टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

December 2008

Stay hungry stay foolish by rashmi bansal

वैसे तो ये बात स्टीव जॉब्स ने कही है. स्टे हंगरी स्टे फ़ूलिश. परंतु अगर यही बात आईआईएम अहमदाबाद से निकले 25 चुनिंदा छात्रों की जीवनी से भी सिद्ध होती हो, तो आप क्या करेंगे?

यकीनन आप भी बने रहेंगे सदैव – मूर्ख और भुक्खड़.

सदा के लिए मूर्ख और भुक्खड़ बने रहने की प्रेरणा पाने के लिए आपको पढ़नी होगी युवाओं की हास्य-व्यंग्य से भरपूर मनोरंजक पत्रिका जैम की संपादिका  यूथ-करी रश्मि बंसल की किताब – स्टे हंगरी स्टे फ़ूलिश.

इस किताब में आईआईएम अहमदाबाद से निकले चुनिंदा 25 छात्रों की संक्षिप्त जीवनी दी गई है कि कैसे उन्होंने पारंपरिक जॉब आफर्स और रुपया और ग्लैमर से भरी नौकरियों को ठुकराकर अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठिनाई से भरे चुनौतीपूर्ण पगडंडियों को चुना और इस प्रकार प्रेरणास्पद - नए पायदान, नए रास्ते गढ़े.

सभी पच्चीस की पच्चीस कहानी एक से बढ़कर एक प्रेरणास्पद है तथा हर कहानी मानवीय मूल्यों और मानवीय क्षमताओं की पराकाष्ठा को सिद्ध करती है. हर कहानी पठनीय है, और पाठक के मन में स्फूर्ति और आशा का संचार भरने में सक्षम है.

इस पुस्तक को सेंटर फार इन्नोवेशन इनक्यूबेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप – अहमदाबाद तथा वाधवानी फ़ाउंडेशन के सहयोग से, एक परियोजना के तहत प्रकाशित किया गया है, और इसीलिए 325 पृष्ठों की इस अमूल्य किताब की बहुत ही वाजिब, सब्सिडाइज्ड कीमत मात्र 125 रुपए रखी गई है.

पुस्तक की भाषा सरल है और पाठकों को बांधे रखने में सक्षम है. पुस्तक को मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित किया गया है – द बिलीवर्स, द अपार्च्यूनिस्ट और द आल्टरनेट विज़न. हर जीवनी के उपरांत ‘यंग एंटरप्रेन्योर्स के लिए शिक्षा’ नाम से पाठ का प्रेरक संक्षेप भी दिया गया है.

प्रस्तुत है बेतरतीब रूप से चुने गए, इस किताब के पृष्ठ 104 से सुनील हांडा की जीवनी के कुछ चुनिंदा अंश (हिन्दी भावानुवाद)

“ जब मैंने 11वीं में हैदराबाद पब्लिक स्कूल में एडमीशन लिया तो पाया कि वहां हर कोई अपने सिलेबस से अलग कोई न कोई किताब पढ़ रहा है – कोई एनिड ब्लायटन पढ़ रहा है तो कोई बिली बंटर. मैंने आज तक कोर्स से बाहर न कोई किताब पढ़ी थी और न ही समाचार पत्र. मैं लाइब्रेरियन के पास गया और उनके सामने रोते हुए बोला कि क्या वे मुझे इन किताबों को पढ़ने में मदद करेंगी कि शुरूआत किससे करनी चाहिए. लाइब्रेरियन को शुरू में विश्वास ही नहीं हुआ कि 11 वीं क्लास का कोई बच्चा ऐसा भी हो सकता है. मगर जल्द ही मैंने लाइब्रेरी की सारी की सारी किताबें पढ़ डालीं...

