टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

जाको राखे साइंया चुरा सके न कोय...

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(स्कूटी की चाबी का चित्र - मेरे मोबाइल के कैमरे से.)

सुबह-सुबह 5 बजे मेरे मोबाइल के अलार्म की घंटी की हल्की सी आवाज सुनाई दी तो मेरी नींद खुली.  आवाज बेहद हल्की आ रही थी. मुझे लगा कि कहीं किताब या तकिये इत्यादि के नीचे वह दब गया होगा और इस वजह से उसकी आवाज दब रही होगी.

चूंकि अलार्म पूरे 1 मिनट बजता है इसीलिए मैं उठा और उसे बंद करने के लिए ढूंढने लगा. वह कमरे में कहीं नहीं मिला, मगर उसकी घंटी की बेहद हल्की आवाज आ रही थी - यह आवाज अन्य किसी मोबाइल के अलार्म की नहीं हो सकती थी क्योंकि मैंने बड़ा विशिष्ट किस्म का अलार्म टोन लगाया हुआ था. जल्द ही अलार्म बंद भी हो गया. परंतु अलार्म हर दस मिनट के अंतराल से बजता रहता है जब तक कि उसे बंद न कर दिया जाए, अतः मैंने मोबाइल को ढूंढने की गरज से घर के दूसरे फ़ोन से काल किया. मेरे मोबाइल की घंटी कुछ इस तरह से बजी जैसे कहीं सुदूर मंदिर में घंटी बज रही हो.

मेरा माथा ठनका. दिमाग की बत्ती जली. मैं तुरंत नीचे बाहर की ओर दौड़ा.

मेरा मोबाइल बाहर सड़क पर रखी मेरी स्कूटी की सीट पर पड़ा था. सुरक्षित. पूरी तरह से. रात में बारिश के मौसम के बावजूद पानी भी नहीं गिरा था.

दरअसल हुआ यूँ था कि रात में साप्ताहिक हाट से सब्जी-भाजी की खरीदारी कर वापस घर आने पर स्कूटी में से पेट्रोल लीक होने लगा, तो लीक का उद्गम देखने के लिए अपने मोबाइल के ब्राइट-एलसीडी स्क्रीन का सहारा लिया. लीक बंद करने के उठापटक में मोबाइल स्कूटी के सीट पर छूट गई  गया और वहीं रह गई थी गया था. स्कूटी घर के बाहर (पार्किंग की व्यवस्था न होने से, जबकि मकान सरकारी है,) सड़क पर ही खड़ी रहती है, और जाहिर है सीट पर मोबाइल भी रात भर, खुले में बाहर पड़ा रह गया.

कहानी अभी थोड़ी बाकी है...

इससे पहले, उसी रोज साप्ताहिक हाट में खरीदारी करने जाते समय अन-अटैण्डेड पार्किंग में स्कूटी में चाबी (घर की चाबियाँ भी उसमें लगी थीं) लगी रह गई, और आधे घंटे  के उपरांत भी वह सुरक्षित मिल गई. जबकि यही स्कूटी कुछ समय पूर्व इसी क्षेत्र में स्थित लाइब्रेरी के अटेंडेड पार्किंग लाट से दिन दहाड़े, ताला तोड़ कर चोरी कर ली गई थी. वो तो बाद में पता नहीं कैसे, पुलिस वालों द्वारा बरामद कर ली गई और थाने से वापस भी मिल गई थी.

जाको राखे साइंया...
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भाग्यशाली इसे ही कहते हैं, शायद


प्रणाम

चलिए मिल तो गया। लेकिन इस तरह सड़क पर रखते हैं, भारी मुसीबत है साहब!एक गलती कर गए हैं-"लीक बंद करने के उठापटक में मोबाइल स्कूटी के सीट पर छूट गई और वहीं रह गई थी." इसमें मोबाइल को स्त्रीलिंग बना दिया है परेशानी ने क्योंकि वह भी स्त्रीलिंग ही है।

अब बच के रहिए। बार-बार ऐसा नहीं हो सकता।

और मेरी सुनिए,

एक बार कार का ड्राइवर के साथ वाला कांच पूरा खुला छोड़ दिया और दूसरे दिन दोपहर को पता चला. कार में सब कुछ सही सलामत था जबकि वह सड़क पर खुले में खड़ी रही.

आप बहुत लकी हैं. लेकिन आइन्दा ध्यान रखने में ही समझदारी है.

चंदन जी,
ग़लती सुधार दी है. शुक्रिया.

हे भगवान और क्या क्या भूल जाते हैं, आश्चर्य है कि स्कूटी वापस मिल गयी( पुलिस में कोई जानपहचान वाला है क्या:)), हैरान हूँ कि मोबाइल सीट से गिरा नहीं रात भर। कहना तो चाह्ती थी कि हिदायत के तौर पर जहां जायें पत्नी जी को साथ ले कर जायें, लेकिन डर है कि कहीं आप साप्ताहिक हाट में उन्हें भी न भूल आयें और उन्हें किसी और वाहन से आना पड़े…।:)

@अनीता जी - एक बार ये भी हो चुका है. उन्हें बाजार में छोड़कर घर आया तो पाया कि घर पर तो ताला लगा है! तब याद आया कि वो तो आलू छांट रही थीं, और मैं करेले तुलवा कर निकल पड़ा था :)

@निशांत जी - कुछ इस तरह का भी हो चुका है. एक बार मानव संग्रहालय कार्यक्रम देखने पहुंचे तो थोड़ा लेट हो गए थे. जल्दबाजी में गाड़ी लाक-वाक तो ठीक से किया है या नहीं ये तो देख लिया, मगर गाड़ी की हेडलाइट जलती छोड़ दिए. कार्यक्रम खत्म होने के उपरांत गाड़ी जब चालू नहीं हुई तो माजरा समझ आया. और वहाँ तो आपको पता है कि धक्का लगाने वाले भी नहीं मिलते!

स्कूटी और सेल के दूसरे जन्म के लिए बधाई :)

रवि जी,
नमस्कार,

इस भूलने की आदत पर काबू डालें | अच्छा होगा कि आपन एक नियम बना लें जैसे कि घर के बहार स्कूटी पार्क करने के बाद घर के अंदर जाने से पहले ये चैक कर लें कि स्कूटी ठीक से लाक हुई है या नहीं, मोबाईल पेंट या शर्त की जेब में है या नहीं इत्यादि |
आपके ब्लॉग को अपने लिंक को देखने के लिए कलिक करें / View your blog link "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगपोस्ट डाट काम" के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

एक बार मैं भी अपनी बाइक को आफिस के स्‍टैण्‍ड में खडा करके उसमें चाबी लगी छोड गया था। शाम को जब लोटा, तो देखा चाबी लगी हुई थी।

------
बेहतर लेखन की ‘अनवरत’ प्रस्‍तुति।
अब आप अल्‍पना वर्मा से विज्ञान समाचार सुनिए..

भाग्य इसे ही कहते हैं, अगली बार के लिये अग्रिम शुभकामनायें।

हम्म्म तो भूलना आपके लिए आम बात है :)

भाग्यशाली है आप

ऐसा मेरे साथ कम से कम दसियों बार हो चुका है जब मैं वाहन की चाबी निकालना भूल गया और घण्‍टों बाद आया तो सब कुछ सुरक्षित-व्‍यवस्थित मिला। ऐसी घटना के बाद, हर बार डर लगा और भगवान को धन्‍यवाद भी दिया किन्‍तु इसके समानान्‍तर मेरा यह भरोसा बढा कि दुनिया में चोर-उचक्‍के कम हैं।

हा हा हा मजेदार किस्सा है..चूँकि मोबाइल मिल गया है वरना हम कहते बेहद अफ़सोस हुआ...:) जाको छुपाये नजर से साईंया चुरा सके न कोय..

@बैरागी जी - नहीं, मेरे विचार में तो चोरों को लगता होगा कि गाड़ी में चाबी लगी है इसका मतलब है कि गाड़ी का मालिक यहीं कहीं होगा और आता ही होगा, इसीलिए वे उसे छूने से डरते रहे :)

बैरागी जी की बात और रवि जी का उस पर कहा हुआ मजेदार लगा।

कवि और कविता के रूप में उसकी माँ के साथ नए पैदा हुए बच्चे के रूप में inseperable हैं.यहाँ पर इस गहरे रिश्ते के बारे में अधिक पता
http://bit.ly/n9GwsR

शनिदेव की जय हो।

जन्मदिन की ढेरों ढेर बधाई

रवि जी जन्‍मदिन पर आपको ढेरों शुभकामनाएं।

आदरणीया रवि 'रतलामी'जी जन्मदिन की ढेरों ढेर बधाई और शुभकामनाएं!

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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