August 2008

परिवर्तन का नाम ही जीवन है. कोई अठारह बरस पहले रोजी-रोटी की खातिर छत्तीसगढ़ से रतलाम पहुँचा था तो खयाल नहीं था कि “रतलामी सेव” जैसा टैग मेरे नाम के साथ जुड़ जाएगा.

इसकी भी मजेदार कहानी है. भले ही रतलाम बहुत छोटा सा शहर हो, मगर कुछ सुविधाओं के मामले में यह मप्र और भारत का अग्रणी शहर रहा है. वर्षों से यह मप्र का सर्वाधिक साक्षर जिला रहा है. इसका रेल्वे स्टेशन भारत का सर्वाधिक स्वच्छ (भारतीय रेलवे स्टेशन और स्वच्छता? ये बात कुछ हजम नहीं हुई?) स्टेशन रहा है. इंदौर में पहले पहल इंटरनेट आया तो एसटीडी के जरिए रतलाम को भी इंटरनेट की सुविधा मिली. एक पृष्ठ को लोड होने में पाँच मिनट लगते. दस दफ़ा इंटरनेट एक्सेस की कोशिश करते और एकाध बार सफल होते. दसियों बार लाइन ड्रॉप होता. उसी दौरान याहू पर अपना आईडी बनाया. जब मनपसंद आईडी याहू ने रिजेक्ट कर दिया तो अचानक सूझा – raviratlami. और फिर बाकी तो इतिहास है.

जब आप लंबे अरसे से किसी स्थान पर रह रहे होते हैं तो आसपास के वातावरण, गली कूचे, लोग – सभी से लगाव हो जाता है. यहां तक कि सूखे पेड़ से भी और गली के खाज युक्त कुत्ते से भी जिसे यदा कदा आप रोटी डाल देते हैं (पर, सुना है कि महानगर वासियों को अब इस जुर्रत पर जुर्माना भरना होगा).

और, यदि आप दो दशक तक एक स्थान पर रह रहे हों और अचानक आप को वहां से बेदखल कर दिया जाए तो आप अपनी स्थिति किस तरह से बयान करेंगे?

कुछ इसी स्थिति में मैं अपने आप को यहाँ पाता हूं. कल ही हमने रतलाम से अपना बोरिया बिस्तरा बांधा और पहुँच गए भोपाल. जब भोपाल में अपना डेरा जमाने की बात आई थी तो मन में सबसे पहले ख्वाब आया था कि काश भोपाल की झील के किनारे थोड़ी सी ऊँचाई पर मकान हो, और मकान की गैलरी से झील की शांत लहरें दिखाई देती हों तो कितना अच्छा हो.

और, देखिये मेरा यह ख्वाब हकीकत में बदल गया. (हालांकि यह अभी किराए पर लिया हुआ अस्थाई निवास है,).

bhopal view from esquire appartments

फ्लैट की गैलरी से भोपाल के छोटे ताल का नजारा.

पाओलो कोएलो की कही बात याद आ गई – सपने देखो. दिल से. विश्व की तमाम ताक़तें आपके उस सपने को साकार करने की साजिशें करेंगी और अंततः आपका सपना पूरा होगा...

mind reading machine

खांटी चिट्ठाकार के पास माइंड रीडर मशीन आ गई तो उसने सोचा कि क्यों न अपने चिट्ठापोस्टों के टिप्पणीकारों के दिमागों में झांक कर देखा जाए. प्रतिफल ये रहे–

