सोचती, बोलती तस्वीरें...

अपने पिछले प्रवास में खींची गई कुछ तस्वीरें. बहुत कुछ बोलती तो बहुत कुछ सोचती सी...

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ड्रीमहाउस

 

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माँ

 

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चूड़ियाँ -1

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चूड़ियाँ 2

 

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दो-स्त्रियाँ

 

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बस स्टैण्ड

 

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चूड़ियाँ 3

 

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चूड़ियाँ 4

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घर-आंगन

 

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हीरो नं 1

 

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शीर्षक-हीन

 

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धूल का फूल

 

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बस स्टैण्ड 2

 

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गुड़िया

 

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फ्रूट-बाजार

 

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हुम्म्...

 

और, अंत में ...

 

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टिप्पणियाँ

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  2. बहुक कुछ बतियाती तस्वीरें।

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  3. मां के बजाय, मंदिर के आलिंद में विराजमान अंबिका. इसी तरह अन्‍य तस्‍वीरें कुछ और भी बोल रही हैं.

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  4. आप तो चित्र भी खूब खींचते हैं। धूल का फूल और घर-आंगन समझ में नहीं आए ठीक से। अच्छे चित्र।

    पिछली बार खून हो गया था।

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  5. तस्‍वीरें सभी अच्‍छी हैं, लेकिन पहली तस्‍वीर सबसे अच्‍छी लगी। देखते ही किसी सुरम्‍य ग्रामीण परिवेश की कल्‍पना में खो गया।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सारे चित्र अपनी कहानी ,खुद कहते लगते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. तस्वीरों में भी जान होती है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेनामी9:28 pm

    चित्र काफ़ी अच्छे लगे। यद्यपि सभी चित्र अच्छे हैं तथापि एक चित्र 'घर आंगन' अपने शीर्षक के साथ न्याय नहीं कर पा रहा लगा। प्रथम चित्र सर्वोत्कृष्ट है। इसमें समग्र ग्रामीण परिवेश दृष्टिगत हो रहा है। द्वितीय चित्र वात्सल्य रस से सराबोर है जिसमें माँ की ममता के दर्शन होते हैं। दरअसल ये दोनों चित्र ऐसे हैं जिनसे देश का हर व्यक्ति स्वयं को जुड़ा हुआ अनुभव करेगा।
    गोपाल कुमार, छात्र (स्नातकोत्तर, हिंदी)
    अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद

    उत्तर देंहटाएं

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