बुधवार, 16 नवंबर 2011

आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 6


आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ
संकलन – सुनील हांडा
अनुवाद – रवि-रतलामी


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उज्जवल भविष्य
अकसर हम अपने टीम सदस्यों को प्रेरित करने के लिए प्रयास करते रहते हैं. कई बार हम कंपनी और व्यक्तिगत सदस्यों के उज्जवल भविष्य हेतु वादा भी करते हैं.

एक धोबी के पास एक गधा था, जो वो सारा काम करता था जो एक गधा करता है. और वह गधा अपने काम से पूरी तरह बोर हो चुका था. वो सोचता था कि अब गधागिरी से तौबा करने का वक्त आ गया है.

एक दिन वह गधा घाट पर एक दूसरे धोबी के गधे से मिला. उनमें वार्तालाप प्रारंभ हुआ. पहला गधा अपने उकताए जीवन के बारे में बताने लगा.

दूसरे गधे ने कहा देखो, मैं भी एक समय तुम्हारी तरह पूरी तरह उकताया हुआ था. मेरी जिंदगी में कोई उजाला नजर नहीं आता था. परंतु पिछले सप्ताह मेरे मालिक ने कुछ ऐसा कहा जिससे मेरा भविष्य अच्छा खासा उज्जवल नजर आने लगा है. तो तुम भी उम्मीद मत हारो. किसी दिन तुम्हारे जीवन के खंडहर में भी बहार आएगी.

ऐसा क्या कह दिया तुम्हारे मालिक ने?” पहले गधे ने पूछा.

दूसरे ने जवाब दिया हाल ही की बात है, एक दिन मेरा मालिक अपनी बेटी से बेहद नाराज हो गया, और उस पर गुर्राया था कि यदि वो लाइन पर नहीं आई तो उसकी शादी अपने गधे यानी मुझसे करवा देगा. अब मेरी जिंदगी में आगे चलने के लिए कुछ तो आसरा है.
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और अब जब भी मैं अपनी टीम के उज्जवल भविष्य के बारे में बात करता हूँ, तो ये कहानी मेरे दिमाग में आती है और मेरे चेहरे में एक मुस्कुराहट!
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12
तेरा तुझको अर्पण
एक समय की बात है. एक बड़ा ही बुद्धिमान और चतुर राजा था और उसके देश की जनता उससे बेहद प्यार करती थी. परंतु राजा अपने कार्यों और राजसी ठाठबाठ से उकता गया था.

एक दिन वह अपने गुरू के पास गया और अपनी समस्या बताई. उसने अपने गुरू से कहा मैं राजकाज से उकता गया हूं. मैं किसी समस्या का कोई हल ढूंढता हूं तो दूसरी समस्या पैदा हो जाती है, और जब मैं इसे हल कर लेता हूं तो तीसरी आ जाती है. रोज रोज नई समस्याएं. मैं बेहद उकता गया हूँ. मैं क्या करूं?”

गुरू ने कहा, ठीक है तो राजगद्दी छोड़ दो
राजा ने प्रतिवाद किया ऐसे में तो समस्या और बढ़ जाएगी. देश में अराजकता फैल जाएगी जिसका जिम्मेदार मैं ठहराया जाऊंगा.

गुरू ने फिर कहा तो राजगद्दी अपने पुत्र को क्यों नहीं सौंप देते?”
राजा ने कहा महाराज, मेरा पुत्र अभी छोटा है और वह राज्य को संभाल नहीं पाएगा.
गुरू ने अंत में कहा फिर तो राजकाज तुम मुझे सौंप दो.
राजा प्रसन्नता पूर्वक बोला हाँ, यह ठीक रहेगा. मैं अभी से ही अपनी राजगद्दी आपको देने की घोषणा करता हूँ. और यह कह कर वह जाने लगा.

गुरू ने राजा से पूछा तुम कहाँ चले?”

मैं कहीं दूर देश चला जाऊंगा, और आम जीवन जीने की कोशिश करूंगा. चिन्ता मुक्त राजा ने कहा.

क्या कहा?” गुरू की भृकुटियाँ तनीं अब तुम मेरे राज्य के एक नागरिक हो और मैं तुम्हारा राजा. तुम्हें राजाज्ञा दी जाती है कि आज से तुम इस राज्य का सारा राजकाज मेरे नाम से चलाओगे. तुम्हारा इसमें कुछ नहीं होगा. यही तुम्हारा कार्य है.

राजा के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था.
कुछ समय के बाद राजा और गुरू की फिर से भेंट हुई. गुरू ने हाल चाल जानना चाहा. राजा ने बताया मैं बेहद खुश हूं. मैं रात को घोड़े बेचकर सोता हूं. दिन में कड़ी मेहनत करता हूँ. समस्याओं को हल करने की पूरी कोशिश करता हूँ. वैसे भी ये सब मेरा नहीं है बल्कि आपका है तो मैं चिंता क्यों करूं? मैं तो बस अपनी ड्यूटी निभाता हूं, और उसी में खुश रहता हूं.
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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

7 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. वाह। दोनों बढ़िया…राजा वाली भी और गधे जी वाली भी…

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  2. नौकरी का अपना ही मजा है और अपने राज का अलग ।

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  3. पहली तो पहले भी पढ़ी थी, दूसरी पढ़कर आनंद आया। गीता में कृष्ण ने कहा है कि लिपायमान हुए बिना कर्मों को करते रहना है। दार्शनिक कहते हैं कि प्रत्येक कर्म में दृष्टा का भाव रहना चाहिए। ज्ञानियों की बातें पढ़ना और उसे कर्म में उतारना..दोनो मे बड़ा फर्क है।

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  4. कहानियां पढ़कर किताब खरीदने की लालसा बढ़ गयी है।

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  5. amisha4:42 pm

    apki kahani bahut good hai

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  6. आप बहुत बढ़िया कार्य कर रहे है , तकनीकी और गैर तकनीकी दोनों में :)

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