व्यंग्यविविध | तकनीकीहिन्दीछींटें और बौछारें


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बुधवार, 25 नवम्बर 2009

विंडोज 7 में हिन्दी में काम कैसे करें?

ठीक है, हर तरफ विंडोज 7 की चर्चा है, यह विक्रय के नए कीर्तिमान चहुँओर स्थापित कर रहा है, और आपके नए नवेले कम्प्यूटर पर भी विंडोज 7 आया हुआ है. सवाल ये है कि इसमें हिन्दी में काम कैसे करें?





विंडोज 7 में हिन्दी कुंजीपट कैसे इनेबल करें?

यह बेहद आसान है. विंडोज एक्सपी की तरह आपको हिन्दी कुंजीपट इंस्टाल करने के लिए अलग से इसके इंस्टालेशन सीडी इत्यादि की आवश्यकता नहीं होगी. विंडोज 7 में हिन्दी का अंतर्निर्मित समर्थन है. हिन्दी कुंजीपट इसमें पहले से ही इंस्टाल रहता है. इसे लागू करने के लिए आपको निम्न चरण अपनाने होंगे –

प्रोग्राम मेन्यू > कंट्रोल पैनल > में क्लिक करें, फिर नए विंडो में एडजस्ट योर कम्प्यूटर सेटिंग विंडो पर क्लिक करें. वहाँ पर क्लॉक, लैंगुएज, रीजन पर क्लिक करें तथा रीजन एंड लैंगुएज पर क्लिक करें. यहाँ आपको बहुत से विकल्प मिलेंगे. यहाँ पर चेंज कीबोर्ड आर अदर इनपुट मैथड को चुनें. एक नया विंडो खुलेगा जहाँ चेंज कीबोर्ड बटन पर क्लिक करें.







अब टैक्स्ट सर्विस एंड इनपुट लैंगुएजेस विंडो पर एड बटन पर क्लिक करें. आपके सामने एक नया विंडो प्रकट होगा – एड इनपुट लैंगुएज’ जिसमें सैकड़ो भाषाओं के कुंजीपट दिखेंगे.

यहाँ पर स्क्रॉल करते हुए नीचे जाएँ और हिन्दी इंडिया पर जाएँ और वहां + चिह्न पर क्लिक करें. वहाँ आपको बहुत से उपलब्ध विकल्प दिखेंगे. हिन्दी का दो ही विकल्प दिखेगा – इनस्क्रिप्ट तथा हिन्दी ट्रेडिशनल. दोनों ही इनस्क्रिप्ट कुंजीपट के रूप हैं. यदि आप इनस्क्रिप्ट प्रयोग करते हैं तब तो ठीक है, अन्यथा आपको कुछ दूसरा उपाय अपनाना होगा.


बहुत से लोग हिन्दी (अन्य भारतीय भाषाओं जैसे कि गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, मराठी, मलयालम, कन्नड इत्यादि भी) टाइप करने के लिए फ़ोनेटिक कुंजीपट का प्रयोग करते हैं. जैसे कि कमल टाइप करने के लिए वे अंग्रेज़ी में kamal या kml टाइप करते हैं. तो इस तरह का कुंजीपट आप विंडोज 7 में आसानी से लगा सकते हैं. आप भाषाइंडिया माइक्रोसॉफ़्ट इंडिक आईएमई 1/2 को इसमें आसानी से संस्थापित कर सकते हैं जिसमें 7 तरह के कुंजीपट – रेमिंगटन (कृतिदेव), फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट, वेबदुनिया इत्यादि से यूनिकोड हिन्दी में टाइप कर सकते हैं. इसी तरह आप बारहा (बरह) को भी संस्थापित कर उसका बढ़िया प्रयोग कर सकते हैं. कुछ अच्छे ऑनलाइन कुंजीपटों – मसलन गूगल, क्विलपैड यूनिनागरी इत्यादि का प्रयोग भी विंडोज 7 में आसानी से किया जा सकता है.

विंडोज 7 में नया हिन्दी फ़ॉन्ट (जैसे कि कृतिदेव) कैसे संस्थापित करें तथा इसमें एक से अधिक यूनिकोड हिन्दी में काम कैसे करें?



विंडोज 7 में यूनिकोड हिन्दी के बहुत से फ़ॉन्ट अंतर्निर्मित उपलब्ध हैं. एक्सपी व विस्ता में तो सिर्फ मंगल फ़ॉन्ट ही उपलब्ध था. विंडोज 7 में मंगल के अलावा कोकिला, उत्साह, अपराजिता इत्यादि फ़ॉन्ट भी सम्मिलित किए गए हैं. आप चाहें तो यहाँ से अन्य हिन्दी यूनिकोड फ़ॉन्ट भी डाउनलोड कर उनका प्रयोग अपने दस्तावेजों को सजाने संवारने के लिए कर सकते हैं.


