July 2009

everything

वैसे तो आपके कम्प्यूटर पर हजारों लाखों की तादाद में जमा हिन्दी सामग्री व हिन्दी नामधारी फ़ाइलों को खोज-बीन कर ढूंढ निकालने के लिए बहुत से विकल्प हैं – जैसे कि गूगल डेस्कटॉप सर्च (तेज तो है, पर यह विंडोज पर बहुत बड़ा फोल्डर बना देता है) तथा विंडोज डेस्कटॉप सर्च (हिन्दी सामग्री ढूंढने के लिए बेहतर, परंतु हिन्दी नामधारी फ़ाइलों को ढूंढने  के लिए प्रयोग में कठिन, धीमा) इत्यादि.

पर, ये उतने त्वरित, तत्क्षण परिणाम नहीं दे पाते जितना एवरीथिंग देता है. ऊपर से यह सिस्टम पर कोई खास लोड नहीं डालता. इसकी संस्थापना फ़ाइल (आप चाहें तो इसका पोर्टेबल संस्करण इसे संस्थापित किए बगैर प्रयोग कर सकते हैं) मात्र 334 किबा है.

फ्रीवेयर प्रोग्राम एवरीथिंक का प्रयोग मैं अरसे से करता आ रहा हूं और डेस्कटॉप की फ़ाइलों को त्वरित ढूंढ निकालने में इसका कोई सानी नहीं है. आप जैसे जैसे टाइप करते जाते हैं, वैसे वैसे आपके सामने सर्च को रिफाइन करता हुआ परिणाम डायनामिक रूप से आपके सामने रखता है.

एवरीथिंग के नए संस्करण में अब हिन्दी में सर्च की सुविधा भी समाहित हो गई है. मैंने इसके सर्च विंडो पर कहानी शब्द युक्त फ़ाइलों को ढूंढने के लिए लिखना शुरू ही किया था और बस इतना ही लिखा था – ‘कहा’ और इसने कोई 401 फ़ाइलों को 1 सेकण्ड के भीतर ही ढूंढ निकाला.

 

everything kahani

एवरीथिंग यहाँ - http://www.voidtools.com/ से डाउनलोड करें.

लिनक्स पॉकेट गाइड को हिन्दी में अब आप पूरा का पूरा यहीं ई-पेपर पर पढ़ सकते हैं या फिर पूरी पीडीएफ़ ई-बुक डाउनलोड कर सकते हैं वह भी बिलकुल मुफ़्त. इसका प्रिंट संस्करण किताब के रूप में चाहिए तो पोथी.कॉम पर ऑर्डर कर सकते हैं.
 
आप चाहें तो इसे मुफ़्त में स्काईड्राइव से यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं
वैकल्पिक डाउनलोड लिंक आर्काइव.ऑर्ग का यह है -

http://archive.org/download/LinuxPocketGuideInHindi/LinuxPocketGuideInHindi.pdf
 
या फिर ईपेपर पर आप नीचे यहीं पर पढ़ें. ध्यान दें कि किताब 6 मेबा की है, जिससे इसे लोड होने में थोड़ा समय लग सकता है.

टीप : किताब को पूरे स्क्रीन पर बड़े आकार में बड़े फ़ॉन्ट साइज में पढ़ने के लिए इसके ऊपरी दाएँ कोने पर फुल स्क्रीन टॉगल बटन पर क्लिक करें.

 clip_image002

10 हजार वाट के साउन्ड सिस्टम, जिसके कि कई पोंगे बेदर्दी से फट चुके हैं पर पड़ोस में 72 घंटे का अखंड भगवन्नाम का पाठ चल रहा है. ग्रहण के दुष्प्रभावों को आदमजात से दूर करने के लिए, विश्व शांति के लिए, अच्छी बारिश के लिए, और न जाने क्या क्या – इन सबके लिए अखंड पाठ. पर लगता है कि ये पाठ सिर्फ पाठ नहीं है, ईश्वर को चेताने के लिए है – भइये, देखो हम पाठ कर रहे हैं – 10 हजार वाट का साउन्ड सिस्टम लगाया है. अक्खा शहर पर हमरी आवाज गूंज रही है. तुम तक तो जाएगी ही. अनदेखा करने की, बहरे बनने की कोशिश न कीजो!

भक्तों की बारंबार, एक ही टोन और एक सी आवाज में हरे राम! हरे कृष्ण!! भजती आवाज जब दिमाग को कंझाने लगी (सोचो, भगवान कितना बोर होता होगा, या अब तक वो किस हद तक बोर हो चुका होगा) तो सोचा चलो कुछ टीवी देखा जाए. हाई वॉल्यूम में टीवी ऑन किया. बाहर से आ रही हरे राम! हरे कृष्ण!! से थोड़ी देर के लिए मुक्ति मिली. चैनल पर चल रहा था – राखी सावंत का स्वयंवर.

