अभिनव बिंद्रा, ये तूने क्या किया…?

28 वर्षों का रेकॉर्ड तूने तोड़ दिया. ले देकर, बड़ी मेहनत से, बड़ी मुश्किल से 1 अरब से अधिक भारतीय जनता ने 25 वर्षीय सिल्वर जुबली रेकॉर्ड बनाया था और उसे आगे बढ़ाकर 50 वर्षीय गोल्डन जुबली रेकॉर्ड (28 तो हो ही गया था, बस बाईस ही तो बचे थे,) के सपने देख रहे थे, उसे तूने अपने एक स्वर्ण पदक से, एक क्षण में ढहा दिया. क्या मिला अभिनव, तुझे क्या मिला? तुझे 1 अरब भारतीयों का खयाल नहीं रहा. उनके सपनों का खयाल नहीं रहा. उनके गोल्डन जुबली बनाने के रेकॉर्ड के सपने को तूने अपने एक गोल्डन पदक से टाइड की तरह चकाचक धो कर रख दिया.

अभिनव, तेरे इस पदक से हम भारतीयों को और भी ढेरों, भयंकर समस्याएं पैदा हो गई हैं. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक. और इन समस्याओं के पीछे तुम्हारा ही हाथ होगा. वैसे भी भारत में समस्याएँ कुछ कम थीं क्या जो तुमने एक और समस्या ला खड़ी की है? तमाम भारतीय और युवा खिलाड़ी अब ओलंपिक पदकों के सपने देखने लगेंगे. सरकारी-गैर सरकारी तंत्र और भारतीय ओलंपिक खेल संघ भी अब इस सच्चाई को स्वीकारेंगे कि सचमुच भारतीय खिलाड़ियों द्वारा कोई पदक जीता भी जा सकता है, और वे इस समस्या का हल जोरों से तलाशने लगेंगे जो उनके लिए और भी बड़ी समस्या होगी. अभी तक तो ओलंपिक पदकों के सपने देखने के कोई मायने ही नहीं थे – क्योंकि हम सभी 1 अरब भारतीय तो पदक विहीनता का 50 वर्षीय रेकॉर्ड बनाने के सपने देखने में लगे हुए थे. अब जब तूने उसे ध्वस्त कर दिया है अभिनव, तो बताओ पदक विहीनता के इस रेकॉर्ड को नए सिरे से बनाने में कोई फायदा है क्या? इससे अच्छा तो पदक हासिल करने के सपने देखे जाएं. और यही अब हम 1 अरब से अधिक भारतीय करेंगे. और, यहीं पर समस्या आएगी. ये तो तुम्हें भी मालूम होगा अभिनव, ऐसे सपने देखने से कुछ हासिल नहीं होगा. न नेम न फेम. और न मनी. ये कोई क्रिकेट थोड़े ही है.

ये कोई क्रिकेट थोड़े ही है जहाँ सट्टे बट्टे में नाम-दाम दोनों कमा लिए और एक ठो बैट, एक ठो बॉल और तीन लकड़ी के डंडे लेकर बीच सड़क पर या चौराहे पर प्रेक्टिस के लिए निकल लिए, और युवराज या पठान की तरह निकल लिए. तीरंदाजी हो या तैराकी, इनकी प्रेक्टिस के लिए भारत में न गली कूचों में सुविधा है, न अनंत काल तक होगी. बस हम सपने देखते रहेंगे. आसमानी, रिक्त, कभी पूरे न होने वाले सपने. ये तूने क्या किया अभिनव? हम भारतीयों के लिए ये सपने क्यों ले आया अभिनव?

बच्चा कभी खेलता कूदता नजर आएगा तो माँएं अपने बच्चों को कुछ इस तरह टांट मार कर डांटा करेंगी – चल चल, अच्छा अभिनव बनने चला है (क्योंकि 28 साला रेकॉर्ड ब्रेक कर किंवदंती तो तुम बन चुके हो, जिसके लिए तुम्हें हमारा प्रणाम.). या कभी बच्चे किताबों में सिर खपाए मिला करेंगे तो इसके उलट बातें सुनने को मिला करेंगी – जब देखो तब किताब में सिर खपाए मिलता है – जरा घंटा भर खेल आता तो तुझमें भी अभिनव के कुछ लक्षण आ जाते... यानी आगे से संकट और पीछे से महा संकट. किस संकट में डाल दिया तूने हम भारतीयों को अभिनव?

