आपको अपने आप पर भरोसा है या नहीं?

bharosa

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ये भरोसे का बड़ा चक्कर है. आपको भले ही अपने आप पर भरोसा न हो, मगर दुनिया है कि आप पर पूरा भरोसा करती है. ठीक वैसे ही जैसे आप अपने बच्चे के ऊपर भरोसा करते हैं कि वो बड़ा होकर पढ़ लिख कर आई.ए.एस. अफ़सर बनेगा. बड़ा नाम और नांवा कमाएगा. भरोसा बाद में टूटे या रहे – जिसके कि बहुतेरे कारक और कारण हो सकते हैं, जैसे कि उसे तो बड़ा होकर सलमान बनने का भरोसा है जिसे आपका आई.ए.एस अफ़सर बनने-बनाने का भरोसा खुद टूटते टूटते तोड़ देगा. मगर, जैसा भी हो, भरोसा अभी तो बना रहता है ना! पालक के मन में भी और बालक के मन में भी.

मुझे भी अपने आप पर भरोसा भले ही नहीं हो, मगर मैं भी दूसरों पर पूरा भरोसा करता हूं, और दूसरे भी अपने आप पर भले न करें, मुझ पर पूरा, पक्का भरोसा करते हैं. वैसे, भरोसा रिलेटिव होता है. सापेक्ष. निरपेक्ष वो कतई नहीं होता. किसी का भरोसा तोड़ने टूटने के उतने ही ज्यादा चांसेज होते हैं जितना ज्यादा भरोसा होता है.

किसी शासकीय कार्यालय में किसी काम के लिए जाओ तो आपको अपने काम के होने का कितना भरोसा होता है? यदि कोई ईमानदार अफ़सर मिल गया तो काम होने को भरोसा तो नहीं होता है, मगर इस बात का पूरा भरोसा होता है कि काम नहीं होगा. फिर आप भरोसे लायक अफ़सर को ढूंढते हैं जो कुछ ले-देकर आपका काम कर दे. जैसे ही आपको भरोसे लायक अफ़सर का पता चलता है, आपका भरोसा तंत्र पर फिर से कायम हो जाता है.

अब आप पूछेंगे कि भरोसे के लायक अफ़सर और बाबू कैसे मिलेंगे? ये मिलेंगे तो आप इन्हें कैसे पहचानेंगे? इन्हें पहचानने का तरीका क्या है? इनकी पहचान क्या है? तो, भरोसा रखिए, कुछ क्लू हमेशा अपने साथ रखिए. ये क्लू आपके भरोसे को कभी नहीं तोड़ेंगे. भई, सीधा सादा गणित है. मसलन – कोई अस्तव्यस्त सा बाबू पान चबाता मिल जाए जिसके शर्ट में पान की पीक के दाग-वाग दिख रहे हों तो समझो कि वो भरोसे का आदमी है. यदि उसके हाथ में जलती सिगरेट का टुकड़ा दबा दिख जाए तो समझो कि वो तो पक्के भरोसे का आदमी है. आपका काम हुआ ही समझो. क्योंकि सरकारी तनख्वाह में, जिसका तैंतीस परसेंट तो सरकार टैक्स के रूप में वेतन देने के पहले ही काट लेती है, कोई सरकारी मुलाजिम सिगरेट के कश अपनी तनख्वाह के पैसे से कैसे मार सकता है भला?

अब पानी और बिजली का ही ले लीजिए. इनके नहीं रहने का भरोसा सबको है. कम से कम हम भारतीयों को तो इसका पूरा भरोसा है कि सुबह नल खोलो तो पाँच में से तीन मर्तबा पानी नहीं निकलेगा क्योंकि तमाम वजहों से नल आया ही नहीं होता है. बिजली रानी पर तो इतना भरोसा है कि दिन में जब तक आधा दर्जन बार उतने ही घंटों के लिए जब तक गुल नहीं हो जाती उसे बिजली रानी कहलाने का हक नहीं. यही हाल रेलवे का है. प्लेटफ़ॉर्म की गंदगी, रिजर्वेशन की सीट नहीं मिलने, जनरल डिब्बे में भीड़ भड़क्का का भरोसा किसे नहीं होता? भारतीय सड़कों पर गड्ढे और स्पीड ब्रेकर हर किलोमीटर में तीन-पाँच के हिसाब से नहीं मिलने का भरोसा किसे नहीं होता?

अब इससे पहले कि इन पंक्तियों को पढ़ते पढ़ते मेरे लेखन से आपका भरोसा उठ जाए, मामला यहीं समाप्त करते हैं. मुलाहिजा फरमाएँ एक पर्याप्त भरोसे का व्यंज़ल –

व्यंज़ल

देखिए किस पर भरोसा कर रहे हैं लोग

केवल गुंडों पर भरोसा कर रहे हैं लोग


वक्त की इंतिहा कहिए कि खुद को छोड़

दूसरे तीसरे पर भरोसा कर रहे हैं लोग


ये तो सचमुच का कमाल हो गया यारों

राजनीतिज्ञों पर भरोसा कर रहे हैं लोग


वक्त की जरूरत है कि प्यार तज कर

घृणा नफरत पर भरोसा कर रहे हैं लोग


कतई भरोसा नहीं है रवि को खुद पर

फिर भी उस पे भरोसा कर रहे हैं लोग

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(स्क्रीनशॉट – साभार अदालत ब्लॉग)

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भारत से लौटकर विदेश मे एक नास्तिक ने कहा " अब मुझे भगवान पर भरोसा हो गया है । " मित्र ने पूछा " कैसे?" उसने कहा "भगवान न होता फिर इतना बड़ा देश किसके भरोसे चलता । "

sab ram bharose chal raha hai ....

सरकारी तनख्वाह में, जिसका तैंतीस परसेंट तो सरकार टैक्स के रूप में वेतन देने के पहले ही काट लेती है, कोई सरकारी मुलाजिम सिगरेट के कश अपनी तनख्वाह के पैसे से कैसे मार सकता है भला?
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ऑन रिकार्ड कह दूं कि सिगरेट नहीं पीता! सो भरोसे का आदमी नहीं। :-(

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