पांचेक मिनट ये ड्रामा देखा. राखी सावंत का आधुनिक स्वयंवर. और मेरे मन में बेसाख्ता निकला - हरे राम! हरे कृष्ण!! ये भी कोई सीरियल है? ये भी कोई स्वयंवर है? हरे राम! हरे कृष्ण!!

मैंने चैनल आगे बदला. इंडिया टीवी में ग्रहण के दुष्प्रभाव पर बचने के टोटके दिखाए जा रहे थे. हरे राम! हरे कृष्ण!! चैनल बेचने के लिए, टीआरपी हासिल करने के लिए जनता को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है! हरे राम! हरे कृष्ण!! अगले दूसरे न्यूज चैनल में मायावती वर्सेस मायावती चल रहा था. इज्जत उतारने के बदले पुरस्कार देने दिलाने की बातें कही जा रही थीं! घोर कलजुग आ गया है! हरे राम! हरे कृष्ण!!

रिमोट फेंक कर सोचा कि चलो दिमाग को कहीं और लगाया जाए. अख़बार उठाया. उसकी पहली हेडिंग पर निगाह गई – ऑस्ट्रेलिया में 3 और भारतीयों पर नस्लीय हमले. मुम्बई-पुणे के जातीय-और-क्षेत्रीय हमलों के परिवर्तित रूप ऑस्ट्रेलिया भी पहुँच गए! राम! राम!! कृष्ण! कृष्ण!!

तंग होकर कम्प्यूटर खोला, ब्लॉगों पर निगाह जमाई. शायद इधर शांति मिले. पर टॉप हिट्स पर सच का सामना नामक पोस्ट मुँह चिढ़ा रहा था, जिसके हर पैरे, हर वाक्य को पढ़ के मुँह से निकल रहा था – हरे राम! राम राम!! कृष्ण! कृष्ण!!

कंप्यूटर का प्लग खींचा, माउस फेंका. और आँख बंद कर ली. पड़ोस में अखंड पाठ बदस्तूर जारी था – हरे राम! हरे कृष्ण! हरे! हरे!¡! अंतत: मेरा दिमाग भी उसमें सिंक्रोनाइज हो गया – हरे राम…

यदि आप इंटरनेट से कुछ न कुछ डाउनलोड करते रहते हैं तो ऐसे में डाउनलोड प्रबंधक आपके लिए बेहद काम के रहते हैं क्योंकि ये न सिर्फ आपके डाउनलोड गति को बढ़ाते हैं, बल्कि डाउनलोड में त्रुटियों को भी नहीं होने देते और यदि डाउनलोड बीच में ब्रेक हो जाता है तो आपको शुरू से डाउनलोड नहीं करना होता, बल्कि बाकी बचे हिस्से को डाउनलोड कर फ़ाइल काम में ले सकते हैं.

 

ऐसा ही एक उन्नत किस्म का डाउनलोड प्रबंधक है डाउनलोड एस्सेलरेटर. अब यह हिन्दी में भी उपलब्ध है. देखें कुछ स्क्रीनशॉट्स -

dap hindi 1

प्रोग्राम सेटअप के समय हिन्दी भाषा का विकल्प चुनें.

 clip_image002

 

अनुवाद की भाषा थोड़ी भोथरी है, मगर ये ऑनलाइन, स्वयंसेवकों द्वारा विकि-आधारित पृष्ठ पर की गई है. अत: गलतियों को नजरअंदाज कर प्रयास को सराहें. और यदि हो सके तो अनुवाद की साफ सफाई में सहयोग दें.

 

डाउनलोड एस्सेलरेटर हिन्दी यहाँ - http://download.speedbit.com/dap92_bros.exe से डाउनलोड करें.

मैं अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। तब इंटरनेट नहीं था, ईमेल नहीं था (और न ही पॉर्न साइटें थीं)। आज के शोध छात्रों के विपरीत, मुझे अपनी परियोजना फ़ाइलों को पूरा करने के लिए विद्यालय के ग्रंथालय तक नित्य दौड़ लगानी होती थी, सैकड़ों भारी भरकम पुस्तकों को उठापटक कर हजारों पृष्ठों में से मसाला खोजना होता था, टीप लिख-लिख कर रखना होता था, अपने प्रोफ़ेसर के साथ घंटों बैठकर दिमाग खपाकर प्रत्येक महत्वपूर्ण बात को दुबारा-तिबारा ढूंढ ढांढ कर लिखना होता था।

तब अगर आज की तरह मेरे पास इंटरनेट होता तो मुझे कहीं जाने की जरूरत ही नहीं होती। मैं अपने शोध विषय के कुछ शब्दों को लेकर गूगल पर कुछ खोजबीन करता और कम्प्यूटर तंत्र की सबसे बढ़िया ईजाद - ‘नक़ल कर चिपका कर’ यानी कि कॉपी/पेस्ट के जरिए देखते ही देखते मेरा बेहतरीन, तथ्यपरक, मौलिक शोध ग्रंथ तैयार हो जाता। किसी तरह की कोई झंझट नहीं होती। आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास इंटरनेट है। गूगल है।

आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास गूगल है।

मैं किसी सूरत अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। पुराने दिनों में चिट्ठियों को बड़े ही सोचविचार कर लिखना होता था, दो चार बार तो उन्हें पढ़ना होता था और फिर आवश्यक बदलाव कर, डाकटिकट चिपकाकर उन्हें पोस्ट करना होता था। क्या पता किसी चिट्ठी में गलत भाषा या कुछ गलत लिख लिखा गया हो और सामने वाले को समस्या हो जाए? डाक के डब्बे के मुँह पर डालते समय भी अगर मुझे कुछ याद आता था तो वह पत्र फाड़ कर नए सिरे से फिर से अच्छी भाषा में अच्छी बात लिख कर चिट्ठी भेजता था। कई ख़तों से इत्र की खुशबु आती थीं जो सामने वाले अपना अभिन्न समझ कर पत्र में खुशबू लगाकर मुझे भेजते थे, परंतु उन्हें यह नहीं पता होता था कि मुझे हर किस्म के इत्र से एलर्जी है। मैं पत्रों के जरिए फैलने वाले एंथ्रेक्स किस्म के वायरस जन्य बीमारियों तथा बढ़ते आतंकवाद के चलते पार्सल बम के फोबिये से भी ग्रसित था। धन्य है इंटरनेट। इसने मेरी सारी समस्या का समाधान कर दिया है।

अब तो मुझे अपना पत्र लिखने और पत्र का प्रत्युत्तर देने के लिए लिफ़ाफ़े और डाकटिकट तो क्या, सोचने की जरूरत ही नहीं होती। अब मैं अपने कम्प्यूटर के ईमेल क्लाएंट पर ‘जवाब भेजें’ बटन को क्लिक करता हूँ, एसएमएस जैसी संक्षिप्त किस्म की नई, व्याकरण-वर्तनी रहित, स्माइली संकेतों युक्त भाषा में संदेशों को लिखता हूँ, और ‘भेजें’ बटन को क्लिक कर देता हूँ। मेरा ईपत्र दन्न से सामने वाले के कम्प्यूटर पर हाजिर हो जाता है।

वैसे भी, स्पैमों की मार से मर चुके ‘बेचारे’ सामने वाले के पास आपके ईपत्र की भाषा और वर्तनी के बारे में सोचने का वक्त ही कहाँ होता है! वह आपके ईपत्र को पढ़ ले यही आपके लिए बहुत है। पहले मैं पत्र लिखने में कोताही करता था। तमाम झंझटें थीं। पत्र लिखो, सुधारो, लिफ़ाफ़े में डालो, चिपकाओ, टिकट चिपकाओ, लाल डिब्बे में डालो। अब ईपत्र तो मुफ़्त में उपलब्ध है बिना झंझट। लिहाजा हर संभव ईपत्र को अपने सभी जानने वालों को अग्रेषित करता रहता हूँ। मेरे इस काम में कुछ वायरस भी मेरा हाथ बटाते हैं जो मेरे नाम से कई परिचितों-अपरिचितों को अपनी ही प्रतिकृति युक्त ईपत्र भेजते रहते हैं।

अहा! इंटरनेट। जीवन आज से पहले इतना आसान कभी नहीं था। पहले मुझे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के यहाँ उनसे मिलने - जुलने - बोलने - बताने - खेलने - गपियाने हेतु आवश्यक रूप से जाना होता था। कितना कष्टप्रद होता था भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़कों पर से गुजर कर अपने अनन्य के पास जाना। उन तक पहुँचते-पहुँचते सारा उत्साह ठंडा हो जाता था और मन में अपराध बोध-सा आ जाता था कि ऐ अनन्य मित्र हमने तेरी खातिर कितने कष्ट सहे! परंतु अब तो मुझे सिर्फ इंटरनेट से जुड़ा एक अदद कम्प्यूटर और एक वेबकैम चाहिये बस। अब मैं अपने ही कयूबिकल से ही विश्व के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति से रूबरू बात कर सकता हूँ, उसके साथ रूबरू शतरंज खेल सकता हूँ और अगर सामने वाला दोस्त राज़ी हो तो कुछ दोस्ती यारी और प्यार रोमांस की भी बातें कर सकता हूँ - और यह सारा कुछ अपने कम्प्यूटर के कुंजीपट से! मैं एक साथ, चैट और मैसेंजर के जरिए दर्जनों लोगों से, दर्जन भर अलग अलग विषय पर, जो दर्जन भर अलग अलग जगह से होते हैं, एक ही समय में एक साथ बात कर सकता हूँ। और देश-काल-भाषा-संस्कृति और समय की सीमा से परे बातें करते रह सकता हूँ।

मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ।

यहाँ तक कि मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ। जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठकर आराम से चाय के घूँट सुड़कता हुआ चैट के जरिए लोगों से बातें कर सकता हूँ तो फिर इसके लिए उनके पास जाकर बात करने की आवश्यकता ही क्या है? इसी तरह से अब जब मैं अपने घर से इंटरनेट के जरिए पिज्जा हट से घर पर ही पिज्जा मंगवा सकता हूँ - तो क्या मैं बेवकूफ हूं जो इसे खरीदने के लिए चार मोहल्ला पार कर भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़क पार कर पिज्जा खरीदने पिज्जा हट जाऊँ? हट!

इंटरनेट उपयोक्ता के रूप में मैं अपने आपको एलीट श्रेणी यानी कि - उस श्रेष्ठी वर्ग में गिनता हूँ - जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। विश्व में अब दो ही किस्म के लोग हैं - एक जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे जो इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं। प्रगतिशील, समृद्ध, श्रेष्ठी वर्ग इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। गरीब फ़ूहड़ इंटरनेट इस्तेमाल नहीं करता है। इंटरनेट के जरिए मेरे कम्प्यूटर स्क्रीन पर तमाम विश्व की ताज़ा जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं और विश्व के ताज़ा समाचार मेरी उंगलियों पर रहते हैं। अपने कुंजीपट के कुछ कुंजियों को दबाने की देर होती है बस। धन्यवाद इंटरनेट।

इंटरनेट के जरिए जब आप सही में वैश्विक हो जाते हैं, तो फिर आपको ये छोटे मोटे बेकार के घरेलू या आसपड़ोस की घटनाओं से क्या लेना देना। इज़राइल की गाज़ा पट्टी पर ताज़ा हमले और ओसामा के नए वक्तव्य के समाचार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं बजाए इस समाचार के कि पड़ोस के सूने मकान में पिछली देर रात तब चोरी हो गई जब मैं चैट में व्यस्त था। वैसे, कुछ खटपट की आवाजें मैंने भी सुनी थीं, परंतु उससे मुझे क्या - भई, यह तो स्थानीय पुलिस का काम है खोजबीन करे और चोरों को पकड़े। और, वैसे भी, मुझे तो अपने पसंदीदा चिट्ठों को पढ़ना था, ढेरों ईपत्रों का जवाब देना था और कुछ चिट्ठों पर टिप्पणियाँ करनी थीं - कुछ चिट्ठाकार टिप्पणियाँ नहीं करने से नाराज से चल रहे दीखते हैं।

इंटरनेट ने लाखों लोगों को लाखों तरीकों से रोजगार दिया हुआ है। अगर इंटरनेट नहीं होता तो सैकड़ों फ़िशर्स, स्पैमर्स, वायरस लेखक तो भूखे ही मर जाते। हैकरों और क्रैकरों का क्या होता। पॉर्न इंडस्ट्री कहां जाती? इंटरनेट - तेरा भला हो, तूने आधी दुनिया को भूखे मरने से बचा लिया। अगर हैकर्स और क्रैकर्स नहीं होते तो दुनिया में पायरेसी कहाँ होती और पायरेसी नहीं होती तो दुनिया में कम्प्यूटर और इंटरनेट का नामलेवा भी नहीं होता - यह मात्र अभिजात्य वर्ग की रखैल माफ़िक बन रहती। धन्यवाद इंटरनेट। तमाम तरह के कीज़ेन व क्रेक के जरिए मेरे कम्प्यूटर में लाखों रुपयों के सॉफ़्टवेयर संस्थापित हैं - भले ही उनकी आवश्यकता मुझे हो या न हो - मैं और मेरा कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के मामले में अमीर तो हैं ही! अगर इंटरनेट नहीं होता तो मैं विश्व के बहुत से महान सॉफ़्टवेयर जिनमें ऑडियो वीडियो सीडी नक़ल करने के औजार व कम्प्यूटर खेल इत्यादि भी सम्मिलित हैं, का इस्तेमाल ही नहीं कर पाता।

इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है।

इंटरनेट ने दुनिया को मनोरंजन युक्त जानकारियों का नया, नायाब माध्यम दिया है। हजारों लाखों पॉर्न साइटों के जरिए आप चीन और चिली की सभ्यता के प्रेम-प्यार के आचार-व्यवहार-बर्ताव का बढ़िया और बारीकी से अध्ययन कर सकते हैं। इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है। आप इंटरनेट से हर चीज मुफ़्त में पा सकते हैं - एमपी3 से लेकर वीडियो तक। और यदि कोई चीज मुफ़्त नहीं मिल रही हो तो उसे मुफ़्त करने का क्रैक चुटकियों में पा सकते हैं। इंटरनेट इज़ अ ग्रेट लेवलर।