कक्षा दसवीं में मेरे 45 % औसत अंक थे. 11 वीं में बच्चे मुझे गंवारु कह कर चिढ़ाते थे. मेरी अंगरेजी भी कमजोर थी. पर मैंने निम्न फंडे को आजमाया –

मैं परिस्थितियों को दोष नहीं दूगा. मैं मौसम को दोष नहीं दूंगा. मैं शासकीय नियम कायदे कानूनों को दोष नहीं दूंगा. मैं ये नहीं कहूंगा कि मेरे पालकों ने मेरे लिए ये किया या ये नहीं किया. मैं कहूंगा कि अब ये हो चुका है, और मुझे कुछ करना होगा, मुझे मेरी जिम्मेदारी समझनी होगी. यदि कुछ अच्छा भला होगा तो मैं अपनी पीठ थपथपाऊंगा, और यदि कुछ बुरा हुआ तो भी मैं अपने आप से मुहब्बत करूंगा. अपनी सफलता-असफलता के पीछे मैं स्वयं हूँ न कि मेरे आसपास का वातावरण या कोई अन्य कारण...”

ठीक है, आप भी अपनी स्वयं की सफलता-असफलता के पीछे खुद आप ही होंगे, मान लिया, मगर कुछ अलग करने के लिए, कुछ नया सा करने के लिए प्रेरणा पाने के लिए इस किताब को दोष तो दे ही सकते हैं. किताब का अन्य विवरण निम्न है:

---

स्टे फ़ूलिश स्टे हंगरी

रश्मि बंसल

प्रकाशक – सीआईआईई, आईआईएम अहमदाबाद

आईएसबीएन नं. 978-81-904530-1-1

पृष्ठ – 325, मूल्य रु. 125.00

----

nobel bribary1

हर साल, साल दर साल जब भी विविध विषयों – क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होती है तो आप भी मेरी तरह बड़े ध्यान से पुरस्कार विजेताओं के बारे में और उनके द्वारा किए गए कार्यों के बारे में पढ़ते तो होंगे ही. पर, क्या आपको पता है कि आप भी अगर ढंग से कोशिश करते होते तो शायद अब तक आपको भी एक नोबेल पुरस्कार साहित्य (या, आप किसी अन्य क्षेत्र में माहिर हैं, तो उसमें,) के क्षेत्र में मिल चुका होता?

मैंने साहित्य के क्षेत्र में कोई तीर नहीं मारे हैं. मेरे सड़ियल व्यंग्य और अड़ियल व्यंज़ल (जिसे ग़ज़ल नहीं माना गया, तो मैंने एक नया ही नाम दे दिया - ) की ले देकर एक-एक किताब प्रकाशित हुई है – वो भी ऑन डिमांड प्रिंट पर, और जिसकी डिमांड मेरे अलावा किसी और ने अब तक नहीं की है. थोड़े मोड़े तकनीकी आलेख मैंने लिखे हैं, जो ज्यादातर पब्लिक के सिर के ऊपर से निकल गए, और जो कचरा अनुवाद मैंने किए, उनसे, पाठकों का कहना है कि मैंने अर्थ का अनर्थ कर डाला है. तो, यदि मैं अपने इन कार्यों की बिना पर मैं नोबल पुरस्कार पाने के सपने देखने लगूं तो लोग मुझे पूरा का पूरा पागल समझने लगेंगे. परंतु नहीं. मैं अब यह सपना देखने की जुर्रत कर सकता हूं. पूरे होशो हवास में!

दरअसल, मैंने नोबल पुरस्कार के लिए सपने ही नहीं देखे थे अब तक. बकौल पाउलो कोएलो, अगर मैं ये सपना देखता होता, तो संसार की तमाम शक्तियाँ मुझे ये पुरस्कार दिलाने षडयंत्र करने लगतीं. इस लिहाज से अब तक तो मुझे ये पुरस्कार कब का मिल चुका होता. मैं मूरख अ-स्वप्नदर्शी!

