(समाचार कतरन साभार - पत्रिका)
बुधवार, 29 सितम्बर 2010
कड़वे आचरण?
सोमवार, 27 सितम्बर 2010
जालघरों के प्रतीक
एक बेहद मनोरंजक, जानकारी परक परियोजना – जालघरों के प्रतीक के बारे में आपको बताते हैं.
कोई दस लाख जालघरों के पते एकत्र किए गए जो अलेक्सा के शीर्ष अनुक्रम में आते हैं. फिर उन जालघरों के फ़ेविकॉन (जालघरों के प्रतीक चिह्न जो आप ब्राउज़र में पता पट्टी के बाजू में देखते हैं – जैसे कि ब्लॉगर का है
) को एकत्र कर उनकी रैंकिंग के लिहाज से एक मोजाएक का रूप जटिल प्रोग्राम व स्क्रिप्ट के जरिए दिया गया. फलस्वरूप बना एक बढ़िया पोस्टर. देखें -
आप देखेंगे कि गूगल का प्रतीक सबसे बड़ा है. फिर फेसबुक का नंबर है. याहू, विकिपीडिया, यू-ट्यूब, एमएसएन पीछे पीछे हैं.
उपर्युक्त चित्र को बड़े आकार में यहाँ देख सकते हैं.
रंग-बिरंगे, चित्र-विचित्र प्रकार के जाल स्थलों के उतने ही रंगीन, चित्र-विचित्र प्रतीक चिह्नों को एक साथ देखना भी एक अलग अनुभव है.
इसका इंटरेक्टिव संस्करण यहाँ है जहाँ से आप इस 1.4 गीगा-पिक्सेल के विशाल पोस्टर में जूम इन कर पैन कर इसका विस्तृत नजारा कर सकते हैं. एक छोटे टुकड़े का जूम किया हिस्सा मुझे कुछ यूं दिखा -
और, आपको ज्यादा ही मजा आया हो तो इसका पोस्टर खरीदने हेतु अपना ईमेल पता भी वहाँ पर दर्ज कर सकते हैं.
मंगलवार, 21 सितम्बर 2010
अंग्रेज़ों, वापस भारत आओ!
दुनिया, सचमुच गोल है. नहीं?
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अब, रूबिक क्यूब से भी बढ़िया एक उलझन-सुलझाऊ पहेली. चित्र में दिखाए गए स्टीरिओ हेडफोन को आप तारों के जंजाल में से जल्दी से जल्दी कितनी जल्दी निकाल बाहर कर सकते हैं?
और हाँ, ध्यान रखें, कोई जादूगिरी नहीं चलेगी!
शनिवार, 18 सितम्बर 2010
हिंदी में लिखने का एक और बढ़िया औजार – विशाल मोनपारा का प्रमुख टाइपपैड
इस लिहाज से हिंदी (तथा अन्य भारतीय भाषा में) लेखन के फ़ोनेटिक औजारों में विशाल मोनपारा के बनाए गए कुछ औजार बेहद काम के हैं.
1. प्रमुख आईएमई (डाउनलोड कड़ी) – 500 केबी का यह औजार एक एक्जीक्यूटेबल फ़ाइल में आता है, जिसे इंस्टाल करने की आवश्यकता नहीं. इसे डाउनलोड कर किसी भी डिरेक्ट्री/फोल्डर से डबल क्लिक कर चलाएँ अथवा स्टार्टअप में डाल दें. इसे चलाने पर सिस्टम ट्रे में आइकन बन जाता है जिसे क्लिक कर टॉगल कर हिंदी में लिख सकते हैं. इस टूल के जरिए फ़ोनेटिक हिंदी में (जैसे कि कमल के लिए kamala, कमला के लिए kamalaa तथा कमाल के लिए kamaala ) विंडोज के किसी भी प्रोग्राम/ब्राउजर के इनपुट विंडो में हिंदी में लिख सकते हैं. मेल / चैट विंडो में भी कमाल की हिंदी लिख सकते हैं. मेरे विचार में अब तक उपलब्ध फ़ोनेटिक आईएमई में सबसे आसान. हिंदी के कठिन शब्दों को भी आसानी से लिखा जा सकता है. बहुभाषी भी है. हिंदी टाइप करने का उदाहरण इस तरह है-
आप देखेंगे कि शब्दों को जोड़ने व अलग करने (ZWJ तथा ZWNJ) के लिए बढ़िया, इंटेलिजेंट तरीके से ^ व ^^ का प्रयोग किया गया है.
