September 2009

जो लोग इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड से हिन्दी टाइपिंग सीखना चाहते हैं, उनके लिए बाजार में इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड स्टीकर आसानी से नहीं मिलता. जो हिन्दी स्टीकर बाजार में मिलते हैं वो रेमिंगटन (कृतिदेव) के ही होते हैं. इस समस्या के हल के लिए अर्जुन राव चावला ने एक बढ़िया गूगल डॉक बनाया है, जिसमें तेलुगु इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड को छापा जा सकता है. इसका आसान प्रयोग चिट्ठाजगत-गिरगिट के जरिए मैंने किया है जिससे आप हिन्दी इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड स्टीकर छाप  सकते हैं.

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यही नहीं इसके जरिए गिरगिट समर्थित अन्य निम्न भारतीय भाषाओं में भी इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड स्टीकर छापा जा सकता है.

 Bangla, Devanagari, Gujarati, Gurmukhi, Kannada, Malayalam, Oriya, Roman(eng), Tamil, Telugu

स्टीकर छापने के लिए पीछे की ओर गोंद लगे काग़ज़ का प्रयोग करें, या फिर सादे काग़ज़ पर छाप कर फ़ेविकोल इत्यादि से चिपकाएं. ध्यान रहे कि गोंद ज्यादा न लगाएं, अन्यथा आपका कुंजीपट खराब हो सकता है. आप चाहें तो इसे सादे काग़ज़ पर छाप कर अपने कीबोर्ड के बाजू में संदर्भ के लिए रख सकते हैं.

अद्यतन : -

  सुधन्व जोगलेकर ने बताया है कि हिन्दी/मराठी के लिए एक बढ़िया प्रिंट किया जा सकने वाला इमेज फ़ाइल नीचे दिये पते पर उपलब्ध है जिसका प्रिंट आउट लेकर स्टीकर बनाया जा सकता है -

http://aksharyogini.sudhanwa.com/kbdlayout.jpg

sada aachar

वैसे, यूं तो आदमी, आदमी ही होता है. मगर कभी वो कुत्ता, कभी उल्लू, कभी गधा और कभी सूअर बन जाता है. यदा कदा कुछ अतिरेकी मामलों में वो बैल या शेर भी बन जाता है. मगर सड़ा अचार?

आधुनिक, कलियुग में वो सड़ा अचार भी बनने लगा है. यही तो कलियुग की पराकाष्ठा है कि अब आदमी हर काल्पनिक रूप से संभव निम्नतम रूप धारण कर सकता है. वो यह भी बन सकता है, वो वह भी बन सकता है और वो सड़ा अचार भी बन सकता है. खासकर भारत की धरती पर. यहाँ की मिट्टी और पानी में कुछ ऐसी खासियत है कि आदमी देखते देखते, दन्न से सड़ा अचार बन जाता है. एक दिन पहले तक वो पूज्यनीय, आदरणीय होता है, मगर किसी शानदार सुबह को पता चलता है कि अरे! वो तो सड़ा अचार हो गया है! आइए, जरा पड़ताल करें कि आदमी आखिर सड़ा अचार कब और क्यूं बन जाता है.

आदमी अगर बड़ा नेता है तो वो सड़ा अचार तब बन जाता है जब उसका करिश्मा खतम हो जाता है. उसके उठाए मुद्दे वोट खैंचू रूप से प्रभावी नहीं रहते. वो अपने दम पर अपने दल के, अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव नहीं जितवा सकता.

ठीक इसके उलट, आदमी अगर वोटर है, तो वो नेताओं के नजरों में भले ही हर पांचवें साल ऐन चुनावों के वक्त देवता माफ़िक हो, मगर चुनावों के निपटते ही वो सड़ा अचार के माफ़िक हो जाता है जो बिलावजह उनके द्वारा किए गए चुनावी वायदों को पूरा करने करवाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ा रहता है.

आदमी अगर सरकारी अफसर है तो वो सड़ा अचार तब होता है जब वो ईमानदार होता है, रिश्वत नहीं लेता-देता और इस तरह से न तो वो जनता के किसी काम का होता है और न अपने बीवी बच्चों के. वो तो पूरे सिस्टम के लिए सड़ा अचार होता है – जो लेन-देन के चैनल को ब्रेक करता है. और, जाहिर है, ऐसे सड़े अचार अकसर लूप लाइन में पड़े रहते हैं.

कई मामलों में आदमी सड़ा अचार तब हो जाता है जब वो धर्मांधता का चश्मा पहन लेता है – पर फिर यहां बड़ी विडंबना यह होती है कि उसे अपने अलावा दूसरे सभी विधर्मी और सड़े अचार नजर आते हैं.

आदमी अगर बड़ा साहित्यकार है तो वो सड़ा अचार तब हो जाता है जब वो खुद तो लिखना अर्से से बन्द कर चुका होता है, मगर साहित्य की वर्तमान दशा पर, समकालीन साहित्यकारों पर, नवोदित रचनाकारों पर, सुधी पाठकों पर यानी कि सब पर अपनी भड़ास निकालता होता है कि लोग साहित्य का कचरा कर रहे हैं और इस तरह से वो अपने आप को छोड़ बाकी की सारी साहित्यिक जनता को सड़ा अचार बताने पर तुला होता है. कुछ एक्स्ट्रीम केसेज में वो प्रेमचंद और भारतेंदु को भी सड़ा अचार सिद्ध करने में तुल जाता है.

आदमी अगर संपादक है तो वो यकीनन उन तमाम लेखकों की नजर में सड़ा अचार होता है जिन्हें वो संपादक नहीं छापता. और इसके ठीक विपरीत ये लेखक संपादक की नजरों में सड़े अचार होते हैं जो सड़े अचार की माफ़िक घोर अपठनीय-अप्रकाशनीय रचनाओं पर रचनाएँ लिख मारते हैं. वैसे, इसे मरफ़ी के सड़े अचार का नियम कहा जा सकता है और यह सामान्य नियम सर्वत्र, जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है. उदाहरण के लिए, प्रेमी-प्रेमिका विवाह पश्चात् एक दूसरे के लिए सड़े अचार के माफ़िक हो जाते हैं.

बहुत हो ली सड़े अचार की बातें. और इससे पहले कि मुंह का जायक़ा खराब हो और आप इस सड़ियल व्यंग्य को सड़े अचार का विशेषण दे दें, आपके लिए एक सड़ा अचार आई मीन, एक शेर पेशे-नज़र है -

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मेरे देश का सिस्टम कुछ यूँ है यारों

यहाँ आदमी बन गया है सड़ा अचार

machhar kanoon

नए क़ानून के मुताबिक, अब अगर आपके घर में कोई मच्छर दरियाफ़्त किया जाएगा, यदि आप मच्छरों को अपने घरों में प्रश्रय दे रहे होंगे तो आपके ऊपर शुद्ध 500 रुपयों का जुर्माना किया जाएगा. %$#@ बहुत हो गया. मच्छरों से तो अब क़ानून बनाकर ही निपटा जा सकेगा. मेरे नगर की म्यूनिसिपल कमेटी ये क़ानून बना रही है. कल को सारे देश में ये लागू किया जाएगा. इतने बढ़िया क़ानून से देश का कौन सा राज्य, कौन सा शहर और कौन सा गांव अछूता रह सकेगा भला? वो तो इन %#@ अनपढ़ मच्छरों का कसूर है, वरना मच्छरों के लिए क़ानून तो कब का बन चुका होता कि मनुष्यों को काटना मना है और खासकर नेता टाइप को तो कतई नहीं.

वैसे भी सरकारें किसी समस्या से निपटने में अक्षम रहती हैं तो वो नए क़ानून बना डालती हैं. कम से कम सरकारों को कोई दोष तो नहीं दे सकता कि वे अकर्मण्य बैठी रहती हैं. तो नया क़ानून बन गया. जनता को अब चाक चौबन्द चौकन्ना रहना होगा. म्यूनिसिपल कमेटी का कोई दारोगा – डॉग शिट स्क्वॉड किस्म का ही – अब आपके घर पर कभी भी दस्तक दे सकता है. रात को बारह बजे, जब आप अपनी मसहरी में शांति की, चैन की नींद सो रहे होंगे, आपके घर की डोर बैल की चीखती आवाज आपकी नींद तोड़ेगी. आप पाएंगे कि दरवाजे पर म्यूनिसिपल कमेटी का मॉस्किटो स्क्वॉड का इंस्पेक्टर व्यंग्यात्मक मुस्कान लिए खड़ा है. वो दन्न से अंदर घुसता है. आपके बेडरुम में फट से घुसता है. मसहरी देख उसकी मुस्कान और चौड़ी हो जाती है. हो न हो इस घर में मच्छर तो होंगे ही तभी तो ये %$**& मसहरी लगा कर चैन की नींद सो रहा है. वो इधर उधर नजर मारता है. एक मच्छर उसे जल्दी ही नजर आ जाता है. वो फटाक से अपनी पेंट में से चालान की रसीद निकालता है. आपकी मजबूरी है. जुर्माने के पाँच सौ देकर रसीद लीजिए, या मामला आधे में निपटाइए, नहीं तो जेल की हवा खाइए. आपने क़ानून तोड़ा है. आपने अपने घर पर मच्छर को प्रश्रय जो दिया है.

सरकार बड़े बड़े दावे करेगी कि इस क़ानून से ये फ़ायदा हुआ वो फ़ायदा हुआ. जुर्माने से इतने हजार लोगों से उतने लाख वसूले. पर इस क़ानून के बाद भी जब स्थिति नियंत्रण में नहीं आएगी, तो सरकार फिर जागेगी. वो फिर से कड़े कदम उठाएगी. इस क़ानून में कड़े प्रावधान रखेगी. जुर्माना पाँच सौ के बजाए पाँच हजार कर देगी. कैद की न्यूनतम सीमा छः महीने के बजाए साल भर कर देगी. नतीजतन आपको आपके घर रात में बारह बजे घंटी बजाने वाला म्यूनिसिपल कमेटी का मॉस्किटो स्क्वॉड के दारोगा की मुस्कान जरा ज्यादा ही फैली हुई मिलेगी.

आपके झगड़ालू पड़ोसी को आपसे बदला लेने का नया तरीका मिल जाएगा. वो दर्जन भर मच्छर आपके घर छोड़ देगा और म्यूनिसिपल के दारोगा को इत्तिला कर देगा – देखो! इसके घर में एक नहीं, पूरे दर्जन भर मच्छर हैं! वैसे, राज की बात बताऊँ, इस इफ़ेक्टिव आइडिये को आप अपने खड़ूस बॉस के ऊपर प्रभावी तरीके से लागू कर सकते हैं. किसी शाम उनसे मिलने के बहाने चले जाएँ, कुछ चापलूसी मक्खन बाजी कर आएं, और इस बीच डिबिया में साथ लाए मच्छरों को निगाह बचा कर छोड़ दें. दारोगा को पहले से ही टिप दे कर रहें. वो तो आपके बाहर आने का इंतजार खुशी से करता मिलेगा.

वैसे, इस क़ानून से जनता कुछ कमाई भी कर सकती है. आप कछुआ छाप मच्छर भगाओ अगरबत्ती, आलआउट मच्छर भगाओ मशीन तथा मच्छर मार रैकेटों का धंधा चालू कर सकते हैं. इनका स्टाक एकत्र कर इनकी कालाबाजारी कर इनमें अच्छा खासा मुनाफ़ा कमा सकते हैं. इन कंपनियों के शेयरों में निवेश कर सकते हैं, क्योंकि इन कंपनियों का भविष्य मच्छरों के कारण बहुत ही बढ़िया चल रहा है और चलता रहेगा.

अब तो मच्छर मियाँ के कसीदे गाने का समय आ गया है. सरकार के लिए भी, सरकारी कारिंदों के लिए भी, और जनता के लिए भी. क्यों न मच्छर-चरित-मानस का पाठ किया जाए?

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हिन्दी में सर्च करने की बढ़िया सुविधा गूगल में है. परंतु आम प्रयोग के दौरान सर्च विकल्प में पिछले चौबीस घंटों या किसी मामले में पिछले बारह घंटों का सर्च विकल्प ही मौजूद रहता है. सवाल ये है कि ट्विटर की तरह गूगल में भी हिन्दी में रीयल टाइम सर्च कैसे करें.


रीयल टाइम सर्च माने कि पिछले पाँच मिनट के दौरान (या पिछले चालीस सेकण्ड के दौरान,) प्रकाशित हुए हिन्दी पन्नों में किसी खास शब्द से ढूंढना.

एक छोटा सा गूगल हैक है. आप भी आजमाएँ. कुछ मजेदार परिणामों (या शून्य परिणाम,) के लिए तैयार रहें.
नीचे दिए गए स्क्रीनशॉट के अनुसार ब्राउजर के एड्रेस बार में गूगल सर्च स्ट्रिंग भरें. जिस हिन्दी शब्द को खोजना है, उसे ‘है’ के बदले प्रतिस्थापित करें. यहाँ पर qdr:n5 का प्रयोग पिछले पाँच मिनट के दौरान प्रकाशित हिन्दी के नए पन्नों में ‘है’ शब्द को ढूंढने के लिए किया गया है. यदि आप पिछले 25 या 47 मिनट के दौरान खोजबीन करना चाहते हैं तो उसे 5 के बदले 25 या 47 कर दें.


कुछ ब्राउज़रों में सर्च स्ट्रिंग भरने के बाद एंटर करने पर यह कमांड कुछ यूँ दिख सकता है:
http://www.google.com/search?q=%E0%A4%B9%E0%A5%88&hl=hi&output=search&tbs=qdr:n5&tbo=1
(ऊपर दिए गए लिंक को आप क्लिक कर यह गूगल सर्च खोल सकते हैं)
परिणाम कुछ यूं नमूदार होगा –

 (चित्र बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)
यदि आप सेकण्डों के भीतर रीयल टाइम ढूंढना चाहते हैं तो जरा सा परिवर्तन नीचे दिए स्क्रीनशॉट के अनुसार करें.

http://www.google.com/search?q=%E0%A4%B9%E0%A5%88&hl=hi&output=search&tbs=qdr:s59&tbo=1
(ऊपर दिए गए लिंक को क्लिक कर आप यह गूगल सर्च खोल सकते हैं)
यहाँ पर पिछले 59 सेकण्ड में वेब पर प्रकाशित हुए हिन्दी पन्नों में ‘है’ शब्द का खोज का परिणाम दिखाएगा. यहां पर आप देखेंगे कि qdr:n को qdr:s कर दिया गया है. n मिनट के लिए है, s सेकण्ड के लिए है.
ऊपर दिए गए सर्च का परिणाम कुछ यह रहा –

 (चित्र बड़े आकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें)
मजेदार बात ये है कि गूगल हर बार ये बताता है कि यह सुविधा अनुपलब्ध है. फिर भी वो सर्च परिणाम दिखाता है!
हैप्पी सर्चिंग!
 

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आदमी, खूबसूरत औरत के सामने बेबस हो जाता है. ठीक है. तो, वो ज्यादा खूबसूरत औरत के सामने ज्यादा बेबस हो जाता होगा. विश्व सुंदरी के सामने तो वो सर्वाधिक बेबस हो जाता होगा. शायद यही कारण है कि आदमी, सदैव से, चिरंतन काल से औरतों को परदों-प्रतिबंधों में रखता आया है. चाहे वो बुरका हो साड़ी का पल्लू हो या पश्चिमी हैट – औरतों को ढांप कर अपने बेबसपने को एक हद तक ढांपने का, उसे काबू में करने का ये बड़ा बढ़िया तरीका गढ़ लिया था आदमी ने!

