टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

January 2010

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जैसे ही मुझे पता चला कि मेरा नाम भी इस वर्ष दिए जाने वाले पद्म पुरस्कारों की सूची में है, मेरे पैरों तले धरती खिसक गई. दिल बैठ गया. वल्लाह! ये क्या हादसा होने जा रहा है मेरे साथ? क्या तुझे मैं ही मिला था इस दुनिया में मुझे इतना दुख दर्द देने को?

पद्म पुरस्कार मिलते ही मेरे आगे पद्मश्री या पद्मविभूषण जबर्दस्ती जुड़ जाता और फिर, नतीजतन मैं मुँह छिपाए फिरता. लोग मुझे भी ठग, झूठा, दीवालिया समझते. सेटिंगबाज किस्म के बॉलीवुड का कलाकार समझते या कोई अमरीकी दीवालिया व्यापारी या चुटकुलेबाज. मैं ऐसी स्थिति के लिए कतई तैयार नहीं था. किसी सूरत तैयार नहीं था.

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मैंने भगवान से विनती की, मंदिर में लाइचीदाने-नारियल चढ़ाए, मजार पर इबादतें की, गुरुद्वारे में अरदास किया और गिरजे में प्रार्थनाएँ की. मगर बहरे भगवान को तो सुनना ही नहीं था. एक ग़रीब मैं ही था जो न जाने किस जन्म की सजा भुगतने वाला था.

जब भगवान ने नहीं सुनी तो मैं डेस्पेरेट हो गया. अब जब पानी नाक से ऊपर जा रहा था तो जिंदा रहने के लिए कुछ जद्दोजहद तो करनी ही थी. मैंने अपने सम्पर्कों को टटोला. एक मंत्री तक जैसे तैसे बात पहुँचाई. चुनावों तक तो मंत्री हर किसी की पहुँच में स्वयं ही बने रहते हैं, पर चुनाव होते ही यकायक हर किसी, यहाँ तक कि स्वयं की भी पहुँच से दूर हो जाते हैं. मंत्री महोदय ने हाथ ऊंचे कर दिए. कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते. पद्म पुरस्कारों का मामला है. गृह विभाग का मामला है. उनकी अपनी सोच है. उनके अपने गुप्त तंत्र हैं जिससे वे ये तय करते हैं कि किसे पुरस्कार दिया जाना चाहिए और किसे नहीं. पता चला है कि आपको तो विशेष रूप से चुना गया है.

विशेष रूप से? हे! भगवान!!! क्या यही दिन दिखाने के लिए तूने मुझे यह जीवन दिया था? एक से बात की जिसकी पहुँच ऊपर तक थी, और जो भेंट-पूजा-पाठ ले-देकर सरकारी-गैर-सरकारी हर विभाग में हर किस्म की सेटिंग करवाने की ताक़त रखता था. उसने कहा कि मामला बड़ा संगीन है. इसे सेट करने में तो बहुत ऊर्जा लगेगी. मैंने कहा कि ऊर्जा की चिंता वो न करे. मैं अपने जीवन की तमाम कमाई इसमें लगा दूंगा. आखिर, इज्जत नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं?

मामला ले-देकर सुलट ही गया. पद्म पुरस्कारों की सूची से मेरा नाम हट गया. भले ही मैं दीवालिया हो गया, इस मामले को सेट करने में मेरे जीवन की सारी पूंजी लुट गई. मगर मैं खुश और प्रसन्न हूं. लोगों को मुँह तो दिखा सकता हूं. लोगों से ऊंची नाक रख कर बात तो कर सकता हूं. अपने नाम के आगे ‘पद्मश्री रहित’ तो गर्व से लगा सकता हूं.

आप मुझे बधाई नहीं देंगे?

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व्यंज़ल

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किया है कुछ कभी काम के लिए

या किया तो बस ईनाम के लिए

 

हमने चमका दिए शब्द और हर्फ

थोड़े से और बेहतर दाम के लिए

 

एक टुकड़ा धूप, नीम का पेड़ हो

यही बहुत है अपने राम के लिए

 

सोचते तो वैसे हम भी हैं बहुत

कुछ करने काम तमाम के लिए

 

वो दौर कुछ और रहा होगा रवि

अब तो जी रहे हैं हराम के लिए

यह रही त्वरित गाइड - (उबुन्टु के नवीनतम संस्करण के लिए)