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(चित्र – साभार तरंग)

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tag – abhinav bindra, Olympic gold medal shooting 2008

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raviratlami ji apka myangatmak lagja behtar hai.par kuch char vakai sukriya ada karnae valae hotae hain.badhai denae valae.mughae lagta hai vyang kae liyae aapnae thik subject nahin chuna. sandhya....

सच है. अभिनव ने तो सचमुच समस्या खड़ी कर दी है. और ये एक सुखद समस्या है....:-)

वाकई में, आपने एक बड़ी समस्या की ओर इशारा किया है!

मेरे एक मित्र ने इस मामले में टिप्पणी कुछ इस तरह की
" यार यह तो गड़बड़ हो गई, अब एक स्वर्ण पदक आ गया, सारी दुनिया जान गई कि ओलंपिक में भारत भी शामिल है। सब हंसी उड़ाएंगे कि इत्ता बड़ा देश और सिर्फ़ एक सोने का तमगा। पदक नही आता तो कम से लोग कई देशों के लोग तो नही जानते कि भारत भी हिस्सा ले रहा है"

खैर!
अपनी तरफ से बधाई बिन्द्रा को और शुक्रिया भी।

हम भी आपके माध्यम से अभिनव को बधाई देते हुए इस समस्या पर सोच-विचार में डूबने जा रहे हैं। इस बीच उस होनहार के लिए कुछ इत्र सुगन्ध अपने रतलाम से इकठ्ठा करके उसका स्वागत करने और उलाहना देने की तैयारी कर लीजिए। रतलाम के इत्र का सम्दर्भ जानने के लिए मेरे ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर पधारें

हा हा सही कहा, अभिनव को इस समस्या को खड़ी करने का आभार और हार्दिक बधाई

:) :)

जीत की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं!

चक दे फट्टे , मार लिया मैदान , जीत ली जंग , दे दिया जवाब , बन गये बादशाह , ख़ुशी से झूम रहा है पूरा देश .......शाबाश अभिनव !

अभिनव को हार्दिक बधाई।
रविजी, आपने एक अलग ही अंदाज़ में अभिनवकी सराहना की है।
पठनीय लेख है।

आज इस विषय से हटकर मन में कुछ विचार इस तरह आते हैं।
इस खेल में निशाना छोटा होता है पर साफ़ नज़र आता है।
लेकिन जब निशाना ही नज़र नहीं आता तब क्या करें?
मेरा संकेत हमारे देश में छिपे हुए आतंकवादियों पर है।
काश कोई तरीका होता जिससे हम इन बडे़ बडे़ बल्कि अदृश्य आतंकवादियों से निपट सकें।
कहाँ है ऐसी बन्दूक और उसे चलाने वाला?

वाकई ये बड़ी चिंता का विषय :-)

शुभकामनाएं पूरे देश और दुनिया को
उनको भी इनको भी आपको भी दोस्तों

स्वतन्त्रता दिवस मुबारक हो
saartak vyang
badhai.........

एक लड़की मिस यूनिवर्स बनी तो भारत की सभी लड़कियों के लिये सुन्दरता के संसाधनों की परेशानी हो गयी थी।
अब सब भाई लोग यह हाई-टेक गन लेने में जुट जायेंगे!
अच्छा लिखा जी।

Veresh

bahut badiya likha , Abhinav ne ek aacha record toda hai . Lekin ub nai samasay kahdi ho gayi woh yeh ki hum log michael philip se jyada medal jeet payege ki nahin ? dekhte hai kya hota hai tub tuk subke liya 1 to hai hi.

इस समस्या की तरफ़ तो हमारा ध्यान ही नहीं गया था, बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है आपने :-)

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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