वैसे, जनता (माने आदमी हो या औरत) तो गाहे बगाहे बेबस होता ही रहता है. जनता के बेबस होने के दर्जनों, जन्मजात कारण हो सकते हैं. कुछ कारण तो जग जाहिर हैं ही –

  • चुनावों के समय जनता भारी बेबस हो जाती है. हर पार्टी के छोटे-बड़े नेता लोगन बड़े बड़े वादे करने थोक के भाव में जनता के दरबार में चले आते हैं. जनता बेचारी बेबस हो जाती है कि वो इन वादों को कहां रखे, क्या करे, क्या न करे. दरअसल, बेबस जनता के पास इन वादों को संभालने का कोई जरिया नहीं होता है, इसीलिए अकसर ये चुनावी वादे कभी पूरे नहीं हो पाते.

  • भारतीय सड़कों पर चलते समय तमाम विश्व की जनता बेबस हो जाती है. भारत की सिंगल लेन की सड़कों पर भारी भीड़, वाहनों के रेलमपेल, गड्ढों, ट्रैफ़िक जाम के बीच में बैठे गाय गरू और अगल बगल तंबू लगाए ठेले खोमचे वालों के बीच चलते हुए सिर्फ भारतीय जनता है जो बेबस नहीं होती है, पर, इसके उलट, जब खाली, छः आठ लेन की चमचमाती सड़कों पर कभी भूले भटके भारतीय जनता पहुँच जाती है तो बेबस हो कर उसके पैर कांपने लगते हैं, और वो वहीं की वहीं खड़ी रह जाती है.

  • जनता जब सरकारी ऑफिस में जाती है तो बेबस जाती है. वैसे, इस तरह के बेबसपने का इलाज सरकारी अफसर टेबुल के नीचे फीस लेकर तुरत-फुरत कर देते हैं. पर ये इलाज सारी जनता के बूते की बात भी तो नहीं है.

  • जनता बाजार जाती है तो दुकानों में सामानों के भाव सुनकर बेबस हो जाती है.

  • साहित्यकार (चाहें तो सहूलियत के लिए ब्लॉगर पढ़ लें,) जनता एक दूसरे के साहित्य (यहाँ भी सहूलियत के लिए ब्लॉग पढ़ लें,) सृजन को देख देख कर बेबस होती रहती है और इस वजह से उलटे सीधे बयान बाजी करती रहती है – एक दूसरे के लेखन को कूड़ा कचरा बताती रहती है.

अजी अब और क्या गिनाएँ, संख्या बढ़ा कर हमें आपको बेबस करने का ऐसा भी कोई इरादा नहीं है कि आप बेबस होकर कर इधर कभी मुँह न करने की कसम लेकर जाएँ.

व्यंज़ल

फिर तेरी याद आई तो बेबस हो गया

आज तो अकारण यूं ही बेबस हो गया


किसी ने आज फिर रची है प्रेम कविता

यारों देखो तो फिर कोई बेबस हो गया


दिमाग तो हमने रख रखे थे काबू में

क्या बताएँ अपना दिल बेबस हो गया


मुद्दत से इंतजार था मौसम बदलने का

जो बहार आई तो बस बेबस हो गया


बातें तो बहुत की थी जेहाद की रवि ने

हथियार पकड़ते ही वो बेबस हो गया

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व्यंज़ल

कैसे बताएँ किस किस का फिर गया है दिमाग

यकीनन मेरा या फिर तेरा फिर गया है दिमाग


वो लोग जो बातें करते हैं समाज में क्रांति की

जानते नहीं कि उनका तो फिर गया है दिमाग


जो देखते हैं सपने खाने में दाल और चीनी की

इतना तो तय है कि उनका फिर गया है दिमाग


मुहब्बत में तरजीह न दी नून तेल लकड़ी को

मुझे मालूम है कि मेरा तो फिर गया है दिमाग


मंदिरों मस्जिदों की भीड़ में भी बेधर्मी है रवि

उसे गुमान नहीं कि उसका फिर गया है दिमाग

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