July 2008

beware of social web sites

कुछ समय तक हमें स्पैम ईमेल अच्छा खासा परेशान करते रहते थे. काम के कोई तीन ईमेल मिलते थे तो साथ में सस्ती वायग्रा और व्यक्तिगत ऋण के तीन दर्जन. इस बीच तकनॉलाजी थोड़ी परिष्कृत होती गई तो ईमेल सेवा प्रदाता जीमेल और याहू तथा हमारे ईमेल क्लाएंट – आउटलुक/थंडरबर्ड के स्पैम फ़िल्टर भी थोड़े चालाक होते गए और ऐसे ईमेल संदेशों को पकड़ कर तत्काल मिटाने लगे. इस तरह हमारा आवक बक्सा इक्का दुक्का स्पैम को छोड़ दें, तो एक बार फिर से साफ सुथरा रहने लगा.

मगर इस बीच इंटरनेट के प्रयोक्ता ज्यादा सामाजिक होने लगे. जाल स्थल में भी सामाजिकता अपना पैर पसारने लगी. वैसे भी मनुष्य सामाजिक प्राणी है. उसे समाज में घुल मिल कर, भीड़ भड़क्के में रहने में आनंद आता है. इसी लिए मेले ठेले में और डलास के जुआघरों में भीड़ की भीड़ उमड़ पड़ती है. कुछ होशियार प्रोग्रामरों ने जाल स्थल को भी सामाजिक स्थल बना दिया. ओरकुट, फेसबुक, लिंक्डइन और न जाने तमाम तरह की सामाजिक साइटें देखते देखते नमूदार हो गईं. और अब वहां भी भीड़ की भीड़ जमी और जुटी हुई रहती है.

आप ओरकुट में अपना प्रोफ़ाइल बनाते हैं, दोस्तों का समूह खड़ा करते हैं, तो देखते हैं कि उधर फेसबुक में भी लोगबाग आपका इंतजार कर रहे हैं. वहाँ भी अपने को अपना प्रोफ़ाइल बनाना है. लिंक्डइन की तो बात ही क्या – उसमें तो फ़ॉर्चून 500 सूची के कोई दो ढाई सौ लोग भी हैं. उसे तो किसी सूरत छोड़ ही नहीं सकते. उधर माइस्पेस और फ्रेंडस्टर ने आपका क्या बिगाड़ा है भाई? तो, चलिए वहाँ भी अपना प्रोफ़ाइल बना ही लेते हैं – सामाजिक तो हैं ही हम. जितना ज्यादा से ज्यादा समाज से जुड़ें उतना ही अच्छा.

पर, अब ये सामाजिक साइटें समस्या बनती जा रही हैं. अब आप जितने ज्यादा सामाजिक होंगे उतनी ज्यादा समस्याएं होगीं. इन साइटों की संख्या कब की सैकड़ा पार कर चुकी है. ऊपर से नई नई सामाजिक साइटें नित्य बनती जा रही हैं और उनमें आपका कोई न कोई मित्र जुड़ता है तो वो चाहता है कि आप भी उस सामाजिक साइट से जुड़ जाएं – मित्रता निभाएं. अब मेरे ईमेल बक्से में स्पैम के बजाए इस तरह के संदेश ज्यादा आने लगे हैं –

raviratlami,
I'd like to add you to my travel network on WAYN
आपका प्यारा मित्र (नाम हटा लिया गया है)
Here is the link:
कड़ी (कड़ी हटा ली गई है)
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What is WAYN?
WAYN (Where Are You Now?) is the global meeting place.

· Meet people from different places

· Share your traveling experiences

· Make a difference on global issue

और जानें... (कड़ी हटा ली गई है)

या फिर कुछ इस तरह के संदेश –

Check out my Facebook profile

I set up a Facebook profile where I can post my pictures, videos and events and I want to add you as a friend so you can see it. First, you need to join Facebook! Once you join, you can also create your own profile.
Thanks,
आपका प्यारा दोस्त (नाम हटा लिया गया है)

और कुछ इस तरह के भी –

आपका प्यारा दोस्त (नाम हटा दिया गया है) would like to be your friend on hi5!

I set up a hi5 profile and I want to add you as a friend so we can share pictures and start building our network. First you need to join hi5! Once you join, you will have a chance to create a profile, share pictures, and find friends.
Thanks,
आपका प्यारा दोस्त

हाई फ़ाइव से जुड़ें (कड़ी हटा ली गई है)

अभी मैं यह लिख ही रहा था कि एक जीमेल की खिड़की चमकने लगी. जाहिर है, एक नया ईमेल आया था. देखा तो एक और मित्र का निमंत्रण था –

Hi,
आपके प्रिय दोस्त ने sent you a friend request from www.Paisawaisa.com.
To accept/reject this request click on the below link:
(कड़ी हटा ली गई है)
To check the sender's profile click on the below link:
(कड़ी हटा ली गई है)


If you are not a member of Paisawaisa and would like to join it, click on the below link
(कड़ी हटा ली गई है)

अब भयंकर दिक्कत की बात ये है कि इस तरह के नए सामाजिक साइटों के लिए आने वाले ईमेल स्पैम नहीं हो सकते – क्योंकि आमतौर पर ये आपके प्रिय मित्रों, परिचितों के जरिए से, और आमतौर पर स्वचालित रूप से उन सामाजिक साइटों से भेजे गए होते हैं और इसलिए इनसे बचना नामुमकिन है.

