आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there -1

कल मैंने इस किताब की चर्चा की थी. और लिखा था कि काश! ये हिंदी में होती. किताब को फिर से उलटने पुलटने पर पाया कि यह तो कॉपी लेफ्टेड किताब है. अतः प्रस्तुत है इसकी कहानियों का हिंदी अनुवाद. कुल 555 कहानियाँ हैं. यहाँ प्रतिदिन 2 कहानियों के अनुवाद के प्रकाशन की कोशिश रहेगी. इस लिहाज से 250 दिनों के भीतर यह पूरी किताब आपके सामने हिंदी में होगी. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

1

घोषणा

मुल्ला नसरुद्दीन भरे बाजार में एक जगह खड़ा हो गया और भीड़ को संबोधित करने लगा.

“भाइयों और बहनो! क्या आप बिना कठिनाई के ज्ञान, बिना मिथ्यापन के सत्य, बिना प्रयास किए उपलब्धियाँ, बिना त्याग किए प्रगति पाना चाहते हैं?”

देखते देखते ही भारी भीड़ जुट गई. हर कोई चिल्लाने लगा – “हाँ, हाँ!”

“बहुत बढ़िया! मुल्ला ने कहा. मैं यही तो जानना चाहता था. आप लोग मुझ पर भरोसा कर सकते हैं. जब भी मुझे ये बातें पता चलेंगी तो मैं आपको अवश्य बताऊँगा”

--

2

मेरा दिल तो पहले से ही वहाँ पर है

एक बुजुर्ग हिमालय पर्वतों की तीर्थयात्रा पर था. कड़ाके की ठंड थी और बारिश भी शुरू हो गई थी.

धर्मशाला के एक कर्मचारी ने पूछा “बाबा, मौसम खराब है. ऐसे में आप कैसे जाओगे?”

बुजुर्ग ने प्रसन्नता से कहा – “मेरा दिल तो वहाँ पहले से ही है. बाकी के लिए तो कोई समस्या ही नहीं है.”

(स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर, सुनील हांडा से साभार अनुवादित. अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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मुल्ला की कथा ओशो बनाकर भी कह जाते थे शायद…ये वाली भी पसन्द आई…बढिया…

मुल्ला नसरुद्दीन का कॉन्टैक्ट नं./ ई-मेल बतायें ताकि गूगल एलर्ट में डालकर निश्चिन्त हो लें। वाह, कितना भला आदमी है...!!!

बढ़िया है. शायद इस किताब में वे कहानियां भी हों जो मेरे ब्लौग पर बहुत पहले आ चुकीं हों. जो नई कहानियां होंगीं उन्हें मैंने अपने ब्लौग पर साभार लगाऊंगा.

इसी ब्लॉग में प्रसन्न रहने की विधियाँ बता दीजियेगा।

निशांत जी,
हाँ, यह बहुत संभव है. अगर आप किताब मंगवा कर देख सकें और हमें बता सकें तो हम नया अनुवाद करने के बजाए, आपके पृष्ठों से यहाँ साभार ले लेंगे.

निहायत गलत बात! हमसे किताब खरिदवा दी, अब कहते हैं कि खुद ही ब्लॉग पर ठेल देंगे फ्री में! :-)

हमने तो कल ही ऑर्डर कर दिया था, पर हिन्दी में पढ़ने का मजा ही कुछ और है।

हाय रे मेरे 113...:)

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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