टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

March 2010

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ऊर्जा बचत के लिए ‘अर्थ आवर’ जैसी विचारधारा काग़ज़ी तौर पर तो बड़ी उम्दा दिखाई देती है, मगर यह किसी बड़े डिज़ॉस्टर को निमंत्रण देती भी प्रतीत होती है. ‘अर्थ आवर’ में पूरी पृथ्वी पर हर तरफ (स्थानीय समयानुसार)  रात 8.30 बजे से 9.30 बजे तक एक साथ बिजली बत्ती बंद रखने की बात कही जा रही है. और अगर सचमुच हम सभी एक साथ बिजली बन्द कर दें, तो यह हमारे लिए बन सकता है ‘डिज़ॉस्टर आवर’. आइए, देखें कि कैसै.

 

वैसे तो आमतौर पर तमाम भारतीय क्षेत्रों में बिजली की खासी किल्लत बनी रहती है और शेड्यूल्ड, नॉन-शेड्यूल्ड तथा अंडर-फ्रिक्वेंसी बिजली कटौती के फलस्वरूप रोज ब रोज कई कई घंटे बिजली बन्द रहती है. ऐसे में ‘अर्थ आवर’ की अवधारणा भारतीय क्षेत्रों के लिए तो काम की ख़ैर नहीं ही है. मगर, कल्पना करें कि जहाँ चौबीसों घंटे बिजली मिलती रहती है, वहाँ पर आप अचानक, एक साथ तमाम बिजली (के तमाम उपकरणों को) बन्द कर दें तो क्या होगा? ये तो एक हादसे को निमंत्रण देने जैसा है.

आपको उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं. कल्पना करें कि कोई मालगाड़ी टनों वजन लेकर अपनी अधिकतम रफ़्तार से दौड़ रही है. अचानक ही कोई दैत्याकार राक्षस मालगाड़ी के तमाम वजन को अपने विशाल पंजों में एक झटके में उठा लेता है. मालगाड़ी का इंजन जो टनों वजन को अपनी पूरी शक्ति से खींच रहा होता है उसके ऊपर अब कोई लोड नहीं होता. तो ऐसे में क्या होगा? मालगाड़ी की गति अनंत हो जाएगी और वो बेपटरी होकर दुर्घटना-ग्रस्त हो जाएगी. ऐसे ही अचानक खाली (जब आप वापस बिजली चालू करेंगे) चलती मालगाड़ी पर अचानक लोड दे दिया जाएगा तो क्या होगा? मालगाड़ी धड़ से रूक जाएगी.

यही हाल हमाले विद्युत संयंत्रों का होगा. विद्युत संयंत्र अपने अपने लोड शेयरिंग के हिसाब से सिंक्रोनाइजेशन में चलते हैं. ‘अर्थ आवर’ के शुरू होते ही उनका लोड अचानक ही खत्म कर दिया जाएगा तो वे अचानक ही सिंक्रोनाइजेशन से बाहर हो जाएंगे और या तो वे दुर्घटनाग्रसत् हो जाएंगे या सुरक्षा के लिहाज से वे स्वयंमेव बन्द हो जाएंगे. इसी तरह ‘अर्थ आवर’ की समाप्ति पर जब अचानक लोड बढ़ेगा तो फिर से एकबार यही स्थिति आएगी. और, एक बार कोई विद्युत संयंत्र सिंक्रोनाइज़ेशन से बाहर हो जाता है तो उसे वापस सिंक्रोनाइजेशन में लाने में समय, सावधानी और तैयारी लगती है. फिर, यहाँ पर तो लोड चहुँओर बन्द हो रहा है, ऐसे में यदा कदा टोटल ब्रेकडाउन की स्थिति भी आ सकती है. यानी – डिज़ॉस्टर को खुले आम आमंत्रण.

‘अर्थ आवर’ की अवधारणा अच्छी है, मगर इसमें व्यावहारिक परिवर्तन की दरकार है. 24 घंटों में क्षेत्रों की सहूलियत व प्रायोगिकता के हिसाब से बिजली बंद करने के समय को अलग-अलग किया जाना चाहिए ताकि इसके कारण विद्युत संयंत्रों व विद्युत वितरण कार्यप्रणाली में आने वाले झटकों को रोका जा सके.

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(समाचार कतरन – भास्कर.कॉम से साभार)

टाइम्स ऑफ़ इंडिया दिल्ली संस्करण में पेज 12 – टाइम्स नेशन में श्रेया रॉय चौधरी का एक आलेख भारतीय भाषाई ब्लॉगों पर प्रकाशित हुआ है. इसे टाइम्स ईपेपर पर (थोड़े कांट-छांट युक्त) यहाँ पढ़ा जा सकता है -

 

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यह लेख अपने पूरे आकार में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की साइट में प्रकाशित हुआ है, जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है.

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यदि किसी वकील या किसी लॉ फर्म से आपके पास कोई ईमेल आता है कि आपके साइट पर कॉपीराइट का उल्लंघन किया गया है और उससे संबंधित कॉपीराइट उल्लंघन का क़ानूनी नोटिस की वर्ड/आरटीएफ फ़ाइल आपके अवलोकनार्थ संलग्न है तो आप क्या करेंगे? आप चिंतित हो उठेंगे और उस दस्तावेज़ को तत्काल खोल कर देखेंगे. जाहिर है, कोई भी चिंतित हो सकता है, और संलग्न दस्तावेज़ को तत्काल खोल कर देखेगा ही कि उसमें क्या लिखा है. और ये क्या! दस्तावेज़ को खोलने का नतीजा आपके लिए बेहद अफसोसनाक होता है – खासकर तब जब आपने अपने कम्प्यूटर पर पर्याप्त सुरक्षा नहीं की है.

इंटरनेट के बदमाश फ़िशर रोज नई-नई चालाकियाँ करते हैं, और नए जाल लाते हैं. हाल ही में इन्होंने इसी तरह के कॉपीराइट उल्लंघन के नोटिस दस्तावेज़ संलग्न कर बेतरतीब ईमेल लाखों लोगों को भेजे हैं. इनके भेजे ईमेल में संलग्न दस्तावेज़ में ट्रोजन वायरस का कूट होता है जिसे उपयोक्ता के खोलते ही उसका कम्प्यूटर संक्रमित हो जाता है और कंप्यूटर की जानकारियाँ – चोरी कर ली जाती हैं.

 

तो ऐसे में अतिरिक्त सावधान रहिए. कॉपीराइट उल्लंघन का नोटिस यदि ईमेल से आता है तो उसे नजरअंदाज कीजिए, और ऐसे नोटिसों का कोरियर / स्पीडपोस्ट या रजिस्ट्री से पोस्टमैन द्वारा आने का इंतजार कीजिए, और, ऐसे चेतावनी देने वाले या डराने वाले ईमेलों को तो खासतौर पर अनदेखा कीजिए जिनमें कोई संलग्नक हो.

विस्तृत विवरण के लिए एफ़-सीक्योर की यह ब्लॉग प्रविष्टि देखें.