अब यदि मैं इन सभी सामाजिक जाल स्थलों में जुड़ने का निमंत्रण स्वीकार कर लूं, तो इन साइटों में अपना प्रोफ़ाइल बनाते व इनमें जुड़े अपने दोस्तों के प्रोफ़ाइलों को देखते ही मेरी जिंदगी पूरी हो जाएगी, और शायद फिर भी समय कम पड़े. जैसा कि पहले भी कहा है, ऐसी सैकड़ों साइटें हैं और दर्जन भर के हिसाब से रोज नए बन रहे हैं. किसी में कुछ नया है तो किसी में कुछ. किसी में कुछ खास है तो किसी में कुछ. सवाल ये है कि किस सामाजिक साइट से जुड़ा जाए और किस से नहीं. फिर यदि आपका जिगरी दोस्त किसी सामाजिक साइट से जुड़ जाता है, वो वहां अपना प्रोफ़ाइल बना लेता है तो फिर तो आपको वहां अपना प्रोफ़ाइल बनाना ही पड़ेगा – उसकी पूरी सुविधा का पूरा लाभ उठाने के लिए.

एक सामाजिक जाल स्थल कुछ समय पहले आया था – शेल्फरी. उसमें प्रयोक्ता अपने द्वारा पढ़े गए किताबों के बारे में बता सकता है कि मैंने ये ये इतनी किताबें पढ़ रखी हैं और अभी मैं ये पढ़ रहा हूं. अपना ज्ञान झाड़ने के लिए - भइये मैंने ये और इतनी किताबें पढ़ रखी हैं – तूने कितना पढ़ा है? तेरा ज्ञान कितना है – तो ठीक है. पर मेरे जैसे लोगों के लिए इससे क्या लेना देना कि भइए, तूने कितना, क्या पढ़ा है, क्या पढ़ रहा है और आइंदा क्या पढ़ने वाला है. और यदि मैं शेल्फरी के जरिए दुनिया को बता दूं कि मैंने रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, कुरान, बाइबिल, ग्रंथसाहब सब पढ़ रखा है तो क्या दुनिया मेरी विद्वता का लोहा मान लेगी? मगर वो सोशल, सामाजिक साइट है, आपका दोस्त उससे जुड़ा है. उसने आपको निमंत्रण (चाहे जाने-अनजाने) भेजा है, लिहाजा आपको उसका सदस्य बनना है और वहाँ अपनी पढ़ी और पढ़ी जाने वाली किताबों को दर्ज करना है.

हालात ये हैं कि आज की स्थिति में मेरे इनबॉक्स में अढ़ाई दर्जन ऐसे निमंत्रण है. आत्मीय, मित्रता से भरपूर. इन्हें न स्पैम की तरह फेंक पा रहा हूं, न इनका निमंत्रण स्वीकार कर पा रहा हूं – आखिर कितनी सामाजिक साइटों में मैं अपना फोटू और अपनी रुचियाँ भरूं? इन आमंत्रणों में दिनों दिन इजाफ़ा भी होता जा रहा है.

इनसे बचने का कोई बस एक ही जरिया मुझे समझ में आ रहा है -

 

हेल्प! मदद! SOS! बचाओ! कोई मुझे इन सामाजिक साइटों से बचाओ!

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(प्रभासाक्षी में संपादित रूप में पूर्व प्रकाशित)

- बालेन्दु दाधीच

पिछले साल 13 मार्च को मुझे माइक्रोसॉफ्ट के आमंत्रण पर उसके रेडमंड (सिएटल) स्थित विश्व मुख्यालय का दौरा करने, उसके संस्थापक बिल गेट्स से मिलने और उन्हें सुनने का अविस्मरणीय अवसर मिला। उनकी चौंका देने वाली तकनीकी और व्यावसायिक सफलता के अलावा उस मौके पर जिन तीन बातों ने मुझे बेहद प्रभावित किया, वे थीं- गूढ़ तकनीकी संकल्पनाओं को आसान ढंग से अभिव्यक्त करने की उनकी योग्यता, कई साल आगे के तकनीकी परिदृश्य को भांप लेने की अद्वितीय क्षमता और उनकी सादगी। माइक्रोसॉफ्ट के एक विश्व स्तरीय सम्मेलन को संबोधित करते समय बिल कोट और टाई की बजाए स्वेटर पहनकर आए थे। वह भी एकदम तनावमुक्त, बेपरवाह शैली में। छोटी-छोटी उपलब्धियों का दिखावा करने वाले हम लोगों के लिए यह देखना एक अद्वितीय अनुभव है कि सॉफ्टवेयर का सरलीकरण और सामान्यीकरण करते हुए पूरी दुनिया की हर डेस्क पर कंप्यूटर पहुंचा देने वाला व्यक्ति, जिसकी कंपनी में अस्सी हजार के करीब कर्मचारी और दस हजार से ज्यादा मिलियनायर (वह भी डॉलर में) हैं, वह दिखावटी चीजों से पूरी तरह मुक्त, बाहर से बेहद सामान्य किंतु भीतर से कितना विलक्षण व्यक्ति है।

