टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

October 2009

इलाहाबाद संगोष्ठी में चर्चा के दौरान यह तकनीकी प्रश्न किया गया था कि उन ब्लॉगर ब्लॉगों को फ़्लैग कैसे करें जिनमें नेविगेशन पट्टी को हटा दिया गया होता है.

report abuse

ब्लॉगस्पाट के ब्लॉगों में यह सुविधा दी गई है कि यदि आपको लगता है कि किसी ब्लॉग में आपत्तिजनक सामग्री है, तो ब्लॉगस्पाट ब्लॉग के सबसे ऊपरी खंड में दिए गए नेविगेशन पट्टी में ‘रिपोर्ट एब्यूज’ को क्लिक कर अपनी आपत्ति दर्ज करवा सकते हैं. और यदि आवश्यक परिपूर्ण मात्रा में ऐसी शिकायतें ब्लॉगस्पाट को मिलती हैं तो उस पर कार्यवाही की जाकर उस सामग्री को वे हटा भी देते हैं.

जिन ब्लॉगस्पाट ब्लॉगों में नेविगेशन पट्टी दिखती है, उसमें तो कोई समस्या नहीं, मगर बहुत से ब्लॉगों में सजावट के नाम पर उसे हमेशा के लिए हटा दिया गया होता है. और आप ऐसे ब्लॉगो को चाह कर भी फ्लैग नहीं कर सकते जिनमें नेविगेशन पट्टी नहीं होता है. ऐसे ब्लॉगों को फ्लैग कैसे करें?

इसके लिए दो विधियाँ हैं –

1) पहली आसान सी विधि है – यदि आप फ़ायरफ़ॉक्स प्रयोग करते हैं तो ब्लॉगस्पाट नेवबार रिस्टोरर नाम के इस ग्रीजमंकी स्क्रिप्ट का प्रयोग करें. इस स्क्रिप्ट के जरिए आमतौर पर प्राय: सभी ब्लॉगर ब्लॉगस्पाट के ब्लॉगों की नेविगेशन पट्टी दिखाई देने लगती है. अब आपको बस फ्लैग बटन पर क्लिक करना है.

2) दूसरी विधि में थोड़ी सी लंबी प्रक्रिया है. नीचे दिया गया यूआरएल देखें –

http://www.google.com/support/blogger/?hl=en&blog_URL=http%3A%2F%2Fblogname.blogspot.com%2F&action=flag&blog_ID=BLOGID

यहाँ पर, जिस ब्लॉग को आपको फ्लैग करना है, उसका ब्लॉग पता व ब्लॉग आईडी भरना होगा. जहाँ गाढ़े अक्षरों में blogname.blogspot.com लिखा है उसे फ्लैग किए जाने वाले ब्लॉग के यूआरएल से बदल दें जैसे कि flagblog.blogspot.com. तथा जहां पर BLOGID लिखा है वहाँ पर ब्लॉग की आईडी (यह अंकों में होता है) डाल दें. ब्लॉग की आईडी उस ब्लॉग के स्रोत (view > source) को देखकर आसानी से पता किया जा सकता है. नीचे दिए अनुसार ब्लॉगर ब्लॉग आईडी दिया गया होता है. आमतौर पर ये स्रोत पृष्ठ के ऊपरी क्षेत्रों में उपलब्ध होता है.

blog ID

अब आप इस कोड को अपने ब्राउजर के पता पट्टी में नकल कर चिपका दें. और एंटर कुंजी दबा दें. आपके सामने उस ब्लॉग को फ्लैग करने का ब्लॉगर का पेज नीचे दिए गए चित्रानुसार प्रकट हो जाएगा. अब कारण चुनने के लिए संबंधित रेडियो बटन पर क्लिक करें और अगला बटन दबाएँ और दिए गए निर्देशों का पालन करें. नेविगेशन पट्टी रहित तथाकथित ब्लॉग को आपने फ़्लैग कर ही दिया. बधाई!

flagging blogger blog

हाँ, ये ध्यान रखें कि आपके अकेले फ़्लैग करने से बात बनेगी नहीं. जल्द सुनवाई के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में हर संभावित क्षेत्रों से फ़्लैग होने चाहिए. साथ ही जेनुइन ब्लॉगों को फ़्लैग करने का कोई अर्थ नहीं होगा ये भी जान लें. ब्लॉगर ब्लॉगस्पाट – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बड़ा पैरोकार है!

आइए, आग को कुछ और हवा दें. दूर-सुदूर प्रांतों-देशों में कान-नाक-मुँह खोलकर अपने कम्प्यूटर के सामने चिंतित होकर ब्लॉगियाती-टिपियाती जनता के लिए, कि इलाहाबाद में क्या क्या न हुआ और क्यों न हुआ और हुआ तो क्यों हुआ इत्यादि के लिए   प्रस्तुत है सम्मेलन के कुछ हा – हा – ही – ही , हाय हैलो के ऑडियो वीडियो.

 

सबसे पहले मनीषा पाण्डेय को सुनें. उनका ओजस्वी वक्तव्य पूरा रेकॉर्ड न कर पाया इसका अफसोस है. – कारण - वही : हार्डवेयर फ़ेल्योर.

 

अब विनीत कुमार को सुनें. ऑडियो क्वालिटी बहुत खराब है – (सेमिनार हाल में ही ऑडियो गूंज रहा था बेसबब) मगर विनीत को सुनना उनको पढ़ने से ज्यादा आनंददायी है. यकीन मानें.