(चित्र – साभार एफ़-सीक्योर.कॉम)

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ये तो सरासर सिनेमा के दर्शकों, छोकरों, मनचलों का अपमान है. उनकी तुलना सीटी बजाते सांसदों से की जा रही है. सिनेमा हॉल और सड़क-चौराहे के साथ संसद की तुलना बेमानी है, अत्याचार है. सीटी बजाते सिनेमा के दर्शक, या किसी हसीन कन्या को देख कर सीटी बजाते मनचले छोकरे किसी सूरत सीटी बजाते सांसदों के समतुल्य नहीं हो सकते. सांसद तो जूतम-पैजार, सीट-फेंक, माइक उखाड़, गाली गलौज, हाथा-पाई इत्यादि इत्यादि के लिए जाने जाते हैं. जबकि सीटी बजाते सिनेमा के दर्शक या मनचले लड़के मासूम किस्म के होते हैं जो दरअसल सिनेमा के किसी हसीन दृश्य की प्रशंसा स्वरूप – मसलन माधुरी के ठुमके को देख कर सीटी बजाते हैं. संसद में सीटी नहीं सीटों का गणित बजता है, और यदि सीटी बजती भी है तो मार्शलों की. और आगे कभी सीटी बजाने की प्रक्रिया सांसदों द्वारा की जाने लगे तो वो हसीन दृश्यों के प्रतिक्रिया स्वरूप नहीं, बल्कि औचित्यहीन विरोध, घोर विरोध और एक दूसरे को नीचा दिखाने के फल स्वरूप होगी. सांसदों में अधिसंख्य हिस्ट्रीशीटर, करोड़-पति मिल जाएंगे. सीटी बजाते दर्शक-लड़के तो रोड छाप रोमियो ही होते हैं. अब आप बताएँ कहाँ हिस्ट्री शीटर और कहाँ रोड छाप रोमियो! लगता है कि रोड छाप रोमियो का मौलिक अधिकार  और उनकी मोनोपोली – सड़कों पर, और सिनेमा हॉलों में सीटी बजाने पर जल्द ही रोक लगेगी. संविधान संशोधन होगा, नया क़ानून बनेगा. सीटी बजाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ महामहिम सांसदों का होगा.

 

वैसे दूसरे एंगल से सोचा जाए तो ठीक भी है. सांसदों को सीटी बजाने की प्रैक्टिस करनी होगी. बहुतों को सीटी बजाना नहीं आता, उन्हें सीखना होगा. सीटी बजाने की प्रक्रिया स्वास्थ्य वर्धक है. फेफड़ों से तमाम शक्ति लगाकर हवा बाहर निकलती है, तभी सीटी बजती है. तो एक तरह से बाबा रामदेव का कपालभाती योग हो जाता है. इससे सांसदों का स्वास्थ्य थोड़ा ठीक रहेगा और वे देश के स्वास्थ्य की भी थोड़ी चिंता कर लेंगे. सीटी बजाते रहने से उनका स्वास्थ्य ठीक होगा तो उनके पेट का घेरा कम होगा नतीजतन वे राष्ट्र का हिस्सा थोड़ा कम खाएंगे.

तो, जब तक अभी हमें सीटी बजाने की स्वतंत्रता हासिल है, आओ यारों, इस ख़ास मौके पर सीटी बजाएँ!

 

व्यंज़ल

आओ यारों कुछ कर दिखाएँ

संसद में चलके सीटी बजाएँ


सभी तो लूट रहे हैं मुल्क को

क्यों न हम भी हाथ हिलाएँ


नए मेनिफेस्टो में जनता को

नए नए सब्जबाग़ दिखाएँ


हाथी नुमा नई पार्टी बनाके

चलो प्रदेश की अरथी उठाएँ


बिगुल बहुत बजा लिया रवि

अब तो चैन की बंसी बजाएँ

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(समाचार कतरन – खासखबर.कॉम से साभार)

एवरीथिंग के जरिए आप हिन्दी शीर्षक वाली  फ़ाइलों को विद्युत गति से खोज सकते हैं. पर तब क्या करें जब हमें फ़ाइलों के अंदर हिन्दी में लिखी इबारत में से खोजना है?

आपके पास दो मुफ़्त के बढ़िया विकल्प हैं.

1 विंडोज डेस्कटॉप सर्च

2 गूगल डेस्कटॉप सर्च

दोनों में से कौन बढ़िया है? रीव्यू तथा तुलना के लिए यहाँ देखें.

विंडोज डेस्कटॉप सर्च विंडोज़ 7 के साथ अंतर्निर्मित है. वस्तुतः यह स्टार्ट मेन्यू से लेकर विंडोज एक्सप्लोरर सभी में शामिल रह कर पृष्ठभूमि में काम करता हुआ बढ़िया परिणाम देता है. मैंने विंडोज एक्सप्लोरर के सर्च विंडो पर हिन्दी में फ़ाइलों के भीतर कहानी शब्द को ढूंढने की कोशिश माईडाक्यूमेंट फ़ोल्डर (विंडोज 7 में लाइब्रेरीज) में की. टाइप करते करते ही परिणाम हाजिर होते हैं जिन पर क्लिक कर आप सीधे उस डाक्यूमेंट को खोल सकते हैं. कुल मिलाकर, परिणाम त्वरित और उम्दा तथा बेहद काम का.

यह रहा स्क्रीनशॉट:

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मगर, फिर भी, यदि आपने लिनक्स में ग्रेप कमांड का प्रयोग किया हो तो फिर आप ही बता सकते हैं कि ग्रेप क्या होता है, और सटीक, त्वरित और सचमुच का सर्च क्या होता है! जी हाँ, लिनक्स में आप कमांड लाइन के जरिए फ़ाइलों में हिन्दी में ढूंढा-ढांढी कर सकते हैं. विंडोज में अभी तक (जी हाँ, अभी तक क्योंकि हिन्दी कमांड लाइन में ढंग से चलती नहीं!) यह सामान्य तौर पर संभव नहीं है!

 

एक छोटा सा टिप – क्या आप गूगल में चित्रों में सिर्फ चेहरों में से ढूंढना चाहते हैं? उदाहरण के लिए यदि आप अपने किसी आलेख में लगाने के लिए निराला का सिर्फ और सिर्फ  चेहरे वाला चित्र ढूंढना चाहते हैं तो नीचे दिए गए कोड को गूगल सर्च बक्से में कॉपी-पेस्ट कर काम में लें, या चाहें तो इस पर सीधे क्लिक कर सकते हैं.

http://images.google.co.in/images?um=1&hl=en&client=firefox-a&rls=org.mozilla%3Aen-US%3Aofficial&tbs=isch%3A1&sa=1&q=निराला&btnG=Search&aq=f&aqi=&aql=&oq=&gs_rfai=&start=0&imgtype=face

और, यदि किसी दूसरे का चेहरा ढूंढना चाहते हैं तो कोड में निराला की जगह कोई दूसरा नाम लिख दें. हमारे गूगल ‘निराला चेहरा खोज’ में उड़नतश्तरी प्रकट भए. नीचे दिया गया चित्र देखें. इसीलिए तो वो हैं हिन्दी ब्लॉग जगत के निराले व्यक्तित्व!

nirala - google face search

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फ़ॉन्ट सुविधा एक्सटेंडेड से अब अपने ऑनलाइन-ऑफ़लाइन डाटाबेस, एक्सएमएल फ़ाइलों तथा और भी ढेरों फ़ॉर्मेट की फ़ाइलों के हिन्दी फ़ॉन्टों को आपस में परिवर्तित कर सकते हैं

आपके पास यदि दो-चार पन्ने का साधारण टैक्स्ट फ़ाइल में डाटा हो तो वह किसी भी साधारण फ़ॉन्ट परिवर्तक से बढ़िया परिवर्तित किया जा सकता है. परंतु विशाल डाटाबेस की फ़ाइलों में रखी प्रचुर हिन्दी सामग्री के फ़ॉन्ट को (पुराने फ़ॉन्टों से यूनिकोड तथा इसके विपरीत तथा पुराने हिन्दी फ़ॉन्टों में आपसी परिवर्तन सम्मिलित) परिवर्तित करना अब तक तो टेढ़ी खीर मानी जाती रही है.

साइबरशॉपी (http://www.cybershoppee.com/ ) जिन्होंने पहले भी फ़ॉन्ट सुविधा नामक एक बेहद उपयोगी फ़ॉन्ट परिवर्तक जारी कर चुके हैं, ने इस अनुप्रयोग का एक्सेटेंडेड संस्करण निकाला है जिसमें यह तमाम सुविधाएँ हैं.

अब आप अपने ऑनलाइन/ऑफ़लाइन डाटाबेस, एक्सएमएल फ़ाइलें तथा और भी अन्य फ़ॉर्मेट की फ़ाइलों को आसानी से एक-दूसरे हिन्दी फ़ॉन्टों में बदल सकते हैं. वर्ड, एक्सेल व एक्सेस डाटाबेस फ़ाइलों का समर्थन तो पहले से ही उपलब्ध था.

मैंने इसका प्रोफ़ेशनल संस्करण प्रयोग किया है व पाया है कि परिवर्तन त्वरित और तेज होता है. मगर कुछ वर्तनी की अशुद्धियाँ (खासकर ड, ढ में नुक्ते गायब हो जाने की समस्या) यह घुसा देता है, जिसे ठीक करने में समय जाया होता है. उम्मीद है नए संस्करणों में यह समस्या नहीं होगी.

 

अधिक जानकारी के लिए इस पते support@cybershoppee.com पर ईमेल करें.

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सामाजिक दूल्हे तक तो ठीक था, मगर जब राजनीति के दुल्हे दुलहिनों को जब करारे कुरकुरे नए 1000 के करेंसी नोटों की मालाएँ पहनाए जाने की खबरें मिलीं तो रिजर्व बैंक चौकन्ना हुआ. रिजर्व बैंक ने #10 नए गाइड लाइन तैयार किए हैं नोटों, ख़ासकर नए, कुरकुरे करारे 1000 के करेंसी नोटों के लिए. इन गाइड लाइनों का सख्ती से पालन करने की हिदायत भी दी गई है, अन्यथा प्रयोगकर्ताओं पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी दायर किया जा सकता है इसकी ताकीद की गई है.

रिजर्व बैंक के प्रवक्ता से पूछा गया कि नई गाइड लाइनें क्यों बनाई गईं हैं और क्या पुरानी गाइड लाइनें उपयुक्त नहीं थीं, तो प्रवक्ता ने भाषण झाड़ा –

“देखिए, वस्तुओं का प्रयोग बदलता रहता है. समय के अनुरूप प्रचलन बदलता है. आदमी को समय के हिसाब से चलना भी चाहिए. जैसी राजा वैसी प्रजा. तो नोटों का प्रचलन व प्रयोग भी बदलेगा और बदलना चाहिए. नोटों का प्रयोग बदल भी गया है. ऐसे में नए गाइड लाइनों की आवश्यकता अपरिहार्य है. उदाहरण के लिए, मोबाइल को ही लें. पहले इनका इस्तेमाल फोन काल के लिए किया जाता था. इन्हें बनाया ही इसीलिए गया था. मगर भाई लोगों ने इसमें इतनी सुविधाएँ जोड़ दी हैं कि अब मोबाइल का प्रयोग फोन काल के लिए कम, संगीत सुनने, एसएमएस करने और चेन मेल के एमएमएस फारवर्ड करने के काम में ज्यादा लिया जाता है”

1000 के नोटों के प्रयोग हेतु रिजर्व बैंक द्वारा घोषित नई #10 गाइड लाइनें हैं –

1. विशेष अवसरों को छोड़कर* (कृपया नीचे कंडिका 2 देखें) नोटों का प्रयोग किसी भी प्रकार की खरीदी-बिक्री-विपणन इत्यादि के लिए तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया जाता है.

2. नोटों का प्रयोग विशेष अवसरों को छोड़कर* (कृपया नीचे कंडिका 6 व 7 देखें) सिर्फ और सिर्फ माला बनाने के काम में लिया जा सकता है.

3. राजनीतिक नेताओं के मालाओं में पाँच करोड़ रुपये से कम कीमत व 65 किलो से कम वजन की माला का प्रयोग प्रतिबंधित है.

4. शादी-विवाह के अवसर पर दूल्हे के मालाओं में 1000 के नोटों का इस्तेमाल प्रतिबंधित है.

5. शादी-विवाह के अवसर पर दूल्हे के मालाओं में कुल छोटे नोटों की क़ीमत 1000 से कम होनी चाहिए.

6. सांसदों / विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए 1000 के नोटों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए, अन्यथा वह अवैध माना जाएगा.

7. हवाला, सुपारी, घूंसखोरी व भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ 1000 के नोटों के प्रयोग की अनुशंसा की जाती है. दीगर मूल्य के नोटों का प्रयोग कदाचरण माना जाएगा.

8. विशेष परिस्थितियों को छोड़कर (कृपया नीचे कंडिका 9 देखें)1000 के नोटों को बैंकों में अथवा लॉकरों में रखना जुर्म होगा. इन्हें बेडरूम में गद्दों तकियों में तथा बोरों में भरकर, बाथरूमों में फ्लैश टंकियों में तथा ऐसे ही दीगर जगहों पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

9. नोटों को भंडारण के लिए कंडिका 8 में वर्णित अनुसार विकल्पों से इतर यदि बैंक में रखा जाना अपरिहार्य हो तो 1000 के नोटों की स्तरीयता, उनकी महत्ता बरकरार रखने के लिए सिर्फ और सिर्फ स्विस बैंक में जमा किया जाना चाहिए.

10. प्रयोक्ताओं को इस महीने की 31 तारीख से पहले 1000 के अपने सभी पुराने नोटों को नए नोटों से बदल लेना चाहिए. इस तिथि के पश्चात् पुराने नोटों का मूल्य शून्य हो जाएगा. नए नोटों में सुरक्षा के लिहाज से, नकली नोटों के प्रचलन को रोकने के लिए, विशेष उपाय किए गए हैं जिनमें से एक - गांधी का अपसाइड डाउन वाटरमार्क भी है.

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(संबंधित व्यंग्य रचना – इम्पोर्टेड रुपया)

पुस्तक मेले में विचरते हुए इस एक अलग, विशिष्ट किताब पर नजर गई. 21 वीं सदी का व्यंग्य कोश.

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उत्सुकतावश पन्ने पलटे कि आखिर इस कोश में क्या संकलित है, तो विषय वस्तु को देखकर लेखक के नायाब विचार और प्रयास को देखकर आनंद आ गया. यह कोश कुछ कुछ टेन-वर्ड-विकि जैसा है. एकाध पृष्ठ पर आप भी नजर मारें -

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विवरण-

व्यंग्य कोश

लेखक - सरन माहेश्वरी

प्रकाशक एवं वितरक

राजस्थानी ग्रन्थागार

सोजती गेट, जोधपुर (राज.)

द्वितीय संस्करण - मूल्य 200.00 रु.

आईएसबीएन नं. 81-86103-00-7

http://rgbooks.net

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व्यंज़ल


क्यों करें काम

काम है आराम


काम में आराम

गुठलियों के दाम


काम बिना दाम?

सरकारी है काम


काम बिना नाम!

सरकारी है काम


रवि तेरा काम?

कुर्सी पे आराम


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(संबंधित प्रविष्टि – आओ आराम फरमाएँ भी देखें)

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फ़ेसबुक पर मित्र निवेदन साज-संभाल रहा था. एक कड़ी को क्लिक करने पर यह बटन प्रकट हुआ – निवेदन दुर्लक्षित करें. हे! भगवान!! इसका अर्थ क्या है? कोई बताएगा? वर्षों से कम्प्यूटर अनुप्रयोगों व वेब सामग्री के हिन्दी अनुवादों में सक्रिय हिस्सेदारी के बावजूद इस बटन पर लिखे का अर्थ मुझे तो समझ में नहीं आया. किसी को आया हो तो बताएँ, ताकि आगे मित्र निवेदन की साज-संभाल की जा सके. अभी तो अपनी गाड़ी दुर्लक्षित (?) हो गई है…

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आपकी हिन्दी भले ही अच्छी खासी अच्छी हो, पर लंबे व बड़े पाठों की वर्तनी पर निगाह मारने के लिए व गलत वर्तनी को पकड़ने के लिए कम्प्यूटर आधारित वर्तनी जाँच का कोई सानी नहीं है.

एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2003 / 2007 के संस्करणों में वैसे तो हिन्दी की वर्तनी जाँच अंतर्निर्मित है, मगर वर्तनी जाँच की सुविधा हेतु प्रयुक्त हिन्दी शब्दों का डाटाबेस बेहद ही अपूर्ण क़िस्म का है (क्या कोई कम्प्यूटर आधारित हिन्दी वर्तनी जाँचक कभी परिपूर्ण बन भी सकता है? और व्याकरण जाँच?), जिससे यह आपको वर्तनी जाँच के समय हिन्दी के सही शब्दों को भी लाल रेखा से रेखांकित कर गलत बताता है और कई मर्तबा अच्छे जानकारों को भी धोखा हो जाता है. कई मर्तबा गलत सुझाव देता है (चूंकि डाटाबेस में सही शब्द शामिल ही नहीं हैं).

ऐसे में अपना स्वयं का हिन्दी शब्दकोश डाटाबेस बनाना व उसे जोड़ना बहुत ही आवश्यक व महत्वपूर्ण हो जाता है. इसके लिए सही हिन्दी शब्दों पर दायाँ क्लिक कर शब्द कोश में जोड़ें का विकल्प चुना जा सकता है. आप देखेंगे कि कुछ दिनों के प्रयोग के उपरांत आपके पास एक अच्छा खासा डाटाबेस तैयार हो जाता है. तो यदि आपके पास ऐसा अच्छा डाटाबेस है तो आपसे आग्रह है कि उसे साझा करें. कुछ दिनों पहले तकनीकी हिन्दी समूह में यह बात मुखर हुई थी और सुधी जनों ने अपने कस्टम डिक्शनरी को साझा करने का वादा भी किया था.

इसी वादे के मुताबिक मैं अपना एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2003-2007 में काम करने वाला हिन्दी का कस्टम डिक्शनरी अपलोड कर रहा हूं, और आपको इसे अपडेट करने का तरीका भी बताता हूं.
इस डिक्शनरी (custom.dic) को आप यहाँ - http://cid-60eace63e15a752a.skydrive.live.com/self.aspx/.Public/CUSTOM.DIC  से डाउनलोड करें. इसमें सामान्य प्रयोग के कोई 4 हजार शब्द हैं.
इसे नोटपैड में खोलें. देखें कि कहीं कोई गलत वर्तनी वाला शब्द तो इसमें शामिल नहीं कर लिया गया है, यदि ऐसा है तो उस शब्द को मिटा दें, या सुधार दें. अन्यथा यह आपके दस्तावेज़ के गलत शब्दों को भी ठीक बताने लगेगा.

अब आपको अपने एमएस ऑफ़िस हिन्दी के कस्टम डिक्शनरी में इस डिक्शनरी की सामग्री को जोड़ना होगा. इसके लिए आपके ऑपरेटिंग सिस्टम और ऑफ़िस के संस्करण के मुताबिक भिन्न डिरेक्ट्री में जाना हो सकता है. आमतौर पर कस्टम डिक्शनरी नाम की फ़ाइल (custom.dic) इन डिरेक्ट्री में मिल सकती है – (ध्यान दें – यूजर नाम यहाँ पर है – RaviRatlami, तो आपके कंप्यूटर के यूजर नाम भिन्न होंगे )

$\Users\RaviRatlami\AppData\Roaming\Microsoft\UProof
$\Documents and Settings\RaviRatlami\Application Data\Microsoft\Proof

आप इसके लिए विंडोज सर्च का सहारा भी ले सकते हैं. अब आप इसमें से किसी भी डिरेक्ट्री में उपलब्ध custom.dic फ़ाइल को खोलें व डाउनलोड की गई custom.dic की सामग्री को अपनी फ़ाइल के अंत में कॉपी पेस्ट कर दें, व इसे सहेज लें. ध्यान दें कि कॉपी पेस्ट करते समय पाठ एक लाइन में एक शब्द हो, अन्यथा मामला बिगड़ सकता है. इस फ़ाइल को एमएस वर्ड अपने अगले प्रयोग के समय स्वयं ही दुरुस्त कर लेगा, शब्दों को छांट लेगा व दोहरे शब्दों को निकाल बाहर करेगा. तो इस तरह से आपकी कस्टम डिक्शनरी बन गई है अब पावरफुल.

यदि आपके पास एमएस ऑफ़िस हिन्दी की बढ़िया, और बड़ी कस्टम डिक्शनरी है तो आपसे आग्रह है कि कहीं इसे अपलोड करें व हमसे साझा करें.
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) – उपर्युक्त कार्य करने से पहले अपने कार्य सहेज लें तथा अपने कार्य, डाटा व custom.dic का बैकअप बना लें.

अद्यतन: #  फ़ाइल का नया संस्करण जिसमें कोई 1.2 लाख शब्द हैं, तकनीकी हिन्दी समूह में अपलोड किया गया है. इनमें निहित शब्दों में कुछ वर्तनी की गलतियाँ हो सकती हैं. फ़ाइल यहाँ से डाउनलोड करें -
http://groups.google.com/group/technical-hindi/web/CUSTOM.zip?hl=hi

 

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चहुँ और चिल्ल पों मची है कि महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए/नहीं होना चाहिए. आपके अपने टेक हो सकते हैं कि महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए या नहीं. मेरे विचार में महिला आरक्षण बिल किसी सूरत पास नहीं होना चाहिए. कदापि नहीं. शीर्ष # 10 कारण जानें कि क्यों –

1. महिला आरक्षण बिल पास हो गया तो शहाबुद्दीनों, पप्पू यादवों का क्या होगा और राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव जीतने के लिए महिला-शहाबुद्दीनों, स्त्री-पप्पू यादवों को कहाँ से लाएँगे?

2. मंत्री/सांसद जो देश/राज्य को छोड़कर सिर्फ और सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र के लिए काम करते हैं, योजना बनाते हैं, बाकी दूसरे क्षेत्र की और आँख मूंद लेते हैं उनको अब दूसरे क्षेत्र की और भी जबरिया देखना होगा. क्योंकि क्या पता अगले चुनाव में उनका क्षेत्र महिला के लिए आरक्षित हो गया तो उन्हें कहीं और से लड़ना पड़ेगा. ये कहां की तुक और कहां का न्याय है. ये तो प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है.

3. महिला आरक्षण बिल पास हो गया तो देश में राबड़ी और माया जैसे देवियों और वतियों का राज होने की संभावना प्रबल है – जिसके बारे में सोचकर रूह कांप जाती है.

4. देश के कुंवारे राहुलों को शादी करनी पड़ेगी – क्योंकि जब अगली बारी में उनके चुनाव क्षेत्र महिला के लिए आरक्षित घोषित कर दिए जाएँ, तो क्षेत्र हाथ से न निकले, घर ही में, पत्नी के पास रहे.

5. 33 प्रतिशत पुरुष सांसद चुनाव जीतने के बाद अपने क्षेत्र के लिए कोई काम ही नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें संभावना में ये दिखाई देता रहेगा कि अगली बारी में उनका क्षेत्र स्त्री के लिए आरक्षित हो जाएगा तो फिर फोकट में सिर फुटव्वल क्यों?

6. 50 प्रतिशत मामलों में महिला आरक्षण का कोई अर्थ इसलिए नहीं होगा क्योंकि इन संसदीय क्षेत्रों में एक बार पति चुनकर आएंगे तो अगली बार पत्नी. सांसद पति रहे या पत्नी क्या फर्क पड़ता है? कई मामलों में मां-बेटा, बेटी-बाप, बहू-ससुर का बढ़िया, उदाहरण योग्य कॉम्बीनेशन भी बनेगा.