बिल गेट्स के शर्ट की कॉलर का एक कोना गलती से स्वेटर के गले में घुसा हुआ था, जिसे बाद में उन्होंने भाषण देते-देते बहुत स्वाभाविक ढंग से ठीक किया। जब वे बोले तो मंत्रमुग्ध कर देने वाली बातें, किंतु बेहद सरल भाषा-शैली में। तकनीकी मुद्दों पर दिए करीब पौन घंटे के भाषण के दौरान कहीं भी कोई बोझिल बात नहीं। सब कुछ बहुत दिलचस्प, रोमांचक और भविष्य के लिए उम्मीदें जगाने वाला। आज की बात करते हुए कब वे दस साल बाद की दुनिया की झलक दिखा देते थे, पता ही नहीं चलता था। लगता था, इस व्यक्ति के सपने कितने वास्तविक हैं।

उन्होंने दो अहम बातें कहीं। पहली यह कि तीस साल तक सॉफ्टवेयर की दुनिया में सबकुछ करने के बाद भी मुझे लगता है कि कितना कुछ करना बाकी है। दूसरे, उन्होंने गूगल की उभरती हुई चुनौती को विनम्रता से स्वीकार करते हुए छलकते हुए आत्मविश्वास के साथ कहा कि ‘लेकिन अभी माइक्रोसॉफ्ट की क्षमताओं का परीक्षण नहीं हुआ है। जो लोग हमें चुका हुआ करार दे रहे हैं, उन्हें हम अपनी क्षमताओं और तकनीक से आगे भी चौंका देने की क्षमता रखते हैं।‘ बाद में रेडमंड स्थित माइक्रोसॉफ्ट मुख्यालय में वास्तव में बहुत सी चौंकाने वाली तकनीकों को साक्षात् देखने और अनुभव करने के बाद महसूस हुआ कि माइक्रोसॉफ्ट और उसे संस्थापक को इतने वर्षों से जानते हुए भी हम कितना कम जानते हैं। दोनों के भीतर ऐसा बहुत कुछ है जो अभी बाहरी दुनिया में देखा जाना बाकी है।

सन 2000 में माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) का अपना पद अपने कॉलेज के दिनों के साथी स्टीव बामर के हवाले कर बिल गेट्स ने सबको चौंका दिया था। अब उन्होंने इस कंपनी के पूर्णकालिक कामकाज से पूरी तरह अलग होने का फैसला करके एक बार फिर विश्व भर में हलचल मचा दी है। कंप्यूटर की दुनिया में क्रांति करने वाले, उसे घर-घर और दफ्तर-दफ्तर में पहुंचाने वाले, दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी बनाने वाले और सॉफ्टवेयर शब्द के पर्याय बन चुके बिल गेट्स अभी सिर्फ 52 साल के हैं। लेकिन वे एक जीवित किंवदंती बन चुके हैं। तकनीकी विश्व की एक अजीम हस्ती, जिसके बिना कंप्यूटर की दुनिया की कल्पना करना असंभव होगा। तैंतीस साल के सक्रिय कारोबारी जीवन को अलविदा करके बिल गेट्स अब अपने जीवन का नया अध्याय शुरू कर चुके हैं। वे ऐसे समय पर व्यावसायिक जीवन के दांव-पेंच, छल-प्रपंच, कूटनीति-रणनीति की दुनिया से अलग हो गए जबकि वे सॉफ्टवेयर की दुनिया के शीर्ष पर थे। इससे ज्यादा शायद वे इस क्षेत्र में अर्जित कर भी नहीं सकते थे। वे ही क्या, तकनीकी क्षेत्र की कोई भी अन्य शख्सियत शायद बिल गेट्स जितनी दूर शायद ही जा पाए।

1975 में न्यू मैक्सिको में अपने एक स्कूली मित्र पॉल ऐलन के साथ मिलकर माइक्रोसॉफ्ट की स्थापना करने वाले बिल गेट्स महज 33 साल की व्यावसायिक यात्रा में उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहां फॉरच्यून पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति करीब 50 अरब डालर (लगभग दो लाख करोड़ रुपए) हो चुकी है।

आज जब बिल गेट्स ने 33 साल के बाद माइक्रोसॉफ्ट के दैनिक कामकाज से सेवानिवृत्ति ले ली है तो शायद जल्दी ही हमें उनके भीतर छिपा हुआ वह दूसरा व्यक्ति देखने को मिले जो सिर्फ तकनीक और कारोबार के बारे में नहीं सोचता, एक सफलतम वैश्विक संस्थान के प्रमुख के नाते विश्व मानवता के प्रति अपने दायित्वों को लेकर भी जागरूक है। जिस भाषण का जिक्र मैंने ऊपर किया, उसमें भी उन्होंने कहा था कि सॉफ्टवेयर की दुनिया शायद आज विश्व के लिए पहले से ज्यादा योगदान देने की स्थिति में है।

