टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

तारीफ़ करने से पहले, जरा समझ तो लें?

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आप तो, मियाँ, ख़्वामख़्वाह ही तारीफ़ें करते फिरते हैं. आइंदा से किसी के लिक्खे की तारीफ़ करने से पहले जरा सोच समझ लीजिए और “वाह! क्या लिखा है!”, “बढ़िया लिखा है!” जैसी टिप्पणी करने से पहले, तारीफ़ के ये दो शब्द कहने से पहले ये पूरा समझ लीजिए कि जो लिक्खा गया है उसका असली अर्थ क्या है. अन्यथा ठीक नहीं होगा. किसी सूरत ठीक नहीं होगा.

बहुत बार, लेखक लिखता कुछ और है, और पाठक अर्थ कुछ और लगा लेता है. ये भी नहीं चलेगा. टेढ़ी बात टेढ़े ढंग से कही गई है तो उसे सीधे सीधे हजम न करें, नहीं तो और बुरा होगा. नांगलोई जैसा.

और कई मर्तबा लेखक सीधे सीधे सपाट लिखता है. वो सपट बयानी कहता है. एक ही अर्थ में एक ही बात कहता है. मगर भाई लोग, ज्ञानी पाठक लोग अपने हिसाब से उसके अर्थ लगा लेते हैं. लेखक एक लिखता है, तो पाठक हजार पढ़-समझ लेते हैं. ये भी नहीं चलेगा. और समझें, गुनें या न समझें, तारीफ़ तो भई तभी करें जब सचमुच, सही-सही, एक का एक समझ लिया हो.

कवि सम्मेलनों में कवि गण अकसर ये बात श्रोताओं से कहते सुनते पाए गए हैं. कवि की मौत दो बार होती है. एक जब उसे गलत वक्त पर दाद दे दी जाती है और दूसरा तब जब उसे सही वक्त पर दाद नहीं मिलती. अब ये दाद देने का मामला बड़ा बारीक है. पाठक और श्रोता के लिहाज से रचनाकार का तारतम्य और सिंक्रोनाइज़ेशन सटीक बैठना चाहिए, अन्यथा सिस्टम के आउट होने का खतरा है, और ऐसे में किसी न किसी की मौत तो होनी है – कवि की या फिर पाठक-श्रोता की!

इसी प्रकार, बड़ा लेखक बड़ा पाठक चाहता है. बड़ा लेखक चाहता है कि उसके लिखे को बड़े लोग, बड़े पाठक पढ़ें, गुनें और तारीफ़ करें. बड़े लेखक के बड़े लेखन की तारीफ़ यदि छोटा पाठक कर दे तो यह बड़े लेखक को बड़ा नागवार गुजरेगा. बड़े लेखक का लेखन बड़ा होता है, वो किसी छोटे, अदने पाठक के न तो काम का है और न समझ का. वैसे भी अपने प्राचीन संस्कृति में यह परंपरा थी कि कोई शूद्र वेदों का सस्वर पाठ कहीं सुन लेता था (पढ़ने की बात तो ख़ैर, बहुत जुदा है,) तो उसके कानों में पिघला सीसा डाल दिया जाता था. तो इसी तरह, बड़े लेखक का बड़ा लेखन कोई शूद्र नुमा छोटा पाठक न पढ़ें, और अगर पढ़ भी लिया है तो उसे सार्वजनिक स्वीकारें नहीं और तारीफ तो कतई न करें नहीं तो उसे लेखक से पिघले सीसे नुमा घोर तिरस्कार मिलना तय है.

यह लेख लिखते-लिखते थोड़ा बोर हो गया तो सोचा थोड़ा मनोरंजन हो जाए. इंटरनेट रेडियो चालू किया तो गाना बज रहा था – धूम मचाले धूम मचाले धूम. वाह! क्या गाना, क्या संगीत क्या कंपोजीशन है. मन झूमने लगा. पर अगले ही पल मैंने अपने मन को ब्रेक लगाया. मन ही मन में बोला, भिड़ू, तारीफ नई करने का. पहले समझने का. पहले गीत संगीत को समझ, शाइरी को समझ फिर तारीफ करना. मन में भी!