7. महिला आरक्षण बिल के पारित हो जाने से भारतीय संसद की नित्य गिरती गरिमा (सांसदों के आपसी जूतम पैजार और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की वजह से) में ठहराव व उलटे गरिमा में उत्थान की संभावना है जो भारतीय लोकतंत्र के लिहाज से कतई स्वास्थ्यवर्धक नहीं है. इसीलिए इस बिल को किसी सूरत पास नहीं होना चाहिए.

8. भारतीय संसद तो बेकार की लफ़्फ़ाजियों, थोथे भाषण, धरना प्रदर्शन, अकारण विरोध, जूतम-पैजार इत्यादि के लिए है. काम-धाम का वहाँ क्या लेना देना? 33 प्रतिशत स्त्रियों को अकारण ही इसमें झोंके जाने की साजिश मात्र है यह बिल.

9. सुखराम और मधु कोड़ा बनने के सपने पर अब तक पुरुषों का ही अधिकार था. महिलाओं को भी ऐसे सपने देखने की सुविधा प्रदान करने वाला है यह बिल. स्त्रियों को फंसाने की साजिश है यह बिल. ऐसे सड़ियल स्वप्न दिखाने वाले इस बिल का स्त्रियों को स्वयं पुरजोर विरोध करना चाहिए.

10. आपको क्या लगता है? आम स्त्री के लिए है यह बिल? दरअसल यह बिल खांटी, जमे हुए राजनीतिक नेताओं के मां-बहन-बेटी-बहू को (इनकम्बेंसी फैक्टर की वजह से अपनी हार से बचने के लिए,) अगले चुनावों में सांसद बनाने की राजनीतिक चाल है यह बिल!

आइए, जी जान से विरोध करें इस तथाकथित महिला आरक्षण बिल का.

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सिर्फ न्यायालय ही क्यों श्रीमान?

गुजरात उच्च-न्यायालय का मानना है कि वहां की ज्यूडिशियरी में किसी को भी खरीदा जा सकता है. बजा फरमाया योर ऑनर! पर सिर्फ ज्यूडिशियरी की बात क्यों, भारत में ऐसा कोई इन्टैक्ट तंत्र बता दें जहाँ किसी को खरीदा नहीं जा सकता.

आप बता सकते हैं?

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व्यंज़ल

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हर कोई बिकता है यहाँ लेवाल चाहिए

सोहनी के देश में एक महिवाल चाहिए


जवाब तो हर किसी के पास है इधर

यहाँ तो बस एक अदद सवाल चाहिए


मुरदों के शहर में हमारा क्या काम

हमें तो रोज एक नया बवाल चाहिए


मेरे मोहल्ले के बाशिंदों को दोस्तों 

खिड़की दरवाजे नहीं दीवाल चाहिए


मामूली से रवि को कोई पूछता नहीं

सब को अब हर तरफ कमाल चाहिए

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(समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया)

यदि हाँ तो इस सर्वे में भाग लीजिए. यह सर्वे माइक्रोसॉफ़्ट के अभिषेक कांत ने पोलडैडी पर चढ़ाया है. जितना ज्यादा लोग पढ़ना चाहेंगे, उतनी ज्यादा संभावना. तो दौड़ लगाइए, अपनी स्वीकृति दीजिए और इंतजार कीजिए हिन्दी में तकनीकी सामग्री का. सर्वे एक पन्ने का है और आपका आधा मिनट ही जाया होगा. तो जल्दी करें.

सर्वे में भाग लेने के लिए इस कड़ी पर चटका लगाएँ

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एक शेर पेश है -
रात में सड़क पे निकलना मना है मेरे देश में यारों ,
न जाने किस अंधे मोड़ पे मौत से भिड़ंत हो जाए.

यह शेर मेरा नहीं है, और न ही किसी मंजे हुए शायर का. यह शेर तो हमारे प्रदेश के मुख्य-मंत्री महोदय का है. वे अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को यह सुझाव दे रहे हैं. और, हो सकता है ऐसी सलाह कल को वे तमाम जनता को दें. अभी तो वे मंत्रियों को कह रहे हैं कि भई, रात-बेरात बाहर सड़क पर न निकलो. तुम्हारे जान-माल का खतरा है. मंत्री वैसे भी जनता जनार्दन से ऊंचे दर्जे के होते हैं, तो उनकी चिंता खास रखनी ही होगी. तो, यदि मंत्रियों को रात-बेरात बाहर जाना हो तो? सड़क मार्ग नहीं, वायुमार्ग का प्रयोग करें. मंत्री बन गए हैं, पर इतना भी नहीं जानते! और जब जनता जनार्दन हो हल्ला मचाने लगेगी तो? चुनावों के समय वोटों का भय दिखाएगी तब? तब उन्हें जनता को भी ऐसी हिदायतें देने में देर नहीं लगेगी. जनता को तैयार रहना चाहिए, ऐसी किसी भी मुश्किल का सामना करने के लिए.
मगर, फिर, रात में ही क्यों? दिन में सड़क में निकलना क्या सुरक्षित है? जनता के लिए तो रात और दिन बराबर हैं. रात में अंधेरी, गड्ढेदार सड़कें आपकी जान की आफत हैं तो दिन में भीड़भाड़, ट्रैफ़िक जाम और बीच सड़क पर ट्रैफ़िक वसूली. जनता तो ख़ैर भुगतने के लिए ही है, मगर मंत्रियों के लिए ज्यादा अच्छा नहीं होता कि तिथि और समय निश्चित कर दिया जाए कि इस नियत तिथि को ही बाहर निकलें, अन्यथा नहीं. फिर उस तिथि और समय पर बढ़िया चाक चौबन्द सुरक्षा व्यवस्था के साथ सड़कों के गड्ढे इत्यादि पाट कर चकाचक कर दिया जाए ताकि कोई समस्या न रहे, कोई खतरा न रहे – जैसे कि वीवीआईपी के लिए होता है?

एक और शेर -
जॉनी तुम यूँ निकला न करो बन ठन के,
न जाने किस गली तुम्हें लूट लिया जाए.

ये शेर भी मेरा नहीं है, और न ही किसी उस्ताद शायर का. ये जबरदस्त शेर ऑस्ट्रेलिया के मंत्री महोदय का है. अभी कुछ दिन पहले ऑस्ट्रेलिया के मंत्री महोदय ने वहाँ के प्रवासी भारतीय जनता को सलाह दी थी कि वे भिखारियों की तरह के कपड़े पहन कर बाहर निकलें, अमीरों की तरह नहीं, ताकि उन पर जातीय और नस्ली प्रहार न हों. उन्हें ये भी हिदायतें दी गई थीं कि आभूषण पहन कर न निकलें, अपने महंगे आई-फोन को दिखाते हुए बात न करें और न ही गाने सुनें. सारी हिदायतें मानवीय गुणों, मानवीय स्वभाव के विरूद्ध! और, अभी तो भारतीय प्रवासियों के लिए ये सलाहें दी गई हैं, कल को ये जातीय और नस्ली हिंसा अन्य जातियों और अन्य नस्लों पर भी होने लगें तब? और, अब जब सरकार ने सलाह दे दी है, तो भिखारी की तरह नजर आते किसी शख्स की ख़ैर नहीं. वो उत्पाती ऑस्ट्रेलियाइयों की निगाह में सबसे पहले आएगा.
मैं अभी ऑस्ट्रेलिया में तो नहीं हूँ, अतः मैं भिखारियों जैसे कपड़े पहनने के लिए अभिशप्त नहीं हूं. मैं अभी मंत्री भी नहीं हूं, और ईश्वर की दया से रात्रि में घूम सकता हूं, क्योंकि ये सलाह अभी मुझ जनता को नहीं मिली है.
शुक्र है!
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(समाचार कतरन – साभार, दैनिक भास्कर)

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मीठी, रसीली टेक्नोलॉजी का इससे बढ़िया उदाहरण और क्या हो सकता है भला? टाइगर टैक्स्ट नाम की एसएमएस सेवा से आप किसी की ऐसी तैसी करते एसएमएस करते हैं, वो एसएमएस सामने वाले के स्क्रीन पर 60 सेकंड के लिए नमूदार होता है, और इससे पहले कि वो कोई एक्शन ले पाए, आपका गाली भरा एसएमएस अपना काम कर खुद हाराकिरी कर लेता है. साथ ही आपके फोन से भी उसका नामोंनिशां मिट जाता है. इस तरह से इसका कोई सुराग कहीं बचा नहीं रह पाता. वैसे, इस तरह के 60 सेकंड में सेल्फ-डिस्ट्रक्टिव एसएमएस संदेशों का प्रयोग और भी विविध रूपों में किया जा सकता है. नेताओं के लिए पार्टी-छोड़, पार्टी-बदल जैसे ऑफ़र और सुझावों के लिए तो यह एविडेंस रहित बढ़िया विकल्प होगा ही, भ्रष्टाचारियों के लिए नेगोशिएशन और डील का मुफ़ीद हथियार भी रहेगा. मजनुओं के लिए ख़ब्ती लैलाओं जिनके पुलिस के पास जा कर शिकायत दर्ज करवाने का हमेशा भय बना रहता है, यह तो पसंदीदा, माफ़िक और मारक हथियार रहेगा. जाने कितने प्रेम निवेदन जो ऐसे भयों से अनभेजे पड़े रह जाते हैं मोबाइलों की मेमोरी में ड्रॉफ़्ट रूपों में और अनसेंट बक्सों में, उनका तो, कल्याण ही हो जाएगा.

मगर बहुत मामलों में खालिस एसएमएस से बात नहीं बनती. बंदा यदि मेरी तरह मोबाइल प्रेमी न हुआ तो? यदि वो कंप्यूटर सेवी हुआ तो? तब तो टाइगर ईमेल और टाइगर ब्लॉग जैसे प्रकल्पों को रूप देना ही होगा. तब आप बिना किसी भय के किसी को भी उसके सात पुश्तों को कोसते हुए ईमेल लिख सकते हैं. ये बात जुदा है कि सामने वाला भी टाइगर ईमेल की सेवा से आपको वापस आपके दस पुश्तों को कोसते हुए जवाब दे दे. मगर, भइए, मजा इसी में तो है. और, टाइगर ब्लॉगों के जरिए तो, स्थिति की कल्पना करें, कि कितना मजा आएगा. लोगबाग जिनकी एकमात्र योग्यता कम्प्यूटर कीबोर्ड के जरिए टाइप कर लेने की होती है, अनाम बने रहकर तमाम तरह के जहरीले विचार 60 सेकंड के लिए ही सही, इंटरनेट पर छोड़ सकेंगे. धार्मिक जहर फैलाने वाले ब्लॉगरों के लिए तो यह तकनॉलाजी खास मुफ़ीद बैठेगा. एक दूसरे के धर्म पर जम कर उन्मादी रूप से गरिया सकेंगे, 60 सेकंड के लिए प्रकाशित कर सकेंगे जिसका इस निर्धारित समय के बाद नामोनिशां दुनिया से स्वयं मिट जाएगा ताकि पकड़ाई में आने के लिए कोई सनद बाकी ही न रहे. ऐसे कामों के लिए तो, 60 सेकंड भी बहुत होते हैं!

आप तो ये भी कहेंगे कि 60 सेकंड बहुत होते हैं, स्नैपशॉट लेने के लिए, फोरेंसिक जांच पड़ताल के लिए, तो मामला 30 सेकंड के लिए भी सेट किया जा सकता है – ट्विटर जैसे छोटे टाइगर ट्विटर के जरिए. या फिर डबल टाइगर विचार के अनुरूप, स्क्रॉल करते शब्दों में, शब्द-दर-शब्द अपनी टाइगरी बातें रखी जा सकती हैं. टाइगर ब्लॉग और टाइगर ट्विटर को जल्द से जल्द लाया जाना चाहिए. जाने कितने महान विचार कम्प्यूटर कीबोर्ड में टाइप होने के लिए जमाने से तैयार हैं, मगर इस तरह की सेवाएँ उपलब्ध नहीं होने से अंदर ही अंदर घुट कर दम तोड़ रही हैं.

प्रोग्रामरों और डेवलपरों! जरा जल्दी करो. हमें टाइगर ब्लॉग और टाइगर ट्विटर जल्द से जल्द उपलब्ध करवाओ! ऐसी सेवाओं का प्रयोग करने के लिए हम तो दशकों से मरे जा रहे हैं.

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(समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया)

पिछले कई महीनों से लगातार माईवे (बीएसएनएल-एमटीएनएल के साथ जो आईपीटीवी सेवा प्रदान करती है) के टेलीमार्केटियरों से बचते-बचाते अंतत: जब 1 महीने के लिए मुफ़्त जांच-परख का ऑफर आया तो सोचा कि चलो, इसी बहाने इस सेवा को न सिर्फ जांच परख लिया जाए और यदि काम का लगे तो इसकी सेवा क्यों न ली जाए. वैसे, नेट पर भारत के आईपीटीवी माईवे के लिए ऋणात्मक समीक्षाओं की भरमार है, और मैं कम से कम किसी चमत्कार की उम्मीद तो कर ही नहीं रहा था.

मेरे हाँ करते ही, जल्द ही माईवे का प्रतिनिधि घर पर धमक गया. कुछ आसान सी फ़ॉर्मेलिटी करवाई गई, एक आवेदन भरवाया गया, सुरक्षा निधि के नाम पर 1500 रुपए लिए गए कि जब आपको यह सेवा पसंद न आए तो हम एक महीने के भीतर आपको यह पैसा वापस दे देंगे. माईवे आईपीटीवी के लिए घर पर बीएसएनएल-एमटीएनएल का ब्रॉडबैण्ड आवश्यक है. मैंने अपना ब्रॉड बैण्ड तब कटवा लिया था जब से मैंने बीएसएनएल की भरोसेमंद, आंशिक रोमिंग युक्त बढ़िया वायरलेस हाईस्पीड इंटरनेट सेवा – ईवीडीओ का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था. तो मैंने एक सस्ती सेवा 125 रुपए प्रतिमाह, 250 मेबा डाउनलोड सीमा हेतु ब्रॉडबैण्ड ले लिया. यह बड़ी अजीब बात है कि माईवे आईपीटीवी के लिए आपके घर में ब्रॉडबैण्ड होना आवश्यक है. भई, मैं टीवी देखना चाहता हूं, कम्प्यूटर चलाना नहीं तो क्या जबरन मुझे ब्रॉडबैण्ड थमाया जाएगा इसके लिए? मैंने विरोध दर्ज किया तो बताया गया कि यह बात पाइपलाइन में है, और इस जबरिया आवश्यकता को जल्द ही खत्म किया जाएगा.

आवेदन के तीसरे दिन माईवे के इंजीनियर मि. तुषार कनेक्शन आईपीटीवी लगाने पहुँच गए. आईपीटीवी के लिए एक छोटा सा सेट-टॉप बॉक्स होता है, और एक रिमोट कंट्रोल. आईपीटीवी को आपके ब्रॉडबैण्ड कनेक्शन के मॉडम के एक नेटवर्क पोर्ट से जोड़ा जाता है. मेरे पास का मौजूदा वायरलेस मॉडम टाइप 4 ने कुछ समस्याएँ खड़ी की तो टाइप 1 लगाया गया. फिर भी काम नहीं बना तो 2 घंटे की अनवरत कोशिश के बाद पता चला कि नए सेट-टॉप बॉक्स में भी खराबी है, क्योंकि वो बूट नहीं हो रहा था. उसे बदला गया, और आगे कोई आधे घंटे के जद्दो जहद और तीन बार सेट-टॉप बॉक्स को रीबूट करने के उपरांत आईपीटीवी के होम के दर्शन टीवी पर कुछ यूं दिखे:

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यहाँ पर कुछ तकनीकी बातें – मैंने जो ब्रॉडबैण्ड इस आईपीटीवी के लिए लिया है, वो 125 रुपए महीने का है, और उसकी लिमिट है – कृपया ध्यान दीजिए – 250 मेबा प्रति माह. अब जो आईपीटीवी इसी कनेक्शन पर लगाया गया है, वो अभी तो एक माह के लिए मुफ़्त है, मगर यदि मैं इसका बेसिक प्लान लूं, तो 100 रुपए मासिक का है. और, आईपीटीवी में प्रतिमिनट 2 एमबीपीएस की गति अच्छे टीवी दर्शन के लिए आवश्यक है. और, यदि मैं 4 घंटे भी नित्य टीवी देखता हूं, तो आप स्वयं गणना करने के लिए स्वतंत्र हैं कि मैं कितने जीबी डाटा इस सौ रुपल्ली में प्रयोग कर लूंगा आईपीटीवी के जरिए. मगर यदि मैं डाटा का प्रयोग ब्रॉडबैण्ड कम्प्यूटिंग के लिए करूं तो जेब कट जाएगी. ये दोतरफा, ग्राहकों को चूना लगाने की नीति किसी एंगल से समझ नहीं आई.

अब आइए देखते हैं आईपीटीवी के तकनीकी पहलू –

सेट-टॉप बॉक्स –

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सेट-टॉप बॉक्स छोटा सा, वजन में हल्का है और इसमें सामान्य टीवी के लिए एसवीडियो और कम्पोजिट वीडियो-ऑडियो आउट हैं. एक ईथरनेट आरजे45 पोर्ट तथा पावर इनपुट सॉकेट है. एक यूएसबी भी इसमें दिया है, मगर इसके बारे में तुषार द्वारा कोई जानकारी नहीं दी गई, कि यह क्या कर सकता है और किसलिए है. इसका मैन्युअल भी नहीं मिला जिससे पता किया जा सके कि इसका कार्य क्या है. माईवे की साइट पर इंस्टालेशन मैनुअल में बताया गया है कि इसका प्रयोग वायरलेस टीवी ब्रॉडकास्ट खास यूएसबी डांगल के जरिए प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है.

सेट-टॉप बॉक्स रिमोट कंट्रोल –

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रिमोट कंट्रोल अनावश्यक लंबा और भारी है. इसमें दो AA आकार के बैटरी के कारण यह नीचे की ओर ज्यादा भारी हो जाता है जिससे पकड़ में बैलेंसिंग की समस्या होती है. मेन्यू में नेविगेशन के लिए जो कुंजियाँ दी गई हैं वे रिमोट के एकदम ऊपरी हिस्से में दी गई है जिससे छोटे हाथ वालों को एक हाथ से पकड़ कर उंगलियों से दबाने में समस्या होती है. नेविगेशन कुंजियों को जगह होने के बावजूद बहुत पास पास रखा गया है जो कुंजियाँ दबाने में समस्या पैदा करता है और कहीं का कहीं दब जाता है. ओके बटन के लिए गैप भी सही नहीं है, जिससे उसे दबाने में भी समस्या आती है. मोटी उंगलियों के लिए तो खास समस्या पैदा करती है. रंगीन बटन विशिष्ट फंक्शनों के लिए हैं और ठीक जगह पर हैं, मगर बाकी के बटन बहुत ही क्राउडेड और पास पास हैं.

आईपीटीवी में नया क्या है?

मेरे पास एयरटेल डीटीएच सेवा पहले से ही उपलब्ध है. आईपीटीवी की सेवा डीटीएच सेवा से उन्नत बताया जा रहा है. मैंने एयरटेल डीटीएच के ऑडियो आउट को फ़िलिप्स एचटीएस 3378 के ऑक्जिलरी 1 से जोड़ा हुआ है. आईपीटीवी को मैंने इसके ऑक्जिलरी 2 से जोड़ दिया ताकि डीटीएच तथा आईपीटीवी के ऑडियो वीडियो दोनों की क्वालिटी में तुलना संभव हो सके.

आईपीटीवी में पारंपरिक टीवी ब्रॉडकास्ट के अलावा और भी दूसरी ढेरों, सुविधाएँ हैं और संभावनाएँ अनंत हैं. चूंकि आपका टीवी इंटरनेट से जुड़ जाता है तो भविष्य में ही सही (अभी तो नहीं है,) इंटरनेट की सारी सुविधाएँ आईपीटीवी के जरिए कम कीमत में मिल सकती हैं. वर्तमान में टीवी प्रसारणों के अतिरिक्त आईपीटीवी में निम्न सुविधाएँ अतिरिक्त रूप से मौजूद हैं –

· मूवी ऑन डिमांड – डीटीएच में सीमित – 4-6 फ़िल्में ही मिल सकती हैं, आईपीटीवी में असीमित हैं, और आप इन्हें पॉज कर सकते हैं, फारवर्ड-बैकवर्ड चला सकते हैं. जो डीटीएटच में संभव नहीं.

· नेट भ्रमण – जैसे कि आप अभी अपना ईमेल चेक कर सकते हैं. भविष्य में कीबोर्ड के जरिए ईमेल लिखने की संभावनाएँ उपलब्ध.

· माईवे आईपीटीवी की आई-सेवा के तहत प्रमुख सुविधाएँ जैसे कि रेल रिजर्वेशन, पीएनआर नंबर जानकारी, नक्शे में रास्ते देखना, पता ज्ञात करना इत्यादि.

· ऑन-डिमांड के तहत टीवी एपिसोड (जैसे कि महाभारत का कोई भी एपिसोड कभी भी देखें), बाबा रामदेव के योग, बच्चों की कहानियाँ, कविताएँ, अंग्रेजी सीखने के पाठ, कार्टून, गेम्स इत्यादि इत्यादि.

सेवा की असली समीक्षा – क्या आईपीटीवी वाकई दमदार है?

अभी तक तो हमने किताबी समीक्षा की कि आईपीटीवी में क्या दावा किया गया है और क्या संभावनाएँ हैं. मगर अब देखते हैं कि वास्तविक प्रयोग में यह कितना खरा उतरता है.

इंजीनियर तुषार द्वारा आईपीटीवी को संस्थापित किए जाने व चालू करने के बाद उसकी कुछ विशेषताओं को देखने परखन के उद्देश्य से मैंने रिमोट के जरिए नेविगेशन प्रारंभ किया तो पाया कि नेविगेशन बहुत ही धीमा और डिलेड रेस्पांस युक्त है. बटन दबाने के कोई 5-10 सेकण्ड बाद स्क्रीन पर बदलाव दिखता है. जब तक आप बटन दबाते हैं, और सोचते हैं कि शायद बटन सही ढंग से नहीं दबा होगा और दूसरा बटन दबा देते हैं. जिससे मामला और गड़बड़ा जाता है. मेन्यू का नेविगेशन भी बेहद खराब किस्म का है और अड़चनें पैदा करता है. आपको शुरू में मेन्यू में जाने और देखने के लिए सीखने में भी अच्छा खासा समय लगता है.

मैंने एएक्सएन टीवी पर सो यू थिंक यू कैन डांस लगाया. दस मिनट बाद, जब एक बढ़िया डांस सीक्वैंस चल रहा था स्क्रीन अचानक फ्रीज हो गया. मैंने सोचा एकाध मिनट में यह ठीक हो जाएगा, मगर नहीं हुआ. मैंने रिमोट के दो चार बटन दबाए, स्टैंडबाई का बटन दबाया, मगर कुछ नहीं हुआ. तुषार ने काल सेंटर का नंबर लिखवाया था, कि कोई समस्या आने पर वहाँ काल करें. मैंने काल सेंटर लगाने की कोशिश की, दो-तीन बार लगाने के बाद उनके स्वचालित वाइस इंटरेक्टिव रेस्पांस के बाद आगे किसी से बात ही नहीं हो पाई. थक हार कर वापस तुषार को नंबर लगाया जो इमर्जेंसी के लिए दिया गया था. उन्होंने कहा कि वो आधे घंटे से आते हैं, देखने के लिए. उनका आधा घंटा अड़तालीस घंटा बीतने के बाद भी नहीं आया है.

