वैसे, यूं तो आदमी, आदमी ही होता है. मगर कभी वो कुत्ता, कभी उल्लू, कभी गधा और कभी सूअर बन जाता है. यदा कदा कुछ अतिरेकी मामलों में वो बैल या शेर भी बन जाता है. मगर सड़ा अचार?
आधुनिक, कलियुग में वो सड़ा अचार भी बनने लगा है. यही तो कलियुग की पराकाष्ठा है कि अब आदमी हर काल्पनिक रूप से संभव निम्नतम रूप धारण कर सकता है. वो यह भी बन सकता है, वो वह भी बन सकता है और वो सड़ा अचार भी बन सकता है. खासकर भारत की धरती पर. यहाँ की मिट्टी और पानी में कुछ ऐसी खासियत है कि आदमी देखते देखते, दन्न से सड़ा अचार बन जाता है. एक दिन पहले तक वो पूज्यनीय, आदरणीय होता है, मगर किसी शानदार सुबह को पता चलता है कि अरे! वो तो सड़ा अचार हो गया है! आइए, जरा पड़ताल करें कि आदमी आखिर सड़ा अचार कब और क्यूं बन जाता है.
आदमी अगर बड़ा नेता है तो वो सड़ा अचार तब बन जाता है जब उसका करिश्मा खतम हो जाता है. उसके उठाए मुद्दे वोट खैंचू रूप से प्रभावी नहीं रहते. वो अपने दम पर अपने दल के, अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव नहीं जितवा सकता.
ठीक इसके उलट, आदमी अगर वोटर है, तो वो नेताओं के नजरों में भले ही हर पांचवें साल ऐन चुनावों के वक्त देवता माफ़िक हो, मगर चुनावों के निपटते ही वो सड़ा अचार के माफ़िक हो जाता है जो बिलावजह उनके द्वारा किए गए चुनावी वायदों को पूरा करने करवाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ा रहता है.
आदमी अगर सरकारी अफसर है तो वो सड़ा अचार तब होता है जब वो ईमानदार होता है, रिश्वत नहीं लेता-देता और इस तरह से न तो वो जनता के किसी काम का होता है और न अपने बीवी बच्चों के. वो तो पूरे सिस्टम के लिए सड़ा अचार होता है – जो लेन-देन के चैनल को ब्रेक करता है. और, जाहिर है, ऐसे सड़े अचार अकसर लूप लाइन में पड़े रहते हैं.
कई मामलों में आदमी सड़ा अचार तब हो जाता है जब वो धर्मांधता का चश्मा पहन लेता है – पर फिर यहां बड़ी विडंबना यह होती है कि उसे अपने अलावा दूसरे सभी विधर्मी और सड़े अचार नजर आते हैं.
आदमी अगर बड़ा साहित्यकार है तो वो सड़ा अचार तब हो जाता है जब वो खुद तो लिखना अर्से से बन्द कर चुका होता है, मगर साहित्य की वर्तमान दशा पर, समकालीन साहित्यकारों पर, नवोदित रचनाकारों पर, सुधी पाठकों पर यानी कि सब पर अपनी भड़ास निकालता होता है कि लोग साहित्य का कचरा कर रहे हैं और इस तरह से वो अपने आप को छोड़ बाकी की सारी साहित्यिक जनता को सड़ा अचार बताने पर तुला होता है. कुछ एक्स्ट्रीम केसेज में वो प्रेमचंद और भारतेंदु को भी सड़ा अचार सिद्ध करने में तुल जाता है.
आदमी अगर संपादक है तो वो यकीनन उन तमाम लेखकों की नजर में सड़ा अचार होता है जिन्हें वो संपादक नहीं छापता. और इसके ठीक विपरीत ये लेखक संपादक की नजरों में सड़े अचार होते हैं जो सड़े अचार की माफ़िक घोर अपठनीय-अप्रकाशनीय रचनाओं पर रचनाएँ लिख मारते हैं. वैसे, इसे मरफ़ी के सड़े अचार का नियम कहा जा सकता है और यह सामान्य नियम सर्वत्र, जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है. उदाहरण के लिए, प्रेमी-प्रेमिका विवाह पश्चात् एक दूसरे के लिए सड़े अचार के माफ़िक हो जाते हैं.
बहुत हो ली सड़े अचार की बातें. और इससे पहले कि मुंह का जायक़ा खराब हो और आप इस सड़ियल व्यंग्य को सड़े अचार का विशेषण दे दें, आपके लिए एक सड़ा अचार आई मीन, एक शेर पेशे-नज़र है -
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मेरे देश का सिस्टम कुछ यूँ है यारों
यहाँ आदमी बन गया है सड़ा अचार