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यापा बैंड का नशीला इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक

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यापा बैंड जर्मनी के चार युवा दोस्तों का है, जिनमें एक तीन गिटार बजाने वाले हैं और एक ड्रमर. वे पेरिस के पास के एक गांव के स्कूल के दिनों से साथ में बजाते आ रहे हैं. इनके अब तक तीन एलबम क्रानिक्स द एन्दो, कैन आई टाक टू यू और पारी-वागा आ चुके हैं और चौथे की तैयारी है. यापा को आप फ़ेसबुक में यहाँ पर पा सकते हैं.कल उनका लाइव परफ़ार्मेंस था जो इतना जीवंत और शानदार था कि प्रेक्षकों ने खड़े होकर ताली बजाते हुए, दो घंटे के नॉन-स्टाप कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद भी दोबारा संगीत सुनने की मांग की जिसे बैंड ने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारा और प्रेक्षकों का मान रखा.यापा अपनी धुनें जमीन से जुड़कर बनाते हैं. वे विश्वभर में गांव गांव देश देश घूमते हैं और वहाँ रह कर स्थानीय संगीतकारों से संगीत सुनते हैं और उसे फिर फ़्यूजन से अपनी धुनें बनाते हैं, जो बेहद नशीली होती है. एक बार का वाकया उन्होंने बताया कि एक बार वे जीवित ज्वालामुखी देखने गए. ज्वालामुखी के अंदर का लाल पिघलता लावा का सुंदर मनमोहक दृष्य उन्हें इतना भाया कि वे सारे दिन वहीं पड़े रहे और वहीं एक धुन भी तैयार कर ली जो बेहद लोकप्रिय रही.यापा बैंड …

फेसबुक और एमएस आफिस बने दोस्त डॉक्स.कॉम पर

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अपनी वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट फाईलें फेसबुक मित्रों से साझा करेंहमारी कंप्यूटिंग की दुनिया तेजी से क्लाउड की ओर अग्रसर है – मतलब ये कि वो पूरी तरह ऑनलाइन होने जा रही है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण रूप में जब माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने ऑफ़िस सूट 2010 (जिसमें तमाम आफिस तंत्राँश जैसे कि वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट आदि शामिल होते हैं) को जारी किया तो उसमें न केवल ऑनलाइन दस्तावेज़ों के संपादन व साझा करने की सुविधा मुहैया कराई बल्कि ऐसे प्रयोक्ताओं के लिए जो ऑफ़िस सूट ख़रीद कर प्रयोग करने की कतई श्रद्धा नहीं रखते थे, डॉक्स.कॉम-बीटा नाम से ऑफ़िस सूट 2010 का ऑनलाइन संस्करण भी फ़ेसबुक के रास्ते जारी किया। हालांकि माइक्रोसॉफ़्ट फ्यूज लैब्स द्वारा जारी डॉक्स.कॉम अब अभी अपने बीटा संस्करण में ही है और इसमें संपूर्ण ऑफ़िस सूट की सुविधाएँ शामिल नहीं की गई हैं, मगर इस पर त्वरित नजर डालने से इसकी संभावनाओं सुविधाओं के बारे में मालूमात किए जा सकते हैं और ये भी कयास लगाए जा सकते हैं कि भविष्य में क्लाउड कंप्यूटिंग का बिज़नेस मॉडल किस तरह आकार ग्रहण करेगा। यकीनन व्यक्तिगत या घरेलू प्रयोग करने वाला प्रयोक्ता आने …