फिर मैंने जो तुषार से इंस्टालेशन के समय सीखा था, के मुताबकि सेट-टॉप बॉक्स को रीबूट कर उसे चालू करने की कोशिश की. मगर सेट-टॉप बॉक्स उस समय रीबूट नहीं हुआ. रीबूट करने के लिए सेट-टॉप बॉक्स में न तो कोई रीसेट बटन है और न ही कोई ऑन-ऑफ स्विच. इसके लिए आपको उसका पावर कार्ड साकेट में से निकालना होगा या पावर प्लग. हद है! तो, इस तरह से मेरा प्रोग्राम ‘सो यू थिंक यू कैन डांस’ अधूरा ही रह गया. शायद नेट में खराबी आ गई थी, और आईपीटीवी सेट-टॉप बॉक्स काम नहीं कर रहा था.

कोई तीन घंटे बाद सेट-टॉप बॉक्स को फिर से चालू किया, तो इस दफा चालू हो गया. जब भी सेट-टॉप बॉक्स बन्द किया जाता है तो उसे चालू होने में 2-3 मिनट लगते हैं. तो यदि आपको टीवी देखने का मूड हो रहा हो, या कोई प्रोग्राम 8 बजे से चालू होता हो तो आप कोई 2-3 मिनट पहले से इसे चालू कर लें, नहीं तो रह जाएंगे. चलते चलते यह बीच बीच में बन्द होता रहा. कभी इसे रीबूट करना पड़ा तो कभी स्टैण्डबाई से फिर से चालू करना पड़ा. कभी मेन्यू बदलते समय यह फ्रीज हो गया तो कभी चैनल बदलते समय. याने कि सेट-टॉप बॉक्स और फ्रीज का चोली दामन का साथ है ऐसा लगता है. कुल मिलाकर टीवी देखने का मजा किरकिरा.

मूवी ऑन डिमांड – चूंकि 1 महीने का मुफ़्त प्रयोग जारी है, अत: मूवी ऑन डिमांड में मुफ़्त उपलब्ध ऋतिक रोशन – अमीषा पटेल की फ़िल्म ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे’ लगाई गई. फ़िल्म बढ़िया चलने लगी. इस बीच पड़ोस से मित्र आ गए. हमने यहाँ उपलब्ध पॉज बटन का प्रयोग किया. फ़िल्म पॉज हो गई. बढ़िया. मित्र के साथ बातों में उलझ गए, समय हो गया पता ही नहीं चला. आधे घंटे बाद प्ले बटन दबाया तो स्क्रीन पर आया – आपने बहुत देर के लिए पॉज बटन दबाया हुआ था अतः मूवी रीसेट हो गई है, शुरू से प्ले करें. धत् तेरे की! शुरू से फिर से प्ले किया गया और फारवर्ड बटन से मूवी आगे खिसका कर वांछित जगह से फिर से देखा. मूवी की क्वालिटी और साउंड बढ़िया थे. कम से कम डीटीएच के फ़िल्म चैनलों – फ़िल्मी, जी सिनेमा, सेटमैक्स इत्यादि से बढ़िया. पता नहीं क्यों डीटीएच के हिन्दी फ़िल्म चैनलों में स्टीरियो फ़ोनिक साउंड से फ़िल्में क्यों नहीं दिखाई जातीं. जबकि एचबीओ जैसे अंग्रेज़ी चैनलों में बढ़िया बाकायदा स्टीरियो साउंड रहता है. यही हाल कार्टून नेटवर्क का है. अंग्रेज़ी भाषा में स्टीरियो प्रसारण होता है, जबकि डब की हुई हिन्दी में मोनो प्रसारण होता है. क्या हिन्दी के दर्शक बेवकूफ हैं, जिन्हें स्टीरियो की समझ नहीं या जरूरत नहीं? यही हाल हिन्दी संगीत चैनलों का है – चाहे एमटीवी हो या चैनल वी या नाइनएक्स – सभी बेसुरे मोनो प्रसारण पेलते रहते हैं.

आईपीटीवी की अन्य सेवाएँ –

मैंने और भी तमाम उपलब्ध सेवाओं को जांचने परखने की कोशिश की. करावके के लिए आपको शुल्क अदा करना होगा. किड जोन में कुछ अच्छे नर्सरी राइम हैं, परंतु उनके चित्रांकन बेहद ही खराब और एनीमेशन बेहद धटिया. यही हाल कहानी और कार्टून के भी हैं. गेम्स में भी बहुत विकल्प अभी नहीं हैं. आईपीटीवी में सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें गीत-संगीत ऑडियो के लिए कोई चैनल नहीं (साइट पर म्यूजिक ऑन डिमांड कमिंग सून दिया है) है, जो कुछ है वो वीडियो चैनल हैं जो मोनो साउंड में फ़िल्मों के प्रोमो गाने सुना सुना कर आपको हद दर्जे के बोर बना सकते हैं.

कुल मिलाकर -

– अगले अड़तालीस घंटे इसी तरह बीते. आप कोई बढ़िया प्रोग्राम देख रहे हैं, पता चला कि वो किसी क्लाइमेक्स के दृश्य में फ्रीज हो गया, फिर आधे घंटे तक सेट-टॉप बॉक्स के चालू होने की कोई संभावना नहीं. चाहे आप उसे रीबूट कर लें, रिमोट के तमाम बटनों को दबा डालें, कुछ नहीं होगा. एक बार तो साउंड में खरखराहट घुस आई जो हर चैनल में एक जैसी थी. आईपीटीवी की वीडियो क्वालिटी डीवीडी बताई जा रही है, मगर यह एयरटेल डीटीएच के मुकाबले पैची और कम गुणवत्ता की है, जिसमें फाइन डिटेल्स गुम हो जाते हैं. यही हाल साउंड का है. मेरे फ़िलिप्स सिस्टम में एयरटेल डीटीएच की साउंड क्वालिटी आईपीटीवी के मुकाबले लगभग हर चैनल में बीस ही रही.

तो, यदि आप आईपीटीवी को इसके गुणों, विशेषताओं और सुविधाओं के नाम पर लेना चाहते हैं, तो अभी यह समय नहीं हुआ है. तकनालाजी नवीन है और इसे मैच्योर होने में, शुरूआती झटकों को दूर होने में संभवतः अभी समय लगेगा. इसमें कोई संशय नहीं कि आईपीटीवी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है, क्योंकि जिस तरह की इंटरेक्टिविटी और क्वालिटी कंटेंट – नेट से जुड़े रहने के कारण – आईपीटीवी आपको मुहैया करवा सकता है, वो कोई अन्य प्रकल्प कदापि नहीं. मगर आज के लिए – आईपीटीवी, कम से कम मेरे लिए - कम्प्लीट नो – नो! और, इसीलिए, एक महीने की मुफ़्त सेवा के बावजूद, मैंने माई-वे आईपीटीवी का रिमोट कोने में फेंक कर एयरटेल डीटीएच का रिमोट हाथ में वापस ले लिया है.

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ओएलपीसी – ( एक लैपटॉप प्रति बच्चा ) विश्व भर के तमाम बच्चों को कम्प्यूटर सिखाने वाली महात्वाकांक्षी परियोजना के हिन्दीकरण पर कार्य कुछ समय से जारी था.  यह प्रोजेक्ट अब पूरा हो गया है – अर्थ यह कि ओएलपीसी अब पूरा हिन्दीमय हो चुका है. परियोजना कोऑर्डिनेटर सत्यकाम गोस्वामी के साथ हाल ही में सम्पन्न इस प्रोजेक्ट में अनुवाद कार्य ख़ाकसार ने किया है.

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