गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

एक भारतीय {अ}सत्यकथा

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(प्रस्तुत है हम देसियों के बीच एक बेहद अग्रेषित मूल अंग्रेज़ी ईमेल फारवर्ड [तथा चिट्ठों पर बेहद कॉपी-पेस्ट] का हिन्दी अनुवाद. मूल (अज्ञात?) लेखक को धन्यवाद सहित)

पुरानी कहानी:


तमाम गर्मियां चींटी जुटी रही और उसने अपने रहने के लिए बढ़िया सा बिल बनाया और उसमें ढेर सारी खाने की चीजें एकत्र कर रख ली ताकि ठंड में काम आवे.

चिड्डा ये देखकर हंसा और बोला चींटी तू मूर्ख है. देखो मैं दिनभर कैसे मजे में खाता पीता नाचता कूदता और मस्ती करता रहता हूं.

ठंड का मौसम आया. चींटी अपने बिल में सुरक्षित थी. उसके पास खाने पीने की चीजों की कोई कमी नहीं थी. चिड्डे के पास न घर था न भोजन व्यवस्था. ठंड में ठिठुरकर उसने अपनी जान दे दी.


भारतीय संस्करण:


तमाम गर्मियां चींटी जुटी रही और उसने अपने रहने के लिए बढ़िया सा बिल बनाया और उसमें ढेर सारी खाने की चीजें एकत्र कर रख ली ताकि ठंड में काम आवे.

चिड्डा ये देखकर हंसा और बोला चींटी तू मूर्ख है. देखो मैं दिनभर कैसे मजे में खाता पीता नाचता कूदता और मस्ती करता रहता हूं.

सर्दी का मौसम आया तो ठंड में ठिठुरते चिड्डे ने प्रेस-कॉफ्रेंस बुलाया और मांग रखी कि जब दूसरे ठंड में भूखे-प्यासे ठिठुरकर मरने की कगार पर हैं तो ऐसे में चींटी क्यों आराम से अपने बिल में खा-पी कर मुटिया रही है.

एनडेटीवी, बेबीसी, सीएसएन सहित तमाम चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज छपी जिसमें एक तरफ ठिठुरते, भूख में कलपते चिड्डे को दिखाया गया तो दूसरी तरफ खूब सारे संग्रहित भोजन के बीच आराम फर्माती चींटी को.

इस भयंकर विरोधाभास को देखकर  अवसरवादी भारतीय राजनीतिज्ञों की दुनिया दंग रह गई. चिड्डे को ऐसा कैसे मरने के लिए छोड़ा जा सकता है भला?

अवनति राय ने चींटी के बिल के सामने इस अत्याचार के विरूद्ध प्रभावी धरना-प्रदर्शन किया.

मेगा पाटवकर ने दूसरे चिड्डों के साथ अनशन किया कि चिड्डों को आरामदायक अपेक्षाकृत गर्म जगह पर विस्थापित किया जाए.

पायावती ने इसे अल्पसंख्यकों पर अन्याय बताया.

तमाम रपटों के आधार पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारतीय सरकार की खिंचाई की कि वह चिड्डे के मौलिक अधिकारों की रक्षा में असमर्थ रही है.
इंटरनेट पर चिड्डे के समर्थन में ऑनलाइन पिटीशनों की बाढ़ आ गई. चिट्ठाजगत में समर्थन और विरोध में घमासान मच गया.
विपक्षी दलों ने संसद में धरना-प्रदर्शन-वाकआउट तो किया ही, संसद में तोड़फोड़ मचाया और एक दूसरे पर कुर्सियों के हत्थे और माइक फेंके. वामपंथी दलों ने चींटी के विरोध में एक माह का बंगाल और केरल बंद करवाया तथा इस भयंकर असमानता के कारणों की न्यायिक जांच की मां की.

राज्यों की वामपंथी सरकारों ने एक क़ानून पास करवाया जिसमें चींटियों को गर्मियों के दौरान ज्यादा काम करने पर पाबंदी लगाई गई ताकि चींटी व चिड्डों के बीच आर्थिक स्तर समान बना रहे व समाज में असमानता पैदा न हो.
आलू प्रसाद ने भारतीय रेलों में चिड्डों के लिए एक अलग कोच रिजर्व करने की घोषणा की तथा चिड्डा रथ नाम का एक नया रेल चलाया जिसमे चिड्डे मुफ़्त में जहां मर्जी पड़े यात्रा कर सकें.

भारतीय न्यायिक कमेटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक कानून पोटागा 'प्रिवेंशन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट ग्रासहॉपर्स एक्ट' [PODAGA], बनाया और उसे पिछले पाँच साल पहले से लागू किया.
वर्जुन सिंह ने चिड्डों के लिए विशेष आरक्षण की घोषणा की.

चींटी को पोडागा कानून के अंतर्गत गिरफ़्तार कर लिया गया और उसकी संपत्ति जब्त कर उसे जेल भेज दिया गया. जब्त की गई सम्पत्ति को जरूरतमंद चिड्डों में बांट दिया गया जिसके एक्सक्लूजिव लाइव प्रसारण के अधिकार एनडेटीवी ने खरीद लिए थे. डांडिया टीवी ने इस आयोजन को बोगस, नकली करार दिया और चींटियों की तुलना तालिबान से की.


अवनति राय ने इसे न्याय की जीत माना.


आलू प्रसाद ने इसे असली सामाजिक न्याय माना.

 

वामपंथियों ने इसे साम्यवाद की क्रांतिकारी जीत माना.

 

संयुक्त राष्ट्र संघ में चिड्डे को वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया.


बहुत साल बाद....


जेल से छूटने के बाद चींटी अमरीका भाग गई और वहां सिलिकान वेली में उसने मल्टी बिलियन डालर की कंपनी खोल ली.

.


चिड्डा अभी भी उसी हाल में है.

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13 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. kahani adhuri hai.. jaldi hi puri kijiyega.. aage jab vahi chinta USA se vapas bharat aata hai to fir kya hota hai?? :)

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  2. bhut badhiya
    bilkul vastavik hai

    u r welcome
    sim786.blogspot.com

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  3. हा हा हा, बहुत खूब! :D

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  4. Afsos, magar yahi yahan ki vaastvikta hai.

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  5. हा हा हा सही है, यही है हमारी राजनीति और मीडिया की पहचान !!

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  6. हां, यह बहुत क्रियेटिव ई-मेल था। हमारे यहां के टिड्डावादी लोगों/दलों/ब्लॉगरों को मनन करना चाहिये।

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  7. वरतमान व्यवस्था कि सच्ची तस्वीर है ।

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  8. :) हमने भी ये कहानी पढ़ी थी। राजनेताओ और मीडिया के कान पर फ़िर भी जूँ नहीं रेगने वाली…।:)

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  9. मुझे हँसी नहीं आई. क्योंकि ऐसा ही हो रहा है.

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