रेडियो बन्द कर दिया है और धूम मचाले धूम मचाले का अर्थ ढूंढा जा रहा है. भाई लोगों, मदद करो. इतने अच्छे गाने की तारीफ तो करनी होगी ना? पर, पहले समझ तो लें?

---

(समाचार कतरन – भास्कर.कॉम)

एक टिप्पणी भेजें

हम तो साहब इसलिये पहला कमेंट कभी करते ही नहीं। ट्रेंड देखकर वाह या आह कर आते हैं।
बाई दि वे, सरजी, ये पहला कमेंट तो नहीं है?

ACHCHH MANORANJAN KIYA AAPNE

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

हा हा!! अब आपकी क्या तारीफ करुँ..डर सा गया हूँ. :)

बहुत सटीक लेख....पहले समझ तो लेना चाहिए की आखिर लिखा क्या है...

कही समझने के चक्कर में देर ना हो जाए ,चलो धूम मचाये | व्यंग्य के माध्यम से सच्ची व तीखी बात |

“वाह! क्या लिखा है!”,
“बढ़िया लिखा है!”
टिप्पणी तो यही करना था, पर अभी बंद कर रहा हूं। पहले यह समझ तो लूं कि क्या लिखा है?

तारीफ करने का मन कर रहा है पर सोच रहा हूँ पूरा समझ आ गया कि नहीं।

बात तो सही कही, मगर लपेटा लोगों के "बड़े" पन को भी ख़ूब!

मैं भी इस पर लिखने की सोच रहा था.. आप ने तो मेरा मुँह नोच लिया.. (इसे तारीफ़ समझने की ग़लती मत कीजियेगा)..
वैसे गुलज़ार की कविता में ऐसा क्या था जिसको लेकर वो इतने अहंकार से भर उट्ठे.. कि तुम क्या खा के समझोगे मियाँ? मगर हम को ई बात नहीं बुझती कि अगर चेतनवा नहीं समझिस तो सड़क पर, और डिस्को में नाचते लोग क्या समझते होंगे?
या फिर बात कुछ ऐसी है कि गुलज़ार साब ख़ुद को बड़ा मिसअण्डरस्टुड फ़ील करते हैं..लगा कि ये चेतनवा बड़ा पढ़ा जा रहा है इस से पूछते हैं कि समझिस का.. पूछा.. ओ तो मगर सनाका खा गया.. अल्ले ई का पूछ लिहिन..
सोचिये ज़रा देस का सबसे मक्बूल सायर इस तरहा फ़ील कर रहा है.. तो बेचारे और कबियों का का हाल होगा.. माई शिमपैथीज..
(श्पेलिंग मिशटेक के लिए सौरी)

ekam sahi hai

jab sab samajh me aa jaye tabhi tareef kare...

बेनामी

आपकी बात सही है. गुलज़ार का यह बहुत ही अभिमानी, अपमानजनक और बचकाना कृत्य है, इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है. आखिर किसी सफल लेखक के साथ ऐसा बर्ताव कैसे किया जा सकता है?

बाई द वे, मैं आपकी तारीफ़ तो करूंगा ही क्योंकि आपकी तारीफ़ आँख मूँदकर की जा सकती है।:)

वाकई मजेदार लिखा है।

बेनामी

outlook express ki mails recovery ka koi free software solution kya aapke knowledge mai hai ?

DVD kaam nahi kar raha ho to windows xp, vista, 7 ko pen drive se kaise install kar sakte hai ?

is baare mai koi jaankari de sakte hai ?

@Anonymous

हालांकि मैंने प्रयोग नहीं किया है, मगर आप यह फ्रीवेयर आउटलुक डाटा रिकवरी टूल आजमा सकते हैं -
http://www.mt-solution.ca/outlook-express-recovery-software/download.htm

साथ ही, यूएसबी से विंडोज एक्सपी इंस्टाल करने के कई तरीके हैं. एक सबसे सरल तरीका यहाँ दिया गया है -
http://en.kioskea.net/faq/3065-installing-windows-xp-from-a-usb-key

विंडोज़ 7 के लिए भी कई तरीके हैं. एक यहाँ वर्णित है -
http://computerworldhelpline.blogspot.com/2010/05/how-to-install-window-7-form-pen-drive.html

बेनामी

jaankari ke liye dhanyevaad

... “वाह! क्या लिखा है!”, “बढ़िया लिखा है!”

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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