टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

हिन्दी के अगले सूर और तुलसी ब्लॉगिंग के जरिए ही पैदा होंगे….

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यकीनन. और भी बहुत कुछ, ब्लॉग संबंधी बेबाक बातें आप पाएँगे मेरे साक्षात्कार में जिसे परिकल्पना ब्लॉगोत्सव 2010 के अंतर्गत यहाँ प्रकाशित किया गया है. रवीन्द्र प्रभात जी का शुक्रिया.

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पढ़ आये. :)

यह कल्पना अत्यंत हास्यापद ही है कि..
,,हिन्दी में सूर तुलसी..आप देखिये कि लगभग
पाँच सौ सालों में कोई कबीर हुआ .दूसरा
वाल्मीक ..तुलसी हुआ ..जाहिर है कि नहीं
दरसल ये अपनी प्रतिभा से नहीं हुये बल्कि
निमित्त मात्र थे..आप क्या प्रायः प्रत्येक ही
धर्म का स्थूल अध्ययन करते हैं और इसी लिये
धर्म में भ्रांतियों की भरमार है..किसी बङी बात
पर समीक्षा करने से पूर्व हमें यह आत्मवलोकन
अवश्य करना चाहिये कि हम जो कह रहे है उसकी
कोई ठोस वजह भी है या नहीं

@राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ -
लगता है आपने मेरी बिम्बो में कही बात को सीधे अर्थों में ले लिया. मेरा कहना है कि उन जैसे वजन के रचनाकार ब्लॉगों के जरिए ही पैदा होंगे - जैसा कि नामवर सिंह ने ब्लॉग माध्यम की संभावना को देखते हुए कहा था - पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं - तो मेरा ये मानना है, और मैं ऐसे ढेरों प्रतिभा सम्पन्न रचनाकारों और एकदम विशिष्ट - बोल्ड एंड ब्यूटीफ़ुल लेखन शैली हिन्दी ब्लॉगों में देख रहा हूँ - जो मेरे इस विचार को और भी संबल प्रदान करते हैं!

बिल्कुल सही ........

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