2. प्रमुख टाइप पैड फायरफाक्स एड ऑन (डाउनलोड कड़ी) – इस एड ऑन को फायरफाक्स में इंस्टाल कर आप फायरफाक्स ब्राउजर में कहीं भी – चैट पर, टिप्पणियों में, ब्लॉगों में हिंदी लिख सकते हैं. परंतु यदि आप प्रमुख आईएमई प्रयोग कर रहे हैं तो इसकी आवश्यकता नहीं है.
3. प्रमुख टाइपपैड (डाउनलोड कड़ी) – 400 केबी डाउनलोड का यह औजार वस्तुतः टाइनीएमसीई रिच टैक्स्ट एडीटर है जिसमें प्रमुख आईएमई प्लगइन लगा हुआ है. इसको डाउनलोड कर किसी डिरेक्ट्री/फोल्डर में अनजिप करें और टाइनीएमसीई (pramukhtypepad.htm) चलाएँ. विकल्प में देवनागरी पर क्लिक कर एडीटर में सीधे फ़ोनेटिक हिंदी में टाइप करें. आप हिंदी सामग्री के रूप रंग व फ़ॉन्ट आकार को भी यहाँ बढ़िया से सज़ा संवार सकते हैं क्योंकि यह WYSIWYG एचटीएमएल एडीटर है. इसमें लिखी सामग्री का कॉपी-पेस्ट कर प्रयोग में लिया जा सकता है. इसमें गुजराती वर्तनी जांचक भी है. उम्मीद करते हैं कि इसमें शीघ्र ही हिंदी का भी वर्तनी जांचक जुड़ेगा.
हिंदी टाइपपैड हग–2 औजार की तरह है और कुछ इस तरह काम करता है –
विशाल ने इन प्रोग्रामों को एलजीपीएल के तहत मुफ़्त में प्रयोग व वितरण हेतु जारी किया है. उनके इस शानदार कार्य के लिए धन्यवाद.
शुक्रवार, 17 सितम्बर 2010
फ़ोर फ़िगर सब्सक्राइबरों की ओर छलांग लगाते हिंदी चिट्ठे
हजारी ग्राहक पाठक संख्या में जल्द ही पहुँचने वाला है चिट्ठा - शब्दों का सफर. वर्तमान में(15 सितम्बर 2010 की स्थिति में) नियमित पाठक संख्या 977. नियमित पाठकों के हजार के आंकड़े तक पहुँचने में कुछ ही पाठकों और कुछ ही दिनों की देरी. किसी भी हिंदी चिट्ठे के लिए आज के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि.
(शब्दों का सफर के नियमित फ़ीड पाठक)
इधर साथ साथ ही है उत्तरांचल. शानदार (15 सितम्बर 2010 की स्थिति) 968 नियमित पाठक संख्या. किसी भी दिन आंकड़ा हजारी हो सकता है. उत्तरांचल की एक पोस्ट (लिंक?) को वैसे भी सर्वकालिक सर्वाधिक बार पढ़ा जाने वाला चिट्ठाप्रविष्टि का दर्जा प्राप्त है. तीनेक साल पहले, तब जब हमारे चिट्ठों के पाठक बमुश्किल दर्जन भर लोग होते थे, इस पोस्ट को पढ़ने और टिपियाने वाले हजार से पार हो चुके थे!
(उत्तरांचल के नियमित फ़ीड पाठक)
मेरे अपने सुनिश्चित विचार में कुछेक आधा दर्जन ऐसे हिंदी चिट्ठे और हैं जिनके नियमित पाठक हजारी आंकड़ों को छू रहे होंगे और इनमें से एकाध के पाठक आगे निकल भी चुके होंगे, परंतु उनके नियमित फ़ीड पाठकों की संख्या उनके चिट्ठों पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं है.
अब आप देखिए कि आपके चिट्ठे इन हजारी ग्राहकों वाले चिट्ठों के सामने कहाँ ठहरते हैं. मेरे अपने चिट्ठे – छींटें और बौछारें का पाठक आंकड़ा तो जादुई, तीन सत्ती (15 सितम्बर 2010 की स्थिति) दिखा रहा है, मगर हजार के लिहाज से, दिल्ली अभी बहुत दूर है!