इस समाचार ने मेरे मन में जबरदस्त आशा जगाई है. नोबल पुरस्कार कमेटी को भी रिश्वत देकर नोबल पुरस्कार खरीदा जा सकता है. मैंने अब यह सपना देख लिया है. विश्व की तमाम भ्रष्ट और रिश्वत-खोर शक्तियाँ मुझे मेरा सपना पूरा करवाने प्रयत्नशील हो गई हैं. अगले वर्ष का साहित्य का नोबल पुरस्कार मेरे नाम पर होगा. अखबारों के शीर्षकों पर निगाहें जमाए रहिए और मुझे बधाई संदेश देने / स्वागत-अभिनंदन समारोहों-जलसों में निमंत्रित करने की तैयारियों में जुट जाइए. आमीन!

20 YEARS

सवाल ये है कि बीस साल में क्या हो सकता है और क्या नहीं.

एक सरकारी नौकर को बीस साल में फायर किया जा सकता है, यदि वो कामचोर निकला तो. बीस साल! इसका अर्थ ये है कि आप उन्नीस साल तक तो आराम से बिना काम धाम किए निकाल सकते हैं. कानूनन कोई आपका बाल बांका नहीं कर सकता. क्योंकि बीस साल से पहले आपको निकाला ही नहीं जा सकता – कम से कम कामचोरी की तोहमत लगाकर. अलबत्ता दूसरे चार्ज हों तो बात दीगर है. फिर आप उन्नीसवें साल के अंत से या अधिक सेफ गेम खेलना है तो, अठारहवें साल से ही सही, काम करना चालू कर दीजिए. अपनी एफ़ीशिएंसी दिखानी चालू कर दीजिए. अब तो आपको वैसे भी निकाला नहीं जा सकता, क्योंकि अब आप काम कर रहे हैं. प्रसंगवश, यहाँ, ये भी दीगर बात है कि सरकारी दफ़्तरों में कामचोरों को भले ही कोई पूछता न हो, एफ़ीशिएंसी दिखाने वालों की ज्यादा दुर्गति होती है. यहाँ तो पासिंग द बक का गेम चलता है. गेम दूसरे के पाले में डालने का खेल चलता है.

ऋणात्मक सोच वालों को जरूर ये तकलीफ़ हो सकती है कि अब तक तो ऐसा कोई क़ानून ही नहीं था. बीस साल क्या, जीवन के पूरे साठ वर्ष तक यानी रिटायर होते तक कामचोरी की बिना पर सरकारी नौकरी से फायर नहीं किया जा सकता था, अब बीस साल का डर आ रहा है. मगर उन्हें शायद ये नहीं मालूम कि बीस साल में दुनिया बदल जाती है, परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, और सरकारें पाँच बार अदल-बदल सकती हैं. उन्हें बीस साल में भी अपना स्वर्णिम भविष्य देखना चाहिए. वैसे भी, बीस दिन या बीस महीने की बात तो नहीं की जा रही है! इसीलिए, क्यों न बीस साल का जश्न मनाएँ.

वैसे भी, बीस साल में क्या क्या नहीं किया जा सकता? यदि आपके पास बढ़िया मलाईदार विभाग है तो आप तो पाँच-सात साल में भी बहुत सारा काम कर सकते हैं. अपनी 7 पुश्तों के खाने-पीने का बंदोबस्त कर सकते हैं. यदि आपने प्लानिंग सही की तो बीस साल में तो आपका सुपुत्र भी गबरू जवान होकर खाने-कमाने लायक बन जाएगा और अपनी सुपुत्री के हाथ बढ़िया तरीके से, सरकारी कर्मचारी बने रहते हुए, समय पर, पीले कर सकते हैं.

इस क़ानून के चलते सरकारी दफ़्तरों में रोचक प्रसंग देखने को मिल सकते हैं. दफ़्तरों में हर बाबू की टेबल पर उसका अपना बीस-वर्षीय काउंटडाउन घड़ी टंगा मिल सकता है. किसी कर्मचारी का बॉस उसे किसी काम के लिए डांटेगा तो कर्मचारी उल्टा बॉस पर बिफरेगा – तुम मेरा आने वाले पंद्रह (या, बारह, तेरह...) साल तक कुछ उखाड़ नहीं सकते!

लगता है सरकार ने इस क़ानून को बनाते समय अपने कर्मियों की दशा-दिशा का पूरा खयाल रखा है. आखिर सरकारी कर्मचारी भी तो उनके अपने, इस देश के प्रिय नागरिक हैं. बीस साल से एक दिन भी कम होता तो कर्मियों को कई समस्याएँ हो सकती थीं. अब जब सरकार ने ये कानून बना ही दिया है तो क्यों न सभी सरकारी कर्मचारियों को इसका लाभ आवश्यक रूप से लेना ही चाहिए?

---

समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया

 

हिन्दी स्पेल चेकर अब काल्पनिक चीज नहीं रह गई है. अब आप इसे बहु-प्लेटफ़ॉर्मों और बहु-उत्पादों में प्राप्त कर सकते हैं.

हिन्दी राइटर, एमएस वर्ड हिन्दी तथा गूगल क्रोम में अंतर्निर्मित हिन्दी स्पेल-चेकर है. ओपन-ऑफ़िस तथा मॉजिल्ला फायरफ़ॉक्स में आप इसे एडऑन के रूप में डाल सकते हैं.

इन हिन्दी वर्तनी जांचकों की तुलनात्मक समीक्षा वैसे तो अन्याय होगी, क्योंकि एमएस वर्ड हिन्दी का शब्द भंडार विकसित व थिसारस से पूर्ण है, क्रोम गूगल समर्थित है और हिन्दी राइटर, ओपन-ऑफ़िस व मोजिल्ला का प्लगइन इत्यादि व्यक्तिगत स्तर के प्रयास हैं. मगर फिर भी वर्तनी जाँच क्षमता व गलत हिज्जे को सही करने हेतु उपलब्ध सुझाव की तुलना तो कर ही सकते हैं.

इसके लिए कुन्नू के ब्लॉग-पोस्ट से बढ़िया पाठ और क्या हो सकता है भला? वे हिन्दी वर्तनी की अपनी कमजोरी को खुले-आम स्वीकारते हुए अपने तकनीकी ज्ञान के बल पर इसे अप्रभावी बनाने की कोशिश करते हैं.

तो, हाथ कंगन को आरसी क्या? चिपकाए गए पाठ की वर्तनी स्वचालित जाँचने में तथा ‘ईस’ शब्द की सही वर्तनी हेतु दाएँ क्लिक से प्राप्त विकल्प देने में  तीन वर्तनी जांचक – क्रमश: फ़ायरफ़ॉक्स, क्रोम व एमएसवर्ड की तुलना आप स्वयं कर लें:

फ़ायरफ़ॉक्स :

hindi spell check in mozilla a

क्रोम :

hindi spell check in chrome a

एम.एस.वर्ड-हिन्दी :

hindi spell check in ms office hindi a

***

blackbird-screen shot

ब्राउज़रों, कम्प्यूटरों में भी जातिवाद? कम्प्यूटिंग की दुनिया को भी जातिवाद अपनी गिरफ़्त में लेने को पूरी तरह तत्पर प्रतीत दीखता है. शुरूआत धमाकेदार हो चुकी है. जातिवाद से अब ब्राउज़र भी अछूते नहीं रह गए हैं. वो दिन अब दूर नहीं जब ब्राह्मणों का विंडोज अलग और कायस्थों, हरिजनों का अपना अलग फ्लेवर का विंडोज होगा. लिनक्स के कुछ धार्मिक संस्करण तो आ ही चुके हैं.

फ़ायरफ़ॉक्स ब्राउज़र का एक विशिष्ट संस्करण ब्लैकबर्ड – खास अफ्रीकी-अमरीकी (शुद्ध शब्दों में कहें तो, काले नीग्रो) जनता के लिए जारी किया जा चुका है.