अब सवाल ये है कि विंडोज 7 में हिन्दी (या कोई भी अन्य) के फ़ॉन्टों को कैसे इंस्टाल करें? विंडोज 7 में यह बेहद आसान है. बस आप किसी भी फ़ॉन्ट फ़ाइल पर दायाँ क्लिक करें और उपलब्ध संदर्भित मेन्यू में से इंस्टाल का विकल्प चुन लें. आपका नया फ़ॉन्ट त्वरित ही आपके अनुप्रयोगों में काम हेतु उपलब्ध हो जाएगा.

विंडोज 7 में एक हिन्दी फ़ॉन्ट की सामग्री दूसरे फ़ॉन्ट में कैसे बदलें?
रूपांतर, परिवर्तन इत्यादि अनुप्रयोग विंडोज 7 में बढ़िया चलते हैं. इसी तरह, तकनीकी हिन्दी खंड के ब्राउजर आधारित समस्त फ़ॉन्ट परिवर्तक भी बढ़िया काम करते हैं. डांगीसॉफ़्ट का फ़ॉन्ट परिवर्तक चलने में धीमा है, मगर यह शत प्रतिशत शुद्धता से फ़ॉन्टों को परिवर्तित करता है.



विंडोज 7 की भाषा – मेन्यू, मदद इत्यादि (यूआई – यूजर इंटरफेस) हिन्दी में कैसे करें?
इसके लिए आपको इसका हिन्दी भाषा का पैक इंस्टाल करना होगा. इसे यहाँ से डाउनलोड करें और संस्थापित करें. तत्पश्चात् प्रोग्राम मेन्यू > कंट्रोल पैनल > में क्लिक करें, फिर नए विंडो में एडजस्ट योर कम्प्यूटर सेटिंग विंडो पर क्लिक करें. वहाँ पर क्लॉक, लैंगुएज, रीजन पर क्लिक करें तथा रीजन एंड लैंगुएज पर क्लिक करें. वहाँ इंस्टाल आर अनइंस्टाल डिस्प्ले लैंगुएज चुनें. ब्राउज कम्प्यूटर चुनें और डाउनलोड की गई फ़ाइल को चुन लें. यदि आप नेट से कनेक्टेड हैं तो हिन्दी भाषा का पैक पहले से इंस्टाल करने की जरूरत भी नहीं है. यह विकल्प – आपको यहीं लांच विंडोज अपडेट के रूप में मिलेगा. उपलब्ध भाषा – हिन्दी चुनें और संस्थापित करें.


विंडोज 7 में हिन्दी अनुप्रयोग कहाँ से लाएँ और कैसे चलाएँ?
अब सवाल ये है कि आपने विंडोज 7 में हिन्दी कुंजीपट डाल लिया, इसकी भाषा हिन्दी कर दी. अब दूसरे हिन्दी के अनुप्रयोग कहाँ से लाएँ? तो आप केडीई हिन्दी 4.x के सैकड़ों अनुप्रयोगों को आप हिन्दी समेत अन्य दूसरे भारतीय भाषाओं में विंडोज 7 में आसानी से चला सकते हैं. कैसे? अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें.

मंगलवार, 24 नवम्बर 2009

मैं गरीब हूँ, बहुत गरीब

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अब तक तो घरों के सामने नाम-पट्ट टंगता था, घरों के नाम या उसका अता-पता – गली, मोहल्ले, मकान का नंबर इत्यादि टंगता था. अब आदमी की अमीरी-गरीबी टंगा करेगी.

यदि आप गरीब हैं, तो अब आपको अपने घर पर लिख कर ये टाँगना पड़ेगा – ‘मैं गरीब हूं’.

अभी तो ‘मैं गरीब हूं’ टंग रहा है. कल को मैं महा-गरीब हूँ, मैं महा-महा गरीब हूं, मैं बिलकुल फटीचर हूँ इत्यादि टंगने के फरमान आएंगे. आखिर सरकार गरीबों को कैसे पहचान पाएगी कि वो गरीब है जब तक कि उसके घर में ये टंगा, लिखा न मिले कि वो गरीब है. बहुत पहले खबर आई थी कि किसी जनप्रतिनिधि के पास बीपीएल कार्ड था. बीपीएल यानी बिलो पावर्टी लाइन. यानी गरीब से भी नीचे. इसके लिए कोई खालिस शब्द भी नहीं है. अपना शब्द भंडार भी इस मामले में कंगाल है. ऐसे लोगों के घरों पर क्या लिखा जाएगा? फिर, जल्द ही इसके उलट, ‘मैं अमीर हूं’, या ‘मैं महा अमीर हूं’, या फिर ‘मैं भारत का या दुनिया का सबसे अमीर हूं’ यह भी टंगने लगेगा. वैसे, अप्रत्यक्ष रूप से तो यह टंगने भी लगा है.

और, गरीबी की परिभाषा, उसका लेवल क्या है? मैं अपनी बात करूं तो मैं अंबानीज़, टाटाज़ के सामने तो महागरीब, महा फटीचर हूं. तो क्या मैं अपने घर के सामने ये लिख मारूं कि मैं तो फलां फलां व्यक्ति की तुलना में तो महा-महा गरीब हूं. या फिर गरीब वो है जिसे दो जून की रोटी मयस्सर नहीं है? तो क्या वो अपने मकान के सामने लिख कर बैठा रहेगा कि भई, मैं तो भूखे मर रहा हूं?

मप्र सरकार गरीबों के घरों के सामने यह लिखवा कर टंगवा रही है – “मैं गरीब हूं.” यह तो वैसी ही बात हुई जैसे कि किसी फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के हाथों पर “मैं चोर हूँ” गुदवा दिया गया था.

गरीब होना कोई अपराध है? क्या गरीबी ऐसी समस्या है जिससे कभी छुटकारा नहीं पाया जा सकता? क्या गरीब को अपनी गरीबी क्या इस तरह सरेआम घोषित करते रहनी पड़ेगी? उसे सरेआम गरीबी का तमगा लगाकर घूमते रहना पड़ेगा?

हमारी वैचारिक गरीबी की पराकाष्ठा नहीं है ये? मैं सचमुच अपने आपको बहुत, बहुत गरीब महसूस करने लगा हूं.

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व्यंज़ल

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पूछते हो कि क्यों मैं गरीब हूँ

तेरे राज में जानम मैं गरीब हूँ

 

दर्द का अहसास है न भूख का

सबब बस ये है कि मैं गरीब हूँ

 

मेरी तो समस्या है बड़ी अजीब

सोने के ढेर पे बैठा मैं गरीब हूँ

 

अमीरों के इस भीषण शहर में

मुझे तो फख्र है कि मैं गरीब हूँ

 

टाँग दी गई तख्ती रवि पर भी

सबने मान लिया है मैं गरीब हूँ

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सोमवार, 23 नवम्बर 2009

ब्लॉगर्स पार्क में आपका स्वागत है...

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लोग-बाग़ भले ही ट्विटर और फेसबुक के कसीदे पढ़ लें, मगर, ब्लॉगिंग इज़ स्टिल इन थिंग. और, अब जब हर संभव विषय पर हर लेवल का कैपेबल व्यक्ति अपने-अपने ब्लॉग पर हर किस्म का मसाला परोसने लग गया है तो उसमें से छांट-बीन कर कुछ माल-मसाला लेकर प्रिंट मीडिया की एक बढ़िया कलेवर वाली पत्रिका निकाल लें तो?

ब्लॉगर्स पार्क पत्रिका में यही किया गया है. ब्लॉगर्स पार्क के दूसरे अंक की मानार्थ प्रति मुझे अभी हाल ही में मिली और इसके पन्ने पलटते हुए अजीब खुशनुमा अहसास हो रहा है कि चलिए, सिर्फ और सिर्फ ब्लॉगों में पूर्व प्रकाशित सामग्री से – पोस्ट व पोस्ट की टिप्पणियों समेत, एक संपूर्ण पत्रिका भारत में, वह भी भोपाल से, बाजार में बिक्री के लिए नियमित प्रकाशित होने लगी है. ब्लॉगर्स पार्क की दूसरी ख़ूबी यह है कि यह द्विभाषी है – पत्रिका अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों में ही है – यानी इसमें अंग्रेज़ी व हिन्दी ब्लॉगों की सामग्री प्रकाशित की गई है. अलबत्ता इसकी सारी सामग्री स्क्रेचमाईसॉल.कॉम के ब्लॉगों से ली गई है.

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जाहिर है, ब्लॉगर्स पार्क को स्क्रेचमाईसॉल.कॉम समूह द्वारा जारी किया गया है जो कि प्रयोक्ताओं को नेट पर वर्डप्रेस जैसी मुफ़्त ब्लॉगिंग सुविधा उपलब्ध करवाते हैं. हालांकि बहुत मामलों में स्क्रेचमाईसॉल.कॉम की सुविधाएँ उतनी उन्नत नहीं हैं, मगर कुछ विशिष्ट किस्म की सुविधाएँ इसमें अंतर्निर्मित हैं – जैसे कि कुछ ज्वलंत व करंट अफेयर्स संबंधी विषयों जैसे कि वातावरण प्रदूषण, भ्रष्टाचार, अपराध इत्यादि पर सीधे ही लिखने लग सकते हैं. स्क्रेचमाईसॉल.कॉम ब्लॉगिंग-प्लेटफ़ॉर्म – ब्लॉग तथा एग्रीगेटर का मिलाजुला रूप प्रतीत होता है.

25 रूपए मूल्य की, 80 पृष्ठों की बढ़िया काग़ज़ में बढ़िया छपी पत्रिका - ब्लॉगर्स पार्क कौतूहल तो पैदा करती है, मगर सामग्री के लिहाज से यह निराश करती है. फिर अभी तो इसका दूसरा अंक ही निकला है. ब्लॉगों जैसी विविधता और मनोरंजकता इसमें लाई जाए तो इसके सफल होने में देर नहीं लगेगी.

ब्लॉगर्स पार्क के प्रवेशांक को (पीडीएफ़ फ़ाइल) आप यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.

शनिवार, 14 नवम्बर 2009

बता, तेरा धर्म क्या है बे?

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जनता जब ज्यादा ही चिल्लाने लगी कि मेरा धर्म तेरे धर्म से ज्यादा सफेद तो बात चाँद पर भी पहुँच गई और आखिर इंस्पेक्टर मातादीन* से रहा नहीं गया तो धरती पर आकर निकल पड़ा जेबी झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का नार्को टैस्ट में काम आने वाला सीरम-इंजैक्शन लेकर. अब तो जनता से उसका सही धर्म उगलवाना ही पड़ेगा.

वो अभी निकला ही था कि सामने ट्रैफ़िक जाम मिला. पता चला कि किसी वीवीआईपी नेता के काफ़िले के लिए ट्रैफ़िक रोका गया है. अब वो तो सुपर कॉप इंस्पेक्टर मातादीन था. उसने अपना डंडा अड़ाया और वीवीआईपी नेता को रोका. उससे बोला – महामहिम, मेरे कन्ने ये झूठ पकड़ने की मशीन भी है और ये नार्को टेस्ट वाला इंजेक्शन. इधर धर्म के नाम पर दुनिया में बड़ा बावेला मच रहा है, दंगे-फ़साद हो रहे हैं, कर्मकाण्ड-जेहाद हो रहे हैं. तो, मेहरबानी होगी, अब आप सच-सच बता दें कि आपका धर्म क्या है?

वीवीआईपी नेता पसीने पसीने हो गया. उसकी जुबान से अबतक, जब से वो नेता बना था कभी सच तो निकला ही नहीं था. पर उसे पता था कि जुबान से सच तो निकलना ही है – चाहे झूठ पकड़ने की मशीन से चाहे सच उगलवाने के इंजेक्शन से. तो वो सचमुच में सच बयान करने लगा –

“भई, मेरा धर्म तो नेतागिरी है. ऐन-कैन-प्रकारेण वोट कबाड़ने का धर्म. वोटर मेरा भगवान और इलैक्शन मेरा त्यौहार. चुनाव जीतने के लिए मुझे अपने घर में आग लगाना पड़े, यहाँ तक कि जेहाद के नाम पर अपनी खुद की दाईं आँख भी फोड़नी पड़े तो वो मैं करूंगा. इसे ही मेरा धर्म समझ लें.”

इंस्पेक्टर मातादीन कन्फ़्यूजिया गया. ये साला कौन सा नया धर्म आ गया. पर मशीन इसे सच बता रही थी. वो हिचकिचाते हुए आगे बढ़ा. सामने पीली बत्ती वाली कार में सिविल सेवा का एक आला अफ़सर चौराहे के लालबत्ती की परवाह किए बगैर चला आ रहा था. सुपर कॉप इंस्पेक्टर मातादीन ने डंडा चमकाया तो अफ़सर भुनभुनाता हुआ आया. अफ़सर के मन में भाव थे – बाद में देख लूंगा तुझे बेटा! ऐसी जगह फ़िंकवाऊंगा कि बस तनख्वाह में गुजारा करता फिरेगा!

इंस्पेक्टर मातादीन ने अफ़सर को आदतन सैल्यूट दागा और फिर बोला – श्रीमान् मेरे पास झूठ पकड़ने की मशीन है और सच उगलवाने का इंजेक्शन. मैं जनता का असली धर्म पता करने निकला हूं. आप भी जनता का हिस्सा हैं, भले ही आप अपने आप को उससे कुछ ऊपर की चीज मानते हों. तो श्रीमान्, जरा बताने का कष्ट करेंगे कि आपका धर्म क्या है?

अफ़सर चकराया. आजतक किसी ने उससे प्रश्न पूछने की जुर्रत नहीं की थी. एक जमाने से वही लोगों से तमाम फ़ालतू के सर्कुलरों के जरिए बेकार के प्रश्न पूछता रहा था. मगर उसे झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का इंजेक्शन दिख रहा था. वो चालू हो गया –

“भई, मेरा धर्म तो पैसा कमाना है. भ्रष्टाचार के जरिए रेत में से तेल निकालना. हम सिविल सेवा में आए ही इसलिए हैं. हमें तो ट्रेनिंग के दौरान ही सिखा दिया गया था कि रेत में से तेल कैसे निकालते हैं. सरकारी योजनाओं से, जनता की जेब से पैसा निकालना और उसे सुरक्षित इन्वेस्ट करना ही हमारा धर्म है.”

इंसपेक्टर मातादीन का दिमाग भिन्नाया. ये और कौन सा नया धर्म आ गया है. कभी इसके बारे में नहीं सुना. वो अफ़सर को सेल्यूट लगाकर वापस मुड़ा तो सीधे एक बुद्धिजीवी से टकरा गया. बुद्धिजीवी ने इंस्पेक्टर मातादीन को पहचान लिया और उससे पूछा कि वो चाँद से कब लौटा. इंसपेक्टर मातादीन ने बुद्धिजीवी को हड़काया और बोला कि अपने काम से काम रखे और ये बताए कि उसका धर्म क्या है. और ध्यान रहे कि सच बताए. झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने का इंजेक्शन उसके पास है.

बुद्धिजीवी ने इंस्पेक्टर मातादीन को बताया कि वो तो बे-धर्मी है. उसका कोई धर्म नहीं है. अगर इंसानियत नाम का कोई धर्म होता तो जरूर वो उसका धर्म हो सकता था. मगर आजकल साली इंसानियत नाम की चीज भी ग़ायब हो चली है. बुद्धिजीवी इस बात को याद कर बड़ा दुःखी प्रतीत हो रहा था. इधर इंस्पेक्टर मातादीन की झूठ पकड़ने की मशीन का कांटा 100% सही से भी आगे ओवरशूट कर रहा था. इंसपेक्टर मातादीन का दिमाग एक बार फिर चकराया. बुद्धिजीवी दुःखी मन से इंसानियत धर्म के नाम पर भाषण झाड़ने लगा था.

इंसपेक्टर मातादीन बुद्धिजीवी से जैसे तैसे पिंड छुड़ाकर भागा और सीधे झुग्गी बस्ती में पहुँच गया. उसने सुन रखा था कि भारत की अधिकांश जनता यहीं रहती है. जनता का असली धर्म यहीं पता चलेगा. वहां पहुँचकर उसने अपना डंडा फटकारा और सबसे पहले सामने पड़ने वाले आदमी को बुलाया. वो पच्चीस साल का जवान था, मगर था हड्डियों का ढांचा. गाल पिचके ऐसे हुए, आँखें ऐसी धंसी हुई – मानो पिचहत्तर साल का बुढ़ऊ हो. इंसपेक्टर मातादीन ने डंडा फटकारा और हुड़काया – बता, तेरा धर्म क्या है बे?

इंसपेक्टर मातादीन को पता था कि इसे झूठ पकड़ने की मशीन और सच उगलवाने के इंजेक्शन का भय दिखाना बेकार है. इस किस्म की जनता तो वर्दी वाले किसी भी आदमी को देख कर भय में आ जाती है और खुद ब खुद सच उगलने लगती है.

वो आदमी अपनी कॉपती आवाज में बोला – “माई-बाप! हमें क्या पता हमारा धर्म क्या है. आप ही बता दें. हमें तो अपनी रोजी-रोटी कमाने से ही फुर्सत नहीं मिलती. जिस दिन कभी फुर्सत मिलती भी है तो दारू सुड़क लेते हैं. जब ज्यादा ही फुर्सत मिलती है – यानी रोजी नहीं मिलती तो पेट पर कपड़ा बाँध कर सो जाते हैं. यदि आप इसे ही हमारा धर्म समझते हैं तो...”

बस, बस, चुपकर! इंसपेक्टर मातादीन का दिमाग पूरी तरह भिन्ना गया. “जनता साली झूठी है. वो झूठ-मूठ का धर्म निभाने के चक्कर में बेवजह दंगा फसाद करती है. आज उसका सच पकड़ में आ ही गया.” वो मन ही मन भुनभुनाया और वापस चाँद पर जा पहुँचा.

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चित्र – साभार, मप्र उत्सव 2009.

* – इंस्पेक्टर मातादीन – व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं रचित कैरेक्टर है.

"इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर" व्यंग्य लेख 'हरिशंकर परसाई' ने लिखा है.उसमें बताया गया है कि कैसे भारत का इंस्पेक्टर चांद पर जाता है और वहां शून्य अपराधिक दर देखकर परेशान हो जाता है.पुलिस महकमें को 'सुधारने'के लिये मातादीन जी कई तरकीबें अपनाते हैं जिसमें कुछ है:-
१.पुलिस का वेतन कम करना.
२.पुलिस लाइन में हनुमान मंदिर बनवाना.
३.बिना अपराध लोगों को सजा दिलवाना.
इस तरह के प्रयासों जल्द ही मातादीन जी को आशातीत सफलता मिलती और शीघ्र अपराध दर बढ़ती है.

बुधवार, 11 नवम्बर 2009

प्रोफ़ेशनल ब्लॉगर बनें! ब्लॉगिंग से कमाई के लिए यूनीक टेक्नीकल ट्रेनिंग!

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आप हमारी बात पूछेंगे, तो हम कहेंगे भई – ऐसे खतरनाक विज्ञापनों से बचा….ओ!!!

मंगलवार, 10 नवम्बर 2009

चिट्ठाचर्चा की एक हजार एक वीं पोस्ट तो गब्बर पहले ही लिख चुका है!

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पता चला है कि चिट्टाचर्चा की हजारवीं पोस्ट आई है. पर, एक हजार एक वीं पोस्ट तो चिट्ठाजगत् का गब्बर पहले ही लिख चुका है.  तो गब्बर की चर्चा आप पढ़ना नहीं चाहेंगे?

गब्बर - अरे ओ सांभा
सांभा - जी, सरकार...

ग.- तो कितने हिन्दी चिट्ठाकार हैं?

सां.- जी, सरकार पांच सौ...

ग.- और दिन में कितने चिट्ठे चर्चा के लिए आ जाते हैं?
सां.- जी, सरकार, यही कोई पंद्रह बीस...

ग.- और तू पंद्रह-बीस चिट्ठों की भी ढंग से चर्चा नहीं कर पाता. ऊपर से बहाने बनाता है कि चिट्ठों पर ताला लगा है? बहूत नाइंसाफी है ये बहूत नाइंसाफ़ी.

सां.- सरकार,...

ग.- और क्यों क्या तेरे कन्ने कोई और काम धाम नईं था क्या जो तू बेमतलब और फ़ालतू चिट्ठाचर्चा लिख-लिख कर तमाम जनता को बोर करता फिरता है?
सां.- जी, सरकार...

ग.- उदर ये भासा ऊसा का क्या चक्कर है? कबी तू बंगाली मोशाय बनके लीखता होय, कबी तू मद्रासी बोन जाता है, कबी तू कविता करता है और कबी तू फ़ोकट का कुंडलियां तो कबी व्यंज़ल मारता है? कबी तू मध्याह्न में आ जाता है तो कबी फुरसत में लिखता बेठा रहेता है और कबी हैदराबादी तो कबी कुवैती बानी बोलता है. तो क्या तू पूरे देस-परदेस में घुमता फिरता है और क्या तेरे में बहुभाषी आत्मा घुस रहेला है?
सां.- हाँ, सरकार...

ग.- हाँ सरकार के बच्चे? क्या तू पाठकों को बेवकूफ़ समझता है? तू सुद्द हीन्दी क्यों नहीं लीखता है? और ई का चक्कर है कि तू कुछ चिट्ठों को तो बड़े प्रेम प्यार से बांचता है चर्चा करता है, और बाकी को छोड़ देता है? स्त्री नाम धारी चिट्ठाकारों के चिट्ठे तो तू बांच लेता है बाकी को फेंक देता है? कुछ चिट्ठों की बड़ी प्रशंसा मारता है तो कुछ चिट्ठों की खिल्ली उड़ाता है. बड़ी यारी दुसमनी निभाता है अपने चिट्ठाचर्चा के जरिए? सुना है तूने बहुत ग्रुप बना लिया है कोटरी बना लीया है?
सां.- सरकार, सरकार...

ग.- सरकार के बच्चे, ये बता तू चिट्ठाचर्चा में फोकट की खाली चरचा मारता है कि कुछ गंभीर समीक्षा-वमीक्षा भी करता है? कि बेफ़ालतू की खाली कड़ियाँ थमाकर भाग जाता है. जब तू चिट्ठाचर्चाकार बन गएला है तो अपने काम में प्रोफ़ेशनल एटीट्यूड क्यों नहीं लाता? चलताऊ काम क्यों करता है? या तो तेरे को चिट्ठाचर्चाकार नहीं बनना था, और जब बन गएला है तो गाहे-बगाहे बहाना क्यों बनाता है?
सां.- नहीं, सरकार...

ग.- चोप्प! अब सुन. अबी मेंने जो तेरे को सुनाया, उसपर ध्यान मार. भेजा उसपे लगा. मेरे को कोई कंट्रोवर्सी नईं मांगता. जो जो पिराबलम मेंने तेरे को ऊपर बताया उसे ठीक करके फिर चिट्ठाचर्चा लिखना. और, जरा जल्दी जल्दी सीख, अपने चिट्ठाचर्चा मैं स्टैंडर्ड ला. समझा क्या? और नहीं समझा तो ये बी समझ - आज मेरे सामने आदमी अकेला तू है और मेरे इस पिस्तौल में गोली पूरी की पूरी छ: है. हा हा हा हा हा हा हा हा हा ...

सां.- जी, सरकार.

चिट्ठाचर्चाकार सांभा तब से अपने टर्मिनल का कुंजीपट टिपियाते बैठा है. उसकी उंगलियाँ धड़ाधड़ चल रही हैं, परंतु गोली के भय से वह एक लाइन टाइप करता है और चार लाइन मिटाता है. उसकी पोस्ट माइनस में चली गई है. वह पोस्ट करे तो करे क्या? --- इस बीच वो एक व्यंज़ल लिख मारता है -

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चर्चा पर एक एंटी व्यंज़ल

 

अच्छी चर्चा बुरी चर्चा

ऐसी चर्चा कैसी चर्चा

 

क्यों किसलिए चर्चा

चर्चा, इसलिए चर्चा

 

बहुत प्रायोगिक चर्चा

बेहद अप्रायोगिक चर्चा

 

फूहड़ और बेकार की चर्चा

बढ़िया बड़े काम की चर्चा

 

आज की, कल की चर्चा

नहीं, परसों की चर्चा

 

अरे! सिर्फ दो की चर्चा

बाप रे! दो सौ की चर्चा

 

उन्हीं उन्हीं की दीगर चर्चा

घूमफिरकर एक ही चर्चा

 

असमय की गई चर्चा

कुसमय क्यों हुई चर्चा

 

बस, तेरी मेरी चर्चा

हद है! यही है चर्चा?

 

वाह! वाह!¡ खूब चर्चा

जित्ते मुंह उत्ती चर्चा

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शुक्रवार, 6 नवम्बर 2009

सीखें एमएस ऑफ़िस 2003/2007 ऑनलाइन हिन्दी में

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नेट पर हिन्दी सामग्री का बाजार अब तेजी की ओर है. माइक्रोसॉफ़्ट द्वारा अपने बेहद लोकप्रिय उत्पाद ऑफ़िस 2003/ 2007 को हमारी अपनी हिन्दी भाषा में ऑनलाइन सिखाने के लिए हिन्दी भाषा में प्रशिक्षण पाठ पिछले कुछ समय से उपलब्ध करवाया गया है. इसका होम पेज यहाँ है.

ऑनलाइन प्रशिक्षण में चरणबद्ध तरीके से चित्रों व स्क्रीनशॉटों के जरिए हिन्दी भाषा में बढ़िया प्रशिक्षण तैयार किया गया है जिसमें आपको वर्ड, एक्सेल, पावरपाइंट, आउटलुक इत्यादि पर प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं.

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हालाकि हिन्दी प्रशिक्षण पाठ की भाषा बड़ी ही अजीब प्रतीत होती है, क्योंकि अनुवाद सीधा और सपाट सा, यंत्रचालित प्रतीत होता है. वर्तनी की गंभीर किस्म की गलतियाँ हैं. फिर भी, प्रशिक्षण का सार ग्रहण करने में समस्या तो नहीं ही होती और उम्मीद करते हैं कि  भविष्य में भाषा भी परिष्कृत कर ली जाएगी. भाषा का एक नमूना देखें -

 

पहली बार देखने पर, आप शायद Word के पिछले संस्करण से कोई निश्चित आदेश नहीं देखेगें. क्षुब्ध न हों. कुछ समूहों में निचले-दाँए कोने में छोटा डायगोनल तीर है बटन छवि.

तीर, संवाद बॉक्स लॉन्चर कहलाता है. यदि आप उसे क्लिक करेंगे, तो आप समूह से संबंधित अधिक विकल्प देखेंगे. अधिकाशंत: विकल्प संवाद बॉक्स के रूप में दिखाई देगें जिसे आप Word के पिछले संस्करण से पहचान सकते हैं. या वे परिचित से दिखने वाले कार्य फलक में दिख सकते हैं.

पिछले संस्करण के बारे में बात करते हुए, यदि आप आश्चर्य कर रहे हैं कि क्या आप Word के पिछले संस्करण जैसा दृश्य और अनुभव प्राप्त कर सकेंगे, तो उत्तर है, नहीं. लेकिन रिबन का थोड़ा उपयोग कर लेने के बाद, आप चीजों के स्थान से परिचित हो जाएगें और उनसे आसानी से कार्य करना पसंद करेगें.

 

कुछ डायरेक्ट लिंक आपके लिए -

एमएस वर्ड 2003 ऑनलाइन हिन्दी ट्यूटोरियल

एमएस वर्ड 2007 ऑनलाइन हिन्दी ट्यूटोरियल

बुधवार, 4 नवम्बर 2009

एमपी3 व अन्य मीडिया फ़ाइलों को ऑनलाइन प्ले हेतु नेट पर अपलोड करने का बढ़िया, आसान तरीका

लाइफ़लागर के तंबू उखड़ने और ई-स्निप जैसी सेवा के भरोसेमंद नहीं रहने के कारण इलाहाबाद राष्ट्रीय संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में इरफ़ान ने जब यह प्रश्न किया कि एमपी3 फ़ाइलों को इंटरनेट पर लोड करने का बढ़िया तरीका क्या है तो अफ़लातून ने अपने स्वयं के अनुभवों को वहाँ पर साझा किया कि एमपी3 फ़ाइलों को बेहतर तरीके से नेट पर कैसे अपलोड किया जा सकता है.

आपके लिए एक और बढ़िया विकल्प है - आर्काइव.ऑर्ग पर मीडिया फ़ाइलों को अपलोड करने का. आर्काइव.ऑर्ग के साथ ख़ूबी यह है कि यह कोई निजी कंपनी नहीं है, बल्कि यह अनुदान प्राप्त संस्था है जो कि नेट की सामग्री को अपने सर्वरों पर भंडारित करते रहती है. मीडिया फ़ाइलों को आप आसानी से भंडारित कर सकते हैं सदा सर्वदा के लिए, और इसके तंबू उखड़ने या सेवाओं को बन्द करने, खत्म करने, सीमित करने जैसी संभावना यहाँ अत्यंत क्षीण हैं. (कॉपीराइट वस्तुओं का ध्यान तो ख़ैर रखना ही होगा.)

आर्काइव.ऑर्ग पर एमपी3 फ़ाइलें ऑनलाइन प्लेयर हेतु अपलो़ड करना अत्यंत आसान है. इसकी विधि निम्न है -

अपने एमपी3 फ़ाइल को http://archive.org पर अपलोड करें. यदि आपने अपना खाता नहीं बनाया हो तो वहाँ पहले एक खाता बना लें. खाता बनाना बहुत आसान है. अपलोड की गई एमपी3 फ़ाइल की कड़ी कॉपी कर लें.

आपके एमपी3 फ़ाइल की कड़ी कुछ इस तरह (उदाहरण) होगी - http://ia310829.us.archive.org/3/items/Meridhun-RaviratlamiGharAaJaVe/RekhaKePyarMe.mp3
अब जहाँ अपने ब्लॉग पोस्ट पर आपको ऑनलाइन ऑडियो प्लेयर एम्बेड करना है, वहां पर नीचे दिया गया कोड कॉपी कर पेस्ट कर दें :

<embed allowscriptaccess="always" flashvars="valid_sample_rate=true&amp;external_url=DOWNLOAD-LINK-OF-MP3" height="52" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" quality="high" src="http://www.odeo.com/flash/audio_player_standard_gray.swf" type="application/x-shockwave-flash" width="300" wmode="transparent"></embed>

अब यहाँ पर DOWNLOAD-LINK-OF-MP3 को अपने उस एमपी3 फ़ाइल की डाउनलोड कड़ी से बदल दें जो आपने आर्काइव.ऑर्ग (http://archive.org ) में अपलोड किया है और कड़ी पहले कॉपी कर रखा हुआ है.

यदि आप ऊपर उदाहरण में दिए गए एमपी3 कड़ी का प्रयोग करेंगे तो आपको कोड कुछ इस तरह दिखेगा -

<embed allowscriptaccess="always" flashvars="valid_sample_rate=true&amp;external_url=http://ia310829.us.archive.org/3/items/Meridhun-RaviratlamiGharAaJaVe/RekhaKePyarMe.mp3" height="52" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" quality="high" src="http://www.odeo.com/flash/audio_player_standard_gray.swf" type="application/x-shockwave-flash" width="300" wmode="transparent"></embed>

अपने ब्लॉग पोस्ट को सहेज कर पोस्ट कर दें.

बस, हो गया!

ऊपर दिए गए कोड का वास्तविक प्रयोग कुछ यूं रहेगा -


ध्यान रहे, आर्काइव.ऑर्ग पर अपलोड किए एमपी3 फ़ाइल की डाउनलोड कड़ी भी साथ में दे दें, क्योंकि ऊपर दिया गया प्लेयर फ्लैश प्लेयर है, और यदि किसी प्रयोक्ता के तंत्र में फ्लैश इंस्टाल नहीं है तो ये नहीं चलेगा. फिर, बहुत से लोग एमपी3 डाउनलोड कर अपने मोबाइल प्लेयरों पर भी सुनते हैं. (ऊपर उदाहरण में दी गई कड़ी को सीधे चिपका दें, या फिर नीचे दिया गया कोड प्रयोग में लें - पर अपने स्वयं के डाउनलोड कड़ी से यहाँ दी गई कड़ी को अवश्य बदल लें)
<a href="http://ia310829.us.archive.org/3/items/Meridhun-RaviratlamiGharAaJaVe/RekhaKePyarMe.mp3" target="_blank">डाउनलोड लिंक</a>

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