(छींटें और बौछारें के नियमित फ़ीड पाठक)
शब्दों का सफर और उत्तरांचल को उनकी शानदार उपलब्धि (हजारी नियमित फ़ीड ग्राहक आंकड़ा तो अब महज ‘जस्ट ए मैटर ऑफ टाइम’ है) के लिए अग्रिम बधाईयाँ!!आपकी नजर में ऐसे और हजारी ग्राहक संख्या वाले हिंदी चिट्ठे हों तो हमें भी बताएँ.
फ़ीड क्या है और कैसे है यह यहाँ से जानें.
अपने नियमित फ़ीड पाठकों की संख्या प्रदर्शित तो करें ही, साथ ही अपने चिट्ठा पाठकों को आपके चिट्ठे की फ़ीड सब्सक्राइब करने के लिए आसान विकल्प अवश्य दें जैसा कि ऊपर दिए चिट्ठों में प्रदर्शित है.
और, अब जब सैकड़ों चिट्ठों में प्रतिमिनट दर्जनों पोस्टें लिखी जाने लगी हैं, एग्रीगेटर्स की भूमिका अप्रासंगिक और संदिग्ध होने लगी है, ऐसे में अपने प्रिय चिट्ठों को पढ़ने का एकमात्र जरिया उनके फ़ीड के नियमित ग्राहक बनने का ही है.
तो, यदि आप इस चिट्ठे के नियमित ग्राहक नहीं बने हैं, तो आज ही बनिए.
बृहस्पतिवार, 16 सितम्बर 2010
इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में हिंदी – यह किशोरी हिंदी अल्हड़ है और चुलबुली भी
दैनिक भास्कर ने 14 सितंबर 2010 हिंदी दिवस पर 24 पृष्ठों का एक राष्ट्रीय विशेषांक निकाला था. यह एक अलग किस्म की, संग्रहणीय पहल रही. उक्त विशेषांक में हिंदी के तमाम दिग्गजों के बीच एक अदने से हिंदी ब्लॉगर (मेरा) का भी एक आलेख छपा है. पढ़िए वह आलेख:
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वो रो कर दुनिया को अपने वजूद का अहसास दिलाता है. दुनिया को अपने वजूद का अहसास दिलाने का उसका यह प्रयास उसके महाप्रयाण तक नित्य, निरंतर जारी रहता है. हर माकूल जगह पर वो अपने विचारों को परोसने के लिए सदैव तत्पर रहता है. धन्य है आज की टेक्नोलॉज़ी दुनिया – इस काम के लिए उसके पास आज मोबाइल है, इंटरनेट है.
मोबाइल और कंप्यूटिंग टेक्नोलॉज़ी ने भाषाई दीवारों को ढहाने में ग़ज़ब का काम किया है. आप किसी का भी – जी हाँ, किसी भी हिंदी भाषी व्यक्ति का मोबाइल उठाकर उसके संदेश बक्से में झांक लें. आपको अधिकतर ऐसे एसएमएस मिलेंगे जो रोमन हिंदी में लिखे होंगे. यूँ रोमन हिंदी को पढ़ने में कठिनाई होती है और कभी कभार अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है, मगर मोबाइलों में हिंदी लिखने की अंतर्निर्मित सुविधा न होने पर भी लोग धड़ल्ले से रोमन लिपि में हिंदी में संदेशों का बखूबी आदान प्रदान कर रहे हैं. बहुत से मोबाइलों में हिंदी (देवनागरी लिपि) में लिखने की सुविधा तो मिलती है, परंतु अकसर गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते संदेशों का कचरा हो जाता है. स्थिति ये है कि एचटीसी, आईफ़ोन जैसे उच्चस्तरीय स्मार्ट मोबाइल फोनों में भी लोगबाग देवनागरी में हिंदी पढ़ने-लिखने का जुगाड़ ढूंढते मिल जाते हैं. मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म में जब तक यूनिकोड मानक को पूरी तरह अपना नहीं लिया जाएगा, समस्या बनी रहेगी और लोग ‘मैं जा रहा हूं’ जैसे सरल वाक्य को लिखने के लिए रोमन लिपि में ‘me jaa rahaa hun’ लिखकर काम चलाते रहेंगे.