इसी तरह, क्या आपको पता है कि स्त्रियों के लिए उनका अपना ब्राउज़र है – फ्लॉक ग्लास?

glos browser

और, हम अपने भारतीय नेताओं को गरियाते फिरते थे कि वो वोटों की राजनीति के लिए जाति-धर्म-क्षेत्रीय वाद के घटिया गुणाभाग चलाते हैं. परंतु अब तो प्रोग्रामर्स और डेवलपर्स भी इसी रस्ते पर चल निकले हैं!

जातिवाद की जय हो! धर्म, क्षेत्रवाद की जय हो!

slowdown and honda
मंदी की मार ने होंडा को भी नहीं छोड़ा. उसके बगैर टीवी पर फ़ॉर्मूला #1 रेसिंग देखने का मजा ही क्या रहेगा. नतीजतन, फ़ॉर्मूला #1 रेसिंग की और भी वाट लगने वाली है. वहाँ और भी मंदी छाने वाली है. मामला साइक्लिक और एंडलेस सर्कुलर वाला हो गया है. मंदी की मार चिठेरों पर भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष पड़ रही है. इससे पहले कि होंडा की तरह मंदी की मार से चिट्ठाकारी छोड़कर भागने की नौबत चिठेरों को आए, मंदी की मार से बचने के लिए चिठेरों हेतु सॉलिड #8 तरीके:
1 – नाईजिरियाई फ़िशरों से साझा व्यापार करें. ये धंधा कभी मंदा नहीं पड़ेगा. यकीन मानिए. ऑनलाइन लॉटरी या $12222222.22 को ठिकाने लगाने में मुफ़्त में मिलने वाले नावां का लालच लोगों को होता रहा है और होता रहेगा.
2 – नए, नायाब अनुप्रयोग लाएँ. उदाहरण के लिए, स्वचालित टिप्पणी अनुप्रयोग. आपके ग्राहक चिट्ठाकार जैसे ही चिट्ठा लिखकर पोस्ट करेंगे, आपका यह वेब अनुप्रयोग दन्न से पच्चीस-तीस टिप्पणियाँ विविध नामों व आई डी से ब्लॉग पोस्ट पर डाल देगा. प्रीमियम ग्राहकों के ब्लॉग पर पचास / सौ टिप्पणियों की सुविधा – यानी जितना माल डालो उतना पाओ की तर्ज पर. देखिए, हिन्दी ब्लॉग जगत के सौजन्य से आपका धंधा कितनी जल्दी और कितने बेहतर तरीके से चल निकलता है. और मंदी? काहे की मंदी? ये धंधा सॉलिड मंदी प्रूफ़ रहेगा. ऑलवेज. ग्यारंटीड.
3 – मंदी चिट्ठापोस्टों में न दिखाएँ. मंदी की मार से चिट्ठों से एडसेंस कमाई कम हो गई है? नौकरी पर खतरा दिख रहा है? सेलरी कम हो गई है? ग़म ग़लत करने के लिए चिट्ठा है ना! सुबह एक पोस्ट ठेलो, दोपहर एक, शाम को एक और सोने से पहले एक. अपने सारे गम चिट्ठों में उंडेल कर रख दीजिए फिर देखिए कहाँ है मंदी और कहाँ है मंदी की मार!
4 – चार पुराने ब्लॉग बंद करें, छ: नए खोलें – मुफ़्त के ब्लॉगर-वर्डप्रेस है ना! माना, मंदी की मार सर्वत्र है, मगर ब्लॉग खोलने बंद करने पर नहीं!
5 – लेखन की धार तेज करें, मंद नहीं - मंदी की मार से लिखने की धार कुंद हो गई है? कोई बात नहीं. गूगल अनुवाद औजार है ना. कोई भी साइट लीजिए, उसका स्वचालित अनुवाद कीजिए चाहें तो थोड़ा कांट-छांट कर लीजिए, थोड़ा प्रवचन-ववचन डाल दीजिए, नहीं तो पूरा रॉ मटीरियल भी चलेगा. बस, आपके लंबे, फुरसतिया स्टाइल ब्लॉग पोस्टों के लिए तकनीकी मसाला से भरपूर मसाला मिल गया. वैसे भी तकनीकी मसाला वाले पोस्टों को कौन तो पढ़ता है और कौन समझता है. टिप्पणियों की बात तो दूर की है!
6 – 1 भाषा में लिखें, 25 भाषा में छापें. धन्यवाद गूगल अनुवाद औजार. अब अनुवाद चाहे कचरा हो, सूरज प्रकाश को सन लाइट कर दे, मगर आपका लिखा 25 भाषा में छपेगा तो मंदी कुछ तो दूर होगी – इंटरनेट में सामग्री की मंदी!
7 – सेंसेक्स नहीं चिट्ठाजगत् के आंकड़े देखें : आपके शेयरों, फंडों व स्क्रिपों के दाम जमीन छू रहे हैं, जिन्हें देख देख कर दिमाग खराब हो रहा है? इनके भाव देखना बंद करें और चिट्ठाजगत् के आंकड़े देखते रहें. यहाँ के आंकड़े देखकर सुकून महसूस करेंगे. देख कहाँ है मंदी? इधर तो ग्राफ़ बढ़ता ही जा रहा है. बढ़ते ग्राफ को देखकर सुकून हर किसी को सुकून महसूस होता ही है.
blogs and recession
8 – कोई वेब कंपनी खोलें, उसका दीवालिया निकाल दें. जी हाँ, एकदम सही तरीका है आज के बिजनेस का. या फिर, ज्यादा अच्छा ये है कि किसी दीवालिया होती कंपनी को एक रुपए के टोकन राशि में खरीद लें. सरकार सभी को बेलआउट पैकेज दे रही है. बहती गंगा में आप भी हाथ धोएँ.
mandi ki maar
----
समाचार कतरन साभार – दैनिक भास्कर, टाइम्स ऑफ इंडिया

kutta kahan nahi jata

बहुत कुत्ता फ़जीती हो गई. अब ये जुदा बात है कि नेताओं की हुई है या कुत्तों की. फिर भी, जब भी किसी नेता की तुलना किसी कुत्ते से होगी तो यकीनन वहाँ कुत्ते की ही फजीहत होगी.

इस बीच, एक अहम् सवाल उठाया गया है कि कुत्ता कहाँ-कहाँ जाता है और कहाँ-कहाँ नहीं जाता...

कुत्ता कहाँ कहाँ जाता है और कहाँ जा सकता है ये विवाद का विषय भी हो सकता है और सूची लंबी, अंतहीन भी हो सकती है. पर, कुत्ता यकीनन इन 13 जगहों पर तो नहीं ही जाता :

1) पार्लियामेंट – जाता है क्या? किसी ने देखा है क्या?

2) संसद भवन – ठीक है, ठीक है, ये ऊपर दिए गए क्र. 1 का ही हिन्दी रूपांतर है, मगर क्या करें, पहले से लेकर दूसरे क्रम तक एक ही नाम है.

3) विधानसभा

4) चुनाव लड़ने

5) वोट मांगने

6) पार्टी/दल बदलने

7) भाषण देने

8) रैली निकालने

9) खोखले वादे करने

10) स्विस बैंक

11) घूस खोरी, भ्रष्टाचार करने

12) कुर्सी पर बैठने

13) कुर्सी खींचने / कुर्सी से गिराने

---

अन्य रचनाएँ

[random][simplepost]

व्यंग्य

[व्यंग्य][random][column1]

विविध

[विविध][random][column1]

हिन्दी

[हिन्दी][random][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][random][column1]

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

[random][column1]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget