टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

December 2011

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व्यंज़ल

 

डरे हुए हैं मेरे शहर के लोग

मरे हुए हैं मेरे शहर के लोग

 

कभी तो चिंगारी सुलगेगी

भरे हुए हैं मेरे शहर के लोग

 

जब भी परीक्षा की घड़ी आई

खरे हुए हैं मेरे शहर के लोग

 

बात बे बात लाल पीले फिर

हरे हुए हैं मेरे शहर के लोग

 

देश को चने के खेत सा रवि

चरे हुए हैं मेरे शहर के लोग

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

327

प्रेम की देवी "वीनस ' और बिल्ली

एक बार एक बिल्ली को एक नौजवान से प्यार हो गया। उसने प्रेम की देवी "वीनस' से प्रार्थना की कि वे उसे एक सुंदर लड़की बना दें।

देवी वीनस को उस पर तरस आ गया और उन्होंने बिल्ली को एक सुंदर लड़की बना दिया। परिणाम स्वरूप वह नौज़वान सुंदर लड़की बनी बिल्ली के प्रेम पाश में फंस गया और उसने उससे विवाह कर लिया।

एकदिन वे दोनों कमरे में बैठे थे, तब वीनस ने यह जानने के लिए कि बिल्ली ने अपने रूप के साथ-साथ अपनी प्रकृति को बदला है या नहीं, उसके सामने एक चूहा फेंका।

जैसे ही बिल्ली ने उस चूहे को देखा, वह भूल गयी कि अब वह एक लड़की है। वह तुरंत चूहे पर झपटी और उसे अपने मुँह में दबोच लिया। इस भयावह दृश्य से क्रोधित होकर प्रेम की देवी ने उसे दोबारा बिल्ली बना दिया।

"अपनी जन्मजात आदतों को बदलना बहुत मुश्किल है।'

328

किसे नौकरी मिली

एक व्यापारी को एक क्लर्क की आवश्यकता थी। उसने क्लर्क के पद पर भर्ती के लिए विज्ञापन दिया। उसे कई आवेदन प्राप्त हुए। उसने बारह अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया। व्यापारी ने एक-एक करके उन्हें कमरे में बुलाया और अंत में एक अभ्यर्थी का चयन किया।

उस व्यापारी का मित्र भी साक्षात्कार कक्ष में मौजूद था। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस लड़के का चयन हुआ है, वह अन्य लड़कों की तुलना में उतना योग्य नहीं था। उसने अपने मित्र से प्रश्न किया - "तुमने इस लड़के को ही क्यों चुना ? वह तो हाईस्कूल उत्तीर्ण भी नहीं है और इस नौकरी के लिए कम पढ़ा-लिखा है ?'

व्यापारी ने उत्तर दिया - "तुम सही कर रहे हो कि यह लड़का हाई स्कूल भी उत्तीर्ण नहीं है। लेकिन तुम यह गलत कह रहे हो कि उस लड़के के पास इस नौकरी के लायक योग्यता नहीं है। वास्तव में वह बहुत योग्य है।'

व्यापारी ने आगे कहा - "सबसे पहले जब उसने कमरे में प्रवेश किया, तो अंदर आने के बाद उसने आहिस्ता से दरवाज़े को बंद किया। यह दर्शाता है कि वह सावधान व चिंतनशील व्यक्ति है और दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखता है। फिर उसने जमीन पर पड़ी किताब को उठाकर मेज पर रखा। इसके अलावा उसके बाल ठीक से झड़े हुए थे और कपड़े पुराने होने के बावजूद साफ और व्यवस्थित थे। इससे अधिक और क्या योग्यता हो सकती है किसी व्यक्ति में ?'

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80

असली गुनहगार

यह कहानी गांधी जी की जीवनी से है.

परंतु यह कहानी ‘महात्मा गांधी’ की कहानी नहीं है, बल्कि एक आम, नटखट किस्म के बच्चे मोहन की कहानी है.

एक बार मोहन ने वास्तव में बड़ी शरारत की. उन्होंने घर से सोने का गहना चुराया और बाजार में बेच दिया, और इसके बारे में झूठ भी बोला. जब मोहन के पिता ने यह सुना तो उन्होंने मोहन को बुलाया और कहा – “मोहन, मुझे पता है कि तुमने यह चोरी की है, और झूठ भी बोला है.”

पिता के सामने अपनी करतूत खुल जाने के कारण मोहन की बोलती बंद थी. उनके पिता धीरे से उठे और एक छड़ी निकाली. मोहन को यह भय लगा कि अब उनकी छड़ी से धुनाई होगी. उनके पिता ने अपनी कमीज की बांह ऊपर समेटी. छड़ी भारी व मोटी थी. डर के कारण मोहन पसीना पसीना हो रहे थे.

परंतु पिता ने मोहन को छड़ी से पीटने के बजाए, अपने आप को पीटना शुरू कर दिया. मोहन ने कहा – “यह क्या कर रहे हैं पिता जी, अपने आप को क्यों सज़ा दे रहे हैं?”

मोहन के पिता ने जवाब दिया - “मैं ही सज़ा का हकदार हूं. मैं तुम्हारा पिता हूँ, तुममें अच्छे संस्कार लाने की जिम्मेदारी मेरी है. मैं इस जिम्मेदारी में असफल हो गया हूँ. अतः मुझे सज़ा भोग लेने दो!”

मोहन के लिए यह एक सबक था. ताउम्र यह घटना उनके जेहन में जीवंत बनी रही...

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तेतसुगन के तीन सूत्र

जेन गुरु तेतसुगन ने एक बार चीनी सूत्रों को प्रकाशित करने का संकल्प लिया. चीनी सूत्रों को लकड़ी के ब्लॉक में उकेर कर ही छपवाया जा सकता था जो बेहद लंबा व धन-ऊर्जा खर्चने वाला कार्य था. तेतसुगन ने इसके लिए चंदा प्राप्त करने के लिए यात्रा प्रारंभ की. यात्रा में लोग यथा शक्ति दान देते, जो कि अकसर बेहद मामूली ही होती थी. परंतु वे हर दानदाता को उसी जज्बे व दिल से धन्यवाद देते थे. दस वर्ष की यात्रा के पश्चात उनके पास इस कार्य के लिए पर्याप्त धन एकत्र हो गया था.

परंतु उसी समय ऊजी नदी में भीषण बाढ़ आ गई और अकाल भी पड़ गया. तेतसुगन ने अपने पास की सारी जमा पूंजी नागरिकों की सेवा सुश्रूषा में लगा दी और सूत्रों के प्रकाशन हेतु नए सिरे से चंदा एकत्र करना प्रारंभ कर दिया.

कई वर्षों के पश्चात् उनके पास फिर चीनी सूत्रों को प्रकाशित करने लायक पर्याप्त धन एकत्र हो गया. परंतु दैवयोग से उन्हीं दिनों महामारी फैल गई. तेतसुगन ने फिर से एक बार अपनी तमाम एकत्र पूंजी महामारी से निपटने में लगा दी. और तीसरी बार फिर चंदा लेने यात्रा पर निकल पड़े.

अंततः तीसरी बार, कोई बीस वर्ष पश्चात् उन्हें अपने इस कार्य को पूरा करने में सफलता मिली.

जापानी कहते हैं कि तेतसुगन ने तीन सूत्र प्रकाशित किए. और, पहले के दो अदृश्य सूत्र तो इस तीसरे वाले से भी ज्यादा उत्तम हैं.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

325

तैरने गया लड़का

एक लड़का नदी में तैर रहा था। तैरते-तैरते वह दूर तक चला गया और डूबने लगा। सौभाग्य से, वहाँ से एक व्यक्ति गुजर रहा था। लड़के ने पूरी ताकत से उस व्यक्ति को आवाज़ लगाकर मदद मांगी।

उस व्यक्ति ने तत्काल सहायता देने के बजाए लड़के को उसके मूर्खतापूर्ण कार्य और गहरे पानी में तैरने के लिए फटकारना शुरू कर दिया। अंततः लड़के ने चिल्लाते हुए कहा - "श्रीमान कृपया पहले मेरी जान बचाये, बाद में उपदेश दीजियेगा।'

"व्यावहारिक मदद के बिना कोई भी परामर्श व्यर्थ होता है।'

326

शिकारी और लकड़हारा

एक शिकारी जंगल में शेर के शिकार के लिए गया। जंगल में उसे एक लकड़हारा मिला। शिकारी ने उससे पूछा कि क्या उसने शेर के झुंड को देखा है और क्या वह जानता है कि शेर की मांद कहां है।

बोला -"जी हाँ, श्रीमान! और यदि आप मेरे साथ आयें तो मैं आपकी मुलाकात शेर से कर भी सकता हूँ।'

यह सुनते ही शिकारी का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया और उसके दाँत कटकटाने लग गए। घबराते हुए वह बोला - "जी कोई बात नहीं दरअसल मैं तो शेर के झुंड की तलाश में था, किसी एक शेर की तलाश में नहीं।'

"दूर से तो कायर भी बहादुरी दिखा सकता है।'

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78

प्रार्थना -3

एक बार अकबर बादशाह शिकार के लिए घने जंगलों में गए. वहाँ दोपहर की नमाज का समय होने पर वहीं जंगल में वे नमाज पढ़ने लगे.

इसी बीच एक किसान महिला बड़ी बदहवासी में दौड़ती चली आई. उसका पुत्र जंगल में खो गया था वह उसे ही सुबह से ढूंढ रही थी. बेध्यानी में उसने बादशाह को नमाज पढ़ते नहीं देखा और उसके पैर का ठोकर बादशाह को लग गया. मगर वह महिला रुकी नहीं और अपने पुत्र को ढूंढने आगे बढ़ गई. बादशाह को नमाज में विघ्न महसूस हुआ, मगर एक सच्चे नमाजी की तरह उन्होंने अपना मुंह बंद ही रखा.

बादशाह का नमाज खत्म हो गया था, और वे वहां से जाने ही वाले थे कि वही महिला अपने पुत्र के साथ वापस लौट रही थी. उसका पुत्र उसे मिल गया था लिहाजा वह बेहद प्रसन्न थी. बादशाह को देखकर उसे याद आया कि अरे थोड़ी देर पहले इसी पर तो मेरा पैर पड़ गया था. वह डर गई.

मगर उसे देखते ही बादशाह का पारा गर्म हो गया और उन्होंने महिला से कहा – तुम्हें नमाज पढ़ता बादशाह दिखाई नहीं दिया? और तुम मुझ पर पाँव धर कर चली गई? तुम्हारी इस बदसलूकी की सज़ा मिलेगी.

महिला का डर अचानक जाता रहा. उसने कहा – जहाँपनाह, मैं अपने पुत्र को ढूंढने में इतना निमग्न थी कि मुझे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था. तो मैं आपको कैसे देखती. मगर आप भी तो नमाज पढ़ रहे थे. ईश्वर को आप भी ढूंढ रहे थे. यदि आप भी मेरी तरह अपने काम में निमग्न होते तो क्या मुझे देख पाते?

अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ. जो बात आज तक किसी विद्वान ने नहीं सिखाई थी, आज इस किसान महिला ने उसे सिखा दिया था.

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79

ऐसे में तो दोस्ती बेहतर है!

मनोचिकित्सक के पास एक आदमी पहुँचा और अपना दुखड़ा कुछ यूँ सुनाया – डॉक्टर, पिछले कई महीनों से नित्य मेरे सपने में एक दैत्य आता है, और अजीब अजीब हरकतें करता है, जिससे मैं रातों में डर जाता हूँ और सो नहीं पाता. कृपया मेरा इलाज कीजिए.

डॉक्टर ने उस आदमी का चिकित्सकीय परीक्षण किया और कहा – आप पूरी तरह से ठीक हो जाएंगे, मगर इलाज लंबा चलेगा. छः महीने से ऊपर लग सकते हैं और पूरे इलाज का खर्चा होगा 25 हजार रुपए.

वह आदमी उठ खड़ा हुआ और वहाँ से चलते-चलते बोला – धन्यवाद. छः महीने और 25 हजार रुपए! इससे बेहतर तो यह होगा कि मैं उस दैत्य से दोस्ती कर लूं.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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और, यह किसी फेकिंग न्यूज की हेडलाइन नहीं है.

जी हाँ!!!

गूगल पर हिंदी के सर्च इंजन की बेहद जरूरत है.

साथ ही हिंदी के स्पेल चेक की!

यह मेरा नहीं, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति, कुठियाला महोदय का कहना है.

और इस समचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया है भारत के नंबर 1 हिंदी समाचार पत्र - दैनिक भास्कर ने.

जबकि गूगल में हिंदी सर्च बाबा आदम के जमाने से अंतर्निर्मित है, और गूगल के तमाम उपक्रमों में उन्नत स्तर की हिंदी की वर्तनी जाँच की सुविधा भी पिछले कई वर्षों से उपलब्ध है.

 

यह सही है कि हम सभी को सभी चीज का ज्ञान नहीं हो सकता. मगर विद्वानों का सही कहना भी तो है - गधा तब तक ही विद्वान बना रहता है, जब तक कि वो रेंकना न शुरू कर दे!