मार्केटिंग स्ट्रेटेजी

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चहुँओर पर्यावरण रक्षा के संदेशों के बीच जब जनता जागृत हो गई तो उसने दस्तावेज़ों के प्रिंट आउट लेना एक तरह से बंद ही कर दिया. टोनर इंक की घटती डिमांड से परेशान निर्माता ने अपने सेल्समैनों से कहा – डिमांड बढ़ाओ या खुद नौकरी छोड़कर बढ़ जाओ.एक नॉट सो ब्रिलिएंट सेल्समैन के दिमाग में एक बत्ती तब जली जब वो नौकरी न रहने की स्थिति में वापस अपने गांव जाने का प्लान कर रहा था.वो अपनी प्लानिंग बीच में छोड़-छाड़कर अपने मैनेजर के पास भागा. उसे अपना आइडिया बताया -“सर, टिकट के प्रतिदिन औसतन दस लाख प्रिंट आउट निकलते हैं. यदि हम बैकग्राउण्ड काला कर दें तो टोनर की खपत चार गुना बढ़ जाएगी.”मैनेजर की आँखें चमक उठीं. वैसे भी यह तो जरा सी सेटिंग-फेटिंग से हो जाने वाला काम था.टोनर की डिमांड फिर से बढ़ गई. कंपनी फायदे में चलने लगी.मार्केटिंग स्ट्रेटेजी से पहले की टिकिट -बाद की टिकिट---

यस प्राइम मिनिस्टर, यू आर राइट. वाजिब ग़लती और ग़लत काम में बाल बराबर ही तो फ़र्क़ होता है!

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हमारे प्राइम मिनिस्टर सही कहते हैं. वाजिब कहते हैं. वैसे भी नेताओं-मंत्रियों के लिए ग़लती और ग़लत काम में बाल बराबर ही तो फ़र्क़ होता है. और, दरअसल जो बाल बराबर फ़र्क़ होता है वो जरा कुछ इस तरह का होता होगा – कांग्रेसी मंत्री करे तो ग़लत काम, कोएलिशन पार्टनर का मंत्री करे तो, वाजिब ग़लती. मंत्री करे तो वाजिब ग़लती, अफ़सर करे तो ग़लत काम. बड़ा अफ़सर करे तो वाजिब ग़लती, अदना अफ़सर करे तो ग़लत काम. वैसे, ये फ़ॉर्मूला भारत में सर्वव्यापी है. सिर्फ सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार को जोड़कर इस यूनिवर्सल नियम को नहीं देखा जाना चाहिए. प्रधानमंत्री कोई नई बात नहीं कह रहे. अपने दैनिक सामाजिक जीवन में जरा झांकें – पति करे तो वाजिब ग़लती, पत्नी करे तो ग़लत काम. पुत्र करे तो वाजिब ग़लती, पुत्री करे तो ग़लत काम. पिता करे तो ग़लत काम, पुत्र करे तो वाजिब ग़लती (या कई मामलों में इसके उलट). सास करे तो वाजिब ग़लती (वो भी बड़ी मामूली), बहू करे तो ग़लत काम (वो भी बहुत भारी!). सूची यूँ लंबी खिंचेगी, मगर उसे खींचने जैसा ग़लत काम करने का क्या फ़ायदा? ---

इंटरनेट के हिंदी प्रयोक्ताओं के लिए दीपावली के दो उपहार

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पहला उपहार -एक शानदार एमपी3 म्यूजिक प्लेयर एआईएमपी2 हिंदी में!पहले देखते हैं कि शानदार क्यों?अपने सदाबहार म्यूजिक प्लेयर एमपी3 में ट्रैक के साउंड को आन-द-फ्लाई (माने चलते चलते या बजाते बजाते) नार्मलाइज करने की सुविधा नहीं है. आमतौर पर जब हम प्लेलिस्ट पर बहुत से गीतों को बजाते हैं तो होता ये है कि कोई गीत तो तेज आवाज में बजता है और कोई धीमा. आपको प्रायः हर ट्रैक में अथवा हर एलबम में आवाज को कम ज्यादा करना ही होता है. ये बहुत ही झंझट भरा काम होता है. यदि आप विनएम्प में साउन्ड नार्मलाइज करते हैं तो उसके लिए अलग विकल्प से करना होता है और विनएम्प उसे एक तरह से कन्वर्ट कर रखता है और इस हेतु उसे समय और प्रोसेसिंग पावर की जरूरत होती है. विंडोज के डिफ़ॉल्ट म्यूजिक प्लेयर विंडोज मीडिया प्लेयर में चलते-चलते साउंड नार्मलाइज की सुविधा तो है, मगर वो आमतौर पर प्रचलित नहीं है और सिस्टम रिसोर्स बहुत खाता है.ये सब समस्याएँ एआईएमपी2 म्यूजिक प्लेयर में नहीं है. एआईएमपी2 म्यूजिक प्लेयर में ध्वनि को बजाते बजाते ही स्वचालित नार्मलाइज करने का विकल्प है (मुख्य मेन्यू > डीएसपी प्रबंधक > आवाज स्वचालित साम…

टेक्नोराती ब्लॉग सर्वे 2010 आंकड़े - क्या ब्लॉगिंग पुरूषों की बपौती है?

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पिछले दिनों टेक्नोराती ब्लॉग सर्वे का आयोजन किया गया. अब तक के सर्वाधिक 7200 ब्लागरों द्वारा सर्वे में भाग लिया गया जिसमें मैंने भी भाग लिया था.वैसे तो यह सर्वे प्रमुखतः अंग्रेज़ी ब्लॉगों के आंकड़े ही दिखाता है, मगर दुनिया के तमाम भाषाओं के ब्लॉगिंग रूख की ओर इसके आंकड़े इंगित तो करते ही हैं.कुछ दिलचस्प आंकड़े हैं -पिछले वर्ष 9% की तुलना में इस वर्ष 21% ब्लॉगर किसी न किसी रूप में व्यावसायिक रूप से ब्लॉगिंग करते हैं. इनमें से 11% ब्लॉगरों की प्राथमिक आय ब्लॉगिंग से होती है. शौकिया ब्लॉगिंग करने वाले 65% हैं जो पिछले वर्ष के मुकाबले 7% कम हैं. इसका अर्थ ये हुआ कि बहुत से शौकिया ब्लॉगर व्यावसायिक ब्लॉगिंग में उतर गए? शायद.पिछले वर्ष 1% के मुकाबले इस वर्ष कारपोरेट ब्लॉगरों की संख्या में इजाफ़ा हुआ और आंकड़ा 4% तक जा पहुँचा. अभी भी ब्लॉगिंग में पुरुषों का वर्चस्व है. दो तिहाई ब्लॉगर पुरूष ही हैं.ब्लॉगिंग के साथ साथ सामाजिक मीडिया का प्रयोग बढ़ रहा है और फेसबुक और ट्विटर का योगदान ब्लॉगों के प्रचार प्रसार में किया जा रहा है. 39% ब्लॉगर अब प्रभावी ब्लॉगिंग के लिए स्मार्टफ़ोनों व टेब्लेट्…

.... क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है!

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तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं? मैं अपने ज्ञान और स्वज्ञान के भरोसे अपने ब्लॉग पोस्टों में, अपने हिसाब से, अपने विचार से, स्तरीय सामग्री ही लिखता हूं. मेरे ये पोस्ट दूसरों को मेरे अज्ञान, अल्पज्ञान से भरे कूड़ा लगते हैं तो इसमें मैं क्या करूं? मैं अपने ब्लॉग में अपने संपूर्ण होशोहवास व ज्ञान के हिसाब से, अपने हिसाब से सही-सही ही लिखता हूँ. दूसरों को ये भले ही गलत लगें. अब मैं दूसरों के हिसाब से तो नहीं लिख सकता. ....क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है. मेरे विश्वास, मेरी धारणाएँ मेरे अपने हैं. मैं उन्हें किसी के कहने से और किसी वाजिब-ग़ैर-वाजिब तर्क-कुतर्क से तो नहीं बदल सकता और मैं अपने उन्हीं विश्वासों और उन्हीं धारणाओं की बदौलत और अकसर उन्हें पुख्ता करने के लिए, दुनिया को बताने-समझाने के लिए, अपने ब्लॉग पोस्ट लिखता हूँ. मैं दूसरों के विश्वास और दूसरों की धारणाओं के अनुसार तो नहीं लिख सकता. ....क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है. मैं अपनी भाषा, अपनी शैली में लिखता हूँ. अपने ब्लॉग पोस्ट पर किसी को गाली देता हूँ या किसी की वंदना करता हूँ तो इससे किसी को क्या? मैं अपने ब्लॉग पर छिछली उथली भाषा का इस्त…

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