बिल गेट्स का सपना विश्व के हर घर में कंप्यूटर पहुंचाने तक सीमित नहीं है, जिसे कम से कम विकसित देशों में तो वे हासिल कर ही चुके हैं। वे विश्व को गरीबी, बीमारी और अशिक्षा जैसी समस्याओं से मुक्त, सुखद-समृद्ध विश्व बनाना चाहते हैं। अपनी पत्नी मेलिंडा के साथ जिस बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन को वे चलाते हैं वह अपनी किस्म का दुनिया का सबसे बड़ा चैरिटी संगठन है। भारत तो उन्हें विशेष रूप से प्रिय है जिसकी एक वजह यहां की सांस्कृतिक समृद्धि है तो दूसरी वजह यहां के प्रतिभाशाली युवक-युवतियां जिन्हें माइक्रोसॉफ्ट ने आगे बढ़ने का अवसर दिया और जिनकी मेधा से खुद भी लाभान्वित हुआ। रेडमंड में भारतीय होना कोई पराएपन का अहसास नहीं देता। माइक्रोसॉफ्ट में भारतीय तकनीकविद् और इंजीनियर खूब हैं और वहीं के माहौल में रच-बस गए हैं।

सिएटल को बिल गेट्स बहुत प्रिय हैं। वह उन पर गर्व करता है और उन्होंने उसे विश्व भर में वह प्रतिष्ठा दिलाई है जो अन्य शहरों के लिए दुर्लभ है। यूं सिएटल ही वह शहर है जहां पर बोइंग विमान बनते हैं और यही वह शहर है जहां से विश्व प्रसिद्ध कॉफी चेन ‘स्टारबक्स‘ की शुरूआत हुई। लेकिन बिल गेट्स की बात कुछ और है। उनके बारे में पूरे शहर में तरह-तरह की दंतकथाएं प्रचलित हैं। झील के भीतर और बाहर बने उनके घर के बारे में जिसमें तैरता हुआ हैलीपैड तो है ही, घर की हर वस्तु इंटरनेट से जुड़ी है और गेट्स भले ही विश्व के किसी भी कोने में हों, कहा जाता है कि वहीं से वे अपने घर की कई चीजों को संचालित कर सकते हैं।

सिएटल में यदि आप माइक्रोसॉफ्ट के मेहमान हैं तो शहर भर के मेहमान हैं। मैंने यह बात कई बार महसूस की। बिल और सिएटल दोनों एक दूसरे के लिए समर्पित हैं। बिल ने शहर को गौरव दिलाया है और उसे तकनीकी विश्व के अग्रणी शहरों की कतार में ला खड़ा किया है। वरना वे चाहते तो माइक्रोसॉफ्ट को वाशिंगटन, न्यूयॉर्क या सिलीकॉन वैली ले जा सकते थे।

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बालेंदु दाधीच प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक हैं. उनके अन्य आलेख आप उनके ब्लॉग मतांतर तथा वाह मीडिया में पढ़ सकते हैं

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(यह विशेष आलेख बिल गेट्स के सेवा निवृत्ति 27 जून 2008 पर लिखा गया था)

बिल गेट्स की सेवा निवृत्ति पर पढ़ें एक अन्य आलेख  अलविदा बिल गेट्स .

cuil - world's biggest search engine home page

विश्व का सबसे बड़ा (world’s biggest) सर्च इंजिन कौन सा है? आपके दिमाग में दन्न से कौंधेगा – गूगल. माफ़ कीजिए, आप ग़लत हैं. विश्व का सबसे बड़ा सर्च इंजिन है कुइल (Cuil – उच्चारण क्या सही है?)

cuil - world's biggest search engine

कुइल इसी सोमवार को जारी किया गया, और जारी होते ही इसने दावा किया कि ये विश्व का सबसे बड़ा सर्च इंजिन है – गूगल से भी बड़ा और माइक्रोसॉफ़्ट से भी बड़ा.

आइए, देखें कि इसके दावे में कितना दम है –

मैंने एक छोटे से, कम प्रचलित शब्द – Ratlam के लिए ढूंढा.

कुइल ने परिणाम कुछ यूँ फेंका –

cuil the new search for Ratlam

और गूगल ने कुछ यूँ दिखाया –

cuil the new search for Ratlam comparing with google

चलिए, यहाँ तो कुइल कुछ बाजी मारता दिखता है. उसका प्रस्तुतिकरण का अंदाज मजेदार और बढ़िया है, और अपने को काम की चीज पर दन्न से जाने में दिक्कत नहीं होगी. सर्च परिणाम भी संदर्भित और काम के हैं, और तीव्र प्राप्त हुए.

फिर मैंने हिन्दी में सर्च किया – प्रचलित शब्द ब्लॉगवाणी.

गूगल ने निकाले 75300 पृष्ठों की कड़ियाँ. आइए, देखें कि कुइल क्या कहता है –

cuil - world's biggest search engine searching for blogvani

लगता है कुइल हिन्दी नहीं समझता. हालाकि रोमन में ढूंढने से हिन्दी पृष्ठों को दिखाता तो है, परंतु सर्च इंटरफेस में हिन्दी डालते ही मामला गड़बड़ हो जाता है. तो, जब तक हिन्दी को ये ढूंढ कर नहीं बताएगा, इसे कैसे मान लें कि ये विश्व का सबसे बड़ा सर्च इंजिन है? विश्व का सबसे बड़ा सर्च इंजिन होने का दावा और हिन्दी खोज में सक्षम नहीं – बात कुछ जमी नहीं.

तो इसके मायने क्या? मायने यही कि अभी भी गूगल ही विश्व का सबसे बड़ा सर्च इंजिन है – मानो या ना मानो!

ability test of hindi blogger

क्या खयाल है? चलिए मान लिया, यहाँ कोई न न्यूनतम और न महत्तम मापदण्ड है, मगर योग्यता के नाम पर कुछ तो होगा? पर, अब आप कहेंगे कि एक चिट्ठाकार की योग्यता आखिर क्या होनी चाहिए जो जांची-परखी भी जा सके. और यदि कुछ तो ऐसा होगा जिसे चिट्ठाकार की योग्यता कहा जा सके तो फिर उसे जांचने में कोई हर्ज है क्या?

मेरे एक चिट्ठे पर हाल ही में एक टिप्पणी आई – “*तिए ये तूने क्या लिखा है?” वो तो टिप्पणी मॉडरेशन का धन्यवाद कि मैंने उस टिप्पणीकार के *तियापे को प्रकाशित नहीं किया. मगर यहाँ पर सवाल यह उठता है कि मैंने जो कुछ लिखा था, वो तो मेरी अपनी नज़रों में महान था. तमाम इंटरनेटी दुनिया में तांक झांक कर मसाला उड़ाकर निचोड़ बनाकर मैंने लिखा था. मेरे अपने हिसाब से वो एक क्लासिक था. जितनी दफा और जितनी मर्तबा और जितनी बार, बार-बार मैं उसे पढ़ता, पढ़कर मुग्ध हो जाता और सोचता कि क्या गजब लिखा है. मुझे लगता कि उसने कहा था की तर्ज पर मेरा यह मात्र एक लेख मुझे चिट्ठासंसार में स्थापित कर सकने की क्षमता रखता है. मगर उस पर आई भी तो यह टिप्पणी!

मगर, फिर मैंने अपने आप को दिलासा दिया - वह पाठक और वह टिप्पणीकार अवश्य ही *तिया रहा होगा जो इंटरनेट के खरबों पृष्ठों को अनदेखा कर मेरे चिट्ठे पर मंडरा रहा था. जाहिर है, उसका ज्ञान मेरे ज्ञान से करोड़ों गुना उच्चकोटि का रहा होगा, और इसीलिए उसने मेरे लेख पर ऐसी टिप्पणी दी. मैंने अपने ज्ञान के मुताबिक, अपनी योग्यता के मुताबिक जो लिख मारा था, वो मेरे बराबर या मुझसे नीचे ज्ञान रखने वाले, मुझसे नीचे योग्यता रखने वाले पाठकों के लिए, जाहिर है, ठीक होगा, परंतु मुझसे ऊपर की योग्यता रखने वालों के लिए मेरा लिखा तो हर हाल में आखिर *तियापा ही होगा!

पर, इस घटना - इस टिप्पणी से मुझे सदमा सा लगा. मुझे अपनी योग्यता पर संदेह सा होने लगा. लगा, एक चिट्ठाकार के नाते मुझे अपनी योग्यता की जांच करनी होगी. मैंने सोचा, चिट्ठाकारों को चिट्ठा पाठकों की पठन योग्यताओं पर संदेह करना फिजूल है. मुझे अपने अंदर के चिट्ठाकार की योग्यता जांच के लिए ही कुछ सूत्र, कुछ फ़ॉर्मूले गढ़ने होंगे. चिट्ठाकारी योग्यता जांच के लिए कुछ करना ही होगा. और फिर तब ही मेरी योग्यता में इजाफ़ा हो सकेगा.

वैसे, नियमित योग्यता जांच तो हर क्षेत्र में, हर एक के होने चाहिएँ. हाल ही में हुए संसद सत्र का उदाहरण लें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी. सांसदों की क़ीमतें 25 करोड़ आंकी गई. विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र के सांसदों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए. वैसे भी, इस महंगाई के जमाने में 100 करोड़ से कम की कीमत तो होना ही नहीं चाहिए. यदि इन सांसदों की नियमित योग्यता जांच होती रहती तो इनमें से अधिकतर योग्य बने रहते और फिर इनमें से हर एक की कीमतें यकीनन 100 करोड़ से ज्यादा होती. अयोग्य सांसदों, जिनकी योग्यताओं की कभी भी जांच नहीं हुई, 25 करोड़ कीमत तो ओवर रेटेड है. साथ ही संसद पटल पर घूँस के 1 करोड़ के नोट लहराए गए. भारतीय संसद पटल की सिर्फ इतनी ही योग्यता – कि वहां सिर्फ 1 करोड़ लहराए गए? 25-50 करोड़ के नोट लहराते तो कोई बात बनती. ये तो भारतीय संसद का सरासर अपमान है. मेरे मुँह से अनायास वही बात निकली जो मेरे चिट्ठे के उस टिप्पणीकार की थी...

