बुधवार, 28 दिसंबर 2011

वाय दिस कोलावरी डी?

 

कोई दो-एक हफ़्ते एक अख़बार (जी हाँ, आपने सही पढ़ा, अख़बार में,) में सुबह-सुबह पढ़ा कि यू-ट्यूब पर कोलावरी डी नामक कोई म्यूजिक वीडियो लीक हो गया है और वो वायरल हो गया है. घंटे भर बाद ऑनलाइन हुआ तो दो तीन ईमेल और इतने ही न्यूज फ़ीड गा रहे थे – वाय दिस कोलावरी डी? एक में तो बाकायदा लिंक भी था.

कोलावरी वायरल हो गया था तो इधर भी इन्फ़ैक्शन होना ही था. देखने के लिए कि कोलावरी क्यों इतना भयंकर रूप से वायरल हो रहा है, यू-ट्यूब लिंक पर क्लिक किया तो जाने अनजाने हमने भी वहाँ आंकड़ा बढ़ाने में अपना योगदान कर ही दिया. वहाँ धनुष गा रहे थे – वाय दिस कोलावरी डी? बाजू में संबंधित वीडियो की सूची में कोलावरी रीमिक्स, हिंदी कोलावरी, लेडी कोलावरी, इंस्ट्रूमेंटल कोलावरी और न जाने क्या क्या कोलावरी मौजूद थे. इतने कम समय में इतने सारे वाय दिस कोलावरी डी?!

थोड़ी देर में ब्लॉग जगत की हलचल लेने चले तो यहाँ भी लेटेस्ट पोस्टों में वाय दिस कोलावरी डी? के दर्शन होने लगे. कहीं वीडियो का लिंक था तो कहीं एमपी3 गाने डाउनलोड का तो कहीं पर पूरा गीत लिखा हुआ था. नाश्ते के समय आदतन रेडियो मिर्ची लगाया तो जो पहला गाना सुनाई दिया वो था - वाय दिस कोलावरी डी? धनुष पें पें पें की ट्यून को चेंज करने की बात कह रहे थे. मेरे भी दिमाग में वाय दिस कोलावरी डी? जम चुका था और कुछ भी पढ़ता लिखता दिमाग में गूंजता - वाय दिस कोलावरी डी?

शाम को सब्जी लेने गया तो टमाटर तौलते तौलते सब्जी वाला गा रहा था – वाय दिस कोलावरी डी? एक अन्य ग्राहक वहीं टमाटर छांट रहा था. इतने में उस ग्राहक का मोबाइल फ़ोन बजा. उसमें बजा - वाय दिस कोलावरी डी? जाहिर है, उसने भी वही कॉलर ट्यून लगा रखा था - वाय दिस कोलावरी डी?

रात को एक मित्र के यहाँ जाना था. डरते डरते घंटी बजाई कि डोर बेल की ट्यून वाय दिस कोलावरी डी? न हो. थोड़ी सी राहत मिली की दरवाजे की घंटी की ट्यून वही पुरानी वाली ओम जय जगदीश हरे ही थी. दरवाजा मित्र के किशोर पुत्र ने खोला. मैं सोफ़े पर बैठता इससे पहले ही उसने मुझसे पूछा – अंकल आप ये वाला बढ़िया गाना सुनेंगे? आज ही मैंने अपने मोबाइल में डाउनलोड किया है. मेरा माथा ठनकता इससे पहले उसने गाना चालू कर दिया - वाय दिस कोलावरी डी? पीछे से उसकी छोटी बहन चली आई. उसने कहा – अंकल मेरे को ये वाय दिस कोलावरी डी? पूरा गाना आता है, सुनाऊँ? और, इस बार भी, जाहिर है वाय दिस कोलावरी डी? पूरा सुनना पड़ा.

देर रात को थकाहारा रिमोट हाथ में लिया बैठा न्यूज चैनल लगाने की सोच रहा था कि कहीं आज-तक या टाइम्स-नाऊ में भी वाय दिस कोलावरी डी? से मुठभेड़ न हो जाए. क्योंकि दोपहर भर हर म्यूजिक चैनल चाहे वो एमटीवी हो या चैनल वी – सभी बारी बारी से दस-दस मिनट के अंतराल में बजा रहे थे वाय दिस कोलावरी डी? गोया कि ये दुनिया का आखिरी गीत हो और उसे आखिरी वक्त में चाहे जितना बजा लो! क्या पता आगे मौका मिले या न मिले!!

इतने में चाय का कप लिए श्रीमती जी आईं. जब आप दिनभर पक चुके हों, तो इत्मीनान से लिए गए चाय का एक घूँट गजब की तसल्ली देता है. श्रीमती जी ने चाय का कप मुझे पकड़ाते हुए गुनगुनाया - वाय दिस कोलावरी डी?

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8 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. और हम आपका ब्लॉग पढने आये तो यहाँ भी :)

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  2. बेनामी5:42 pm

    it is a best example of mouth publicity
    ravi soni

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  3. सच में हर कोई गा रहा था ट्रेन में, कोलावरी...

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  4. sach men sab ke munh se kolavari di hi sunne men aa raha tha lekin jitni teji se chadha utni hi tezi se utra bhi

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  5. :-)

    इस गाने में क्या जादू है... साढ़े तीन साल का आदि भी दीवाना है... दिन भर गाता और देखता है..

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