एक ग़रीब की आत्मकथा...
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(आत्मकथा लिखना अब अमीरों की ही बपौती नहीं रह गई है. अब तो गरीब भी आत्मकथा लिख सकता है. लिखकर उसे प्रकाशित भी कर सकता है. वो तो धन्य है इस चुनाव का, कि उसे एक स्मार्टफोन और चहुँओर इंटरनेट का वादा मिल गया है. तो उसने आव न देखा न ताव, एक पार्टी के इलेक्शन मेनिफेस्टो के एक कोरे हिस्से में दन्न से एक आत्मकथा लिख मारा. स्मार्टफोन के आते ही उसे फट् से इंटरनेट पर चढ़ा देगा. पेश है आपके लिए उसका प्रीव्यू. अंतिम प्रकाशन तक इसमें थोड़ा मोड़ा कांटछांट और फेरबदल संभव है.)
मुझे चुनाव का मौसम बहोत पसंद है. मैं चाहता हूं कि काश चुनाव का मौसम हर छठे-चौमासे आता रहे. तमाम नेताओं को तभीच मेरी याद आती है. इस बार तो मुझे नया, चमचमाता स्मार्टफोन मिलने वाला है. पिछली बार मैं तमिलनाडु में था तो मुझे रंगीन टीवी मिला था. घड़ियों, साड़ियों, सौ-सौ के नोटों की सौगात हम गरीब गुरबों को चुनावों के दौरान ही तो मिलता है तो फिर चुनाव हरदम हर समय होते ही रहना चाहिए कि नहीं. जैसे ही इधर एक चुनाव गुजरे, उधर दूसरा चालू हो जाना चाहिए. तभी हम गरीबों पर लोगों का ध्यान जाएगा. वरना हम क्या खा पी पहन रहे हैं, कैसे जीवनयापन कर रहे हैं उसका पता किसी को भी नहीं चलता.
पिछले चुनाव में चाउर वाले बाबा ने हमें दो रुपए किलो चावल का वादा किया था. इस बार हमें उम्मीद थी कि एक रूपया किलो तो कर ही देगा. चलो कोई बात नहीं, अगले चुनाव में तो हो ही जाएगा. अगले चुनाव के लिए कुछ बचा के रखना है कि नहीं. हम तो सपना देख रहे हैं कि किसी न किसी चुनाव में किसी इलेक्शन मेनिफेस्टों में अप्रत्यक्ष रूप से कहा जाएगा – अबे गरीब, तू गरीब का गरीब रह. बस तू हमें और हमारी पार्टी को वोट देता रह. हम तुम्हें मुफ़्त में चावल-दाल-आटा तो देंगे ही, खाली स्मार्ट फोन क्या – हम उसमें समय समय पर टाक टाइम भी डलवा कर देते रहेंगे.
वो तो बुरा हो चुनाव आयोग का जो जबरन जबरदस्ती ज्यास्ती में नेताओं की नकेल कसता रहता है. सबसे बड़ा गरीबों का दुस्मन है वो. उसे गरीबों में खुसहाली आती अच्छी नहीं लगती. चुनाव आयोग का सिस्टम बदल देना चाहिए. आचार संहिता को फाड़ के फेंक देना चाहिए. ये नहीं होते तो - पिछले कई चुनावों से लेकर अब तक -हम गरीबों की हालत कुछ और ही होती.
लोगबाग कहते हैं कि साला गरीब नोट लेकर वोट देता है. घड़ी और साड़ी लेकर ईवीएम का बटन दबाता है. रात में मुफ़्त की दारू पीकर सुबे में उसको वोट दे आता है जो उसे दारू पिलाता है. ठीक है, पर ये बताओ भइये कि नागनाथ और सांपनाथ में ही जब चुनना है तो उसको वोट क्यों नहीं दें जो कुछ खिलाता पिलाता है. इलेक्सन जीतकर फिर खुद खाएगा पिएगा, और अगले चुनाव में फिर हमें जादा खिलाएगा पिलाएगा खैरात बांटेगा. तो हम ऐसे ही लोगन को तो चुनेगा न!
अबकी चुनाव में सुनेला है कि हर कोई पीएम इन वेटिंग हो गया है. क्या आडवानी, क्या माया. पवार से लेकर पासवान और जया अम्मा से लेकर मेरी झुग्गी की लाइन का पार्सद जयराम बाबू. मैं भी सोचता है साला क्यों न मैं भी पीएम इन वेटिंग बन जाऊं. सोचने में क्या जाता है? वैसे भी अपनी फिल्लम में साहरूख भाई ने कहा है – यदि किसी चीज को शिद्दत से चाहोगे तो विश्व की तमाम शक्तियाँ आपके स्वप्न को पूरा करने का षडयंत्र करेंगी. वैसे तो अपुन इधर गरीबइच ठीक है, अमीरों के लफड़े अपने को नईं सुहाते, फेर पीएम इन वेटिंग की बात अलग है. एकाध चुनाव जीत जाने की बात अलग है...
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(कार्टून कतरन – साभार टाइम्स आफ इंडिया)








7 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:
वाह! वाह! गुरुदेव! वाह! आनन्द आ गया। पढ-पढ कर सामने वाले की हालत तो 'जबरा मारै, रोवै न दे' जैसी कर दी है आपने।
जोरदार डण्डा घुमाय दियो।
जय हो आपकी।
पिछली बार मैं तमिलनाडु में था तो मुझे रंगीन टीवी मिला था. घड़ियों, साड़ियों, सौ-सौ के नोटों की सौगात हम गरीब गुरबों को चुनावों के दौरान ही तो मिलता है तो फिर चुनाव हरदम हर समय होते ही रहना चाहिए कि नहीं......
...Bada Aamir nikla apka ye garib....
5 saal me ek baar hi sahi,
Aur bonus (Madhyavadhi chunav) to kabhi bhi....
इस बार लेपटॉप मिल रहा है, अपन भी लाइन लगाने का पिलान बना रहेला है....
ek achchaa vyangya
जबरदस्त पोस्ट ... क्या व्यंग्य किया है।
maza aa gaya ....ha ha ha
लाइन कहाँ लगानी है ?
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