तो, समय समय पर, नियमित योग्यता जाँच तो होते ही रहने चाहिएँ. चिट्ठाकारों के भी, और चिट्ठापाठकों के भी. इस तरह दोनों तरफ योग्यताओं में इजाफा होता रहेगा. जब जाँच होंगे, तो कुछ मापदण्ड भी तय करने होंगे. विविध क्षेत्रों में योग्यता जाँच के लिए कुछ न्यूनतम मापदण्ड कुछ यूँ हो सकते हैं –

  • केंद्रीय मंत्रियों के लिए - लालू की तरह मतदाताओं का मनोरंजन कर उन्हें उल्लू बनाने की योग्यता.
  • सरकारी अफ़सर के लिए – अपनी तनख़्वाह से सौ गुना अधिक रिश्वत/कमीशन उगाह सकने की योग्यता.
  • सरकारी कर्मचारी के लिए – महीने भर में अधिकतम बहाने बनाने, अधिकतम छुट्टी लेने व हर हाल में न्यूनतम काम करने की योग्यता.
  • प्रोफ़ेसरों के लिए – कोर्स के अलावा हर संभव विषय में शानदार लेक्चर दे सकने की योग्यता.
  • पुलिस के लिए – एफआईआर लिखने के लिए फरियादी से यथा संभव उसके औकात से ज्यादा माल निकलवा सकने तथा उसे ही अपराधी सिद्ध करने की योग्यता.

जाहिर है, सूची अनंत रूप से लंबी हो सकती है. और इससे पहले कि आप मेरी चिट्ठाकारी योग्यता पर संदेह कर आगे पढ़ने के बजाए सीधे कोई उलटी सीधी टिप्पणी लिख मारें और मैं उसके बिना पर आपकी चिट्ठापठन योग्यता पर संदेह करने लगूं, मामला यहीं बन्द करता हूं.

फिर भी, क्यों न अपन अपनी योग्यताओं की जाँच करवा ही लें? क्या खयाल है? पर, वे योग्यताएं आखिर क्या होंगी?

मूलत: http://raviratlami.blogspot.com पर प्रकाशित

techfaq

टेकफैक http://www.tech-faq.com/lang/hi/ हिन्दी में?


हुँह, पर ये तो मूल अंग्रेज़ी का 'स्वचालित हिन्दी अनुवाद' स्थल है!
समस्या तब है जब गूगल हिन्दी खोज के परिणाम ऐसी साइटों से आएंगे (आ रहे हैं, तभी यह पता चला), और हम भाषा पर सिर धुनते रहेंगे, जब तक कि समझ में न आए कि भाई, माजरा क्या है!

fuel hindi
रेडहेट लिनक्स के प्रायोजन में विगत 12-13 जुलाई 2008 को पुणे में बारंबार प्रयुक्त होने वाली हिन्दी कम्प्यूटिंग शब्दावली (FUEL – फ्रिक्वेंटली यूज्ड एन्ट्रीज़ फ़ॉर लोकलाइज़ेशन) की समीक्षा, परिष्करण व परिमार्जन हेतु एक आयोजन सम्पन्न हुआ. विस्तृत विवरण इस आयोजन के समन्वयक राजेश रंजन ने अपने चिट्ठे पर तथा फ्यूल के आधिकारिक स्थल पर दर्ज किया है.

हिन्दी अनुवादों में – खासकर कम्प्यूटिंग तकनालाजी को अनुवाद करते समय क्या और कैसी समस्या आती है इसे राजेश रंजन ने अपनी प्रस्तुति में खूबसूरती से बयान किया है. इस मजेदार, जानकारी परक प्रस्तुति की पीडीएफ़ फ़ाइल जरूर देखें.

ज्ञातव्य है कि इस सूची को कोई पिछले 5 वर्षों के दौरान लगातार परिष्कृत व परिमार्जित किया जाता रहा है. हालाँकि यह सूची अभी भी अनंतिम है, मगर एक तरह से परिपूर्ण है, और अनुप्रयोगों के हिन्दी अनुवादकों से आग्रह है कि वे हर प्लेटफ़ॉर्म पर एक जैसे अनुवादों हेतु इन्हीं शब्दों का प्रयोग करें तो बेहतर होगा. वैसे, अच्छे सुंदर और सटीक परंतु सरल हिन्दी शब्दों की खोज लगातार जारी है और जारी रहेगी. उदाहरण के तौर पर एक शब्द अंग्रेजी का है – हाईलाइट (Highlight) इसके लिए अब तक हिन्दी अनुवादों में उभारें प्रयोग में लिया जाता रहा था. जब इस पर चर्चा छिड़ी तो एक बढ़िया विकल्प सामने आया – आलोकित करें. सूची में दिए हिन्दी शब्दों के लिए आप भी अपने सुझाव यहाँ पर दर्ज कर सकते हैं.

इस सूची को अन्य भाषाओं के लिए भी आधार के रूप में प्रयोग में लिया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ी भाषा में कम्प्यूटर शब्दावली के कुछ शुरूआती अनुवाद यहाँ उपलब्ध हैं.

यह संपूर्ण सूची विविध फ़ॉर्मेट में आपके प्रयोग हेतु उपलब्ध है.
पीओ फ़ॉर्मेट / एक्सेल / पीडीएफ़ / ओडीएस / एचटीएमएल

इस सफल आयोजन के लिए रेडहेट व समन्वयक राजेश रंजन को धन्यवाद.

इस मौके पर चिट्ठाकार देबाशीष चक्रवर्ती ने अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई.

ravi debashish (Small)

साथ ही, इस मौके पर विश्व के सर्वाधिक स्टीकर युक्त लैपटॉप {व उसके मालिक} को देखने का सौभाग्य मिला. आप भी देखें -
g karunakar with world's most stickered laptop (Small)

prism
जमाना वेब अनुप्रयोगों का है. स्थिति यह है कि इंटरनेट युक्त डेस्कटॉप / लॅपटॉप पीसी के अधिकतर अनुप्रयोग जाल अनुप्रयोग हैं जो ब्राउजरों पर चलते हैं. उदाहरण के लिए जी-मेल, याहू-मेल, ब्लॉगर, वर्डप्रेस, ऑनलाइन गेम्स, गपशप व त्वरित संदेशवाहक, इत्यादि-इत्यादि. और, आज जाल अनुप्रयोगों के जरिए कम्प्यूटिंग के आमतौर पर तमाम काम निपटाए जा सकते हैं.
अब तो गूगल डॉक्स जैसे वेब अनुप्रयोग भी आ चुके हैं जो आपको इंटरनेट के जरिए वेब ब्राउजर के भीतर ही संपूर्ण ऑफिस सूट जैसे अनुप्रयोग मुहैया कर रहे हैं.
ऐसे जाल-अनुप्रयोगों को अब तक ब्राउजर के भीतर ही चलाए जाने की समस्या थी. परंतु अब आपके पास कई किस्म के विकल्प हैं जिनसे आप ऐसे जाल अनुप्रयोगों को डेस्कटॉप अनुप्रयोगों की तरह चला सकते हैं. एडोबी एयर, माइक्रोसॉफ़्ट सिल्वरलाइट और मॉजिल्ला प्रिज्म जैसे प्रकल्प जो वेब अनुप्रयोगों को डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह उपयोग की सहूलियतें प्रदान करने लगे हैं तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं.
किसी जाल अनुप्रयोग को डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह इस्तेमाल करने के क्या फ़ायदे हो सकते हैं भला? अब यह तो आपको इन्हें प्रयोग करने के उपरांत ही पता चलेगा, परंतु सबसे बड़ी सहूलियत ये है कि डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह एक बार सेट करने के उपरांत आप इन्हें अपने स्टार्ट मेन्यू या डेस्कटॉप शॉर्टकट से सीधे चला सकते हैं, बार बार ब्राउजर खोल कर उन साइटों में जाने की आवश्यकता नहीं होती. बहुत बार, आपके लॉगिन खातों और कुकीज को इन अनुप्रयोगों में सेट कर लिया जाता है और फिर आपको दोबारा बारंबार लॉगिन करने की झंझट भी नहीं होती. जरा जीमेल (या याहू मेल को) को डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह प्रयोग कर देखें. अंतर अपने आप पता चल जाएगा. आइए, देखें कि जीमेल को हम प्रिज़्म के जरिए डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह कैसे चला सकते हैं.
सबसे पहले प्रिज़्म डाउनलोड करें व अपने कम्प्यूटर में संस्थापित करें.
स्टार्ट > प्रोग्राम मेन्यू से प्रिज्म चालू करें. URL में जीमेल का पता भरें. उसे नाम दें. हिन्दी में भी दे सकते हैं. जैसे कि गूगल मेल. अन्य सेटिंग भी दे सकते हैं – जैसे कि स्टार्ट मेन्यू में जोड़ने के लिए वह विकल्प चुनें. OK पर क्लिक करें.
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अब स्टार्ट > प्रोग्राम मेन्यू में जाएं. वहां वेब एप्स खंड में आपका नया जुड़ा अनुप्रयोग दिखाई देगा. उस पर क्लिक करें. आपका जाल अनुप्रयोग – डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह रूप-रंग लिए चालू होगा. हाँ, ध्यान रखें कि आपका इंटरनेट कनेक्शन बदस्तूर चालू रहे.
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प्रिज्म के साथ ख़ूबी ये है कि आप इसे लिनक्स तथा मॅक ओएस में भी संस्थापित कर सकते हैं और तमाम जाल अनुप्रयोगों को वहां भी डेस्कटॉप अनुप्रयोग की तरह चला सकते हैं. – जी हाँ, ब्लॉगवाणी को भी और चिट्ठाजगत् को भी – पर असली मजा है गूगल स्प्रेडशीट जैसे जाल अनुप्रयोगों को डेस्कटॉप अनुप्रयोगों की तरह प्रयोग करने में.
अद्यतन : इस विषय पर अमित गुप्ता द्वारा लिखा एक परिपूर्ण आलेख यहाँ पढ़ें

world getting happier

अच्छा, क्या आप ये बता सकते हैं कि आप कल ज्यादा खुश थे कि आज? अच्छा, अच्छा - परसों आप कितना खुश थे? आने वाले कल या फिर आने वाले परसों के घटत-बढ़त के बारे में क्या खयाल है आपका – बता सकते हैं कि आप कितना खुश रह पाएंगे?

यदि एक सर्वे के नतीजों की मानें तो यकीनन आप कल की अपेक्षा आज ज्यादा खुश हैं और कल को और ज्यादा खुश होंगे. आज से दस साल पहले आप जितना खुश थे उससे कहीं ज्यादा खुश आप आज हैं. इस हिसाब से, दस साल पहले की आपकी खुशी, आपके बीस साल पहले की खुशी से ज्यादा रही थी क्योंकि इस दरमियान दुनिया दिन पर दिन ज्यादा खुश होती जा रही थी, होती जा रही है. और, जाहिर है, दुनिया के साथ दुनिया के लोग दिनोंदिन ज्यादा खुश होते जा रहे हैं.

अब पड़ताल ये करनी होगी कि हमारी खुशी बढ़ाने के पीछे के फ़ैक्टर आखिर क्या हैं. शोधकर्ताओं को छोड़ दें – हो सकता है, उनके अपने मापदंड होंगे खुशियों को मापने के. मगर कई मामलों में मैं वास्तव में बहुत खुश हूं. पहले की अपेक्षा बहुत सी खुशियाँ हैं मेरे पास. कुछ उदाहरण देना चाहूंगा -

लोग महंगाई का नाहक रोना रो रहे हैं. दरअसल इसके ‘खुशी’ फ़ैक्टर की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया है. बीते कल को मैं जिस चीज को चार आने में खरीदता था, आज उसे चार रुपए में खरीदता हूँ. मेरी खरीदने की औकात भले ही न बढ़ी हो, मगर मैं खुश हूं कि मैं महंगी चीजें खरीदने के महंगे सपने तो देख सकता हूं. पहले सपने भी आते थे तो वही चार आने के! अब जब मेरे सपने भी रईस हो गए हैं तो मैं क्योंकर न खुश होऊं भला. टमाटर और गोभी के भाव पचास रुपए किलो बिकते हैं तो मैं खुश होता हूं कि चलो व्यापारियों और किसानों को अब उनके उत्पादन का सही मूल्य तो मिलने लगा है. अब मैं बाजार जाता हूं, तो पचास रुपए किलो की गोभी लेकर, भले ही महीने में एकाध बार और सौ-दो सौ ग्राम खरीदता होऊं, पर मेरे मन में गर्व की, खुशी की अनुभूति होती है - मैं भी गोभी पचास रुपए किलो की खरीदकर खा सकता हूँ. रुपए में किलो भर गोभी नित्य खरीदकर सुबह-शाम खाने में यह खुशी कहीं मिल सकती है भला? दस रुपए किलो की गोभी भी कोई गोभी है लल्लू? साला उसमें तो स्वाद भी नहीं आता. आ ही नहीं सकता. और जब यह कल को सौ रुपए या डेढ़ सौ रुपए किलो बिकेगा, तब इसके क्या कहने. फिर मैं जब कोई साल दो साल में यदा कदा लाकर खा लिया करूंगा तब मैं आज की अपेक्षा कहीं ज्यादा खुश होऊँगा. पचास रुपए की खुशी और सौ रुपए की खुशी में ज्यादा खुशी कौन सी है ये बात तो खैर, उल्लू और गधे भी बता देंगे.

संचार साधनों की ही ले लें. पहले कितना कष्ट होता था. पत्र-पोस्टकार्ड-अंतर्देशीय-लिफ़ाफ़ा न जाने क्या क्या जतन करते थे अपना खोज खबर अपने दोस्तों परिजनों को बताने के. और कभी तो तमाम झंझटों को पार करते हुए खुद अपनी तशरीफ लेकर पधारना पड़ता था. अब तो दन्न से मोबाइल घुमाया मिस काल दिया और हो गया. थोड़े से ज्यादा खुश लोगों के लिए याहू-एमएसएन ऑडियो-वीडियो चैट है. अब तो आपको सालगिरह तो क्या, तेरहीं-बरसी पर भी कहीं जाने की जरुरत नहीं, किसी से प्रत्यक्ष मिलने की झंझट नहीं. फोन से, चैट से, ईमेल से शुभकामनाएं-संवेदना - चाहे जिस तरह के संदेश हों, चाहे जिस मात्रा में हों, प्रकट कर सकते हैं और भले ही सामने वाला आभार तले मर खप जाए. खुशियाँ देने वाले इन औजारों का मैं भी भारी भरकम प्रयोग बेहद खुशी से करता हूं, और जाहिर है जब इन औजारों में नई नई ख़ूबियाँ नित्य आती हैं तो मैं और ज्यादा-ज्यादा खुश हो लेता हूं.

अब, वैसे तो मैं आपको ऐसे दर्जनों और वजहें गिना सकता हूँ पहले की तुलना में ज्यादा और ज्यादा खुश रहने के. पर इससे आपका क्या सरोकार? इस दौरान आप भी कोई कम खुश थोड़े ही न हुए होंगे. सारा जग जो खुश, ज्यादा खुश हुआ जाता है. तो फिर निर्लज्जता से खीसें क्यों निपोर रहे हैं? कुछ अपनी भी तो गिनाएं.

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व्यंज़ल

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औरों को दुःखी देख मैं खुश हो गया

बदलाव की बातें करके खुश हो गया


वहां और भी थे बहुत से सबब मगर

धर्म की बात सुन कर खुश हो गया


हादसों के प्रभाव शायद बदलने लगे

तभी मेरा एक हिस्सा खुश हो गया


गया तो था मैं एक सजदे में मगर

विनाश की बातें कर खुश हो गया


ये फ़क़त वक्त वक्त की बात है रवि

रोने की बात पे आज खुश हो गया


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(समाचार कतरन साभार टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

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