1 –यदि आपके लिनक्स तंत्र  में केपीपीपी संस्थापित नहीं है तो कमांड दें (रूट यूजर के रूप में):
# apt-get install kppp
2 -अब केपीपीपी को चलाएं निम्न कमांड देकर:
# kppp
नीचे दिया गया विंडो खुलेगा. यदि आपका तंत्र अंग्रेजी में है तो अंग्रेजी में खुलेगा. जापानी में भी खुल सकता है यदि आप जापानी भाषा  में तंत्र  में काम करते हों तो,

अब केपीपी को थोड़ा कॉन्फ़िगर करना पड़ेगा. कॉन्फ़िगर पर क्लिक करें तथा खाता टैब पर क्लिक करें. नया में क्लिक करें फिर कनेक्शन नाम दें बीएसएनएल, नंबर भरें #777. ठीक OK पर क्लिक करें. अब मॉडम टैब पर क्लिक करें और नया पर क्लिक करेंइसे ईवीडीओ या अन्य कोई नाम दें फिर मॉडम उपकरण ड्रापडाउन मेन्यू में चुनें /dev/ttyUSB0. ठीक पर क्लिक करें और सेटिंग सहेजें. अब केपीपीपी मुख्य विंडो में जुड़ें (कनेक्ट) पर क्लिक करें. प्रयोक्ता नाम व पासवर्ड दें (डिफ़ॉल्ट सीडीएमए होता है यदि आपने बदला नहीं है तो) और बिंगो - आपका नेट कनेक्ट हो गया.
यह विधि उबुन्टु में तो बढ़िया काम करता ही है, बस केपीपीपी की संस्थापना अन्य लिनक्स तंत्र में भिन्न हो सकता है बाकी केपीपीपी को सेट करने की विधि सभी लिनक्स तंत्र में एक जैसी है.

हैप्पी ब्राउजिंग इन लिनक्स - बीएसएनएल ईवीडीओ के जरिए.

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वैसे भी, कहावत है कि किसी चलती चीज को न छेड़ें. तो, जब आपका कम्प्यूटर अच्छा भला चलता होता है, किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं आती होती है तो फिर आप अपग्रेड के चक्कर में आखिर पड़ते ही हैं क्यों भला?

कुछ समय पहले उन्मुक्त ने अपना लिनक्स का संस्करण अपग्रेड किया था और उनका हिन्दी लिखने का कुंजीपट स्किम उनके अच्छे खासे चलते लिनक्स तंत्र से गायब हो गया था. पिछले दिनों मेरे कम्प्यूटर पर बारंबार फ्लैश होते संदेश कि - नया संस्करण अपडेट के लिए बहुत समय से आ चुका है और आप बुद्धू अपग्रेड ही नहीं कर रहे हो – को देख देख कर जब बोर हो गया तो अंतत: मैंने भी हथियार डाल दिए.

और, नतीजा बड़ा हौलनाक रहा!

वैसे, कंपनियाँ अपने सॉफ़्टवेयरों के अपग्रेड संस्करण निकालती हैं – तो अपने प्रयोक्ताओं के भले के लिए. नया संस्करण ज्यादा सुविधा वाला, तेज, अतिरिक्त फ़ंक्शनलिटी और आसान इत्यादि इत्यादि युक्त होता है. होता करे, मगर हमारे जैसा गरीब उपयोक्ता क्या करे जब उसका अच्छा खासा चलता सिस्टम समस्या पैदा करने लगे?

ऊपर दिया स्क्रीनशॉट लिनक्स उबुनन्टु 9.10 पर चल रहे अनुप्रयोग लोकलाइज का है. जहाँ एडिटिंग विंडो है वहाँ देख रहे हैं कि पाठ ब्रेक हो रहा है. जबकि ट्रांसलेशन मेमोरी में वही पाठ बढ़िया दिखा रहा है. जबकि यही अनुप्रयोग उबुन्टु 8.X पर झकास, बिना परेशानी के अब तक चला आया है.

इसी तरह, नोकिया सीडीएमए का फोन भी नेट से कनेक्ट नहीं हो रहा, जबकि पहले तो बढ़िया हुआ करता था. अपग्रेड कर हमने तो अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार ली.

लगता है, डाउनग्रेड ही करना पड़ेगा.

सीख – यदि बेहद जरूरी न हो, तो किसी अच्छी भली काम करती चीज में छेड़खानी न करें, भले ही वह मुफ़्त का अपग्रेड ही क्यों न हो! खासकर, प्रोडक्टिविटी से जुड़े मशीनों में.

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कल से स्पीकर पर चारों ओर से देश भक्ति पूर्ण गाने बज रहे हैं. एक गाना बारंबार बज रहा है – जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया… सुन सुन कर कोफ़्त सी होने लगी. वास्तविकता तो कुछ और है. वास्तविकता कड़वी है मेरे दोस्त. बहुत कड़वी. कुछ इस तरह -

जहाँ डाल-डाल पर भ्रष्ट कोड़े करते हैं बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ असत्य, हिंसा और अधर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा

ये धरती वो जहाँ एसपीएस राठौर जैसे अधिकारियों का बोलबाला
जहाँ हर बालक एक बाल मजदूर है और हर राधा एक हाला
जहाँ देश के लुटेरे नेता सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा

अलबेलों की इस धरती के व्यवहार भी हैं अलबेले
कहीं रिश्वत की जगमग है कहीं हैं भाई-भतीजावाद के मेले
जहाँ लालफीताशाही और अकर्मण्यता का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा

जब कटुता पैदा करते मस्जिद और शिवाले
जहाँ हर नगर में कूड़ाकरकट गंदगी धूल फैला डाले
भ्रष्टाचार की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा

(राजेन्द्र किशन से क्षमायाचना सहित)

(चित्र – सौजन्य अनुज नरवाल रोहतकी)

धन्यवाद अंकुर. आपके द्वारा सुझाया वीडियो यहाँ एम्बेड कर दिया है :

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महाराष्ट्र में जैसे ही हल्ला मचा कि टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य होने जा रहा है, हर ओर हल्ला मच गया. मचना ही था. टैक्सी ड्राइवरों के रस्ते महाराष्ट्र में होटल के बेयरे से लेकर मैनेजर, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक यहाँ तक कि आईएएस अफसरों पर भी मराठी बोलना-लिखना-पढ़ना अनिवार्य होने की संभावना जो थी.

इधर खालिस भारतीय सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामरों में भी इस कंट्रोवर्सी में नई संभावनाएँ दिखाई देने लगीं. कुछ रातों रात प्रोग्राम और गॅजेट्स लेकर आ गए तो कुछेक ने कुछ प्रोग्रामों/गॅजेट्स में हैक कर अपना नया उत्पाद बना लिया. कुछ खालिस भारतीय इंटरप्रेन्योर किस्म के लोगों ने सरकार में सेंध मार दी और अपने-अपने उत्पादों के लिए रातों रात न सिर्फ टेंडर निकलवा लिए, बल्कि कार्टेल बना कर सर्वोच्च कीमत में सर्वाधिक न्यूनतम कीमत दिखाते ऑर्डर खैंच लिए.

बाजार में देखते ही देखते मराठी लैंग्वेज प्रोग्रामों, सॉफ़्टवेयर सॉल्यूशन्स की भरमार हो गई. आपके लिए पेश है कुछ विशिष्ट किस्म के मराठी भाषाई उत्पादों के बारे में बेहद जरूरी जानकारी. अपने आपको इन जानकारियों से अद्यतन रखिए और इस मराठी क्राइसिस से उबरिए…

* मराठी-पॉड – आई-पॉड किस्म का यह यंत्र आपके बहुत काम का है. यह एक किस्म का अत्याधुनिक स्वचालित टू-वे मराठी स्पीकिंग सिस्टम है. आप इसमें विश्व की किसी भी जुबान में बोलें, यह आउटपुट मराठी में ही देगा. विश्व में किसी को भी कहीं पर भी किसी भी भाषा में फोन लगाएँ, इसका स्वचालित तंत्र बोलते व सुनाते समय सबकुछ मराठी में बदल देगा. है ना पक्का मराठी, जो आपको भी पक्का मराठी जुबान वाला बना देगा! इसके टच स्क्रीन पर आप दुनिया के किसी भी भाषा में लिखें, इसका अंतर्निर्मित उन्नत लैंगुएज परिवर्तक आपके लिखे को मराठी में बदल देगा.

* मराठी-जीपीआरएस – यह विशेष दिशा-सूचक यंत्र है, जो खास मराठी के लिए डिजाइन किया गया है. भाषा इंटरफेस इत्यादि तो जाहिर है मराठी में है ही, यह भाषाई राजनीतिक पार्टी के मुख्यालयों व उनके ठाकरेज-चव्हाण्ज जैसे नेताओं के लोकेशन को सदा इंगित करते रहता है. आप जिधर भी जिस भी दिशा में जितनी दूर भी जाएँ, ये आपको महाराष्ट्र और महाराष्ट्र के इन खास ‘भाषाई’ नेताओं के लोकेशन से सदा अपडेट करते रहता है. इसके एडवांस वर्जन में यह सुविधा है कि यह आपको एडवांस में चेतावनी दे देता है कि आज किधर को मनसे के लोग गर्दी मचाने वाले हैं. ग्रेट मराठी गॅजेट यू डिजर्व फॉर!

* मराठी स्पीच सिंथेसाइजर – चलिए, मान लिया कि आप दादे परदादे के जमाने से महाराष्ट्र में रहते आए हैं, मगर इसका ये अर्थ तो नहीं कि आप पक्के मराठी हो गए हैं. आपके स्पीच और टोन में यदि मराठीपन नहीं टपका तो मनसे के लोग आपको टपका डालेंगे. यदि आप हाल ही में महाराष्ट्र आए हैं तो आपके लिए तो खैर ये बेहद जरूरी किस्म का गॅजेट है. इसे आप अपने दाँतों के बीच आसानी से फंसा सकते हैं और फिर भले ही आप अपनी मादरी जबान में लोगों की ऐसी तैसी करते फिरें, ये आपके मुखारविंद से खालिस, एकदम शुद्ध, टंच मराठी बोलों की झड़ी लगा देगा. और, इस तरह से आपको 100% सुरक्षित रखेगा.

* मराठी वोटिंग एनालाइजर एंड प्रेडिक्टर – भाषाई राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं, सरकारों के लिए अत्यंत जरूरी प्रोग्राम. यह प्रोग्राम स्वचालित डाटा एकत्र करने की क्षमता युक्त है और यह एनालाइज कर बताता है कि किस तरह के भाषाई शगूफ़े छोड़ कर कहाँ कहाँ से कितने वोट कबाड़े जा सकते हैं. यह यंत्र आउट आफ द ब्लू नए नए विचार लाने की कूवत रखता है. शक है कि इस यंत्र का प्रयोग कई खांटी मराठी भाषाई नेतागिरी करने वाले नेता गुपचुप तरीके से अर्से से कर रहे हैं. ए मस्ट फ़ॉर एवरी नेताज इन महाराष्ट्रा!

* आल लैंग्वेज टू मराठी कन्वर्शन प्रोग्राम – वैसे, अफवाह तो ये है कि इसे सरकार ने ही भारी भरकम अनुदान देकर इसे डिजाइन करवाया है. यह अत्याधुनिक कम्प्यूटर प्रोग्राम कम्प्यूटर की हर भाषा की हर किस्म की सामग्री को त्वरित और तत्क्षण ही मराठी में बदल देता है. महाराष्ट्र की सीमा में चलने वाले तमाम कम्पयूटरों में इस प्रोग्राम को प्रीलोड करवाना अनिवार्य है. यह मुफ़्त प्रोग्राम इंटरनेट से कनेक्टेड हर कंप्यूटर पर जो महाराष्ट्र की धरती की सीमा के भीतर होता है, उसमें स्वचालित इंस्टाल हो जाता है. यह प्रोग्राम इतना एडवांस्ड है कि यहाँ तक कि प्रोग्रामिंग की कॉम्प्लैक्स सी++ जैसी लाइब्रेरियों को भी यह बड़ी चतुराई से मराठी में बदल देता है.

ऐसे और भी दर्जनों प्रोग्राम और उपकरण हैं, और नित्य नए-नए आ रहे हैं. अपनी उंगलियों को क्रास कर रखे रहिए. हम जल्द ही ऐसे प्रोग्रामों, उपकरणों के बारे में आपको अपडेट करते हैं.

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(समाचार कतरन – साभार, इंडियन एक्सप्रेस)

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यह कहना है (फ़ेक आईपीएल प्लेयर - FIP) नक़ली इंडियन प्रीमियर लीग खिलाड़ी का. सीजन 3 की पूरी तैयारी है. क्या  FIP अपनी अगली ब्लॉग पारी के लिए तैयार हैं? क्या FIP गेमचेंजरों का नक़ाब फिर एक दफा आपके सामने उतारने के लिए प्रकट होंगे? अपने ब्लॉग के जरिए देखते ही देखते क्रिकेट जगत में सनसनी बनने वाले, और क्रिकेटियरों से भी ज्यादा प्रसिद्ध और लोकप्रिय होने वाले ‘फ़िप’ अपनी किताब गेमचेंजर्स लेकर फरवरी में प्रकट हो रहे हैं. देखना ये है कि उनकी किताब भी उनके ब्लॉग की तरह प्रसिद्धि के आसमान छूती है या नहीं!

