बुधवार, 6 जनवरी 2010

मां, मुझे भी आइंस्टाइन के जैसा दिमाग दिलवा दे...

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जब दिमाग बँट रहा था, तब आप कहाँ चले गए थे? कई मर्तबा आपको ये ताना सुनने में आया होगा. मगर अब गम खाने की कोई बात नहीं. आने वाले समय में आप अपने दिमाग को कृत्रिम रूप से डिजाइनर दिमाग का स्वरूप इस तरह से दे सकेंगे कि दस-दस आइंस्टाइनी दिमाग वाले भी आपके दिमाग के सामने पानी भरें.

मगर ठहरिए, क्या सचमुच आपको आइंस्टाइनी या लियोनार्दो दा विंची या चंद्रशेखरन जैसे दिमाग की चाहत है?

भई, यदि मुझे विकल्प चुनने कहा जाएगा, तो मैं इसके बजाय कुछ दूसरे, अच्छे दिमागों को तरजीह दूंगा.

मैं चाहूंगा कि मेरे पास कोड़ा की तरह दिमाग हो. चंद वर्षों में ही, हींग लगे न फ़िटकरी के तर्ज पर जादू की तरह आसमान से 4000 करोड़ रुपए कमाने वाला दिमाग. ऐसे दिमाग पर हर किसी को रश्क नहीं होगा? भले ही प्रकट में लोग नुक्ता चीनी करें, मगर मन में तो लड्डू फूटते रहते हैं कि काश उनके पास भी ऐसा शानदार दिमाग होता. लोग खुले आम स्वीकारने में भले ही हिचकें, मगर इस खबर को पढ़ने के बाद वे निश्चय ही मेरी तरह सपने संजोने लगे होंगे – जब ये तकनालॉजी हकीकत में बदलेगी तो इस तरह का डिजाइनर दिमाग लगवाने वालों में, यकीन मानिए, मैं पहला व्यक्ति होऊंगा.

मैं ओसामा की तरह का दिमाग भी पाना चाहूंगा. अक्खा अमरीका की सारी पलटनों को धता बताता हुआ ओसामा हर दूसरे चौथे दिन अमरीका को धमकी देता अपना वीडियो टेप भेज अल जजीरा को भेज देता है. है न वाकई दिमागी काम? ओसामा के दिमाग का लोहा तो अक्खा दुनिया मान रही है!

वैसे यदि विकल्प मिले तो मैं चेतन भगत की तरह 3 ईडियट्स जैसा दिमाग भी पाना चाहूंगा – ताकि मैं अनुबंध करने के बावजूद किस तरह से ऐन मौके पर विवाद खड़ा कर लाइम लाइट में आऊँ और अपने किताबों की बिक्री में अच्छा खासा इजाफ़ा कर सकूं.

कुछ और उर्वर दिमागों की सूची भी मेरे दिमाग में हैं. मसलन आसाराम और बाबा रामदेव जैसा दिमाग. बैठे ठाले प्रवचन और योगासनों के प्रचार प्रसार के जरिए कार्पोरेट जैसा साम्राज्य खड़ा करना क्या आम दिमाग वालों के बस की बात है भला? इसके लिए तो विशिष्ट दिमाग की जरूरत होती है.

आपके दिमाग में भी कुछ खयाल आ रहे होंगे. तो आप किस तरह का दिमाग पाना चाहेंगे? हम भी जानना चाहेंगे – हमें भी जानने की उत्सुकता है!

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समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया

12 blogger-facebook:

  1. हम तो तमाम घोटाले बाजों का दिमाग खरीद लेंगे. जब जिसकी जरूर लगा लिया, बाकि स्पेर में रखे रहेंगे. :)

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  2. काफी दिनों बाद आपका ब्लॉग पड़कर अच्चा लगा, मजेदार पोस्ट है

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  3. सवाल है कि एक दिमाग/मन संभल नहीं रहा। चंचल: हि मन: कृष्ण:! दूसरा ले कर क्या होगा? आप तो इसी को वश में करने का तरीका बतायें।

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  4. औप्शन इतने हैं कि दिमाग ही काम नहीं कर रहा है।

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  5. एक दिमाग मुझे चहिये पर अभी तय नही किया किसका

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  6. जो अभी है उसको भी १ प्रतिशत भी उपयोग नहीं किया है, बिल्कुल नए सा ही है। एक और लेकर क्या करूँगी?
    घुघूती बासूती

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  7. कोई ऐसा दिमाग हो तो बताएं जो सब से बढ़िया दिमाग का चुनाव कर सके:))

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  8. अपना तो ओरिजनल ही ठीक है पईरेटेड में वो बात कहां है |

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  9. डिज़ाईनर दिमाग?

    यकीन कीजिए, भारत में इसका कोई डिमाँड नहीं होगा।
    आप डिज़ाइनर चेहरे की बात कीजिए, डिज़ाइनर फ़िगर की बात कीजिए।
    फ़िर देखिए कितना लम्बा लाईन लग जाता है, इन्हें हासिल करने के लिए

    और नारायण दत्त तिवारी जी और बिल क्लिन्टन जैसे लोग शरीर के किस भाग में वृद्धि/सुधार चाहेंगे यह बताने के आवश्यकता नहीं।
    साधारण दिमाग वाले भी इसका सही अंदाज़ा लगा सकते हैं।

    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु

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  10. आदरणीय, रामदेव जी ने यदि करोडों का भी साम्राज्य बनाया है तो उसके पीछे जो त्याग है, उसे आप क्यों नहीं देखते. जिस समय धनाड्य युवा किसी नवयौवना की बाहों में झूलते हैं, बड़ी गाड़ियों और शानदार बंगलों में ऐश मनाते हैं, उस उम्र में तन पर मात्र एक कपड़ा लपेटे हुए व्यक्ति पर इस तरह का व्यंग्य मुझे उचित नहीं लगता. जिस व्यक्ति ने कंदराओं और किताबों में बंद योग को घर घर पहुंचा दिया हो, जिसने योग को आंदोलन के रूप में बदल दिया हो, उसके त्याग को न देखकर उसे कार्पोरेट महारथी के रुप में विश्लेषित करना मुझे समझ में नहीं आता. कम से कम वह व्यक्ति मौत के घाट उतारने के फतवे तो नहीं देता, कि उसने यह कह दिया लिहाजा उसके लिये फतवा, फलां को वोट दो क्योंकि वह मेरे मजहब के हित में है. आप कैसे हर धान ढाई पसेरी लगा सकते हैं.

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  11. 'भारतीय नागरिक' के मन में जो आदर्श है उसका पूरा सम्मान करते हुए भी मैं उनसे असहमत होना चाहूंगा. यह ठीक है कि बाबा रामदेव ने योग को जन-जन तक पहुंचाया, लेकिन उन्होंने जो भी त्याग किया, उसकी जो कीमत उन्होंने वसूली है क्या वह हद से ज़्यादा नहीं है, और क्या कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा त्याग न कर दे, वैध तरीकों से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर सकता है? मुझे तो यह उचित लगता है कि हम सही को सही और ग़लत को ग़लत कहें, एक सही के कारण दूसरे गलत को सही कहने की ग़लती न करें.

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  12. भारतीय नागरीकजी,
    एक सीईओ के रूप में रामदेवजी की सफलता के बखान तो मैं भी करता हूँ. संत के रूप में नहीं.

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