 

आगे विनीत से लिया गया छोटा सा साक्षात्कार. छोटा इसलिए, कि साक्षात्कार के बीच में ही बैटरी जाने कैसे माशाअल्ला हो गई और एक वीडियो करप्ट हो गया. फिर भी, जो थोड़ा सा बचा है वह भी इसलिए महत्वपूर्ण है कि विनीत ने जब से ब्लॉग लिखना शुरू किया, उनका लेखन, उनकी लेखनी का तेवर, उनकी शैली सबकुछ कूदती फांदती नित्य नई ऊँचाईयाँ पाती गई. उन्होंने बातों बातों में बताया कि पिछले साल-डेढ़ साल में ही उन्हें कई-कई प्रमुख जगहों से नियमित लेखन के प्रस्ताव मिलते रहे हैं और उन्होंने हिन्दी लेखन से ही पच्चीस हजार रुपए से भी अधिक की आय इस छोटे से समय में अर्जित कर ली है. जहाँ हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाएँ बेहद कम, मात्र रस्मी पारिश्रमिक देती हैं, ऐसे में उनकी यह उपलब्धि अचंभित करती है.

 

विनीत का साक्षात्कार – भाग 1

 

विनीत का साक्षात्कार – भाग 2

वैसे तो अपने पास और भी दर्जनों एलीबाई हैं कि वहाँ उपस्थित चिट्ठाकारों ने सरकारी पैसे से और क्या क्या मौज मस्ती की, मगर हमने हांडी के चावल दिखा दिए हैं. तो दोस्तों, आपका तो पता नहीं, इधर से चिरकुटाई बन्द. अब से रेगुलर ब्लॉगिंग जारी आहे. जै चिट्ठाकारी - जै जै चिट्ठासंसार!

windows 7

जैसी कि पूर्व सूचना आपको थी, आज 28 अक्तूबर 2009 को भारतीय समयानुसार शाम 4 बजे से लेकर 5.30 बजे तक एक ऑनलाइन वेबकास्ट है. वेबकास्ट यानी इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन ट्यूटोरियल. इसमें वीडियो (स्क्रीनकास्ट) के जरिए विंडोज़ 7 को हिन्दी के लिए सेट करने व उनमें विभिन्न कुंजीपटों व इंटरनेट, हिन्दी फ़ॉन्टों में काम करने के बारे में विस्तार (ऑडियो वीडियो के माध्यम से) से बताया जाएगा. आपके प्रश्नों के उत्तर चैट के माध्यम से भी वहीं, तत्काल दिया जाएगा.

जाहिर है, यह वेबकास्टिंग मेरे द्वारा होस्ट की जा रही है.

इस वेबकास्ट में शामिल होने के लिए इस कड़ी पर 3.45 बजे शाम (भारतीय समयानुसार, इससे पहले यह कड़ी उपलब्ध तो होगी, पर काम नहीं करेगी) को क्लिक करें -

 

http://msevents.microsoft.com/cui/Register.aspx?culture=en-IN&EventID=1032429276&CountryCode=IN

 

पर, इससे पहले आपको अपने विंडोज में विंडोज लाइव मीडिया प्रोग्राम (LMSEtup.exe) इंस्टाल करना होगा जो आपको वेबकास्टिंग दिखाता है. यह प्रोग्राम यहाँ से डाउनलोड करें -

 

http://download.microsoft.com/download/4/F/7/4F712B94-C6A5-4A66-AD8F-53E04085B939/LMSetup.exe

 

तो चलिए, वेबकास्ट में मिलते हैं और कुछ सीखते हैं आज शाम 4 बजे.

इलाहाबाद में मैंने अपनी प्रस्तुति में चिट्ठाकारी में निहित खतरों के बारे में भी बताया था. अभिषेक ओझा ने कई पोस्टों में ब्लॉगिंग के खतरे के बारे में विस्तृत विवरण दिए हैं. इनमें से एक है – अनर्गल, व्यक्तिगत आक्षेप. यह टिप्पणी सुरेश चिपलूणकर के चिट्ठे से ली गई है. मुलाहिजा फरमाएँ :)





Vishal Pandey said...



सुरेश जी आपने सही मुद्दा उठाया है। जैसे नामवर जी मठाधीश है वैसे ही हमारे हिन्दी ब्लाग जगत के भी कुछ मठाधीश है। इनमे से दो को हम सब बखूबी जानते है। एक गंजी होती खोपडी वाला मरियल सा शख्स और दूसरा बाहर निकले दाँतो वाला हँसोड। आप यदि इन दोनो के चमचे नही तो हिन्दी ब्लाग जगत की मलाई कभी नही खा सकते।
आज हिन्दी बलाग जगत का विकास क्यो नही हुआ। ऐसे लोगो के कारण जो भाई-भतीजावाद को बढावा देते रहे और गूगल से हिन्दी प्रोमोशन के नाम पर पैसे उगाहते रहे। पैसे तो पा गये पर कुनबा बढाओ की नीति छूटी नही। आप ही बताये क्यो चिठठा-चर्चा मे खास ब्लागो की ही चर्चा होती है। यदि ये हिन्दी के सेवक है और उस नाम से पैसे कमा रहे है तो सभी चिठ्ठो की चर्चा करे।
मरियल से दूसरे मठाधीश को हिन्दी ब्लागिंग के नाम पर छत्तीसगढ से पैसा मिलता है। यहाँ हुये ब्लागिंग सम्मेलन मे भी उसने अपने चमचो को बुलाया था रेल की टिकट दिलवा कर। यह पूरा रैकेट है। इन्हे "हिन्दी ब्लाग माफिया" कह सकते है।
हिन्दी ब्लाग जगत आज की स्थिति मे दुर्गन्ध भरे तालाब की तरह है जिन्हे ऐसे मठाधीश सडा रहे है और सडाते रहेंगे।
वे लोग अच्छे है जो हिन्दी ब्लागिंग का मोह त्याग चुके है। हम भी उनमे शामिल है। बस आपको पढने चले आते है।
26 October, 2009 12:46 AM


यह रही स्क्रीनशॉट – ताकि सनद रहे:
mahajaal par suresh chiplunkar par raviratlami and anoop shukla
तो, यदि आप ब्लॉगिंग में हैं, तो इन खतरों से बच नहीं सकते. इन खतरों को मोल लेना ही होगा. कोई भी आपके किसी भी हिस्से की धज्जियाँ कभी भी कहीं भी बड़े बेखौफ़ तरीके से उड़ा सकता है.
जाहिरा तौर पर, आपकी जानकारी के लिए, टिप्पणीकार विशाल पाण्डेय का ब्लॉगर प्रोफ़ाइल बन्द है याने बेनामी?. अब जनता को कैसे पता चले कि ये मरियल... और हँसोड़ के बीच या इधर उधर ऊपर नीचे कहाँ ठहरते हैं?

अब शायद अगली बारी आपकी है. ठंडे पानी का गिलास, ब्लॉगिंग करते समय सदा साथ में रखें. :)

व्यंज़ल  तो बनता है न भाई? मुलाहिजा फरमाएँ -

चलने के खतरे हैं फिरने के खतरे हैं
यहाँ तो बोलने बताने में खतरे हैं

जंगलों का तो अजब हाल है साहब
अब हाथियों को चींटियों से खतरे हैं

बात भी करो तो किससे और कैसी
इस जमाने में बात-बेबात के खतरे हैं

जमाना बहुत बदल गया है यारों
अब औरों से नहीं अपनों से खतरे हैं

अज्ञानी मूढ़ रवि ये नहीं जानता
जियादा तो खुद को खुद से खतरे हैं

क्या आप जानते हैं कि अजित वडनेरकर कभी अहमद हुसैन – मोहम्मद हुसैन के शिष्य हुआ करते थे और वे एक उम्दा गायक भी हैं? देखिए उनके लाइव परफ़ॉर्मेंस का वीडियो – जब से हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए.

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(वीडियो – साभार अनूप शुक्ल के कैमरे से)

windows 7

विंडोज का हर संस्करण चलने चलाने में अपने पूर्व के संस्करणों से बहुत कुछ भिन्न होता है. विंडोज 7 में हिन्दी कैसे चलाएँ? विंडोज 7 में नया क्या है? विंडोज 7 में इंटरनेट-नेटवर्किंग कैसे करें? इत्यादि. यह सब और बहुत कुछ जानिए मुफ़्त वेबकास्ट से.

अब तक का सर्वश्रेष्ठ, चलने में तीव्र और आसान, अत्यधिक सुरक्षित विंडोज संस्करण 7 बस आने वाला ही है. 22 अक्तूबर 09 को इसे अधिकृत रूप से तमाम विश्व में जारी किया जा रहा है. इसके कुछ शानदार पहलुओं के बारे में तथा इसमें कैसे काम करें इत्यादि के बारे में जीवंत वेबकास्टों की शृंखला 23 से 30 अक्तूबर 09 के बीच चलेगी. विवरण निम्न है –

windows 7 webcast

(चित्र बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)

  • 23 अक्तूबर - विंडोज 7 खेल-खेल में – अभिषेक कांत व अन्य विशेषज्ञ
  • 26 अक्तूबर - विंडोज 7 परफ़ॉर्मेंस के नये आयाम – शांतनु कौशिक
  • 27 अक्तूबर - विंडोज 7 इंटरनेट व होम नेटवर्किंग – एलन बी तुलादार व रमेश के.
  • 28 अक्तूबर - विंडोज 7 में हिन्दी में काम कैसे करें – रविशंकर श्रीवास्तव
  • 29 अक्तूबर - विंडोज 7 मनोरंजन व मीडिया सेंटर – सौमित्र सेनगुप्ता
  • 30 अक्तूबर - विंडोज 7 एसेंशियल्स: विंडोज लाइव – मनन कक्कड़

समय : प्रथम वेबकास्ट को छोड़कर जो कि 2 से 4.30 बजे तक है, बाकी के सारे वेबकास्ट 4.00 से 5.30 बजे तक हैं. अपने शेड्यूलर को अभी अद्यतन कर लें.

जैसा कि ऊपर सूची में स्पष्ट है, 28 अक्तूबर का ‘हिन्दी में काम कैसे करें’ सत्र मेरा होगा.

यदि आप भविष्य में विंडोज 7 पर काम करना चाहते हैं (जो कि बहुत संभव है क्योंकि इसमें तमाम ख़ूबियाँ हैं) तो इन वेबकास्टों में जरूर शामिल हों. इन जानकारी पूर्ण वेबकास्टों में आप मुफ़्त शामिल हो सकते हैं.

