टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

आइए, थोड़ा उदास हो जाएँ...

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आह! अब तो उल्टी गंगा बहानी होगी. उदास रहने के बहाने ढूंढने होंगे, जुगाड़ लगाने होंगे.

 

अब तक तो हम खुश रहने के हजार बहाने ढूंढते रहे थे. जिधर देखो उधर आदमी खुश दिखाई देता है. भीतर से दुःखी भी हो तो ऊपरी तौर पर खुश नजर आने की कोशिश में लगा रहता है. और नहीं तो खुशी पाने की जुगाड़ में लगा दीखता है. अगर आप अपने आसपास नजर दौड़ाएँ तो पाएंगे कि हर आदमी खुश रहने के जुगाड़ में जी जान से लगा हुआ है. सामने कोई प्रेमी अपने नए, हाई टैक, डबल प्रोसेसर युक्त और कैपेसिटिव टच स्क्रीन युक्त लेटेस्ट एंड्राइड फ़ोन को प्रेम से निहारता हुआ, 3 जी वीडियो कॉलिंग के जरिए अपनी प्रेमिका से लाइव चैट में मस्त है, खुश है. उधर सड़क पर कोई बंदा अभी ही सर्र से अपने नए हीरो करिज़्मा को फुल थ्रॉटल से टेस्ट करता निकला है. वैसे वो जाना पहचाना सा बंदा है जो अकसर इधर से गुजरता है और भीड़ हो या खाली सड़क हर कहीं अपनी बाइक को फुल थ्रॉटल पर रखता है. उसे इसी में खुशी मिलती है. इधर अपने क्यूबिकल में आपका कुलीग अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर ऐंवें.कॉम में क्षणिक खुशी की तलाश कर रहा है.

 

मगर बंधु, रुकिए. ठहरिए. खुशी के पीछे पागल मत बनिए. खुशी पाने के लिए दिन-रात एक मत करिए. खुशी से आपको कई तरह से हानि पहुँच सकती है. सबसे पहले तो ये कि खुशी यूँ ही हासिल नहीं होती. खुशी पाने के लिए आपको मेहनत करनी पड़ती है, नावां कमाना होता है, बीवी-बच्चे-प्रेमिका को खुश करना होता है. हीरो करिज्मा को फुल थ्रॉटल में दौड़ाने के लिए पेट्रोल की जरूरत होती है. और, इन सब में तन मन धन की जरूरत होती है. और, सबसे बड़ा नुकसान ये कि खुशी से आपकी याददाश्त कमजोर होती है. जी हाँ, आपकी याददाश्त कमजोर होती है. कहीं ऐसा न हो कि खुशी की तलाश में आप खुद को भूल जाएँ.

 

नए शोधों से पता चला है कि उदास रहने वालों की याददाश्त तेज होती है. इसका सीधा सटीक अर्थ ये कि खुश रहने से आपकी याददाश्त कमजोर होती है. अब आप या तो खुश रह लें या फिर अपनी याददाश्त तेज कर लें. दूसरे शब्दों में, आपकी भुलक्कड़ी का सीधा संबंध आपकी खुशी से है. अभी तक आप अपनी बीवी या गर्लफ्रेंड के (बहन जी इसके उलट समझ लें,) बर्थडे भूलते रहे हैं तो इसका दोष आप अपनी खुशी को दें. अब आप जैसे भुलक्कड़ों को अपनी दशा सुधारने के लिए उदास रहना होगा और उदास बने रहने के बहाने ढूंढने होंगे.

वैसे, उदास रहने के लिए बहाने ढूंढने की जरूरत नहीं है. आप अपने आसपास की दशा-दिशा को एक बार निहार लें बस. उदास होने और सदा सर्वदा के लिए उदास बने रहने के लिए इतना ही काफ़ी है. उदास रहने के लिए तन मन धन से मेहनत करने की भी जरूरत नहीं होती.