ले दे कर अभी तीन-चार साल ही हुए हैं मुझे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए और मैं तो इसके पीछे पागल हो रहा हूँ। मैं भोजन के बगैर कुछ दिनों तक जी लूंगा, पानी के बगैर कुछ घंटों जी लूंगा, शायद हवा के बिना भी कुछ मिनट टिक जाउं। परंतु इंटरनेट के बगैर, एक पल भी नहीं! इंटरनेट तो अब मेरी मूलभूत आवश्यकता में शामिल हो गया है। भोजन, पानी और हवा की सूची में पहले पहल अब इंटरनेट का नाम आता है।

और आप चाहते हैं कि मैं कहूँ - इंटरनेट बुराइयों की जड़ है? माफ़ कीजिएगा महोदय, मेरे विचार आपसे मेल नहीं खाते। बिलकुल मेल नहीं खाते!

---

(निरंतर [वर्तमान में उपलब्ध नहीं,] पर नवंबर 06 में पूर्व प्रकाशित)

इंटरनेट पर हिन्दी अपने पैर जहाँ तहाँ पसार रही है. इसका एक अच्छा उदाहरण है बहुभाषी पोर्टल बाब.ला. इसमें हिन्दी अनुवाद, शब्दकोश इत्यादि दिए गए हैं. आइए, हिन्दी शब्द अच्छा की जांच परख यहाँ करें -

babla

वाह!, ये तो वाकई इम्प्रेसिव है!

बाब.ला में शब्द आधारित ऑनलाइन  गेम्स जैसे कि हैंगमेन, उलट-पुलट, स्मरण इत्यादि अन्य भाषाओं में तो हैं, परंतु हिन्दी में नहीं हैं. उम्मीद करें कि ये शीघ्र ही उपलब्ध होंगे. बाब.ला की सूचना मुझे मेनका के  ईमेल से मिली. आप भी जायजा लें -

मेरा नाम मेनका है और मैं bab.la (http://bab.la) में काम करती हूँ.  यह एक इंटरैक्टिव भाषा पोर्टल है. मैं हाल ही में आपके वेबसाईट से गुजरी और मुझे आपके लेखकों के लेखन दिलचस्प लगे.
bab.la एक इंटरैक्टिव भाषा पोर्टल है  जो मुफ्त में ऑनलाइन शब्दकोश, शब्द संग्रहों में पाठ, परीक्षा, खेल और वाद सभा दिलवाती है. यहाँ १५ भाषाओं में शब्दकोश हैं. इनमें हज़ारों बोलचाल में इस्तेमाल किए जानेवाले शब्द और हर विषय में उपयोग होनेवाले विशेष शब्द संग्रहित है. bab.la का उपयोग करनेवाले अपनी ही उल्थाएं जोड सकते हैं, परीक्षाएं बना सकते है, और स्वयं ही अपने शब्द संग्रह की पाठ बना सकते हैं और अपने मित्रों को भेज सकते हैं.
हमारा मानना है कि bab.la  आपके श्रोताओं के लिए उपयोगी रहेगा. आप आपके ब्लॅग पर हमारा विजेट भी लगा सकते है. यह आप हमारे वेबसाईट से आसानी से डाऊनलोड कर सकते हैं.
आप या तो हमारे वेबसाईट का लिंक डाल सकते है,
http://bab.la/ . या फिर सीधे शब्दकोश का ही लिंक डाल सकते हैं, http://en.bab.la/dictionary/english-hindi/
अगर आपको हमारे वेबसाईट के बारे में कोई भी शंका हो तो मुझे संपर्क करें.
धन्यवाद.
निंदापूर्ण
मेनका

ये निंदापूर्ण क्या होता है? अभिवादन का कोई नया तरीका है ये? लगता है बाब.ला में ढूंढना पड़ेगा.

clip_image002

एचपी / कॉम्पैक का लोगो कितना सुंदर और प्यारा सा है – एचपी-टोटल केयर. परंतु काम सीधे इसके उलट है. टोटल फेलुअर. इसलिए, दोस्तों एचपी कॉम्पैक का लैपटॉप/नोटबुक भूलकर भी न खरीदें. विवरण आगे देता हूं कि क्यों:-