अधिक विवरण के लिए यहाँ जाएँ

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वैसे तो हर पोस्ट की हर टिप्पणी (स्पैम को छोड़ दें) अमूल्य और अनमोल होती है, मगर किसी ब्लॉग पर आपकी एक टिप्पणी के बदले पाँच रुपए का दान दिया जा रहा है तो वहाँ आप एक टिप्पणी तो दे ही सकते हैं?

अनघ देसाई इस दफ़ा दीपावली कुछ खास तरीके से मना रहे हैं. वे अपने ब्लॉग पर 15 अक्तूबर से 19 अक्तूबर 2009 के बीच मिले प्रत्येक टिप्पणी के बदले 5 रुपए का दान देंगे. इसी तरह इस दौरान फेसबुक/ईमेल/ट्विटर पर (स्पैम नहीं) मिले शुभकामना संदेशों पर वे 0.25 रुपए का दान देंगे तथा प्रत्येक एसएमएस पर वे 0.50 रुपए का दान देंगे. उनके इस विचार को लोगों ने हाथों हाथ लिया है और बहुत से लोग अनघ के साथ दान देने के लिए जुड़ गए हैं और मामला इन पंक्तियों के लिखे जाने तक रुपए 17.50 प्रति शुभकामना संदेश तक जा चुका है. ये दान बालिका शिक्षा (एजुकेटिंग गर्ल चाइल्ड) के लिए दिए जाएंगे.

अनघ के इस पोस्ट पर टिप्पणी करें

अनघ को ईमेल से शुभकामना संदेश भेजें. ईमेल पता उनके प्रोफ़ाइल से यहाँ से हासिल करें.

ट्विटर पर शुभकामना संदेश #deepwish विषय से भेजें (अपने ट्विटर पोस्ट में #deepwish जोड़ दें बस). अनघ का ट्विटर पृष्ठ

बूंद बूंद से घट भरता है. मुक्त हस्त से टिप्पणी करें, ईमेल/ट्विटर से शुभकामना भेजें (दान दें) !

corporate blogging in India

आदमी की (सद्यः संशोधित?) मूल भूत आवश्यकताओं में अब शामिल हैं – रोटी, कपड़ा, मकान और जी हाँ, सही पहचाना - ब्लॉगिंग! बहुत पहले की मजाक में कही गई बात अब सत्य प्रतीत होती दीखती है. आदमी (और, औरतों की भी,) की मूलभूत आवश्यकताओं में अब रोटी, कपड़ा और मकान के साथ साथ इंटरनेट तो जुड़ ही गया है. फ़िनलैण्ड विश्व का ऐसा पहला देश बन गया है जहाँ इंटरनेट – वो भी 1 एमबीपीएस ब्रॉडबैण्ड को अब व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में शामिल मान लिया गया है और इसके लिए क़ानून बना दिया गया है. इधर, इंटरनेट से ब्लॉगिंग जुड़ा हुआ है. तो हम आगे क्यों न एक बात मजाक में ही सही, कहें – आदमी की मूल भूत आवश्यकताओं में अब शामिल हैं – रोटी, कपड़ा, मकान और ब्लॉगिंग!

और, जब चहुँओर ब्लॉगिंग की धूम मच रही हो तो कार्पोरेट जगत में, कार्पोरेट स्टाइल में कार्पोरेट ब्लॉगिंग क्यों नहीं? कार्पोरेट ब्लॉगिंग नाम के किताब में राजीव करवाल और प्रीति चतुर्वेदी ने इसी विषय को केंद्र में रखते हुए बहुत सी काम की बातें बताईं हैं. डेढ़ सौ पृष्ठों की इस किताब का मूल्य तीन सौ पैंतालीस रुपए है जो कि थोड़ा ज्यादा प्रतीत होता है, मगर जब बात कार्पोरेट जगत की कही जाएगी तो मामला थोड़ा महंगा तो होगा ही! वैसे किताब के पन्ने व लेआउट, प्रिंटिंग इत्यादि उच्च श्रेणी के हैं.

किताब में नौ अध्याय है जिसमें कार्पोरेट ब्लॉगिंग परिदृश्य से लेकर मार्केटिंग, उत्पादकता, उपभोक्ता इत्यादि तमाम पहलुओं में ब्लॉगिंग के जरिए ज्यादा से ज्यादा कैसे कुछ हासिल किया जा सकता है यह बताने की कोशिश उदाहरणों के साथ की गई है. कई मामले में लेखक द्वय सफल भी रहे हैं, तो कहीं कहीं उबाऊ, दोहराए गए विवरण भी हैं. हर अध्याय के अंत में टिप्पणियाँ और संदर्भ नाम से किताबों, सीडी, व नेट के कड़ियों युक्त संदर्भ दिए हैं, जिससे विषय संबंधी अतिरिक्त ज्ञान हासिल तो किया ही जा सकता है, तथ्यों की पुष्टि भी की जा सकती है.

जब आईबीएम और डिज़्नी जैसी विशालकाय बहु-राष्ट्रीय कंपनियाँ ब्लॉगों का उपयोग उत्पाद/परियोजना में अभिनवता लाने तथा आंतरिक परियोजना प्रबंधन जैसे उपायों के लिए भी कर रही हैं, तो कार्पोरेट जगत में ब्लॉगों की लोकप्रियता और उपादेयता स्वयंसिद्ध है ही. क्लीयरट्रिप.कॉम जैसे उपक्रमों के उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे इन कार्पोरेट सेक्टरों ने ब्लॉगों का शानदार, व्यवहारिक प्रयोग अपने उत्पादों के बारे में जानकारियों को जनजन तक पहुँचाने में, ग्राहकों से फ़ीडबैक लेने व उन्हें उच्च स्तरीय सुविधाएँ प्रदान करने में कैसे किया.

नेटकोर के राजेश जैन भारत में कार्पोरेट ब्लॉगिंग के पुरोधाओं में से एक रहे हैं जो ईमर्जिक – राजेश जैन का ब्लॉग नाम से अपना ब्लॉग लिखते हैं. आज की तिथि में सैकड़ों बड़ी और नामी भारतीय कंपनियों के सीईओ तथा कंपनियों के स्टाफ़ में से ही, कार्पोरेट ब्लॉगिंग करते हैं – जाहिर है, अपने व्यवसाय को एक नई दिशा देने के लिए.

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कार्पोरेट ब्लॉगिंग इन इंडिया

लेखक गण - राजीव करवाल एवं प्रीति चतुर्वेदी

प्रकाशक – विज़्डम ट्री, 4779/23, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2

पृष्ठ – 127, मूल्य 345.00 रुपए.

आईएसबीएन नं. – 978-81-8328-131-7

bharosa

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ये भरोसे का बड़ा चक्कर है. आपको भले ही अपने आप पर भरोसा न हो, मगर दुनिया है कि आप पर पूरा भरोसा करती है. ठीक वैसे ही जैसे आप अपने बच्चे के ऊपर भरोसा करते हैं कि वो बड़ा होकर पढ़ लिख कर आई.ए.एस. अफ़सर बनेगा. बड़ा नाम और नांवा कमाएगा. भरोसा बाद में टूटे या रहे – जिसके कि बहुतेरे कारक और कारण हो सकते हैं, जैसे कि उसे तो बड़ा होकर सलमान बनने का भरोसा है जिसे आपका आई.ए.एस अफ़सर बनने-बनाने का भरोसा खुद टूटते टूटते तोड़ देगा. मगर, जैसा भी हो, भरोसा अभी तो बना रहता है ना! पालक के मन में भी और बालक के मन में भी.

मुझे भी अपने आप पर भरोसा भले ही नहीं हो, मगर मैं भी दूसरों पर पूरा भरोसा करता हूं, और दूसरे भी अपने आप पर भले न करें, मुझ पर पूरा, पक्का भरोसा करते हैं. वैसे, भरोसा रिलेटिव होता है. सापेक्ष. निरपेक्ष वो कतई नहीं होता. किसी का भरोसा तोड़ने टूटने के उतने ही ज्यादा चांसेज होते हैं जितना ज्यादा भरोसा होता है.

किसी शासकीय कार्यालय में किसी काम के लिए जाओ तो आपको अपने काम के होने का कितना भरोसा होता है? यदि कोई ईमानदार अफ़सर मिल गया तो काम होने को भरोसा तो नहीं होता है, मगर इस बात का पूरा भरोसा होता है कि काम नहीं होगा. फिर आप भरोसे लायक अफ़सर को ढूंढते हैं जो कुछ ले-देकर आपका काम कर दे. जैसे ही आपको भरोसे लायक अफ़सर का पता चलता है, आपका भरोसा तंत्र पर फिर से कायम हो जाता है.

अब आप पूछेंगे कि भरोसे के लायक अफ़सर और बाबू कैसे मिलेंगे? ये मिलेंगे तो आप इन्हें कैसे पहचानेंगे? इन्हें पहचानने का तरीका क्या है? इनकी पहचान क्या है? तो, भरोसा रखिए, कुछ क्लू हमेशा अपने साथ रखिए. ये क्लू आपके भरोसे को कभी नहीं तोड़ेंगे. भई, सीधा सादा गणित है. मसलन – कोई अस्तव्यस्त सा बाबू पान चबाता मिल जाए जिसके शर्ट में पान की पीक के दाग-वाग दिख रहे हों तो समझो कि वो भरोसे का आदमी है. यदि उसके हाथ में जलती सिगरेट का टुकड़ा दबा दिख जाए तो समझो कि वो तो पक्के भरोसे का आदमी है. आपका काम हुआ ही समझो. क्योंकि सरकारी तनख्वाह में, जिसका तैंतीस परसेंट तो सरकार टैक्स के रूप में वेतन देने के पहले ही काट लेती है, कोई सरकारी मुलाजिम सिगरेट के कश अपनी तनख्वाह के पैसे से कैसे मार सकता है भला?

अब पानी और बिजली का ही ले लीजिए. इनके नहीं रहने का भरोसा सबको है. कम से कम हम भारतीयों को तो इसका पूरा भरोसा है कि सुबह नल खोलो तो पाँच में से तीन मर्तबा पानी नहीं निकलेगा क्योंकि तमाम वजहों से नल आया ही नहीं होता है. बिजली रानी पर तो इतना भरोसा है कि दिन में जब तक आधा दर्जन बार उतने ही घंटों के लिए जब तक गुल नहीं हो जाती उसे बिजली रानी कहलाने का हक नहीं. यही हाल रेलवे का है. प्लेटफ़ॉर्म की गंदगी, रिजर्वेशन की सीट नहीं मिलने, जनरल डिब्बे में भीड़ भड़क्का का भरोसा किसे नहीं होता? भारतीय सड़कों पर गड्ढे और स्पीड ब्रेकर हर किलोमीटर में तीन-पाँच के हिसाब से नहीं मिलने का भरोसा किसे नहीं होता?

अब इससे पहले कि इन पंक्तियों को पढ़ते पढ़ते मेरे लेखन से आपका भरोसा उठ जाए, मामला यहीं समाप्त करते हैं. मुलाहिजा फरमाएँ एक पर्याप्त भरोसे का व्यंज़ल –

व्यंज़ल

देखिए किस पर भरोसा कर रहे हैं लोग

केवल गुंडों पर भरोसा कर रहे हैं लोग


वक्त की इंतिहा कहिए कि खुद को छोड़

दूसरे तीसरे पर भरोसा कर रहे हैं लोग


ये तो सचमुच का कमाल हो गया यारों

राजनीतिज्ञों पर भरोसा कर रहे हैं लोग


वक्त की जरूरत है कि प्यार तज कर

घृणा नफरत पर भरोसा कर रहे हैं लोग


कतई भरोसा नहीं है रवि को खुद पर

फिर भी उस पे भरोसा कर रहे हैं लोग

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(स्क्रीनशॉट – साभार अदालत ब्लॉग)

Piyara sahab
देश-विदेश के जाने-माने पत्रकार-संपादक-स्तंभकार राजकुमार केसवानी ताज़ा-ताज़ा हिन्दी ब्लॉग जगत में कूदे हैं. बाजे वाली गली नाम का उनका हिन्दी ब्लॉग देखते ही देखते अच्छा खासा चर्चित हो गया है. संगीत को ओढ़ते बिछाते फिरते और संगीत में रमते से प्रतीत होते राजकुमार केसवानी के संग्रह में पुराने जमाने के विनाइल और लाख के बने एलपी, एसपी, ईपी के हजारों रेकार्ड हैं. उनके पास अभी भी चालू हालत में गियर से चलने वाला बाजा है जिसे चाभी भरकर बजाया जाता है. इसमें गाना सीधे सुई-और-डायाफ्राम से घूमते रेकार्ड के जरिए बजता है. ध्वनि पैदा करने के लिए इसमें इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी नहीं है – और इस वजह से जादुई संगीत का वातावरण पैदा होता है. जिन्होंने रूबरू इसे सुना है (मैंने अभी अभी ही इसे सुना है,), वही इसके जादू को महसूस कर सकते हैं.
हाल ही में राजकुमार केसवानी से लंबी बातचीत हुई. उनके हिन्दी ब्लॉग जगत के थोड़े से समय के अनुभव तथा उनके प्रिय शगल संगीत पर हुई बातचीत और उनके बाबा आदम के जमाने के मगर अभी भी बढ़िया काम कर रहे चाबी वाले बाजे पर बजते गाने के बेहद दिलचस्प वीडियो आप भी देखें -


भाग 1 :  हिन्दी ब्लॉग जगत में अभी परिपक्वता दूर-दूर तक नजर नहीं आती :


भाग 2 : समय के साथ संगीत की पसंदगी बदलती ही है :

राजकुमार केसवानी का चाबी वाला बाजा

बाजा बजाने की तैयारी

बजता हुआ ग्रामोफ़ोन - एंटीक पीस?

और, अंत में देखें-सुनें राजकुमार केसवानी के अनमोल संग्रह से गौहर जान  के स्वर में रेकॉर्ड प्लेयर पर बजता गीत. यह गीत भारत में शुरूआती दौर में रेकॉर्ड किए गए चंद गीतों में से एक है.

सबसे ऊपर का चित्र - राजकुमार केसवानी के अनमोल खजाने से : गायक पियारा साहब का दशकों पुराना रेकॉर्ड - पियारा साहब कलकत्ता के महाराजा के दरबारी गायक थे

BANWARI LAL CHOKSE

वैसे तो बनवारी लाल चौकसे की आत्मकथात्मक किताब ‘श्रमिक से पद्मश्री’ स्मरणिका के रूप में ज्यादा नजर आती है मगर स्वेट मार्डेनों, दीपक चोपड़ाओं और जमात में ताज़ा तरीन शामिल हुए रश्मि बंसलों जैसे तमाम प्रेरणास्पद लेखकों की तमाम किताबों के जैसी प्रेरणा यह एक किताब पाठक के मन में भर सकती है.

किताब बहुत ही सहज और बेहद सरल भाषा में लिखी गई है. शुरुआत के पन्नों में कुछ अनावश्यक से बधाई संदेशों को स्थान दे दिया गया है, और आखिरी के पृष्ठों में चित्रों के चयन में तारतम्यता नहीं बरती गई है, बावजूद इसके पूरी किताब पठनीय और बेहद प्रेरणास्पद है.

किताब में बनवारी लाल चौकसे ने ये बताया है कि किस तरह उन्होंने एक दिहाड़ी श्रमिक – दैनिक वेतनभोगी मजदूर के रूप में अपना कैरियर एक नामालूम सी प्राइवेट कंपनी में प्रारंभ किया और अपनी लगन, अपनी क्षमता, नित्य सीखने की ललक, हर कार्य में, हर जाब में अपना शतप्रतिशत झोंक देने की प्रतिबद्धता के बल पर न सिर्फ बहुत ही कम समय में बीएचईएल व भारत के सर्वोच्च श्रम पुरस्कारों को प्राप्त किया, बल्कि भारत सरकार के बेहद प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार भी प्राप्त किया. अगर आप समझते हैं कि पद्म पुरस्कार चंद रसूख वालों को मिलता है, तो आप गलत हैं. बनवारी लाल चौकसे जैसे लोग इसके अपवाद हैं. वे भारत के चंद सर्वाधिक पुरस्कृत तकनीकज्ञों में से एक हैं.

प्रस्तुत है किताब के कुछ प्रेरणास्पद अनुच्छेद -

मैं वर्ष 1973 में ओमेगा इंडस्ट्री में हेल्पर के रूप में कार्यरत था. इस संस्थान में मेरा कार्य मशीनों की साफ सफाई तथा जाबों को मशीन पर लोड-अनलोड करने वाला था. एक दिन मैं स्टील की प्लेटों को स्टोर से शॉप फ्लोर में ला रहा था. प्लेटें काफी वजनदार होने के कारण मुझे बहुत परेशानी हो रही थी. मेरे इस कार्य को ओमेगा इंडस्ट्रीज के मालिक श्री प्रकाश साहब देख रहे थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि कहाँ रहते हो तथा शिक्षा क्या है? मैं डर गया कि वे मुझे नौकरी से निकाल देंगे. लेकिन उन्होंने प्रेम से कहा कि बेटा इतना कठिन कार्य तुम्हारे बस का नहीं है. तुम भेल में ट्रेनिंग क्यों नहीं कर लेते! मैं तुम्हारी मदद करूंगा. अब मैं पूरी तरह से यह समझने लगा कि वे इस बहाने से अब मुझे काम पर नहीं बुलाएंगे. लेकिन परिणाम उल्टा ही हुआ. उन्होंने अपने अधीनस्थों के माध्यम से मुझे ट्रेनिंग की जानकारी भिजवाई तथा यह भी आश्वासन दिया कि जब तक तुम्हारा प्रशिक्षण के लिए चयन नहीं हो जाता, यहाँ पर काम करते रहो. मैं इस घटना को याद करते हुए यह कहना चाहता हूं कि कठिन परिश्रम से अंजान लोग भी आपकी मदद कर सकते हैं.”

नवम्बर 2000 में मुझे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण के लिए सिंगापुर के अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में आमंत्रित किया गया था. उन दिनों भेल संस्थान की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण कार्पोरेट कार्यालय द्वारा सारे अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम स्थगित कर दिए गये थे.

लेकिन कार्पोरेट प्रबंधन ने मेरी उपलब्धियों तथा पहली बार ऐसे आमंत्रण के लिए मुझे तथा मेरे साथ दो अधिकारियों को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण के लिए भेजा गया था. प्रस्तुति का विषय गुणता सर्किल के नेता के रूप में मेरी उपलब्धियाँ था.

वहां मंच पर मुझसे एक प्रश्न पूछा गया – यदि कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्थान आपको उच्च वेतन पर अपने यहाँ नौकरी प्रदान करे तो आप क्या जाएंगे?

मेरा उत्तर था कि जिस संस्थान एवं राष्ट्र ने मुझे इतने संसाधन उपलब्ध करवाकर आज जिस मंच पर लाकर खड़ा किया है, मैं उस देश तथा अपने उस संस्थान को छोड़ने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोच सकता...”

अपनी किताब के आखिरी हिस्से में वे सफलता के कुछ सूत्र गिनाते हैं –

  • कार्य के प्रति अपनत्व
  • नितांत जिज्ञासु बने रहना
  • पूर्ण विश्वास रखें एवं मनोयोग बनाए रखें
  • गलतियों को छिपाए नहीं और संकोच से बचें
  • स्वयं को असहाय व कमजोर न समझें
  • अहं भाव को त्यागकर परोपकारी बनें
  • समय के महत्व को जानें

---.

श्रमिक से पद्मश्री

आत्मकथा

लेखक : बनवारी लाल चौकसे

प्रकाशक – इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज रोड, भोपाल मप्र 462016

आईएसबीएन नं. 978-81-89107-27-7

पृष्ठ 136, मूल्य – 125/- रु.

यदा कदा हम सभी का सामना रीअल, वास्तविक चीजों से हो जाता है, और हम सन्न खड़े देखते रह जाते हैं. ऐसे ही कुछ वास्तविक चीजों से सामना पिछले दिनों अनायास हो गया. आप भी दर्शन-लाभ लें.

यह है द रीअल कैटल क्लास -

 

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पौराणिक महत्व की, दैव नगरी – उज्जयिनी के रेलवे विश्रामगृह का 30 सितम्बर 09 की रात्रि का चित्र है यह. बताने की जरूरत नहीं कि हम भी शामिल थे रीअल कैटल क्लास में – झाबुआ तक के रात्रिकालीन सफर के दौरान क्षणिक विश्राम की तलाश में :)

 

और, यह हैं  असली मदर मैरी.

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एक और एंगल से नहीं सराहेंगे?

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--

(सभी चित्र – सौजन्य :  रेखा)




हमारी नामी कंपनी 'सो फ्लां' ने एक लिमिटेड एडीशन गाँधी लँगोटी बाजार में पेश किया है. लिमिटेड एडीशन की सिर्फ 3000 लँगोटियाँ तैयार की गई हैं. इन लँगोटियों की ढेरों ख़ासियतें हैं जो इन्हें व इनके खरीदारों और प्रयोगकर्ताओं को विशिष्ट बनाती हैं. पहली खासियत तो ये है  कि इन्हें अति विशिष्ट किस्म के खद्दर से बनाया गया है. वही खद्दर, जो देश के नेताओं को आजादी के पहले और आजादी के बाद बहुत ही मुफीद बैठता आ रहा है अब तक. खद्दर के लिए कच्चा माल खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया के वर्जिन जंगलों से आयातित किया गया है. इसकी रुई प्राकृतिक रूप से उगे पौधों से तैयार की गई है और पूर्णतः जैविक पैदावार है, न कि रासायनिक और कृत्रिम रूप से उगी. इसे खास तौर पर डिजाइन किए गए हीरा मोती माणिक्य मढ़े करघे की सहायता से हाथ से बुना गया है. लँगोटी का डिजाइन प्रसिद्ध फ्रेंच फ़ैशन डिजाइनर 'विव सेंट फोरें' द्वारा रीडिजाइन कर बनाया गया है.
इसके बॉर्डर में विशेष किस्म के प्लेटिनम अलॉय का प्रयोग किया गया है जिससे लँगोटी सुन्दर, आकर्षक तो दिखती ही है, इस्तेमाल में नर्म और मुलायम भी होती है. इसकी ड्यूरेबिलिटी के लिए विशेष ट्रीटमेंट दिया गया है जिससे कि इसका प्रयोग एक बार में लगातार पाँच साल तक एक ही कुर्सी पर बैठकर किया जा सकता है.
गाँधी लँगोटी की एक और महत्वपूर्ण खासियत ये है कि आप नेता हों या अफसर, गाँधी लँगोटी डालकर बेशक भ्रष्टाचार के नए-नए, विशाल कारनामे कर सकते हैं. आपके ऊपर कोई आँच नहीं आएगी. आपने जो गाँधी लँगोटी का कैमोफ्लॉज पहना हुआ होगा. गाँधी लँगोटी आपको हर किस्म के चुनाव में (पूरे भारत में इसकी गारंटी है) जितवाने में सहायक होगा. आप लँगोटी की आड़ में आप चाहे कितने मतदाता खुले आम खरीद सकते हैं – कोई चुनाव आयोग आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा – क्योंकि उसे तो आपकी गाँधी लँगोटी ही दिखाई देगी. गाँधी लँगोटी की ये भी खासियत है कि ये अपने मालिक के लिए अच्छे और मलाईदार पद वाली कुर्सियों की व्यवस्था खुद करेगा.

चूंकि गाँधी लँगोटी को लिमिटेड एडीशन के रूप में सीमित संख्या में जारी किया गया है, अतः इसके मालिक और प्रयोगकर्ता समाज में विशेष इज्जत और मान सम्मान के हकदार होंगे. वे समाज के एलीट क्लास और श्रेष्ठी वर्ग के लोग होंगे जो गाँधी लँगोटी को अफोर्ड कर सकेंगे. जाहिरा तौर पर ऐसे में चंद बड़े नेताओं, उद्योगपतियों और बड़े अफसरों के हाथ में ही गाँधी लँगोटी पहुँच पाएगी. और ऐसे में गाँधी लँगोटी धारकों को हर कहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में माना जाएगा और उनका स्वागत सत्कार किया जाता रहेगा.

इन लँगोटियों की एक बड़ी खासियत यह भी है कि इन्हें सर्वसिद्धि यंत्र के रूप में प्रयोग में लिया जा सकता है. आपका काम कहीं रुक रहा हो, अड़ रहा हो, कहीं फंस रहा हो, बस एक अदद गाँधी लँगोटी की दरकार है आपको. एक अदद गाँधी लँगोटी सामने वाले अफसर/नेता/मंत्री को गिफ़्ट कर दें. गाँधी लँगोटी का असर चौबीस घंटे के भीतर होगा और आपका रुका हुआ काम बन जाएगा. वैसे भी गाँधी लँगोटी को खास इन्हीं कामों को ध्यान  में रख कर डिजाइन किया गया है.

इन लँगोटियों की वैसे तो और भी ढेरों खासियतें हैं जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता और इन्हीं खासियतों के चलते लिमिटेड एडीशन गाँधी लँगोटी बाजार में जारी होते ही सोल्ड आउट हो गई और सुना है कि अब उसकी ब्लैक मार्केटिंग हो रही है. एक शीर्ष के वित्तीय सलाहकार के मुताबिक इन्वेस्टमेंट के लिहाज से भी गाँधी लँगोटी पर निवेश करना एक समझदारी भरा निर्णय होगा. इसीलिए गाँधी लँगोटी चाहे जितनी खरीद सकें खरीद लें.

गाँधी लँगोटी के बाजार से उत्साहित हमारी कंपनी जल्द ही गाँधी लाठी, गाँधी घड़ी, गाँधी खड़ाऊँ, गाँधी धोती के लिमिटेड एडीशन जारी करने जा रही है. इनमें भी एक से बढ़कर एक खासियतें होंगी. अग्रिम बुकिंग चालू है. इससे पहले कि आप पीछे रह जाएँ, गाँधी को लपक लें. गाँधी की लँगोटी ही सही!
---

व्यंज़ल

यहाँ कहीं दिखती नहीं लँगोटियाँ
क्या हमने पहनी भी हैं लँगोटियाँ


यथा राजा तथा प्रजा के तर्ज पर
लोगों ने कब से तज दी लँगोटियाँ


मेरे शहर की सूरत यूँ बदल गई
यहाँ सरे आम धुलती है लँगोटियाँ


वक्त ने सब उलट कर रख दिया
पैंट के ऊपर पहनते हैं लँगोटियाँ


अपने  को छुपाने में लगा है रवि
पहन कर लँगोटियों पे लँगोटियाँ
---
(स्क्रीनशॉट – साभार नई-दुनिया ईपेपर)

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