यह सब और बहुत कुछ FIP के नेट पर पहले पहल दिए गए साक्षात्कार में पढ़ें – हिन्दी पत्रिका सामयिकी में यहाँ पर.

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माना कि वेब-नी-टेक (http://webneetech.com) कोई न्यूयॉर्क टाइम्स (जैसी बड़ी साइट) नहीं है, मगर मैं भी कौन सा बड़ा बिग ब्लॉगर हूं? जो भी हो, मेरा एक साक्षात्कार वहां पर छपा है. यदि आपको लगता है कि वहाँ बेकाम की कुछ बकवास पढ़ने को मिल सकती है तो सीधे वहाँ जाने के लिए यहाँ चटका लगाएँ.

 

फ़िफ़्टीन सेकण्ड्स ऑफ फेम की कुछ पूर्व प्रविष्टियाँ -  छोटे शहरों की बड़ी चिट्ठाकारी , फ़िफ्टीन सेकण्ड्स ऑफ़ फ़ेम रिटर्न्स, फ़िफ़्टीन सेकण्ड्स ऑफ़ फ़ेम रीवाइन्डेड, फ़ाइव सेकण्ड्स ऑफ़ फ़ेम रील्लोडेड

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जब दिमाग बँट रहा था, तब आप कहाँ चले गए थे? कई मर्तबा आपको ये ताना सुनने में आया होगा. मगर अब गम खाने की कोई बात नहीं. आने वाले समय में आप अपने दिमाग को कृत्रिम रूप से डिजाइनर दिमाग का स्वरूप इस तरह से दे सकेंगे कि दस-दस आइंस्टाइनी दिमाग वाले भी आपके दिमाग के सामने पानी भरें.

मगर ठहरिए, क्या सचमुच आपको आइंस्टाइनी या लियोनार्दो दा विंची या चंद्रशेखरन जैसे दिमाग की चाहत है?

भई, यदि मुझे विकल्प चुनने कहा जाएगा, तो मैं इसके बजाय कुछ दूसरे, अच्छे दिमागों को तरजीह दूंगा.

मैं चाहूंगा कि मेरे पास कोड़ा की तरह दिमाग हो. चंद वर्षों में ही, हींग लगे न फ़िटकरी के तर्ज पर जादू की तरह आसमान से 4000 करोड़ रुपए कमाने वाला दिमाग. ऐसे दिमाग पर हर किसी को रश्क नहीं होगा? भले ही प्रकट में लोग नुक्ता चीनी करें, मगर मन में तो लड्डू फूटते रहते हैं कि काश उनके पास भी ऐसा शानदार दिमाग होता. लोग खुले आम स्वीकारने में भले ही हिचकें, मगर इस खबर को पढ़ने के बाद वे निश्चय ही मेरी तरह सपने संजोने लगे होंगे – जब ये तकनालॉजी हकीकत में बदलेगी तो इस तरह का डिजाइनर दिमाग लगवाने वालों में, यकीन मानिए, मैं पहला व्यक्ति होऊंगा.

मैं ओसामा की तरह का दिमाग भी पाना चाहूंगा. अक्खा अमरीका की सारी पलटनों को धता बताता हुआ ओसामा हर दूसरे चौथे दिन अमरीका को धमकी देता अपना वीडियो टेप भेज अल जजीरा को भेज देता है. है न वाकई दिमागी काम? ओसामा के दिमाग का लोहा तो अक्खा दुनिया मान रही है!

वैसे यदि विकल्प मिले तो मैं चेतन भगत की तरह 3 ईडियट्स जैसा दिमाग भी पाना चाहूंगा – ताकि मैं अनुबंध करने के बावजूद किस तरह से ऐन मौके पर विवाद खड़ा कर लाइम लाइट में आऊँ और अपने किताबों की बिक्री में अच्छा खासा इजाफ़ा कर सकूं.

कुछ और उर्वर दिमागों की सूची भी मेरे दिमाग में हैं. मसलन आसाराम और बाबा रामदेव जैसा दिमाग. बैठे ठाले प्रवचन और योगासनों के प्रचार प्रसार के जरिए कार्पोरेट जैसा साम्राज्य खड़ा करना क्या आम दिमाग वालों के बस की बात है भला? इसके लिए तो विशिष्ट दिमाग की जरूरत होती है.

आपके दिमाग में भी कुछ खयाल आ रहे होंगे. तो आप किस तरह का दिमाग पाना चाहेंगे? हम भी जानना चाहेंगे – हमें भी जानने की उत्सुकता है!

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समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया

मियाँ मनमोहन, अब जरा ये भी तो बता दें कि आख़िर आप किसके चंगुल में हैं?

changul

 

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व्यंज़ल

 

क्या फ़र्क कौन किसके चंगुल में है

जनता सदा से नेता के चंगुल में है

 

भविष्य  स्वर्णिम है यकीनन हमारा

क़ानून बाहुबलियों के चंगुल में है

 

अपनी मांद में ख़ैर मना लिए बहुत

अंतत: राठौर रूचिका के चंगुल में है

 

मेरे वतन का हो गया है अजब हाल

मंत्री अब नौकरशाहों के चंगुल में है

 

वक़्त ने पलटा है आज अपना पाँसा

वही वक़्त आज रवि के चंगुल में है

नए साल में हम-आप एक से बढ़िया एक संकल्प लेते हैं. पर, क्या करें, इन संकल्पों की राह में इतने ही या इससे भी बढ़िया रोड़े चहुँ-ओर से चले आते हैं और नतीजा वही होता है – ढाक के तीन पात! आपकी पूरी कोशिश होती है, आप जी जान से कोशिश करते हैं कि आप अपने नए साल के नए संकल्प को भरसक पूरा करें, मगर जालिम दुनिया आपके संकल्प को तोड़ने के लिए हर किस्म की साजिश करती नजर आती है. और, इसी वजह से, आमतौर पर प्राय: हम सभी के संकल्प, अगर आनन फानन नहीं, तो कुछ दिनों में, टूट ही जाते हैं.

इस साल आपने एक बढ़िया संकल्प लिया. आपका संकल्प है कि आप आज से अपने कार्य स्थल पर, अपने ऑफ़िस या दुकान पैदल जाएंगे. आखिर दूरी महज चार-छः किलोमीटर की ही तो है. इस बहाने थोड़ी वर्जिश हो जाएगी और दुनिया में कार्बन फुटप्रिंट को थोड़ा सा कम करने में आपका भी महती योगदान रहेगा. वैसे भी पिछला पूरा माह कोपेनहेगेन-कोपेनहेगेन मय हो गया था.

जैसे ही आप घर से निकलते हैं, आपके घर के नुक्कड़ का पनवाड़ी आपको टोकता है – क्या साहब जी, आज गाड़ी खराब हो गई है क्या? वो जेनुइन प्रश्न पूछता है, मगर आप झुंझला कर उसे बताते हैं कि नहीं भाई, दुनिया का तापमान बढ़ रहा है इसी वजह से मैंने इस साल ये संकल्प लिया है कि मैं काम पर पैदल जाऊंगा. गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करूंगा. पनवाड़ी असमंजस में होता है उसके पल्ले ये नहीं पड़ता है कि दुनिया का तापमान कम हो रहा है, तो अभी अपने यहाँ सर्दी के मारे बुरा हाल क्यों हो रहा है...

आप थोड़ा आगे निकलते हैं तो यूसुफ़ मियाँ पीछे से अपने चमचमाते, लेटेस्ट मॉडल के वाहन पर सवारी करते आते हैं और प्रश्न दागते हैं – क्या मियाँ, गाड़ी पंचर हो गई क्या? चलिए हम आपको लिफ़्ट दिए देते हैं. आप उन्हें निवेदन पूर्वक मना करते हैं कि भई, आज, नए साल से मैं काम पर पैदल जाया करूंगा. यूसूफ़ मियाँ यह कहते ठहाके लगाते चले जाते हैं – अरे मियाँ, इतनी बचत मत करो, कमा रहे हो तो कुछ खर्च भी करो.