मेरे v3000 सीरीज के कॉम्पैक नोटबुक में शुरू से ही समस्या बनी रही थी. यह धुंआधार गर्म होता था, यदा कदा डिस्प्ले नहीं आता था, वायरलेस नेटवर्क कार्ड में गड़बड़ी थी, डीवीडी रेकॉर्डर खराब हो गया था इत्यादि... 4-5 बार रिपेयर होने के बाद भी उसके वायरलेस ने पूरा काम करना बंद कर दिया था. मेरी 12 महीने की वारंटी खत्म हो गई थी तो मैं मरता क्या न करता, यूएसबी वायरलेस नेटवर्क कार्ड अतिरिक्त 1200 रुपए खर्च कर ले आया. मुझे लगा था कि ये सिर्फ मेरे ही कम्प्यूटर में है. परंतु नहीं. ये समस्या बहुत से, हजारों-लाखों एचपी/कॉम्पैक नोटबुक/लैपटॉप में है. हजारों परेशान ग्राहकों ने तमाम फोरमों में इसका जिक्र किया है. भारत की कम्प्यूटर तकनालाजी की पत्रिका डिजिट ने इस विषय पर मई-जून-जुलाई 2009 में पिछले तीन महीनों में लगातार फॉलोअप किया है और सैकड़ों परेशान उपभोक्ताओं की समस्याओं को सामने रखा है. इन समस्याओं के मद्देनजर एचपी / कॉम्पैक ने अपने लैपटॉप/नेटबुक कम्प्यूटरों के लिए 24 महीने की विस्तारित वारंटी दी है. जबकि उन्हें ऐसे डिफेक्टिव कम्प्यूटरों को रीकाल कर मुफ़्त में बदल देना चाहिए था. डिजिट में यह भी अपुष्ट हवाला दिया गया है कि एचपी ने माना है कि ये लैपटॉप/नोटबुक गर्म स्थानों – जैसे कि भारत में – चलाने के उपयुक्त ही नहीं थे!

अभी हाल ही में एक प्रेजेन्टेशन के दौरान मेरा लैपटॉप फिर से उसी समस्या से ग्रस्त हो गया – डिस्प्ले की खराबी. ऐन प्रेजेन्टेशन के दौरान इसका डिस्प्ले बंद हो गया. सोचिए, ऐसे समय जब आप बड़ी मेहनत से अपना प्रेजेन्टेशन बनाकर ले जाते हैं और आपका सिस्टम चालू होने से इनकार कर दे. इस तरह की समस्याओं से हजारों खरीदार पहले ही भुगत रहे हैं. एचपी / कॉम्पैक का सर्विस भी बेहद खराब है. जरा सी समस्या को हल करने के लिए एक से दो सप्ताह का समय लेना आम बात है.

आप मेरे जैसे सैकड़ों बेवकूफ़ (और क्या कहें, गाढ़े पसीने की कमाई 35 हजार खर्च करने के बाद कचरा कचरा खरीद लाए,) खरीदारों के क्रंदन आप निम्न कड़ियों पर देख सकते हैं –

http://www.consumercomplaints.in//complaints/hp-compaq-presario-v3000-342av-c112099.html

http://h30434.www3.hp.com/psg/board/message?board.id=Display&thread.id=395&view=by_date_ascending&page=1

http://h30434.www3.hp.com/psg/board/message?board.id=Display&thread.id=395

http://www.techenclave.com/laptops/compaq-pressario-v3000-series-free-extended-117889.html

http://h10025.www1.hp.com/ewfrf/wc/document?lc=en&dlc=en&cc=in&docname=c01296338 (एचपी की आधिकारिक स्वीकृति)

Linux pocket guide in Hindi
जब हिन्दी ब्लॉगिंग की कट-पेस्ट किताब छप कर आई तो विचार आया कि क्यों न इसी स्टाइल में हिन्दी लिनक्स सिखाने की किताब लिख दी जाए. वैसे भी लिनक्स संबंधी बहुत से ट्यूटोरियल पहले भी लिख मारे थे और जाल जगत के लिनक्स प्रेमी गीकअंकुर गुप्ता ने भी बहुत से टिप्स व ट्रिक्स हिन्दी में ही लिख मारे थे. आलोक ने तो लिनक्स परिचय का पूरा का पूरा अनुवाद का बीड़ा एक समय हाथ में लिया था. तो कुछ शुरूआती सामग्री हाथ में तो थी ही. आलोक की अनुवादित सामग्री जीपीएल में थी, और अंकुर ने अपने ब्लॉग की सामग्री के इस्तेमाल की सहर्ष अनुमति दे दी. आलोक व अंकुर का विशेष आभार.
इस विचार को बूस्ट-अप किया राजेश रंजन ने जिन्होंने पहले ही हिन्दी कम्प्यूटिंग पर एक बढ़िया किताब लिख डाला है, और उसे अभी वे परिमार्जित कर रहे हैं. यह किताब भी कुछ ही समय में आपके सामने उपलब्ध होगी.
तो इस तरह लिनक्स सिखाने की हिन्दी गाइड तैयार हो गई. किताब को बिगिनर्स – नए सीखने वालों के लिहाज से लिखा गया है, चित्रमय है और स्टेप-बाई स्टेप विधियाँ दी गई हैं. लिनक्स टिप्स व ट्रिक्स भी है, तो अति संक्षिप्त लिनक्स मैनुअल भी. यदि किसी को लिनक्स सीखना हो भले ही वो अंग्रेज़ी भाषा समझता हो, यदि हिन्दी समझता है तो इसकी अनुशंसा उसे अवश्य करें – सरलता से सिखाने के मामले में यह डमीज और ईडियट सीरीज से भी बेहतर है.

इस किताब को आप पोथी.कॉम से यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं. इस किताब का प्रीव्यू आप यहाँ देख सकते हैं.
पोथी.कॉंम से मेरी दो किताबें पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं. जिन्हें आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं.

हिन्दी लिनक्स पॉकेट गाइड ई-बुक अब आप यहां से मुफ़्त में ई-पेपर पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ़ ईबुक मुफ़्त में डाउनलोड कर सकते हैं.

 

 image

इससे जोरदार, इससे शानदार और इससे नया-नायाब विचार और क्या हो सकता है भला? न रहेगा बांस न बनेगी बांसुरी और न फिर कोई इसे बजा पाएगा! भ्रष्टाचार रोकने के लिए बिना जेब की पतलून पहन कर काम पर आने का आदेश दिया गया है. बात भले ही नेपाल की हो रही हो, पर किसी दिन भारत में, और फिर सारे संसार में ये बात लागू होने में देर नहीं लगेगी. ये पक्का समझें.

चलिए, पुरुष कर्मचारी पर तो यह नियम लागू कर सकते हैं कि वो बिना जेब की कमीज-पतलून पहन कर आए. पर, यदि कर्मचारी महिला हुई तो? बहुत सी महिलाएँ अपना माल-मत्ता रुपया-पैसा अपनी चोली में उंड़स कर रखती हैं. तो क्या उन पर बिना चोली के वस्त्र पहन कर आने का नियम बनाया जाएगा? चलिए, ये विचार तो एक्स्ट्रीम हो सकता है, मगर उन पर बिना हैंड-बैग लिए काम पर आने का नियम तो बनाया ही जा सकता है. अब भले ही हो पाउडर लिप्स्टिक्स बनाने वाली कंपनियों - पॉड्स, निविया, रेवलॉन वालों की ऐसी  की तैसी. वैसे, इस नियम को बनाने वालों को बिना जिप की पतलून पहनने का नियम बनाने का विचार क्यों नहीं आया यह आश्चर्य का विषय  है. समाज में भ्रष्टाचार के अलावा और भी तो अपराध होते हैं.

बहुत से भ्रष्टाचारी लेनदेन बिलो-द-टेबुल, अंडर-द-टेबुल होते हैं. तो क्या भ्रष्टाचार रोकने के लिए बिना टेबुल के ऑफ़िस का नया नियम बनेगा. क्योंकि फिर, न टेबुल रहेगा न अंडर द टेबुल डील हो सकेगी.

वैसे, अभी भी बहुत से सरकारी महकमों में ड्यूटी पर आते समय कर्मचारी को घोषणा करनी पड़ती है कि उसकी अंटी में कितना माल है. ताकि जब बाद में (यदि कभी किसी कर्मचारी के जीवनकाल में हुई तो,) चेकिंग हो तो यह पता चल सके कि उसके पास घोषित माल से ज्यादा कहीं से उड़ कर तो नहीं आ गया है. पतलून में जेब नहीं रहेगी तो बेचारे कर्मचारी को इस बेहद घृणित नित्य कर्म से छुटकारा तो मिलेगा!

बहुत पहले राजीव गांधी ने कहा था कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए स्वीकृत एक रुपये में से सिर्फ 15 पैसा जनता तक पहुँचता है, बाकी भ्रष्ट शासन तंत्र डकार जाता है. हाल ही में राहुल बाबा ने भी इसे दोहराया और मामला 10-5 पैसे तक का बता दिया. ऐसे में, ये विचार नहीं आता कि बिना सरकारी तंत्र के सरकार क्यों न रहे? न सरकारी तंत्र रहेगा न भ्रष्टाचार. वैसे, अन्वेषण की बात ये है कि इतने अति भ्रष्ट तंत्र के होते हुए अभी भी 10-15 पैसे जनता तक पहुँच रहे हैं. यह तो भ्रष्ट सरकारी तंत्र की घोर अक्षमता है. उन्हें अपना पूरा 100 प्रतिशत लगाना चाहिए. वे अपने टारगेट में निहायत फेलुअर रहे हैं.

भले ही अब हम अपनी जरूरतों के लिए विकल्प के तौर पर अपने अपने कच्छों में कई कई जेबें लगवा लें, पर आइए, आज से बिना जेब की पतलूनें पहनें. भ्रष्टाचार को खत्म जो करना है!

---

व्यंज़ल
दिल का हाल बताती हैं पतलूनें
यों राज बहुत छुपाती हैं पतलूनें

कभी तंग चुस्त तो कभी फैली
वक्त को आगे चलाती हैं पतलूनें

मेरे देश में मेरे अजीज दोस्तों
बगैर जेब की होती हैं पतलूनें

नंगई कभी छिपती है भले ही
यारों ने पहनी होती हैं पतलूनें

वो दौर अलग रहा होगा रवि
अब के तो लजाती हैं पतलूनें

----

क्या ब्लॉग सिर्फ और सिर्फ छपास पीड़ा को जड़ से मारने का इलाज मात्र है या फिर इंटरनेट का यह मल्टीमीडिया युक्त सुगम सरल प्रकाशन सुविधा भविष्य में प्रेमचंद या देवकीनंदन खत्री जैसे लेखकों को पैदा करने की ताक़त रखता है?

पिछले दिनों हिन्दी के एक ब्लॉग में पुष्पा भारती के कथन पर गंभीर चर्चा चली थी। पुष्पा भारती ने हिन्दी ब्लॉगों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि यहाँ तो भाषाएँ भी बड़ी अजीब है - ब्लॉगर ‘टेंशनात्मक’ लिख रहे हैं – तो ये टेंशनात्मक क्या है? इससे पहले नामवर सिंह जैसे दिग्गज इसे खारिज कर चुके हैं। अलबत्ता राजेंद्र यादव सरीखे कुछ विशिष्ट भविष्यदृष्टा की नजरों में ब्लॉगों के जरिए सृजनात्मकता की असीम संभावनाएँ भी झलकती हैं।

पांच साल के हिन्दी ब्लॉग इतिहास में सृजनात्मकता के लिहाज से क्या कुछ हासिल हुआ और भविष्य का पट क्या कहता है?

क्या ब्लॉग सिर्फ और सिर्फ छपास पीड़ा को जड़ से मारने का इलाज मात्र है या फिर इंटरनेट का यह मल्टीमीडिया युक्त सुगम सरल प्रकाशन सुविधा भविष्य में प्रेमचंद या देवकीनंदन खत्री जैसे लेखकों को पैदा करने की ताक़त रखता है? क्या यहाँ सिर्फ अनर्गल और पानठेलों-पर-की-जाने-वाली-बहस नुमा चीजें छापी जाती हैं या फिर इसमें स्तरीय सामग्री भी आती हैं?

इन तमाम मुद्दों पर गर्मागर्म बहस के लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 10 जुलाई, 2009 को 2 बजे से 3 बजे तक रायपुर (छ.ग.), निंरजन धर्मशाला में सुनिश्चित किया गया है। यह संगोष्ठी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के आयोजन के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि रहेंगे देश के महत्वपूर्ण आलोचक एवं भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक डॉ. प्रभाकर तथा विशिष्ट अतिथि होंगे – वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ एवं ए. अरविंदाक्षन, कालीकट तथा इसकी अध्यक्षता करेंगे - प्रसिद्ध ब्लॉगर रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी) ।

भागीदारी हेतु ब्लॉगर बंधु सादर आमंत्रित हैं। प्रतिभागी ब्लॉगर्स के भोजन, आवास की व्यवस्था संस्थान द्वारी की गई है तथा इसके अलावा राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी में भी भाग ले सकते हैं जिसमें देश के 50 से अधिक वरिष्ठ आलोचक उपस्थित हो रहे हैं ।

----

संगोष्ठी संयोजक

जयप्रकाश मानस

मोबाइल – 94241-82664

ई-मेल – srijangatha@gmail.com

money ke liye kuch bhi karega

मंदी की मार में, आदमी तो आदमी, लगता है कंपनियाँ भी पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हो गई हैं. विश्व की नं #1 पैसा-लेन-देन वाली कंपनी पेपाल ने एक नया विचार गढ़ा है. आप सभी से थैंक्यू सर्विस नहीं ले सकते, लिहाजा पैसा देकर काम करवाएँ. कोई भी काम. छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा. डू स्टफ़ फ़ॉर मनी नाम की यह सेवा देखते हैं कितना लोकप्रिय होती है, और जनता के काम आती भी है या नहीं. जो भी हो, वहां पर लोगों को एक दूसरे को काम बताने की होड़ सी मच गई है – पर, फोकट में नहीं. पैसा देकर.

money ke liye kuch bhi karega3

मैंने समीर ‘उड़नतश्तरी’ को बेनामी आरती फिर से ढोल मंझीरे के साथ गाने का निवेदन किया, तो इसने मेरा हिन्दी अनुरोध अस्वीकार कर दिया. ये जमूरा प्रोग्राम हिन्दी नहीं समझता.

 money ke liye kuch bhi karega5

फिर से अंग्रेज़ी में अनुरोध भेज दिया है. देखते हैं समीर भाई झांझ-मंझीरे के साथ आरती गाने का काम करते भी हैं या नहीं. यदि वो फिर से आरती गा देते हैं तो समझिए कि यह प्रकल्प सफल है!

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget