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Thursday, April 02, 2009

एक लाख वर्ष पुरानी चित्रकारी देखना चाहेंगे?

तो, भीम बेटका (बैठकम या बैठका?) में आपका स्वागत है. भीम बेटका भोपाल (मप्र) से कोई 50 किमी दूर है. यह एक पर्वतीय स्थल है, जहाँ बहुत सी प्राकृतिक गुफाएँ हैं. इन्हीं गुफाओं में आदिमानवों का प्राकृतिक शैलाश्रय रहा था और अपने फुरसत के क्षणों में आदिमानवों ने गुफा की दीवारों पर विविध रूपाकारों में सैकड़ों दर्शनीय चित्र अंकित किए थे. यहां की कोई 500 से अधिक गुफाओं में सैकड़ों प्रागैतिहासिक चित्र है. यहाँ के कुछ चित्र पचास हजार वर्ष पुराने हैं, और एक प्याला नुमा आकृति के बारे में कहा जाता है कि वो कोई एक लाख वर्ष पुराना है. अलबत्ता समय, काल और वातावरण की वजह से लगातार होते क्षरण से हमें उस प्याले नुमा चित्र के दर्शन तो नहीं हुए, मगर बहुत से चित्र पुरातन काल की जीवनी की बयानी करते मिले. पाषाणआश्रय के इन चित्रों को देखकर बरबस ही अपने पुरखों की याद आती है कि उनका प्राचीन, वन्य जीवन कैसा रहा होगा. अधिसंख्य चित्र 9 हजार वर्ष पुराने हैं.

भीम बेटका को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर भी घोषित किया जा चुका है. कुछ चित्र आप भी देखें –

 bhim baithka images1

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bhim baithka images4

 

bhim baithka images2

 

दुःख की बात है कि इन शैलाश्रयों और इनमें उकेरे चित्रों के पुख्ता संरक्षण के उपाय नदारद दिखे. चित्रों के ऊपर वेदरप्रूफ कोटिंग किया जाना आवश्यक है, अन्यथा कुछ वर्षों में इन चित्रों के पूरी तरह से नष्ट हो जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. कहीं कहीं पत्थरों की गुफाओं के दीवारों की परतें भी उखड़ कर गिर रही हैं.

भीम बेटका के बारे में गोविंद कुमार गुंजन ने अपने ब्लॉग में बहुत ही सुंदर प्रविष्टि लिखी है. जागरण में भी छोटा सा समाचार पढ़ें. विकिपीडिया पर भी बहुत बढ़िया जानकारी परक आलेख है.

 

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चलते चलते –

भीम बेटका में इनसे भी सामना हुआ:

 

जिंदगी की जद्दोजहद – पीपल का पेड़, दैत्याकार पाषाण शिला से बुरी तहर लिपटा हुआ - पत्थर में से तेल निकालना शायद यही है -

bhim baithka struggle for life2

 

और, दीवार पर लिखी ये इबारत -

bhim baithka grffiti

 

भाषा भले ही शुद्ध न हो, इरादे तो शुद्ध और नेक हैं!

9 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

"अर्श" said...

DHANYA HUA EK LAAKH SAAL PURAANI CHITRON KO DEKH KAR...

AAPKA AABHAAR

ARSH

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बिल्कुल ऐसे चित्र उकेरने का मन होता है। मन कितना प्रागैतिहासिक है!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत ही सुन्दर सामग्री.धन्यवाद.

संगीता पुरी said...

इतनी सुंदर जानकारी , चित्र और लिंको के साथ यह आलेख बहुत ही अच्‍छा लगा ... बहुत बहुत धन्‍यवाद।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ऐसी ही चित्रकारी यहाँ कोटा से 20 किलोमीटर दूर चट्टानेश्वर में है। इतिहासकारों के पहुँचने के पहले तक इन्हें सीता माता के माँडणे कहा जाता था।

amit said...

अपना पचमढी सांची आदि के प्रोग्राम के साथ भीमबेटका का भी प्रोग्राम शामिल है, देखें कब जाना हो पाता है! :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भीम बेटका के चित्रकारों से मिलवाने के लिए धन्यवाद.

संजय बेंगाणी said...

शुद्ध पोस्ट.
कुल मिला कर तब घुड़सवारी व भालों का उपयोग होने लगा था.. :)

kiran rajpurohit nitila said...

Ravi ji
bahut bahut rochak laga padhkar .
behtareen jankari or photo ke liye
shukriya.
Kiran Rajpurohit Nitila

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