आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 43

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

319

चरमराते हुए पहिये

एक ऊबड़खाबड़ रोड पर दो बैल एक बैलगाड़ी को खींचते ले जा रहे थे। तभी बैलगाड़ी के पहियों से चरमराने की आवाज़ आने लगी। गाड़ीवान ने पहियों को कोसते हुए कहा - "अरे निर्दयी! जब कठोर परिश्रम करके गाड़ी खींचने वाले ये जानवर नहीं कराह रहे हैं तो तुम क्यों शोर मचा रहे हो?"

320

भेड़िया ओर मेमना

नदी के किनारे एक भेड़िये को कुछ दूरी पर एक भटकता हुआ मेमना दिखायी देता है। वह उस पर हमला करके अपना शिकार बनाने का निश्चय करता है। निरीह मेमने के शिकार के लिए वह बहाना ढूंढने लगता है।

वह मेमने पर चिल्लाता है - "अरे दुष्ट! जिस नदी का मैं पानी पी रहा हूँ उसे गंदा करने की तेरी हिम्मत कैसे हुयी?"

मेमना नम्रतापूर्वक बोला - "माफ कीजिए श्रीमान! लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आया कि मैं किस तरह पानी गंदा कर रहा हूँ, जबकि पानी तो आपकी ओर से बहता हुआ मेरे पास आ रहा है।"

"हो सकता है! पर सिर्फ एक वर्ष पहले मैंने सुना था कि तुम मेरी पीठ पीछे बहुत बुराई कर रहे थे।" - भेड़िये ने बात बनाते हुये कहा।

"लेकिन श्रीमान, एक वर्ष पहले तो मैं पैदा ही नहीं हुआ था" - मेमने ने कहा।

"हो सकता है कि तुम न हो। वो तुम्हारी माँ भी हो सकती है। पर इससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं है। अब तुम मेरे भोजन में और व्यवधान नहीं डालो।" - भेड़िये ने गुर्राते हुए कहा और बिना पल गवाये उस निरीह मेमने पर टूट पड़ा।

"एक तानाशाह अपनी तानाशीही के लिए हमेशा कोई न कोई बहाना तलाश लेता है।"

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हीरे की असली कीमत

एक मुर्गे को दाना खोजते समय मैदान में दाने के आकार में तराशा हुआ एक हीरा मिल गया. मुर्गे ने तुरंत उस पर चोंच मारी, मुंह में लिया और जब उसे उसका स्वाद नहीं जमा और जीभ को कड़ा-कड़ा महसूस हुआ तो उसने तत्काल ही उसे वापस थूक दिया.

यह देख हीरा मुर्गे से बोला – ओ मूर्ख मुर्गे, तुम्हें मालूम नहीं मेरी असली कीमत क्या है? मैं एक नवलखा हार में लगा हुआ था, पर यहाँ उसमें से गिर गया हूँ. मैं असली नायाब हीरा हूँ. फुर्सत में तराशा गया और कई राजकुमारियों के गले की शोभा रह चुका हूँ. मैं बेशकीमती हूँ, और तुम मुझे यूं ही फेंक कर चले जा रहे हो?

मुर्गे ने उसकी ओर निस्पृह सी दृष्टि डाली और गर्व से बोला – तुम्हारी कीमत और खासियत तुम अपने पास रखो, मेरी नजर में तो तुम्हारी कीमत गेंहू के एक दाने के बराबर भी नहीं है!

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72

मैं एक बार कमिटमेंट कर दूं तो...

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर मित्र राष्ट्रों के सम्मेलन में विंस्टन चर्चिल के साथ रूस के जोसफ स्तालिन व अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमेन विविध संधियों पर हस्ताक्षर कर रहे थे.

ट्रूमेन ने पाया कि विंस्टन चर्चिल हर संधि के ब्यौरों पर हस्ताक्षर करने से पहले खूब बहस करते थे और मतभेदों को दूर होने से पहले तक हस्ताक्षर नहीं करते थे.

इसके विपरीत स्तालिन बड़े ही दोस्ताना अंदाज में पेश आते थे और हर संधि पर बिना किसी मतभेद पैदा किए हस्ताक्षर कर देते थे.

बाद में जब इन संधियों को लागू करने की बारी आई तो विंस्टन चर्चिल ने उन्हें अक्षरशः लागू करवाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जबकि स्तालिन ने संधियों की परवाह किए बगैर अपनी मर्जी से जो चाहा वैसा किया.

ट्रूमेन को चर्चिल और स्तालिन के तब के व्यवहार में अंतर अब समझ में आया. स्तालिन शुरू से ही संधि को हल्के में ले रहे थे, जबकि चर्चिल पूरे कमिटमेंट के साथ हस्ताक्षर कर रहे थे.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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बहोत अच्छी कहानी ।

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ये किताब खरीद ली है. लेकिन लग रहा है मेरे यहाँ जबतक पंहुचेगी उससे पहले पूरी तो आपके यहाँ ही पढ़ लूँगा :)

तानाशाही रवैया बेहतर अंदाज में पेश किया है।

स्तालिन ही सही जँच रहा है इन जैसे ठगों के लिए।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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