  • टिप्पणी थी – बहुत बढ़िया, लिखते रहें. मशीन ने बताया : एकदम घटिया! क्या बेकार लिखा है. तुम चिट्ठा लिखते आखिर क्यों हो? कोई और काम नहीं है इसका मतलब ये तो नहीं....
  • टिप्पणी थी – मजा आ गया. बहुत सुंदर लिखते हैं आप. मशीन ने सही किया : मुंह का स्वाद कड़वा हो गया. इतना बेकार क्यों लिखते हैं आप?
  • टिप्पणी थी – क्या बात है, वाह! मशीन ने सुधारा : ये भी कोई बात हुई, धत्.
  • टिप्पणी थी – बहुत बढ़िया कटाक्ष किया है. मशीन ने असल बात बताई : सेंस ऑफ ह्यूमर तो है नहीं और ह्यूमर दिखाने चले.
  • टिप्पणी थी – मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं. मशीन ने असलियत उजागर की: आपकी किसी भी बात पर किसी को भी इत्तेफाक नहीं हो सकता.
  • टिप्पणी थी – बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी दी है. मशीन ने वस्तुस्थिति स्पष्ट की : क्या बासी जानकारी टीप कर परोस रहे हो
  • टिप्पणी थी - क्या लिखते हैं, हंसते हंसते बुरा हाल हो गया. अगली पोस्ट का इंतजार. मशीनी जानकारी : सचमुच बुरा हाल हो गया हंसते हंसते. लिखने चले महाभारत, लिख मारे रामायण. अब अगली पोस्ट मत ठेलना.
  • टिप्पणी थी - शब्द संचयन को माध्यम बनाकर बड़ी गहरी बात कह डाली. मशीन ने सुधारा : शब्दों के बड़े जादूगर बनने चले हो, जो कह रहे हो, वो समझ भी रहे हो?
  • टिप्पणी थी – बहुत गहरी अभिव्यक्ति है, मजा आ गया. मशीन ने सत्य बात बताई : अत्यंत छिछली किस्म की अभिव्यक्ति. बोर कर दिया.
  • टिप्पणी थी - शब्दों के माध्यम से बहुत सुंदर चित्र खींचा है, साधुवाद स्वीकारें. मशीन ने सत्यता बयान की: शब्दों के ऊलजलूल प्रयोग से कभी पोस्टें बनती हैं? राक्षसवाद स्वीकार करें.
  • टिप्पणी थी – कहां से लाते हैं इतनी बढ़िया फोटो. मशीनी सुधार : फ्लिकर से मार मार कर अपनी पोस्ट सजाते हो, शर्म करो.
  • टिप्पणी थी – कहाँ थे अब तक, छा गए. मशीन का कटु-सत्य : अब तक जहाँ थे, वहीं ठीक थे. कचरा फैलाने क्यों आ गए.

(टिप्पणियाँ – इस चिट्ठा पोस्ट से साभार)

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हिन्दी / मराठी टाइप करने में समस्या है? तेजी से टाइप नहीं कर पाते हैं? फोनेटिक टाइप कर कर उंगली दुख जाती है? आपके लिए कुछ उपाय तो हैं, जिन्हें सीख कर आप हिन्दी / मराठी त्वरित गति  से टाइप कर सकते हैं.

 

और, हिन्दी मराठी फटाफट और धपाधप टाइप करना सीखने के लिए किसी वीडियो ट्यूटोरियल से अच्छा भला और क्या हो सकता है?

 

तो देखिए वीडियो की पहली किश्त:

 

हिन्दी मराठी शीघ्र टाइपिंग सिखाने वाली वीडियो की दूसरी किश्त:

 

इसे बेहद प्रोफ़ेशनल अंदाज में तैयार किया है लीना महेन्दले ने. उन्हें धन्यवाद.

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28 वर्षों का रेकॉर्ड तूने तोड़ दिया. ले देकर, बड़ी मेहनत से, बड़ी मुश्किल से 1 अरब से अधिक भारतीय जनता ने 25 वर्षीय सिल्वर जुबली रेकॉर्ड बनाया था और उसे आगे बढ़ाकर 50 वर्षीय गोल्डन जुबली रेकॉर्ड (28 तो हो ही गया था, बस बाईस ही तो बचे थे,) के सपने देख रहे थे, उसे तूने अपने एक स्वर्ण पदक से, एक क्षण में ढहा दिया. क्या मिला अभिनव, तुझे क्या मिला? तुझे 1 अरब भारतीयों का खयाल नहीं रहा. उनके सपनों का खयाल नहीं रहा. उनके गोल्डन जुबली बनाने के रेकॉर्ड के सपने को तूने अपने एक गोल्डन पदक से टाइड की तरह चकाचक धो कर रख दिया.

अभिनव, तेरे इस पदक से हम भारतीयों को और भी ढेरों, भयंकर समस्याएं पैदा हो गई हैं. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक. और इन समस्याओं के पीछे तुम्हारा ही हाथ होगा. वैसे भी भारत में समस्याएँ कुछ कम थीं क्या जो तुमने एक और समस्या ला खड़ी की है? तमाम भारतीय और युवा खिलाड़ी अब ओलंपिक पदकों के सपने देखने लगेंगे. सरकारी-गैर सरकारी तंत्र और भारतीय ओलंपिक खेल संघ भी अब इस सच्चाई को स्वीकारेंगे कि सचमुच भारतीय खिलाड़ियों द्वारा कोई पदक जीता भी जा सकता है, और वे इस समस्या का हल जोरों से तलाशने लगेंगे जो उनके लिए और भी बड़ी समस्या होगी. अभी तक तो ओलंपिक पदकों के सपने देखने के कोई मायने ही नहीं थे – क्योंकि हम सभी 1 अरब भारतीय तो पदक विहीनता का 50 वर्षीय रेकॉर्ड बनाने के सपने देखने में लगे हुए थे. अब जब तूने उसे ध्वस्त कर दिया है अभिनव, तो बताओ पदक विहीनता के इस रेकॉर्ड को नए सिरे से बनाने में कोई फायदा है क्या? इससे अच्छा तो पदक हासिल करने के सपने देखे जाएं. और यही अब हम 1 अरब से अधिक भारतीय करेंगे. और, यहीं पर समस्या आएगी. ये तो तुम्हें भी मालूम होगा अभिनव, ऐसे सपने देखने से कुछ हासिल नहीं होगा. न नेम न फेम. और न मनी. ये कोई क्रिकेट थोड़े ही है.

ये कोई क्रिकेट थोड़े ही है जहाँ सट्टे बट्टे में नाम-दाम दोनों कमा लिए और एक ठो बैट, एक ठो बॉल और तीन लकड़ी के डंडे लेकर बीच सड़क पर या चौराहे पर प्रेक्टिस के लिए निकल लिए, और युवराज या पठान की तरह निकल लिए. तीरंदाजी हो या तैराकी, इनकी प्रेक्टिस के लिए भारत में न गली कूचों में सुविधा है, न अनंत काल तक होगी. बस हम सपने देखते रहेंगे. आसमानी, रिक्त, कभी पूरे न होने वाले सपने. ये तूने क्या किया अभिनव? हम भारतीयों के लिए ये सपने क्यों ले आया अभिनव?

बच्चा कभी खेलता कूदता नजर आएगा तो माँएं अपने बच्चों को कुछ इस तरह टांट मार कर डांटा करेंगी – चल चल, अच्छा अभिनव बनने चला है (क्योंकि 28 साला रेकॉर्ड ब्रेक कर किंवदंती तो तुम बन चुके हो, जिसके लिए तुम्हें हमारा प्रणाम.). या कभी बच्चे किताबों में सिर खपाए मिला करेंगे तो इसके उलट बातें सुनने को मिला करेंगी – जब देखो तब किताब में सिर खपाए मिलता है – जरा घंटा भर खेल आता तो तुझमें भी अभिनव के कुछ लक्षण आ जाते... यानी आगे से संकट और पीछे से महा संकट. किस संकट में डाल दिया तूने हम भारतीयों को अभिनव?

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(चित्र – साभार तरंग)

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tag – abhinav bindra, Olympic gold medal shooting 2008

even god cant help india sala
व्यंज़ल


इवन गॉड कान्ट हेल्प साला
फिर चिंता किसको है साला


ये हालत हुई तो किस तरह
क्या और कैसा सवाल साला


होगा ये देश किसी और का
न तो मेरा न तेरा है साला


पता है कुछ हो नहीं सकता
सपना क्यों देखता है साला


पैदा तो रवि भी देशभक्त था
वो भी पूरा बदल गया साला
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Tag – satire, god can’t help india, supreme court ruling, public interest litigation

व्यंग्य

Vynagya

        जीवन के चार दशक गुजार लेने के बाद पीछे मुड़कर जब मैंने देखा तो पाया कि मैं सफल तो कतई नहीं कहलाऊंगा। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के कोई खास झंडे गाड़े हों, जब मुझे दिखाई नहीं दिया तो मैं उदास हो गया। इसी उदासी में मैं टहलने निकल गया। सोचा था इस उदासी को गायों-गोल्लरों, ट्रैफ़िक और धूल भरी सड़कों में उड़ाकर आ जाऊंगा। वैसे भी, ऑटो-टैम्पो और सड़क के दोनों ओर रेहड़ी-खोमचे-ठेलों की भीड़ के बीच यदि आप सकुशल एक दो किलोमीटर की यात्रा बिना ठुके-ठोंके सप्रयत्न कर आएं, तो आपकी उदासी यकीनन कई दिनों के लिए छूमंतर हो जाएगी।

सड़क में एक सांड के सींग से बचने की कोशिश में मैं सीधे एक फेरी वाले के ठेले के ऊपर जा गिरा। वो कुछ सज्जन किस्म का आदमी था जिसने मुझे पलट कर गालियाँ नहीं दीं और मुझे तत्परता से उठाया। मेरी भी सज्जनता कुछ जागी और मैं ठेले पर विक्रय के लिए रखी सामग्रियों को उचटती निगाह से देखने लगा। वो किताब की दुकान थी। तमाम तरह की किताबें विक्रय के लिए उपलब्ध थीं। उन सबमें सबसे ऊपर एक किताब का चमकीला शीर्षक चमक रहा था - "उठो महान बनो"।

जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है।

आह! यही तो मैं खोज रहा था। मैं सफल बनना चाह रहा था, महान बनना चाह रहा था। जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है। कांपते हाथों से मैंने उस किताब को उठाया। डरते डरते उसकी कीमत देखी - कहीं यह हजारों में न हो - महान बनाने वाली महान किताब कहीं कीमत में भी महान न हो। कीमत से तसल्ली हुई। वो जेब पर बहुत भारी नहीं हो रही थी। मैंने तत्काल उसे खरीद लिया और सीधे घर की ओर वापस लपका।

अब मेरे महान बनने में चंद लमहों की ही देरी थी। किताब का आद्योपांत पाठन करना था। चंद बातों को जीवन में उतारना था और बस हो गया। लौटते समय मेरे कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कल्पना में मैंने देखा कि मैं महान से महानतम बन गया हूं और तमाम दुनिया के लोग मेरे अनुयायी बन गए हैं और मेरे जयकारे लगा रहे हैं। घर आकर मैंने बीवी की ओर हिकारत भरी नजरों से देखा कि वो हमेशा मुझे मेरी औकात से कम आंका करती है, मेरी असफलताओं पर टोकती रहती है, मेरे निठल्लेपन के ताने कसती रहती है, अब देखना - तेरा वही निठल्ला पति देखते देखते ही कैसे महान बनता है।

नहा-धोकर, किताब में धूप-बत्ती देकर उसका पारायण प्रारंभ किया। आंखें मुंद रही थीं, सिर भारी हो रहा था, मुँह से उबासी दूर हो नहीं रही थी, मगर मैं किताब पढ़ता रहा। इतनी गंभीरता से तो मैंने अपने बोर्ड के इम्तिहान की पढ़ाई भी नहीं की थी। मगर यहाँ मामला महान बनने का जो था। सो गुंजाइश ही नहीं थी। अठारह घंटे छत्तीस मिनट में किताब एक ही बैठक में आद्योपांत पढ़ गया। इस बीच कोई छब्बीस कप कॉफ़ी के उदरस्थ कर लिए और बीबी के छः ताने और स्मित हास्य के कोई आठ वार भी झेल लिए। किताब को मैंने पूरा पढ़ लिया था। उठो महान बनो। अब मैं उठ सकता था। मैं उठा और सीधे बिस्तरे पर जा गिरा। उसके बाद दो दिनों तक सोता रहा।

उठो महान बनो नाम की किताब पढ़ने के महीनों बीत जाने के बाद भी मुझे मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। मैंने तो उसमें बताए तौर तरीकों को अपने ऊपर ओढ़ने आजमाने की ईमानदार कोशिश की थी। मगर महानता शायद मुझसे कोसों दूर थी। या इस शब्द से मेरा छत्तीस का आंकड़ा था। मैं फिर से गहन उदासी के दौर में फंस गया था।

मैं एक बार फिर उदासी दूर करने घूमने निकला तो अपने आपको उसी किताब दुकान पर पाया। इस दफ़ा सबसे ऊपर एक किताब चमकती दिखाई दे रही थी - "बेस्ट सेलर - कैसे पाएं सफलता।" वल्लाह! क्या किताब है। एकदम सही। सही समय पर सही किताब मिली मुझे। मैं अब तक हर क्षेत्र का असफल आदमी सफलता ही तो चाहता था। मुझे लगा कि दुनिया का हर सफल आदमी इस किताब में से होकर निकला है। और अब मेरी बारी है। मैंने अपनी जेब कुछ ढीली की और इस किताब को ले आया।

मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज-ब-रोज, उसी रफ़्तार से, कम होती रहीं।

इस दफ़ा मैंने इस किताब के हर हिस्से को गौर से पढ़ा। ये नहीं कि अखंड-रामायण पाठ की तरह एक बैठक में पढ़ मारा। मैंने नोट्स बनाए, सूत्रों को, वाक्यांशों को रटा। मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज ब रोज कम होती रहीं - उसी रफ़्तार से। उनमें भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और मेरी सफलता में भी बाल बराबर फर्क नजर नहीं आया। मैं फिर निराश हो गया।

निराशाओं के ऐसे दौर आते रहे और मैं अपनी निराशा दूर करने सड़क नापता रहा, सांड के सींग खाता रहा, और किताब दुकान पर गिरता रहा। वहां से अपने आपको बदलने के लिए, सफल होने के लिए, धनी बनने के लिए, स्मार्ट बनने के लिए, सुखी बनने के लिए, व्यवहार कुशल बनने के लिए तमाम किताबें लाता रहा, और पढ़ता रहा। मगर परिस्थितियों को नहीं बदलना था सो नहीं बदलीं। मेरे घर के दरवाजे की दिशा दक्षिण की ओर थी और वो भी वैसी ही बनी रही।

घोर निराशा में मैंने इन सारी किताबों को एकत्र किया और उस दुकान में वापस फेंकने के लिए ले गया। मैंने किताबों का गट्ठर उसके ठेले पर दे मारा। मारे क्रोध के मेरा माथा भन्ना रहा था मैं उसे क्रोध में कुछ बोलता - कि वो कैसी अनुपयोगी, बेकार, रद्दी अप्रभावी किताबें बेचता है - सामने एक नई नवेली चमचमाती किताब पर मेरी नजर पड़ी। किताब का नाम था - "चिंता छोड़ो सुख से जिओ"। आह! तो ये है अल्टीमेट, अंतिम किताब। मेरा गुस्सा काफूर हो गया। मैंने तत्काल उसे खरीदा और प्रसन्न मन घर वापस आया।

chinta choro sukh se jiyo

मेरी निराशा दूर हो चुकी है। हमेशा के लिए। ऐसा नहीं है कि मैंने किताब का पाठ कर लिया है और उसे पूरा पढ़ लिया है और उसके उपदेशों को जीवन में उतार लिया है। दरअसल, जब भी मैं उसे पढ़ने के लिए उठाता हूं, और उसका शीर्षक पढ़ता हूँ, मेरी सारी दुश्चिंताएं हवा में विलीन हो जाती हैं। मैं सारी चिंता वहीं छोड़ देता हूं – यहाँ तक कि उस किताब को पढ़ने की चिंता को भी और मैं सुख से जीने लग जाता हूं। किताब को मैंने अपने इबादतगाह में सबसे ऊपर रख दिया है और इसका शीर्षक ही मुझे रोज-ब-रोज, हर वक्त प्रेरित करता रहता है। यह वो किताब है - ओह माफ कीजिए, यह किताब का वो शीर्षक है, जिसने मेरे जीवन में सर्वाधिक प्रभाव डाला है। जय हो।

मैं सफल हो गया हूँ। मैं महान हो गया हूँ। मैं धनवान, अरबपति हो गया हूँ - क्योंकि अब मैं इन बातों के लिए कतई कोई चिंता नहीं करता।

आप बताएं, क्या आप सफल होने की चिंता करते हैं? क्या आप सफल होना चाहते हैं? यदि हाँ, तो मेरी सलाह मानें - "चिंता छोड़ो सुख से जियो" नाम की यह किताब खरीद लाएं। पढ़ने व आत्मसात करने के लिए नहीं, उसकी पूजा करने के लिए – उसका नित्य दर्शन करने के लिए, जैसे कि मैं करता हूं। सफलता आपसे सिर्फ एक किताब की दूरी पर है.

(निरंतर में पूर्व-प्रकाशित)

Tag: Hasya Vyangay, satire, funny stories, hindi hasya vyangya, books for self improvement

pothi

हिन्दी चिट्ठों की पहले-पहल (ठीक है, ठीक है, चलिए मान लिया कि ये सही भी नहीं है और किसी भी कोण से कोई तीर मारने वाली बात भी नहीं है, :)) छपी किताब (चिट्ठे की संकलित सामग्री का पुस्तकाकार रूप) यहाँ उपलब्ध है. और दूसरी यहाँ. इन किताबों को ऑनडिमांड प्रिंट तकनॉलाजी के जरिए छापा जाता है जिसे आप ऑनलाइन खरीद सकते हैं. यानी किताब का छपा संस्करण उपलब्ध नहीं होता है, मगर आपका आदेश प्राप्त होते ही उतनी संख्या में किताब छाप कर आपको भेज दी जाती है.

वैसे तो ऑनडिमांड प्रिंटिंग तकनॉलाजी नई नहीं है. ब्लॉग को प्रकाशित कर पुस्तक रूप में प्राप्त करने व बेचने की सुविधा पहले से ही उपलब्ध रही है. ऐसी ही एक सुविधा ब्लॉग2प्रिंट है जहाँ आप किसी भी चिट्ठे का यूआरएल भर कर उसे पुस्तकाकार रूप में छपवा कर पैसा देकर मंगवा सकते हैं. आप अपने ब्लॉग को वहां पंजीकृत करवाकर ब्लॉग (के छपे) पुस्तक के विक्रय होने पर आप रायल्टी भी वसूल कर सकते हैं.

कुछ इसी तरह की, नए किस्म की पहल की गई है भारतीय साइट पोथी.कॉम के जरिए. पोथी.कॉम के जरिए आप न सिर्फ अपनी किताबें छपवा सकते हैं, बल्कि उन्हें इस साइट के जरिए विक्रय भी कर सकते हैं. और, यदि आपके पास ब्लॉग का भरपूर मसाला है तो फिर क्या कहने. बस अपने ब्लॉग प्रविष्टियों में से कुछ छान-फटक कीजिए (चाहें तो आद्योपांत पूरा ब्लॉग भी छपवा सकते हैं, अनानिमस टिप्पणियों समेत,) किताब का मुख पृष्ठ और अंतिम पृष्ठ डिजाइन कीजिए और अपनी फ़ाइलें पोथी.कॉम को अपलोड कर दीजिए बस. आप चाहें तो यह काम पोथी.कॉम को भी सौंप सकते हैं जो मात्र 500 रुपए के न्यूनतम शुल्क पर आपको यह शुरुआती सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. बस, आपको अपनी रचना, अपना लेखन मसाला अपलोड करने की देरी है और आपकी किताब पोथी.कॉम के साइट पर प्रकाशित हो जाएगी – बिना किसी झंझट, बिना किसी समस्या और, बिना किसी शुल्क के. आप चाहेंगे तो पोथी.कॉम आपको आपकी किताब की रायल्टी भी देगी. आप अपनी प्रत्येक विक्रय की गई पुस्तक पर जितनी रायल्टी प्राप्त करना चाहते हैं वह निर्दिष्ट कर दें बस.

अब आपके पाठक आपकी किताबों की प्रतियाँ पोथी.कॉम से सीधे खरीद सकते हैं. किताबें खरीदने के लिए भी विविध विकल्प हैं – आप पेपॉल-क्रेडिट कार्ड के जरिए, मनीऑर्डर या चेक/डीडी के जरिए या फिर इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर के जरिए भुगतान कर सकते हैं और भुगतान प्राप्त होते ही पोथी.कॉम आपकी किताबें प्रिंट (ऑनडिमांड प्रिंटिंग तकनीक का प्रयोग कर) कर आपको 2-5 कार्य दिवस में भेज देंगे.

पोथी.कॉम को प्रमोट करने वालों में से एक हिन्दी ब्लॉग जगत की जानी पहचानी हस्ती जया झा हैं. आइए, इनके प्रयासों को तहे दिल से सराहें.

कैसे? पोथी.कॉम के जरिए अपनी किताबें प्रकाशित करवा कर और वहाँ से किताबें खरीद कर!

और, शुरूआत आप मेरी इन किताबों की खरीद से कर सकते हैं – रविरतलामी के व्यंग्य (272 पृष्ठ, 256 रुपए मात्र)

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तथा रविरतलामी की ग़ज़लें और व्यंज़ल (189 पृष्ठ, 216 रुपए मात्र).

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जाहिर है, इन किताबों में मेरे ब्लॉग से संकलित सामग्री है. हाँ, मुझे इन किताबों से रायल्टी भी मिलेगी – अतः यदि आप दर्जन-दो-दर्जन खरीद लें (मित्रों-रिश्तेदारों को गिफ़्ट देने हेतु :)) तो और अच्छा.

जल्दी कीजिए, हिन्दी चिट्ठे की विश्व की पहली छपी किताब का स्टॉक सीमित है. इससे पहले कि लोग बाग़ खरीद ले भागें, और आप हाथ मलते रह जाएं, अपनी प्रति सुनिश्चित कर लें. आज, अभी ही!

क्या कहा? अच्छा अच्छा – ऑन डिमांड प्रिंट में न तो कभी स्टॉक रहता है और न कभी खाली होता है? आपने सही कहा. पर पहले पहल ऑर्डर नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं?

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वैसे तो अब पुराने हिन्दी फ़ॉन्ट जैसे कि कृतिदेव, चाणक्य, आगरा इत्यादि को यूनिकोड में (और इसके ठीक उलटे यानी यूनिकोड हिन्दी फ़ॉन्ट को पुराने हिन्दी फ़ॉन्ट में बदलने के लिए,) बदलने के लिए कई उपाय हैं, मगर ब्लॉगवाणी का नया फ़ॉन्ट कनवर्टर बेहद आसान, बढ़िया, त्वरित परिणाम देने वाला है और परिवर्तन किए पाठों में करीब 99 प्रतिशत शुद्धता प्रदान करता है.

इसका दो खिड़कियों वाला इंटरफेस इस्तेमाल में आसान है. ऊपर की खिड़की में जिस पाठ का फ़ॉन्ट बदलना है उसे चिपकाइए, और कनवर्ट बटन दबाइए. नीचे की खिड़की से परिवर्तित पाठ को नक़ल कर अपने वर्ड प्रोसेसर में प्रयोग कीजिए.

अभी इस औजार में बेहद लोकप्रिय तीन फ़ॉन्ट – कृतिदेव, चाणक्य और आगरा को परिवर्तित करने की सुविधा है. इसमें शुषा, श्रीलिपि जैसे कुछ अन्य लोकप्रिय फ़ॉन्ट को भी परिवर्तित करने की सुविधा मिलती तो ज्यादा बेहतर होता. उम्मीद है इस औजार के अगले संस्करणों में यह सुविधा मिलेगी.

इस औजार की ख़ूबी यह है कि आप इसे ऑनलाइन यहाँ से भी प्रयोग कर सकते हैं और इसे डाउनलोड कर अपने कम्प्यूटर पर ऑफलाइन मोड में सीधे चला सकते हैं

डाउनलोड योग्य यह औजार मात्र 114 किबा का है, यानी आकार में अत्यंत छोटा. वैसे इसे प्रयोग करने के लिए आपके कम्प्यूटर पर .net एनवायरनमेंट संस्थापित होना आवश्यक है.

इंडीनेटर फ़ॉन्ट कनवर्टर यहाँ से डाउनलोड करें या सीधे ऑनलाइन यहाँ से चलाएं

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प्र.: वास्तविक आनंद क्या है?
उ.: चिट्ठाकारी.

प्र.: आपके स्वप्न क्या हैं?
उ.: एक खूबसूरत दिन जब आपकी अपनी शारीरिक आवश्यकताएँ भी बेमानी हो
जाएँ और आप ब्लागिंग के अलावा कुछ नहीं करें.

प्र.: जब आप ब्लागिंग नहीं करते हैं तो क्या करते हैं?
उ.: वही काम करता हूं जो मुझे यथासंभव ब्लागिंग में वापस ले जाते हैं.

प्र.: यदि दुनिया में चिट्ठाकारी नहीं होती?
उ.: काल्पनिक प्रश्नों के उत्तर नहीं होते – काल्पनिक उत्तर भी नहीं.

प्र.: आपने किस उम्र में ब्लागिंग प्रारंभ किया?
उ.: काश मैं और पहले ब्लागिंग प्रारंभ कर सकता.

प्र.: अपने एक सम्पूर्ण दिन की व्याख्या करेंगे?
उ.: ब्लागिंग खाना, ब्लागिंग पीना और हां, ब्लागिंग सोना!.

प्र.: एक अच्छे ब्लॉगर के क्या सीक्रेट हैं?
उ.: हमेशा दिल लगाकर, तन-मन-धन से ब्लॉग करो!

प्र.: क्या आपको किसी से प्यार हुआ है?
उ.: हाँ, जाहिर है, चिट्ठाकारी से, और मैं अपने चिट्ठे से भी बेहद प्यार करता हूँ.

प्र.: यदि आप ब्लागिंग की दुनिया में नहीं होते तो किस क्षेत्र में होते?
उ.: ओह! यह प्रश्न हमेशा से मुझे सताता रहा है. मैं इसका उत्तर नहीं दे सकूंगा.
(आंखें डबडबा जाती हैं)

प्र.: आपके जीवन का दर्शन क्या है?
उ.: मैं ब्लॉगिंग में यकीन करता हूं… हमेशा.

प्र.: अपने खाली समय में आप क्या करते हैं ?
उ.: ब्लॉग लिखता हूँ. दूसरों के ब्लॉग पढ़ता हूं.

प्र.: आपकी प्रेरणा कौन है?
उ.: ब्लॉग्स. और वे हमेशा मुझे और ज्यादा संजीदगी से और ब्लॉग लिखने को प्रेरित करते हैं.

प्र.: ब्लॉगिंग की परिभाषा देंगे?
उ.: ब्लॉगिंग तो आपके दिल की आंतरिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है जिसे आप अपने लेखन, चित्र, ऑडियो, वीडियो, और ऐसे ही अन्य विविध माध्यमों के द्वारा समस्त विश्व को प्रस्तुत करते हैं.

प्र.: आपके ब्लॉग की विशेषताएँ क्या हैं?
उ.: मैं सिर्फ ब्लॉग लिखना चाहता हूं. वास्तविक मनुष्यों के लिए वास्तविक ब्लॉग.

प्र.: आप किसे पसंद करेंगे – बुद्धि या धन?
उ.: दोनों में से किसी को भी नहीं. मैं ब्लॉगों, ब्लॉगरों को पसंद करता हूँ. यदि फिर भी आप जोर देंगे तो मैं धनी होना पसंद करूंगा चूंकि फिर मैं ढेरों ब्लॉगरों को मेरे लिए ब्लॉगिंग के लिए हायर कर सकूंगा.

प्र.: आपके विचार में प्यार का बोध क्या हो सकता है?
उ.: प्यार तो मन की एक अवस्था है जिसमें हर वस्तु – अच्छी हो या बुरी - अत्यंत प्रिय लगती है. उदाहरण के लिए, जब आप ब्लॉग लिखते हैं तो ब्लॉग के प्रथम कुछ पंक्तियों में ही जो गूढ़ार्थ निकल आता है – आपको वह अच्छा लगता है.
मुझे तो लगता है कि हर किसी को ब्लॉग और ब्लॉगरों से प्यार करना चाहिए.

प्र.: “रविरतलामी के ब्लॉग” के बारे में आपके विचार?
उ.: शानदार. जब ब्लॉगिंग के बीच कभी कोई ब्रेक मैं ले लेता हूँ, जो जाहिर है, कभी कभार ही होता है, तो यहाँ ब्लॉग पढ़ने आता हूँ.

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