ईमेल के जरिए स्पैम संदेश भेजने की घटनाओं में दिनों दिन उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई है. और बहुत बार हैक किए गए प्रयोक्ता को न तो कोई जानकारी रहती है और न ही उसके पास अपने खाते को वापस पाने के रास्ते. क्योंकि कई बार हैकर उन तमाम रास्तों को भी बंद कर चुका होता है. और बहुधा अपने खाते को फिर से वापस पाने का तरीका आसान नहीं होता वरन बेहद कष्टकारी होता है और समय खाऊ होता है.
इस समस्या से प्रभावकारी तरीके से निपटने के लिेए हॉटमेल ईमेल सेवा में एक बेहद नायाब फ़ीचर जोड़ा गया है - माई फ्रेंड्स बीन हैक्ड!
तो, अब जब आपको आपके किसी मित्र के किसी ईमेल से लगे कि उनका खाता हैक कर लिया गया है, तो इस बटन को दबा दें. हॉटमेल न सिर्फ हैकर के क्रियाकलाप पर रोक लगाएगा, वरन आपके मित्र को उनका खाता वापस प्राप्त करने में सहायता भी करेगा.
क्या कहा? आप भी मेरी तरह विश्व के पहले फ्री ईमेल सेवा - हॉटमेल का प्रयोग करना सदियों पहले बंद कर चुके हैं?
कोई बात नहीं. शायद ये सुविधा जल्द ही अन्य जगहों पर भी उपलब्ध हो जाए, क्योंकि यह है वाकई बड़े काम का. यदि आप स्वयं न्यूनतम 2 वेब-ईमेल खाता चलाते हैं तब तो यह आपके लिए और भी काम का हो सकता है क्योंकि किसी एक खाते के हैक हो जाने की स्थिति में आपका दूसरा खाता ऐसे में आपके लिए देवदूत की तरह रक्षक का काम कर सकता है.

पिछले दिनों गृहनगर की यात्रा पर था तो जब एक बचपन के मित्र के घर जा रहा था तो वहाँ गली के एक कोने में यह देखा.  एक छोटी सी  दीवार के सहारे फलता फूलता बड़ा सा विशाल वृक्ष. यह पीपल समूह का वृक्ष है.

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आपने भी ऐसे बहुत से पीपल या वट के पेड़ देखे होंगे अकल्पनीय जगहों पर, जहाँ वे जीवन के लिए हर किस्म के संघर्ष करते हुए दिखते होंगे. चट्टानों में, छतों में दीवारों में. और आमतौर पर मरियल, सूखे एक दो डाल युक्त दिखते हैं.

मगर यह एकदम अलग है. विशाल और हरा भरा जबकि इसकी जड़ें जमीन पर नहीं हैं, दीवार पर ही चिपकी हैं.

 

पास पड़ोस के लोगों ने बताया कि यह कोई 15-20 वर्ष पुराना है और मकान मालिक द्वारा कई बार काटने उखाड़ने के बाद भी यह इतना हरा भरा और विशाल है.

जिजीविषा शायद इसे ही कहते हैं.

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माकेदार गूगल+ आया तो गूगल(-) को तो आना ही था. गूगल माइनस को रिलीज करने वाली पार्टी के बारे में तो अभी एंटीसेक और एनॉनिमस हैकर समूहों को भी पता नहीं है, मगर है यह बेहद काम का.

 

आप सोच रहे होंगे कि ये गूगल माइनस आखिर है क्या बला?

 

दरअसल, गूगल माइनस एंटी-सोशल-नेटवर्किंग वेब एप्प है जो आपको गूगल+ तथा फ़ेसबुक जैसी वेब विपदाओं से प्रभावी तरीकों से बचाता है.

 

गूगल माइनस क्या क्या कर सकता है?

सवाल ये है कि ये नया जारी किया गया गूगल माइनस आखिर कर क्या सकता है और क्या सचमुच ये हमारे काम का है भी?

तो उत्तर है – हाँ, ये बहुत कुछ कर सकता है और ये हमारे बहुत काम का है. इसकी स्केलेबिलिटी अंतहीन है. इसमें आप अपनी सुविधानुसार सुविधाएँ और फीचर्स आसानी से जोड़ घटा सकते हैं. वस्तुतः इसको काम में लेने के लिए आपके पास क्षमता होनी चाहिए. आप अपनी क्षमता के मुताबिक इस मुफ़्त एप्प से चाहे जो काम ले सकते हैं. अपुष्ट खबरों के मुताबिक कुछ हैकरों ने इससे सुबह का नाश्ता भी तैयार करवाने में सफलता प्राप्त कर ली है.

वर्तमान में गूगल माइनस में उपलब्ध मुख्य फ़ीचर्स हैं -

  • अपने इनबॉक्स को जो गूगल+ इनवाइटों से अथवा या गूगल+ में आपको आपके मित्रों के द्वारा जोड़े जाने की सूचना से भर गए हैं, उन्हें न सिर्फ खाली करता है, बल्कि आगे से ऐसे संदेशों को पूरी तरह से ब्लॉक करता है. इसके प्रीमियम वर्जन में सुविधा है कि यह फ़ेसबुक मित्र निवेदकों अथवा गूगल+ में जोड़े जाने वाले संदेश प्रेषकों को अपशब्दों सहित न सिर्फ नकारने की सूचना देता है, उनके खातों से अवांछित डाटा मिटा भी देता है.
  • गूगल माइनस आपको एंटी सर्कल बनाने की सुविधा देता है जिसमें आप अपने खड़ूस बॉस, एक्स-गर्लफ्रैंड, सास/बहू (जो लागू हो), प्रतिद्वंद्वी (कक्षा या कार्यस्थल पर) तथा तमाम लोग जिनसे आप नफ़रत करते हैं – जैसे कि तमाम भारतीय नेता.. इत्यादि को जोड़ सकते हैं और उन्हें मौके बे मौके च्यूंटी काट सकते हैं – एकदम फेसबुक स्टाइल में, मगर यहाँ आपको गूगल+ के विपरीत पूरी तरह से अनाम प्रोफ़ाइल बनाना होगा. असली प्रोफ़ाइल डिलीट कर दिये जाएंगे.
  • फ़ेसबुक या गूगल+ पर खाता नहीं बना सकते क्योंकि आपका बॉस या आपकी सास वहाँ पहले से ही मौजूद है और आप कोई चीज इनसे शेयर नहीं करना चाहते? कोई बात नहीं. गूगल माइनस है ना. यहाँ खाता बनाइए. यहाँ न तो आपका बॉस होगा न आपकी सास. होंगे भी तो नक़ली प्रोफ़ाइलों के साथ, और यदि आपको उनके नक़ली प्रोफ़ाइल का पता चल भी गया तो आप आराम से उतनी ही नक़ली प्रोफ़ाइल के साथ उनका अपशब्दों से ताजिंदगी मजाक उड़ाते रह सकते हैं.
  • गूगल माइनस में फ़ेसबुक के लाइक बटन या गूगल के प्लस बटन के विपरीत डिसलाइक तथा माइनस बटन होता है. आप चीजों को आसानी से डिस्लाइक कर सकेंगे, आपके द्वारा डिस्लाइक की गई सूचियाँ आसानी से  आपके दुश्मनों को सर्वत्र उपलब्ध होंगी. दुश्मन? हाँ, ये तो पहले बताना था. गूगल माइनस एंटी सर्कल में आप मित्र नहीं जोड़ सकते. यहाँ आप एंटी-फ्रेंड यानी दुश्मनों को ही शामिल कर सकते हैं. साथ ही ये आपके वर्तमाम गूगल+ अथवा फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल के नक़ली मित्रों की पहचान कर उनसे आपकी मित्रता खत्म करने में और उन्हें दुश्मन बनाने में भी प्रभावी तरीके से मदद करता है.
  • यह आपके दुश्मनों अथवा खड़ूस बॉस के फ़ेसबुक अकाउन्ट पर लाखों नकली फेसबुक मित्र निवेदन भेज कर उन्हें नकली तरीके से फूलकर कुप्पा होने में मदद करता है ताकि यह देख कर आप उन पर हँस सकें. लाफ़्टर इज द बेस्ट मेडिसिन. इस तरह से गूगल माइनस एक बढ़िया दवा की तरह भी काम करता है.
  • गूगल माइनस के हैंगइन में ये सुविधा है कि आप अपने एंटीफ्रैंड और जिनसे आप नफरत करते हैं उनसे रीयल टाइम में वीडियो संवाद कर सकते हैं. उन्हें भयंकर गाली गुफ़्तार दे सकते हैं, उनकी बुराईयाँ कर सकते हैं. हैँगइन का उन्नत अल्गोरिद्म सिर्फ गालियों को ही पास करेगा तथा सामान्य भाषा में की गई बातचीत बीप से गायब कर देगा. वैसे भी डेल्ही बेली ने गालियों को फैशन स्टेटमेंट बना दिया है, और अब बात बात में गाली देना सभ्यता की निशानी समझा जाने लगा है. साहित्यिक, सभ्य भाषा में संवाद करने वालों को अब असभ्य, पिछड़ा, गघा और बेवकूफ़ समझा जाने लगा है.
  • गूगल माइनस आपको किसी भी अजनबी से अनफ्रैंड होने की सुविधा देता है. आप पब्लिक प्रोफ़ाइल से किसी भी बंदे का प्रोफ़ाइल चुनकर उसे अनफ्रैंड निमंत्रण भेज सकते हैं. और फिर उसके बाद पूरी तरह एंटीसोशल एलीमेंट की तरह मजमा जमा सकते हैं – एक दूसरे की वाल पर गाली गलौज वाले, श्राप देते हुए, उनके वंशजों को धिक्कारते हुए संदेश भेज सकते हैं और प्राप्त कर सकते हैं. नकली सभ्य इंटरनेट की मोनोटोनी को खत्म करने में, और सादा सरल इंटरनेट में कुछ मिर्च-मसाला भरने में गूगल माइनस का योगदान अहम रहेगा.

ये तो सिर्फ कुछेक महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं. गूगल माइनस का परीक्षण अभी जारी है और आगे इसके अन्य विशेषताओं के बारे में यहाँ चर्चा जारी रहेगी. अतः इस ब्लॉग पर नजरें जमाए रखें.

आपको गूगल माइनस का निमंत्रण चाहिए? जी हाँ, यह मुफ़्त वेब एप्प भी सिर्फ चुनिंदा आमंत्रितों के लिए ही उपलब्ध है, क्योंकि जो चीज निमंत्रण के जरिए मिलती है, उसके आरंभिक तौर पर सफल होने के चांसेज कुछ गुना बढ़ जाते हैं. तो यदि आपको गूगल माइनस का निमंत्रण चाहिए तो नीचे टिप्पणी बक्से में अपना ईमेल पता दर्ज करें, आपको निमंत्रण भेज दिया जाएगा. निमंत्रण पहले आओ पहले पाओ की तर्ज पर भेजा जाएगा, अतः कृपया जल्दी करें. ऐसा न हो कि निमंत्रण खत्म हो जाएं.

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नूरजहाँ नामक  3.5 किलो के 1 नग आम की कीमत यदि 300 रुपए हो तो ये कहावत सच साबित तो होगी ही!

-- नूरजहाँ - एक और दृश्य :

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चलिए, इसी बहाने अब आम-उत्सव मना ही लेते हैं -
-- लोटिया चौसा :

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-- लंगड़ा :

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-- तोतापरी :

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-- लखनऊ सफेदा :

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-- सुर्खा झाखड़बाग :

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-- काला पहाड़ :

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-- पायरी :

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-- हुस्न आरा :

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-- केसर :

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-- नायाब :

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-- राजापुरी

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-- देसी :

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-- अम्बिका

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-- अरदायू :

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-- सिन्धु :

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-- तोतापरी -2 :

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-- दशहरी :
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-- आम्रपाली :

.... गुलाब खास :

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-- चितला :

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मुंह में पानी आया कि नहीं ?

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पहले, पहली बात. इतिहास की बात.

मैं 1988 से कंप्यूटरों पर हिंदी में काम कर रहा हूँ, तब बिना हार्ड-डिस्क या 20 मेबा की हार्डडिस्क युक्त 286 कंप्यूटर होते थे जिनकी स्पीड 33 मेहर्त्ज होती थी और जिनमें रैम 1-2 मेबा होता था. अविश्वसनीय? जी हाँ. और फिर भी हमारा काम हो जाता था. हम खुश थे कि कंप्यूटर हमारा काम कितना आसान कर देता है!

तब डास ऑपरेटिंग सिस्टम से फ्लापी से बूट कर काम करते थे. बूटेबल फ्लॉपी में ही कुछ प्रोग्राम होते थे. हिंदी के लिए उन दिनों अक्षर नामक वर्ड प्रोसेसर होता था. उसमें हिंदी कीबोर्ड हिंदी रेमिंगटन टाइपराइटर के कीबोर्ड जैसा होता था.

बहुत दिनों तक इसी में काम करते रहे. बाद में विंडोज 3.x / 95 आया तो डास आधारित अक्षर कालातीत हो गया, और एमएस ऑफ़िस आ गया जिसमें तोड़ निकाल कर कृतिदेव जैसे हिंदी टाइफ़ेस दिखने वाले मूल रूप में अंग्रेज़ी फ़ॉन्टों से काम चलाना पड़ा. कृतिदेव भी रेमिंगटन हिंदी कीबोर्ड आधारित था. चूंकि अक्षर भी रेमिंगटन कीबोर्ड पर था, अतः यहाँ कुछ अक्षरों के अलावा समस्या उतनी नहीं हुई, मगर लिखी हिंदी सामग्री में से माल ढूंढना टेढ़ी खीर होती थी क्योंकि बैकग्राउण्ड में तो अंग्रेज़ी का ही फ़ॉन्ट होता था.

कृतिदेव यूँ तो कमर्शियल फ़ॉन्ट है, मगर पायरेटेड रूप में यह हर जगह आसानी से मिल जाता है, और आसान विकल्प के रूप में यह बेहद प्रचलित भी हुआ. मगर इसमें प्रिंटिंग में उतनी सफाई दिखती नहीं, इसीलिए दूसरे फ़ॉन्टों का - मसलन चाणक्य का चलन भी प्रारंभ हुआ.

इस बीच इंटरनेट चला आया. नेट पर सामग्री डालने में कृतिदेव फ़ॉन्ट  में समस्या थी कि जब तक सामने वाले के कंप्यूटर में फ़ॉन्ट न हो तो यह दिखेगी नहीं. इसका मुफ़्त वितरण भी संभव नहीं था. इसके तोड़ में कुछ कंपनियों ने डायनामिक फ़ॉन्ट निकाले, मगर वो भी सिर्फ इंटरनेट एक्सप्लोरर में चले. इस बीच शुषा नामक फ़ॉन्ट निकला जो न सिर्फ मुफ़्त था, बाद में इसके डायनामिक फ़ॉन्ट भी निकले जो नेट पर बढ़िया चले. यह बहुत कुछ हिंदी रोमन फ़ोनेटिक आधारित था, और इस फ़ॉन्ट में अभिव्यक्ति.ऑर्ग जैसी हिंदी की बहुत सी साइटें बेहद लोकप्रिय भी हुईं. मगर शुषा का कीबोर्ड लेआउट भिन्न था. मुझे इंटरनेट में शुषा में सामग्री डालने में बेहद कष्टों का सामना करना पड़ा क्योंकि मुझे रेमिंगटन आती थी, और उसे जबरदस्ती भूल कर मुझे शुषा सीखना पड़ा.

सन् 2000 के आसपास यूनिकोड हिंदी का प्रचलन चालू हुआ, और नवीन टेक्नोलॉजी के रूप में इसका एडॉप्शन तेजी से हुआ. यूनिकोड हिंदी के साथ लफ़ड़ा ये हुआ कि इसके मानकीकरण में सीडैक का हाथ रहा जिसके कारण सीडैक ने बेहद अदूरदर्शिता पूर्ण तरीके से सदा सर्वदा लोकप्रिय व सर्वाधिक प्रचलित हिंदी कीबोर्ड रेमिंगटन के बजाए अपने जिस्ट व इस्की में प्रयुक्त इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड को प्रस्तुत कर दिया, और रेमिंगटन का विकल्प ही नहीं दिया. यदि रेमिंगटन हिंदी कीबोर्ड ही रहता, या कम से कम एक वैकल्पिक कीबोर्ड के रूप में रहता तो भी ठीक था, मगर इस रद्दी निर्णय के  कारण यूनिकोड हिंदी फ़ॉन्ट में टाइप करने के लिए डिफ़ॉल्ट रूप में इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड के अलावा कोई विकल्प ही नहीं रहा. तब न तो कन्वर्टर उपलब्ध थे, और न ही की-बोर्ड लेआउट क्रियेटर जैसी तकनीकें. लिहाजा, लिनक्स प्रोग्रामों के हिंदी अनुवादों के लिए मुझे एक बार फिर शुषा फ़ॉन्ट के कीबोर्ड  को भूल कर इनस्क्रिप्ट अपनाना पड़ा. पहले रेमिंगटन, फिर शुषा और फिर इनस्क्रिप्ट - सोचिए इन कीबोर्ड में महारत हासिल कर लेने के बाद उन्हें भूल कर नया सीखने को कहा जाए तो क्या होगा? माइक्रोसॉफ़्ट के इंडिकआईएमई व बरहा में एक से अधिक हिंदी कीबोर्ड मिलने लगे थे, मगर ये लिनक्स तंत्रों में चलते नहीं थे.

इस बीच हिंदी के कई तरह के फ़ॉन्ट व कीबोर्ड प्रचलित हुए. तमाम छोटे बड़े वेंडरों ने अपने मुताबिक स्टाप गेप अरेंजमेंट के तहत तात्कालिक उपाय निकाले और माल बाजार में ठेल दिए. इस कारण हिंदी कंप्यूटिंग बाजार में 200 से अधिक कीबोर्ड चलते रहे. अलबत्ता सर्वाधिक प्रचलित अभी भी हैं - कृतिदेव और चाणक्य. कृतिदेव फ़ॉन्ट में इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड से लिखने के लिए बालेंदु दाधीच ने एक औजार भी निकाला था, जिसका प्रयोग मैं करता था - मगर मामला यहाँ भी कट-पेस्ट वाला झंझट भरा होता था.

 

अब मेरी इस समस्या का सामाधान ई-पण्डित के नए आइऍमई हो गया है.

नया आइऍमई क्या कर सकता है -

मोटे तौर पर यह इनस्क्रिप्ट कुंजीपट के जरिए यूनिकोड हिंदी, कृतिदेव तथा चाणक्य तीनों में ही मैटर तैयार करता है. यानी अब आपको अपने मैटर को न तो कन्वर्टरों से कन्वर्ट करने की जरूरत है और न ही अलग-अलग डिमांड के मुताबिक अलग अलग कीबोर्ड से टाइप कर मैटर भेजने की जरूरत. हिंदी में भिन्न फ़ॉन्टों में टाइपिंग इतनी आसान कभी नहीं थी.

एक फ़ीडबैक मैं देना चाहूँगा - यदि यह .net से बना है तो इसे लिनक्स तंत्रों के लिए भी कम्पाइल कर जारी किया जाए. या इसका सोर्स कोड मुक्त कर दिया जाए ताकि इसमें और भी चीजें आसानी से जोड़ी जा सकें.

 

इस औजार की अन्य सुविधाएँ हैं-

 

 

» बिना कॉपी-पेस्ट के झंझट के किसी भी ऍप्लिकेशन में सीधे टाइप करने की सुविधा।
» यूनिकोड हिन्दी एवं लिगेसी फॉण्टों में टाइप करने की सुविधा। चाणक्य तथा कृतिदेव फॉण्टों हेतु समर्थन।
» लिगेसी फॉण्टों हेतु शुद्धतम ऍल्गोरिद्म। संयुक्ताक्षरों तथा मात्राओं आदि को किसी भी अन्य नॉन-यूनिकोड टैक्स्ट ऍडीटर की तुलना में अत्यधिक शुद्धता से रैण्डर करता है।
» Ctrl कुञ्जी से बिना भाषा बदले बहुधा प्रयोग होने वाले रोमन चिह्न भी टाइप किये जा सकते हैं जिससे बार-बार हिन्दी-अंग्रेजी में कूद-फाँद नहीं करनी पड़ती।
» डिफॉल्ट फॉण्ट, अंकों का प्रारुप, विण्डोज़ के साथ ऑटोस्टार्ट होने आदि सैट करने की सुविधायें।
» विशेष चिह्नों को बटनों द्वारा आसानी से टाइप करने की सुविधा।
» इन्स्क्रिप्ट न जानने वालों के लिये कीबोर्ड हेतु इन्स्क्रिप्ट लेआउट के स्टीकर छापने की सुविधा।

» प्रयोक्ता गाइड (हैल्प फाइल) अन्य ऑनलाइन उपयोगी कड़ियों सहित।
» छोटा आकार एवं सरल इंस्टालेशन।
» व्यावसायिक स्तर का सॉफ्टवेयर होने के बावजूद निःशुल्क।

 

औजार की कार्यप्रणाली सम्बन्धी सम्पूर्ण जानकारी, कीबोर्ड लेआउट, टिप्स तथा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रोग्राम के साथ संलग्न यूजर गाइड में दिये गये हैं।

प्रोग्राम की डाउनलोड कड़ी व अन्य विस्तृत जानकारी हेतु यहाँ http://epandit.shrish.in/labs/ePanditIME/ जाएँ.

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ई-पण्डित को साधुवाद.

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वीडियो गेम को रीडिफ़ाइन करने में काइनेक्ट ने बड़ा कमाल किया है, और ये अच्छा खासा सफल और लोकप्रिय रहा है. इसका एपीआई अब सब के लिए खोल दिया गया है, इसका मतलब है कि देखते ही देखते इसके सैकड़ों अकल्पनीय प्रयोग भी सामने आएंगे.

काइनेक्ट वस्तुतः वेब कैम के सहारे फेस व बॉडी रिकग्नीशन के जरिए कॉम्प्लैक्स कंप्यूटिंग इनपुट हासिल कर उनका संपादन करता है. काइनेक्ट के जरिए आप अपने हाथों और पैरों को वास्तविक रूप में चला कर एक तरह से एक्सरसाइज करते हुए गेम खेल सकते हैं.

काइनेक्ट चूंकि पूर्णतः एक गेमिंग कंसोल उपकरण है, अतः यह महंगा उपकरण है.

अभी हाल ही में मुझे एक नए वेब कैम की जरूरत पड़ी तो सस्ता सा इंटेक्स आईटी 305 डबल्यूसी उठा लाया. वैसे तो यह प्लग-एंड प्ले है, परंतु इसके साथ एक सीडी भी थी और एक दो पन्ने का यूजर मैनुअल. यूँ ही सरसरी निगाह यूजर मैनुअल में मारी तो पाया कि अरे! यह तो ग़रीबों का काइनेक्ट है.

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(बच्चों के लिए एक छोटा सा मजेदार खेल - आप जहाँ जहाँ अपना सिर ले जाएंगे - वहाँ वहाँ नाक से पानी टपकता रहेगा)

इस वेब कैम के साथ आए सीडी में में फेस व हैंड रिकग्नीशन सिस्टम के साथ बढ़िया तरीके से काम करने वाले कुछ मजेदार खेल हैं. इन खेलों को काइनेक्ट की तरह ही बिना किसी माउस अथवा कीबोर्ड के, इस वेब कैम के सामने अपना सिर व अपने हाथों को हिलाकर कर कंट्रोल कर सकते हैं. गेम जरूर छोटे हैं, धीमे हैं और रिस्पांस थोड़ा टाइमलैग के साथ व स्लगिश है, मगर एक पांच सौ रुपल्ली के वेब कैम में आपको और चाहिए?

मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ जब मैं मॉनीटर के सामने बैठूं और फ़ाइल मेन्यू में कमांड अपने पलकों को झपका कर दूं. इससे कम से कम मेरी आँखों में आ रही शुष्कता तो दूर होगी और कुछ एक्सरसाइज भी, साथ ही साथ उंगलियों के कार्पेल टनल सिंड्रोम का इलाज भी होगा.

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(बेहतरीन भारतीय भित्तिचित्र)

भारतीय रेलों के डिब्बों के भीतरी हिस्सों में और टॉयलेट पर ग्रेट इंडियन ग्रेफ़ीटी -  अजीबोग़रीब चित्रकला के नमूने आप सभी ने देखे होंगे. पर ये एकदम अलग किस्म का है - बिलकुल अनदेखा.

लगता है किसी विद्यार्थी ने ट्रांजिस्टर सर्किट को याद रखने की कोशिश तब की है जब वो परीक्षा देने जा रहा था.

पर, पास ही पारंपरिक चित्र में किसी दिलजले अभिषेक का हृदय खूना-खून भी हो रहा है. बाजू के सर्किट को देखकर? शायद हाँ, शायद ना!

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गूगल ब्लॉगर के गूगल+ में शामिल होने व उसके नाम में (अफ़वाहें हैं कि ब्लॉगर की जगह गूगल ब्लॉग नाम होने जा रहा है) परिवर्तन की अफ़वाहों के बीच एक बड़ा परिवर्तन आज नमूदार हुआ.
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इसका यूआई रीडिजाइन किया हुआ, एकदम साफ सुथरा और इस्तेमाल में आसान और तेज है.
हो सकता है कि नए रीडिजाइन ब्लॉग में अतिरिक्त सुविधाएँ भी मिलें. एक बड़ी सुविधा की मांग बहुत समय से है - डिस्कशन स्टाइल में कमेंटिंग सिस्टम. देखते हैं यह कब मिलता है.
बस, एक समस्या है. सेटिंग में हिंदी रखे रहने के बावजूद अभी हिंदी यूआई ग़ायब है और उसे वापस लाने  के लिए जुगाड़ नहीं दिख रहा. शायद कुछ दिनों में यह भी आए.
हैप्पी ब्लॉगिंग

अद्यतन  - इसका नया ऑनलाइन एडीटर भी बढ़िया है.
इंटरफ़ेस के कुछ लिंक काम नहीं कर रहे, व कुछ लिंक गलत पाइंट कर रहे हैं.
लगता है इस अदला बदली में कुछ दिन समस्या बनी रहेगी.

यदि आपको गुटखा खाने की लत है और आपको किसी ऐसी जगह तीन घंटे के लिए (मसलन मल्टीप्लैक्स इत्यादि,) जाना है जहाँ गुटखा ले जाने की पाबंदी है तो आप क्या जुगाड़ करेंगे?

 

आपके लिए तो बढ़िया, सरल सा जुगाड़ है.

न तो आपको अपने जूतों के तसलों में गुप्त खाना बनवाने की जरूरत है और न ही अंतर्वस्त्रों में छुपाकर ले जाने की जरूरत है.

आजकल मोबाइल सर्वत्र, सर्वव्यापी है. मोबाइल की बैटरी निकालिए, उसके बैटरी वाले खाने में गुटखे का पाउच रखिए, और बस ले चलिए.

हिंट - 1- एक से अधिक पाउच रखने के लिए बड़ी बैटरी वाला मोबाइल रखें, न कि दो या अधिक मोबाइल.

हिंट - 2 - बैटरी अलग से जेब में न रखें.

बैटरी अलग से रखने पर चेकिंग में पकड़े जाने का खतरा रहता है. चेकिंग के दौरान  (नीचे) चित्र में दिया गया मोबाइल में रखा पाउच  दो-दो मोबाइल रखने व दोनों की ही बैटरी अलग निकाल कर जेब में रखने की वजह से ही पकड़ में आया!

 

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यदि आपके प्लास्टिक के स्टूल का एक पाया टूट जाए तो आप क्या करेंगे?

अ - उसे रद्दी में बेच देंगे

ब - उसे कूड़े दान में डाल देंगे

स - उसे कबाड़ वाले को मुफ़्त में दे देंगे

द - उसके टूटे पाए को बोल्ट से जोड़कर प्रयोग में लेंगे

 

सही जवाब - (द)

देखिए, कि ये कैसे करें -

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हाँ, स्टूल के बाकी के तीन पैरों को काट कर बैलेंस करना न भूलें!

(जुगाड़ - स्थानीय ऑटो रिपेयर शॉप पर, अच्छी कंडीशन में, कार्यरत पाया गया)

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जैसा कि चित्र से जाहिर है, यह न तो डेल्ही बेली का डायलॉग है और न ही किसी पर्यावरण प्रेमी का.
किसी टूटे-दिल सोनू की आपबीती कहानी का शीर्षक नहीं है ये?

अंतर्जाल

फ़ेसबुक का इंद्रासन हिलाने आया गूगल+?

इंटरनेट खोज, ईमेल, एप्स के बाद गूगल का नया बड़ा शगूफ़ा

लेखकः रविशंकर श्रीवास्तव | July 1st, 2011

Google Plus- Stream

इंटरनेट पर गूगल की एक नई नवेली सोशल नेटवर्किंग सेवा गूगल+ (उच्चारणः गूगल प्लस) चंद चुनिंदा आमंत्रितों के लिए प्रारंभ हो गई है। यह http://plus.google.com या http://www.google.com/+ पर उपलब्ध है।

Google Plusमाना जा रहा है कि गूगल+ को फ़ेसबुक को मात देने की नीयत से अच्छी खासी मेहनत कर प्रस्तुत किया जा रहा है। गूगल यूं भी इंटरनेट पर खोज और ईमेल से लेकर ऑफ़िस अनुप्रयोगों तक की तमाम तरह की सेवाएं और वेब अनुप्रयोग प्रदान कर उस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व बना बैठा है। माईक्रोसॉफ्ट बिंग के प्रवेश के बाद विगत कुछ दिनों में गूगल की बादशाहत को सबसे बड़ा खतरा फ़ेसबुक से ही रहा है, जिसका प्रयोक्ता ने एक दफा रुख किया तो फिर वहीं की हो कर रह गई, ऐसा मुकाम जो आर्कुट को मयस्सर नहीं हो सका। कई क्षेत्रों में तो इंटरनेट प्रयोग के मामले में फ़ेसबुक ने गूगल को पछाड़ कर पहले स्थान पर कब्जा भी कर लिया है। अफवाह तो ये भी है कि गूगल को उसके घर में घुसकर मात देने के लिए फ़ेसबुक ने ईमेल के पश्चात अब अपना सर्च इंजन लाने की भी योजना बना ली है। संभवतः इस समीकरण को बदलने के लिए ही गूगल ने प्लस नामक यह नया सोशल शगूफ़ा छोड़ा है। अब सवाल यही है कि क्या गूगल+ की ये कोशिश कामयाब होगी?

 

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