 

यकीन नहीं होता? एक काम करिए, चलिए, पॉलिटिकल सिस्टम को ले लेते हैं. कितना गंदा, कितना खराब हो गया है ये. इस बात पर आप उदास नहीं होगें तो क्या खुश होंगे? सड़कों की हालत ले लीजिए. गड्ढे और ट्रैफ़िक जाम से तो चलते फिरते ही उदास हुआ जा सकता है. वैसे एक वजह पर्यावरण-प्रदूषण भी है खास पढ़े लिखे लोगों को सदैव, सदा सर्वदा उदास बनाए रखने के लिए. नित्यप्रति बढ़ती कीमतें तो ख़ैर, वॉरेन बफ़ेट जैसे लोगों को भी उदास बना सकती हैं तो आपकी तो औकात ही क्या!

 

जो भी हो, इस शोध से एक विकल्प तो मिला है हमें. आपका तो पता नहीं, मगर मैं अपनी बता सकता हूं. मैं खुश रहना चाहूँगा. भले ही भुलक्कड़ हो जाऊँ. और फिर, बीवी की बर्थडे भूल जाने पर बढ़िया सा बहाना भी तो रहेगा – जॉनी, गम न करो, मैं खुश रहता हूं, तुम्हें भी खुश रखता हूँ इसीलिए भूल जाता हूं. तुम भी मेरी छोटी-मोटी भूलने की गलतियों को भूल जाया करो और खुश रहा करो!

छींटे और बौछारें 

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एक टिप्पणी भेजें

कोई बात सीधे सिद्ध न हो सके तो उसे शोध के माध्‍यम से तो साबित किया ही जा सकता है.

बेनामी

बहुत अच्छा लेखा है!

पर हम तो पता नहीं कितना कुछ भुलाना चाहते हैं, इसी लिये प्रसन्न भी रहते हैं।

लगता तो गलत है यह शोध। क्योंकि दुनिया में या कम से कम भारत में अधिकांश आदमी उदास रहते हैं और याददाश्त तो सबकी कितनी मजबूत होती है वह पाँच साल पर या पाँच दिन पर भी देखी जा सकती है। इससे सिद्ध होता है कि यह शोध गलत है और भारत में एक अखबार का थोड़ा हिस्सा विज्ञापन छोड़कर फालतू समाचार में खर्च कर दिया गया है।

आपकी बात कैसे मान लूँ। आज ही मैंने फेस बुक पर लिखा है कि इन दिनों उदासी छाई हुई है और कुछ भी करने को मन नहीं हो रहा। किन्‍तु याद नहीं आ रहा कि उदासी क्‍यों है। अपनी कही बात को सच साबित करने के लिए मेरी मदद कीजिए।

बैरागी जी,
सच तो ये है कि बैरागी कभी उदास नहीं हो सकता. आप खुश हैं, भीतर-भीतर से. बहुत खुश. इसलिए दुनिया जहान की चीजें भूल जाते हैं. मेरी तरह :)

बेनामी

्कय भूल जाये कुछ ज्ख्म अप्नो ने दिये कुछ पारायो ने दिये………………………॥एस एल कुमावत

आपकी शोध बिलकुल सही है। प्रायः यही देखती हूँ की उदास रहने की प्रवित्ति वाले लोगों की याददाश्त अच्छी होती है क्यूंकि वे कुछ भूलना ही नहीं चाहते। छोटे मोटे गम भी कब्र खोद कर याद रखते हैं। इसके विपरीत खुश रहना एक बहुत बड़ा गुण है। खुश रहने वाले हर परिस्थिति में खुश ही रहते हैं, फिर चाहे कुछ याद रहे या फिर भूल जाए।

सुना है उदास रहने से वेट भी कम होता है :)

जिंदगी का एक भी क्षण गलती से भी उदासी में न बीत जाए, ऐसा संकल्प होना चाहिए हर इंसान का. उदासी कई बार हमारे बस में नहीं होती, पर खुशी तो होती है. फर्क बस नज़रिए का है. अगर खुश रहने कि आदत दाल ली तो भला उदासी पास आएगी भी तो कैसे.

बहोत अच्छे काम कि बात बताई
नया हिन्दी ब्लोग
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ap ke mene kai lekh dekhe .aap jitni sateek bhasha me likhte hai vo adbhut hai meri taraf se badhai sweekar kariye.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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