जैसे तैसे आप अपनी यात्रा की आधी दूरी तय करते हैं तो मेन रोड चला आता है. वाहनों की रेलम पेल. हाईवे को जेब्रा क्रासिंग पर से भी पार करना टेढ़ी खीर. आप दिल कड़ा कर आगे बढ़ते हैं तो टैम्पो की चपेट में आते आते बचते हैं. एक हायाबूसा चालक आपको अपने वाहन और अपने चालन दोनों की क्षमता जबर्दस्ती बताने के लिहाज से आपको कट मारकर जाता है और आप गिरते गिरते बचते हैं. आपका मन एक बारगी कहता है कि भाड़ में जाए नये साल का नया संकल्प. आप एक खाली ऑटो के लिए हाथ उठाते उठाते रह ही जाते हैं.

ले देकर आप अपने रास्ते का तीन चौथाई हिस्सा पार कर ही लेते हैं. आप सोचते हैं कि आपने कितना महान काम किया है. जब धरती को बचाने का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें आपका नाम भी स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा – आपने भी आखिर अपना वाहन तजकर काम पर पैदल जाकर धरती को बचाने की मुहिम में बड़ा योगदान दिया जो है. इसी ख़ामख़याली में आपका पाँव सड़क के गड्ढे पर पड़ जाता है और आपके पाँव में मोच आ जाती है. आप गिर पड़ते हैं और आपसे चला नहीं जाता. अब तो आपके पास कोई रास्ता नहीं बचता. अंतत: आपका संकल्प टूट ही जाता है और आप वाहन की शरण में आ ही जाते हैं.

ये तो सिर्फ एक संकल्प की बात हुई. आप कोई सा भी, कैसा भी संकल्प लेकर देख लें. संकल्प कोई भी हो, विश्व की तमाम शक्तियाँ आपके संकल्पों को तोड़ने के लिए जी जान से साजिशें करेंगी, राह में तमाम रोड़ें अटकाएंगी और आपका संकल्प अंतत: टूट ही जाएगा.

नेट पर और अन्यत्र बहुत सी सामग्री पुराने हिन्दी फ़ॉन्टों (जैसे कि कृतिदेव तथा चाणक्य में) में पीडीएफ़ के रूप में उपलब्ध है. इसे यूनिकोड फ़ॉन्ट के दस्तावेज में बदलना अच्छा खासा सिरदर्द होता है, जब तक कि आपके पास कुछ ठीक-ठाक औजार न हों.

 

पर अब आप नेट पर उपलब्ध मुफ़्त के जुगाड़ों से यह काम आसानी से कर सकते हैं. ध्यान रहे, पीडीएफ़ दस्तावेज स्कैन किया दस्तावेज न हो, बल्कि डिजिटल फ़ॉर्मेट से तैयार (जैसे कि कृतिदेव फ़ॉन्ट से तैयार वर्ड दस्तावेज से बनाया गया पीडीएफ़) हो, तभी यह जुगाड़ काम करेगा. इसके लिए, ये हैं आपके लिए कुछ आसान से चरण -

 

( 1 ) सबसे पहले अपने पीडीएफ़ फ़ाइल को अपने जीमेल खाते में अपने ही नाम से भेजें.

( 2 ) जीमेल खाते में संलग्नक रूप में दिखाई दे रहे पीडीएफ़ फ़ाइल के नीचे दिए गए लिंक देखें पर क्लिक करें.

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( 3 ) गूगल डॉक्स में एक नया पेज खुलेगा जहाँ पर बाएँ ऊपरी कोने पर उपलब्ध सामान्य एचटीएमएल कड़ी पर क्लिक करें.

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( 4 ) कुछ ही समय में उसी पेज पर हिन्दी सामग्री का रॉ डाटा (यानी कृतिदेव या चाणक्य फ़ॉन्ट इत्यादि में,) आपके सामने उपलब्ध होगा. इसे कॉपी पेस्ट कर कहीं सहेज लें, या इस पेज को सेव एज का विकल्प कर एचटीएमएल पेज के रूप में सहेज लें. फिर तकनीकी हिन्दी खण्ड में उपलब्ध कन्वर्टर फ़ाइलों की मदद से सामग्री को यूनिकोड में परिवर्तित कर लें. इस विधि से कृतिदेव फ़ॉन्ट की सामग्री लगभग 95 प्रतिशत शुद्धता से यूनिकोड में परिवर्तित की जा सकती है.

 

है न अत्यंत आसान,  वह भी बाहरी औजारों को इंस्टाल किए बगैर?

हैप्पी कन्वर्टिंग!!  हैप्पी न्यू ईयर!!!

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