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

323

ज्यूपिटर, नेप्च्यून, मिनर्वा और मोमस

एक कथा के अनुसार स्वर्ग में ज्यूपिटर(बृहस्पति), नेप्च्यून(वरुण) और मिनर्वा(ग्रीक मान्यता के अनुसार कला और ज्ञान की देवी) में यह शर्त लग गयी कि उनमें से कौन इस संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु बना सकता है। मोमस भी स्वर्ग में रहने वाले एक देवता थे। उन्हें इस प्रतियोगिता का निर्णायक बनाया गया।

ज्यूपिटर ने इंसान, मिनर्वा ने घर और नेप्च्यून ने सांड को बनाया। निर्णायक की सीट पर बैठे मोमस ने सभी रचनाओं में दोष निकालने शुरू कर दिये। सबसे पहले उसने सांड में यह दोष निकाला कि उसके सींग आँखों के नीचे नहीं हैं जिससे वह उन्हें देख नहीं पाता।

फिर उसने इंसान में यह दोष ढूंढा कि उसकी छाती में कोई खिड़की नहीं है जिससे उसके मन के विचार और भावनायें दिखायी नहीं देतीं है।

अंत में उसने घर में दोष निकाला कि इसमें पहिए नहीं लगे हैं। पहिए न होने के कारण उसके निवासी उसे बुरे पड़ोसियों से दूर नहीं ले जा सकते।

जैसे ही मोमस ने अपना निर्णय समाप्त किया, ज्यूपिटर ने उसे स्वर्ग से बाहर का रास्ता दिखा दिया और कहा कि किसी भी रचना में दोष निकालना बहुत आसान है। उसे दूसरों की रचना में तब तक दोष निकालने का हक़ नहीं है, जब तक वह स्वयं कोई अनूठी रचना न करे।

"किसी दूसरे की रचना में दोष निकाना सबसे आसान काम है।"

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सर्वोत्तम सेब

मुल्ला नसरुद्दीन ने अपना भाषण समाप्त ही किया था कि भीड़ में खड़े उनके एक निंदक ने उनसे कहा - "आध्यात्मिक सिद्धांतों को बघारने से तो अच्छा यह होगा कि तुम कुछ व्यावहारिक बात बताओ।"

बेचारे नसरुद्दीन भौचक रह गए और उससे बोले - "आप मुझसे किस तरह का व्यावहारिक ज्ञान दिखवाना चाहते हैं?"

इस बात से खुश होकर कि उसने नसरुद्दीन को चारों खाने चित कर दिया, भीड़ पर रौब जमाता हुया वह व्यक्ति बोला - "उदाहरण के लिए तुम स्वर्ग के बगीचे के एक सेब को दिखाओ।"

नसरुद्दीन ने तत्काल एक सेब तोड़ा और उसे थमा दिया। सेब देखकर वह व्यक्ति बोला - "लेकिन यह सेब तो एक ओर से सड़ा है। स्वर्ग के बगीचे का सेब तो सर्वोत्तम होना चाहिए।"

नसरुद्दीन ने तपाक से उत्तर दिया - "तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो कि स्वर्ग का सेब सर्वोत्तम होना चाहिए। लेकिन तुम्हारी औकात के हिसाब से यही सेब सर्वोत्तम है। तुम्हें इससे अच्छा सेब नहीं मिल सकता।"

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दृष्टि रावण सी या विभीषण सी?

युद्ध में पराजित रावण मृत्यु शैय्या पर पड़े अंतिम सांस गिन रहे थे. राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा कि रावण प्रकाण्ड विद्वान है, अतः उससे कुछ ज्ञान प्राप्त कर आओ.

लक्ष्मण रावण के पास गए और अपनी इच्छा का इजहार किया. रावण ने लक्ष्मण को बहुत सी ज्ञान की, राजनीति की और लोकाचार की बातें बताई. तब लक्ष्मण ने रावण से पूछा - आप तो प्रकाण्ड विद्वान हैं, शिष्टाचार की बातें बता रहे हैं, मगर फिर भी आपने सीता माँ का अपहरण क्यों किया?

रावण ने बिना किसी पश्चाताप के कहा – मैं राक्षस कुल में पैदा हुआ और इस तरह की बातें अपने रोजमर्रा जीवन में देखता था. इसीलिए मैंने भी यह कार्य कर डाला.

लक्ष्मण को अचरज हुआ. विभीषण भी तो उसका भाई था, जो उसके विपरीत आचरण वाला था. वह सीधे विभीषण के पास गया और पूछा – आप राक्षस कुल में पैदा हुए, रोजमर्रा जीवन में राक्षसी कर्म को आपने देखा फिर भी आपके मन में दैवत्व कहाँ से आ गया?

विभीषण ने जवाब दिया – यह सही है कि मैं राक्षस कुल में पैदा हुआ, मगर प्रारंभ से ही मैं इस तरह के राक्षसी कर्म और अन्याय को नापसन्द करता था और मैंने प्रण किया था कि ऐसे काम मैं कभी नहीं करूंगा तथा लोगों को भी ऐसे कार्य करने से भरसक मना करूंगा.

परिस्थितियाँ बेशक महत्वपूर्ण हो सकती हैं, मगर ये आपको अलग तरीके से सोचने के लिए रोक नहीं सकतीं. थिंक डिफ़रेंटली!

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77

इच्छा

एक विद्यार्थी था. उसे विविध विषयों पर ज्ञान की प्राप्ति का बड़ा शौक था. उसने प्रकाण्ड विद्वान सुकरात का नाम सुन रखा था. ज्ञान की लालसा में एक दिन अंततः वह सुकरात के पास पहुँच ही गया और सुकरात से पूछा कि वह भी किस तरह से सुकरात की तरह प्रकाण्ड पंडित बन सकता है.

सुकरात बहुत कम बात करते थे. विद्यार्थी को यह बात बोलकर बताने के बजाए उसे वे समुद्र तट पर ले गए. जब किसी बात को सिद्ध करना होता था तब सुकरात इसी तरह की विचित्र किस्म की विधियाँ अपनाते थे. समुद्र तट पर पहुँच कर वे बिना अपने कपड़े उतारे समुद्र के पानी में उतर गए.

विद्यार्थी ने समझा कि यह भी ज्ञान प्राप्ति का कोई तरीका है, अतः वह भी सुकरात के पीछे पीछे कपड़ों सहित समुद्र के गहरे पानी में उतर पड़ा. अब सुकरात पलटे और विद्यार्थी के सिर को पानी में बलपूर्वक डुबा दिया. विद्यार्थी को लगा कि यह कुछ बपतिस्मा जैसा करिश्मा हो जिसमें ज्ञान स्वयमेव प्राप्त हो जाता हो. उसने प्रसन्नता पूर्वक अपना सिर पानी में डाल लिया. परंतु एकाध मिनट बाद जब उस विद्यार्थी को सांस लेने में समस्या हुई तो उसने अपना पूरा जोर लगाकर सुकरात का हाथ हटाया और अपना सिर पानी से बाहर कर लिया.

हाँफते हुए और गुस्से से उसने सुकरात से कहा – ये क्या कर रहे थे आप? आपने तो मुझे मार ही डाला था!

जवाब में सुकरात ने विनम्रता पूर्वक विद्यार्थी से पूछा – जब तुम्हारा सिर पानी के भीतर था तो सबसे ज्यादा जरूरी वह क्या चीज थी जो तुम चाहते थे?

विद्यार्थी ने उसी गुस्से में कहा – सांस लेना चाहता था और क्या!

सुकरात ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – जिस बदहवासी से तुम पानी के भीतर सांस लेने के लिए जीवटता दिखा रहे थे, वैसी ही जीवटता जिस दिन तुम ज्ञान प्राप्ति के लिए अपने भीतर पैदा कर लोगे, तो समझना कि तुम्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई है.

इच्छा सभी करते हैं, सवाल जीवटता पैदा करने का है.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

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हवा और सूरज

एक दिन हवा और सूरज में इस बात को लेकर नोकझोक हो गयी कि उनमें से कौन ज्यादा ताकतवर है। उन्होंने इस बात का फैसला एक प्रतियोगिता के जरिए करने का निर्णय लिया। उन्होंने यह तय किया कि जो भी उस यात्री को अपना कोट उतारने को विवश कर देगा, वही ज्यादा ताकतवर कहलायेगा।

हवा ने कहा कि पहले वह प्रयास करेगी। इसके बाद हवा अपनी पूरी रफ्तार से बहने लगी। बादल उमड़ने लगे और यात्री को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बर्फ का तूफान आ गया हो। हवा जितनी तेज बहती जाती, वह यात्री अपना कोट उतनी ही मजबूती से अपने शरीर से जकड़े रहता।

इसके बाद सूरज की बारी आयी। अपनी पहली किरण से ही उसने घने बादलों और ठंड को दूर भगा दिया। यात्री को अचानक गर्मी महसूस हुयी। जैसे - जैसे सूरज गर्म होता गया, यात्री को गर्मी का अहसास होता गया और अंततः उसने गर्मी से छटपटाते हुए अपना कोट उतारकर जमीन पर फेंक दिया।

सूरज को इस प्रतियोगिता का विजेता घोषित कर दिया गया। वास्तविकता यह है कि प्रकृति की भयावह शक्तियों और खतरों की तुलना में सूरज की गुनगुनी धूप किसी भी व्यक्ति की बांछे खिला सकती है।

"शक्ति की तुलना में विनय का दर्ज़ा हमेशा ऊपर होता है।"

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चील और लोमड़ी

एक चील और लोमड़ी काफी लंबे अर्से से एक अच्छे पड़ोसी की तरह रहते चले आ रहे थे। चील का घोसला पेड़ के ऊपर स्थित था और लोमड़ी की माँद उसी पेड़ के नीचे।

एक दिन चील को अपने बच्चों का पेट भरने के लिए कोई भोजन नसीब नहीं हुआ। उसने यहाँ-वहाँ देखा तो उसे पता लगा कि लोमड़ी अपने घर पर नहीं है। वह झट से नीचे उतरी और लोमड़ी का एक बच्चा पंजे में दबाकर अपने घोसले में ले गयी। वह आश्वस्त थी कि उसके घोसले की ऊँचाई उसे लोमड़ी के प्रतिशोध से बचायेगी।

चील उस लोमड़ी के बच्चे को अपने भूखे बच्चों में बांटने ही वाली थी कि लोमड़ी अपनी माँद में लौटी और अपने बच्चे की सुरक्षित घर वापसी का याचना करने लगी। चील ने उसकी अनुनय-विनय पर कोई ध्यान नहीं दिया। लोमड़ी को जब अपने तमाम प्रयास व्यर्थ जाते दिखाई दिए, तब वह पड़ोस के एक किसान के खेत पर पहुँची। वह किसान खाना पका रहा था। लोमड़ी वहाँ से जलती हुई मशाल उठा लायी और पेड़ को आग लगा दी। अपने बच्चों और स्वयं के जीवन पर खतरा मंडराता देख चील ने लोमड़ी के बच्चे को सही सलामत वापस कर दिया।

"एक तानाशाह उन लोगों से कभी सुरक्षित नहीं होता

जिन पर वह तानाशाही करता है।"

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असली चमत्कार

एक स्वामी जी थे जिनके भक्तों की संख्या लाखों में थी. वे अपने प्रवचनों में मनुष्यों में मनुष्यत्व बचाए रखने की बातें अकसर किया करते थे.

एक बार एक अन्य स्वामी के भक्त उन्हें सुनने आए. प्रवचन के बीच में उन भक्त ने स्वामी जी का उपहास उड़ाते हुए कहा कि हमारे स्वामी तो नदी के एक किनारे खड़े होकर हाथों में ब्रश लेकर हवा में चित्र बनाते हैं तो वह नदी के दूसरे किनारे पर रखे कैनवस पर उतर आता है. क्या आप ऐसा कोई चमत्कार कर सकते हैं?

स्वामी जी ने कहा हाँ, क्यों नहीं! मैं इससे भी ज्यादा चमत्कार करता हूँ. आपके तथाकथित गुरु जादू की छड़ी से ऐसा ट्रिक कर दिखाते हैं, पर मेरा यह तरीका नहीं है. मेरा चमत्कार तो यह है जब मुझे खूब भूख लगती है तभी मैं खाता हूँ, और जब मुझे जोर की प्यास लगती है, तभी मैं खाता हूं. और यही बात मैं अपने भक्तों को सिखाता हूँ.

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संसदीय हास-परिहास 4

जब एक संसद सदस्य सरकार के कामधाम के बेहद धीमे तरीके से बेजार होकर यह बोले – यह सरकार तो पूरी तरह स्थाई हो गई है बाल बराबर भी नहीं खिसकती. तो जवाब में प्रो. मधु दंडवते ने स्पष्ट किया - सरकार वैसे भी स्थाई सम्पत्ति है.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

कोई दो-एक हफ़्ते एक अख़बार (जी हाँ, आपने सही पढ़ा, अख़बार में,) में सुबह-सुबह पढ़ा कि यू-ट्यूब पर कोलावरी डी नामक कोई म्यूजिक वीडियो लीक हो गया है और वो वायरल हो गया है. घंटे भर बाद ऑनलाइन हुआ तो दो तीन ईमेल और इतने ही न्यूज फ़ीड गा रहे थे – वाय दिस कोलावरी डी? एक में तो बाकायदा लिंक भी था.

कोलावरी वायरल हो गया था तो इधर भी इन्फ़ैक्शन होना ही था. देखने के लिए कि कोलावरी क्यों इतना भयंकर रूप से वायरल हो रहा है, यू-ट्यूब लिंक पर क्लिक किया तो जाने अनजाने हमने भी वहाँ आंकड़ा बढ़ाने में अपना योगदान कर ही दिया. वहाँ धनुष गा रहे थे – वाय दिस कोलावरी डी? बाजू में संबंधित वीडियो की सूची में कोलावरी रीमिक्स, हिंदी कोलावरी, लेडी कोलावरी, इंस्ट्रूमेंटल कोलावरी और न जाने क्या क्या कोलावरी मौजूद थे. इतने कम समय में इतने सारे वाय दिस कोलावरी डी?!

थोड़ी देर में ब्लॉग जगत की हलचल लेने चले तो यहाँ भी लेटेस्ट पोस्टों में वाय दिस कोलावरी डी? के दर्शन होने लगे. कहीं वीडियो का लिंक था तो कहीं एमपी3 गाने डाउनलोड का तो कहीं पर पूरा गीत लिखा हुआ था. नाश्ते के समय आदतन रेडियो मिर्ची लगाया तो जो पहला गाना सुनाई दिया वो था - वाय दिस कोलावरी डी? धनुष पें पें पें की ट्यून को चेंज करने की बात कह रहे थे. मेरे भी दिमाग में वाय दिस कोलावरी डी? जम चुका था और कुछ भी पढ़ता लिखता दिमाग में गूंजता - वाय दिस कोलावरी डी?

