टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

.... क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है!

तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं?

मैं अपने ज्ञान और स्वज्ञान के भरोसे अपने ब्लॉग पोस्टों में, अपने हिसाब से, अपने विचार से, स्तरीय सामग्री ही लिखता हूं. मेरे ये पोस्ट दूसरों को मेरे अज्ञान, अल्पज्ञान से भरे कूड़ा लगते हैं तो इसमें मैं क्या करूं? मैं अपने ब्लॉग में अपने संपूर्ण होशोहवास व ज्ञान के हिसाब से, अपने हिसाब से सही-सही ही लिखता हूँ. दूसरों को ये भले ही गलत लगें. अब मैं दूसरों के हिसाब से तो नहीं लिख सकता. ....क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है.

मेरे विश्वास, मेरी धारणाएँ मेरे अपने हैं. मैं उन्हें किसी के कहने से और किसी वाजिब-ग़ैर-वाजिब तर्क-कुतर्क से तो नहीं बदल सकता और मैं अपने उन्हीं विश्वासों और उन्हीं धारणाओं की बदौलत और अकसर उन्हें पुख्ता करने के लिए, दुनिया को बताने-समझाने के लिए, अपने ब्लॉग पोस्ट लिखता हूँ. मैं दूसरों के विश्वास और दूसरों की धारणाओं के अनुसार तो नहीं लिख सकता. ....क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है.

मैं अपनी भाषा, अपनी शैली में लिखता हूँ. अपने ब्लॉग पोस्ट पर किसी को गाली देता हूँ या किसी की वंदना करता हूँ तो इससे किसी को क्या? मैं अपने ब्लॉग पर छिछली उथली भाषा का इस्तेमाल कर भाषा पर बलात्कार करने को या शुद्ध-सुसंस्कृत भाषा लिखने को स्वतंत्र हूँ. सरल भाषा में लिखता हूँ या जटिल इससे किसी को क्या सरोकार? मैं अपनी उथली-छिछली-खिचड़ी भाषा में लिखता हूँ. मैं दूसरों के कहे अनुसार तथाकथित सभ्य बनकर नहीं लिख सकता. ...क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है.

अपडेट - मैं किसी भी विषय पर, चाहे उस पर मेरी जानकारी हो या न हो, बड़े ही एक्सपर्ट तरीके से, प्रोफ़ेशनल अंदाज में, बड़ी गंभीरता से, दमदारी से लिख सकता हूँ. वह भी अपने एंगिल से, अपने तर्कों-कुतर्कों से सही ठहराते हुए. मैं आधे-अधूरे और अपने हिसाब से संपादित उद्धरणों के द्वारा अपनी किसी भी बात को सत्य सिद्ध कर सकता हूँ. .... क्योंकि ये ब्लॉग मेरा है .

अब, मेरे लेखों से, मेरे ब्लॉग पोस्टों से किसी को मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं?

**-**

व्यंज़ल

**-**

सभ्य बनने की कोशिश यूँ मेरी भी पूरी थी

तेरे शहर की फ़िजाँ में कोई बात रही होगी

 

ये तो कबूल लो पार्टनर कि इस रुसवाई में

हमेशा की तरह जरा सी कोई बात रही होगी

 

दंगे-फ़साद यूं मुफ़्त में कहीं भी नहीं होते

मानो न मानो कोई न कोई बात रही होगी

 

सब ने यहाँ पे सी लिए हैं होंठ अपने अपने

पता कैसे चले कि क्या कोई बात रही होगी

 

हमें भी कोई शौक नहीं था बतंगड़ का रवि

बात पे निकली थी तो कोई बात रही होगी

**-**

(2007 में लिखी गई यह पोस्ट आज भी मौजूं नहीं है?)

विषय:

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दंगे-फ़साद यूं मुफ़्त में कहीं भी नहीं होते
मानो न मानो कोई न कोई बात रही होगी
सब ने यहाँ पे सी लिए हैं होंठ अपने अपने
पता कैसे चले कि क्या कोई बात रही होगी
....bahut achha laga aapka bebaak lekhan...

मस्त..

ये ही सोच कर तो लिखते है...

स्वतन्त्रता में किसी को कोई आक्षेप क्यों रहे?

रवि भाई, दीवाली के मौके पर मिर्ची खिलाने का क्‍या मतलब है।
:)

बिल्कुल यह ब्लॉग आपका ही है :)

लाजवाब -कोई तो बात रही ही होगी !

`अपने हिसाब से सही-सही ही लिखता हूँ.'

हां जी, हमारे हिसाब से भी सही ही लिखते हैं, पर ये मिर्ची किस को लगी ये हमारी समझ से परे है:)

आज ‘अपनी ब्लॉगरी आजाद है’ कहना पड़ा
हम समझ सकते हैं जी कोई बात रही होगी

मिर्चियाँ लगती हैं तो हम क्या करें
बस फख़त कहते हैं कोई बात रही होगी

.
.
.
पर मिर्ची लगी किसे है ?
तनी बताइये हमका...

...

kya bat hai, kya sahi lapka hai aapne, man prasann ho gaya padh kar...

याने कि मैंने ब्‍लॉग लिखना शुरु किया, उससे पहले ही आप मेरा बखान कर चुके थे?

न जाने कितने ब्‍लागरों को अपनी शकल दिखाई दे रही होगी आपकी इस पोस्‍ट में।

ब्‍लागियों पर यह अत्‍याचार? अपनेवाले होकर?

आपके विचारों से सहमत हूँ।

कुछ लोगों को यहाँ वहाँ मेरी टिप्पणी पढने पर मिर्ची लगती है।
ब्लॉग्गर को नहीं, उनके अन्य पाठकों को।
अब मैं भी क्या करूँ?
मेरी टिप्पणी है।

शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

All post in this blog are nice to read... thanks for all the valuable info to shared it....

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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