इंटरनेट पर यूनिकोड हिंदी आने के पहले एक तरह से रोमन हिंदी का ही साम्राज्य चलता था. स्थिति तेजी से बदली है और अब तो कम्प्यूटर पर हिंदी (यूनिकोड देवनागरी) टाइप करने के तमाम किस्म के अनगिनत आसान औजारों से इंटरनेट पर हिंदी प्रयोक्ताओं का एक तरह से महाविस्फोट हो गया है. कयास लगाए जा रहे हैं कि इंटरनेट पर हिंदी पृष्ठों की संख्या अंग्रेज़ी व चीनी के बाद तीसरे नंबर पर जल्द ही पहुँच जाएगी. इंटरनेट पर हिंदी पृष्ठों में खासा इज़ाफ़ा ब्लॉगों, फ़ेसबुक, ओरकुट जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों के हिंदी प्रयोक्ताओं के कारण हो रहा है. इन साइटों के प्रयोक्ता दिन दूनी रात चौगुनी के दर से बढ़ रहे हैं और सामग्री दिन चौगुनी रात नौगुनी की दर से. इंटरनेट से जुड़ा हर व्यक्ति अपनी बात, अपने विचार, अपना सृजन सबके के सामने रखना चाह रहा है. प्रश्न उठता है कि उसकी हिंदी कैसी है? हिंदी इन नए माध्यमों के आने से क्या कुछ बदल रही है और इन माध्यमों का हिंदी भाषा, शैली आदि पर क्या कोई प्रभाव पड़ रहा है?
इंटरनेट पर अपने तरह के अनगिनत ‘हंस के अभिनव ओझा’ अवतरित हो गए हैं जो गाहे-बगाहे, ठहरते-विचरते लोगों की भाषा, व्याकरण और वर्तनी की ग़लतियों की ओर इंगित करते रहते हैं. यहाँ फर्क यह है कि मामला एकतरफा नहीं होता. हाल ही में तकनीकी हिंदी फोरम में शब्दकोश के ‘कोश’ या ‘कोष?’ को लेकर लंबी बहस छिड़ी जो हफ़्तों जारी रही और जब इस सिलसिले में हिंदी भाषा के इतिहास के पन्ने खुले तो तथाकथित बड़े साहित्यकारों समेत ऐसे ओझाओं के तथाकथित ज्ञान की परतें भी खुल गईं. इंटरनेट में एक ओर भाषा में परिशुद्धता के पैरोकारों की कमी नहीं है तो वहीं दूसरी ओर मस्त-मौला चाल में अपनी भाषा, अपनी वर्तनी और अपने स्टाइल में लिखने वालों की भी कमी नहीं है. आपकी परिशुद्ध भाषा जाए भाड़ में हमारी तो अपनी शैली, अपनी भाषा के तर्ज पर. वैसे भी, जब आप ट्रांसलिट्रेशन जैसे औजारों की सहायता से लिख रहे हों तो ‘कि’ और ‘की’ में फर्क को पाठकों पर ही क्यों न छोड़ दें! बात यहीं तक थी तब तक भी ठीक-ठाक था. प्रयोगवादी तो लिपि का भी अंतर्राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं – यानी तुक भिड़ानी हो तो धड़ल्ले से रोमन लिपि का प्रयोग. आपको ये बात भले ही ऊटपटांग लगे, मगर ऐसे ही एक प्रयोगवादी कवि राहुल उपाध्याय की ‘इंटरनेशनल हिंदी’ में ये ग़ज़ल देखिए जो उन्होंने अपने ब्लॉग पर छापी है –
21 वीं सदी
डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिये
'graduate' को नौकरी ही नहीं 'green card' चाहिये
खुशियाँ मिलती थी कभी शाबाशी से
हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिये
जो करते हैं दावा हमारी हिफ़ाज़त का
उन्हें अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिये
घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों
कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिये
'blog, email' और 'groups' के ज़माने में
भुला दिये गये हैं वो जिन्हें सिर्फ़ 'postcard' चाहिये
तो एक तरफ इंटरनेट पर हिंदी भाषा के प्रयोग में अखबारी किस्म का घालमेल बहुतायत में नजर आता है, वहीं दूसरी तरफ छिटपुट तौर पर भाषा प्रयोग के नए अनगढ़ शिल्प भी देखने को मिलते हैं. प्रमोद सिंह पठन-पाठन में थकने की बात कुछ इस नए, नायाब अंदाज में कह रहे हैं –
“...लल्ली बरसात का पानी में लेसराया साड़ी समेट रही थी, मने असमंजस था कि कड़ाही में चूड़ा भूज लें कि पाव भर पकौड़ी छान लें, उखड़े मन छनछनाई बोलीं, तुमलोक को सरम नहीं लगता कि इसके और उसके पीछे साहित्तिक अलता सजाते चलते हो? सोहर गाते हो तो अइसा जेमें दू आना के जलेबी जेतना भी मिठास नहीं है, और हमरे छिनके मन को अपने बभनई में उलझाते हो? हमरे बिस्वास को? हमरे मन के अंतरंग के अनुराग को?...”
