तलाक आसान है मगर शादी मुश्किल...

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किसी न किसी एक चीज को तो आसान होना ही था. या कहें कि करना ही था. ये क्या कि शादी मुश्किल और यदि एक बार फंस गए तो तलाक महा मुश्किल.

अपने देश में शादी-ब्याह की मुश्किलों का ये हाल है कि पहले तो आप धर्म-जाति मिलाएँ, फिर कुण्डली मिलाएँ, फिर शिक्षा-दीक्षा, परिवार और गोत्र मिलाएँ. ये सब मिल गया तो दहेज की रकम मिलाएँ. तब ले देकर कहीं शादी हो पाती है.

यहाँ तो बच्चा पैदा होता है और मां-बाप की खुशी दूसरे दिन से ग़ायब हो जाती है चूंकि फिर उसे अपने बच्चे के विवाह की चिंता सताने लगती है. बचपन से वो अपने बच्चों के अच्छे और बढ़िया विवाह के सपने बुनते रहता है. माएँ, दादियाँ अपने बेटों बेटियों यानी भावी वर-वधुओं के लिए गहने कपड़े गर्भस्थ शिशु के समय से ही जुटाना चालू कर देती हैं. इसके बावजूद कई सपने टूट जाते हैं कई बिखर जाते हैं और कई में ट्विस्ट आ जाता है.

इधर, विवाह में मामला प्रेम प्यार का हो तो दो खानदान के प्राण-प्रतिष्ठा से लेकर धर्म-जाति और गोत्र-खाप-पंचायत सब बीच में चले आते हैं. कुल मिलाकर मुश्किल ही मुश्किल. ऊपर से आजकल – धन्य है अल्ट्रासाउंड स्कैन का – लड़कियों का चहुँओर अकाल होने लगा है. ऐसे में शादी में और भी मुश्किल. विकल्प तो अब विवाह योग्य पुरुषों को पीपल के पेड़ के साथ शादी बनाने का ही बचेगा लगता है, पर, अगर वो भी बचा रहा तो.

अब, सरकार शादी को तो आसान नहीं बना सकती. कितनी तो परेशानी और कितनी तो समस्याएँ हैं. ऊपर से नई समस्याएँ रक्तबीज की तरह उग रही हैं – जैसे कि खाप पंचायतों द्वारा वांछित शादी में तमाम वांछित-अवांछित कारणों से प्रतिबंध लगाया जाना. सो सरकार ने तलाक को ही आसान बना दिया. शायद सेकंड हैंड शादी का मार्केट जोर पकड़ ले.

अब यदि ऐसी मुश्किलातों में, मान लीजिए, कि किला फतह हो गया, शादी हो गई और सब कुछ भला चंगा हो गया तब तो कोई बात नहीं. और, ईश्वर न करे, अगर गृहस्थी की गाड़ी ठीक से पटरी पर नहीं आई तो तलाक और मुश्किल. आपकी लाख कुंडली मिलती हो, और पूरे छत्तीस गुण मिलते हों, पर कभी होता ये है कि शादी हो जाने के छः महीने के उपरांत आप सामने वाले की सूरत नहीं देखना चाहते, उसे देखते ही उसकी गर्दन दबोच लेने को जी करता है, उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगाने को जी चाहता है, गैस चूल्हे का वाल्व खोलकर कर लाइटर ऑन करने को जी चाहता है फिर भी आप उसके साथ एक ही घर में एक ही कमरे में रहने को अभिशप्त होते हैं.

ऐसा नहीं चलेगा. चलना ही नहीं चाहिए. अवांछित, जुनून, झोंक और इम्पल्स में हो रहे मर्डरों को रोकने की सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है आखिर. इसलिए तलाक को आसान होना ही चाहिए. तीन बार तलाक बोलने जितना. पर मामला दोनों तरफ होना चाहिए. ये नहीं कि इसमें पुरुषों का एकाधिकार हो. बल्कि लेडीज फर्स्ट की तरह महिलाओं के लिए थोड़ा और आसान होना चाहिए तथा उनके द्वारा मात्र दो बार बोल देने से तलाक हो जाना चाहिए. बल्कि इसे तो इतना आसान कर दिया जाना चाहिए कि यदि मामला पति-पत्नी किसी के भी सपने में भी आ जाए तो भी उसे सत्य मान लिया जाना चाहिए.

धन्य है. सरकार ने शादी-शुदा जोड़ों की मुश्किलों को समझा है. मुश्किल से, बड़ी मुश्किल से शादी हुई है तो क्या? क्या सात जनम तक भुगतें? नहीं, अब इसकी जरूरत नहीं क्योंकि तलाक तो अब आसान है ना. बहुत से लोग जो इस भय के कारण शादी नहीं करते थे कि सात जन्मों के बंधन में बंधना होगा, तलाक आसानी से मिलती नहीं, उम्मीद है वे अब जल्द ही शादी करेंगे. इधर कुछ दिनों से इन्हीं भय के चलते लिव-इन रिलेशनशिप का प्रचलन बढ़ चला था उसमें कुछ कमी आ सकती है.

 

वैसे, मेरा भी कोई तलाक देने लेने का इरादा हाल फिलहाल नहीं है, मगर इस बात का सुकून तो रहेगा – अब ये आसान है. कभी भी दे-ले लेंगे!

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व्यंज़ल

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शादी मुश्किल तलाक आसान है

और क्या गिनाएँ क्या आसान है


नलों में पानी सूख गए कब से

कुएँ खोदकर पीना आसान है


मीटरों में बिजली नहीं क्योंकि

कंटिया फँसाना बेहद आसान है


हालात वाकई हो गए हैं बेहतर

हिंद में इंग्लिश बड़ा आसान है


बकबक को चाहिए मेहनत रवि

धीर गंभीर बात यहाँ आसान है


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(समाचार कतरन – साभार डीडब्ल्यू वर्ल्ड)

एक टिप्पणी भेजें

bilkul sahi kaha aapne

shadi mushkil, aasan talak

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

व्यंजल में आनन्द आया.

शादी करना कोई हँसी खेल नहीं. करने के बाद लगता है किस मूर्खता के लिए यह सब किया. थेंक गॉड अब छूटकारा आसान है. कहीं यह पीड़ित पतियों का नया वोटबैंक बनाने की चाल तो नहीं. :)

आप सही कह रहे हैं, सैकेंड हैंड शादी मार्केट को बड़ावा मिल जाए शायद। अब शादी शूदा जोंड़ों का खुदा खैर करें ...

अब शादी वाले जोंड़ों का खुदा खैर करे,बाकी सैकेंड़ हैड शादी और व्यजल मजेदार हैं.....

ब़ड़े भाई, बहुत खूब! शानदार खाका खींचा है। वाकई शादी करना मुश्किल, उसे निभाना उस से भी मुश्किल, कम से कम तलाक तो आसान हो ही जाए।

Bhai sahab apne Bilkul thik nahi kaha- "Talaak aasaan nahi" Jindagi beet jaati logo ko talak lene mein" . Talaak log le hi kyon? Par kannon ke aad mein kai aise abhage maa-baap hai jo apne ladke-ladkiyon ki baat ko chhipakar ya gumraahkar ya paise ki lalach dekar ek dusare ki jindagi barbad kar dete yanhi par "TALAAK" ki avasyakta padti. aur ye prakriya itani "SARAL" nahi. Isi ke karan kendra Sarkaar ne yani "CONGRESS" sarkaar ne apne cabinet ki meeting ise "SARAL" banane ka prastao pass kiya. But abhi to Charcha honi baaki hai, ise LOKSABHA OR RAJYASABHA se gujarna hai............................?

व्यंजल पढकर मजा आया | शायद कुछ तो आसान होगा |

tremendous writing...how u find such words n such topics...soch rahe hu shadi se pehle divorce ka koi provision hota to divorce hi le lete....

kyaaaaaaa,,,,bat he ---bhai....yaha to sabhi talakshuda he,,,,,,shadi bhagwan ke hath me hoti hae,,,kab kisse karwana he....or kisse nahi....par TALAK to kewaL BIBI KE PAS ....

sahi bat he ...............ek to shadi ke liye karz lo.....phir talak ke liye ....dono ka interest chukate hue hi jindgi nikal jati he....sab kahte he shadi ki jodiya swarg me banti he....par talak lena -dena keawal bibi ke haath me hota he....

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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