शाम को सब्जी लेने गया तो टमाटर तौलते तौलते सब्जी वाला गा रहा था – वाय दिस कोलावरी डी? एक अन्य ग्राहक वहीं टमाटर छांट रहा था. इतने में उस ग्राहक का मोबाइल फ़ोन बजा. उसमें बजा - वाय दिस कोलावरी डी? जाहिर है, उसने भी वही कॉलर ट्यून लगा रखा था - वाय दिस कोलावरी डी?

रात को एक मित्र के यहाँ जाना था. डरते डरते घंटी बजाई कि डोर बेल की ट्यून वाय दिस कोलावरी डी? न हो. थोड़ी सी राहत मिली की दरवाजे की घंटी की ट्यून वही पुरानी वाली ओम जय जगदीश हरे ही थी. दरवाजा मित्र के किशोर पुत्र ने खोला. मैं सोफ़े पर बैठता इससे पहले ही उसने मुझसे पूछा – अंकल आप ये वाला बढ़िया गाना सुनेंगे? आज ही मैंने अपने मोबाइल में डाउनलोड किया है. मेरा माथा ठनकता इससे पहले उसने गाना चालू कर दिया - वाय दिस कोलावरी डी? पीछे से उसकी छोटी बहन चली आई. उसने कहा – अंकल मेरे को ये वाय दिस कोलावरी डी? पूरा गाना आता है, सुनाऊँ? और, इस बार भी, जाहिर है वाय दिस कोलावरी डी? पूरा सुनना पड़ा.

देर रात को थकाहारा रिमोट हाथ में लिया बैठा न्यूज चैनल लगाने की सोच रहा था कि कहीं आज-तक या टाइम्स-नाऊ में भी वाय दिस कोलावरी डी? से मुठभेड़ न हो जाए. क्योंकि दोपहर भर हर म्यूजिक चैनल चाहे वो एमटीवी हो या चैनल वी – सभी बारी बारी से दस-दस मिनट के अंतराल में बजा रहे थे वाय दिस कोलावरी डी? गोया कि ये दुनिया का आखिरी गीत हो और उसे आखिरी वक्त में चाहे जितना बजा लो! क्या पता आगे मौका मिले या न मिले!!

इतने में चाय का कप लिए श्रीमती जी आईं. जब आप दिनभर पक चुके हों, तो इत्मीनान से लिए गए चाय का एक घूँट गजब की तसल्ली देता है. श्रीमती जी ने चाय का कप मुझे पकड़ाते हुए गुनगुनाया - वाय दिस कोलावरी डी?

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

319

चरमराते हुए पहिये

एक ऊबड़खाबड़ रोड पर दो बैल एक बैलगाड़ी को खींचते ले जा रहे थे। तभी बैलगाड़ी के पहियों से चरमराने की आवाज़ आने लगी। गाड़ीवान ने पहियों को कोसते हुए कहा - "अरे निर्दयी! जब कठोर परिश्रम करके गाड़ी खींचने वाले ये जानवर नहीं कराह रहे हैं तो तुम क्यों शोर मचा रहे हो?"

320

भेड़िया ओर मेमना

नदी के किनारे एक भेड़िये को कुछ दूरी पर एक भटकता हुआ मेमना दिखायी देता है। वह उस पर हमला करके अपना शिकार बनाने का निश्चय करता है। निरीह मेमने के शिकार के लिए वह बहाना ढूंढने लगता है।

वह मेमने पर चिल्लाता है - "अरे दुष्ट! जिस नदी का मैं पानी पी रहा हूँ उसे गंदा करने की तेरी हिम्मत कैसे हुयी?"

मेमना नम्रतापूर्वक बोला - "माफ कीजिए श्रीमान! लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आया कि मैं किस तरह पानी गंदा कर रहा हूँ, जबकि पानी तो आपकी ओर से बहता हुआ मेरे पास आ रहा है।"

"हो सकता है! पर सिर्फ एक वर्ष पहले मैंने सुना था कि तुम मेरी पीठ पीछे बहुत बुराई कर रहे थे।" - भेड़िये ने बात बनाते हुये कहा।

"लेकिन श्रीमान, एक वर्ष पहले तो मैं पैदा ही नहीं हुआ था" - मेमने ने कहा।

"हो सकता है कि तुम न हो। वो तुम्हारी माँ भी हो सकती है। पर इससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं है। अब तुम मेरे भोजन में और व्यवधान नहीं डालो।" - भेड़िये ने गुर्राते हुए कहा और बिना पल गवाये उस निरीह मेमने पर टूट पड़ा।

"एक तानाशाह अपनी तानाशीही के लिए हमेशा कोई न कोई बहाना तलाश लेता है।"

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71

हीरे की असली कीमत

एक मुर्गे को दाना खोजते समय मैदान में दाने के आकार में तराशा हुआ एक हीरा मिल गया. मुर्गे ने तुरंत उस पर चोंच मारी, मुंह में लिया और जब उसे उसका स्वाद नहीं जमा और जीभ को कड़ा-कड़ा महसूस हुआ तो उसने तत्काल ही उसे वापस थूक दिया.

यह देख हीरा मुर्गे से बोला – ओ मूर्ख मुर्गे, तुम्हें मालूम नहीं मेरी असली कीमत क्या है? मैं एक नवलखा हार में लगा हुआ था, पर यहाँ उसमें से गिर गया हूँ. मैं असली नायाब हीरा हूँ. फुर्सत में तराशा गया और कई राजकुमारियों के गले की शोभा रह चुका हूँ. मैं बेशकीमती हूँ, और तुम मुझे यूं ही फेंक कर चले जा रहे हो?

मुर्गे ने उसकी ओर निस्पृह सी दृष्टि डाली और गर्व से बोला – तुम्हारी कीमत और खासियत तुम अपने पास रखो, मेरी नजर में तो तुम्हारी कीमत गेंहू के एक दाने के बराबर भी नहीं है!

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72

मैं एक बार कमिटमेंट कर दूं तो...

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर मित्र राष्ट्रों के सम्मेलन में विंस्टन चर्चिल के साथ रूस के जोसफ स्तालिन व अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमेन विविध संधियों पर हस्ताक्षर कर रहे थे.

ट्रूमेन ने पाया कि विंस्टन चर्चिल हर संधि के ब्यौरों पर हस्ताक्षर करने से पहले खूब बहस करते थे और मतभेदों को दूर होने से पहले तक हस्ताक्षर नहीं करते थे.

इसके विपरीत स्तालिन बड़े ही दोस्ताना अंदाज में पेश आते थे और हर संधि पर बिना किसी मतभेद पैदा किए हस्ताक्षर कर देते थे.

बाद में जब इन संधियों को लागू करने की बारी आई तो विंस्टन चर्चिल ने उन्हें अक्षरशः लागू करवाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जबकि स्तालिन ने संधियों की परवाह किए बगैर अपनी मर्जी से जो चाहा वैसा किया.

ट्रूमेन को चर्चिल और स्तालिन के तब के व्यवहार में अंतर अब समझ में आया. स्तालिन शुरू से ही संधि को हल्के में ले रहे थे, जबकि चर्चिल पूरे कमिटमेंट के साथ हस्ताक्षर कर रहे थे.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

317

प्रसन्न चीनी नागरिक

यदि आप अमेरिका के चाइनाटाउन इलाके में घूमने जाये तो प्रायः हर जगह कपड़े का थैला लादे एक मोटे व्यक्ति की मूर्ति देखने को मिलेगी। चीनी व्यापारी उसे प्रसन्न चीनी नागरिक या लाफिंग बुद्धा कहते हैं।

होतेई नामक यह व्यक्ति चीन के प्रसिद्व तांग साम्राज्य काल में रहता था। उसे अपने आप को प्रसिद्व चीनी विद्या “ज़ैन” का विद्वान कहलाने और आसपास कई शिष्यों के जमावड़े में कोई रुचि नहीं थी। इसके बजाए वह उपहार, टाफियाँ, फल, और मेवों से भरा कपड़े का बैग उठाकर सडक पर टहलता रहता थ। वह अपने आस-पास जुटे बच्चों को उपहार व टाफियाँ बांटा करता था। एक तरह से उसने सडक पर ही बच्चों का स्कूल स्थापित कर लिया था।

लेकिन जब भी वह किसी “ज़ैन विद्या के अनुयायी” से मिलता, अपना हाथ फैलाकर उनसे पैसे मांगता।

एक दिन वह अपने रोजमर्रा के कार्य में लगा हुआ था कि एक ज़ैन गुरू वहाँ आये और पूछने लगे- “बताओ ज़ैन विद्या का क्या महत्व है?”

होतेई ने उत्तर देने के बजाए सांकेतिक रूप से अपना बैग जमीन पर पटक दिया।

गुरू जी ने फिर प्रश्न किया - “तब बताओ कि ज़ैन विद्या की क्या वास्तविकता है?” प्रसन्न चीनी नागरिक होतेई ने तुरंत थैले को फिर से अपने कंधे पर लाद लिया और अपने रास्ते चलते बना।

हमेशा अपना कर्तव्य करते रहना चाहिये।

318

विजिटिंग कार्ड

चीनी के मैजी साम्राज्य काल में कैचू नामक चीनी ज़ैन विद्या के एक गुरू हुआ करते थे। वे क्योटो के एक किले में रहते थे। एक दिन क्योटो प्रांत के गर्वनर पहली बार उनसे मिलने आये।

उन्होंने गुरूजी के शिष्य को अपना विज़िटंग कार्ड दिया जो शिष्य ने गुरूजी के समक्ष प्रस्तुत किया, जिस पर लिखा था “किटागाकी, गवर्नर ऑफ क्योटो”

कार्ड को पढ़कर गुरूजी बोले - “मझे ऐसे किसी आदमी से नहीं मिलना। उससे कहो कि यहां से चला जाये।”

इसके बाद शिष्य ने अफसोस जताते हुये वह विजिटिंग कार्ड गवर्नर को वापस कर दिया।

गर्वनर ने बात समझते हुए कहा - “दरअसल मुझसे ही गलती हो गयी है।”यह कहकर उन्होंने “गवर्नर ऑफ क्योटो” शब्द काट दिये और पुनः वह कार्ड देते हुए कहा - “एक बार गुरूजी से फिर पूछ लो।”

जब गुरूजी ने पुनः वह कार्ड देखा तो तत्परता से बोले - “अच्छा! किटागाकी आया है। उसे तुरंत बुलाओ, मैं उससे मिलना चाहता हूँ।

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70

समर्पण और खुशहाली

एक बार एक राजा ज्ञान प्राप्ति के लिए एक प्रसिद्ध मठ पर गया. मठ में गुरु के अलावा बाकी सभी राजा को देख कर अति उत्साहित थे.

राजा ने मठाधीश से अपने आने का मंतव्य बताया और कहा – गुरूदेव, मैं आपके ज्ञान व प्रसिद्ध मठ से बेहद प्रभावित हूँ, और मैं अपने राज्य में अपने शासन से खुशहाली लाना चाहता हूँ. कृपया कुछ दिशा दर्शन करें.

गुरुदेव ने कहा –अच्छी बात है, मगर खुशहाली शासन व नियंत्रण से नहीं आती है, बल्कि सभी के अपने कार्यों के प्रति समर्पण से प्राप्त होती है.

अपने कार्य के प्रति समर्पण का भाव पैदा करें, खुशहाली, प्रगति स्वयमेव प्राप्त होगी

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71

प्रार्थना -2

एक मठ में यह सर्व-प्रचलित नियम नहीं था “शांति बनाए रखने के लिए वार्तालाप नहीं करें”

बल्कि यह नियम था – “यदि शांति को बेहतर बना सकते हैं तो वार्तालाप जरूर करें”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

315

बुजुर्ग व्यक्ति और मृत्यु

एक बुजुर्ग व्यक्ति काफी दूर से लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर लादे चला आ रहा था। वह बुरी तरह थक चुका था। जब उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने अपने बोझ को जमीन पर फेंक दिया और मृत्यु को इस दर्द से निजात दिलाने के लिए पुकारा।

अगले ही पल मृत्यु उसके समक्ष आ खड़ी हुयी और पूछने लगी कि वह क्या चाहता है?

बुजुर्ग व्यक्ति बोला - "मुझ पर सिर्फ इतनी कृपा करें कि यह लकड़ी का गट्ठर फिर से मेरे सिर पर रखने में सहायता कर दें।"

"जीवन अत्यंत प्रिय होता है। हताशा में मृत्यु को पुकारना तो आसान है

परंतु वास्तव में मृत्यु का वरण करना बहुत कठिन।"

316

शेरनी

एक बार जंगल के सभी जानवरों में यह बहस छिड़ गयी कि कौन सा जानवर सबसे ज्यादा बच्चे पैदा कर सकता है। जब विवाद शांत नहीं हुआ तो वे इसके निपटारे के लिए शेरनी के पास गए।

उन्होंने शेरनी से पूछा - "और तुम्हारे कितने बच्चे हैं?"

शेरनी ने तत्परतापूर्वक उत्तर दिया - "सिर्फ एक। लेकिन वह जंगल का राजा है।"

"परिमाण से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है गुणवत्ता"

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68

ईश्वर का प्रमाण

न्यूटन का एक नास्तिक मित्र एक दिन न्यूटन से मिलने आया. न्यूटन अपने प्रयोगों में तल्लीन थे. मित्र ने देखा कि न्यूटन ने सौर तंत्र को प्रदर्शित करता हुआ एक बढ़िया मशीन बनाया है. उनके मित्र ने उसे चलाकर देखा तो सूर्य के चारों ओर पृथ्वी और अन्य तमाम ग्रह घूमने लगे.

उनके मित्र ने न्यूटन से पूछा – इसे किस ने बनाया है? तुमने या तुम्हारे किसी शिष्य ने?

न्यूटने ने जवाब दिया – किसी ने नहीं.

मित्र ने कहा – ऐसा कैसे हो सकता है?

न्यूटन ने कहा – बिलकुल हो सकता है. ठीक वैसे ही जैसे कि तुम्हारे मुताबिक इस वास्तविक संसार – सूर्य, पृथ्वी इत्यादि को किसी ने नहीं बनाया है, ये अपने आप बना है.

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69

कितनी लंबी सोच

एक व्यापारी के पास इतना सामान था कि डेढ़ सौ ऊंटों के काफिले में भी नहीं समाता था. उसके पास चालीस नौकर थे जो काफिले को संभालते थे. एक दिन उसने अपने मित्र सादी को खाने पर बुलाया.

रात्रि भोज के दौरान और बाद में रात भर वह व्यापारी अपनी व्यापारिक समस्याएँ सादी को सुनाता रहा. फिर आखिर में उसने सादी को बताया –

“ओ सादी, मैं अब अपने आखिरी व्यापारिक यात्रा पर जाने वाला हूँ. अबकी बार मैं अपने साथ मिस्र से गंधक लेकर चीन जाऊंगा क्योंकि वहाँ यह भारी मुनाफे में बिकेगा. फिर वहाँ से चीनी पात्र लेकर रोम जाऊंगा और बहुत पैसे बनाऊंगा. वहाँ से मेरा जहाज बड़ी मात्रा में माल लेकर भारत जाएगा जहाँ उसे बेचकर मसाले भर लाऊंगा इधर यमन और मिस्र में भारी दामों में बेचकर बेहिसाब दौलत कमाऊंगा.”

सादी के चेहरे पर अविश्वास के भावों को नजर अंदाज करता हुआ व्यापारी आगे जारी रहा – “और इस तरह मेरे मित्र, फिर मैं अपनी बाकी जिंदगी ऐशोआराम से गुजारूंगा.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

313

काना सांभर

एक काना सांभर समुद्र के किनारे घास चर रहा था। अपने आपको किसी संभावित हमले से बचाने के लिए वह अपनी नज़र हमेशा ज़मीन की ओर रखता था जबकि अपनी कानी आँख समुद्र की ओर रखता था क्योंकि उसे समुद्र की ओर से किसी हमले की आशंका नहीं थी।

एक दिन कुछ नाविक उस ओर आए। जब उन्होंने सांभर को चरते हुए देखा तो आराम से उस पर निशाना साधकर अपना शिकार बना लिया।

अंतिम आंहें भरते हुए सांभर बोला - "मैं भी कितना अभागा हूँ। मैंने अपना सारा ध्यान ज़मीन की ओर लगा रखा था जबकि समुद्र की ओर से मैं आश्वस्त था। पर अंत में शत्रु ने उसी ओर से हमला किया।"

"खतरा प्रायः उसी ओर से दस्तक देता है

जिस ओर से आपने अपेक्षा न की हो।"

314

मित्र बनाओ और तबाह करो

सिविल वॉर के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति लिंकन दक्षिणी इलाके में रहने वाले व्यक्तियों को शत्रु कहने के बजाए गुमराह व्यक्ति कहकर संबोधित किया करते थे।

एक बुजुर्ग एवं उग्र देशभक्ति महिला ने लिंकन को यह कहते हुए फटकार लगायी कि वे अपने शत्रु को तबाह करने के बजाए उनके प्रति नरम रवैया अपना रहे हैं।

लिंकन ने उस महिला को उत्तर दिया - "ऐसा आप कैसे कह सकती हैं मैंडम! क्या मैं अपने शत्रुओं को उस समय तबाह नहीं करता, जब मैं उन्हें अपना मित्र बना लेता हूँ।"

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66

सच्चा चोर

एक बार एक बुद्धिमान जज के पास एक आदतन युवा चोर को लाया गया जो रंगे हाथों चोरी करते पकड़ा गया था. जज ने उस युवक की उम्र को देखते हुए उसे चोरी की पारंपरिक सज़ा देने के बजाय उसे यह दण्ड दिया कि भविष्य में वह सिर्फ सच और सच ही बोलेगा.

युवक प्रसन्न हो गया और इस सज़ा को भुगतने को तैयार हो गया क्योंकि वह जेल जाने से बच गया था.

उस रात को अंधेरे में आदतन वह युवक फिर उठा और चोरी करने के लिए निकल पड़ा. परंतु अपने कदम घर के बाहर रखते ही उसे विचार आया कि यदि वह फिर से चोरी करते पकड़ा गया, या फिर किसी ने उसे रात में रास्ते में देख लिया और पूछ लिया कि तुम क्या करने निकले हो, तो उसे तो सिर्फ सच और सच ही बोलना है, और ऐसे में वह यह बोल कर पकड़ा जाएगा कि वो चोरी करने जा रहा है.

वह चोर युवक जज के दण्ड का पालन पूरी सच्चाई से करना चाहता था, और अंततः उसकी चोरी करने की आदत खत्म हो गई.

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67

मुझ पर भरोसा है या गधे पर?

एक बार एक किसान मुल्ला के पास आया और उसका गधा दोपहर के लिए उधार मांगा ताकि वो अपने खेत पर कुछ सामान ढो सके.

मुल्ला ने जवाब दिया - “मेरे मित्र, मैं हमेशा तुम्हें खेतों में काम करते देखता हूँ, और खुश होता हूं. तुम फसलें पैदा करते हो और हम सब उसका उपयोग करते हैं, यह वास्तविक समाज सेवा है. मेरा दिल भी तुम्हारी सहायता करने को सदैव तत्पर रहता है. मैं हमेशा ख्वाब देखा करता था कि मेरा गधा तुम्हारे खेतों में उगाए गए फसलों को प्रेम पूर्वक ढो रहा है. आज तुम मुझसे गधा उधार मांग रहे हो यह मेरे लिए बेहद खुशी की बात है. मगर क्या करूं, मेरा गधा आज मेरे पास नहीं है. मैंने आज अपना गधा किसी और को उधार दे रखा है.”

“ओ मुल्ला, कोई बात नहीं. मैं कोई अन्य व्यवस्था कर लूंगा. और मुझे तुम्हारे इन दयालु शब्दों और मेरे प्रति आपकी भावना से मुझे बेहद प्रसन्नता हुई. आपको बहुत बहुत धन्यवाद” किसान ने कहा और वापस जाने लगा.

इस बीच घर के पिछवाड़े से मुल्ला के गधे के रेंकने की आवाज आई. किसान रुक गया. उसने मुल्ला की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखा और कहा – “मुल्ला तुम तो कहते थे कि तुमने गधा किसी और को दे दिया है, पर वो तो पीछे बंधा हुआ है.”

“अजीब आदमी हो तुम भी! तुम्हें मेरी बात पर यकीन होना चाहिए कि गधे के रेंकने पर?” मुल्ला ने किसान से पूछा!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

311

काम नहीं तो भोजन नहीं

हयाजूको चीनी जैन विद्या के एक प्रसिद्ध गुरू थे। वे अस्सी वर्ष की उम्र में भी अपने शिष्यों के साथ कठोर श्रम करते थे जैसे - बागवानी करना, मैदान साफ करना, पेड़ों की कटाई-छटाई करना....आदि।

उनके शिष्यों को यह देखकर दु:ख होता कि उनके वृद्ध शिक्षक इतना कठिन श्रम करते हैं। वे भी यह जानते थे कि उनके गुरू उनकी यह बात कभी नहीं मानेंगे कि वे कठिन श्रम न करें। इसलिये शिष्यों ने भी एक दिन उनके औजार छुपा दिये।

औजार नहीं मिलने से गुरूजी उस दिन कोई श्रम नहीं कर पाये। उस दिन गुरूजी ने कुछ नहीं खाया। अगले दिन भी उन्होंने कुछ नहीं खाया, और उसके अगले दिन भी नहीं।

उनके शिष्यों ने आपस में चर्चा की कि गुरूजी यह जानकर बहुत क्रोधित होंगे कि हम लोगों ने उनके औजार छुपा दिये इसलिये अच्छा होगा कि हम उनके औजार वापस रख दें।

उन्होंने ऐसा ही किया। गुरूजी ने उस दिन फिर परिश्रम किया और बाद में खाना खाया। उस शाम गुरूजी ने अपने शिष्यों को "काम नहीं तो भोजन नहीं" विषय पर व्याख्यान दिया।

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312

सबसे महत्त्वपूर्ण काम, व्यक्ति एवं समय

एक शिष्य ने अपने गुरूजी से पूछा - "सबसे महत्तपूर्ण काम क्या है? सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कौन है तथा हमारे जीवन का सबसे बेहतरीन समय कौनसा है?

गुरूजी ने उत्तर दिया - "इस समय तुम्हारे पास जो काम है, वही सबसे महत्त्वपूर्ण है। वह व्यक्ति जिसके साथ तुम काम कर रहे हो (या जिसके लिये तुम काम कर रहे हो, जैसे - अध्यापक के लिये छात्र, चिकित्सक के लिये मरीज......) सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है तथा यह समय (वर्तमान) ही सबसे महत्वपूर्ण समय है। इसे व्यर्थ न जाने दो।"

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64

मिट्टी का या सोने का?

कालिदास से एक बार राजा ने पूछा – कालिदास, ईश्वर ने आपको बुद्धि तो भरपूर दी है, मगर रूप-रंग देने में भी यदि ऐसी ही उदारता वे बरतते तो बात ही कुछ और होती.

कालिदास ने राजा के व्यंग्यात्मक लहजे को पहचान लिया. कालिदास ने कुछ नहीं कहा, परंतु सेवक को पानी से भरे एक जैसे दो पात्र लाने को कहा – एक सोने का एक मिट्टी का.

दोनों पात्र लाए गए. गर्मियों के दिन थे. कालिदास ने राजा से पूछा – राजन्! क्या आप बता सकते हैं कि इनमें से किस पात्र का पानी पीने के लिए उत्तम है?

राजा ने छूटते ही उत्तर दिया – यह तो सीधी सी बात है, मिट्टी का. और फिर तुरंत उन्हें अहसास हुआ कि कालिदास क्या कहना चाहते हैं!

बाह्य रूपरंग सरसरी तौर पर लुभावना लग सकता है, मगर असली सुंदरता तो आंतरिक होती है. मिट्टी का घड़ा आपकी (वास्तविक) प्यास बुझा सकता है, सोने का घड़ा नहीं!

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65

शहर के दरवाजे और जुबान पर ताले

एक समय एक राजा राज्य करता था जिसकी बुद्धिमत्ता, चातुर्य और राज्य कौशल चतुर्दिक प्रसिद्धि के शिखर पर था. राज्य धन्य-धान्य से परिपूर्ण था और चहुँओर खुशहाली का साम्राज्य था.

राजा का वजीर एक बार राज्य भ्रमण पर निकला. यात्रा से वापस आकर उन्होंने राजा से कहा – राजन्! आपकी प्रसिद्धि चतुर्दिक है, दुनिया के तमाम अन्य राजा महाराजा आपकी बुद्धिमत्ता और राज्य कौशलता का लोहा मानते हैं, और चहुँओर लोग आपकी तारीफ करते हैं. राज्य भी धन्यधान्य से परिपूर्ण और खुशहाल है. मगर फिर भी कुछ लोग मुझे ऐसे मिले जो आपकी बुराई करते हैं, आपके बारे में फूहड़ चुटकुले सुनाते हैं और आपके बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णयों की खिल्ली उड़ाते हैं. ऐसा कैसे है राजन्?

राजा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया – राज्य की तमाम जनता को मालूम है कि राजा उनके लिए क्या करता है. रहा सवाल जबान का, तो मैं राज्य के बाहरी रास्तों पर बने हुए दरवाजों को तो बंद कर उन पर ताले लगवा सकता हूँ, मगर मनुष्य की जुबान पर नहीं. और उनकी ये जुबानें मुझे सदैव उत्तम कार्य करते रहने को प्रेरित करती रहती हैं कि शायद कभी उनकी जुबान बदल जाएँ.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

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संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

309

लीला

एक गुरू जी अपने शिष्यों को हिंदू मान्यताओं को समझाते हुये बोले - "सारा जगत प्रभु की लीला है, यानि यह संसार एक खेल है और यह ब्रहांड खेलकूद का मैदान है। आध्यात्म का लक्ष्य जीवन को एक खेल बनाना है। "

एक शुद्धतावादी पर्यटक को उनकी बातें निरर्थक लगीं। वह बोला - " तो क्या कर्म का कोई महत्त्व नहीं है ?"

गुरू जी उत्तर दिया - "जरूर है। लेकिन कोई कार्य तब आध्यात्मिक हो जाता है जब इसे खेल की तरह किया जाये। "

310

नेता के कार्य

जब एक धार्मिक नेता के चेलों ने एक कार्यक्रम के दौरान अपने नेता की तारीफों के पुल बांधे, तो नेता बहुत खुश हुए।

बाद में उनसे इस बारे में पूछा गया तो वे बोले - "जो व्यक्ति दूसरों को अपनी शक्ति दिखाता है, वह धार्मिक नेता नहीं हो सकता।"

तब उनसे पूछा गया कि "फिर धार्मिक नेता के क्या कर्का होते हैं?"

नेता जी ने उत्तर दिया - लोगों को प्रेरित करना न कि कानूनी पचड़ों में डालना। उन्हें जागृत करना, न कि मजबूर करना ।"

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62

संसदीय हास-परिहास – 3

बहस के दौरान जब एक सदस्य ने आपत्ति दर्ज की कि सभापति महोदय का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई सदस्य शुरू से ही कोशिश कर रहे हैं ताकि उन्हें भी बोलने का मौका मिले, मगर सभापति महोदय ध्यान ही नहीं दे रहे हैं!

इस पर सभापति ने मुस्कुराते हुए अपनी बात कुछ यूँ रखी – “मेरा ध्यान एक बार में एक ही सम्माननीय सदस्य की ओर आकर्षित हो सकता है!”

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63

नमक की सही कीमत

एक बार एक सुल्तान अपने लाव-लश्कर के साथ यात्रा पर था. यात्रा लंबी, कई दिनों की थी, और एक बार बीच पड़ाव में रसोई का नमक खत्म हो गया.

रसोइये ने सुल्तान से फरियाद की कि उसके भंडार का नमक खत्म हो गया है. सुल्तान ने तुरंत अपने अपने एक सिपाही को बुलाया और पास के गांव के किराना दुकान से शीघ्र ही नमक लेकर आने को कहा. साथ ही सुल्तान ने सिपाही को रुपए देते हुए कहा कि नमक की वाजिब कीमत देकर ही लाना.

सिपाही की प्रश्न-वाचक निगाहों को सुल्तान ताड़ गया. सुल्तान ने स्पष्ट किया – “तुम सुल्तान के सिपाही, चाहो तो सुल्तान के नाम पर मुफ़्त नमक ला सकते हो या फिर पैसा तो तुम्हारी जेब का नहीं, राजकोष का है ऐसा सोचकर अनाप-शनाप भाव से नमक ला सकते हो. मगर दोनों ही परिस्थिति में तुम गलत कार्य करोगे.

जरा जरा सी बातें ही हमें बहुत कुछ सिखाती हैं. बूंद-बूंद से घट भरता है. आज तुम नमक की तुच्छ सी कीमत सही-सही अदा नहीं करोगे तो भविष्य में बड़े बड़े सौदे में सही कीमत कैसे लगाओगे? इसीलिए जाओ और सही कीमत देकर ही नमक लाओ.”

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

307

अनुपात

ज्ञान प्राप्त करने की तमाम आकांक्षाऐं मन में लिए एक पर्यटक आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने पहुंचा परंतु गुरू की साधारण बातों से वह जरा भी प्रभावित नहीं हुआ। उसने आश्रम के एक अन्य शिष्य से कहा - "मैं यहाँ गुरू की तलाश में आया था। लेकिन इन गुरूजी में ऐसी कोई खास बात नज़र ही नहीं आयी।'

शिष्य ने उत्तर दिया - "गुरू ऐसे मोची के समान होते हैं जिनके पास कभी न खत्म होने वाला चमड़े का भंडार है। लेकिन वे आपके पैरों के आकार के हिसाब से ही कटाई और सिलाई का कार्य करते हैं।'

308

अपने भाग्यविधाता बनो

एक दिन नसरुद्दीन अपने गाँव में टहल रहा था। तभी उसके कुछ पड़ोसी पास आकर बोले - "नसरुद्दीन। तुम बहुत बुद्धिमान और नेक इंसान हो। हम लोगों को अपना चेला बना लो। तुम हमें यह समझाओ कि हम किस तरह अपना जीवन व्यतीत करें और जीवन में सुख और शांति के लिए हमें क्या करना चाहिये?"

नसरुद्दीन ने कहा - "ठीक है। मैं तुम्हें पहला शिक्षा अभी दिए देता हूँ। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तुम अपने पैरों और चप्पलों का विशेष ध्यान रखो। उन्हें हर समय साफ और स्वच्छ रखो। "

पड़ोसी उसकी बात को ध्यान से सुन रहे थे, तभी उनका ध्यान नसरुद्दीन के पैरों की ओर गया जो बहुत मैले-कुचैले थे तथा उसकी चप्पलें भी टूटी-फूटी थीं।

एक पड़ोसी तपाक से बोला - "लेकिन नसरुद्दीन, तुम्हारे पैर तो बहुत ही गंदे हैं और चप्पलों का तो कहना ही क्या। जिन बातों का तुम खुद ही पालन नहीं कर रहे हो, उनका पालन हम कैसे कर सकते हैं ?"

नसरुद्दीन - "तो मैं भी यह जानने के लिए इधर-उधर नहीं भटकता कि मुझे अपना जीवन कैसे बिताना चाहिये?"

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60

अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो

एक गांव में एक आदमी अपने प्रिय तोते के साथ रहता था.

एक बार जब वह आदमी किसी काम से दूसरे गांव जा रहा था, तो उसके तोते ने उससे कहा – “मालिक, जहाँ आप जा रहे हैं वहाँ मेरा गुरु-तोता रहता है. उसके लिए मेरा एक संदेश ले जाएंगे?”

“क्यों नहीं!” – उस आदमी ने जवाब दिया.

“मेरा संदेश है,” तोते ने कहा - “आजाद हवाओं में सांस लेने वालों के नाम एक बंदी तोते का सलाम.”

वह आदमी दूसरे गांव पहुँचा और वहाँ उस गुरु-तोते को अपने प्रिय तोते का संदेश बताया. संदेश सुनकर गुरु-तोता तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया.

जब वह आदमी अपना काम समाप्त कर वापस घर आया तो उस तोते ने पूछा कि क्या उसका संदेश गुरु-तोते तक पहुँच गया था.

आदमी ने तोते को पूरी कहानी बताई कि कैसे उसका संदेश सुनकर उसका गुरु-तोता तत्काल मर गया था.

यह बात सुनकर वह तोता भी तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया.

उस आदमी ने बुझे मन से तोते को पिंजरे से बाहर निकाला और उसका दाह-संस्कार करने के लिए ले जाने लगा. जैसे ही उस आदमी का ध्यान थोड़ा भंग हुआ, वह तोता तुरंत उड़ गया और जाते जाते उसने अपने मालिक को बताया – “मेरे गुरु-तोते ने मुझे संदेश भेजा था कि अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो!”

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61

रेत पर लिखें कि पत्थर पर

दो दोस्त कहीं जा रहे थे. रास्ते में उनमें किसी बात पर झगड़ा हो गया. गर्मागर्मी में एक ने दूसरे को चांटा जड़ दिया. जिसने चांटा खाया, उसने दुःखी होकर रेत पर लिखा – “आज मेरे प्रिय मित्र ने मुझे दुःखी किया.”

वापसी में भी वे साथ थे. बीच रास्ते में नदी पड़ती थी. दोनों ने स्वच्छ बहती नदी में स्नान करने का मन बनाया. अचानक वह मित्र जिसने चांटा खाया था, भँवर में फंस कर डूबने लगा. उसके उसी मित्र ने जिसने चांटा मारा था, उसे बचाया.

जिसने चांटा खाया था, उसने खुश होकर एक चट्टान पर लिखा – “आज मेरे प्रिय मित्र ने मेरा जीवन बचाया.”

जब कोई आपको दुःखी करे, तो उसे रेत पर लिखें ताकि क्षमा करने वाली हवाएँ उसे मिटा दें. परंतु जब कोई आपके लिए अच्छा काम करे, तो उसे पत्थर पर लिखें ताकि वो आपकी स्मृतियों में सदैव बना रहे.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

305

कोयल , पंख और कीड़े

एक जंगल में एक कोयल अपने सुर में गा रही थी। तभी एक किसान वहाँ से एक बक्सा लेकर गुजरा जिसमें कीड़े भरे हुये थे। कोयल ने गाना छोड़ दिया और उसने किसान से पूछा - "इस बक्से में क्या है और तुम कहाँ जा रहे हो?'

किसान ने उत्तर दिया कि बक्से में कीड़े भरे हुये हैं जिन्हें वह पंख के बदले शहर में बेचने जा रहा है। यह सुनकर कोयल ने कहा - "मेरे पास बहुत से पंख हैं जिनमें से एक पंख तोड़कर मैं आपको दे सकती हूँ। इससे मेरा बहुत समय बच जाएगा और आपका भी।'

किसान ने कोयल को कुछ कीड़े निकालकर दिए जिसके बदले में कोयल ने अपना एक पंख तोड़कर दिया। अगले दिन भी यही हुआ। फिर ऐसा रोज ही होने लगा। एक दिन ऐसा भी आया जब कोयल के सभी पंख समाप्त हो गए।

सभी पंख समाप्त हो जाने के कारण कोयल उड़ने में असमर्थ हो गयी और कीड़े पकड़कर खाने लायक भी नहीं बची। वह बदसूरत दिखने लगी, उसने गाना बंद कर दिया और जल्द ही भूख से मर गयी।

"भोजन प्राप्त करने का जो आसान मार्ग कोयल ने चुना,

वही मार्ग अंततः सबसे कठिन साबित हुआ।'

306

स्थिरता

एक नौजवान एक आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने गया। लेकिन उसे आश्रम के अनुशासन बहुत कठिन लगे। आश्रम में नियमों का पालन अनिवार्य था। जल्द ही वह निराशा में डूब गया और उसने नदी में डूबकर आत्महत्या करने का इरादा कर लिया।

जब वह नदी में डूबने जा रहा था, तब उसने मार्ग में पत्थरों पर पड़े गोल निशानों को देखा। दरअसल नदी से पानी भरकर लौटते समय महिलायें जिस जगह पानी भरे घड़े रखा करती थीं, वहां के पत्थरों पर गोल निशान बन गए थे।

उस नौजवान को नियमित अभ्यास और दृढ़ इच्छा शक्ति का महत्त्व समझ में आ गया। नियमित आदतें ही हमारा चरित्र बन जाती हैं।

"दृढ़ इच्छा शक्ति और नियमित अभ्यास ही जीवन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।'

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58

सभी तीर निशाने पर

एक बार एक राजा एक छोटे से शहर की यात्रा पर था. वहाँ उसने आश्चर्य से देखा कि पेड़ों के तनों पर, घरों की दीवारों पर तीर बिंधे हुए हैं और हर तीर ठीक निशान के बीचों बीच है. उसने ऐसे विलक्षण धनुर्धर से मिलना चाहा. राजा ने उस धनुर्धर को बुलाया और पूछा कि वह हर बार इस तरह का सटीक निशाना कैसे लगा लेता है.

उस धनुर्धर ने स्पष्ट किया – बहुत आसानी से श्रीमान्. मैं पहले तीर चलाता हूँ, फिर जहाँ तीर लगता है उसके चारों ओर निशान बना देता हूँ.

“हम अपनी धारणा पहले बना लेते हैं, वस्तुस्थिति जानने की कोशिश बाद में करते हैं. हम देखते हैं तो इस लिए नहीं कि कुछ नया देखें, बल्कि अपने विचारों को पुख्ता करने वाली चीजों को ढूंढने के लिए.

और, हम वाद-विवाद करते हैं तो सत्य का पता लगाने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी धारणा को ऐन-कैन-प्रकारेण पुख्ता बनाने के लिए!”

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59

संसदीय हास परिहास -2

बाबू जगजीवन राम रेल बजट पेश कर रहे थे. अपने बजट भाषण में उन्होंने सांसद की पत्नियों के लिए निशुल्क रेल यात्रा की घोषणा की. एक अविवाहित सांसद ने पूछा – अविवाहित सांसद क्या यह सुविधा अपने मित्र के लिए ले सकते हैं? बाबूजी ने कहा – यह सुविधा स्पाउस (spouse) के लिए है, स्पाइस(spice) के लिए नहीं!

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

303

स्वयं को बदलकर ही दुनिया को बदलो

सूफी संत बयाज़िद ने अपने बारे में बताते हुए कहा - ‘मैं अपनी जवानी के दिनों में क्रांतिकारी विचारों से ओतप्रोत था। मैं हर समय ईश्वर से यही मांगता कि मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं दुनिया बदल सकूँ।’

जैसे-जैसे मैं अधेड़ावस्था में पहुँचा, मैंने यह महसूस किया कि मेरा आधा जीवन यूँ ही व्यर्थ गुजर गया है और मैं एक भी व्यक्ति को नहीं बदल पाया हूँ। तब मैंने अपनी प्रार्थना बदल दी। मैं यह प्रार्थना करने लगा कि हे प्रभु, मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को बदल सकूँ। मैं अपने संपर्क में आने वाले मित्रों और संबंधियों को बदलकर ही संतुष्ट हो जाऊँगा।

अब जबकि मैं वृद्धावस्था में पहुँच गया हूँ और जीवन के कुछ दिन ही शेष हैं, प्रभु से मेरी सिर्फ एक ही विनती है कि मुझे सिर्फ इतनी शक्ति दो कि मैं अपने आप को बदल सकूँ।

यदि मैंने प्रारंभ से ही यह प्रार्थना की होती तो मेरा जीवन व्यर्थ नहीं गया होता।

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304

मुर्गा और आभूषण

एक मुर्गा अपनी मुर्गियों व स्वयं का पेट भरने के लिए भोजन की तलाश में खेत की जमीन खोद रहा था। तभी उसे जमीन में दबा एक आभूषण मिला। वह समझ गया कि यह जरूर कोई बेशकीमती चीज़ है।

जब उसे समझ में नहीं आया कि उस आभूषण का क्या किया जाये, तो वह बोला- "ऐसे व्यक्तियों के लिये जो तुम्हारी कीमत समझते हैं, तुम निश्चय ही बेहतरीन हो। लेकिन मैं एक दाना अनाज के बदले संसार के सभी आभूषणों को कुर्बान कर सकता हूँ।'

"किसी वस्तु का मूल्य उसे देखने वाले की आँखों में होता है।'

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56

सुखी व्यक्ति की कमीज

खलीफा एक बार बीमार पड़ गया. उसे रेशमी वस्त्रों, नर्म गद्दों में भी आराम नहीं मिलता था, नींद नहीं आती थी और बेवजह दुःखी रहता था. दुनिया के तमाम वैद्यों हकीमों को बुलाया गया. परंतु किसी को भी बीमारी समझ नहीं आ रही थी और लिहाजा इलाज भी नहीं हो पा रहा था. अंत में एक ऐसे वैद्य को बुलाया गया जो अपने विचित्र परंतु प्रभावी इलाज हेतु प्रसिद्ध था. वैद्य ने देखते ही बताया कि खलीफा का इलाज बस यही है कि किसी सुखी व्यक्ति की कमीज खलीफा के सिर पर घंटे भर के लिए रखी जाए.

चहुँओर सुखी व्यक्ति को ढूंढा जाने लगा. जिसे भी पूछो, वो किसी न किसी कारण से दुःखी था. व्यक्तियों को दुःखी बनाने के सैकड़ों हजारों अनगिनत कारण थे. इस बीच सुखी व्यक्ति ढूंढने वाले खलीफा के सिपाहियों को एक गरीब चरवाहा अपने ढोरों के साथ जाते हुए मिला. उनमें से एक ने चरवाहे से मजाक में पूछा – क्यों रे तू सुखी है या दुखी?

चरवाहे ने जवाब दिया – मैं दुःखी क्यों होऊं? मैं तो दुनिया का सबसे सुखी इंसान हूं.

तो चल निकाल अपनी कमीज उतार हमें अपने खलीफा के लिए यह चाहिए – एक सिपाही ने कहा.

पर, मेरे पास न तो कमीज है और न ही मैं कमीज पहनता हूं – चरवाहे ने कहा.

जब यह बात खलीफ़ा तक पहुँची तो उन्होंने मंथन किया और पाया कि उनकी बीमारी की जड़ रेशमी वस्त्र, नर्म गद्दे और हीरे-जवाहरात हैं. खलीफा ने वे सब सामाजिक कार्य में वितरित कर दिए. खलीफा अब स्वस्थ और सुखी हो गया था.

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57

विद्या ददाति विनयम्

एक स्टेशन पर एक युवक छोटा सा सूटकेस हाथ में लेकर ट्रेन से उतरा. उतर कर वह कुली ढूंढने लगा. कुली-कुली उसने कई आवाजें लगाई, परंतु कोई कुली नहीं आया. उस युवक के साथ एक अन्य व्यक्ति भी ट्रेन से उतरा. उसने जब देखा कि युवक एक बहुत ही छोटे से सूटकेस को उठाने के लिए कुली ढूंढ रहा है तो उसकी मदद के लिए गया कि शायद युवक को कुछ स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होगी, जिसके कारण वह छोटे से सूटकेस को ढोने के लिए भी कुली ढूंढ रहा है.

उस व्यक्ति ने युवक से पूछा – आप इस जरा से सूटकेस को उठाने के लिए कुली को क्यों ढूंढ रहे हैं?

मैं पढ़ा लिखा व्यक्ति हूँ, और सूटकेस छोटा हो या बड़ा इसे तो कुली ही उठाते हैं – युवक ने जवाब दिया.

कुली तो हैं नहीं, यदि तुम्हें कोई समस्या न हो तो मैं इसे उठा कर आप जहाँ कहें पहुँचा देता हूं – उस व्यक्ति ने प्रस्ताव दिया.

युवक सहर्ष राज़ी हो गया. गंतव्य पर पहुँचने पर युवक उस व्यक्ति को मेहनताना देने लगा. मगर उस व्यक्ति ने मना कर दिया.

शाम को वहीं स्टेशन के पास एक सभागार में प्रसिद्ध विद्वान ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भाषण था. सभागार में वह युवक भी पहुँचा. दरअसल वह खासतौर पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भाषण सुनने ही इस शहर में आया था.

उसने देखा कि वह व्यक्ति जिसने उसका बैग उठाया था, और कोई नहीं, ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

301

वर्तमान में जियो

एक कंजूस व्यक्ति ने जीवन भर कंजूसी करके पांच लाख दीनार एकत्रित कर लिये। इस एकत्रित धन की बदौलत वह एक साल तक बिना कोई काम किए चैन की बंशी बजाने के स्वप्न देखने लगा। इसके पहले कि वह उस धन को निवेश करने का इरादा कर पाता, यमदूत ने उसके दरवाज़े पर दस्तक दे दी।

उस व्यक्ति ने यमदूत से कुछ समय देने की प्रार्थना की परंतु यमदूत टस से मस नहीं हुआ। उसने याचना की - "मुझे तीन दिन की ज़िंदगी दे दो, मैं तुम्हें अपना आधा धन दे दूँगा।" पर यमदूत ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।

उस व्यक्ति ने फिर प्रार्थना की - "मैं आपसे एक दिन की ज़िंदगी की भीख मांगता हूं। इसके बदले तुम मेरी वर्षों की मेहनत से जोड़ा गया पूरा धन ले लो।" पर यमदूत फिर भी अडिग रहा।

अपनी तमाम अनुनय-विनय के बाद उसे यमदूत से सिर्फ इतनी मोहलत मिली कि वह एक संदेश लिख सके। उस व्यक्ति ने अपने संदेश में लिखा - "जिस किसी को भी यह संदेश मिले, उससे मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि वह जीवनभर सिर्फ संपत्ति जोड़ने की फिराक में न रहे। ज़िंदगी का एक - एक पल पूरी तरह से जियो। मेरे पांच लाख दीनार भी मेरे लिए एक घंटे का समय नहीं खरीद सके।"

302

सतत जागरूकता

ज़ैन विद्या सीखने वाले छात्र को तब तक इसके अध्यापन की अनुमति नहीं है जब तक कि वह कम से कम 10 वर्ष तक अपने गुरू के सानिध्य में न रहे।

टैनो नामक एक छात्र 10 वर्ष का कठिन परिश्रम करके 'गुरू' का दर्ज़ा प्राप्त करने में सफल हो गया। एक दिन वह अपने गुरू नैनिन से मिलने गया। उस दिन तेज बारिश हो रही थी, इसलिये टैनो ने लकड़ी की खड़ाऊँ पहनी तथा अपने साथ छाता लेकर गया।

जैसे ही उसने गुरू जी के कक्ष में प्रवेश किया, उन्होंने उससे पूछा -"लगता है तुमने अपनी खड़ाऊँ और छाता बाहर दालान में ही छोड़ दिया है। तुम मुझे यह बताओ कि तुमने अपना छाता बांयी ओर रखा है या खड़ाऊँ?"

टैनो को इस बारे में कुछ याद नहीं था अतः वह उत्तर न दे पाने के कारण शर्मिंदा हो गया। उसे यह एहसास भी हो गया कि वह लगातार जागरूक नहीं रह सका। वह पुनः नैनिन का शिष्य बन गया और सतत जागरूकता के अभ्यास के लिए पुनः 10 वर्षों तक श्रम किया।

"ऐसा व्यक्ति जो लगातार जागरूक रहता है तथा हर पल में पूरी तरह

शरीक होता है, वही गुरू कहलाने के योग्य है।"

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54

दुनिया मेरी नजर में

गांव के बाहर बने चौपाल पर उस गांव का एक निवासी रस्सियाँ बुनता हुआ बैठा था.

इतने में एक यात्री वहाँ आया और उस निवासी से जानना चाहा कि इस गांव में किस किस्म के व्यक्ति रहते हैं. यात्री ने आगे बताया कि वो अपने वर्तमान गांव को छोड़ कर नई जगह बसना चाहता है.

गांव के निवासी ने पूछा – तुम्हारे वर्तमान गांव में किस किस्म के लोग रहते हैं?

वे सभी लालची, कूढ़ मगज, निष्ठुर और असभ्य हैं – यात्री ने बताया.

इस गांव के निवासी भी ठीक ऐसे ही हैं – गांव के उस निवासी ने खुलासा किया.

 

संयोगवश थोड़ी देर के बाद एक अन्य यात्री वहाँ पहुँचा और उसने भी उस निवासी से ठीक यही बात पूछी. क्योंकि वह भी अपना गांव छोड़कर नए गांव में बसना चाहता था.

गांव के उस निवासी ने यात्री से वही प्रश्न पूछा कि उसके वर्तमान गांव में किस किस्म के लोग रहते हैं.

यात्री ने बताया – हमारे गांव के निवासी दयालु, बुद्धिमान, सभ्य, भद्र अच्छे हैं.

उस निवासी ने कहा – हमारे गांव में भी सभी ऐसे ही हैं.

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55
फल खाने की अधीरता

आम के मौसम में बग़ीचे में बंदरों का खूब उत्पात रहता था. बहुत सारा फल बंदर खा जाते थे. इस बार मालिक ने बंदरों को दूर रखने के लिए कुछ चौकीदार रख लिए सुरक्षा के कड़े उपाय अपना लिए.

बंदरों को मीठे आम का स्वाद मिलना मुश्किल हो गया. वे अपने सरदार के पास गए और उनसे अपनी समस्या के बारे में बताया.

बंदरों के सरदार ने कहा कि हम भी इनसानों की तरह आम के बगीचे लगाएंगे, और अपनी मेहनत का फल बिना किसी रोकटोक के खाएंगे.

बंदरों ने एक बढ़िया जगह तलाशा और खूब सारे अलग अलग किस्मों के आम की गुठलियाँ एकत्र किया और बड़े जतन से उन्हें बो दिया.

एक दिन बीता, दो दिन बीते बंदर सुबह शाम उस स्थान पर जा कर देखते. तीसरे दिन भी जब उन्हें जमीन में कोई हलचल दिखाई नहीं दी तो उन्होंने पूरी जमीन फिर से खोद डाली और गुठलियों को देखा कि उनमें से पेड़ क्यों निकल नहीं रहे हैं. इससे गुठलियों में हो रहे अंकुरण खराब हो गए.

कुछ पाने के लिए कुछ समय तो देना पड़ता है!

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

299

उत्कृष्टता को साझा करना

एक किसान को हमेशा राज्य स्तरीय मेले में सर्वश्रेष्ठ मक्का उत्पादन के लिए पुरस्कार मिलता था। उसकी यह आदत थी कि वह अपने आसपास के किसानों को मक्के के सबसे अच्छे बीज बांट देता था।

जब उससे इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा - "यह मेरे ही हित की बात है। हवा अपने साथ पराग कणों को उड़ा कर लाती है। यदि मेरे आसपास के किसान घटिया दर्जे के बीज का प्रयोग करेंगे तो इससे मेरी फसल को भी नुक्सान पहुँचेगा। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि वे बेहतरीन गुणवत्ता के बीजों का प्रयोग करें।"

जो कुछ भी आप दूसरों को देते हैं, अंततः वही आपको वापस मिलता है।

अतः यह आपके ही स्वार्थ की बात है कि आप स्वार्थरहित बनें।

300

मैंने देखने से मना कर दिया!

मूक और बधिर संस्था के दो छात्रों में आपस में झगड़ा हो गया। जब उस संस्था का कर्मचारी उनके बीच के विवाद के निपटारे के लिए आया तो उसने देखा कि एक मूक-बधिर दूसरे की ओर पीठ करके खड़ा है और ठहाके लगा रहा है।

उसने पहले व्यक्ति से अंगुलियों के इशारों से पूछा - "आखिर माजरा क्या है? तुम्हारा साथी इतना गुस्से में क्यों लग रहा है?"

उस व्यक्ति ने इशारा करते हुए उत्तर दिया - "दरअसल वह मुझे कसम दिलाना चाहता है पर मैंने देखने से ही मना कर दिया।"

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52

दर्प का सत्य

एक नगर में एक तीरंदाज रहता था. उसने तीरंदाजी में इतनी निपुणता हासिल कर ली थी कि वह निशाने पर लगे तीर पर फिर से निशाना लगा कर उसे बीच में से दो-फाड़ कर देता था. अपनी कौशलता पर उसे घमंड हो आया और वह अपने आपको अपने गुरु से भी ऊँचा समझने लगा.

शिष्य का यह अभिमान गुरु तक पहुँचना ही था. गुरु ने एक दिन अपने शिष्य से यात्रा पर चलने को कहा. रास्ते में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल नहीं था. एक बड़े से वृक्ष को काटकर पुल का रूप दे दिया गया था. नदी किनारे पर पहुँचते ही गुरु ने शिष्य से रुकने को कहा और तीर धनुष लेकर वृक्ष के तने के बने पुल के सहारे नदी की बीच धारा के ऊपर पहुँच गए. और वहाँ से किनारे एक वृक्ष पर निशाना साध कर तीर चलाया. तीर वृक्ष के तने पर धंस गया. गुरु ने फिर से निशाना लगाकर तीर चलाया और वृक्ष पर धंसे तीर को बीच में से दो-फाड़ कर दिया.

गुरु ने शिष्य से ऐसा ही करने को कहा. शिष्य पुल रूपी वृक्ष के तने के बीच में पहुँचा. नीचे नदी की तेज धारा बह रही थी. थोड़े से ही असंतुलन से नीचे गिर जाने और धारा में बह जाने का खतरा था. शिष्य ने तीर चलाया. वह वृक्ष के तने में जा धंसा. अब शिष्य ने उस धंसे तीर को दो-फाड़ करने के लिए दोबारा निशाना लगाया. मगर तीर निशाने पर लगने के बजाए वृक्ष के तने से कई इंच बाहर निकल कर जा गिरा. दरअसल नीचे बहती नदी की तेज धारा और लकड़ी के तने से बने संकरे फिसलन युक्त पुल की वजह से भयभीत हो उसके कदम लड़खड़ा रहे थे और इस वजह से उसका निशाना चूक गया था. जबकि गुरु ने अपने भय पर पहले ही नियंत्रण पा लिया था.

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53

त्रुटियों पर ध्यान

कुछ बच्चे बरसाती नदी के ऊपर बने पुलिया पर खेल रहे थे. वे कंकड़ों से नीचे बहती हुई नदी में डूबते-उतराते छोटी मोटी चीजों पर निशाना लगा रहे थे. उनमें से किसी का निशाना नहीं सध रहा था.

एक स्वामी जी उधर से गुजर रहे थे. उन्हें बच्चों के इस खेल को देखने में आनंद आ रहा था. वे बड़ी देर से उनके खेल को देख रहे थे. एक बच्चे का ध्यान उनकी तरफ गया तो उसने स्वामी जी से कहा – महाराज! हमारा निशाना तो नहीं लग रहा. क्या आप निशाना लगा सकते हैं?

स्वामी जी मुस्कुराए. बोले - मैं कोशिश कर सकता हूं.

उन्होंने कुछ पत्थर लिए और बहते लक्ष्यों पर निशाना साधा. हर पत्थर निशाने पर लगा. बच्चे आश्चर्यचकित थे. उन्होंने स्वामी से पूछा कि ऐसा कैसे किया.

स्वामी जी ने बताया – मैं आप सबको निशाना लगाते देख रहा था. मैं यह ध्यान से देख रहा था कि आप सब कहाँ गलतियाँ कर रहे हैं. निशाना लगाते समय मैंने वे गलतियाँ नहीं कीं.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

297

अंडे

मुल्ला नसरुद्दीन अंडे बेचकर गुजारा करते थे। एक दिन एक व्यक्ति उनकी दुकान पर आया और बोला - "बताओ मेरे हाथ में क्या है ?'

नसरुद्दीन बोला - "मुझे कोई सुराग दो।'

वह व्यक्ति बोला - "एक क्या, मैं तुम्हें कई सुराग दूँगा। यह अंडे के आकार का है। यह अंडे की तरह लगता है। इसका स्वाद और गंध भी अंडे की तरह है। अंदर से यह सफेद और पीला है। वैसे तो यह तरल रूप में होता है पर पकाने या गर्म करने पर ठोस जाता है। इसके अलावा, यह मुर्गी से प्राप्त होता है...........'

"हाँ में समझ गया। तुम शायद केक की बात कर रहे हो।' - मुल्ला नसरूद्दीन तपाक से बोला।

"कभी कभी ज्ञानी व्यक्ति को भी प्रत्यक्ष दिखने वाली वस्तु दिखायी नहीं पड़ती और पादरी को मसीहा दिखायी नहीं देते।'

298

क्या कुत्ता जानता है ?

मुल्ला नसरुद्दीन एक गुर्राते हुये भयंकर दिखने वाले कुत्ते से भयभीत हो रहे थे। उस कुत्ते के मालिक ने कहा - "डरो मत। क्या तुमने यह कहावत नहीं सुनी कि जो भौंकते हैं, वे काटते नहीं।'

नसरुद्दीन ने उत्तर दिया - "तुम यह कहावत जानते हो। मैं भी यह कहावत जानता हूँ। पर क्या यह कुत्ता जानता है?'

---.

50

क्या आपका जीवन इतना कीमती है कि इसे बचाया जाए?

एक बच्चा नदी में नहा रहा था. अचानक वह लहरों में फंस कर डूबने लगा. संयोग से पास से गुजर रहे मुल्ला ने उसे डूबते देखा तो तुरंत नदी में छलांग लगा कर उस डूबते बच्चे को नदी से बाहर निकाला.

जब मुल्ला जाने लगा तो बच्चे ने धन्यवाद दिया.

मुल्ला ने कहा – धन्यवाद किसलिए?

बच्चे ने कहा – आपने मेरी जान बचाई इसलिए.

मुल्ला ने जवाब दिया – बच्चे, ठीक है, जब तुम बड़े हो जाओगे तो यह सुनिश्चित जरूर करना कि तुम्हारी जिंदगी सचमुच बचाने लायक थी!

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51

वर्तमान का सदुपयोग

एक ऋषि की मृत्यु के उपरांत उनके शिष्य गमगीन बैठे थे. उनमें से किसी का भी ज्ञान अर्जन अथवा दैनंदिनी कार्यों में मन नहीं लग रहा था.

ऋषि की मृत्यु की खबर पाकर उनके एक ऋषि मित्र आश्रम पहुँचे. उन्होंने स्वर्गीय ऋषि के शिष्यों की हालत देखी तो उनसे पूछा – तुम्हारे गुरु ने तुम्हें सर्वाधिक महत्वपूर्ण कौन सी बात सिखाई है?

सभी ने एक स्वर में कहा - वर्तमान का भरपूर सदुपयोग करो.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

295

ठीक उस जगह

एक गुरू जी नदी के तट पर ध्यान अवस्था में बैठे थे। उनके एक शिष्य ने उनके चरणों में श्रद्धा एवं समर्पण के प्रतीक के रूप में दो बेशकीमती मोती रखे।

गुरू जी ने अपनी आँखें खोलीं, उनमें से एक मोती को उठाया और उसे इतनी असावधानी से पकड़ा कि वह उनके हाथ से छिटक कर लुढ़कता हुआ नदी में चला गया।

शिष्य ने आव देखा न ताव, नदी में छलांग लगा दी। उसने कई गोते लगाये पर मोती को ढ़ूँढ़ने में असफल रहा।

अंततः थककर उसने पुनः अपने गुरू का ध्यान भंग किया और बोला - "आप उस जगह को जानते हैं, जहाँ वह मोती गिरा है। कृपया मुझे वह जगह बता दें ताकि मैं आपके लिये मोती खोज़ कर ला सकूं।

गुरू जी ने दूसरा मोती अपने हाथ में लिया और पानी में फेंकते हुए बोले - "ठीक उस जगह।'

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296

चाय के कप

एक छात्र ने गुरू सुजुकी रोशी से पूछा कि जापानी लोग अपने चाय के कपों को इतना पतला क्यों बनाते हैं कि वे आसानी से टूट जायें ?

गुरू जी ने उत्तर दिया -"कप नाजुक नहीं हैं बल्कि तुम्हें उन्हें पकड़ने का सलीका नहीं आता। वातावरण को बदलने के बजाए तुम्हें अपने आप को इसके अनुरूप ढ़ालने की कला आनी चाहिए।'

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48

न्याय की कुर्सी

प्राचीन काल में मध्य भारत में राजा भोज नामक एक न्याय-प्रिय राजा राज्य करता था. वह अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध था.

एक बार उसके राजदरबार में एक व्यक्ति न्याय के लिए आया और अपना दुखड़ा सुनाया कि उसने दूर देश की यात्रा पर जाने से पहले घर के हीरे जवाहरात और गहने अपने पड़ोसी को सुरक्षित रखने के लिए दे दिया था, क्योंकि मेरे छोटे बच्चों के साथ मेरी पत्नी निपट अकेली थी. परंतु जब मैं यात्रा से वापस लौटा तो इसके मन में खोट आ गया है और यह मेरे जवाहरातों को वापस लौटाने के बजाय कह रहा है कि उसने तमाम जवाहरात मेरी पत्नी को पहले ही लौटा दिए हैं. जबकि उसने मेरी पत्नी को कोई जवाहरात नहीं लौटाए हैं.

राजा भोज ने पड़ोसी से तहकीकात की तो पड़ोसी ने गांव के कोतवाल और सरपंच को गवाह के तौर पर पेश कर दिया कि उनके सामने उसने गहने उसकी पत्नी को लौटाए हैं.

राजा भोज ने इन गवाहियों को सत्य मानते हुए फैसला सुना दिया. मगर वह व्यक्ति प्रलाप करने लगा कि राजा का फैसला न्यायोचित नहीं है. प्रलाप करते ही उसने कहा कि
इससे तो बेहतर एक गांव का चरवाहा न्याय सुनाता है.

राजा भोज को उस चरवाहे के बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने उस व्यक्ति और गवाह कोतवाल और सरपंच को लेकर चरवाहे के पास पहुँचे और कहा कि वो न्याय करे.

चरवाहे ने एक टीले पर बैठकर पूरी बात सुनी और कोतवाल को अकेले बुलाया. उससे पूछा कि जवाहरात कैसे थे कितने थे और उनका रूप रंग कैसा था.

उसके पश्चात चरवाहे ने सरपंच को बुलाकर यही बात पूछी.

और फिर चरवाहे ने फैसला सुना दिया कि पड़ोसी झूठ बोल रहा है. दरअसल कोतवाल और सरपंच दोनों ने हीरे जवाहरातों और गहनों के बारे में पूरी तरह भिन्न और अलग विवरण दिये थे, जिसमें कोई मेल नहीं था. थोड़ी कड़ाई से पूछताछ करने पर कोतवाल और सरपंच ने मुंह खोल दिया कि उसे उस व्यक्ति के पड़ोसी ने रिश्वत देकर यह गवाही देने के लिए कहा था.

राजा ने चरवाहे से पूछा कि वो ऐसा चतुराई भरा निर्णय कैसे दे देता है. चरवाहे ने कहा कि उसे खुद नहीं मालूम. मगर जब वह इस टीले पर बैठता है तो उसका दिमाग चलने लग जाता है.

राजा भोज ने उस टीले की खुदाई की तो वहाँ से राजा विक्रमादित्य का सिंहासन मिला, जिसमें 32 पुतलियाँ थीं. सिंहासन बत्तीसी नामक ग्रंथ इसी सिंहासन के 32 पुतलियों द्वारा सुनाई गई कहानियों पर आधारित है.

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49

जो राम रचिराखा...

लंका विजय के लिए समुद्र पर पुल बनाया जा रहा था. सुग्रीव की वानर सेना इस कार्य में लगी हुई थी. बड़े और विशाल पत्थरों को ढो कर लाया जा रहा था और समुद्र पर पुल बनाने के लिए डाला जा रहा था. ये पत्थर पानी में डूब नहीं रहे थे, बल्कि तैर रहे थे.

राम जी भी यह देख रहे थे और यह सोचते हुए कि उन्हें भी अपना योगदान देना चाहिए. उन्होंने कुछ पत्थर उठाए और समुद्र में डाले. परंतु उनके द्वारा डाले गए पत्थर समुद्र में डूब गए. उन्होंने कई बार प्रयास किए, परंतु उनके द्वारा समुद्र में डाले गए पत्थर डूब ही जाते थे. जबकि तमाम उत्साहित वानर सेना द्वारा डाले गए पत्थर डूबते नहीं थे. राम जी थोड़े परेशान हो गए कि आखिर माजरा क्या है.

हनुमान जी बड़ी देर से राम जी को यह कार्य करते देख रहे थे और मंद ही मंद मुस्कुरा रहे थे. अचानक राम जी की नजर उनपर पड़ी.

हनुमान जी ने कहा – हे प्रभु! जिसको आपने छोड़ दिया, उसे कौन बचाएगा? उसे तो डूबना ही है...

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

293

हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं

सिकंदर महान जब भारत से लौटने को हुआ तो उसे याद आया कि उसकी जनता ने उसे अपने साथ एक भारतीय योगी को लाने के लिए कहा था। उसने योगी की खोज़ प्रारंभ कर दी। उसे जंगल में पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठे हुए एक योगी दिखायी दिये। सिकंदर, शाति से उनके सामने जाकर बैठ गया।

जब योगी ने अपनी आँखें खोलीं, तो सिकंदर ने पाया कि उनके इर्द-गिर्द एक दैवीय प्रकाश फैल गया है। उसने योगी से कहा -"क्या आप मेरे साथ यूनान चलना पसंद करेंगे ? मैं आपको सब कुछ दूँगा। मेरे महल का एक भाग आपके लिए आरक्षित रहेगा और आपकी सेवा में हर समय सेवक तैयार रहेंगे।'

योगी ने मुस्कराते हुए कहा - "मेरी कोई आवश्यकतायें नहीं हैं। मुझे किसी भी सेवक की आवश्यकता नहीं है और मेरी यूनान जाने की भी कोई इच्छा नहीं है।'

योगी द्वारा दो-टूक मना करने पर सिकंदर नाराज हो गया। वह क्रोधित हो उठा। अपनी तलवार निकालते हुए उसने योगी से कहा, "क्या तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े भी कर सकता हूँ ? मैं विश्व विजेता सिकंदर महान हूँ।'

योगी ने पुनः शांत भाव से मुस्कराते हुए कहा - "तुमने दो बातें कहीं हैं। पहली यह कि तुम मुझे कई टुकड़ों में काट सकते हो। नहीं, तुम कभी मुझे टुकड़ों में नहीं काट सकते। हाँ, तुम सिर्फ मेरे शरीर को काट सकते हो जिसे मैं सिर्फ एक आभूषण की तरह धारण किए हुए हूँ। मैं अमर और नश्वर हूँ। दूसरी बात तुमने यह कही है कि तुम विश्व-विजेता हो। मेरे विचार से तुम केवल मेरे गुलाम के गुलाम हो।'

अचंभित सिकंदर ने पूछा - "मैं कुछ समझा नहीं ?'

तब योगी ने कहा - "क्रोध मेरा गुलाम है। यह पूर्णतः मेरे नियंत्रण में है। लेकिन तुम क्रोध के गुलाम हो। कितनी आसानी से तुम क्रोधित हो जाते हो। इसलिये तुम मेरे गुलाम के गुलाम हुये।'

 

294

प्रशिक्षक का घूंसा

जिटोकू एक बेहतरीन कवि था। उसने एक बार ज़ेन नामक कला का अध्ययन करने का इरादा किया। इसलिए वह इस कला के माहिर प्रशिक्षक इक्की के पास गया। काफी उम्मीदों के साथ वह उनके पास पहुँचा। जैसे ही उसने प्रवेश किया, उसे एक जोरदार घूंसे का सामना करना पड़ा। उसे काफी आश्चर्य और उत्पीड़न महसूस हुआ। इसके पहले किसी ने भी उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं की थी। लेकिन ज़ेन कला का यह बेहद सख्त नियम था कि जब तक गुरू की आज्ञा न हो, तब तक कुछ कहने या करने की मनाही थी। इसलिये वह चुपचाप बाहर चला गया। वह उनके प्रमुख शिष्य डोकुओन के पास गया एवं उसे पूरी घटना का वृतांत सुनाया। उसने गुरू को द्वन्द्व युद्ध के लिये आमंत्रित करने का अपना इरादा भी बताया।

डोकुओन ने पूरी बात सुनने के बाद कहा - "लेकिन गुरूदेव तो तुम्हारे प्रति कुछ अधिक ही दयालुता से पेश आये। अपने आप को ज़ैन के अभ्यास के लिए समर्पित कर दो। तुम स्वयं में फर्क देखोगे।'

जिटोकू ने ऐसा ही किया। तीन दिन और रात के कठोर परिश्रम के बाद उसे उसकी कल्पना के परे अंतर्रात्मा में दिव्‍य प्रकाश का अनुभव हुआ। गुरू इक्की ने भी उसके अंतर्रात्मा प्रकाश को मान्यता प्रदान की।

जिटोकू पुनः डोकुओन के पास गया। उसने उसे धन्यवाद देते हुए कहा- "यदि उस दिन तुमने मुझे सही राह नहीं दिखाई होती, तो मैं कभी भी ऐसा अलौकिक अनुभव नहीं कर पाता। अब मुझे यह भी ज्ञान हो गया है कि गुरू जी ने मुझे बहुत जोर से घूंसा नहीं मारा था।'

 

47

सही या गलत

जापान के प्रसिद्ध ध्यान योग गुरु बेनकेई की कक्षा में पूरे जापान से विद्यार्था शिक्षा लेने पहुँचते थे. एक बार एक विद्यार्थी को वहाँ चोरी करते पकड़ लिया गया. कुछ विद्यार्थियों ने उस चोर को बेनकेई के सामने प्रस्तुत किया. परंतु बेनकेई ने किसी तरह का कोई एक्शन लेने या उस चोर को दंडित करने के बजाय उसे छोड़ दिया और कहा कि कक्षा में मन लगाए.

कुछ दिनों बाद वही विद्यार्थी फिर से चोरी करते पकड़ा गया. बेनकेई ने इस बार भी उस चोर को कुछ नहीं कहा. न तो दंडित किया और न ही उसे कक्षा से निकाला. विद्यार्थियों में से कुछ ने बेनकेई से शिकायत की कि आप उस चोर को यदि दंडित कर शाला से बाहर नहीं निकालेंगे तो हम शाला छोड़ देंगे.

बेनकेई ने कहा – “आप सभी लोग बुद्धिमान हो. क्या गलत है और क्या सही यह सब समझते हो, इसलिए चोरी नहीं करते हो. तुम्हारा वह भाई, जो चोरी करता है, वो तुमसे थोड़ा कम बुद्धिमान है. उसे सही और गलत में फर्क नहीं मालूम. यदि मैं ही उसे यह न सिखाऊं कि चोरी करना गलत है तो फिर उसे यह बात और कौन सिखाएगा? तुम ही क्या, यदि शाला के पूरे विद्यार्थी भी मुझे छोड़कर चले जाएं, तो भी मैं उसे बाहर नहीं निकालूंगा.”

जब यह बात उस चोर विद्यार्थी के पास पहुंची तो, उसकी अश्रुधारा बह निकली और उसके मन से चोरी चकारी इत्यादि के विचार अश्रु में घुल गए, मिट गए.

 

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

291

शेर और गधा

एक बार एक शेर और गधा साथ-साथ शिकार पर जाने को राजी हो गए। कुछ समय बाद वे एक गुफा के पास पहुँचे जहाँ जंगली भेड़ों का झुण्ड घास चर रहा था। शेर गुफा के द्वार पर घात लगाकर बैठ गया जबकि गधा गुफा में प्रवेश कर गया। गुफा में पहुँच कर उसने दुलत्ती मारना और रेंकना प्रारंभ कर दिया जिससे भेड़े डर के मारे गुफा से बाहर को भागीं।

जब शेर ने उनमें से कुछ भेड़ों को पकड़ लिया तो गधा बाहर आया और उसने शेर से यह पूछा कि वह उसके वीरतापूर्ण प्रदर्शन के बारे में क्या राय रखता है ?

शेर ने कहा - "अरे मैं भी तुमसे डर गया होता। वो तो अच्‍छा है कि मुझे पता था कि तुम "गधे' हो ।'

"कूटनीति द्वारा गुलामों की उपयोगिता भी बढ़ जाती है।'

292

विरोध

बार-बार होने वाली आलोचनाओं से व्यथित एक सामाजिक कार्यकर्ता से उसके गुरू ने कहा - "आलोचकों के शब्दों को ध्यान से सुनो। वे उस बात को बताते हैं जो तुम्हारे मित्र तुमसे छुपाते हैं।'

लेकिन उन्होंने यह भी कहा - "आलोचकों द्वारा की गई बातों से कभी निराश मत होना।'

"कोई भी मूर्ति किसी आलोचक के सम्मान में नहीं बनायी जाती।

मूर्तियाँ तो आलोचना के लिये बनायी जाती हैं।'

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45

संसदीय हास-परिहास

एक बार सांसद पीलू मोदी पर लोकसभा अध्यक्ष के अनादर का मामला चला कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष की तरफ पीठ फेर दिया था. मोदी जी ने, जो शारीरिक रूप से भारी भरकम थे, अपना बचाव कुछ यूँ किया – महोदय, मेरा न तो आगा है न पीछा. मैं तो बस गोल-मटोल हूं.

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46

भय बिन होय न प्रीति गुसाईं

मर्यादा पुरुषोत्तम राम लंका विजय के लिए समुद्र के किनारे सेना समेत पहुँचे. उन्होंने समुद्र देव से रास्ता देने का निवेदन किया.

राम ने एक दिन इंतजार किया, दो दिन इंतजार किया और फिर तीसरे दिन भी जब समुद्र देव ने उनके निवेदन को अनसुना कर दिया तो उन्हें भी क्रोध आ गया और उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा पर तीर लगा कर खींचा कि समुद्र का सारा पानी अपने तीर से सुखा डालेंगे.

समुद्र देव डर कर थरथर कांपते हुए प्रकट हुए और हाथ जोड़कर बोले – भगवन्, मुझे क्षमा करें. आप ऐसा अनर्थ न करें. मैं आपसे अनुनय करता हूँ कि आप मेरे सीने पर पुल बना लें, और लंका विजय हासिल करें.

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

289

संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु

चीनी गुरू सोज़ेन से उनके एक छात्र ने पूछा - "संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु कौन सी है?"

गुरू ने उत्तर दिया - "मरी हुई बिल्ली की सिर।"

छात्र ने अचंभित होते हुए पूछा - "मरी हुई बिल्ली का सिर आखिर कैसे सबसे बहुमूल्य हो सकता है?"

गुरू सोज़ेन ने उत्तर दिया - "क्योंकि कोई उसका मूल्य नहीं बता सकता।"

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290

बात पलटना

एक दिन गुस्से से भरा मुल्ला नसरुद्दीन अपने पड़ोसी के घर पहुंचा और बोला - "तुम्हारे सांड ने मेरी गाय पर हमला कर उसे घायल कर दिया दिया है, और मैं मुआवज़ा पाने का हक़दार हूँ।"

पड़ोसी को भी गुस्सा आ गया और वह बोला - "मुझसे मुआवज़ा मांगने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? जानवर की करतूत के लिए किसी आदमी को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?"

नसरुद्दीन बोले - "जी हाँ, आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं। लेकिन शायद मुझसे भी कहने में कुछ गल्ती हो गई है। मैं फिर से बताता हूँ। दरअसल, मेरे सांड ने आपकी गाय को घायल कर दिया है। लेकिन कोई बात नहीं, अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसकी गाय थी और किसका सांड। "

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43

ब्रह्मज्ञान

एक बार एक भिखारीनुमा व्यक्ति अरस्तू के पास गया और उनसे ब्रह्मज्ञान मांगने लगा.

अरस्तू ने उसे सिर से लेकर पैर तक देखा और कहा – “अपने कपड़े साफ करो, और रोज नहाओ-धोओ. अपने बालों को कटवाओ और कंघी करो...गलतियाँ करो, मगर उन्हें दोहराओ नहीं...अपनी गलतियों से सीखो. वास्तविक तपस्या तो अपने आप में झांकना और अपनी गलतियों से सीखना ही है.”

--.

 

44

मुफ़्त के गधे

नसरूद्दीन गधे बेचने का कारोबार करता था. वो साप्ताहिक बाजार में गधे लेकर आता और अपने गधे बेहद कम कीमत में बेचता जिससे उसके सारे गधे बिक जाते और वो ठीकठाक मुनाफा कमाता.

एक दिन गधे बेचने वाला एक दूसरा व्यापारी नसरूद्दीन के पास आया और बोला “मुल्ला, मैं अपने गधों के लिए चारा इधर-उधर से जुगाड़ कर लेता हूं. मेरे चरवाहे बंधुआ मजदूर हैं जिन्हें मैं कोई फूटी कौड़ी भी नहीं देता. इस तरह से मैं गधों पर ज्यादा कुछ खर्चा नहीं करता. फिर भी जो कीमत मैं लगाता हूँ, उसमें कम लाभ मिलता है. तुम तो मुझसे भी कम कीमत में गधे बेचते हो. ऐसे कैसे कर लेते हो?”

मुल्ला ने फिलासफी झाड़ी – “तुम चारा चुराते हो, मैं गधे चुराता हूं”

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आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

287

जिंग और चुआन

जिंग और चुआन ने स्नातक परीक्षा पास करने के तुरंत बाद एक थोक भंडार कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दिया। दोनों ने बहुत मेहनत की। कुछ वर्ष बाद, उनके बॉस ने जिंग का प्रमोशन सेल्स एक्जीक्यूटिव पद पर कर दिया, जबकि चुआन को सेल्स रिप्रिजेन्टेटिव ही बने रहने दिया। चुआन को जब यह बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने अपने बॉस को इस्तीफा सौंप दिया एवं यह उनसे यह शिकायत की कि वे कठोर परिश्रम करने वालों को महत्व न देकर चापलूसों का प्रमोशन करते हैं।

बॉस यह जानते थे कि चुआन ने भी इतने वर्ष परिश्रम से कार्य किया है लेकिन चुआन को उसमें और जिंग में अंतर समझाने के लिए उन्होंने चुआन को एक कार्य करने को कहा। उन्होंने चुआन से कहा कि वह बाजार जाकर ऐसे विक्रेता का पता लगाये जो तरबूज बेच रहा हो। चुआन ने बाजार से लौटकर बताया कि तरबूज बेचने वाला मिल गया है।

बॉस ने पूछा - "कितने रू. किलो ?'

चुआन फिर बाजार गया और लौटकर बोला - "12 रू. प्रति किलो।'

तब बॉस ने चुआन से कहा - "अब मैं यही कार्य जिंग को सौंपूंगा।'

फिर जिंग बाजार गया और लौटकर बोला - "बॉस केवल एक व्यक्ति तरबूज बेचता है। 12 रु. प्रति किलो, 100रु. के 10 किलो। उसके पास 340 तरबूज हैं। उसकी दुकान पर 58 तरबूज थे जिसमें से प्रत्येक लगभग 15 किग्रा. का है। ये तरबूज अभी दो दिन पहले ही दक्षिण प्रांत से लाये गये हैं। ये ताजे, लाल और अच्छी गुणवत्ता के हैं।'

चुआन बहुत प्रभावित हुआ और वह अपने और जिंग में फर्क को समझ गया। अंत में उसने इस्तीफा वापस लेने और जिंग से सीखने का निर्णय लिया।

"एक सफल व्यक्ति हमेशा तल्लीन प्रेक्षक, अधिक चिंतनशील एवं गहराई से सोचने वाला होता है। सफल व्यक्ति कई वर्ष आगे तक का अनुमान कर लेता है जबकि हम

महज कल तक के बारे में ही सोच पाते हैं।'

"एक वर्ष और एक दिन में 365 गुना का अंतर होता है।'

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288

सुख प्राप्ति के लिए 84वीं समस्या को सुलझाना

एक व्यक्ति महात्मा बुद्ध के पास सहायता मांगने के लिए आया। वह अपने जीवन से निराश था। हालांकि ऐसी कोई भयंकर बात नहीं थी परंतु वह व्यक्ति किसी न किसी बात से निराश रहता था और उसके मन में शिकायत बनी रहती। वह एक किसान था। उसे खेती करना अच्छा लगता था। पर कभी-कभी कम बारिश होती थी या कभी-कभी बहुत ज्यादा। जिससे उसकी खेती अच्छी नहीं हो पाती थी। उसकी पत्नी भी बहुत अच्छी थी, जिसे वह प्यार करता था। लेकिन जब वह उससे ज्यादा झेड़खानी करती तो वह चिढ़ जाता। उसके प्यारे-प्यारे बच्चे थे जो उसे अत्यंत प्रिय थे। लेकिन कभी-कभी.........................

बुद्ध ने धैर्यपूर्वक उस मनुष्य की व्यथा सुनी और कहा - "मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।'

भौचक्के रह गए किसान ने कहा -"मैं तो समझता था कि आप एक महान शिक्षक हैं और आप मुझे शिक्षा देंगे।'

बुद्ध ने कहा - "हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या से ग्रस्त है। वास्तव में हम लोग हमेशा ही समस्याओं से घिरे रहते हैं और इसके लिए हम कुछ कर भी नहीं सकते। यदि तुम एक समस्या सुलझा भी लो, तो तुरंत ही दूसरी आ जाएगी। जैसे मान लीजिए कि आप मरने ही वाले हैं। यह तुम्हारे लिए एक समस्या है। और यह ऐसी समस्या है जिससे आप बच नहीं सकते। हम सभी को इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है और उनमें से कुछ कभी समाप्त नहीं होती।'

किसान गुस्से से बोला - "तो आपकी शिक्षा में ऐसी क्या खास बात है?'

बुद्ध बोले - इससे आपको 84वीं समस्या को हल करने में सहायता मिलेगी।

किसान बोला - 84वीं समस्या क्या है?

"यह कि तुम कोई समस्या नहीं चाहते।' - बुद्ध ने उत्तर दिया।

यदि हम अपने आप को इच्छाओं से मुक्त कर लें तो कोई समस्या नहीं रहेगी। स्पष्ट सोच के साथ हम वास्तविक परिस्थितियों का सामना करते हैं। हमारे जीवन में जो भी घटित होता या होने वाला होता है, उसके ऊपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है या जरा सा ही नियंत्रण है। लेकिन हम किसी समस्या से कैसे निपटते हैं, यह पूर्णतः हमारे हाथ में है।

"प्रायः हम अपने जीवन में उत्पन्न हुई परिस्थितियों के प्रति बाहरी रूप से प्रतिक्रिया करते हैं जबकि हमें आध्यात्मिक रूप से प्रतिक्रिया करनी चाहिये।'

--

42

जिंदगी की नाव, आ रही है कि जा रही है?

मुल्ला नदी की ओर जी जान लगा कर दौड़ता हुआ जा रहा था. उसे दूसरे गांव जाना था और नाव जाने का समय हो चुका था, और वह पहले ही लेट हो गया था. नदी किनारे उसे नाव दिखाई दी. वह और जी जान लगा कर भागा और एक छलांग में नाव के ऊपर जा चढ़ा. इस कोशिश में वो नाव में गिर पड़ा, उसके कपड़े फट गए और उसकी कोहनी छिल गई, जिसमें से खून टप टप टपकने लगा.

मगर वो प्रसन्न था. उसने नाव को पकड़ ही लिया था. वो खुशी से उठा और चिल्लाया – मैंने नाव को पकड़ ही लिया. लेट हो गया था, मगर मुझे नाव आखिरकार मिल ही गई.

पास में बैठे दूसरे यात्री ने अपना सामान समेटते हुए मुल्ला को बताया – ये नाव जा नहीं रही है, बल्कि आ रही है, और अभी ही किनारे लगी है!

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