ये एक ऐसी कौमार्य हिंदी है जिसमें आंचलिकता की छाप है, देसी मिट्टी की सुगंध है, नए शब्दों का छौंक है. जाहिर है इन सोशल नेटवर्किंग साइटों में एक ओर हिंदी का घोर इंटरनेशलाइजेशन हो रहा है तो दूसरी ओर हिंदी की आंचलिक भाषाओं को अपने पवित्र रूप में फलने फूलने और जमे रहने का सस्ता सुंदर और टिकाऊ वातावरण भी मिला है जहाँ अवधी भी है, मालवी भी है, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, हरियाणवी इत्यादि सभी हैं. और, यदि आप में क्रिएटिविटी हो तो इनमें घालमेल कर कोई नई सरसराती भाषा शैली भी ईजाद कर लें, और यकीन मानिए, आपके फालोअरों की कोई कमी भी नहीं होगी.
इंटरनेट है ही ऐसा. सबके लिए स्पेस. वृहत्. अनंत. असीमित.
बुधवार, 15 सितम्बर 2010
विरोधाभास की पराकाष्ठा – हिंदी दिवस पर हिंदी भवन सेल!
यह है कल (14 सितंबर हिंदी दिवस) के अखबारों में जोर शोर से दिए गए विज्ञापन की कटिंग -
यह तो था भोपाल के हिंदी भवन का हाल. आपके अपने शहरों के हिंदी/तमिल/गुजराती/मराठी इत्यादि-इत्यादि भवनों के क्या हाल हैं?
मंगलवार, 14 सितम्बर 2010
आपके लिए हिन्दी दिवस विशेष सौगात – शानदार मुफ़्त अंग्रेज़ी-हिंदी-अंग्रेजी शील की डिक्शनरी
वैसे तो ढेरों अंग्रेज़ी हिंदी / हिंदी अंग्रेज़ी शब्दकोश अब हमारे ऑनलाइन व ऑफलाइन उपयोग के लिए उपलब्ध हैं, मगर यह डिक्शनरी अपने आप में अलग है.
इसमें अंग्रेज़ी से हिंदी व हिंदी से अंग्रेज़ी दोनों में ही दुतरफा शब्दकोश की सुविधा है. कोई 27 हजार शब्दों के अर्थ इसमें समाहित हैं. स्थापना में आसान है, विंडोज एक्सपी से लेकर विंडोज 7 (एडमिन के रूप में चलाएँ) तक सभी में बढ़िया काम करता है.
हिंदी में जो लोग कृतिदेव फ़ॉन्ट का प्रयोग करते हैं, वे सीधे इसके सर्च विंडो में कृतिदेव फ़ॉन्ट से हिंदी – अंग्रेज़ी शब्दकोश का फायदा उठा सकते हैं. यूनिकोड के प्रयोक्ताओं को यहाँ निराशा हाथ लगेगी. साथ ही इनस्क्रिप्ट टाइपिंग वाले भी इसे प्रयोग करने में दिक्कत महसूस करेंगे. मगर, आप स्क्रॉल कर माउस के जरिए अथवा माउस क्लिक कर शब्दकोश का उपयोग कर सकते हैं. नेविगेशन आसान है और ऑन द फ्लाई (आप जैसे जैसे टाइप करते हैं, सर्च रीयल टाइम में स्वतः और शीघ्र बदलता है) बड़ी तेजी से काम करता है.
इसके टूलबार में दिए गए विकल्प के जरिए आप नए शब्द जोड़ सकते हैं, किसी प्रविष्टि को परिवर्धित कर सकते हैं अथवा हिंदी-अंग्रेज़ी मोड से अंग्रेज़ी हिंदी मोड में स्विच कर सकते हैं.
इसे इन्दौर के शीलनिधि गुप्ता ने बनाया है जो इंदौर के आइडियल एकेडेमी में कंप्यूटर साइंस के लेक्चरर हैं.
शीलनिधि को बहुत बहुत धन्यवाद.
शील का दुतरफा हिंदी अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश मुफ़्त में यहाँ से डाउनलोड करें.
रविवार, 12 सितम्बर 2010
लीजिए, पेश है हिंदी का पहला स्पैम कमेंट!
हिंदी ब्लॉगों में वैसे तो नाइस, बढ़िया लिखा है, स्वागत है, सुंदर इत्यादि कमेंट स्पैम की श्रेणी में ही आते हैं, मगर अगर इन्हें नजर अंदाज नहीं किया गया तो ब्लॉगों में टिप्पणियों का अकाल ही हो जाएगा.
जो चिट्ठाकार बंधु वर्डप्रेस पर अपने स्वयं के डोमेन पर ब्लॉग चलाते हैं वे स्पैम कर्मा के आंकड़े जानते होंगे कि अंग्रेजी व नामालूम – चीनी जैसी भाषाओं के कितने हजार स्पैम कमेंट अब तक ब्लॉग पोस्टों पर आने से रोक दिए गए हैं. ब्लॉगर का स्पैम कमेंट रोकने का सिस्टम अभी और तगड़ा बनाया गया है और स्पैम कमेंटों को मॉडरेट करने की ताजी सुविधा अभी हाल ही में जोड़ी भी गई है.
इसके बावजूद यदा कदा कोई न कोई स्पैम कमेंट फिल्टरों की छन्नी से निकल कर जेनुइन कमेंट के रूप में चला आता है.
ऐसी ही एक टिप्पणी मेरी आवक डाक में आई. उसकी हिंदी थोड़ी खिसकी हुई थी. मुझे पहले लगा कि मेरा कोई दक्षिण भारतीय ब्लॉग प्रेमी होगा, जो आड़ी तिरछी हिंदी में अपना संदेश मुझ तक पहुँचाना चाहता है. मगर उसके यूजर नेम से थोड़ी आशंका हुई. संदेश निम्न था -
चैट ने आपकी पोस्ट " सॉफ़्टवेयर मुक्ति दिवस और हिन्दी पखवाड़ा पर हिन्दी... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
बढ़िया पोस्ट. मैं आगे और अधिक पढ़ने के लिए तत्पर हैं! बहुत बहुत धन्यवाद!
तो मैंने उसके यूजर नेम में दिए लिंक पर जाकर देखने की कोशिश की. जो मैंने पाया वो तो चकित करने वाला था. आप भी देखें -
और, इनके उपयोगकर्ता तो अंग्रेज आर्थर, स्टीवन और अल्बर्ट हैं जो कमाल की हिंदी लिखते हैं. देखिए -
हुम्म…
चैट?
कभी नहीं!!!
मंगलवार, 7 सितम्बर 2010
हिंदी के एकमात्र पूर्णकालिक ब्लॉगर शैलेश भारतवासी का जीवंत साक्षात्कार - देखिए तकनीकी दुनिया से साहित्यिक संसार के चुनौतीभरे उनके सफर की रोमांचक दास्तां
इलेक्ट्रानिकी एवम् संचारिकी में बी.टेक. शैलेश भारतवासी अपने आप को हिंदी के एकमात्र पूर्णकालिक ब्लॉगर कहलाना पसंद करते हैं. शैलेश को हिंदी ब्लॉगिंग का पर्याय कहना अनुचित नहीं होगा. उन्होंने 2007 में जब हिंदी में ब्लॉगिंग की शुरूआत की थी, तो उस वक्त उन्होंने सोचा नहीं होगा कि हिंदी ब्लॉगिंग को वे पूर्णकालिक प्रोफ़ेशन का रूप दे देंगे. शैलेश भारतवासी ने अपने ब्लॉगिंग प्रकल्प हिंद-युग्म के जरिए हिंदी ब्लॉगिंग को एक तरह से री-डिफ़ाइन किया है, और तमाम संभावनाएँ न सिर्फ तलाशी हैं, उनके कमर्शियल वायेबिलिटी की ओर पुख्ता कदम भी रखे हैं. हिन्द युग्म के बैनर तले तमाम नायाब और बड़े काम हुए हैं, और आगे बहुत सी नई योजनाएँ पाइपलाइन में हैं. हिंदी ब्लॉगिंग के उज्जवल भविष्य के प्रति शैलेश भारतवासी पूरी तरह आश्वस्त हैं और बताते हैं कि आने वाले समय में और भी बहुत से पूर्णकालिक हिंदी ब्लॉगर आएंगे जिनकी आजीविका का बढ़िया साधन हिंदी ब्लॉगिंग होगी.
नीचे दिए यूट्यूब वीडियो में देखिए उनका दिलचस्प साक्षात्कार
कुछ अच्छे चुनिंदा हिंदी ब्लॉग पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ

