आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 20

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

(275)

राजा की खुशामद

प्रसिद्ध दार्शनिक डायोजिनीस दाल-रोटी खा रहे थे। उन्हें दाल-रोटी खाते हुए एक अन्य दार्शनिक अरिस्टीप्पस ने देखा, जो राजा की खुशामद करके आराम से गुजर-बसर कर रहे थे।

अरिस्टीप्पस तपाक से बोले - "यदि तुम भी राजा की जी-हुजुरी करना सीख लो तो इस तरह तुम्हें दाल-रोटी पर गुजारा नहीं करना पड़ेगा। "

डायोजिनीस ने सरलतापूर्वक उत्तर दिया - "यदि तुम दाल-रोटी पर गुजारा करना सीख लो तो तुम्हें राजा की खुशामद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"

(276)

घोड़े की चोरी

नसरुद्दीन के पास एक बेहतरीन घोड़ा था। सभी उससे ईर्ष्या करते थे। उसके कस्बे का एक व्यापारी, जिसका नाम अहमद था, वह घोड़ा खरीदना चाहता था। उसने नसरुद्दीन को उस घोड़े के बदले 100 ऊँट देने का प्रस्ताव दिया पर नसरुद्दीन उस घोड़े को बेचना नहीं चाहता था।

अहमद ने गुस्से में आकर कहा - "मैंने तुम्हें बेहतरीन प्रस्ताव दिया है। यदि तुम शराफत से नहीं मानोगे तो मुझे दूसरे तरीके भी आजमाने पड़ सकते हैं जो तुम्हें पसंद नहीं आऐंगे।"

एक दिन वह रेगिस्तान में भिखारी का रूपधारण करके बैठ गया। उसे पता था कि नसरुद्दीन वहां से गुजरेगा। उसे कराहता हुआ देख नसरुद्दीन को उस पर दया आ गयी और उसने उसका हाल पूछा।

अहमद ने कराहते हुए कहा कि उसने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है और वह इतना कमजोर हो चुका है कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सकता। नसरुद्दीन को उस पर दया आ गई और वह बोला - "मैं तुम्हें अपने घोड़े पर बैठाकर ले चलूंगा और मैं पीछे - पीछे पैदल चल लूंगा।"

जैसे ही नसरुद्दीन ने उसे उठाकर अपने घोड़े पर बैठाया, अहमद ने घोड़े को सरपट दौड़ाना शुरू कर दिया। नसरुद्दीन ने उससे रुकने को कहा। अहमद पीछे मुड़कर जोर से चिल्लाते हुए बोला - "मैंने तुमसे पहले ही कहा था नसरुद्दीन! यदि तुम अपना घोड़ा मुझे नहीं बेचोगे तो मैं उसे चुरा लूंगा।"

नसरुद्दीन बोला - "ठहरो मित्र, एक बात सुनते जाओ! मुझे तुमसे सिर्फ यह कहना है कि घोड़ा चुराने की अपनी यह तरकीब किसी को नहीं बताना।"

अहमद - "क्यों?"

नसरुद्दीन - "यदि किसी दिन सड़क के किनारे पड़े बीमार व्यक्ति को वास्तव में मदद की आवश्यकता होगी तो लोग इस तरकीब को याद कर कभी उसकी मदद नहीं करेंगे।"

नसरुद्दीन के इन शब्दों को सुनकर अहमद का मन ग्लानि से भर गया। वह वापस लौटा और नसरुद्दीन से क्षमा मांगते हुए उसका घोड़ा लौटा दिया।

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30

जब गुरु का ज्ञान मिलता है

सूफ़ी मान्यता है कि किसी व्यक्ति की समस्या का समाधान तब तक नहीं होता जब तक कि उसके गुरु की कृपा दृष्टि का एक अंश उस पर न पड़े.

एक बार एक सूफ़ी संत मृत्युशैय्या पर थे. उन्हें अपने प्रिय तीन नए-नए शिष्यों के भविष्य की चिंता थी कि इन्हें ज्ञान की ओर ले जाने वाला सही गुरु कहाँ कैसे मिलेगा. संत चाहते तो वे किसी सक्षम विद्वान का नाम ले सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और चाहा कि शिष्य स्वयं अपने लिए गुरु तलाशें.

इसके लिए संत ने मन ही मन एक विचित्र उपाय तलाशा. उन्होंने अपने तीनों शिष्यों को बुलाया और कहा – कि हमारे आश्रम में जो 17 ऊँट हैं उन्हें तुम तीनों मिलकर इस तरह से बांट लो – सबसे बड़ा इनमें से आधा रखेगा, मंझला एक तिहाई और सबसे छोटे के पास नौंवा हिस्सा हो.

यह तो बड़ा विचित्र वितरण था, जिसका कोई हल ही नहीं निकल सकता था. तीनों शिष्यों ने बहुत दिमाग खपाया मगर उत्तर नहीं निकला, तो उनमें से एक ने कहा – गुरु की मंशा अलग करने की नहीं होगी, इसीलिए हम तीनों मिलकर ही इनके मालिक बने रहते हैं, कोई बंटवारा नहीं होगा.

दूसरे ने कहा – गुरु ने निकटतम संभावित बंटवारे के लिए कहा होगा

परंतु बात किसी के गले से नहीं उतरी. उनकी समस्या की बात चहुँओर फैली तो एक विद्वान ने तीनों शिष्यों को बुलाया और कहा – तुम मेरे एक ऊँट ले लो. इससे तुम्हारे पास पूरे अठारह ऊँट हो जाएंगे. अब सबसे बड़ा इनमें से आधा यानी नौ ऊंट ले ले. मंझला एक तिहाई यानी कि छः ऊँट ले ले. सबसे छोटा नौंवा हिस्सा यानी दो ऊँट ले ले. अब बाकी एक ऊँट बच रहा है, जो मेरा है तो उसे मैं वापस ले लेता हूँ.

शिष्यों को उनका नया गुरु मिल गया था. गुरु शिष्यों की समस्या में स्वयं भी शामिल जो हो गया था.

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31

जैसा चाहोगे वैसा ही मिलेगा

एक धार्मिक कक्षा में शिक्षक ने अपने शिष्यों को घरू-कार्य दिया कि अगले दिन वे अपने धर्म ग्रंथ से एक एक अनमोल वचन लिख लाएँ, और पूरी कक्षा के सामने उसे पढ़ें और उसका अर्थ बताएं.

दूसरे दिन एक विद्यार्थी ने पूरी कक्षा के सामने पढ़ा – “लेने से ज्यादा अच्छा देना होता है.” पूरी कक्षा ने ताली बजाई.

दूसरे विद्यार्थी ने कहा – “ईश्वर उन्हें पसंद करता है जो हँसी-खुशी अपना सर्वस्व दान करते हैं.” कक्षा में एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी.

तीसरे ने कहा – “मूर्ख सदैव कंगाल बना रहता है.”

उन तीनों ने एक ही धार्मिक किताब से अंश उठाए थे. मगर तीनों की अपनी दृष्टि ने अलग अलग अनमोल वचन पकड़े.

जब आप सोचते हैं, जब आप किसी चीज की विवेचना करते हैं तो यह आपके चेतन-अवचेतन मस्तिष्क और आपकी सोच को ही प्रतिबिंबित करता है. अपनी सोच को धनात्मक बनाए रखें तो काले अक्षरों में भी स्वर्णिम आभा दिखाई देगी.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ।

पढा। मुल्ला जी की प्रेरणा…हर आदमी का अलग दृष्टिकोण।

दाल रोटी में भगवान बसे हैं ।

बाबा भारती की भी घोड़े की कहानी कुछ ऐसी ही थी ।

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